श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
आजीव्यांश्चिच्छिदुर्वृक्षान् केचित्परशुपाणयः । प्रादहन् शरणान्यन्ये प्रजानां ज्वलितोल्मुकैः ॥१५
एवं विप्रकृते लोके दैत्येन्द्रानुचरैर्मुहुः । दिवं देवाः परित्यज्य भुवि चेरुरलक्षिताः ॥१६
हिरण्यकशिपुर्भ्रातुः सम्परेतस्य दुःखितः । कृत्वा कटोदकादीनि भ्रातृपुत्रानसान्त्वयत् ॥१७
शकुनिं शम्बरं धृष्टं भूतसन्तापनं वृकम् । कालनाभं महानाभं हरिश्मश्रुमथोत्कचम् ॥१८
तन्मातरं रुषाभानुं दितिं च जननीं गिरा । श्लक्ष्णया देशकालज्ञ इदमाह जनेश्वर ॥१९
इसलिये तुमलोग इसी समय पृथ्वीपर जाओ। आजकल वहाँ ब्राह्मण और क्षत्रियोंकी बहुत बढ़ती हो गयी है। वहाँ जो लोग तपस्या, यज्ञ, स्वाध्याय, व्रत और दानादि शुभ कर्म कर रहे हों, उन सबको मार डालो ।।१०।। विष्णुकी जड़ है द्विजातियोंका धर्म-कर्म; क्योंकि यज्ञ और धर्म ही उसके स्वरूप हैं। देवता, ऋषि, पितर, समस्त प्राणी और धर्मका वही परम आश्रय है ।।११।। जहाँ-जहाँ ब्राह्मण, गाय, वेद, वर्णाश्रम और धर्म-कर्म हों, उन-उन देशोंमें तुमलोग जाओ, उन्हें जला दो, उजाड़ डालो' ।।१२।।
दैत्य तो स्वभावसे ही लोगोंको सताकर सुखी होते हैं। दैत्यराज हिरण्यकशिपुकी आज्ञा उन्होंने बड़े आदरसे सिर झुकाकर स्वीकार की और उसीके अनुसार जनताका नाश करने लगे ।।१३।। उन्होंने नगर, गाँव, गौओंके रहनेके स्थान, बगीचे, खेत, टहलनेके स्थान, ऋषियोंके आश्रम, रत्न आदिकी खानें, किसानोंकी बस्तियाँ, तराईके गाँव, अहीरोंकी बस्तियाँ और व्यापारके केन्द्र बड़े-बड़े नगर जला डाले ।।१४।।
कुछ दैत्योंने खोदनेके शस्त्रोंसे बड़े-बड़े पुल, परकोटे और नगरके फाटकोंको तोड़-फोड़ डाला तथा दूसरोंने कुल्हाड़ियोंसे फले-फूले, हरे-भरे पेड़ काट डाले। कुछ दैत्योंने जलती हुई लकड़ियोंसे लोगोंके घर जला दिये ।।१५।। इस प्रकार दैत्योंने निरीह प्रजाका बड़ा उत्पीड़न किया। उस समय देवतालोग स्वर्ग छोड़कर छिपे रूपसे पृथ्वीमें विचरण करते थे ।।१६।।
युधिष्ठिर! भाईकी मृत्युसे हिरण्यकशिपुको बड़ा दुःख हुआ था। जब उसने उसकी अन्त्येष्टि क्रियासे छुट्टी पा ली, तब शकुनि, शम्बर, धृष्ट, भूतसन्तापन, वृक, कालनाभ, महानाभ, हरिश्मश्रु और उत्कच अपने इन भतीजोंको सान्त्वना दी ।।१७-१८।।
उनकी माता रुषाभानुको और अपनी माता दितिको देश-कालके अनुसार मधुर वाणीसे समझाते हुए कहा ।।१९।।
हिरण्यकशिपुरुवाच
अम्बाम्ब हे वधूः पुत्रा वीरं मार्हथ शोचितुम् । रिपोरभिमुखे श्लाघ्यः शूराणां वध ईप्सितः ॥२०
भूतानामिह संवासः प्रपायामिव सुव्रते । दैवेनैकत्र नीतानामुन्नीतानां स्वकर्मभिः ॥२१
नित्य आत्माव्ययः शुद्धः सर्वगः सर्ववित्परः । धत्तेऽसावात्मनो लिङ्गं मायया विसृजन्गुणान् ॥२२
यथाम्भसा प्रचलता तरवोऽपि चला इव । चक्षुषा भ्राम्यमाणेन दृश्यते चलतीव भूः ॥२३
एवं गुणैर्भ्राम्यमाणे मनस्यविकलः पुमान् । याति तत्साम्यतां भद्रे ह्यलिङ्गो लिङ्गवानिव ॥२४
एष आत्मविपर्यासो ह्यलिङ्गे लिङ्गभावना । एष प्रियाप्रियैर्योगो वियोगः कर्मसंसृतिः ॥२५
सम्भवश्च विनाशश्च शोकश्च विविधः स्मृतः । अविवेकश्च चिन्ता च विवेकास्मृतिरेव च ॥२६
