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श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

१८४

  • रामचरितमानस *

देव दनुज गन नाना जाती। सकल जीव तहाँ आनहि भाँती॥ महि सरि सागर सर गिरि नाना। सब प्रपंच तहाँ आनइ आना॥

तथा नाना जातिके देवता एवं दैत्यगण थे। सभी जीव वहाँ दूसरे ही प्रकारके थे। अनेक पृथ्वी, नदी, समुद्र, तालाब, पर्वत तथा सब सृष्टि वहाँ दूसरी-ही-दूसरी प्रकारकी थी ॥ २ ॥

अंडकोस प्रति प्रति निज रूपा। देखेउँ जिनस अनेक अनूपा॥ अवधपुरी प्रति भुवन निनारी। सरजू भिन्न भिन्न नर नारी॥

प्रत्येक ब्रह्माण्डमें मैंने अपना रूप देखा तथा अनेकों अनुपम वस्तुएँ देखीं। प्रत्येक भुवनमें न्यारी ही अवधपुरी, भिन्न ही सरयूजी और भिन्न प्रकारके ही नर-नारी थे ॥ ३ ॥

दसरथ कौसल्या सुनु ताता। बिबिध रूप भरतादिक भाता॥ प्रति ब्रह्मांड राम अवतारा। देखउँ बालबिनोद अपारा॥

हे तात! सुनिये, दशरथजी, कौसल्याजी और भरतजी आदि भाई भी भिन्न-भिन्न रूपोंके थे। मैं प्रत्येक ब्रह्माण्डमें रामावतार और उनकी अपार बाललीलाएँ देखता फिरता ॥ ४ ॥

दो०—भिन्न भिन्न मैं दीख सबु अति बिचित्र हरिजान।

अगनित भुवन फिरेउँ प्रभु राम न देखेउँ आन॥ ८१ (क) ॥

हे हरिवाहन! मैंने सभी कुछ भिन्न-भिन्न और अत्यन्त विचित्र देखा। मैं अनगिनत ब्रह्माण्डोंमें फिरा, पर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको मैंने दूसरी तरहका नहीं देखा ॥ ८१ (क) ॥

सोड़ सिसुपन सोड़ सोभा सोड़ कृपाल रघुबीर।

भुवन भुवन देखत फिरउँ प्रेरित मोह समीर॥ ८१ (ख) ॥

सर्वत्र वही शिशुपन, वही शोभा और वही कृपालु श्रीरघुवीर! इस प्रकार मोहरूपी पवनकी प्रेरणासे मैं भुवन-भुवनमें देखता फिरता था ॥ ८१ (ख) ॥

भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका। बीते मनहुँ कल्प सत एका॥

फिरत फिरत निज आश्रम आयउँ। तहाँ पुनि रहि कछु काल गवाँयउँ॥

अनेक ब्रह्माण्डोंमें भटकते मुझे मानो एक सौ कल्प बीत गये। फिरता-फिरता मैं अपने आश्रममें आया और कुछ काल वहाँ रहकर बिताया ॥ १ ॥

निज प्रभु जन्म अवध सुनि पायउँ। निर्भर प्रेम हरषि उठि धायउँ॥

देखउँ जन्म महोत्सव जाई। जेहि बिधि प्रथम कहा मैं गाई॥

फिर जब अपने प्रभुका अवधपुरीमें जन्म (अवतार) सुन पाया, तब प्रेमसे परिपूर्ण होकर मैं हर्षपूर्वक उठ दौड़ा। जाकर मैंने जन्म-महोत्सव देखा, जिस प्रकार मैं पहले वर्णन कर चुका हूँ ॥ २ ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१८५

राम उदर देखेउँ जग नाना । देखत बनइ न जाइ बखाना ॥ तहैं पुनि देखेउँ राम सुजाना । माया पति कृपाल भगवाना ॥

श्रीरामचन्द्रजीके पेटमें मैंने बहुत-से जगत् देखे, जो देखते ही बनते थे, वर्णन नहीं किये जा सकते। वहाँ फिर मैंने सुजान मायाके स्वामी कृपालु भगवान् श्रीरामको देखा ॥ ३ ॥

करउँ बिचार बहोरी बहोरी । मोह कलिल व्यापित मति मोरी ॥ उभय घरी महँ मैं सब देखा । भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा ॥

मैं बार-बार विचार करता था। मेरी बुद्धि मोहरूपी कीचड़से व्याप्त थी। यह सब मैंने दो ही घड़ीमें देखा। मनमें विशेष मोह होनेसे मैं थक गया ॥ ४ ॥

दो०— देखि कृपाल बिकल मोहि बिहँसे तब रघुबीर।

बिहँसतहीं मुख बाहेर आयउँ सुनु मतिधीर ॥ ८२ ( क ) ॥

मुझे व्याकुल देखकर तब कृपालु श्रीरघुवीर हँस दिये। हे धीरबुद्धि गरुड़जी! सुनिये, उनके हँसते ही मैं मुँहसे बाहर आ गया ॥ ८२ ( क ) ॥

सोड़ लरिकार्डि मो सन करन लगे पुनि राम।

कोटि भाँति समुझावउँ मनु न लहइ बिश्राम ॥ ८२ ( ख ) ॥

श्रीरामचन्द्रजी मेरे साथ फिर वही लड़कपन करने लगे। मैं करोड़ों (असंख्य) प्रकारसे मनको समझाता था, पर वह शान्ति नहीं पाता था ॥ ८२ ( ख ) ॥

देखि चरित यह सो प्रभुताई । समुझत देह दसा बिसराई ॥

धरनि परेउँ मुख आव न बाता । त्राहि त्राहि आरत जन त्राता ॥

यह [बाल] चरित्र देखकर और [पेटके अंदर देखी हुई] उस प्रभुताका स्मरण कर मैं शरीरकी सुध भूल गया और 'हे आर्तजनोंके रक्षक! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये' पुकारता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा। मुखसे बात नहीं निकलती थी! ॥ १ ॥

प्रेमाकुल प्रभु मोहि बिलोकी । निज माया प्रभुता तब रोकी ॥

कर सरोज प्रभु मम सिर धरेऊ । दीनदयाल सकल दुख हरेऊ ॥

तदनन्तर प्रभुने मुझे प्रेमविह्वल देखकर अपनी मायाकी प्रभुता (प्रभाव) को रोक लिया। प्रभुने अपना कर-कमल मेरे सिरपर रखा। दीनदयालुने मेरा सम्पूर्ण दुःख हर लिया ॥ २ ॥

कीन्ह राम मोहि बिगत बिमोहा । सेवक सुखद कृपा संदोहा ॥

प्रभुता प्रथम बिचारि बिचारी । मन महँ होइ हरष अति भारी ॥

सेवकोंको सुख देनेवाले, कृपाके समूह (कृपापमय) श्रीरामजीने मुझे मोहसे सर्वथा रहित कर दिया। उनकी पहलेवाली प्रभुताको विचार-विचारकर (याद कर-करके) मेरे मनमें बड़ा भारी हर्ष हुआ ॥ ३ ॥

१८६

  • रामचरितमानस *

भगत बछलता प्रभु कै देखी । उपजी मम उर प्रीति बिसेषी ॥ सजल नयन पुलकित कर जोरी । कीन्हिउँ बहु बिधि बिनय बहोरी ॥

प्रभुकी भक्तवत्सलता देखकर मेरे हृदयमें बहुत ही प्रेम उत्पन्न हुआ। फिर मैंने [आनन्दसे] नेत्रोंमें जल भरकर, पुलकित होकर और हाथ जोड़कर बहुत प्रकारसे विनती की ॥ ४ ॥

दो०— सुनि सप्रेम मम बानी देखि दीन निज दास ।

बचन सुखद गंभीर मृदु बोले रमानिवास ॥ ८३ ( क ) ॥

मेरी प्रेमयुक्त वाणी सुनकर और अपने दासको दीन देखकर रमानिवास श्रीरामजी सुखदायक, गम्भीर और कोमल वचन बोले— ॥ ८३ ( क ) ॥

