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श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,617 पृष्ठ

१. प्रा० पा०—रूपिणा। २. प्रा० पा०—निरीक्ष्य धू०। ३. प्रा० पा०—क्ष्यो भ्रु०। ४. प्रा० पा०—पधारितैः।
१. प्रा० पा०—नृणां शुचं। २. प्रा० पा०—दिशि। ३. प्रा० पा०—प्रति।
१. प्रा० पा०—काल। २. प्रा० पा०—अतः। ३. प्रा० पा०—परमात्मानमेव च।

अथ तृतीयोऽध्यायः हिरण्यकशिपुकी तपस्या और वरप्राप्ति

नारद उवाच

हिरण्यकशिपू राजन्नजेयमजरामरम् । आत्मानमप्रतिद्वन्द्वमेकराजं व्यधित्सत ॥१

स तेपे मन्दरद्रोण्यां तपः परमदारुणम् । ऊर्ध्वबाहुर्नभोदृष्टिः पादाङ्गुष्ठाश्रितावनिः ॥२

जटादीधितिभी रेजे संवर्तार्क इवांशुभिः । तस्मिंस्तपस्तप्यमाने देवाः स्थानानि भेजिरे ॥३

नारदजीने कहा—युधिष्ठिर! अब हिरण्यकशिपुने यह विचार किया कि 'मैं अजेय, अजर, अमर और संसारका एकछत्र सम्राट् बन जाऊँ, जिससे कोई मेरे सामने खड़ातक न हो सके' ॥१॥ इसके लिये वह मन्दराचलकी एक घाटीमें जाकर अत्यन्त दारुण तपस्या करने लगा। वहाँ हाथ ऊपर उठाकर आकाशकी ओर देखता हुआ वह पैरके अँगूठेके बल पृथ्वीपर खड़ा हो गया ॥२॥ उसकी जटाएँ ऐसी चमक रही थीं, जैसे प्रलयकालके सूर्यकी किरणें। जब वह इस प्रकार तपस्यामें संलग्न हो गया, तब देवतालोग अपने-अपने स्थानों और पदोंपर पुनः प्रतिष्ठित हो गये ॥३॥

तस्य मूर्ध्नः समुद्भूतः सधूमोऽग्निस्तपोमयः । तिर्यगूर्ध्वमधोलोकानतपद्विष्वगीरितः ॥४

चुक्षुभुर्नद्युदन्वन्तः सद्वीपाद्रिश्चचाल भूः । निपेतुः सग्रहास्तारा जज्वल्युश्च दिशो दश ॥५

तेन तप्ता दिवं त्यक्त्वा ब्रह्मलोकं ययुः सुराः । धात्रे विज्ञापयामासुर्देवदेव जगत्पते ॥६

दैत्येन्द्रतपसा तप्ता दिवि स्थातुं न शक्नुमः ।

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तस्य चोपशमं भूमन् विधेहि यदि मन्यसे । लोका न यावन्नङ्क्ष्यन्ति बलिहारास्तवाभिभूः१ ॥७

तस्यायं किल सङ्कल्पश्चरतो दुश्चरं तपः । श्रूयतां किं न विदितस्तवाथापि निवेदितः ॥८

सृष्ट्वा चराचरमिदं तपयोगसमाधिना । अध्यास्ते सर्वधिष्ण्येभ्यः परमेष्ठी निजासनम् ॥९

तदहं वर्धमानेन तपयोगसमाधिना । कालात्मनोश्च नित्यत्वात्साधयिष्ये तथाऽऽत्मनः ॥१०

अन्यथेदं२ विधास्येऽहमयथापूर्वमोजसा । किमन्यैः कालनिर्धूतैः कल्पान्ते वैष्णवादिभिः ॥११

बहुत दिनोंतक तपस्या करनेके बाद उसकी तपस्याकी आग धूएँके साथ सिरसे निकलने लगी। वह चारों ओर फैल गयी और ऊपर-नीचे तथा अगल-बगलके लोकोंको जलाने लगी ।।४।। उसकी लपटसे नदी और समुद्र खौलने लगे। द्वीप और पर्वतोंके सहित पृथ्वी डगमगाने लगी। ग्रह और तारे टूट-टूटकर गिरने लगे तथा दसों दिशाओंमें मानो आग लग गयी ।।५।।

हिरण्यकशिपुकी उस तपोमयी आगकी लपटोंसे स्वर्गके देवता भी जलने लगे। वे घबराकर स्वर्गसे ब्रह्मलोकमें गये और ब्रह्माजीसे प्रार्थना करने लगे—‘हे देवताओंके भी आराध्यदेव जगत्पति ब्रह्माजी! हमलोग हिरण्यकशिपुके तपकी ज्वालासे जल रहे हैं। अब हम स्वर्गमें नहीं रह सकते। हे अनन्त! हे सर्वाध्यक्ष! यदि आप उचित समझें तो अपनी सेवा करनेवाली जनताका नाश होनेके पहले ही यह ज्वाला शान्त कर दीजिये ।।६-७।। भगवन्! आप सब कुछ जानते ही हैं, फिर भी हम अपनी ओरसे आपसे यह निवेदन कर देते हैं कि वह किस अभिप्रायसे यह घोर तपस्या कर रहा है। सुनिये, उसका विचार है कि ‘जैसे ब्रह्माजी अपनी तपस्या और योगके प्रभावसे इस चराचर जगत्की सृष्टि करके सब लोकोंसे ऊपर सत्यलोकमें विराजते हैं, वैसे ही मैं भी अपनी उग्र तपस्या और योगके प्रभावसे वही पद और स्थान प्राप्त कर लूँगा। क्योंकि समय असीम है और आत्मा नित्य है। एक जन्ममें नहीं, अनेक जन्म; एक युगमें न सही, अनेक युगोंमें ।।८-१०।। अपनी तपस्याकी शक्तिसे मैं पाप-पुण्यादिके नियमोंको पलटकर इस संसारमें ऐसा उलट-फेर कर दूँगा, जैसा पहले कभी नहीं था। वैष्णवादि पदोंमें तो रखा ही क्या है। क्योंकि कल्पके अन्तमें उन्हें भी कालके गालमें चला जाना पड़ता है’* ।।११।।

इति शुश्रुम निर्बन्धं तपः परममास्थितः ।

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विधत्स्वानन्तरं युक्तं स्वयं त्रिभुवनेश्वर ।।१२

तवासनं द्विजगवां पारमेष्ठ्यं जगत्पते । भवाय श्रेयसे भूत्यै क्षेमाय विजयाय च ।।१३

इति विज्ञापितो देवैर्भगवानात्मभूर्नृप । परीतो भृगुदक्षाद्यैर्ययौ दैत्येश्वराश्रमम् ।।१४