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । यमस्य प्रेतबन्धूनां संवादं तं निबोधता ॥२७
उशीनेरेष्वभूद्राजा सुयज्ञ इति विश्रुतः । सपत्नैर्निहतो युद्धे ज्ञातयस्तमुपासत ॥२८
हिरण्यकशिपुने कहा—मेरी प्यारी माँ, बहू और पुत्रो! तुम्हें वीर हिरण्याक्षके लिये किसी प्रकारका शोक नहीं करना चाहिये। वीर पुरुष तो ऐसा चाहते ही हैं कि लड़ाईके मैदानमें अपने शत्रुके सामने उसके दाँत खट्टे करके प्राण त्याग करें; वीरोंके लिये ऐसी ही मृत्यु श्लाघनीय होती है ॥२०॥ देवि! जैसे प्याऊपर बहुत-से लोग इकट्ठे हो जाते हैं, परन्तु उनका मिलना-जुलना थोड़ी देरके लिये ही होता है—वैसे ही अपने कर्मोंके फेरसे दैववश जीव भी मिलते और बिछुड़ते हैं ॥२१॥ वास्तवमें आत्मा नित्य, अविनाशी, शुद्ध, सर्वगत, सर्वज्ञ और
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देह-इन्द्रिय आदिसे पृथक् है। वह अपनी अविद्यासे ही देह आदिकी सृष्टि करके भोगोंके साधन सूक्ष्मशरीरको स्वीकार करता है ॥२२॥ जैसे हिलते हुए पानीके साथ उसमें प्रतिबिम्बित होनेवाले वृक्ष भी हिलते-से जान पड़ते हैं और घुमायी जाती हुई आँखके साथ सारी पृथ्वी ही घूमती-सी दिखायी देती है, कल्याणी! वैसे ही विषयोंके कारण मन भटकने लगता है और वास्तवमें निर्विकार होनेपर भी उसीके समान आत्मा भी भटकता हुआ-सा जान पड़ता है। उसका स्थूल और सूक्ष्म- शरीरोंसे कोई भी सम्बन्ध नहीं है, फिर भी वह सम्बन्धी-सा जान पड़ता है ॥२३-२४॥ सब प्रकारसे शरीररहित आत्माको शरीर समझ लेना—यही तो अज्ञान है। इसीसे प्रिय अथवा अप्रिय वस्तुओंका मिलना और बिछुड़ना होता है। इसीसे कर्मोंके साथ सम्बन्ध हो जानेके कारण संसारमें भटकना पड़ता है ॥२५॥ जन्म, मृत्यु, अनेकों प्रकारके शोक, अविवेक, चिन्ता और विवेककी विस्मृति—सबका कारण यह अज्ञान ही है ॥२६॥ इस विषयमें महात्मालोग एक प्राचीन इतिहास कहा करते हैं। वह इतिहास मरे हुए मनुष्यके सम्बन्धियोंके साथ यमराजकी बातचीत है। तुमलोग ध्यानसे उसे सुनो ॥२७॥
उशीनर देशमें एक बड़ा यशस्वी राजा था। उसका नाम था सुयज्ञ। लड़ाईमें शत्रुओंने उसे मार डाला। उस समय उसके भाई-बन्धु उसे घेरकर बैठ गये ॥२८॥
विशीर्णरत्नकवचं विभ्रष्टाभरणस्रजम् । शरनिर्भिन्नहृदयं शयानमसृगाविलम् ॥२९
प्रकीर्णकेशं ध्वस्ताक्षं रभसा दष्टदच्छदम् । रजः कुण्ठमुखाम्भोजं छिन्नायुधभुजं मृधे ॥३०
उशीनरेन्द्रं विधिना तथा कृतं पतिं महिष्यः प्रसमीक्ष्य दुःखिताः । हताः स्म नाथेति करैरुरो भृशं घ्नन्त्यो मुहुस्तत्पदयोरुपापतन् ॥३१
रुदत्य उच्चैर्दयिताङ्घ्रिपङ्कजं सिञ्चन्त्य अस्रैः कुचकुङ्कुमारुणैः । विस्रस्तकेशाभरणाः शुचं१ नृणां सृजन्त्य आक्रन्दनया विलेपिरे ॥३२
अहो विधात्राकरुणेन नः प्रभो भवान् प्रणीतो दृग्गोचरां दशाम् । उशीनराणामसि वृत्तिदः पुरा
कृतोऽधुना येन शुचां विवर्धनः ॥३३
त्वया कृतज्ञेन वयं महीपते कथं विना स्याम सुहृत्तमेन ते। तत्रानुयानं तव वीर पादयोः शुश्रूषतीनां दिश² यत्र यास्यसि ॥३४
एवं विलपतीनां वै परिगृह्य³ मृतं पतिम्। अनिच्छतीनां निर्हारमर्कोऽस्तं संन्यवर्तत ॥३५