काकभसुंडि मागु बर अति प्रसन्न मोहि जानि ।

अनिमादिक सिधि अपर रिधि मोच्छ सकल सुख खानि ॥ ८३ ( ख ) ॥

हे काकभशुण्डि! तू मुझे अत्यन्त प्रसन्न जानकर वर माँग। अणिमा आदि अष्ट सिद्धियाँ, दूसरी ऋद्धियाँ तथा सम्पूर्ण सुखोंकी खान मोक्ष, ॥ ८३ ( ख ) ॥

ग्यान बिबेक बिरति बिग्याना । मुनि दुर्लभ गुन जे जग नाना ॥

आजु देउँ सब संसय नाहीं । मागु जो तोहि भाव मन माहीं ॥

ज्ञान, विवेक, वैराग्य, विज्ञान (तत्त्वज्ञान) और वे अनेकों गुण जो जगत्में मुनियोंके लिये भी दुर्लभ हैं, ये सब मैं आज तुझे दूँगा, इसमें सन्देह नहीं। जो तेरे मन भावे, सो माँग ले ॥ १ ॥

सुनि प्रभु बचन अधिक अनुरागेउँ । मन अनुमान करन तब लागेउँ ॥

प्रभु कह देन सकल सुख सही । भगति आपनी देन न कही ॥

प्रभुके वचन सुनकर मैं बहुत ही प्रेममें भर गया। तब मनमें अनुमान करने लगा कि प्रभुने सब सुखोंके देनेकी बात कही, यह तो सत्य है; पर अपनी भक्ति देनेकी बात नहीं कही ॥ २ ॥

भगति हीन गुन सब सुख ऐसे । लवन बिना बहु बिंजन जैसे ॥

भजन हीन सुख कवने काजा । अस बिचारि बोलेउँ खगराजा ॥

भक्तिये रहित सब गुण और सब सुख वैसे ही (फोके) हैं जैसे नमकके बिना बहुत प्रकारके भोजनके पदार्थ। भजनसे रहित सुख किस कामके? हे पक्षिराज! ऐसा विचारकर मैं बोला— ॥ ३ ॥

जौँ प्रभु होइ प्रसन्न बर देहू । मो पर करहु कृपा अरु नेहू ॥

मन भावत बर मागउँ स्वामी । तुम्ह उदार उर अंतरजामी ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१८७

हे प्रभो! यदि आप प्रसन्न होकर मुझे वर देते हैं और मुझपर कृपा और स्नेह करते हैं, तो हे स्वामी! मैं अपना मन-भाया वर माँगता हूँ। आप उदार हैं और हृदयके भीतरकी जाननेवाले हैं ॥ ४ ॥

दो०— अबिरल भगति बिसुद्ध तव श्रुति पुरान जो गाव।

जेहि खोजत जोगीस मुनि प्रभु प्रसाद कोउ पाव ॥ ८४ ( क ) ॥

आपकी जिस अविरल (प्रगाढ़) एवं विशुद्ध (अनन्य, निष्काम) भक्तिको श्रुति और पुराण गाते हैं, जिसे योगीश्वर मुनि खोजते हैं और प्रभुकी कृपासे कोई विरला ही जिसे पाता है, ॥ ८४ (क) ॥

भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपा सिंधु सुख धाम।

सोड़ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम ॥ ८४ ( ख ) ॥

हे भक्तोंके [मन-इच्छित फल देनेवाले] कल्पवृक्ष! हे शरणागतके हितकारी! हे कृपासागर! हे सुखधाम श्रीरामजी! दया करके मुझे अपनी वही भक्ति दीजिये ॥ ८४ (ख) ॥

एवमस्तु कहि रघुकुलनायक। बोले बचन परम सुखदायक ॥

सुनु बायस तैं सहज सयाना। काहे न मागसि अस बरदाना ॥

‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो) कहकर रघुवंशके स्वामी परम सुख देनेवाले बचन बोले—हे काक! सुन, तू स्वभावसे ही बुद्धिमान् है। ऐसा वरदान कैसे न माँगता? ॥ १ ॥

सब सुख खानि भगति तैं मागी। नहिं जग कोउ तोहि सम बड़भागी ॥

जो मुनि कोटि जतन नहिं लहहीं। जे जप जोग अनल तन दहहीं ॥

तूने सब सुखोंकी खान भक्ति माँग ली, जगत्में तेरे समान बड़भागी कोई नहीं है। वे मुनि जो जप और योगकी अग्निसे शरीर जलाते रहते हैं, करोड़ों यत्न करके भी जिसको (जिस भक्तिको) नहीं पाते ॥ २ ॥

रीझेउँ देखि तोरि चतुराई। मागेहु भगति मोहि अति भाई ॥

सुनु बिहंग प्रसाद अब मोरें। सब सुभ गुन बसिहहिं उर तोरें ॥

वही भक्ति तूने माँगी। तेरी चतुरता देखकर मैं रीझ गया। यह चतुरता मुझे बहुत ही अच्छी लगी। हे पक्षी! सुन, मेरी कृपासे अब समस्त शुभ गुण तेरे हृदयमें बसेंगे ॥ ३ ॥

भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। जोग चरित्र रहस्य बिभागा ॥

जानब तैं सबही कर भेदा। मम प्रसाद नहिं साधन खेदा ॥

भक्ति, ज्ञान, विज्ञान, वैराग्य, योग, मेरी लीलाएँ और उनके रहस्य तथा विभाग—इन सबके भेदको तू मेरी कृपासे ही जान जायगा। तुझे साधनका कष्ट नहीं होगा ॥ ४ ॥

१८८

  • रामचरितमानस *

दो०—माया संभव भ्रम सब अब न व्यापिहँहिं तोहि।

जानेसु ब्रह्म अनादि अज अगुन गुनाकर मोहि ॥ ८५ ( क ) ॥

मायासे उत्पन्न सब भ्रम अब तुझको नहीं व्यापेंगे। मुझे अनादि, अजन्मा, अगुण (प्रकृतिके गुणोंसे रहित) और [गुणातीत दिव्य] गुणोंकी खान ब्रह्म जानना ॥ ८५ ( क ) ॥

मोहि भगत प्रिय संतत अस बिचारि सुनु काग।

कार्यँ बचन मन मम पद करेसु अचल अनुराग ॥ ८५ ( ख ) ॥

हे काक! सुन, मुझे भक्त निरन्तर प्रिय हैं, ऐसा विचारकर शरीर, वचन और मनसे मेरे चरणोंमें अटल प्रेम करना ॥ ८५ ( ख ) ॥

अब सुनु परम बिमल मम बानी। सत्य सुगम निगमादि बखानी ॥

निज सिद्धांत सुनावउँ तोही। सुनु मन धरु सब तजि भजु मोही ॥

अब मेरी सत्य, सुगम, वेदादिके द्वारा वर्णित परम निर्मल वाणी सुन। मैं तुझको यह 'निज सिद्धान्त' सुनाता हूँ। सुनकर मनमें धारण कर और सब तजकर मेरा भजन कर ॥ १ ॥

मम माया संभव संसारा। जीव चराचर बिबिधि प्रकारा ॥

सब मम प्रिय सब मम उपजाए। सब ते अधिक मनुज मोहि भाए ॥

यह सारा संसार मेरी मायासे उत्पन्न है। [इसमें] अनेकों प्रकारके चराचर जीव हैं। वे सभी मुझे प्रिय हैं; क्योंकि सभी मेरे उत्पन्न किये हुए हैं। [किन्तु] मनुष्य मुझको सबसे अधिक अच्छे लगते हैं ॥ २ ॥

तिन्ह महाँ द्विज द्विज महाँ श्रुतिधारी। तिन्ह महुँ निगम धरम अनुसारी ॥

तिन्ह महाँ प्रिय बिरक्त पुनि ग्यानी। ग्यानिहु ते अति प्रिय बिग्यानी ॥

उन मनुष्योंमें भी द्विज, द्विजोंमें भी वेदोंको [कण्ठमें] धारण करनेवाले, उनमें भी वेदोक्त धर्मपर चलनेवाले, उनमें भी विरक्त (वैराग्यवान्) मुझे प्रिय हैं। वैराग्यवानोंमें फिर ज्ञानी और ज्ञानियोंसे भी अत्यन्त प्रिय विज्ञानी हैं ॥ ३ ॥

तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा। जेहि गति मोरि न दूसरि आसा ॥

पुनि पुनि सत्य कहउँ तोहि पाहीं। मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं ॥

विज्ञानियोंसे भी प्रिय मुझे अपना दास है, जिसे मेरी ही गति (आश्रय) है, कोई दूसरी आशा नहीं है। मैं तुझसे बार-बार सत्य ('निज सिद्धान्त') कहता हूँ कि मुझे अपने सेवकके समान प्रिय कोई भी नहीं है ॥ ४ ॥

भगति हीन बिरंचि किन होई। सब जीवहु सम प्रिय मोहि सोई ॥

भगतिवंत अति नीचउ प्रानी। मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१८१

भक्तिहीन ब्रह्मा ही क्यों न हो, वह मुझे सब जीवोंके समान ही प्रिय है। परन्तु भक्तिमान् अत्यन्त नीच भी प्राणी मुझे प्राणोंके समान प्रिय है, यह मेरी घोषणा है ॥५॥

दो०— सुचि सुशील सेवक सुमति प्रिय कहु काहि न लाग।

श्रुति पुरान कह नीति असि सावधान सुनु काग ॥ ८६ ॥

पवित्र, सुशील और सुन्दर बुद्धिवाला सेवक, बता, किसको प्यारा नहीं लगता? वेद और पुराण ऐसी ही नीति कहते हैं। हे काक! सावधान होकर सुन ॥ ८६ ॥

एक पिता के बिपुल कुमारा। होहिं पृथक् गुन सील अचारा ॥ कोउ पंडित कोउ तापस ग्याता। कोउ धनवंत सूर कोउ दाता ॥

एक पिताके बहुत-से पुत्र पृथक्-पृथक् गुण, स्वभाव और आचरणवाले होते हैं। कोई पण्डित होता है, कोई तपस्वी, कोई ज्ञानी, कोई धनी, कोई शूरवीर, कोई दानी, ॥ १ ॥

कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई। सब पर पितहि प्रीति सम होई ॥ कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा। सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा ॥

कोई सर्वज्ञ और कोई धर्मपरायण होता है। पिताका प्रेम इन सभीपर समान होता है। परन्तु इनमेंसे यदि कोई मन, बचन और कर्मसे पिताका ही भक्त होता है, स्वप्रमैं भी दूसरा धर्म नहीं जानता, ॥ २ ॥

सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना। जद्यपि सो सब भाँति अयाना ॥ एहि बिधि जीव चराचर जेते। त्रिजग देव नर असुर समेते ॥

वह पुत्र पिताको प्राणोंके समान प्रिय होता है, यद्यपि (चाहे) वह सब प्रकारसे अज्ञान (मूर्ख) ही हो। इस प्रकार तिर्यक् (पशु-पक्षी), देव, मनुष्य और असुरोंसमेत जितने भी चेतन और जड़ जीव हैं, ॥ ३ ॥

अखिल बिस्व यह मोर उपाया। सब पर मोहि बराबरि दाय। तिन्ह महँ जो परिहरि मद माया। भजै मोहि मन बच अरु काया ॥

[उनसे भरा हुआ] यह सम्पूर्ण विश्व मेरा ही पैदा किया हुआ है। अतः सबपर मेरी बराबर दया है। परन्तु इनमेंसे जो मद और माया छोड़कर मन, बचन और शरीरसे मुझको भजता है, ॥ ४ ॥

दो०— पुरुष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ।

सर्ब भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ ॥ ८७ ( क ) ॥

वह पुरुष हो, नपुंसक हो, स्त्री हो अथवा चर-अचर कोई भी जीव हो, कपट छोड़कर जो भी सर्वभावसे मुझे भजता है वही मुझे परम प्रिय है ॥ ८७ ( क ) ॥

११०

  • रामचरितमानस *

सो०— सत्य कहउँ खग तोहि सुचि सेवक मम प्रानप्रिय।

अस बिचारि भजु मोहि परिहरि आस भरोस सब ॥ ८७ (ख) ॥

हे पक्षी! मैं तुझसे सत्य कहता हूँ, पवित्र (अनन्य एवं निष्काम) सेवक मुझे प्राणोंके समान प्यारा है। ऐसा विचारकर सब आशा-भरोसा छोड़कर मुझीको भज ॥ ८७ (ख) ॥

कबहूँ काल न व्यापिहि तोही। सुमिरेसु भजेसु निरंतर मोही ॥ प्रभु बचनामृत सुनि न अघाऊँ। तनु पुलकित मन अति हरषाऊँ ॥

तुझे काल कभी नहीं व्यापेगा। निरन्तर मेरा स्मरण और भजन करते रहना। प्रभुके बचनामृत सुनकर मैं तूस नहीं होता था। मेरा शरीर पुलकित था और मनमें मैं अत्यन्त ही हर्षित हो रहा था ॥ १ ॥

सो सुख जानइ मन अरु काना। नहिं रसना पहिं जाइ बखाना ॥ प्रभु सोभा सुख जानहिं नयना। कहि किमि सकहिं तिन्हहि नहिं बयना ॥

वह सुख मन और कान ही जानते हैं। जीभसे उसका बखान नहीं किया जा सकता। प्रभुकी शोभाका वह सुख नेत्र ही जानते हैं। पर वे कह कैसे सकते हैं? उनके वाणी तो है नहीं ॥ २ ॥

बहु बिधि मोहि प्रबोधि सुख देई। लगे करन सिसु कौतुक तेई ॥ सजल नयन कछु मुख करि रूखा। चितइ मातु लागी अति भूखा ॥

मुझे बहुत प्रकारसे भलीभाँति समझाकर और सुख देकर प्रभु फिर वही बालकोंके खेल करने लगे। नेत्रोंमें जल भरकर और मुखको कुछ रूखा [—सा] बनाकर उन्होंने माताकी ओर देखा—[और मुखाकृति तथा चितवनसे माताको समझा दिया कि] बहुत भूख लगी है ॥ ३ ॥

देखि मातु आतुर उठि धाई। कहि मृदु बचन लिए उर लाई ॥ गोद राखि कराव पय पाना। रघुपति चरित ललित कर गाना ॥

यह देखकर माता तुरंत उठ दौड़ी और कोमल वचन कहकर उन्होंने श्रीरामजीको छातीसे लगा लिया। वे गोदमें लेकर उन्हें दूध पिलाने लगीं और श्रीरघुनाथजी (उन्हीं) की ललित लीलाएँ गाने लगीं ॥ ४ ॥

सो०— जेहि सुख लागि पुरारि असुभ बेष कृत सिव सुखद।

अवधपुरी नर नारि तेहि सुख महुँ संतत मगन ॥ ८८ (क) ॥

जिस सुखके लिये [सबको] सुख देनेवाले कल्याणरूप त्रिपुरारि शिवजीने अशुभ वेष धारण किया, उस सुखमें अवधपुरीके नर-नारी निरन्तर निमग्न रहते हैं ॥ ८८ (क) ॥

सोई सुख लवल्लेस जिन्ह बारक सपनेहुँ लहेउ।

ते नहिं गनहिं खगेस ब्रह्मसुखहि सज्जन सुमति ॥ ८८ (ख) ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१११

उस सुखका लवलेशमात्र जिन्होंने एक बार स्वप्नमें भी प्राप्त कर लिया, हे पक्षिराज! वे सुन्दर बुद्धिवाले सज्जन पुरुष उसके सामने ब्रह्मसुखको भी कुछ नहीं गिनते ॥ ८८ (ख) ॥

मैं पुनि अवध रहेउँ कछु काला । देखेउँ बालबिनोद रसाला ॥ राम प्रसाद भगति बर पायउँ । प्रभु पद बंदि निजाश्रम आयउँ ॥

मैं और कुछ समयतक अवधपुरीमें रहा और मैंने श्रीरामजीकी रसीली बाललीलाएँ देखीं। श्रीरामजीकी कृपासे मैंने भक्तिका वरदान पाया। तदनन्तर प्रभुके चरणोंकी वन्दना करके मैं अपने आश्रमपर लौट आया ॥ १ ॥