न ददर्श प्रतिच्छन्नं वल्मीकतृणकीचकैः । पिपीलिकाभिराचीर्णमेदस्त्वङ्मांसशोणितम् ।।१५।।

तपन्तं तपसा लोकान् यथाभ्रापिहितं रविम् । विलक्ष्य विस्मितः प्राह प्रहसन् हंसवाहनः ।।१६

ब्रह्मोवाच

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते तपःसिद्धोऽसि काश्यप । वरदोऽहमनुप्राप्तो व्रियतामीप्सितो वरः ।।१७

अद्राक्षमहमेतत्ते हृत्सारं महदद्भुतम् । दंशभक्षितदेहस्य प्राणा ह्यस्थिषु शेरते ।।१८

नैतत्पूर्वर्षयश्चक्रुर्न करिष्यन्ति चापरे । निरम्बुर्धारयेत्प्राणान् को वै दिव्यसमाः शतम् ।।१९

व्यवसायेन तेऽनेन दुष्करेण मनस्विनाम् । तपोनिष्ठेन भवता जितोऽहं दितिनन्दन ।।२०

ततस्त आशिषः सर्वा ददाम्यसुरपुङ्गव । मर्त्यस्य ते अमर्त्यस्य दर्शनं नाफलं मम ।।२१

नारद उवाच

इत्युक्त्वाऽऽदिभवो देवो भक्षिताङ्गं पिपीलिकैः । कमण्डलुजलेनौक्षद्दिव्येनामोघराधसा ।।२२

हमने सुना है कि ऐसा हठ करके ही वह घोर तपस्यामें जुटा हुआ है। आप तीनों लोकोंके स्वामी हैं। अब आप जो उचित समझें, वही करें ॥१२॥ ब्रह्माजी! आपका यह सर्वश्रेष्ठ परमेष्ठि-पद ब्राह्मण एवं गौओंकी वृद्धि, कल्याण, विभूति, कुशल और विजयके लिये है। (यदि यह हिरण्यकशिपुके हाथमें चला गया, तो सज्जनोंपर संकटोंका पहाड़ टूट पड़ेगा)' ॥१३॥ युधिष्ठिर! जब देवताओंने भगवान् ब्रह्माजीसे इस प्रकार निवेदन किया, तब वे भृगु और दक्ष आदि प्रजापतियोंके साथ हिरण्यकशिपुके आश्रमपर गये ॥१४॥ वहाँ जानेपर पहले तो वे उसे देख ही न सके; क्योंकि दीमककी मिट्टी, घास और बाँसोंसे उसका शरीर ढक गया था। चींटियाँ उसकी मेदा, त्वचा, मांस और खून चाट गयी थीं ॥१५॥ बादलोंसे ढके हुए सूर्यके समान वह अपनी तपस्याके तेजसे लोकोंको तपा रहा था। उसको देखकर ब्रह्माजी भी विस्मित हो गये। उन्होंने हँसते हुए कहा ॥१६॥

ब्रह्माजीने कहा—बेटा हिरण्यकशिपु! उठो, उठो। तुम्हारा कल्याण हो। कश्यपनन्दन! अब तुम्हारी तपस्या सिद्ध हो गयी। मैं तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ। तुम्हारी जो इच्छा हो, बेखटके माँग लो ॥१७॥ मैंने तुम्हारे हृदयका अद्भुत बल देखा। अरे, डाँसोंने तुम्हारी देह खा डाली है। फिर भी तुम्हारे प्राण हड्डियोंके सहारे टिके हुए हैं ॥१८॥

ऐसी कठिन तपस्या न तो पहले किसी ऋषिने की थी और न आगे ही कोई करेगा। भला ऐसा कौन है जो देवताओंके सौ वर्षतक बिना पानीके जीता रहे ॥१९॥ बेटा हिरण्यकशिपु! तुम्हारा यह काम बड़े-बड़े धीर पुरुष भी कठिनतासे कर सकते हैं। तुमने इस तपोनिष्ठासे मुझे अपने वशमें कर लिया है ॥२०॥ दैत्यशिरोमणे! इसीसे प्रसन्न होकर मैं तुम्हें जो कुछ माँगो, दिये देता हूँ। तुम हो मरनेवाले और मैं हूँ अमर! अतः तुम्हें मेरा यह दर्शन निष्फल नहीं हो सकता ॥२१॥

नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर! इतना कहकर ब्रह्माजीने उसके चींटियोंसे खाये हुए शरीरपर अपने कमण्डलुका दिव्य एवं अमोघ प्रभावशाली जल छिड़क दिया ॥२२॥

स तत्कीचकवल्मीकात् सहओजोबलान्वितः । सर्वावयवसम्पन्नो वज्रसंहननो युवा । उत्थितस्तप्तहेमाभो विभावसुरिवैधसः ॥२३

स निरीक्ष्याम्बरे देवं हंसवाहमवस्थितम् । ननाम शिरसा भूमौ तद्दर्शनमहोत्सवः ॥२४

उत्थाय प्राञ्जलिः प्रह्व ईक्षमाणो दृशा विभुम् । हर्षाश्रुपुलकोद्भेदो गिरा गद्गदयागृणात् ॥२५

हिरण्यकशिपुरुवाच

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कल्पान्ते कालसृष्टेन योऽन्धेन तमसाऽऽवृतम् । अभिव्यनग् जगदिदं स्वयंज्योतिः स्वरोचिषा ॥२६

आत्मना त्रिवृता चेदं सृजत्यवति लुम्पति । रजः सत्त्वतमोधाम्ने पराय महते नमः ॥२७

नम आद्याय बीजाय ज्ञानविज्ञानमूर्तये । प्राणेन्द्रियमनोबुद्धिविकारैर्व्यक्तिमीयुषे ॥२८

त्वमीशिषे जगतस्तस्थुषश्च प्राणेन मुख्येन पतिः प्रजानाम् । चित्तस्य चित्तेर्मनइन्द्रियाणां पतिर्महान् भूतगुणाशयेशः ॥२९

त्वं सप्ततन्तून् वितनोषि तन्वा त्रय्या चातुर्होत्रकविद्यया च । त्वमेक आत्माऽऽत्मवतामनादि- रनन्तपारः कविरन्तरात्मा ॥३०