तत्र ह प्रेतबन्धूनामाश्श्रुत्य परिदेवितम्। आह तान् बालको भूत्वा यमः स्वयमुपागतः ॥३६
उसका जड़ाऊ कवच छिन्न-भिन्न हो गया था। गहने और मालाएँ तहस-नहस हो गयी थीं। बाणोंकी मारसे कलेजा फट गया था। शरीर खूनसे लथपथ था। बाल बिखर गये थे। आँखें धँस गयी थीं। क्रोधके मारे दाँतोंसे उसके होठ दबे हुए थे। कमलके समान मुख धूलसे ढक गया था। युद्धमें उसके शस्त्र और बाँहें कट गयी थीं ॥२९-३०॥
रानियोंको दैववश अपने पतिदेव उशीनर नरेशकी यह दशा देखकर बड़ा दुःख हुआ। वे ‘हा नाथ! हम अभागिनें तो बेमौत मारी गयीं।’ यों कहकर बार-बार जोरसे छाती पीटती हुई अपने स्वामीके चरणोंके पास गिर पड़ीं ॥३१॥ वे जोर-जोरसे इतना रोने लगीं कि उनके कुच-कुंकुमसे मिलकर बहते हुए लाल-लाल आँसुओंने प्रियतमके पादपद्म पखार दिये। उनके केश और गहने इधर-उधर बिखर गये। वे करुण-क्रन्दनके साथ विलाप कर रही थीं, जिसे सुनकर मनुष्योंके हृदयमें शोकका संचार हो जाता था ॥३२॥
‘हाय! विधाता बड़ा क्रूर है। स्वामिन्! उसीने आज आपको हमारी आँखोंसे ओझल कर दिया। पहले तो आप समस्त देशवासियोंके जीवनदाता थे। आज उसीने आपको ऐसा बना दिया कि आप हमारा शोक बढ़ा रहे हैं ॥३३॥ पतिदेव! आप हमसे बड़ा प्रेम करते थे, हमारी थोड़ी-सी सेवाको भी बड़ी करके मानते थे। हाय! अब आपके बिना हम कैसे रह सकेंगी। हम आपके चरणोंकी चेरी हैं। वीरवर! आप जहाँ जा रहे हैं, वहीं चलनेकी हमें भी आज्ञा दीजिये’ ॥३४॥
वे अपने पतिकी लाश पकड़कर इसी प्रकार विलाप करती रहीं। उस मुर्देको वहाँसे दाहके लिये जाने देनेकी उनकी इच्छा नहीं होती थी। इतनेमें ही सूर्यास्त हो गया ॥३५॥ उस समय उशीनरराजाके सम्बन्धियोंने जो विलाप किया था, उसे सुनकर वहाँ स्वयं यमराज बालकके वेषमें आये और उन्होंने उन लोगोंसे कहा— ॥३६॥
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यम उवाच
अहो अमीषां वयसाधिकानां विपश्यतां लोकविधिं विमोहः । यत्रागतस्तत्र गतं मनुष्यं स्वयं सधर्मा अपि शोचन्त्यपार्थम् ।।३७
अहो वयं धन्यतमा यदत्र त्यक्ताः पितृभ्यां न विचिन्तयामः । अभक्ष्यमाणा अबला वृकादिभिः स रक्षिता रक्षति यो हि गर्भे ।।३८
य इच्छयेशः सृजतीदमव्ययो य एव रक्षत्यवलुम्पते च यः । तस्याबलाः क्रीडनमाहुरीशितु- श्चराचरं निग्रहसङ्ग्रहे प्रभुः ।।३९
पथि च्युतं तिष्ठति दिष्टरक्षितं गृहे स्थितं तद्विहतं विनश्यति । जीवत्यनाथोऽपि तदीक्षितो वने गृहेऽपि गुप्तोऽस्य हतो न जीवति ।।४०
भूतानि तैस्तैर्निजयोनिकर्मभि- र्भवन्ति काले न भवन्ति सर्वशः । न तत्र ह्यात्मा प्रकृतावपि स्थित- स्तस्या गुणैरन्यतमो निबध्यते ।।४१
इदं शरीरं पुरुषस्य मोहजं यथा पृथग्भौतिकमीयते गृहम् । यथौदकैः पार्थिवतैजसैर्जनः कालेन जातो विकृतो विनश्यति ।।४२
यमराज बोले—बड़े आश्चर्यकी बात है! ये लोग तो मुझसे सयाने हैं। बराबर लोगोंका मरना-जीना देखते हैं, फिर भी इतने मूढ़ हो रहे हैं। अरे! यह मनुष्य जहाँसे आया था, वहीं चला गया। इन लोगोंको भी एक-न-एक दिन वहीं जाना है। फिर झूठमूठ ये लोग इतना शोक
