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श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

१७६

  • रामचरितमानस *

भगवान् प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने भक्तोंके लिये राजाका शरीर धारण किया और साधारण मनुष्योंके-से अनेकों परम पावन चरित्र किये ॥ ७२ ( क ) ॥

जथा अनेक बेष धरि नृत्य करइ नट कोइ ।

सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ ॥ ७२ ( ख ) ॥

जैसे कोई नट (खेल करनेवाला) अनेक वेष धारण करके नृत्य करता है, और वही-वही (जैसा वेष होता है, उसीके अनुकूल) भाव दिखलाता है, पर स्वयं वह उनमेंसे कोई हो नहीं जाता, ॥ ७२ ( ख ) ॥

असि रघुपति लीला उरगारी । दनुज बिमोहनि जन सुखकारी ॥

जे मति मलिन बिषयबस कामी । प्रभु पर मोह धरहिं इमि स्वामी ॥

हे गरुड़जी! ऐसी ही श्रीरघुनाथजीकी यह लीला है, जो राक्षसोंको विशेष मोहित करनेवाली और भक्तोंको सुख देनेवाली है। हे स्वामी! जो मनुष्य मलिनबुद्धि, विषयोंके वश और कामी हैं, वे ही प्रभुपर इस प्रकार मोहका आरोप करते हैं ॥ १ ॥

नयन दोष जा कहैं जब होई । पीत बरन ससि कहुँ कह सोई ॥

जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा । सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा ॥

जब जिसको [कवैल आदि] नेत्रदोष होता है, तब वह चन्द्रमाको पीले रंगका कहता है। हे पक्षिराज! जब जिसे दिशाभ्रम होता है, तब वह कहता है कि सूर्य पश्चिममें उदय हुआ है ॥ २ ॥

नौकारूढ़ चलत जग देखा । अचल मोहबस आपुहि लेखा ॥

बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादी । कहहिं परस्पर मिथ्याबादी ॥

नौकापर चढ़ा हुआ मनुष्य जगत्को चलता हुआ देखता है और मोहवश अपनेको अचल समझता है। बालक घूमते (चक्राकार दौड़ते) हैं, घर आदि नहीं घूमते। पर वे आपसमें एक-दूसरेको झूठा कहते हैं ॥ ३ ॥

हरि बिषइक अस मोह बिहंगा । सपनेहुँ नहिं अग्यान प्रसंगा ॥

मायाबस मतिमंद अभागी । हृदयँ जमनिका बहुबिधि लागी ॥

हे गरुड़जी! श्रीहरिके विषयमें मोहकी कल्पना भी ऐसी ही है, भगवान्में तो स्वप्नमें भी अज्ञानका प्रसंग (अवसर) नहीं है। किन्तु जो मायाके वश, मन्दबुद्धि और भाग्यहीन हैं और जिनके हृदयपर अनेकों प्रकारके परदे पड़े हैं, ॥ ४ ॥

ते सठ हठ बस संसय करहीं । निज अग्यान राम पर धरहीं ॥

वे मूर्ख हठके वश होकर सन्देह करते हैं और अपना अज्ञान श्रीरामजीपर आरोपित करते हैं ॥ ५ ॥

दो०—काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूप ।

ते किमि जानहिं रघुपतिहि मूढ़ परे तम कूप ॥ ७३ ( क ) ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१७७

जो काम, क्रोध, मद और लोभमें रत हैं और दुःखरूप घरमें आसक्त हैं, वे श्रीरघुनाथजीको कैसे जान सकते हैं? वे मूर्ख तो अन्धकाररूपी कुएँमें पड़े हुए हैं ॥७३ (क) ॥

निर्गुण रूप सुलभ अति सगुण जान नहीं कोइ।

सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ ॥ ७३ (ख) ॥

निर्गुण रूप अत्यन्त सुलभ (सहज ही समझमें आ जानेवाला) है, परन्तु [गुणातीत दिव्य] सगुण रूपको कोई नहीं जानता। इसलिये उन सगुण भगवान्के अनेक प्रकारके सुगम और अगम चरित्रोंको सुनकर मुनियोंके भी मनको भ्रम हो जाता है ॥ ७३(ख) ॥

सुनु खगेस रघुपति प्रभुताई। कहउँ जथामति कथा सुहाई ॥ जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही। सोउ सब कथा सुनावउँ तोही ॥

हे पक्षिराज गरुड़जी! श्रीरघुनाथजीकी प्रभुता सुनिये। मैं अपनी बुद्धिके अनुसार वह सुहावनी कथा कहता हूँ। हे प्रभो! मुझे जिस प्रकार मोह हुआ, वह सब कथा भी आपको सुनाता हूँ ॥ १ ॥

राम कृपा भाजन तुम्ह ताता। हरि गुन प्रीति मोहि सुखदाता ॥ ताते नहीं कछु तुम्हहि दुरावउँ। परम रहस्य मनोहर गावउँ ॥

हे तात! आप श्रीरामजीके कृपापात्र हैं। श्रीहरिके गुणोंमें आपकी प्रीति है, इसीलिये आप मुझे सुख देनेवाले हैं। इसीसे मैं आपसे कुछ भी नहीं छिपाता और अत्यन्त रहस्यकी बातें आपको गाकर सुनाता हूँ ॥ २ ॥

सुनहु राम कर सहज सुभाऊ। जन अभिमान न राखहिं काऊ ॥ संसृत मूल सूलप्रद नाना। सकल सोक दायक अभिमाना ॥

श्रीरामचन्द्रजीका सहज स्वभाव सुनिये। वे भक्तमें अभिमान कभी नहीं रहने देते। क्योंकि अभिमान जन्म-मरणरूप संसारका मूल है और अनेक प्रकारके क्लेशों तथा समस्त शोकोंका देनेवाला है ॥ ३ ॥

ताते करहिं कृपानिधि दूरी। सेवक पर ममता अति भूरी ॥ जिमि सिसु तन ब्रन होइ गोसाई। मातु चिराव कठिन की नाई ॥

इसीलिये कृपानिधि उसे दूर कर देते हैं; क्योंकि सेवकपर उनकी बहुत ही अधिक ममता है। हे गोसाई! जैसे बच्चेके शरीरमें फोड़ा हो जाता है, तो माता उसे कठोर हृदयकी भाँति चिरा डालती है ॥ ४ ॥

दो०—जदपि प्रथम दुख पावइ रोवइ बाल अधीर।

ब्याधि नास हित जननी गनति न सो सिसु पीर ॥ ७४ (क) ॥

१७८

  • रामचरितमानस *

यद्यपि बच्चा पहले (फोड़ा चिराते समय) दुःख पाता है और अधीर होकर रोता है, तो भी रोगके नाशके लिये माता बच्चेकी उस पीड़ाको कुछ भी नहीं गिनती (उसकी परवा नहीं करती और फोड़ेको चिरवा ही डालती है) ॥ ७४ (क) ॥

तिमि रघुपति निज दास कर हरहिं मान हित लागि।

तुलसिदास ऐसे प्रभुहि कस न भजहु भ्रम त्यागि ॥ ७४ (ख) ॥

उसी प्रकार श्रीरघुनाथजी अपने दासका अभिमान उसके हितके लिये हर लेते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि ऐसे प्रभुको भ्रम त्यागकर क्यों नहीं भजते ॥ ७४ (ख) ॥

राम कृपा आपनि जड़ताई। कहउँ खगेस सुनुहु मन लाई॥ जब जब राम मनुज तनु धरहीं। भक्त हेतु लीला बहु करहीं॥

हे पक्षिराज गरुड़जी! श्रीरामजीकी कृपा और अपनी जड़ता (मूर्खता) की बात कहता हूँ, मन लगाकर सुनिये। जब-जब श्रीरामचन्द्रजी मनुष्यशरीर धारण करते हैं और भक्तोंके लिये बहुत-सी लीलाएँ करते हैं ॥ १ ॥

तब तब अवधपुरी में जाऊँ। बालचरित बिलोकि हरषाऊँ॥ जन्म महोत्सव देखउँ जाई। बरष पाँच तहँ रहउँ लोभाई॥