तब ते मोहि न व्यापी माया । जब ते रघुनायक अपनाया ॥ यह सब गुप्त चरित मैं गावा । हरि मायाँ जिमि मोहि नचावा ॥

इस प्रकार जबसे श्रीरघुनाथजीने मुझको अपनाया, तबसे मुझे माया कभी नहीं व्यापी। श्रीहरिकी मायाने मुझे जैसे नचाया, वह सब गुप्त चरित्र मैंने कहा ॥ २ ॥

निज अनुभव अब कहउँ खगेसा । बिनु हरि भजन न जाहिं कलेसा ॥ राम कृपा बिनु सुनु खगराई । जानि न जाइ राम प्रभुताई ॥

हे पक्षिराज गरुड़! अब मैं आपसे अपना निजी अनुभव कहता हूँ। [वह यह है कि] भगवान्के भजन बिना क्लेश दूर नहीं होते। हे पक्षिराज! सुनिये, श्रीरामजीकी कृपा बिना श्रीरामजीकी प्रभुता नहीं जानी जाती; ॥ ३ ॥

जानें बिनु न होइ परतीती । बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती ॥ प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई । जिमि खगपति जल कै चिकनाई ॥

प्रभुता जाने बिना उनपर विश्वास नहीं जमता, विश्वासके बिना प्रीति नहीं होती और प्रीति बिना भक्ति वैसे ही दृढ़ नहीं होती जैसे हे पक्षिराज! जलकी चिकनाई ठहरती नहीं ॥ ४ ॥

सो०— बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु।

गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरिभगति बिनु ॥ ८९ ( क ) ॥

गुरुके बिना कहीं ज्ञान हो सकता है? अथवा वैराग्यके बिना कहीं ज्ञान हो सकता है? इसी तरह वेद और पुराण कहते हैं कि श्रीहरिकी भक्तिके बिना क्या सुख मिल सकता है? ॥ ८९ (क) ॥

कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु।

चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ ॥ ८९ ( ख ) ॥

हे तात! स्वाभाविक संतोषके बिना क्या कोई शान्ति पा सकता है? [चाहे] करोड़ों उपाय करके पच-पच मरिये; [फिर भी] क्या कभी जलके बिना नाव चल सकती है? ॥ ८९ (ख) ॥

११२

  • रामचरितमानस *

बिनु संतोष न काम नसाहीं। काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं॥ राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा। थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा॥

संतोषके बिना कामनाका नाश नहीं होता और कामनाओंके रहते स्वप्नमें भी सुख नहीं हो सकता। और श्रीरामके भजन बिना कामनाएँ कहीं मिट सकती हैं? बिना धरतीके भी कहीं पेड़ उग सकता है? ॥ १ ॥

बिनु बिग्यान कि समता आवइ। कोउ अवकास कि नभ बिनु पावइ॥ श्रद्धा बिना धर्म नहिं होई। बिनु महि गंध कि पावइ कोई॥

विज्ञान (तत्त्वज्ञान) के बिना क्या समभाव आ सकता है? आकाशके बिना क्या कोई अवकाश (पोल) पा सकता है? श्रद्धाके बिना धर्म [का आचरण] नहीं होता। क्या पृथ्वीतत्वके बिना कोई गन्ध पा सकता है? ॥ २ ॥

बिनु तप तेज कि कर बिस्तारा। जल बिनु रस कि होइ संसारा॥ सील कि मिल बिनु बुध सेवकाई। जिमि बिनु तेज न रूप गोसाई॥

तपके बिना क्या तेज फैल सकता है? जल-तत्वके बिना संसारमें क्या रस हो सकता है? पण्डितजनोंकी सेवा बिना क्या शील (सदाचार) प्राप्त हो सकता है? हे गोसाई! जैसे बिना तेज (अग्नि-तत्व) के रूप नहीं मिलता ॥ ३ ॥

निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा। परस कि होइ बिहीन समीरा॥ कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा। बिनु हरि भजन न भव भय नासा॥

निज-सुख (आत्मानन्द) के बिना क्या मन स्थिर हो सकता है? वायु-तत्वके बिना क्या स्पर्श हो सकता है? क्या विश्वासके बिना कोई भी सिद्धि हो सकती है? इसी प्रकार श्रीहरिके भजन बिना जन्म-मृत्युके भयका नाश नहीं होता ॥ ४ ॥

दो०— बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु।

राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु॥ १० ( क )॥

बिना विश्वासके भक्ति नहीं होती, भक्तिके बिना श्रीरामजी पिघलते (ढरते) नहीं और श्रीरामजीकी कृपाके बिना जीव स्वप्नमें भी शान्ति नहीं पाता ॥ १० (क) ॥

सो०— अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल।

भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद॥ १० ( ख )॥

हे धीरबुद्धि! ऐसा विचारकर सम्पूर्ण कुतर्क और सन्देहोंको छोड़कर करुणाकी खान सुन्दर और सुख देनेवाले श्रीरघुवीरका भजन कीजिये ॥ १० (ख) ॥

  • उत्तरकाण्ड *

११३

निज मति सरिस नाथ मैं गाई। प्रभु प्रताप महिमा खगराई॥ कहेउँ न कछु करि जुगति बिसेषी। यह सब मैं निज नयनन्हि देखी॥

हे पक्षिराज! हे नाथ! मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार प्रभुके प्रताप और महिमाका गान किया। मैंने इसमें कोई बात युक्तिसे बढ़ाकर नहीं कही है। यह सब अपनी आँखों देखी कही है॥ १ ॥

महिमा नाम रूप गुन गाथा। सकल अमित अनंत रघुनाथा॥ निज निज मति मुनि हरि गुन गावहिं। निगम सेष सिव पार न पावहिं॥

श्रीरघुनाथजीकी महिमा, नाम, रूप और गुणोंकी कथा सभी अपार एवं अनन्त हैं तथा श्रीरघुनाथजी स्वयं भी अनन्त हैं। मुनिगण अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार श्रीहरिके गुण गाते हैं। वेद, शेष और शिवजी भी उनका पार नहीं पाते॥ २ ॥

तुम्हहि आदि खग मसक प्रजंता। नभ उड़ाहिं नहिं पावहिं अंता॥ तिमि रघुपति महिमा अवगाहा। तात कबहुँ कोउ पाव कि थाहा॥

आपसे लेकर मच्छरपर्यन्त सभी छोटे-बड़े जीव आकाशमें उड़ते हैं, किन्तु आकाशका अन्त कोई नहीं पाते। इसी प्रकार हे तात! श्रीरघुनाथजीकी महिमा भी अथाह है। क्या कभी कोई उसकी थाह पा सकता है?॥ ३ ॥

रामु काम सत कोटि सुभग तन। दुर्गा कोटि अमित अरि मर्दन॥ सक्र कोटि सत सरिस बिलासा। नभ सत कोटि अमित अवकासा॥

श्रीरामजीका अरबों कामदेवोंके समान सुन्दर शरीर है। वे अनन्त कोटि दुर्गाओंके समान शत्रुनाशक हैं। अरबों इन्द्रोंके समान उनका विलास (ऐश्वर्य) है। अरबों आकाशोंके समान उनमें अनन्त अवकाश (स्थान) है॥ ४ ॥

दो०— मरुत कोटि सत बिपुल बल रबि सत कोटि प्रकास।

ससि सत कोटि सुसीतल समन सकल भव त्रास॥ ११ ( क )॥

अरबों पवनके समान उनमें महान् बल है और अरबों सूर्योंके समान प्रकाश है। अरबों चन्द्रमाओंके समान वे शीतल और संसारके समस्त भयोंका नाश करनेवाले हैं॥ ११ ( क )॥

काल कोटि सत सरिस अति दुस्तर दुर्ग दुरंत।

धूमकेतु सत कोटि सम दुराधरष भगवंत॥ ११ ( ख )॥

अरबों कालोंके समान वे अत्यन्त दुस्तर, दुर्गम और दुरन्त हैं। वे भगवान् अरबों धूमकेतुओं (पुच्छल तारों) के समान अत्यन्त प्रबल हैं॥ ११ (ख)॥