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क्यों करते हैं? ।।३७।। हम तो तुमसे लाखगुने अच्छे हैं, परम धन्य हैं; क्योंकि हमारे माँ-बापने हमें छोड़ दिया है। हमारे शरीरमें पर्याप्त बल भी नहीं है, फिर भी हमें कोई चिन्ता नहीं है। भेड़िये आदि हिंसक जन्तु हमारा बाल भी बाँका नहीं कर पाते। जिसने गर्भमें रक्षा की थी, वही इस जीवनमें भी हमारी रक्षा करता रहता है ।।३८।। देवियो! जो अविनाशी ईश्वर अपनी मौजसे इस जगत्को बनाता है, रखता है और बिगाड़ देता है—उस प्रभुका यह एक खिलौनामात्र है। वह इस चराचर जगत्को दण्ड या पुरस्कार देनेमें समर्थ है ।।३९।। भाग्य अनुकूल हो तो रास्तेमें गिरी हुई वस्तु भी ज्यों-की-त्यों पड़ी रहती है। परन्तु भाग्यके प्रतिकूल होनेपर घरके भीतर तिजोरीमें रखी हुई वस्तु भी खो जाती है। जीव बिना किसी सहारेके दैवकी दयादृष्टिसे जंगलमें भी बहुत दिनोंतक जीवित रहता है, परंतु दैवके विपरीत होनेपर घरमें सुरक्षित रहनेपर भी मर जाता है ।।४०।।
रानियो! सभी प्राणियोंकी मृत्यु अपने पूर्वजन्मोंकी कर्मवासनाके अनुसार समयपर होती है और उसीके अनुसार उनका जन्म भी होता है। परन्तु आत्मा शरीरसे अत्यन्त भिन्न है, इसलिये वह उसमें रहनेपर भी उसके जन्म-मृत्यु आदि धर्मोंसे अछूता ही रहता है ।।४१।। जैसे मनुष्य अपने मकानको अपनेसे अलग और मिट्टीका समझता है, वैसे ही यह शरीर भी अलग और मिट्टीका है। मोहवश वह इसे अपना समझ बैठता है। जैसे बुलबुले आदि पानीके विकार, घड़े आदि मिट्टीके विकार और गहने आदि स्वर्णके विकार समयपर बनते हैं, रूपान्तरित होते हैं तथा नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही इन्हीं तीनोंके विकारसे बना हुआ यह शरीर भी समयपर बान-बिगड़ जाता है ।।४२।।
यथानलो दारुषु भिन्न ईयते यथानिलो देहगतः पृथक् स्थितः । यथा नभः सर्वगतं न सज्जते तथा पुमान् सर्वगुणाश्रयः परः ।।४३
सुयज्ञो नन्वयं शेते मूढा यमनुशोचथ । यः श्रोता योऽनुवक्तेह स न दृश्येत कर्हिचित् ।।४४
न श्रोता नानुवक्तायं मुख्योऽप्यत्र महानसुः । यस्त्विहेन्द्रियवानात्मा स चान्यः प्राणदेहयोः ।।४५
भूतेन्द्रियमनोलिङ्गान् देहानुच्चावचान् विभुः । भजत्युत्सृजति ह्यन्यस्तच्चापि स्वेन तेजसा ।।४६
यावल्लिङ्गान्वितो ह्यात्मा तावत् कर्म निबन्धनम् । ततो विपर्ययः क्लेशो मायायोगोऽनुवर्तते ।।४७
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वितथाभिनिवेशोऽयं यद् गुणेष्वर्थदृग्वचः । यथा मनोरथः स्वप्नः सर्वमैन्द्रियकं मृषा ॥४८
जैसे काठमें रहनेवाली व्यापक अग्नि स्पष्ट ही उससे अलग है, जैसे देहमें रहनेपर भी वायुका उससे कोई सम्बन्ध नहीं है, जैसे आकाश सब जगह एक-सा रहनेपर भी किसीके दोष-गुणसे लिप्त नहीं होता—वैसे ही समस्त देहेन्द्रियोंमें रहनेवाला और उनका आश्रय आत्मा भी उनसे अलग और निर्लिप्त है ॥४३॥