तब-तब मैं अयोध्यापुरी जाता हूँ और उनकी बाललीला देखकर हर्षित होता हूँ। वहाँ जाकर मैं जन्ममहोत्सव देखता हूँ और [भगवान्की शिशुलीलामें] लुभाकर पाँच वर्षतक वहीं रहता हूँ ॥ २ ॥

इष्टदेव मम बालक रामा। सोभा बपुष कोटि सत कामा॥ निज प्रभु बदन निहारि निहारी। लोचन सुफल करउँ उरगारी॥

बालकरूप श्रीरामचन्द्रजी मेरे इष्टदेव हैं, जिनके शरीरमें अरबों कामदेवोंकी शोभा है। हे गरुड़जी! अपने प्रभुका मुख देख-देखकर मैं नेत्रोंको सफल करता हूँ ॥ ३ ॥

लघु बायस बपु धरि हरि संगा। देखउँ बालचरित बहु रंगा॥

छोटे-से कौएका शरीर धरकर और भगवान्के साथ-साथ फिरकर मैं उनके भाँति-भाँतिके बालचरित्रोंको देखा करता हूँ ॥ ४ ॥

दो०— लरिकाई जहँ जहँ फिरहिं तहँ तहँ संग उड़ाउँ।

जूठनि परड़ अजिर महँ सो उठाड़ करि खाउँ ॥ ७५ (क) ॥

लड़कपनमें वे जहाँ-जहाँ फिरते हैं, वहाँ-वहाँ मैं साथ-साथ उड़ता हूँ और आँगनमें उनकी जो जूठन पड़ती है, वही उठाकर खाता हूँ ॥ ७५ (क) ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१७१

एक बार अतिसय सब चरित किए रघुबीर।

सुमिरत प्रभु लीला सोड़ पुलकित भयउ सरीर ॥ ७५ (ख) ॥

एक बार श्रीरघुवीरने सब चरित्र बहुत अधिकतासे किये। प्रभुकी उस लीलाका स्मरण करते ही काकभुशुण्डिजीका शरीर [प्रेमानन्दवश] पुलकित हो गया ॥ ७५ (ख) ॥

कहइ भसुंड सुनहु खगनायक। राम चरित सेवक सुखदायक ॥

नृप मंदिर सुंदर सब भाँती। खचित कनक मनि नाना जाती ॥

भुशुण्डिजी कहने लगे—हे पक्षिराज! सुनिये, श्रीरामजीका चरित्र सेवकोंको सुख देनेवाला है। [अयोध्याका] राजमहल सब प्रकारसे सुन्दर है। सोनेके महलमें नाना प्रकारके रत्न जड़े हुए हैं ॥ १ ॥

बरनि न जाड़ रुचिर अँगनाई। जहाँ खेलहिं नित चारिउ भाई ॥

बालविनोद करत रघुराई। बिचरत अजिर जननि सुखदाई ॥

सुन्दर अँगनका वर्णन नहीं किया जा सकता, जहाँ चारों भाई नित्य खेलते हैं। माताको सुख देनेवाले बालविनोद करते हुए श्रीरघुनाथजी अँगनमें विचर रहे हैं ॥ २ ॥

मरकत मृदुल कलेवर स्यामा। अंग अंग प्रति छबि बहु कामा ॥

नव राजीव अरुन मृदु चरना। पदज रुचिर नख ससि दुति हरना ॥

मरकत मणिके समान हरिताभ श्याम और कोमल शरीर है। अङ्ग-अङ्गमें बहुत-से कामदेवोंकी शोभा छायी हुई है। नवीन [लाल] कमलके समान लाल-लाल कोमल चरण हैं। सुन्दर अँगुलियाँ हैं और नख अपनी ज्योतिसे चन्द्रमाकी कान्तिको हरनेवाले हैं ॥ ३ ॥

ललित अंक कुलिसादिक चारी। नूपुर चारु मधुर रवकारी ॥

चारु पुरट मनि रचित बनाई। कटि किंकिनि कल मुखर सुहाई ॥

[तलवेमें] वज्रादि (वज्र, अंकुश, ध्वजा और कमल) के चार सुन्दर चिह्न हैं, चरणोंमें मधुर शब्द करनेवाले सुन्दर नूपुर हैं, मणियों, रत्नोंसे जड़ी हुई सोनेकी बनी हुई सुन्दर करधनीका शब्द सुहावना लग रहा है ॥ ४ ॥

दो०—रेखा त्रय सुंदर उदर नाभी रुचिर गँभीर।

उर आयत भ्राजत बिबिधि बाल बिभूषन चीर ॥ ७६ ॥

उदरपर सुन्दर तीन रेखाएँ (त्रिवली) हैं, नाभि सुन्दर और गहरी है। विशाल वक्षःस्थलपर अनेकों प्रकारके बच्चोंके आभूषण और वस्त्र सुशोभित हैं ॥ ७६ ॥

अरुन पानि नख करज मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर ॥

कंध बाल केहरि दर ग्रीवा। चारु चिबुक आनन छबि सीवा ॥

१८०

  • रामचरितमानस *

लाल-लाल हथेलियाँ, नख और अँगुलियाँ मनको हरनेवाले हैं और विशाल भुजाओंपर सुन्दर आभूषण हैं। बालसिंह (सिंहके बच्चे) के-से कंधे और शंखके समान (तीन रेखाओंसे युक्त) गला है। सुन्दर टुट्टी है और मुख तो छबिकी सीमा ही है ॥ १ ॥

कलबल बचन अधर अरुनारे । दुड़ दुड़ दसन बिसद बर बारै ॥ ललित कपोल मनोहर नासा । सकल सुखद ससि कर सम हासा ॥

कलबल (तोतले) बचन हैं, लाल-लाल ओंठ हैं। उज्ज्वल, सुन्दर और छोटी-छोटी [ऊपर और नीचे] दो-दो दंतुलियाँ हैं। सुन्दर गाल, मनोहर नासिका और सब सुखोंको देनेवाली चन्द्रमाकी [अथवा सुख देनेवाली समस्त कलाओंसे पूर्ण चन्द्रमाकी] किरणोंके समान मधुर मुसकान है ॥ २ ॥

नील कंज लोचन भव मोचन । भ्राजत भाल तिलक गोरोचन ॥ बिकट भृकुटि सम श्रवन सुहाए । कुंचित कच मेचक छबि छाए ॥

नीले कमलके समान नेत्र जन्म-मृत्यु [के बन्धन] से छुड़ानेवाले हैं। ललाटपर गोरोचनका तिलक सुशोभित है। भौंहें टेढ़ी हैं, कान सम और सुन्दर हैं, काले और घुँघराले केशोंकी छबि छा रही है ॥ ३ ॥

पीत झीनि झगुली तन सोही । किलकनि चितवनि भावति मोही ॥ रूप रासि नृप अजिर बिहारी । नाचहिं निज प्रतिबिंब निहारी ॥

पोली और महीन झँगुली शरीरपर शोभा दे रही है। उनकी किलकारी और चितवन मुझे बहुत ही प्रिय लगती है। राजा दशरथजीके आँगनमें विहार करनेवाले रूपकी राशि श्रीरामचन्द्रजी अपनी परछाहीं देखकर नाचते हैं, ॥ ४ ॥

मोहि सन करहिं बिबिधि बिधि क्रीड़ा । बरनत मोहि होति अति ब्रीड़ा ॥ किलकत मोहि धरन जब धावहिं । चलउँ भागि तब पूप देखावहिं ॥

और मुझसे बहुत प्रकारके खेल करते हैं, जिन चरित्रोंका वर्णन करते मुझे लज्जा आती है ! किलकारी मारते हुए जब वे मुझे पकड़ने दौड़ते और मैं भाग चलता, तब मुझे पूआ दिखलाते थे ॥ ५ ॥

दो०— आवत निकट हँसहिं प्रभु भाजत रुदन कराहिं ।

जाऊँ समीप गहन पद फिरि फिरि चितड़ पराहिं ॥ ७७ ( क ) ॥

मेरे निकट आनेपर प्रभु हँसते हैं और भाग जानेपर रोते हैं और जब मैं उनका चरण स्पर्श करनेके लिये पास जाता हूँ, तब वे पीछे फिर-फिरकर मेरी ओर देखते हुए भाग जाते हैं ॥ ७७ ( क ) ॥