११४

  • रामचरितमानस *

प्रभु अगाध सत कोटि पताला । समन कोटि सत सरिस कराला ॥ तीरथ अमित कोटि सम पावन । नाम अखिल अघ पूग नसावन ॥

अरबों पातालोंके समान प्रभु अथाह हैं। अरबों यमराजोंके समान भयानक हैं। अनन्तकोटि तीर्थोंके समान वे पवित्र करनेवाले हैं। उनका नाम सम्पूर्ण पापसमूहका नाश करनेवाला है ॥ १ ॥

हिमगिरि कोटि अचल रघुबीरा । सिंधु कोटि सत सम गंभीरा ॥ कामधेनु सत कोटि समाना । सकल काम दायक भगवाना ॥

श्रीरघुवीर करोड़ों हिमालयोंके समान अचल (स्थिर) हैं और अरबों समुद्रोंके समान गहरे हैं। भगवान् अरबों कामधेनुओंके समान सब कामनाओं (इच्छित पदार्थों) के देनेवाले हैं ॥ २ ॥

सारद कोटि अमित चतुराई । बिधि सत कोटि सृष्टि निपुनाई ॥ बिष्णु कोटि सम पालन कर्ता । रुद्र कोटि सत सम संहर्ता ॥

उनमें अनन्तकोटि सरस्वतियोंके समान चतुरता है। अरबों ब्रह्माओंके समान सृष्टिश्चनाकी निपुणता है। वे करोड़ों विष्णुओंके समान पालन करनेवाले और अरबों रुद्रोंके समान संहार करनेवाले हैं ॥ ३ ॥

धनद कोटि सत सम धनवाना । माया कोटि प्रपंच निधाना ॥ भार धरन सत कोटि अहीसा । निरवधि निरुपम प्रभु जगदीसा ॥

वे अरबों कुबेरोंके समान धनवान् और करोड़ों मायाओंके समान सृष्टिके खजाने हैं। बौद्ध उठानेमें वे अरबों शेषोंके समान हैं। [अधिक क्या] जगदीश्वर प्रभु श्रीरामजी [सभी बातोंमें] सीमारहित और उपमारहित हैं ॥ ४ ॥

छं०—निरुपम न उपमा आन राम समान रामु निगम कहै । जिमि कोटि सत खद्योत सम रबि कहत अति लघुता लहै ॥ एहि भाँति निज निज मति बिलास मुनीस हरिहि बखानहीं । प्रभु भाव गाहक अति कृपाल सप्रेम सुनि सुख मानहीं ॥

श्रीरामजी उपमारहित हैं, उनकी कोई दूसरी उपमा है ही नहीं। श्रीरामके समान श्रीराम ही हैं, ऐसा वेद कहते हैं। जैसे अरबों जुगनुओंके समान कहनेसे सूर्य [प्रशंसाको नहीं वरं] अत्यन्त लघुताको ही प्राप्त होता है (सूर्यकी निन्दा ही होती है)। इसी प्रकार अपनी-अपनी बुद्धिके विकासके अनुसार मुनीश्वर श्रीहरिका वर्णन करते हैं। किन्तु प्रभु भक्तोंके भावमात्रको ग्रहण करनेवाले और अत्यन्त कृपालु हैं। वे उस वर्णनको प्रेमसहित सुनकर सुख मानते हैं।

  • उत्तरकाण्ड *

११५

दो०—रामु अमित गुन सागर थाह कि पावड़ कोड़।

संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हि सुनायउँ सोड़ ॥ १२ ( क ) ॥

श्रीरामजी अपार गुणोंके समुद्र हैं, क्या उनकी कोई थाह पा सकता है? संतोसे मैंने जैसा कुछ सुना था, वही आपको सुनाया ॥ १२ ( क ) ॥

सो०—भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन।

तजि ममता मद मान भजिअ सदा सीतारवन ॥ १२ ( ख ) ॥

सुखके भण्डार, करुणाधाम भगवान् भाव (प्रेम) के वश हैं। [अतएव] ममता, मद और मानको छोड़कर सदा श्रीजानकीनाथजीका ही भजन करना चाहिये ॥ १२ ( ख ) ॥

सुनि भुसुंडि के बचन सुहाए। हरषित खगपति पंख फुलाए ॥

नयन नीर मन अति हरषाना। श्रीरघुपति प्रताप उर आना ॥

भुशुण्डिजीके सुन्दर वचन सुनकर पक्षिराजने हर्षित होकर अपने पंख फुला लिये। उनके नेत्रोंमें [प्रेमानन्दके आँसुओंका] जल आ गया और मन अत्यन्त हर्षित हो गया। उन्होंने श्रीरघुनाथजीका प्रताप हृदयमें धारण किया ॥ १ ॥

पाछिल मोह समुद्धि पछिताना। ब्रह्म अनादि मनुज करि माना ॥

पुनि पुनि काग चरन सिरु नावा। जानि राम सम प्रेम बढ़ावा ॥

वे अपने पिछले मोहको समझकर (याद करके) पछिताने लगे कि मैंने अनादि ब्रह्मको मनुष्य करके माना। गरुड़जीने बार-बार काकभुशुण्डिजीके चरणोंपर सिर नवाया और उन्हें श्रीरामजीके ही समान जानकर प्रेम बढ़ाया ॥ २ ॥

गुर बिनु भव निधि तरड़ न कोई। जौँ बिरंचि संकर सम होई ॥

संसय सर्प गसेउ मोहि ताता। दुखद लहरि कुतर्क बहु ब्राता ॥

गुरुके बिना कोई भवसागर नहीं तर सकता, चाहे वह ब्रह्माजी और शंकरजीके समान ही क्यों न हो। [गरुड़जीने कहा—] हे तात! मुझे सन्देशरूपी सर्पने डस लिया था और [साँपके डसनेपर जैसे विष चढ़नेसे लहरे आती हैं, वैसे ही] बहुत-सी कुतर्करूपी दुःख देनेवाली लहरे आ रही थीं ॥ ३ ॥

तव सरूप गारुड़ि रघुनायक। मोहि जिआयउ जन सुखदायक ॥

तव प्रसाद मम मोह नसाना। राम रहस्य अनूपम जाना ॥

आपके स्वरूपरूपी गारुड़ी (साँपका विष उतारनेवाले) के द्वारा भक्तोंको सुख देनेवाले श्रीरघुनाथजीने मुझे जिला लिया। आपकी कृपासे मेरा मोह नाश हो गया और मैंने श्रीरामजीका अनुपम रहस्य जाना ॥ ४ ॥

११६

  • रामचरितमानस *

दो०—ताहि प्रसंसि बिबिधि बिधि सीस नाड़ कर जोरि।

बचन बिनीत सप्रेम मृदु बोलेउ गुरुड़ बहोरि ॥ १३ ( क ) ॥

उनकी (भुशुण्डिजीकी) बहुत प्रकारसे प्रशंसा करके, सिर नवाकर और हाथ जोड़कर फिर गुरुड़जी प्रेमपूर्वक विनम्र और कोमल वचन बोले— ॥ १३ ( क ) ॥

प्रभु अपने अबिबेक ते बूझउँ स्वामी तोहि।

कृपासिंधु सादर कहहु जानि दास निज मोहि ॥ १३ ( ख ) ॥

हे प्रभो! हे स्वामी! मैं अपने अविवेकके कारण आपसे पूछता हूँ। हे कृपाके समुद्र! मुझे अपना 'निज दास' जानकर आदरपूर्वक (विचारपूर्वक) मेरे प्रश्नका उत्तर कहिये ॥ १३ ( ख ) ॥

तुम्ह सर्बग्य तग्य तम पारा। सुमति सुसील सरल आचारा ॥

ग्यान बिरति बिग्यान निवासा। रघुनायक के तुम्ह प्रिय दासा ॥

आप सब कुछ जाननेवाले हैं, तत्त्वके ज्ञाता हैं, अन्धकार (माया) से परे, उत्तम बुद्धिसे युक्त, सुशील, सरल आचरणवाले, ज्ञान, वैराग्य और विज्ञानके धाम और श्रीरघुनाथजीके प्रिय दास हैं ॥ १ ॥