मूर्खों! जिसके लिये तुम सब शोक कर रहे हो, वह सुयज्ञ नामका शरीर तो तुम्हारे सामने पड़ा है। तुमलोग इसीको देखते थे। इसमें जो सुननेवाला और बोलनेवाला था, वह तो कभी किसीको नहीं दिखायी पड़ता था। फिर आज भी नहीं दिखायी दे रहा है, तो शोक क्यों? ॥४४॥ (तुम्हारी यह मान्यता कि 'प्राण ही बोलने या सुननेवाला था, सो निकल गया' मूर्खतापूर्ण है; क्योंकि सुषुप्तिके समय प्राण तो रहता है, पर न वह बोलता है न सुनता है।) शरीरमें सब इन्द्रियोंकी चेष्टाका हेतुभूत जो महाप्राण है, वह प्रधान होनेपर भी बोलने या सुननेवाला नहीं है; क्योंकि वह जड़ है। देह और इन्द्रियोंके द्वारा सब पदार्थोंका द्रष्टा जो आत्मा है, वह शरीर और प्राण दोनोंसे पृथक् है ॥४५॥ यद्यपि वह परिच्छिन्न नहीं है, व्यापक है—फिर भी पंचभूत, इन्द्रिय और मनसे युक्त नीचे-ऊँचे (देव, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि) शरीरोंको ग्रहण करता और अपने विवेकबलसे मुक्त भी हो जाता है। वास्तवमें वह इन सबसे अलग है ॥४६॥ जबतक वह पाँच प्राण, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, बुद्धि और मन—इन सत्रह तत्त्वोंसे बने हुए लिंगशरीरसे युक्त रहता है, तभीतक कर्मोंसे बँधा रहता है और इस बन्धनके कारण ही मायासे होनेवाले मोह और क्लेश बराबर उसके पीछे पड़े रहते हैं ॥४७॥ प्रकृतिके गुणों और उनसे बनी हुई वस्तुओंको सत्य समझना अथवा कहना झूठमूठका दुराग्रह है। मनोरथके समयकी कल्पित और स्वप्नके समयकी दीख पड़नेवाली वस्तुओंके समान इन्द्रियोंके द्वारा जो कुछ ग्रहण किया जाता है, सब मिथ्या है ॥४८॥
अथ नित्यमनित्यं वा नेह शोचन्ति तद्विदः । नान्यथा शक्यते कर्तुं स्वभावः शोचतामिति ॥४९
लुब्धको विपिने कश्चित्पक्षिणां निर्मितोऽन्तकः । वितत्य जालं विदधे तत्र तत्र प्रलोभयन् ॥५०
कुलिङ्गमिथुनं तत्र विचरत्समदृश्यत । तयोः कुलिङ्गी सहसा लुब्धकेन प्रलोभिता ॥५१
सासज्जत शिकस्तन्त्यां महिषी कालयन्त्रिता । कुलिङ्गस्तां तथाऽऽपन्नां निरीक्ष्य भृशदुःखितः । स्नेहादकल्पः कृपणः कृपणां पर्यदेवयत् ॥५२
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अहो अकरुणो देवः स्त्रियाऽऽकरुणया विभुः । कृपणं मानुशोचन्त्या दीनया किं करिष्यति ।।५३
कामं नयतु मां देवः किमर्धेनात्मनो हि मे । दीनेन जीवता दुःखमनेन विधुरायुषा ।।५४
कथं त्वजातपक्षांस्तान् मातृहीनान् बिभर्म्यहम् । मन्दभाग्याः प्रतीक्षन्ते नीडे मे मातरं प्रजाः ।।५५
एवं कुलिङ्गं विलपन्तमार्रात् प्रियावियोगातुरमश्रुकण्ठम् । स एव तं शाकुनिकः शरेण विव्याध कालप्रहितो विलीनः ।।५६
एवं यूयमपश्यन्त्य आत्मापायमबुद्धयः । नैनं प्राप्स्यथ शोचन्त्यः पतिं वर्षशतैरपि ।।५७
इसलिये शरीर और आत्माका तत्त्व जाननेवाले पुरुष न तो अनित्य शरीरके लिये शोक करते हैं और न नित्य आत्माके लिये ही। परन्तु ज्ञानकी दृढ़ता न होनेके कारण जो लोग शोक करते रहते हैं, उनका स्वभाव बदलना बहुत कठिन है ।।४९।।
किसी जंगलमें एक बहेलिया रहता था। वह बहेलिया क्या था, विधाताने मानो उसे पक्षियोंके कालरूपमें ही रच रखा था। जहाँ-कहीं भी वह जाल फैला देता और ललचाकर चिड़ियोंको फँसा लेता ।।५०।। एक दिन उसने कुलिंग पक्षीके एक जोड़ेको चारा चुगते देखा। उनमेंसे उस बहेलियेने मादा पक्षीको तो शीघ्र ही फँसा लिया ।।५१।। कालवश वह जालके फंदोंमें फँस गयी। नर पक्षीको अपनी मादाकी विपत्तिको देखकर बड़ा दुःख हुआ। वह बेचारा उसे छुड़ा तो सकता न था, स्नेहसे उस बेचारीके लिये विलाप करने लगा ।।