प्राकृत सिसु इव लीला देखि भयउ मोहि मोह ।

कवन चरित्र करत प्रभु चिदानंद संदोह ॥ ७७ ( ख ) ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१८१

साधारण बच्चों-जैसी लीला देखकर मुझे मोह (शङ्का) हुआ कि सच्चिदानन्दधन प्रभु यह कौन [महत्त्वका] चरित्र (लीला) कर रहे हैं ॥ ७७ (ख) ॥

एतना मन आनत खगराया । रघुपति प्रेरित ब्यापी माया ॥ सो माया न दुखद मोहि काहीं । आन जीव इव संसृत नाहीं ॥

हे पक्षिराज! मनमें इतनी [शङ्का] लाते ही श्रीरघुनाथजीके द्वारा प्रेरित माया मुझपर छा गयी। परन्तु वह माया न तो मुझे दुःख देनेवाली हुई और न दूसरे जीवोंकी भाँति संसारमें डालनेवाली हुई ॥ १ ॥

नाथ इहाँ कछु कारन आना । सुनहु सो सावधान हरिजाना ॥ ग्यान अखंड एक सीताबर । माया बस्य जीव सचराचर ॥

हे नाथ! यहाँ कुछ दूसरा ही कारण है। हे भगवान् के वाहन गरुड़जी! उसे सावधान होकर सुनिये। एक सीतापति श्रीरामजी ही अखण्ड ज्ञानस्वरूप हैं और जड़-चेतन सभी जीव मायाके वश हैं ॥ २ ॥

जौं सब कें रह ग्यान एकरस । ईस्वर जीवहि भेद कहहु कस ॥ माया बस्य जीव अभिमानी । ईस बस्य माया गुन खानी ॥

यदि जीवोंको एकरस (अखण्ड) ज्ञान रहे, तो कहिये, फिर ईश्वर और जीवमें भेद ही कैसा? अभिमानी जीव मायाके वश है और वह [सत्त्व, रज, तम—इन] तीनों गुणोंकी खान माया ईश्वरके वशमें है ॥ ३ ॥

परबस जीव स्वबस भगवंता । जीव अनेक एक श्रीकंता ॥ मुधा भेद जद्यपि कृत माया । बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया ॥

जीव परतन्त्र है, भगवान् स्वतन्त्र हैं; जीव अनेक हैं, श्रीपति भगवान् एक हैं। यद्यपि मायाका किया हुआ यह भेद असत् है तथापि वह भगवान् के भजन बिना करोड़ों उपाय करनेपर भी नहीं जा सकता ॥ ४ ॥

दो०—रामचंद्र के भजन बिनु जो चह पद निर्बान ।

ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिषान ॥ ७८ ( क ) ॥

श्रीरामचन्द्रजीके भजन बिना जो मोक्षपद चाहता है, वह मनुष्य ज्ञानवान् होनेपर भी बिना पूँछ और सींगका पशु है ॥ ७८ ( क ) ॥

राकापति षोडस उअहिं तारागन समुदाइ ।

सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ ॥ ७८ ( ख ) ॥

सभी तारागणोंके साथ सोलह कलाओंसे पूर्ण चन्द्रमा उदय हो और जितने पर्वत हैं उन सबमें दावाग्नि लगा दी जाय, तो भी सूर्यके उदय हुए बिना रात्रि नहीं जा सकती ॥ ७८ ( ख ) ॥

१८२

  • रामचरितमानस *

ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा । मितइ न जीवन्ह केर कलेसा ॥ हरि सेवकहि न व्याप अबिद्या । प्रभु प्रेरित व्यापइ तेहि बिद्या ॥

हे पक्षिराज ! इसी प्रकार श्रीहरिके भजन बिना जीवोंका क्लेश नहीं मितता । श्रीहरिके सेवकको अबिद्या नहीं व्यापती । प्रभुकी प्रेरणासे उसे विद्या व्यापती है ॥ १ ॥

ताते नास न होइ दास कर । भेद भगति बाढ़इ बिहंगबर ॥ भ्रम तें चकित राम मोहि देखा । बिहँसे सो सुनु चरित बिसेषा ॥

हे पक्षिश्रेष्ठ ! इसीसे दासका नाश नहीं होता और भेद-भक्ति बढ़ती है । श्रीरामजीने मुझे जब भ्रमसे चकित देखा, तब वे हँसे । वह विशेष चरित्र सुनिये ॥ २ ॥

तेहि कौतुक कर मरमु न काहूँ । जाना अनुज न मातु पिताहूँ ॥ जानु पानि धाए मोहि धरना । स्यामल गात अरुन कर चरना ॥

उस खेलका मर्म किसीने नहीं जाना, न छोटे भाइयोंने और न माता-पिताने ही । वे श्याम शरीर और लाल-लाल हथेली और चरणतलवाले बालरूप श्रीरामजी घुटने और हाथोंके बल मुझे पकड़नेको दौड़े ॥ ३ ॥

तब मैं भागि चलेउँ उरगारी । राम गहन कहँ भुजा पसारी ॥ जिमि जिमि दूर उड़ाउँ अकासा । तहँ भुज हरि देखउँ निज पास ॥

हे सपोंके शत्रु गरुड़जी ! तब मैं भाग चला । श्रीरामजीने मुझे पकड़नेके लिये भुजा फैलायी । मैं जैसे-जैसे आकाशमें दूर उड़ता, वैसे-वैसे ही वहाँ श्रीहरिकी भुजाको अपने पास देखता था ॥ ४ ॥

दो०— ब्रह्मलोक लगि गयउँ मैं चितयउँ पाछ उड़ात ।

जुग अंगुल कर बीच सब राम भुजहि मोहि तात ॥ ७९ ( क ) ॥

मैं ब्रह्मलोकतक गया और जब उड़ते हुए मैंने पीछेकी ओर देखा, तो हे तात ! श्रीरामजीकी भुजामें और मुझमें केवल दो ही अंगुलका बीच था ॥ ७९ ( क ) ॥

ससाबरन भेद करि जहाँ लगे गति मोरि ।

गयउँ तहाँ प्रभु भुज निरखि व्याकुल भयउँ बहोरि ॥ ७९ ( ख ) ॥

सातों आवरणोंको भेदकर जहाँतक मेरी गति थी, वहाँतक मैं गया । पर वहाँ भी प्रभुकी भुजाको [अपने पीछे] देखकर मैं व्याकुल हो गया ॥ ७९ ( ख ) ॥

मूदेउँ नयन त्रसित जब भयऊँ । पुनि चितवत कोसलपुर गयऊँ ॥ मोहि बिलोकि राम मुसुकाहीं । बिहँसत तुरत गयउँ मुख माहीं ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१८३

जब मैं भयभीत हो गया, तब मैंने आँखें मूद लीं। फिर आँखें खोलकर देखते ही अवधपुरीमें पहुँच गया। मुझे देखकर श्रीरामजी मुसकराने लगे। उनके हँसते ही मैं तुरंत उनके मुखमें चला गया ॥ १ ॥

उदर माझ सुनु अंडज राया। देखेउँ बहु ब्रह्मांड निकाया ॥ अति बिचित्र तहाँ लोक अनेका। रचना अधिक एक ते एका ॥

हे पक्षिराज! सुनिये, मैंने उनके पेटमें बहुत-से ब्रह्माण्डोंके समूह देखे। वहाँ (उन ब्रह्माण्डोंमें) अनेकों विचित्र लोक थे, जिनकी रचना एक-से-एककी बढ़कर थी ॥ २ ॥

कोटिन्ह चतुरानन गौरीसा। अगनिनत उडगन रबि रजनीसा ॥ अगनिनत लोकपाल जम काला। अगनिनत भूधर भूमि बिसाला ॥

करोड़ों ब्रह्माजी और शिवजी, अनगिनत तारागण, सूर्य और चन्द्रमा, अनगिनत लोकपाल, यम और काल, अनगिनत विशाल पर्वत और भूमि, ॥ ३ ॥

सागर सरि सर बिपिन अपारा। नाना भाँति सृष्टि बिस्तारा ॥ सुर मुनि सिद्ध नाग नर किंनर। चारि प्रकार जीव सचराचर ॥