कारन कवन देह यह पाई। तात सकल मोहि कहहु बुझाई ॥

राम चरित सर सुंदर स्वामी। पायहु कहाँ कहहु नभगामी ॥

आपने यह काकशरीर किस कारणसे पाया? हे तात! सब समझाकर मुझसे कहिये। हे स्वामी! हे आकाशगामी! यह सुन्दर रामचरितमानस आपने कहाँ पाया, सो कहिये ॥ २ ॥

नाथ सुना मैं अस सिव पाहीं। महा प्रलयहुँ नास तव नाहीं ॥

मुधा बचन नहि ईस्वर कहई। सोउ मोरें मन संसय अहई ॥

हे नाथ! मैंने शिवजीसे ऐसा सुना है कि महाप्रलयमें भी आपका नाश नहीं होता और ईश्वर (शिवजी) कभी मिथ्या वचन कहते नहीं। वह भी मेरे मनमें सन्देह है ॥ ३ ॥

अग जग जीव नाग नर देवा। नाथ सकल जगु काल कलेवा ॥

अंड कटाह अमित लयकारी। कालु सदा दुरतिक्रम भारी ॥

[क्योंकि] हे नाथ! नाग, मनुष्य, देवता आदि चर-अचर जीव तथा यह सारा जगत् कालका कलेवा है। असंख्य ब्रह्माण्डोंका नाश करनेवाला काल सदा बड़ा ही अनिवार्य है ॥ ४ ॥

सो०—तुम्हहि न व्यापत काल अति कराल कारन कवन।

मोहि सो कहहु कृपाल ग्यान प्रभाव कि जोग बल ॥ १४ ( क ) ॥

  • उत्तरकाण्ड *

११७

[ऐसा वह] अत्यन्त भयङ्कर काल आपको नहीं व्यापता (आपपर प्रभाव नहीं दिखलाता) इसका क्या कारण है? हे कृपालु! मुझे कहिये, यह ज्ञानका प्रभाव है या योगका बल है? ॥ १४ (क) ॥

दो०—प्रभु तव आश्रम आएँ मोर मोह भ्रम भाग।

कारन कवन सो नाथ सब कहहु सहित अनुराग ॥ १४ (ख) ॥

हे प्रभो! आपके आश्रममें आते ही मेरा मोह और भ्रम भाग गया। इसका क्या कारण है? हे नाथ! यह सब प्रेमसहित कहिये ॥ १४ (ख) ॥

गरुड़ गिरा सुनि हरषेउ कागा । बोलेउ उमा परम अनुरागा ॥ धन्य धन्य तव मति उरगारी । प्रस्न तुम्हारि मोहि अति प्यारी ॥

हे उमा! गरुड़जीकी वाणी सुनकर काकभुशुण्डिजी हर्षित हुए और परम प्रेमसे बोले—हे सर्पोंके शत्रु! आपकी बुद्धि धन्य है! धन्य है! आपके प्रश्न मुझे बहुत ही प्यारे लगे ॥ १ ॥

सुनि तव प्रस्न सप्रेम सुहाई । बहुत जनम कै सुधि मोहि आई ॥ सब निज कथा कहउँ मैं गाई । तात सुनहु सादर मन लाई ॥

आपके प्रेमयुक्त सुन्दर प्रश्न सुनकर मुझे अपने बहुत जन्मोंकी याद आ गयी। मैं अपनी सब कथा विस्तारसे कहता हूँ। हे तात! आदरसहित मन लगाकर सुनिये ॥ २ ॥

जप तप मख सम दम ब्रत दाना । बिरति बिबेक जोग बिग्याना ॥ सब कर फल रघुपति पद प्रेमा । तेहि बिनु कोउ न पावइ छेमा ॥

अनेक जप, तप, यज्ञ, शम (मनको रोकना), दम (इन्द्रियोंको रोकना), ब्रत, दान, वैराग्य, विवेक, योग, विज्ञान आदि सबका फल श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें प्रेम होना है। इसके बिना कोई कल्याण नहीं पा सकता ॥ ३ ॥

एहिं तन राम भगति मैं पाई । ताते मोहि ममता अधिकाई ॥ जेहि तें कछु निज स्वार्थ होई । तेहि पर ममता कर सब कोई ॥

मैंने इसी शरीरसे श्रीरामजीकी भक्ति प्राप्त की है। इसीसे इसपर मेरी ममता अधिक है। जिससे अपना कुछ स्वार्थ होता है, उसपर सभी कोई प्रेम करते हैं ॥ ४ ॥

सो०—पन्नगारि असि नीति श्रुति संमत सज्जन कहहिं।

अति नीचहु सन प्रीति करिअ जानि निज परम हित ॥ १५ (क) ॥

हे गरुड़जी! वेदोंमें मानी हुई ऐसी नीति है और सज्जन भी कहते हैं कि अपना परम हित जानकर अत्यन्त नीचसे भी प्रेम करना चाहिये ॥ १५ (क) ॥

पाट कीट तें होइ तेहि तें पाटंबर रुचिर।

कृमि पालड़ सबु कोइ परम अपावन प्रान सम ॥ १५ (ख) ॥

११८

  • रामचरितमानस *

रेशम कीड़ेसे होता है, उससे सुन्दर रेशमी वस्त्र बनते हैं। इसीसे उस परम अपवित्र कीड़ेको भी सब कोई प्राणोंके समान पालते हैं ॥ १५ (ख) ॥

स्वारथ साँच जीव कहूँ एहा। मन क्रम बचन राम पद नेहा॥ सोड़ पावन सोड़ सुभग सरीरा। जो तनु पाड़ भजिअ रघुबीरा॥

जीवके लिये सच्चा स्वार्थ यही है कि मन, वचन और कर्मसे श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम हो। वही शरीर पवित्र और सुन्दर है जिस शरीरको पाकर श्रीरघुवीरका भजन किया जाय ॥ १ ॥

राम बिमुख लहि बिधि सम देही। कबि कोबिद न प्रसंसहिं तेही॥ राम भगति एहिं तन उर जामी। ताते मोहि परम प्रिय स्वामी॥

जो श्रीरामजीके विमुख है वह यदि ब्रह्माजीके समान शरीर पा जाय तो भी कवि और पण्डित उसकी प्रशंसा नहीं करते। इसी शरीरसे मेरे हृदयमें रामभक्ति उत्पन्न हुई। इसीसे हे स्वामी! यह मुझे परम प्रिय है ॥ २ ॥

तजउँ न तन निज इच्छा मरना। तन बिनु बेद भजन नहिं बरना॥ प्रथम मोहँ मोहि बहुत बिगोवा। राम बिमुख सुख कबहुँ न सोवा॥

मेरा मरण अपनी इच्छापर है, परन्तु फिर भी मैं यह शरीर नहीं छोड़ता; क्योंकि वेदोंने वर्णन किया है कि शरीरके बिना भजन नहीं होता। पहले मोहने मेरी बड़ी दुर्दशा की। श्रीरामजीके विमुख होकर मैं कभी सुखसे नहीं सोया ॥ ३ ॥

नाना जनम कर्म पुनि नाना। किए जोग जप तप मख दाना॥ कवन जोनि जनमेउँ जहँ नाहीं। मैं खगेस भ्रमि भ्रमि जग माहीं॥

अनेकों जन्मोंमें मैंने अनेकों प्रकारके योग, जप, तप, यज्ञ और दान आदि कर्म किये। हे गरुड़जी! जगत्में ऐसी कौन योनि है, जिसमें मैंने [बार-बार] घूम-फिरकर जन्म न लिया हो ॥ ४ ॥

देखेउँ करि सब करम गोसाईं। सुखी न भयउँ अबहिं की नाई॥ सुधि मोहि नाथ जन्म बहु केरी। सिव प्रसाद मति मोहँ न घेरी॥

हे गुसाईं! मैंने सब कर्म करके देख लिये, पर अब (इस जन्म) की तरह मैं कभी सुखी नहीं हुआ। हे नाथ! मुझे बहुत-से जन्मोंकी याद है। [क्योंकि] श्रीशिवजीकी कृपासे मेरी बुद्धिको मोहने नहीं घेरा ॥ ५ ॥