जैसे लकड़ीके ढेरमेंसे आग जल उठे, वैसे ही वह जल छिड़कते ही बाँस और दीमकोंकी मिट्टीके बीचसे उठ खड़ा हुआ। उस समय उसका शरीर सब अवयवोंसे पूर्ण एवं बलवान् हो गया था, इन्द्रियोंमें शक्ति आ गयी थी और मन सचेत हो गया था। सारे अंग वज्रके समान कठोर एवं तपाये हुए सोनेकी तरह चमकीले हो गये थे। वह नवयुवक होकर उठ खड़ा हुआ ।।२३।। उसने देखा कि आकाशमें हंसपर चढ़े हुए ब्रह्माजी खड़े हैं। उन्हें देखकर उसे बड़ा आनन्द हुआ। अपना सिर पृथ्वीपर रखकर उसने उनको नमस्कार किया ।।२४।। फिर अंजलि बाँधकर नम्रभावसे खड़ा हुआ और बड़े प्रेमसे अपने निर्निमेष नयनोंसे उन्हें देखता हुआ गद्गद वाणीसे स्तुति करने लगा। उस समय उसके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू उमड़ रहे थे और सारा शरीर पुलकित हो रहा था ।।२५।।

हिरण्यकशिपुने कहा—कल्पके अन्तमें यह सारी सृष्टि कालके द्वारा प्रेरित तमोगुणसे, घने अन्धकारसे ढक गयी थी। उस समय स्वयंप्रकाशस्वरूप आपने अपने तेजसे पुनः इसे प्रकट किया ।।२६।। आप ही अपने त्रिगुणमय रूपसे इसकी रचना, रक्षा और संहार करते हैं। आप रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणके आश्रय हैं। आप ही सबसे परे और महान् हैं। आपको मैं नमस्कार करता हूँ ।।२७।। आप ही जगत्के मूल कारण हैं। ज्ञान और विज्ञान आपकी मूर्ति हैं। प्राण, इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि विकारोंके द्वारा आपने अपनेको प्रकट किया है ।।२८।। आप मुख्यप्राण सूत्रात्माके रूपसे चराचर जगत्को अपने नियन्त्रणमें रखते

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हैं। आप ही प्रजाके रक्षक भी हैं। भगवन्! चित्त, चेतना, मन और इन्द्रियोंके स्वामी आप ही हैं। पंचभूत, शब्दादि विषय और उनके संस्कारोंके रचयिता भी महत्तत्त्वके रूपमें आप ही हैं ।।२९।। जो वेद होता, अध्वर्यु, ब्रह्मा और उद्गाता—इन ऋत्विजोंसे होनेवाले यज्ञका प्रतिपादन करते हैं, वे आपके ही शरीर हैं। उन्हींके द्वारा अग्निष्टोम आदि सात यज्ञोंका आप विस्तार करते हैं। आप ही सम्पूर्ण प्राणियोंके आत्मा हैं। क्योंकि आप अनादि, अनन्त, अपार, सर्वज्ञ और अन्तर्यामी हैं ।।३०।।

त्वमेव कालोऽनिमिषो जनाना- मायुर्लवाद्यावयवैः क्षिणोषि । कूटस्थ आत्मा परमेष्ठ्यजो महां- स्त्वं जीवलोकस्य च जीव आत्मा ।।३१ त्वत्तः परं नापरमप्यनेज- देजच्च किञ्चिद् व्यतिरिक्तमस्ति । विद्याः कलास्ते तनवश्च सर्वा हिरण्यगर्भोऽसि बृहत्त्रिपृष्ठः ।।३२ व्यक्तं विभो स्थूलमिदं शरीरं येनेन्द्रियप्राणमनोगुणांस्त्वम् । भुङ्क्षे स्थितो धामनि पारमेष्ठ्ये अव्यक्त आत्मा पुरुषः पुराणः ।।३३ अनन्ताव्यक्तरूपेण येनेदमखिलं ततम् । चिदचिच्छक्तियुक्ताय तस्मै भगवते नमः ।।३४ यदि दास्यस्यभिमतान् वरान्मे वरदोत्तम । भूतेभ्यस्त्वद्विसृष्टेभ्यो मृत्युर्मा भून्मम प्रभो ।।३५ नान्तर्बहिर्दिवा नक्तमन्यस्मादपि चायुधैः । न भूमौ नाम्बरे मृत्युर्न नरैर्न मृगैरपि ।।३६ व्यसुभिर्वासुमद्भिर्वा सुरासुरमहोरगैः । अप्रतिद्वन्द्वतां युद्धे ऐकपत्यं च देहिनाम् ।।३७ सर्वेषां लोकपालानां महिमानं यथाऽऽत्मनः । तपोयोगप्रभावाणां यन्न रिष्यति कर्हिचित् ।।३८

आप ही काल हैं। आप प्रतिक्षण सावधान रहकर अपने क्षण, लव आदि विभागोंके द्वारा लोगोंकी आयु क्षीण करते रहते हैं। फिर भी आप निर्विकार हैं। क्योंकि आप ज्ञानस्वरूप, परमेश्वर, अजन्मा, महान् और सम्पूर्ण जीवोंके जीवनदाता अन्तरात्मा हैं ।।३१।।

प्रभो! कार्य, कारण, चल और अचल ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जो आपसे भिन्न हो। समस्त विद्या और कलाएँ आपके शरीर हैं। आप त्रिगुणमयी मायासे अतीत स्वयं ब्रह्म हैं। यह स्वर्णमय ब्रह्माण्ड आपके गर्भमें स्थित है। आप इसे अपनेमेंसे ही प्रकट करते हैं ।।३२।। प्रभो! यह व्यक्त ब्रह्माण्ड आपका स्थूल शरीर है। इससे आप इन्द्रिय, प्राण और मनके विषयोंका उपभोग करते हैं। किन्तु उस समय भी आप अपने परम ऐश्वर्यमय स्वरूपमें ही स्थित रहते हैं। वस्तुतः आप पुराणपुरुष, स्थूल-सूक्ष्मसे परे ब्रह्मस्वरूप ही हैं ।।३३।। आप अपने अनन्त और अव्यक्त स्वरूपसे सारे जगत्में व्याप्त हैं। चेतन और अचेतन दोनों ही आपकी शक्तियाँ हैं। भगवन्! मैं आपको नमस्कार करता हूँ ।।३४।। प्रभो! आप समस्त वरदाताओंमें श्रेष्ठ हैं। यदि आप मुझे अभीष्ट वर देना चाहते हैं, तो ऐसा वर दीजिये कि आपके बनाये हुए किसी भी प्राणीसे—चाहे वह मनुष्य हो या पशु, प्राणी हो या अप्राणी, देवता हो या दैत्य अथवा नागादि किसीसे भी मेरी मृत्यु न हो। भीतर-बाहर, दिनमें, रात्रिमें, आपके बनाये प्राणियोंके अतिरिक्त और भी किसी जीवसे, अस्त्र-शस्त्रसे, पृथ्वी या आकाशमें—कहीं भी मेरी मृत्यु न हो। युद्धमें कोई मेरा सामना न कर सके। मैं समस्त प्राणियोंका एकच्छत्र सम्राट् होऊँ ।।३५-३७।। इन्द्रादि समस्त लोकपालोंमें जैसी आपकी महिमा है, वैसी ही मेरी भी हो। तपस्वियों और योगियोंको जो अक्षय ऐश्वर्य प्राप्त है, वही मुझे भी दीजिये ।।३८।। इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे हिरण्यकशिपोर्वरयाचनं नाम तृतीयोऽध्यायः ।।३।।