असंख्य समुद्र, नदी, तालाब और वन तथा और भी नाना प्रकारकी सृष्टिका विस्तार देखा। देवता, मुनि, सिद्ध, नाग, मनुष्य, किन्नर तथा चारों प्रकारके जड़ और चेतन जीव देखे ॥ ४ ॥

दो०— जो नहीं देखा नहीं सुना जो मनहूँ न समाड़।

सो सब अद्भुत देखेउँ बरनि कवनि बिधि जाड़ ॥ ८० ( क ) ॥

जो कभी न देखा था, न सुना था और जो मनमें भी नहीं समा सकता था (अर्थात् जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी), वही सब अद्भुत सृष्टि मैंने देखी। तब उसका किस प्रकार वर्णन किया जाय! ॥ ८० ( क ) ॥

एक एक ब्रह्मांड महूँ रहउँ बरष सत एक।

एहि बिधि देखत फिरउँ मैं अंड कटाह अनेक ॥ ८० ( ख ) ॥

मैं एक-एक ब्रह्माण्डमें एक-एक सौ वर्षतक रहता। इस प्रकार मैं अनेकों ब्रह्माण्ड देखता फिरा ॥ ८० ( ख ) ॥

लोक लोक प्रति भिन्न बिधाता। भिन्न बिज्जु सिव मनु दिसिन्नाता ॥ नर गंधर्ब भूत बेताला। किंनर निसिचर पसु खग ब्याला ॥

प्रत्येक लोकमें भिन्न-भिन्न ब्रह्मा, भिन्न-भिन्न विष्णु, शिव, मनु, दिक्पाल, मनुष्य, गन्धर्व, भूत, वैताल, किन्नर, राक्षस, पशु, पक्षी, सर्प, ॥ १ ॥

१८४

  • रामचरितमानस *

देव दनुज गन नाना जाती। सकल जीव तहाँ आनहि भाँती॥ महि सरि सागर सर गिरि नाना। सब प्रपंच तहाँ आनइ आना॥

तथा नाना जातिके देवता एवं दैत्यगण थे। सभी जीव वहाँ दूसरे ही प्रकारके थे। अनेक पृथ्वी, नदी, समुद्र, तालाब, पर्वत तथा सब सृष्टि वहाँ दूसरी-ही-दूसरी प्रकारकी थी ॥ २ ॥

अंडकोस प्रति प्रति निज रूपा। देखेउँ जिनस अनेक अनूपा॥ अवधपुरी प्रति भुवन निनारी। सरजू भिन्न भिन्न नर नारी॥

प्रत्येक ब्रह्माण्डमें मैंने अपना रूप देखा तथा अनेकों अनुपम वस्तुएँ देखीं। प्रत्येक भुवनमें न्यारी ही अवधपुरी, भिन्न ही सरयूजी और भिन्न प्रकारके ही नर-नारी थे ॥ ३ ॥

दसरथ कौसल्या सुनु ताता। बिबिध रूप भरतादिक भाता॥ प्रति ब्रह्मांड राम अवतारा। देखउँ बालबिनोद अपारा॥

हे तात! सुनिये, दशरथजी, कौसल्याजी और भरतजी आदि भाई भी भिन्न-भिन्न रूपोंके थे। मैं प्रत्येक ब्रह्माण्डमें रामावतार और उनकी अपार बाललीलाएँ देखता फिरता ॥ ४ ॥

दो०—भिन्न भिन्न मैं दीख सबु अति बिचित्र हरिजान।

अगनित भुवन फिरेउँ प्रभु राम न देखेउँ आन॥ ८१ (क) ॥

हे हरिवाहन! मैंने सभी कुछ भिन्न-भिन्न और अत्यन्त विचित्र देखा। मैं अनगिनत ब्रह्माण्डोंमें फिरा, पर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको मैंने दूसरी तरहका नहीं देखा ॥ ८१ (क) ॥

सोड़ सिसुपन सोड़ सोभा सोड़ कृपाल रघुबीर।

भुवन भुवन देखत फिरउँ प्रेरित मोह समीर॥ ८१ (ख) ॥

सर्वत्र वही शिशुपन, वही शोभा और वही कृपालु श्रीरघुवीर! इस प्रकार मोहरूपी पवनकी प्रेरणासे मैं भुवन-भुवनमें देखता फिरता था ॥ ८१ (ख) ॥

भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका। बीते मनहुँ कल्प सत एका॥

फिरत फिरत निज आश्रम आयउँ। तहाँ पुनि रहि कछु काल गवाँयउँ॥

अनेक ब्रह्माण्डोंमें भटकते मुझे मानो एक सौ कल्प बीत गये। फिरता-फिरता मैं अपने आश्रममें आया और कुछ काल वहाँ रहकर बिताया ॥ १ ॥

निज प्रभु जन्म अवध सुनि पायउँ। निर्भर प्रेम हरषि उठि धायउँ॥

देखउँ जन्म महोत्सव जाई। जेहि बिधि प्रथम कहा मैं गाई॥

फिर जब अपने प्रभुका अवधपुरीमें जन्म (अवतार) सुन पाया, तब प्रेमसे परिपूर्ण होकर मैं हर्षपूर्वक उठ दौड़ा। जाकर मैंने जन्म-महोत्सव देखा, जिस प्रकार मैं पहले वर्णन कर चुका हूँ ॥ २ ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१८५

राम उदर देखेउँ जग नाना । देखत बनइ न जाइ बखाना ॥ तहैं पुनि देखेउँ राम सुजाना । माया पति कृपाल भगवाना ॥

श्रीरामचन्द्रजीके पेटमें मैंने बहुत-से जगत् देखे, जो देखते ही बनते थे, वर्णन नहीं किये जा सकते। वहाँ फिर मैंने सुजान मायाके स्वामी कृपालु भगवान् श्रीरामको देखा ॥ ३ ॥

करउँ बिचार बहोरी बहोरी । मोह कलिल व्यापित मति मोरी ॥ उभय घरी महँ मैं सब देखा । भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा ॥

मैं बार-बार विचार करता था। मेरी बुद्धि मोहरूपी कीचड़से व्याप्त थी। यह सब मैंने दो ही घड़ीमें देखा। मनमें विशेष मोह होनेसे मैं थक गया ॥ ४ ॥

दो०— देखि कृपाल बिकल मोहि बिहँसे तब रघुबीर।

बिहँसतहीं मुख बाहेर आयउँ सुनु मतिधीर ॥ ८२ ( क ) ॥

मुझे व्याकुल देखकर तब कृपालु श्रीरघुवीर हँस दिये। हे धीरबुद्धि गरुड़जी! सुनिये, उनके हँसते ही मैं मुँहसे बाहर आ गया ॥ ८२ ( क ) ॥

सोड़ लरिकार्डि मो सन करन लगे पुनि राम।

कोटि भाँति समुझावउँ मनु न लहइ बिश्राम ॥ ८२ ( ख ) ॥

श्रीरामचन्द्रजी मेरे साथ फिर वही लड़कपन करने लगे। मैं करोड़ों (असंख्य) प्रकारसे मनको समझाता था, पर वह शान्ति नहीं पाता था ॥ ८२ ( ख ) ॥

देखि चरित यह सो प्रभुताई । समुझत देह दसा बिसराई ॥

धरनि परेउँ मुख आव न बाता । त्राहि त्राहि आरत जन त्राता ॥

यह [बाल] चरित्र देखकर और [पेटके अंदर देखी हुई] उस प्रभुताका स्मरण कर मैं शरीरकी सुध भूल गया और 'हे आर्तजनोंके रक्षक! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये' पुकारता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा। मुखसे बात नहीं निकलती थी! ॥ १ ॥

प्रेमाकुल प्रभु मोहि बिलोकी । निज माया प्रभुता तब रोकी ॥

कर सरोज प्रभु मम सिर धरेऊ । दीनदयाल सकल दुख हरेऊ ॥

तदनन्तर प्रभुने मुझे प्रेमविह्वल देखकर अपनी मायाकी प्रभुता (प्रभाव) को रोक लिया। प्रभुने अपना कर-कमल मेरे सिरपर रखा। दीनदयालुने मेरा सम्पूर्ण दुःख हर लिया ॥ २ ॥