५२।। उसने कहा—‘यों तो विधाता सब कुछ कर सकता है। परन्तु है वह बड़ा निर्दयी। यह मेरी सहचरी एक तो स्त्री है, दूसरे मुझ अभागेके लिये शोक करती हुई बड़ी दीनतासे छटपटा रही है। इसे लेकर वह करेगा क्या ।।५३।। उसकी मौज हो तो मुझे ले जाय। इसके बिना मैं अपना यह अधूरा विधुर जीवन, जो दीनता और दुःखसे भरा हुआ है, लेकर क्या करूँगा ।।५४।। अभी मेरे अभागे बच्चोंके पर भी नहीं जमे हैं। स्त्रीके मर जानेपर उन मातृहीन बच्चोंको मैं कैसे पालूूँगा? ओह! घोंसलेमें वे अपनी माँकी बाट देख रहे होंगे’ ।।५५।। इस तरह वह पक्षी बहुत-सा विलाप करने लगा। अपनी सहचरीके वियोगसे वह आतुर हो रहा था। आँसुओंके मारे उसके गला रुँध गया था। तबतक कालकी प्रेरणासे पास ही छिपे हुए उसी बहेलियेने ऐसा बाण मारा कि वह भी वहींपर लोट गया ।।५६।। मूर्ख रानियो! तुम्हारी भी यही दशा
होनेवाली है। तुम्हें अपनी मृत्यु तो दीखती नहीं और इसके लिये रो-पीट रही हो! यदि तुमलोग सौ बरसतक इसी तरह शोकवश छाती पीटती रहो, तो भी अब तुम इसे नहीं पा सकोगी ।।५७।।
हिरण्यकशिपुरुवाच
बाल$^१$ एवं प्रवदति सर्वे विस्मितचेतसः ।
ज्ञातयो मेनिरे सर्वमनित्यमयथोत्थितम् ।।५८
यम एतदुपाख्याय तत्रैवान्तरधीयत ।
ज्ञातयोऽपि सुयज्ञस्य चक्रुर्यत्साम्परायिकम् ।।५९
ततः$^२$ शोचत मा यूयं परं$^३$ चात्मानमेव च ।
क आत्मा कः परो वात्र स्वीयः पारक्य एव वा ।
स्वपराभिनिवेशेन विनाज्ञानेन देहिनाम् ।।६०
नारद उवाच
इति दैत्यपतेर्वाक्यं दितिराकर्ण्य सस्नुषा ।
पुत्रशोकं क्षणात्त्यक्त्वा तत्त्वे चित्तमधारयत् ।।६१
हिरण्यकशिपुने कहा—उस छोटेसे बालककी ऐसी ज्ञानपूर्ण बातें सुनकर सब-के-सब दंग रह गये। उशीनर-नरेशके भाई-बन्धु और स्त्रियोंने यह बात समझ ली कि समस्त संसार और इसके सुख-दुःख अनित्य एवं मिथ्या हैं ।।५८।। यमराज यह उपाख्यान सुनाकर वहीं अन्तर्धान हो गये। भाई-बन्धुओंने भी सुयज्ञकी अन्त्येष्टि-क्रिया की ।।५९।। इसलिये तुमलोग भी अपने लिये या किसी दूसरेके लिये शोक मत करो। इस संसारमें कौन अपना है और कौन अपनेसे भिन्न? क्या अपना है और क्या पराया? प्राणियोंको अज्ञानके कारण ही यह अपने-परायेका दुराग्रह हो रहा है, इस भेद-बुद्धिका और कोई कारण नहीं है ।।६०।।
नारदजीने कहा—युधिष्ठिर! अपनी पुत्रवधूके साथ दितिने हिरण्यकशिपुकी यह बात सुनकर उसी क्षण पुत्रशोकका त्याग कर दिया और अपना चित्त परमतत्त्वस्वरूप परमात्मामें लगा दिया ।।६१।।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे दितिशोकापनयनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ।।२।।
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१. प्रा० पा०—रूपिणा। २. प्रा० पा०—निरीक्ष्य धू०। ३. प्रा० पा०—क्ष्यो भ्रु०। ४. प्रा० पा०—पधारितैः।
१. प्रा० पा०—नृणां शुचं। २. प्रा० पा०—दिशि। ३. प्रा० पा०—प्रति।
१. प्रा० पा०—काल। २. प्रा० पा०—अतः। ३. प्रा० पा०—परमात्मानमेव च।
अथ तृतीयोऽध्यायः हिरण्यकशिपुकी तपस्या और वरप्राप्ति
नारद उवाच
हिरण्यकशिपू राजन्नजेयमजरामरम् । आत्मानमप्रतिद्वन्द्वमेकराजं व्यधित्सत ॥१