१. प्रा० पा०—स्तथा विभो। २. प्रा० पा०—अन्यथैव । *यद्यपि वैष्णवपद (वैकुण्ठादि नित्यधाम) अविनाशी हैं, परन्तु हिरण्यकशिपु अपनी आसुरी बुद्धिके कारण उनको कल्पके अन्तमें नष्ट होनेवाला ही मानता था। तामसी बुद्धिमें सब बातें विपरीत ही दीखा करती हैं।

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अथ चतुर्थोऽध्यायः

हिरण्यकशिपुके अत्याचार और प्रह्लादके गुणोंका वर्णन

नारद उवाच

एवं वृतः शतधृतिर्हिरण्यकशिपोरथ ।
प्रादात्तत्तपसा प्रीतो वरांस्तस्य सुदुर्लभान् ॥१

ब्रह्मोवाच

तातेमे दुर्लभाः पुंसां यान् वृणीषे वरान् मम ।
तथापि वितराम्यङ्ग वरान् यदपि दुर्लभान् ॥२

ततो जगाम भगवानमोघानुग्रहो विभुः ।
पूजितोऽसुरवर्येण स्तूयमानः प्रजेश्वरैः ॥३

एवं लब्धवरो दैत्यो बिभ्रद्धेममयं वपुः ।
भगवत्यकरोद् द्वेषं भ्रातुर्वधमनुस्मरन् ॥४

स विजित्य दिशः सर्वा लोकांश्च त्रीन् महासुरः ।
देवासुरमनुष्येन्द्रान् गन्धर्वगरुडोरगान् ॥५

सिद्धचारणविद्याध्रानृषीन् पितृपतीन् मनून् ।
यक्षरक्षःपिशाचेशान् प्रेतभूतपतीनथ ॥६

सर्वसत्त्वपतीञ्जित्वा वशमानीय विश्वजित् ।
जहार लोकपालानां स्थानानि सह तेजसा ॥७

देवोद्यानश्रिया जुष्टमध्यास्ते स्म त्रिविष्टपम् ।
महेन्द्रभवनं साक्षान्निर्मितं विश्वकर्मणा ।
त्रैलोक्यलक्ष्म्यायतन्मध्युवासाखिलर्द्धिमत् ॥८

यत्र विद्रुमसोपाना महामारकता भुवः ।

यत्र स्फाटिककुड्यानि वैदूर्यस्तम्भपङ्क्तयः ॥९

यत्र चित्रवितानानि पद्मरागासनानि च । पयःफेननिभाः शय्या मुक्तादामपरिच्छदाः ॥१०

नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर! जब हिरण्यकशिपुने ब्रह्माजीसे इस प्रकारके अत्यन्त दुर्लभ वर माँगे, तब उन्होंने उसकी तपस्यासे प्रसन्न होनेके कारण उसे वे वर दे दिये ॥१॥ ब्रह्माजीने कहा—बेटा! तुम जो वर मुझसे माँग रहे हो, वे जीवोंके लिये बहुत ही दुर्लभ हैं; परन्तु दुर्लभ होनेपर भी मैं तुम्हें वे सब वर दिये देता हूँ ॥२॥ [नारदजी कहते हैं—] ब्रह्माजीके वरदान कभी झूठे नहीं होते। वे समर्थ एवं भगवद्रूप ही हैं। वरदान मिल जानेके बाद हिरण्यकशिपुने उनकी पूजा की। तत्पश्चात् प्रजापतियोंसे अपनी स्तुति सुनते हुए वे अपने लोकको चले गये ॥३॥ ब्रह्माजीसे वर प्राप्त करनेपर हिरण्यकशिपुका शरीर सुवर्णके समान कान्तिमान् एवं हृष्ट-पुष्ट हो गया। वह अपने भाईकी मृत्युका स्मरण करके भगवान्‌से द्वेष करने लगा ॥४॥ उस महादैत्यने समस्त दिशाओं, तीनों लोकों तथा देवता, असुर, नरपति, गन्धर्व, गरुड़, सर्प, सिद्ध, चारण, विद्याधर, ऋषि, पितरोंके अधिपति, मनु, यक्ष, राक्षस, पिशाचराज, प्रेत, भूतपति एवं समस्त प्राणियोंके राजाओंको जीतकर अपने वशमें कर लिया। यहाँतक कि उस विश्व-विजयी दैत्यने लोकपालोंकी शक्ति और स्थान भी छीन लिये ॥५-७॥ अब वह नन्दनवन आदि दिव्य उद्यानोंके सौन्दर्यसे युक्त स्वर्गमें ही रहने लगा था। स्वयं विश्वकर्माका बनाया हुआ इन्द्रका भवन ही उसका निवासस्थान था। उस भवनमें तीनों लोकोंका सौन्दर्य मूर्तिमान् होकर निवास करता था। वह सब प्रकारकी सम्पत्तियोंसे सम्पन्न था ॥८॥ उस महलमें मूँगेकी सीढ़ियाँ, पन्नेकी गचें, स्फटिकमणिकी दीवारें, वैदूर्यमणिके खंभे और माणिककी कुर्सियाँ थीं। रंग-बिरंगे चँदोवे तथा दूधके फेनके समान शय्याएँ, जिनपर मोतियोंकी झालरें लगी हुई थीं, शोभायमान हो रही थीं ॥९-१०॥

कूजद्भिर्नूपुरैर्देव्यः शब्दयन्त्य इतस्ततः । रत्नस्थलीषु पश्यन्ति सुदतीः सुन्दरं मुखम् ॥११

तस्मिन्महेन्द्रभवने महाबलो१ महामना निर्जितलोक एकराट् । रेमेऽभिवन्द्याङ्‌घ्रियुगः सुरादिभिः प्रतापितैरूर्जितचण्डशासनः ॥१२

तमङ्ग मत्तं मधुनोरुगन्धिना विवृत्तताम्राक्षमशेषधिष्ण्यपाः । उपासतोपायनपाणिभिर्विना

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त्रिभिस्तपोयोगबलौजसां पदम् ।।१३

जगुर्महेन्द्रासनमोजसा स्थितं विश्वावसुस्तुम्बुरुरस्मदादयः२ । गन्धर्वसिद्धा ऋषयोऽस्तुवन्मुहु- र्विद्याधरा अप्सरसश्च पाण्डव ।।१४