कीन्ह राम मोहि बिगत बिमोहा । सेवक सुखद कृपा संदोहा ॥

प्रभुता प्रथम बिचारि बिचारी । मन महँ होइ हरष अति भारी ॥

सेवकोंको सुख देनेवाले, कृपाके समूह (कृपापमय) श्रीरामजीने मुझे मोहसे सर्वथा रहित कर दिया। उनकी पहलेवाली प्रभुताको विचार-विचारकर (याद कर-करके) मेरे मनमें बड़ा भारी हर्ष हुआ ॥ ३ ॥

१८६

  • रामचरितमानस *

भगत बछलता प्रभु कै देखी । उपजी मम उर प्रीति बिसेषी ॥ सजल नयन पुलकित कर जोरी । कीन्हिउँ बहु बिधि बिनय बहोरी ॥

प्रभुकी भक्तवत्सलता देखकर मेरे हृदयमें बहुत ही प्रेम उत्पन्न हुआ। फिर मैंने [आनन्दसे] नेत्रोंमें जल भरकर, पुलकित होकर और हाथ जोड़कर बहुत प्रकारसे विनती की ॥ ४ ॥

दो०— सुनि सप्रेम मम बानी देखि दीन निज दास ।

बचन सुखद गंभीर मृदु बोले रमानिवास ॥ ८३ ( क ) ॥

मेरी प्रेमयुक्त वाणी सुनकर और अपने दासको दीन देखकर रमानिवास श्रीरामजी सुखदायक, गम्भीर और कोमल वचन बोले— ॥ ८३ ( क ) ॥

काकभसुंडि मागु बर अति प्रसन्न मोहि जानि ।

अनिमादिक सिधि अपर रिधि मोच्छ सकल सुख खानि ॥ ८३ ( ख ) ॥

हे काकभशुण्डि! तू मुझे अत्यन्त प्रसन्न जानकर वर माँग। अणिमा आदि अष्ट सिद्धियाँ, दूसरी ऋद्धियाँ तथा सम्पूर्ण सुखोंकी खान मोक्ष, ॥ ८३ ( ख ) ॥

ग्यान बिबेक बिरति बिग्याना । मुनि दुर्लभ गुन जे जग नाना ॥

आजु देउँ सब संसय नाहीं । मागु जो तोहि भाव मन माहीं ॥

ज्ञान, विवेक, वैराग्य, विज्ञान (तत्त्वज्ञान) और वे अनेकों गुण जो जगत्में मुनियोंके लिये भी दुर्लभ हैं, ये सब मैं आज तुझे दूँगा, इसमें सन्देह नहीं। जो तेरे मन भावे, सो माँग ले ॥ १ ॥

सुनि प्रभु बचन अधिक अनुरागेउँ । मन अनुमान करन तब लागेउँ ॥

प्रभु कह देन सकल सुख सही । भगति आपनी देन न कही ॥

प्रभुके वचन सुनकर मैं बहुत ही प्रेममें भर गया। तब मनमें अनुमान करने लगा कि प्रभुने सब सुखोंके देनेकी बात कही, यह तो सत्य है; पर अपनी भक्ति देनेकी बात नहीं कही ॥ २ ॥

भगति हीन गुन सब सुख ऐसे । लवन बिना बहु बिंजन जैसे ॥

भजन हीन सुख कवने काजा । अस बिचारि बोलेउँ खगराजा ॥

भक्तिये रहित सब गुण और सब सुख वैसे ही (फोके) हैं जैसे नमकके बिना बहुत प्रकारके भोजनके पदार्थ। भजनसे रहित सुख किस कामके? हे पक्षिराज! ऐसा विचारकर मैं बोला— ॥ ३ ॥

जौँ प्रभु होइ प्रसन्न बर देहू । मो पर करहु कृपा अरु नेहू ॥

मन भावत बर मागउँ स्वामी । तुम्ह उदार उर अंतरजामी ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१८७

हे प्रभो! यदि आप प्रसन्न होकर मुझे वर देते हैं और मुझपर कृपा और स्नेह करते हैं, तो हे स्वामी! मैं अपना मन-भाया वर माँगता हूँ। आप उदार हैं और हृदयके भीतरकी जाननेवाले हैं ॥ ४ ॥

दो०— अबिरल भगति बिसुद्ध तव श्रुति पुरान जो गाव।

जेहि खोजत जोगीस मुनि प्रभु प्रसाद कोउ पाव ॥ ८४ ( क ) ॥

आपकी जिस अविरल (प्रगाढ़) एवं विशुद्ध (अनन्य, निष्काम) भक्तिको श्रुति और पुराण गाते हैं, जिसे योगीश्वर मुनि खोजते हैं और प्रभुकी कृपासे कोई विरला ही जिसे पाता है, ॥ ८४ (क) ॥

भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपा सिंधु सुख धाम।

सोड़ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम ॥ ८४ ( ख ) ॥

हे भक्तोंके [मन-इच्छित फल देनेवाले] कल्पवृक्ष! हे शरणागतके हितकारी! हे कृपासागर! हे सुखधाम श्रीरामजी! दया करके मुझे अपनी वही भक्ति दीजिये ॥ ८४ (ख) ॥

एवमस्तु कहि रघुकुलनायक। बोले बचन परम सुखदायक ॥

सुनु बायस तैं सहज सयाना। काहे न मागसि अस बरदाना ॥

‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो) कहकर रघुवंशके स्वामी परम सुख देनेवाले बचन बोले—हे काक! सुन, तू स्वभावसे ही बुद्धिमान् है। ऐसा वरदान कैसे न माँगता? ॥ १ ॥

सब सुख खानि भगति तैं मागी। नहिं जग कोउ तोहि सम बड़भागी ॥

जो मुनि कोटि जतन नहिं लहहीं। जे जप जोग अनल तन दहहीं ॥

तूने सब सुखोंकी खान भक्ति माँग ली, जगत्में तेरे समान बड़भागी कोई नहीं है। वे मुनि जो जप और योगकी अग्निसे शरीर जलाते रहते हैं, करोड़ों यत्न करके भी जिसको (जिस भक्तिको) नहीं पाते ॥ २ ॥

रीझेउँ देखि तोरि चतुराई। मागेहु भगति मोहि अति भाई ॥

सुनु बिहंग प्रसाद अब मोरें। सब सुभ गुन बसिहहिं उर तोरें ॥

वही भक्ति तूने माँगी। तेरी चतुरता देखकर मैं रीझ गया। यह चतुरता मुझे बहुत ही अच्छी लगी। हे पक्षी! सुन, मेरी कृपासे अब समस्त शुभ गुण तेरे हृदयमें बसेंगे ॥ ३ ॥

भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। जोग चरित्र रहस्य बिभागा ॥

जानब तैं सबही कर भेदा। मम प्रसाद नहिं साधन खेदा ॥

भक्ति, ज्ञान, विज्ञान, वैराग्य, योग, मेरी लीलाएँ और उनके रहस्य तथा विभाग—इन सबके भेदको तू मेरी कृपासे ही जान जायगा। तुझे साधनका कष्ट नहीं होगा ॥ ४ ॥

१८८

  • रामचरितमानस *

दो०—माया संभव भ्रम सब अब न व्यापिहँहिं तोहि।

जानेसु ब्रह्म अनादि अज अगुन गुनाकर मोहि ॥ ८५ ( क ) ॥

मायासे उत्पन्न सब भ्रम अब तुझको नहीं व्यापेंगे। मुझे अनादि, अजन्मा, अगुण (प्रकृतिके गुणोंसे रहित) और [गुणातीत दिव्य] गुणोंकी खान ब्रह्म जानना ॥ ८५ ( क ) ॥

मोहि भगत प्रिय संतत अस बिचारि सुनु काग।

कार्यँ बचन मन मम पद करेसु अचल अनुराग ॥ ८५ ( ख ) ॥

हे काक! सुन, मुझे भक्त निरन्तर प्रिय हैं, ऐसा विचारकर शरीर, वचन और मनसे मेरे चरणोंमें अटल प्रेम करना ॥ ८५ ( ख ) ॥