दो०— प्रथम जन्म के चरित अब कहउँ सुनुहु बिहगेस।

सुनि प्रभु पद रति उपजड़ जातें मिटहिं कलेस ॥ १६ (क) ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१११

हे पक्षिराज! सुनिये, अब मैं अपने प्रथम जन्मके चरित्र कहता हूँ, जिन्हें सुनकर प्रभुके चरणोंमें प्रीति उत्पन्न होती है, जिससे सब क्लेश मिट जाते हैं ॥ १६ (क) ॥

पूरुब कल्प एक प्रभु जुग कलिजुग मल मूल।

नर अरु नारि अधर्म रत सकल निगम प्रतिकूल ॥ १६ (ख) ॥

हे प्रभो! पूर्वके एक कल्पमें पापोंका मूल युग कलियुग था, जिसमें पुरुष और स्त्री सभी अधर्मपरायण और वेदके विरोधी थे ॥ १६ (ख) ॥

तेहिं कलिजुग कोसलपुर जाई। जन्मत भयउँ सूद्र तनु पाई॥ सिव सेवक मन क्रम अरु बानी। आन देव निंदक अभिमानी ॥

उस कलियुगमें मैं अयोध्यापुरीमें जाकर शूद्रका शरीर पाकर जन्मा। मैं मन, वचन और कर्मसे शिवजीका सेवक और दूसरे देवताओंकी निन्दा करनेवाला अभिमानी था ॥ १ ॥

धन मद मत्त परम बाचाला। उग्रबुद्धि उर दंभ बिसाला ॥ जदपि रहेउँ रघुपति रजधानी। तदपि न कछु महिमा तब जानी ॥

मैं धनके मदसे मतवाला, बहुत ही बकवादी और उग्रबुद्धिवाला था; मेरे हृदयमें बड़ा भारी दम्भ था। यद्यपि मैं श्रीरघुनाथजीकी राजधानीमें रहता था, तथापि मैंने उस समय उसकी महिमा कुछ भी नहीं जानी ॥ २ ॥

अब जाना मैं अवध प्रभावा। निगमागम पुरान अस गावा ॥ कवनेहुँ जन्म अवध बस जोई। राम परायन सो परि होई ॥

अब मैंने अवधका प्रभाव जाना। वेद, शास्त्र और पुराणोंने ऐसा गाया है कि किसी भी जन्ममें जो कोई भी अयोध्यामें बस जाता है, वह अवश्य ही श्रीरामजीके परायण हो जायगा ॥ ३ ॥

अवध प्रभाव जान तब प्रानी। जब उर बसहिं रामु धनुपानी ॥ सो कलिकाल कठिन उरगारी। पाप परायन सब नर नारी ॥

अवधका प्रभाव जीव तभी जानता है, जब हाथमें धनुष धारण करनेवाले श्रीरामजी उसके हृदयमें निवास करते हैं। हे गरुड़जी! वह कलिकाल बड़ा कठिन था। उसमें सभी नर-नारी पाप-परायण (पापोंमें लिस) थे ॥ ४ ॥

दो०—कलिमल ग्रसे धर्म सब लुस भए सदग्रंथ।

दंभिन्ह निज मति कल्पि करि प्रगट किए बहु पंथ ॥ १७ (क) ॥

कलियुगके पापोंने सब धर्मोंको ग्रस लिया, सदग्रन्थ लुप्त हो गये, दम्भियोंने अपनी बुद्धिसे कल्पना कर-करके बहुत-से पंथ प्रकट कर दिये ॥ १७ (क) ॥

१०००

  • रामचरितमानस *

भाए लोग सब मोहबस लोभ ग्रसे सुभ कर्म।

सुनु हरिजान ग्यान निधि कहउँ कछुक कलिधर्म ॥ ९७ (ख) ॥

सभी लोग मोहके वश हो गये, शुभकर्मोंको लोभने हड़प लिया। हे ज्ञानके भण्डार! हे श्रीहरिके वाहन! सुनिये, अब मैं कलिके कुछ धर्म कहता हूँ ॥ ९७ (ख) ॥

बरन धर्म नहिं आश्रम चारी। श्रुति विरोध रत सब नर नारी ॥

द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन। कोउ नहिं मान निगम अनुसासन ॥

कलियुगमें न वर्णधर्म रहता है, न चारों आश्रम रहते हैं। सब पुरुष-स्त्री वेदके विरोधमें लगे रहते हैं। ब्राह्मण वेदोंके बेचनेवाले और राजा प्रजाको खा डालनेवाले होते हैं। वेदकी आज्ञा कोई नहीं मानता ॥ १ ॥

मारग सोड़ जा कहुँ जोड़ भावा। पंडित सोड़ जो गाल बजावा ॥

मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहुँ संत कहइ सब कोई ॥

जिसको जो अच्छा लग जाय, वही मार्ग है। जो डींग मारता है, वही पण्डित है। जो मिथ्या आरम्भ करता (आडम्बर रचता) है और जो दम्भमें रत है, उसीको सब कोई संत कहते हैं ॥ २ ॥

सोड़ सयान जो परधन हारी। जो कर दंभ सो बड़ आचारी ॥

जो कह झूँठ मसखरी जाना। कलिजुग सोड़ गुनवंत बखाना ॥

जो [जिस किसी प्रकारसे] दूसरेका धन हरण कर ले, वही बुद्धिमान् है। जो दम्भ करता है वही बड़ा आचारी है। जो झूठ बोलता है और हँसी-दिल्लीगी करना जानता है, कलियुगमें वही गुणवान् कहा जाता है ॥ ३ ॥

निराचार जो श्रुति पथ त्यागी। कलिजुग सोड़ ग्यानी सो बिरागी ॥

जाकें नख अरु जटा बिसाला। सोड़ तापस प्रसिद्ध कलिकाला ॥

जो आचारहीन है और वेदमार्गको छोड़े हुए है, कलियुगमें वही ज्ञानी और वही वैराग्यवान् है। जिसके बड़े-बड़े नख और लंबी-लंबी जटाएँ हैं, वही कलियुगमें प्रसिद्ध तपस्वी है ॥ ४ ॥

दो०—असुभ वेष भूषन धरें भच्छाभच्छ जे खाहिं।

तेड़ जोगी तेड़ सिद्ध नर पूज्य ते कलिजुग माहिं ॥ ९८ (क) ॥

जो अमङ्गल वेष और अमङ्गल भूषण धारण करते हैं और भक्ष्य-अभक्ष्य (खाने योग्य और न खाने योग्य) सब कुछ खा लेते हैं, वे ही योगी हैं, वे ही सिद्ध हैं और वे ही मनुष्य कलियुगमें पूज्य हैं ॥ ९८ (क) ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१००१

सो०— जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेड़।

मन क्रम बचन लबार तेड़ बकता कलिकाल महुँ ॥ ९८ (ख) ॥

जिनके आचरण दूसरोंका अपकार (अहित) करनेवाले हैं, उन्हींका बड़ा गौरव होता है और वे ही सम्मानके योग्य होते हैं। जो मन, वचन और कर्मसे लबार (झूठ बकनेवाले) हैं, वे ही कलियुगमें वक्ता माने जाते हैं ॥ ९८ (ख) ॥

नारि बिबस नर सकल गोसाईं। नाचहिं नट मर्कट की नाईं ॥

सूद्र द्विजन्ह उपदेसहिं ग्याना। मेलि जनेऊ लेहिं कुदाना ॥

हे गोसाईं! सभी मनुष्य स्त्रियोंके विशेष वशमें हैं और बाजीगरके बंदरकी तरह [उनके नचाये] नाचते हैं। ब्राह्मणोंको शूद्र ज्ञानोपदेश करते हैं और गलमें जनेऊ डालकर कुत्सित दान लेते हैं ॥ १ ॥

सब नर काम लोभ रत क्रोधी। देव बिप्र श्रुति संत विरोधी ॥

गुन मंदिर सुंदर पति त्यागी। भजहिं नारि पर पुरुष अभागी ॥

सभी पुरुष काम और लोभमें तत्पर और क्रोधी होते हैं। देवता, ब्राह्मण, वेद और संतोंके विरोधी होते हैं। अभागिनी स्त्रियाँ गुणोंके धाम सुन्दर पतिको छोड़कर परपुरुषका सेवन करती हैं ॥ २ ॥