स एव वर्णाश्रमिभिः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । इज्यमानो हविर्भागानग्रहीत् स्वेन तेजसा ।।१५

अकृष्टपच्या तस्यासीत् सप्तद्वीपवती मही । तथा कामदुघा द्यौस्तु नानाश्र्चर्यपदं नभः ।।१६

रत्नाकराश्च रत्नौघांस्तत्पत्न्यश्चोहूरूर्मिभिः । क्षारसीधुघृतक्षौद्रदधिक्षीरामृतोदकाः ।।१७

शैला द्रोणीभिराक्रीडं सर्वर्तुषु गुणान् द्रुमाः । दधार लोकपालानामेक एव पृथग्गुणान् ।।१८

सर्वांगसुन्दरी अप्सराएँ अपने नूपुरोंसे रुन-झुन ध्वनि करती हुई रत्नमय भूमिपर इधर-उधर टहला करती थीं और कहीं-कहीं उसमें अपना सुन्दर मुख देखने लगती थीं ।।११।। उस महेन्द्रके महलमें महाबली और महामनस्वी हिरण्यकशिपु सब लोकोंको जीतकर, सबका एकच्छत्र सम्राट् बनकर बड़ी स्वतन्त्रतासे विहार करने लगा। उसका शासन इतना कठोर था कि उससे भयभीत होकर देव-दानव उसके चरणोंकी वन्दना करते रहते थे ।।१२।। युधिष्ठिर! वह उत्कट गन्धवाली मदिरा पीकर मतवाला रहा करता था। उसकी आँखें लाल-लाल और चढ़ी हुई रहतीं। उस समय तपस्या, योग, शारीरिक और मानसिक बलका वह भंडार था। ब्रह्मा, विष्णु और महादेवके सिवा और सभी देवता अपने हाथोंमें भेंट ले-लेकर उसकी सेवामें लगे रहते ।।१३।। जब वह अपने पुरुषार्थसे इन्द्रासनपर बैठ गया, तब युधिष्ठिर! विश्वावसु, तुम्बुरु तथा हम सभी लोग उसके सामने गान करते थे। गन्धर्व, सिद्ध, ऋषिगण, विद्याधर और अप्सराएँ बार-बार उसकी स्तुति करती थीं ।।१४।।

युधिष्ठिर! वह इतना तेजस्वी था कि वर्णाश्रमधर्मका पालन करनेवाले पुरुष जो बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले यज्ञ करते, उनके यज्ञोंकी आहुति वह स्वयं छीन लेता ।।१५।। पृथ्वीके सातों द्वीपोंमें उसका अखण्ड राज्य था। सभी जगह बिना ही जोते-बोये धरतीसे अन्न पैदा होता था। वह जो कुछ चाहता, अन्तरिक्षसे उसे मिल जाता तथा आकाश उसे भाँति-भाँतिकी आश्चर्यजनक वस्तुएँ दिखा-दिखाकर उसका मनोरंजन करता था ।।१६।। इसी प्रकार खारे

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पानी, सुरा, घृत, इक्षुरस, दधि, दुग्ध और मीठे पानीके समुद्र भी अपनी पत्नी नदियोंके साथ तरंगोंके द्वारा उसके पास रत्नराशि पहुँचाया करते थे ।।१७।। पर्वत अपनी घाटियोंके रूपमें उसके लिये खेलनेका स्थान जुटाते और वृक्ष सब ऋतुओंमें फूलते-फलते। वह अकेला ही सब लोकपालोंके विभिन्न गुणोंको धारण करता ।।१८।।

स इत्थं निर्जितककुबेकराड् विषयान् प्रियान् । यथोपजोषं भुञ्जानो नातृप्यदजितेन्द्रियः ।।१९

एवमैश्वर्यमत्तस्य दृप्तस्योच्छास्त्रवर्तिनः । कालो महान् व्यतीयाय ब्रह्मशापमुपेयुषः ।।२०

तस्योग्रदण्डसंविग्नाः सर्वे लोकाः सपालकाः । अन्यत्रालब्धशरणाः शरणं ययुरच्युतम् ।।२१

तस्यै नमोऽस्तु काष्ठायै यत्रात्मा हरिरीश्वरः । यद्गत्वा न निवर्तन्ते शान्ताः संन्यासिनोऽमलाः ।।२२

इति ते संयतात्मानः समाहितधियोऽमलाः । उपतस्थुर्हृषीकेशं विनिद्रा वायुभोजनाः ।।२३

तेषामाविरभूद्वाणी अरूपा मेघनिःस्वना । सन्नादयन्ती ककुभः साधूनामभयङ्करी ।।२४

मा भैष्ट विबुधश्रेष्ठाः सर्वेषां भद्रमस्तु वः । मद्दर्शनं हि भूतानां सर्वश्रेयोपपत्तये ।।२५

ज्ञातमेतस्य दौरात्म्यं दैतेयापसदस्य च । तस्य शान्तिं करिष्यामि कालं तावत्प्रतीक्षत ।।२६

यदा देवेषु वेदेषु गोषु विप्रेषु साधुषु । धर्मे मयि च विद्वेषः स वा आशु विनश्यति ।।२७

निर्वैराय प्रशान्ताय स्वसुताय महात्मने । प्रह्लादाय यदा द्रुह्येद्धनिष्येऽपि वरोर्जितम् ।।२८

इस प्रकार दिग्विजयी और एकच्छत्र सम्राट् होकर वह अपनेको प्रिय लगनेवाले ebook converter DEMO Watermarks*

विषयोंका स्वच्छन्द उपभोग करने लगा। परन्तु इतने विषयोंसे भी उसकी तृप्ति न हो सकी। क्योंकि अन्ततः वह इन्द्रियोंका दास ही तो था ॥१९॥

युधिष्ठिर! इस रूपमें भी वह भगवान्‌का वही पार्षद है, जिसे सनकादिकोंने शाप दिया था। वह ऐश्वर्यके मदसे मतवाला हो रहा था तथा घमंडमें चूर होकर शास्त्रोंकी मर्यादाका उल्लंघन कर रहा था। देखते-ही-देखते उसके जीवनका बहुत-सा समय बीत गया ॥२०॥ उसके कठोर शासनसे सब लोक और लोकपाल घबरा गये। जब उन्हें और कहीं किसीका आश्रय न मिला, तब उन्होंने भगवान्‌की शरण ली ॥२१॥ (उन्होंने मन-ही-मन कहा—) ‘जहाँ सर्वात्मा जगदीश्वर श्रीहरि निवास करते हैं और जिसे प्राप्त करके शान्त एवं निर्मल संन्यासी महात्मा फिर लौटते नहीं, भगवान्‌के उस परम धामको हम नमस्कार करते हैं’ ॥२२॥ इस भावसे अपनी इन्द्रियोंका संयम और मनको समाहित करके उन लोगोंने खाना-पीना और सोना छोड़ दिया तथा निर्मल हृदयसे भगवान्‌की आराधना की ॥२३॥ एक दिन उन्हें मेघके समान गम्भीर आकाशवाणी सुनायी पड़ी। उसकी ध्वनिसे दिशाएँ गूँज उठीं। साधुओंको अभय देनेवाली वह वाणी यों थी— ॥२४॥ ‘श्रेष्ठ देवताओ! डरो मत। तुम सब लोगोंका कल्याण हो। मेरे दर्शनसे प्राणियोंको परम कल्याणकी प्राप्ति हो जाती है ॥२५॥ इस नीच दैत्यकी दुष्टताका मुझे पहलेसे ही पता है। मैं इसको मिटा दूँगा। अभी कुछ दिनोंतक समयकी प्रतीक्षा करो ॥२६॥