स तेपे मन्दरद्रोण्यां तपः परमदारुणम् । ऊर्ध्वबाहुर्नभोदृष्टिः पादाङ्गुष्ठाश्रितावनिः ॥२
जटादीधितिभी रेजे संवर्तार्क इवांशुभिः । तस्मिंस्तपस्तप्यमाने देवाः स्थानानि भेजिरे ॥३
नारदजीने कहा—युधिष्ठिर! अब हिरण्यकशिपुने यह विचार किया कि 'मैं अजेय, अजर, अमर और संसारका एकछत्र सम्राट् बन जाऊँ, जिससे कोई मेरे सामने खड़ातक न हो सके' ॥१॥ इसके लिये वह मन्दराचलकी एक घाटीमें जाकर अत्यन्त दारुण तपस्या करने लगा। वहाँ हाथ ऊपर उठाकर आकाशकी ओर देखता हुआ वह पैरके अँगूठेके बल पृथ्वीपर खड़ा हो गया ॥२॥ उसकी जटाएँ ऐसी चमक रही थीं, जैसे प्रलयकालके सूर्यकी किरणें। जब वह इस प्रकार तपस्यामें संलग्न हो गया, तब देवतालोग अपने-अपने स्थानों और पदोंपर पुनः प्रतिष्ठित हो गये ॥३॥
तस्य मूर्ध्नः समुद्भूतः सधूमोऽग्निस्तपोमयः । तिर्यगूर्ध्वमधोलोकानतपद्विष्वगीरितः ॥४
चुक्षुभुर्नद्युदन्वन्तः सद्वीपाद्रिश्चचाल भूः । निपेतुः सग्रहास्तारा जज्वल्युश्च दिशो दश ॥५
तेन तप्ता दिवं त्यक्त्वा ब्रह्मलोकं ययुः सुराः । धात्रे विज्ञापयामासुर्देवदेव जगत्पते ॥६
दैत्येन्द्रतपसा तप्ता दिवि स्थातुं न शक्नुमः ।
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तस्य चोपशमं भूमन् विधेहि यदि मन्यसे । लोका न यावन्नङ्क्ष्यन्ति बलिहारास्तवाभिभूः१ ॥७
तस्यायं किल सङ्कल्पश्चरतो दुश्चरं तपः । श्रूयतां किं न विदितस्तवाथापि निवेदितः ॥८
सृष्ट्वा चराचरमिदं तपयोगसमाधिना । अध्यास्ते सर्वधिष्ण्येभ्यः परमेष्ठी निजासनम् ॥९
तदहं वर्धमानेन तपयोगसमाधिना । कालात्मनोश्च नित्यत्वात्साधयिष्ये तथाऽऽत्मनः ॥१०
अन्यथेदं२ विधास्येऽहमयथापूर्वमोजसा । किमन्यैः कालनिर्धूतैः कल्पान्ते वैष्णवादिभिः ॥११
बहुत दिनोंतक तपस्या करनेके बाद उसकी तपस्याकी आग धूएँके साथ सिरसे निकलने लगी। वह चारों ओर फैल गयी और ऊपर-नीचे तथा अगल-बगलके लोकोंको जलाने लगी ।।४।। उसकी लपटसे नदी और समुद्र खौलने लगे। द्वीप और पर्वतोंके सहित पृथ्वी डगमगाने लगी। ग्रह और तारे टूट-टूटकर गिरने लगे तथा दसों दिशाओंमें मानो आग लग गयी ।।५।।
हिरण्यकशिपुकी उस तपोमयी आगकी लपटोंसे स्वर्गके देवता भी जलने लगे। वे घबराकर स्वर्गसे ब्रह्मलोकमें गये और ब्रह्माजीसे प्रार्थना करने लगे—‘हे देवताओंके भी आराध्यदेव जगत्पति ब्रह्माजी! हमलोग हिरण्यकशिपुके तपकी ज्वालासे जल रहे हैं। अब हम स्वर्गमें नहीं रह सकते। हे अनन्त! हे सर्वाध्यक्ष! यदि आप उचित समझें तो अपनी सेवा करनेवाली जनताका नाश होनेके पहले ही यह ज्वाला शान्त कर दीजिये ।।६-७।। भगवन्! आप सब कुछ जानते ही हैं, फिर भी हम अपनी ओरसे आपसे यह निवेदन कर देते हैं कि वह किस अभिप्रायसे यह घोर तपस्या कर रहा है। सुनिये, उसका विचार है कि ‘जैसे ब्रह्माजी अपनी तपस्या और योगके प्रभावसे इस चराचर जगत्की सृष्टि करके सब लोकोंसे ऊपर सत्यलोकमें विराजते हैं, वैसे ही मैं भी अपनी उग्र तपस्या और योगके प्रभावसे वही पद और स्थान प्राप्त कर लूँगा। क्योंकि समय असीम है और आत्मा नित्य है। एक जन्ममें नहीं, अनेक जन्म; एक युगमें न सही, अनेक युगोंमें ।।८-१०।। अपनी तपस्याकी शक्तिसे मैं पाप-पुण्यादिके नियमोंको पलटकर इस संसारमें ऐसा उलट-फेर कर दूँगा, जैसा पहले कभी नहीं था। वैष्णवादि पदोंमें तो रखा ही क्या है। क्योंकि कल्पके अन्तमें उन्हें भी कालके गालमें चला जाना पड़ता है’* ।।११।।