सौभागिनीं बिभूषन हीना। बिधवन्ह के सिंगार नबीना ॥

गुर सिष बधिर अंध का लेखा। एक न सुनइ एक नहिं देखा ॥

सुहागिनी स्त्रियाँ तो आभूषणोंसे रहित होती हैं, पर विधवाओंके नित्य नये शृङ्गार होते हैं। शिष्य और गुरुमें बहरे और अंधेका-सा हिसाब होता है। एक (शिष्य) गुरुके उपदेशको सुनता नहीं, एक (गुरु) देखता नहीं (उसे ज्ञानदृष्टि प्राप्त नहीं है) ॥ ३ ॥

हरइ सिष्य धन सोक न हरई। सो गुर घोर नरक महुँ परई ॥

मातु पिता बालकन्हि बोलावहिं। उदर भैर सोइ धर्म सिखावहिं ॥

जो गुरु शिष्यका धन हरण करता है, पर शोक नहीं हरण करता, वह घोर नरकमें पड़ता है। माता-पिता बालकोंको बुलाकर वही धर्म सिखलाते हैं, जिससे पेट भरे ॥ ४ ॥

दो०— ब्रह्म ग्यान बिनु नारि नर कहहिं न दूसरि बात।

कौड़ी लागि लोभ बस करहिं बिप्र गुर घात ॥ ९९ (क) ॥

स्त्री-पुरुष ब्रह्मज्ञानके सिवा दूसरी बात नहीं करते, पर वे लोभवश कौड़ियों (बहुत थोड़े लाभ)के लिये ब्राह्मण और गुरुकी हत्या कर डालते हैं ॥ ९९ (क) ॥

बादहिं सूद्र द्विजन्ह सन हम तुम्ह ते कछु घाटि।

जानइ ब्रह्म सो बिप्रबर आँखि देखावहिं डाटि ॥ ९९ (ख) ॥

१००२

  • रामचरितमानस *

शूद्र ब्राह्मणोंसे विवाद करते हैं [और कहते हैं] कि हम क्या तुमसे कुछ कम हैं? जो ब्रह्मको जानता है वही श्रेष्ठ ब्राह्मण है। [ऐसा कहकर] वे उन्हें डांटकर आँखें दिखलाते हैं ॥ ९९ (ख) ॥

पर त्रिय लंपट कपट सयाने। मोह द्रोह ममता लपटाने ॥ तेड़ अभेदबादी ग्यानी नर। देखा मैं चरित्र कलिजुग कर ॥

जो परायी स्त्रीमें आसक्त, कपट करनेमें चतुर और मोह, द्रोह और ममतामें लिपटे हुए हैं, वे ही मनुष्य अभेदवादी (ब्रह्म और जीवको एक बतानेवाले) जानी हैं। मैंने उस कलियुगका यह चरित्र देखा ॥ १ ॥

आपु गए अरु तिन्हू घालहिं। जे कहूँ सत मारग प्रतिपालहिं ॥ कल्प कल्प भरि एक एक नरका। परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका ॥

वे स्वयं तो नष्ट हुए ही रहते हैं; जो कहीं सन्मार्गका प्रतिपालन करते हैं, उनको भी वे नष्ट कर देते हैं। जो तर्क करके वेदकी निन्दा करते हैं, वे लोग कल्प-कल्पभर एक-एक नरकमें पड़े रहते हैं ॥ २ ॥

जे बरनाधम तेलि कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा ॥ नारि मुड़ि गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं संन्यासी ॥

तेली, कुम्हार, चाण्डाल, भील, कोल और कलवार आदि जो वर्णमें नीचे हैं, स्त्रीके मरनेपर अथवा घरकी सम्पत्ति नष्ट हो जानेपर सिर मुँडाकर संन्यासी हो जाते हैं ॥ ३ ॥

ते बिप्रन्ह सन आपु पुजावहिं। उभय लोक निज हाथ नसावहिं ॥ बिप्र निरच्छर लोलुप कामी। निराचार सठ बृषली स्वामी ॥

वे अपनेको ब्राह्मणोंसे पुजवाते हैं और अपने ही हाथों दोनों लोक नष्ट करते हैं। ब्राह्मण अपढ़, लोभी, कामी, आचारहीन, मूर्ख और नीची जातिकी व्यभिचारिणी स्त्रियोंके स्वामी होते हैं ॥ ४ ॥

सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना। बैठि बरासन कहहिं पुराना ॥ सब नर कल्पित करहिं अचारा। जाइ न बरनि अनीति अपारा ॥

शूद्र नाना प्रकारके जप, तप और ब्रत करते हैं तथा ऊँचे आसन (व्यासगद्दी) पर बैठकर पुराण कहते हैं। सब मनुष्य मनमाना आचरण करते हैं। अपार अनीतिका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ५ ॥

दो०— भए बरन संकर कलि भिन्नसेतु सब लोग।

करहिं पाप पावहिं दुख भय रुज सोक बियोग ॥ १०० ( क ) ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१००३

कलियुगमें सब लोग वर्णसंकर और मर्यादासे च्युत हो गये। वे पाप करते हैं और [उनके फलस्वरूप] दुःख, भय, रोग, शोक और [प्रिय वस्तुका] वियोग पाते हैं ॥ १०० (क) ॥

श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत बिरति बिबेक।

तेहिं न चलहिं नर मोह बस कल्पहिं पंथ अनेक ॥ १०० (ख) ॥

वेदसम्मत तथा वैराग्य और ज्ञानसे युक्त जो हरिभक्तिका मार्ग है, मोहवश मनुष्य उसपर नहीं चलते और अनेकों नये-नये पंथोंकी कल्पना करते हैं ॥ १०० (ख) ॥

छं०—बहु दाम सँवारहिं धाम जती । बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती ॥

तपसी धनवंत दरिद्र गृही । कलि कौतुक तात न जात कही ॥

संन्यासी बहुत धन लगाकर घर सजाते हैं। उनमें वैराग्य नहीं रहा, उसे विषयोंने हर लिया। तपस्वी धनवान् हो गये और गृहस्थ दरिद्र। हे तात! कलियुगकी लीला कुछ कही नहीं जाती ॥ १ ॥

कुलवंति निकारहिं नारि सती । गृह आनहिं चेरि निबेरि गती ॥

सुत मानहिं मातु पिता तब लौं । अबलानन दीख नहीं जब लौं ॥

कुलवती और सती स्त्रीको पुरुष घरसे निकाल देते हैं और अच्छी चालको छोड़कर घरमें दासीको ला रखते हैं। पुत्र अपने माता-पिताको तभीतक मानते हैं जबतक स्त्रीका मुँह नहीं दिखायी पड़ा ॥ २ ॥

ससुरारि पिआरि लगी जब तें । रिपुरूप कुटुंब भए तब तें ॥

नृप पाप परायन धर्म नहीं । करि दंड बिडंब प्रजा नितहीं ॥

जबसे ससुराल प्यारी लगने लगी, तबसे कुटुम्बी शत्रुरूप हो गये। राजा लोग पापपरायण हो गये, उनमें धर्म नहीं रहा। वे प्रजाको नित्य ही [बिना अपराध] दण्ड देकर उसकी विडम्बना (दुर्दशा) किया करते हैं ॥ ३ ॥

धनवंत कुलीन मलीन अपी । द्विज चिन्ह जनेउ उधार तपी ॥

नहिं मान पुरान न बेदहि जो । हरि सेवक संत सही कलि सो ॥

धनी लोग मलिन (नीच जातिके) होनेपर भी कुलीन माने जाते हैं। द्विजका चिन्ह जनेऊमात्र रह गया और नंगे बदन रहना तपस्वीका। जो वेदों और पुराणोंको नहीं मानते, कलियुगमें वे ही हरिभक्त और सच्चे संत कहलाते हैं ॥ ४ ॥

कबि बृंद उदार दुनी न सुनी । गुन दूषक ब्रात न कोपि गुनी ॥

कलि बारहिं बार दुकाल परै । बिनु अन्न दुखी सब लोग मरै ॥