कोई भी प्राणी जब देवता, वेद, गाय, ब्राह्मण, साधु, धर्म और मुझसे द्वेष करने लगता है, तब शीघ्र ही उसका विनाश हो जाता है ॥२७॥ जब यह अपने वैरहीन, शान्त और महात्मा पुत्र प्रह्लादसे द्रोह करेगा—उसका अनिष्ट करना चाहेगा, तब वरके कारण शक्तिसम्पन्न होनेपर भी इसे मैं अवश्य मार डालूँगा।’ ॥२८॥

नारद उवाच

इत्युक्ता लोकगुरुणा तं प्रणम्य दिवौकसः । न्यवर्तन्त गतोद्वेगा मेनिरे चासुरं हतम् ॥२९

तस्य दैत्यपतेः पुत्राश्चत्वारः परमाद्भुताः । प्रह्लादोऽभून्महांस्तेषां गुणैर्महदुपासकः ॥३०

ब्रह्मण्यः शीलसम्पन्नः सत्यसन्धो जितेन्द्रियः । आत्मवत्सर्वभूतानामेकः प्रियसुहृत्तमः ॥३१

दासवत्संनतार्याङ्घ्रिः पितृवद्दीनवत्सलः । भ्रातृवत्सदृशे स्निग्धो गुरुष्वीश्वरभावनः । विद्यार्थरूपजन्माढ्यो मानस्तम्भविवर्जितः ॥३२

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नोद्विग्नचित्तो व्यसनेषु निःस्पृहः श्रुतेषु दृष्टेषु गुणेष्ववस्तुदृक्। दान्तेन्द्रियप्राणशरीरधीः सदा प्रशान्तकामो रहितासुरोऽसुरः ।।३३

यस्मिन्महद्गुणा राजन् गृह्यन्ते कविभिर्मुहुः। न तेऽधुनापिधीयन्ते यथा भगवतीश्वरे ।।३४

यं साधुगाथासदसि रिपवोऽपि सुरा नृप। प्रतिमानं प्रकुर्वन्ति किमुतान्ये भवादृशाः ।।३५

नारदजी कहते हैं—सबके हृदयमें ज्ञानका संचार करनेवाले भगवान्‌ने जब देवताओंको यह आदेश दिया, तब वे उन्हें प्रणाम करके लौट आये। उनका सारा उद्वेग मिट गया और उन्हें ऐसा मालूम होने लगा कि हिरण्यकशिपु मर गया ।।२९।। युधिष्ठिर! दैत्यराज हिरण्यकशिपुके बड़े ही विलक्षण चार पुत्र थे। उनमें प्रह्लाद यों तो सबसे छोटे थे, परन्तु गुणोंमें सबसे बड़े थे। वे बड़े संतसेवी थे ।।३०।। ब्राह्मणभक्त, सौम्यस्वभाव, सत्यप्रतिज्ञ एवं जितेन्द्रिय थे तथा समस्त प्राणियोंके साथ अपने ही समान समताका बर्ताव करते और सबके एकमात्र प्रिय और सच्चे हितैषी थे ।।३१।। बड़े लोगोंके चरणोंमें सेवककी तरह झुककर रहते थे। गरीबोंपर पिताके समान स्नेह रखते थे। बराबरीवालोंसे भाईके समान प्रेम करते और गुरुजनोंमें भगवद्भाव रखते थे। विद्या, धन, सौन्दर्य और कुलीनतासे सम्पन्न होनेपर भी घमंड और हेकड़ी उन्हें छू तक नहीं गयी थी ।।३२।। बड़े-बड़े दुःखोंमें भी वे तनिक भी घबराते न थे। लोक-परलोकके विषयोंको उन्होंने देखा-सुना तो बहुत था, परन्तु वे उन्हें निःसार और असत्य समझते थे। इसलिये उनके मनमें किसी भी वस्तुकी लालसा न थी। इन्द्रिय, प्राण, शरीर और मन उनके वशमें थे। उनके चित्तमें कभी किसी प्रकारकी कामना नहीं उठती थी। जन्मसे असुर होनेपर भी उनमें आसुरी सम्पत्तिका लेश भी नहीं था ।।३३।। जैसे भगवान्‌के गुण अनन्त हैं, वैसे ही प्रह्लादके श्रेष्ठ गुणोंकी भी कोई सीमा नहीं है। महात्मालोग सदासे उनका वर्णन करते और उन्हें अपनाते आये हैं। तथापि वे आज भी ज्यों-के-त्यों बने हुए हैं ।।३४।। युधिष्ठिर! यों तो देवता उनके शत्रु हैं; परन्तु फिर भी भक्तोंका चरित्र सुननेके लिये जब उन लोगोंकी सभा होती है, तब वे दूसरे भक्तोंको प्रह्लादके समान कहकर उनका सम्मान करते हैं। फिर आप-जैसे अजातशत्रु भगवद्भक्त उनका आदर करेंगे, इसमें तो सन्देह ही क्या है ।।३५।। गुणैरलमसंख्येयैर्माहात्म्यं तस्य सूच्यते। वासुदेवे भगवति यस्य नैसर्गिकी रतिः ।।३६

न्यस्तक्रीडनको बालो जडवत्तन्मनस्तया।

कृष्णग्रहगृहीतात्मा न वेद जगदीदृशम् ॥३७

आसीनः पर्यटन्नश्नन् शयानः प्रपिबन् ब्रुवन् । नानुसन्धत्त एतानि गोविन्दपरिरम्भितः ॥३८

क्वचिद्रुदति वैकुण्ठचिन्ताशबलचेतनः । क्वचिद्धसति तच्चिन्ताह्लाद उद्गायति क्वचित् ॥३९

नदति क्वचिदुत्कण्ठो विलज्जो नृत्यति क्वचित् । क्वचित्तद्भावनायुक्तस्तन्मयोऽनुचकार ह ॥४०