अब सुनु परम बिमल मम बानी। सत्य सुगम निगमादि बखानी ॥

निज सिद्धांत सुनावउँ तोही। सुनु मन धरु सब तजि भजु मोही ॥

अब मेरी सत्य, सुगम, वेदादिके द्वारा वर्णित परम निर्मल वाणी सुन। मैं तुझको यह 'निज सिद्धान्त' सुनाता हूँ। सुनकर मनमें धारण कर और सब तजकर मेरा भजन कर ॥ १ ॥

मम माया संभव संसारा। जीव चराचर बिबिधि प्रकारा ॥

सब मम प्रिय सब मम उपजाए। सब ते अधिक मनुज मोहि भाए ॥

यह सारा संसार मेरी मायासे उत्पन्न है। [इसमें] अनेकों प्रकारके चराचर जीव हैं। वे सभी मुझे प्रिय हैं; क्योंकि सभी मेरे उत्पन्न किये हुए हैं। [किन्तु] मनुष्य मुझको सबसे अधिक अच्छे लगते हैं ॥ २ ॥

तिन्ह महाँ द्विज द्विज महाँ श्रुतिधारी। तिन्ह महुँ निगम धरम अनुसारी ॥

तिन्ह महाँ प्रिय बिरक्त पुनि ग्यानी। ग्यानिहु ते अति प्रिय बिग्यानी ॥

उन मनुष्योंमें भी द्विज, द्विजोंमें भी वेदोंको [कण्ठमें] धारण करनेवाले, उनमें भी वेदोक्त धर्मपर चलनेवाले, उनमें भी विरक्त (वैराग्यवान्) मुझे प्रिय हैं। वैराग्यवानोंमें फिर ज्ञानी और ज्ञानियोंसे भी अत्यन्त प्रिय विज्ञानी हैं ॥ ३ ॥

तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा। जेहि गति मोरि न दूसरि आसा ॥

पुनि पुनि सत्य कहउँ तोहि पाहीं। मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं ॥

विज्ञानियोंसे भी प्रिय मुझे अपना दास है, जिसे मेरी ही गति (आश्रय) है, कोई दूसरी आशा नहीं है। मैं तुझसे बार-बार सत्य ('निज सिद्धान्त') कहता हूँ कि मुझे अपने सेवकके समान प्रिय कोई भी नहीं है ॥ ४ ॥

भगति हीन बिरंचि किन होई। सब जीवहु सम प्रिय मोहि सोई ॥

भगतिवंत अति नीचउ प्रानी। मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१८१

भक्तिहीन ब्रह्मा ही क्यों न हो, वह मुझे सब जीवोंके समान ही प्रिय है। परन्तु भक्तिमान् अत्यन्त नीच भी प्राणी मुझे प्राणोंके समान प्रिय है, यह मेरी घोषणा है ॥५॥

दो०— सुचि सुशील सेवक सुमति प्रिय कहु काहि न लाग।

श्रुति पुरान कह नीति असि सावधान सुनु काग ॥ ८६ ॥

पवित्र, सुशील और सुन्दर बुद्धिवाला सेवक, बता, किसको प्यारा नहीं लगता? वेद और पुराण ऐसी ही नीति कहते हैं। हे काक! सावधान होकर सुन ॥ ८६ ॥

एक पिता के बिपुल कुमारा। होहिं पृथक् गुन सील अचारा ॥ कोउ पंडित कोउ तापस ग्याता। कोउ धनवंत सूर कोउ दाता ॥

एक पिताके बहुत-से पुत्र पृथक्-पृथक् गुण, स्वभाव और आचरणवाले होते हैं। कोई पण्डित होता है, कोई तपस्वी, कोई ज्ञानी, कोई धनी, कोई शूरवीर, कोई दानी, ॥ १ ॥

कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई। सब पर पितहि प्रीति सम होई ॥ कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा। सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा ॥

कोई सर्वज्ञ और कोई धर्मपरायण होता है। पिताका प्रेम इन सभीपर समान होता है। परन्तु इनमेंसे यदि कोई मन, बचन और कर्मसे पिताका ही भक्त होता है, स्वप्रमैं भी दूसरा धर्म नहीं जानता, ॥ २ ॥

सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना। जद्यपि सो सब भाँति अयाना ॥ एहि बिधि जीव चराचर जेते। त्रिजग देव नर असुर समेते ॥

वह पुत्र पिताको प्राणोंके समान प्रिय होता है, यद्यपि (चाहे) वह सब प्रकारसे अज्ञान (मूर्ख) ही हो। इस प्रकार तिर्यक् (पशु-पक्षी), देव, मनुष्य और असुरोंसमेत जितने भी चेतन और जड़ जीव हैं, ॥ ३ ॥

अखिल बिस्व यह मोर उपाया। सब पर मोहि बराबरि दाय। तिन्ह महँ जो परिहरि मद माया। भजै मोहि मन बच अरु काया ॥

[उनसे भरा हुआ] यह सम्पूर्ण विश्व मेरा ही पैदा किया हुआ है। अतः सबपर मेरी बराबर दया है। परन्तु इनमेंसे जो मद और माया छोड़कर मन, बचन और शरीरसे मुझको भजता है, ॥ ४ ॥

दो०— पुरुष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ।

सर्ब भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ ॥ ८७ ( क ) ॥

वह पुरुष हो, नपुंसक हो, स्त्री हो अथवा चर-अचर कोई भी जीव हो, कपट छोड़कर जो भी सर्वभावसे मुझे भजता है वही मुझे परम प्रिय है ॥ ८७ ( क ) ॥

११०

  • रामचरितमानस *

सो०— सत्य कहउँ खग तोहि सुचि सेवक मम प्रानप्रिय।

अस बिचारि भजु मोहि परिहरि आस भरोस सब ॥ ८७ (ख) ॥

हे पक्षी! मैं तुझसे सत्य कहता हूँ, पवित्र (अनन्य एवं निष्काम) सेवक मुझे प्राणोंके समान प्यारा है। ऐसा विचारकर सब आशा-भरोसा छोड़कर मुझीको भज ॥ ८७ (ख) ॥

कबहूँ काल न व्यापिहि तोही। सुमिरेसु भजेसु निरंतर मोही ॥ प्रभु बचनामृत सुनि न अघाऊँ। तनु पुलकित मन अति हरषाऊँ ॥

तुझे काल कभी नहीं व्यापेगा। निरन्तर मेरा स्मरण और भजन करते रहना। प्रभुके बचनामृत सुनकर मैं तूस नहीं होता था। मेरा शरीर पुलकित था और मनमें मैं अत्यन्त ही हर्षित हो रहा था ॥ १ ॥

सो सुख जानइ मन अरु काना। नहिं रसना पहिं जाइ बखाना ॥ प्रभु सोभा सुख जानहिं नयना। कहि किमि सकहिं तिन्हहि नहिं बयना ॥

वह सुख मन और कान ही जानते हैं। जीभसे उसका बखान नहीं किया जा सकता। प्रभुकी शोभाका वह सुख नेत्र ही जानते हैं। पर वे कह कैसे सकते हैं? उनके वाणी तो है नहीं ॥ २ ॥

बहु बिधि मोहि प्रबोधि सुख देई। लगे करन सिसु कौतुक तेई ॥ सजल नयन कछु मुख करि रूखा। चितइ मातु लागी अति भूखा ॥

मुझे बहुत प्रकारसे भलीभाँति समझाकर और सुख देकर प्रभु फिर वही बालकोंके खेल करने लगे। नेत्रोंमें जल भरकर और मुखको कुछ रूखा [—सा] बनाकर उन्होंने माताकी ओर देखा—[और मुखाकृति तथा चितवनसे माताको समझा दिया कि] बहुत भूख लगी है ॥ ३ ॥

देखि मातु आतुर उठि धाई। कहि मृदु बचन लिए उर लाई ॥ गोद राखि कराव पय पाना। रघुपति चरित ललित कर गाना ॥

यह देखकर माता तुरंत उठ दौड़ी और कोमल वचन कहकर उन्होंने श्रीरामजीको छातीसे लगा लिया। वे गोदमें लेकर उन्हें दूध पिलाने लगीं और श्रीरघुनाथजी (उन्हीं) की ललित लीलाएँ गाने लगीं ॥ ४ ॥