क्वचिदुत्पुलकस्तूष्णीमास्ते संस्पर्शनिर्वृतः । अस्पन्दप्रणयानन्दसलिलामीलितेक्षणः ॥४१

स उत्तमश्लोकपदारविन्दयो- र्निषेवयाकिञ्चनसङ्गलब्धया । तन्वन् परां निर्वृतिमत्मनो मुहु- र्दुःसङ्गदीनान्यमनःशमं व्यधात् ॥४२

उनकी महिमाका वर्णन करनेके लिये अगणित गुणोंके कहने-सुननेकी आवश्यकता नहीं। केवल एक ही गुण—भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें स्वाभाविक, जन्मजात प्रेम उनकी महिमाको प्रकट करनेके लिये पर्याप्त है ॥३६॥

युधिष्ठिर! प्रह्लाद बचपनमें ही खेल-कूद छोड़कर भगवान्‌के ध्यानमें जडवत् तन्मय हो जाया करते। भगवान् श्रीकृष्णके अनुग्रहरूप ग्रहने उनके हृदयको इस प्रकार खींच लिया था कि उन्हें जगत्‌की कुछ सुध-बुध ही न रहती ॥३७॥ उन्हें ऐसा जान पड़ता कि भगवान् मुझे अपनी गोदमें लेकर आलिंगन कर रहे हैं। इसलिये उन्हें सोते-बैठते, खाते-पीते, चलते-फिरते और बातचीत करते समय भी इन बातोंका ध्यान बिलकुल न रहता ॥३८॥ कभी-कभी भगवान् मुझे छोड़कर चले गये, इस भावनामें उनका हृदय इतना डूब जाता कि वे जोर-जोरसे रोने लगते। कभी मन-ही-मन उन्हें अपने सामने पाकर आनन्दोद्रेकसे ठठाकर हँसने लगते। कभी उनके ध्यानके मधुर आनन्दका अनुभव करके जोरसे गाने लगते ॥३९॥ वे कभी उत्सुक हो बेसुरा चिल्ला पड़ते। कभी-कभी लोक-लज्जाका त्याग करके प्रेममें छककर नाचने भी लगते थे। कभी-कभी उनकी लीलाके चिन्तनमें इतने तल्लीन हो जाते कि उन्हें अपनी याद ही न रहती, उन्हींका अनुकरण करने लगते ॥४०॥ कभी भीतर-ही-भीतर भगवान्‌का कोमल संस्पर्श अनुभव करके आनन्दमें मग्न हो जाते और चुपचाप शान्त होकर बैठ रहते। उस समय उनका रोम-रोम पुलकित हो उठता। अधखुले नेत्र अविचल प्रेम और

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आनन्दके आँसुओंसे भरे रहते ॥४१॥ भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी यह भक्ति अकिंचन भगवत्प्रेमी महात्माओंके संगसे ही प्राप्त होती है। इसके द्वारा वे स्वयं तो परमानन्दमें मग्न रहते ही थे; जिन बेचारोंका मन कुसंगके कारण अत्यन्त दीन-हीन हो रहा था, उन्हें भी बार-बार शान्ति प्रदान करते थे ॥४२॥ युधिष्ठिर! प्रह्लाद भगवान्के परम प्रेमी भक्त, परम भाग्यवान् और ऊँची कोटिके महात्मा थे। हिरण्यकशिपु ऐसे साधु पुत्रको भी अपराधी बतलाकर उनका अनिष्ट करनेकी चेष्टा करने लगा ॥४३॥

तस्मिन्महाभागवते महाभागे महात्मनि ।
हिरण्यकशिपू राजन्नकरोदघमात्मजे ॥४३

युधिष्ठिर उवाच

देवर्ष एतदिच्छामो वेदितुं तव सुव्रत ।
यदात्मजाय शुद्धाय पितादात् साधवे ह्यघम् ॥४४

पुत्रान् विप्रतिकूलान् स्वान् पितरः पुत्रवत्सलाः ।
उपालभन्ते शिक्षार्थं नैवाघमपरो यथा ॥४५

किमुतानुवशान् साधूंस्तादृशान् गुरुदेवतान् ।
एतत् कौतूहलं ब्रह्मन्नस्माकं विधम प्रभो ।
पितुः पुत्राय यद् द्वेषो मरणाय प्रयोजितः ॥४६

युधिष्ठिरने पूछा—नारदजी! आपका व्रत अखण्ड है। अब हम आपसे यह जानना चाहते हैं कि हिरण्यकशिपुने पिता होकर भी ऐसे शुद्धहृदय महात्मा पुत्रसे द्रोह क्यों किया ॥४४॥ पिता तो स्वभावसे ही अपने पुत्रोंसे प्रेम करते हैं। यदि पुत्र कोई उलटा काम करता है, तो वे उसे शिक्षा देनेके लिये ही डाँटते हैं, शत्रुंकी तरह वैर-विरोध तो नहीं करते ॥४५॥

फिर प्रह्लादजी-जैसे अनुकूल, शुद्धहृदय एवं गुरुजनोंमें भगवद्भाव करनेवाले पुत्रोंसे भला, कोई द्वेष कर ही कैसे सकता है। नारदजी! आप सब कुछ जानते हैं। हमें यह जानकर बड़ा कौतूहल हो रहा है कि पिताने द्वेषके कारण पुत्रको मार डालना चाहा। आप कृपा करके मेरा यह कुतूहल शान्त कीजिये ॥४६॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे प्रह्लादचरिते
चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥


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१. प्रा० पा०—महासुरो महाबलो नि०। २. प्रा० पा०—रुनारदादयः।

अथ पञ्चमोऽध्यायः हिरण्यकशिपुके द्वारा प्रह्लादजीके वधका प्रयत्न

नारद उवाच

पौरोहित्याय भगवान् वृतः काव्यः किलासुरैः । षण्डामर्कौ सुतौ तस्य दैत्यराजगृहान्तिके ॥१

तौ राज्ञा प्रापितं बालं प्रह्लादं नयकोविदम् । पाठयामासतुः पाठ्यानन्यांश्चासुरबालकान् ।।२

यत्तत्र गुरुणा प्रोक्तं शुश्रुवेऽनु पपाठ च । न साधु मनसा मेने स्वपरासद्ग्रहाश्रयम् ।।३

नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर! दैत्यों ने भगवान् श्रीशुक्राचार्यजीको अपना पुरोहित बनाया था। उनके दो पुत्र थे—षण्ड और अमर्क। वे दोनों राजमहलके पास ही रहकर हिरण्यकशिपुके द्वारा भेजे हुए नीतिनिपुण बालक प्रह्लादको और दूसरे पढ़ानेयोग्य दैत्य-बालकोंको राजनीति, अर्थनीति आदि पढ़ाया करते थे ।।१-२।।

प्रह्लाद गुरुजीका पढ़ाया हुआ पाठ सुन लेते थे और उसे ज्यों-का-त्यों उन्हें सुना भी दिया करते थे। किन्तु वे उसे मनसे अच्छा नहीं समझते थे। क्योंकि उस पाठका मूल आधार था अपने और परायेका झूठा आग्रह ।।३।।

एकदासुरराट् पुत्रमङ्कमारोप्य पाण्डव । पप्रच्छ कथ्यतां वत्स मन्यते साधु यद्भवान् ।।४

प्रह्लाद उवाच

तत्साधु मन्येऽसुरवर्य देहिनां सदा समुद्विग्नधियामसद्ग्रहात् । हित्वाऽऽत्मपातं गृहमन्धकूपं वनं गतो यद्धरिमाश्रयेत ।।५

नारद उवाच

श्रुत्वा पुत्रगिरो दैत्यः परपक्षसमाहिताः । जहास बुद्धिर्बालानां भिद्यते परबुद्धिभिः ॥६

सम्यग्विधार्यतां बालो गुरुगेहे द्विजातिभिः । विष्णुपक्षैः प्रतिच्छन्नैर्न भिद्येतास्य धीर्यथा ॥७

गृह्मानीतमाहूय प्रह्लादं दैत्ययाजकाः । प्रशस्य श्लक्ष्णया वाचा समपृच्छन्त सामभिः ॥८

वत्स प्रह्लाद भद्रं ते सत्यं कथय मा मृषा । बालानति कुतस्तुभ्यमेष बुद्धिविपर्ययः ॥९

बुद्धिभेदः परकृत उताहो ते स्वतोऽभवत् । भण्यतां श्रोतुकामानां गुरूणां कुलनन्दन ॥१०

प्रह्लाद उवाच

स्वः परश्चेत्यसद्ग्राहः पुंसां यन्मायया कृतः । विमोहितधियां दृष्टस्तस्मै भगवते नमः ॥११

स यदानुव्रतः पुंसां पशुबुद्धिर्विभिद्यते । अन्य एष तथान्योऽहमिति भेदगतासती ॥१२

युधिष्ठिर! एक दिन हिरण्यकशिपुने अपने पुत्र प्रह्लादको बड़े प्रेमसे गोदमें लेकर पूछा—'बेटा! बताओ तो सही, तुम्हें कौन-सी बात अच्छी लगती है?' ॥४॥ प्रह्लादजीने कहा—पिताजी! संसारके प्राणी 'मैं' और 'मेरे' के झूठे आग्रहमें पड़कर सदा ही अत्यन्त उद्विग्न रहते हैं। ऐसे प्राणियोंके लिये मैं यही ठीक समझता हूँ कि वे अपने अधःपतनके मूल कारण, घाससे ढके हुए अँधेरे कुएँके समान इस घरको छोड़कर वनमें चले जायँ और भगवान् श्रीहरिकी शरण ग्रहण करें ॥५॥ नारदजी कहते हैं—प्रह्लादजीके मुँहसे शत्रुपक्षकी प्रशंसासे भरी बात सुनकर हिरण्यकशिपु ठठाकर हँस पड़ा। उसने कहा—'दूसरोंके बहकानेसे बच्चोंकी बुद्धि यों ही बिगड़ जाया करती है ॥६॥ जान पड़ता है गुरुजीके घरपर विष्णुके पक्षपाती कुछ ब्राह्मण वेष बदलकर रहते हैं। बालककी भलीभाँति देख-रेख की जाय, जिससे अब इसकी बुद्धि बहकने न पाये ॥७॥ जब दैत्योंने प्रह्लादको गुरुजीके घर पहुँचा दिया, तब पुरोहितोंने उनको बहुत ebook converter DEMO Watermarks*

पुचकारकर और फुसलाकर बड़ी मधुर वाणीसे पूछा ।।८।। बेटा प्रह्लाद! तुम्हारा कल्याण हो। ठीक-ठीक बतलाना। देखो, झूठ न बोलना। यह तुम्हारी बुद्धि उलटी कैसे हो गयी? और किसी बालककी बुद्धि तो ऐसी नहीं हुई ।।९।। कुलनन्दन प्रह्लाद! बताओ तो बेटा! हम तुम्हारे गुरुजन यह जानना चाहते हैं कि तुम्हारी बुद्धि स्वयं ऐसी हो गयी या किसीने सचमुच तुमको बहका दिया है? ।।१०।।

प्रह्लादजीने कहा—जिन मनुष्योंकी बुद्धि मोहसे ग्रस्त हो रही है, उन्हींको भगवान्‌की मायासे यह झूठा दुराग्रह होता देखा गया है कि यह ‘अपना’ है और यह ‘पराया’। उन मायापति भगवान्‌को मैं नमस्कार करता हूँ ।।११।। वे भगवान् ही जब कृपा करते हैं, तब मनुष्योंकी पाशविक बुद्धि नष्ट होती है। इस पशुबुद्धिके कारण ही तो ‘यह मैं हूँ और यह मुझसे भिन्न है’ इस प्रकारका झूठा भेदभाव पैदा होता है ।।१२।।

स एष आत्मा स्वपरेत्यबुद्धिभि-   दुरत्ययानुक्रमणे निरूप्यते । मुह्यन्ति यद्वर्त्मनि वेदवादिनो   ब्रह्मादयो ह्येष भिनत्ति मे मतिम् ।।१३

यथा भ्राम्यत्ययो ब्रह्मन् स्वयमाकर्षसन्निधौ । तथा मे भिद्यते चेतश्चक्रपाणेर्यदृच्छया ।।१४

<p align="center"><b>नारद उवाच</b></p>

एतावद्ब्राह्मणायोक्त्वा विरराम महामतिः । तं निर्भर्त्स्यार्थ१ कुपितः स दीनो राजसेवकः ।।१५

आनीयतामरे वेत्रमस्माकमयशस्करः । कुलाङ्गारस्य दुर्बुद्धेश्चतुर्थोऽस्योदितो दमः ।।१६

दैतेयचन्दनवने जातोऽयं कण्टकद्रुमः । यन्मूलोन्मूलपरशोर्विष्णोर्नालायितोऽर्भकः२ ।।१७

इति तं विविधोपायैर्भीषयंस्तर्जनादिभिः । प्रह्लादं ग्राहयामास त्रिवर्गस्योपपादनम् ।।१८

तत एनं गुरुर्ज्ञात्वा ज्ञातज्ञेयचतुष्टयम् । दैत्येन्द्रं दर्शयामास मातृमृष्टमलङ्कृतम् ।।१९

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