सो०— जेहि सुख लागि पुरारि असुभ बेष कृत सिव सुखद।

अवधपुरी नर नारि तेहि सुख महुँ संतत मगन ॥ ८८ (क) ॥

जिस सुखके लिये [सबको] सुख देनेवाले कल्याणरूप त्रिपुरारि शिवजीने अशुभ वेष धारण किया, उस सुखमें अवधपुरीके नर-नारी निरन्तर निमग्न रहते हैं ॥ ८८ (क) ॥

सोई सुख लवल्लेस जिन्ह बारक सपनेहुँ लहेउ।

ते नहिं गनहिं खगेस ब्रह्मसुखहि सज्जन सुमति ॥ ८८ (ख) ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१११

उस सुखका लवलेशमात्र जिन्होंने एक बार स्वप्नमें भी प्राप्त कर लिया, हे पक्षिराज! वे सुन्दर बुद्धिवाले सज्जन पुरुष उसके सामने ब्रह्मसुखको भी कुछ नहीं गिनते ॥ ८८ (ख) ॥

मैं पुनि अवध रहेउँ कछु काला । देखेउँ बालबिनोद रसाला ॥ राम प्रसाद भगति बर पायउँ । प्रभु पद बंदि निजाश्रम आयउँ ॥

मैं और कुछ समयतक अवधपुरीमें रहा और मैंने श्रीरामजीकी रसीली बाललीलाएँ देखीं। श्रीरामजीकी कृपासे मैंने भक्तिका वरदान पाया। तदनन्तर प्रभुके चरणोंकी वन्दना करके मैं अपने आश्रमपर लौट आया ॥ १ ॥

तब ते मोहि न व्यापी माया । जब ते रघुनायक अपनाया ॥ यह सब गुप्त चरित मैं गावा । हरि मायाँ जिमि मोहि नचावा ॥

इस प्रकार जबसे श्रीरघुनाथजीने मुझको अपनाया, तबसे मुझे माया कभी नहीं व्यापी। श्रीहरिकी मायाने मुझे जैसे नचाया, वह सब गुप्त चरित्र मैंने कहा ॥ २ ॥

निज अनुभव अब कहउँ खगेसा । बिनु हरि भजन न जाहिं कलेसा ॥ राम कृपा बिनु सुनु खगराई । जानि न जाइ राम प्रभुताई ॥

हे पक्षिराज गरुड़! अब मैं आपसे अपना निजी अनुभव कहता हूँ। [वह यह है कि] भगवान्के भजन बिना क्लेश दूर नहीं होते। हे पक्षिराज! सुनिये, श्रीरामजीकी कृपा बिना श्रीरामजीकी प्रभुता नहीं जानी जाती; ॥ ३ ॥

जानें बिनु न होइ परतीती । बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती ॥ प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई । जिमि खगपति जल कै चिकनाई ॥

प्रभुता जाने बिना उनपर विश्वास नहीं जमता, विश्वासके बिना प्रीति नहीं होती और प्रीति बिना भक्ति वैसे ही दृढ़ नहीं होती जैसे हे पक्षिराज! जलकी चिकनाई ठहरती नहीं ॥ ४ ॥

सो०— बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु।

गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरिभगति बिनु ॥ ८९ ( क ) ॥

गुरुके बिना कहीं ज्ञान हो सकता है? अथवा वैराग्यके बिना कहीं ज्ञान हो सकता है? इसी तरह वेद और पुराण कहते हैं कि श्रीहरिकी भक्तिके बिना क्या सुख मिल सकता है? ॥ ८९ (क) ॥

कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु।

चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ ॥ ८९ ( ख ) ॥

हे तात! स्वाभाविक संतोषके बिना क्या कोई शान्ति पा सकता है? [चाहे] करोड़ों उपाय करके पच-पच मरिये; [फिर भी] क्या कभी जलके बिना नाव चल सकती है? ॥ ८९ (ख) ॥

११२

  • रामचरितमानस *

बिनु संतोष न काम नसाहीं। काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं॥ राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा। थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा॥

संतोषके बिना कामनाका नाश नहीं होता और कामनाओंके रहते स्वप्नमें भी सुख नहीं हो सकता। और श्रीरामके भजन बिना कामनाएँ कहीं मिट सकती हैं? बिना धरतीके भी कहीं पेड़ उग सकता है? ॥ १ ॥

बिनु बिग्यान कि समता आवइ। कोउ अवकास कि नभ बिनु पावइ॥ श्रद्धा बिना धर्म नहिं होई। बिनु महि गंध कि पावइ कोई॥

विज्ञान (तत्त्वज्ञान) के बिना क्या समभाव आ सकता है? आकाशके बिना क्या कोई अवकाश (पोल) पा सकता है? श्रद्धाके बिना धर्म [का आचरण] नहीं होता। क्या पृथ्वीतत्वके बिना कोई गन्ध पा सकता है? ॥ २ ॥

बिनु तप तेज कि कर बिस्तारा। जल बिनु रस कि होइ संसारा॥ सील कि मिल बिनु बुध सेवकाई। जिमि बिनु तेज न रूप गोसाई॥

तपके बिना क्या तेज फैल सकता है? जल-तत्वके बिना संसारमें क्या रस हो सकता है? पण्डितजनोंकी सेवा बिना क्या शील (सदाचार) प्राप्त हो सकता है? हे गोसाई! जैसे बिना तेज (अग्नि-तत्व) के रूप नहीं मिलता ॥ ३ ॥

निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा। परस कि होइ बिहीन समीरा॥ कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा। बिनु हरि भजन न भव भय नासा॥

निज-सुख (आत्मानन्द) के बिना क्या मन स्थिर हो सकता है? वायु-तत्वके बिना क्या स्पर्श हो सकता है? क्या विश्वासके बिना कोई भी सिद्धि हो सकती है? इसी प्रकार श्रीहरिके भजन बिना जन्म-मृत्युके भयका नाश नहीं होता ॥ ४ ॥

दो०— बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु।

राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु॥ १० ( क )॥

बिना विश्वासके भक्ति नहीं होती, भक्तिके बिना श्रीरामजी पिघलते (ढरते) नहीं और श्रीरामजीकी कृपाके बिना जीव स्वप्नमें भी शान्ति नहीं पाता ॥ १० (क) ॥

सो०— अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल।

भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद॥ १० ( ख )॥

हे धीरबुद्धि! ऐसा विचारकर सम्पूर्ण कुतर्क और सन्देहोंको छोड़कर करुणाकी खान सुन्दर और सुख देनेवाले श्रीरघुवीरका भजन कीजिये ॥ १० (ख) ॥

  • उत्तरकाण्ड *

११३

निज मति सरिस नाथ मैं गाई। प्रभु प्रताप महिमा खगराई॥ कहेउँ न कछु करि जुगति बिसेषी। यह सब मैं निज नयनन्हि देखी॥

हे पक्षिराज! हे नाथ! मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार प्रभुके प्रताप और महिमाका गान किया। मैंने इसमें कोई बात युक्तिसे बढ़ाकर नहीं कही है। यह सब अपनी आँखों देखी कही है॥ १ ॥

महिमा नाम रूप गुन गाथा। सकल अमित अनंत रघुनाथा॥ निज निज मति मुनि हरि गुन गावहिं। निगम सेष सिव पार न पावहिं॥

श्रीरघुनाथजीकी महिमा, नाम, रूप और गुणोंकी कथा सभी अपार एवं अनन्त हैं तथा श्रीरघुनाथजी स्वयं भी अनन्त हैं। मुनिगण अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार श्रीहरिके गुण गाते हैं। वेद, शेष और शिवजी भी उनका पार नहीं पाते॥ २ ॥

तुम्हहि आदि खग मसक प्रजंता। नभ उड़ाहिं नहिं पावहिं अंता॥ तिमि रघुपति महिमा अवगाहा। तात कबहुँ कोउ पाव कि थाहा॥

आपसे लेकर मच्छरपर्यन्त सभी छोटे-बड़े जीव आकाशमें उड़ते हैं, किन्तु आकाशका अन्त कोई नहीं पाते। इसी प्रकार हे तात! श्रीरघुनाथजीकी महिमा भी अथाह है। क्या कभी कोई उसकी थाह पा सकता है?॥ ३ ॥

रामु काम सत कोटि सुभग तन। दुर्गा कोटि अमित अरि मर्दन॥ सक्र कोटि सत सरिस बिलासा। नभ सत कोटि अमित अवकासा॥

श्रीरामजीका अरबों कामदेवोंके समान सुन्दर शरीर है। वे अनन्त कोटि दुर्गाओंके समान शत्रुनाशक हैं। अरबों इन्द्रोंके समान उनका विलास (ऐश्वर्य) है। अरबों आकाशोंके समान उनमें अनन्त अवकाश (स्थान) है॥ ४ ॥

दो०— मरुत कोटि सत बिपुल बल रबि सत कोटि प्रकास।

ससि सत कोटि सुसीतल समन सकल भव त्रास॥ ११ ( क )॥

अरबों पवनके समान उनमें महान् बल है और अरबों सूर्योंके समान प्रकाश है। अरबों चन्द्रमाओंके समान वे शीतल और संसारके समस्त भयोंका नाश करनेवाले हैं॥ ११ ( क )॥

काल कोटि सत सरिस अति दुस्तर दुर्ग दुरंत।

धूमकेतु सत कोटि सम दुराधरष भगवंत॥ ११ ( ख )॥

अरबों कालोंके समान वे अत्यन्त दुस्तर, दुर्गम और दुरन्त हैं। वे भगवान् अरबों धूमकेतुओं (पुच्छल तारों) के समान अत्यन्त प्रबल हैं॥ ११ (ख)॥

११४

  • रामचरितमानस *

प्रभु अगाध सत कोटि पताला । समन कोटि सत सरिस कराला ॥ तीरथ अमित कोटि सम पावन । नाम अखिल अघ पूग नसावन ॥

अरबों पातालोंके समान प्रभु अथाह हैं। अरबों यमराजोंके समान भयानक हैं। अनन्तकोटि तीर्थोंके समान वे पवित्र करनेवाले हैं। उनका नाम सम्पूर्ण पापसमूहका नाश करनेवाला है ॥ १ ॥

हिमगिरि कोटि अचल रघुबीरा । सिंधु कोटि सत सम गंभीरा ॥ कामधेनु सत कोटि समाना । सकल काम दायक भगवाना ॥

श्रीरघुवीर करोड़ों हिमालयोंके समान अचल (स्थिर) हैं और अरबों समुद्रोंके समान गहरे हैं। भगवान् अरबों कामधेनुओंके समान सब कामनाओं (इच्छित पदार्थों) के देनेवाले हैं ॥ २ ॥

सारद कोटि अमित चतुराई । बिधि सत कोटि सृष्टि निपुनाई ॥ बिष्णु कोटि सम पालन कर्ता । रुद्र कोटि सत सम संहर्ता ॥

उनमें अनन्तकोटि सरस्वतियोंके समान चतुरता है। अरबों ब्रह्माओंके समान सृष्टिश्चनाकी निपुणता है। वे करोड़ों विष्णुओंके समान पालन करनेवाले और अरबों रुद्रोंके समान संहार करनेवाले हैं ॥ ३ ॥

धनद कोटि सत सम धनवाना । माया कोटि प्रपंच निधाना ॥ भार धरन सत कोटि अहीसा । निरवधि निरुपम प्रभु जगदीसा ॥

वे अरबों कुबेरोंके समान धनवान् और करोड़ों मायाओंके समान सृष्टिके खजाने हैं। बौद्ध उठानेमें वे अरबों शेषोंके समान हैं। [अधिक क्या] जगदीश्वर प्रभु श्रीरामजी [सभी बातोंमें] सीमारहित और उपमारहित हैं ॥ ४ ॥

छं०—निरुपम न उपमा आन राम समान रामु निगम कहै । जिमि कोटि सत खद्योत सम रबि कहत अति लघुता लहै ॥ एहि भाँति निज निज मति बिलास मुनीस हरिहि बखानहीं । प्रभु भाव गाहक अति कृपाल सप्रेम सुनि सुख मानहीं ॥

श्रीरामजी उपमारहित हैं, उनकी कोई दूसरी उपमा है ही नहीं। श्रीरामके समान श्रीराम ही हैं, ऐसा वेद कहते हैं। जैसे अरबों जुगनुओंके समान कहनेसे सूर्य [प्रशंसाको नहीं वरं] अत्यन्त लघुताको ही प्राप्त होता है (सूर्यकी निन्दा ही होती है)। इसी प्रकार अपनी-अपनी बुद्धिके विकासके अनुसार मुनीश्वर श्रीहरिका वर्णन करते हैं। किन्तु प्रभु भक्तोंके भावमात्रको ग्रहण करनेवाले और अत्यन्त कृपालु हैं। वे उस वर्णनको प्रेमसहित सुनकर सुख मानते हैं।

  • उत्तरकाण्ड *

११५

दो०—रामु अमित गुन सागर थाह कि पावड़ कोड़।

संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हि सुनायउँ सोड़ ॥ १२ ( क ) ॥

श्रीरामजी अपार गुणोंके समुद्र हैं, क्या उनकी कोई थाह पा सकता है? संतोसे मैंने जैसा कुछ सुना था, वही आपको सुनाया ॥ १२ ( क ) ॥

सो०—भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन।

तजि ममता मद मान भजिअ सदा सीतारवन ॥ १२ ( ख ) ॥

सुखके भण्डार, करुणाधाम भगवान् भाव (प्रेम) के वश हैं। [अतएव] ममता, मद और मानको छोड़कर सदा श्रीजानकीनाथजीका ही भजन करना चाहिये ॥ १२ ( ख ) ॥

सुनि भुसुंडि के बचन सुहाए। हरषित खगपति पंख फुलाए ॥

नयन नीर मन अति हरषाना। श्रीरघुपति प्रताप उर आना ॥

भुशुण्डिजीके सुन्दर वचन सुनकर पक्षिराजने हर्षित होकर अपने पंख फुला लिये। उनके नेत्रोंमें [प्रेमानन्दके आँसुओंका] जल आ गया और मन अत्यन्त हर्षित हो गया। उन्होंने श्रीरघुनाथजीका प्रताप हृदयमें धारण किया ॥ १ ॥

पाछिल मोह समुद्धि पछिताना। ब्रह्म अनादि मनुज करि माना ॥

पुनि पुनि काग चरन सिरु नावा। जानि राम सम प्रेम बढ़ावा ॥

वे अपने पिछले मोहको समझकर (याद करके) पछिताने लगे कि मैंने अनादि ब्रह्मको मनुष्य करके माना। गरुड़जीने बार-बार काकभुशुण्डिजीके चरणोंपर सिर नवाया और उन्हें श्रीरामजीके ही समान जानकर प्रेम बढ़ाया ॥ २ ॥

गुर बिनु भव निधि तरड़ न कोई। जौँ बिरंचि संकर सम होई ॥

संसय सर्प गसेउ मोहि ताता। दुखद लहरि कुतर्क बहु ब्राता ॥

गुरुके बिना कोई भवसागर नहीं तर सकता, चाहे वह ब्रह्माजी और शंकरजीके समान ही क्यों न हो। [गरुड़जीने कहा—] हे तात! मुझे सन्देशरूपी सर्पने डस लिया था और [साँपके डसनेपर जैसे विष चढ़नेसे लहरे आती हैं, वैसे ही] बहुत-सी कुतर्करूपी दुःख देनेवाली लहरे आ रही थीं ॥ ३ ॥

तव सरूप गारुड़ि रघुनायक। मोहि जिआयउ जन सुखदायक ॥

तव प्रसाद मम मोह नसाना। राम रहस्य अनूपम जाना ॥

आपके स्वरूपरूपी गारुड़ी (साँपका विष उतारनेवाले) के द्वारा भक्तोंको सुख देनेवाले श्रीरघुनाथजीने मुझे जिला लिया। आपकी कृपासे मेरा मोह नाश हो गया और मैंने श्रीरामजीका अनुपम रहस्य जाना ॥ ४ ॥