इति शुश्रुम निर्बन्धं तपः परममास्थितः ।
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विधत्स्वानन्तरं युक्तं स्वयं त्रिभुवनेश्वर ।।१२
तवासनं द्विजगवां पारमेष्ठ्यं जगत्पते । भवाय श्रेयसे भूत्यै क्षेमाय विजयाय च ।।१३
इति विज्ञापितो देवैर्भगवानात्मभूर्नृप । परीतो भृगुदक्षाद्यैर्ययौ दैत्येश्वराश्रमम् ।।१४
न ददर्श प्रतिच्छन्नं वल्मीकतृणकीचकैः । पिपीलिकाभिराचीर्णमेदस्त्वङ्मांसशोणितम् ।।१५।।
तपन्तं तपसा लोकान् यथाभ्रापिहितं रविम् । विलक्ष्य विस्मितः प्राह प्रहसन् हंसवाहनः ।।१६
ब्रह्मोवाच
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते तपःसिद्धोऽसि काश्यप । वरदोऽहमनुप्राप्तो व्रियतामीप्सितो वरः ।।१७
अद्राक्षमहमेतत्ते हृत्सारं महदद्भुतम् । दंशभक्षितदेहस्य प्राणा ह्यस्थिषु शेरते ।।१८
नैतत्पूर्वर्षयश्चक्रुर्न करिष्यन्ति चापरे । निरम्बुर्धारयेत्प्राणान् को वै दिव्यसमाः शतम् ।।१९
व्यवसायेन तेऽनेन दुष्करेण मनस्विनाम् । तपोनिष्ठेन भवता जितोऽहं दितिनन्दन ।।२०
ततस्त आशिषः सर्वा ददाम्यसुरपुङ्गव । मर्त्यस्य ते अमर्त्यस्य दर्शनं नाफलं मम ।।२१
नारद उवाच
इत्युक्त्वाऽऽदिभवो देवो भक्षिताङ्गं पिपीलिकैः । कमण्डलुजलेनौक्षद्दिव्येनामोघराधसा ।।२२
हमने सुना है कि ऐसा हठ करके ही वह घोर तपस्यामें जुटा हुआ है। आप तीनों लोकोंके स्वामी हैं। अब आप जो उचित समझें, वही करें ॥१२॥ ब्रह्माजी! आपका यह सर्वश्रेष्ठ परमेष्ठि-पद ब्राह्मण एवं गौओंकी वृद्धि, कल्याण, विभूति, कुशल और विजयके लिये है। (यदि यह हिरण्यकशिपुके हाथमें चला गया, तो सज्जनोंपर संकटोंका पहाड़ टूट पड़ेगा)' ॥१३॥ युधिष्ठिर! जब देवताओंने भगवान् ब्रह्माजीसे इस प्रकार निवेदन किया, तब वे भृगु और दक्ष आदि प्रजापतियोंके साथ हिरण्यकशिपुके आश्रमपर गये ॥१४॥ वहाँ जानेपर पहले तो वे उसे देख ही न सके; क्योंकि दीमककी मिट्टी, घास और बाँसोंसे उसका शरीर ढक गया था। चींटियाँ उसकी मेदा, त्वचा, मांस और खून चाट गयी थीं ॥१५॥ बादलोंसे ढके हुए सूर्यके समान वह अपनी तपस्याके तेजसे लोकोंको तपा रहा था। उसको देखकर ब्रह्माजी भी विस्मित हो गये। उन्होंने हँसते हुए कहा ॥१६॥
ब्रह्माजीने कहा—बेटा हिरण्यकशिपु! उठो, उठो। तुम्हारा कल्याण हो। कश्यपनन्दन! अब तुम्हारी तपस्या सिद्ध हो गयी। मैं तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ। तुम्हारी जो इच्छा हो, बेखटके माँग लो ॥१७॥ मैंने तुम्हारे हृदयका अद्भुत बल देखा। अरे, डाँसोंने तुम्हारी देह खा डाली है। फिर भी तुम्हारे प्राण हड्डियोंके सहारे टिके हुए हैं ॥१८॥
ऐसी कठिन तपस्या न तो पहले किसी ऋषिने की थी और न आगे ही कोई करेगा। भला ऐसा कौन है जो देवताओंके सौ वर्षतक बिना पानीके जीता रहे ॥१९॥ बेटा हिरण्यकशिपु! तुम्हारा यह काम बड़े-बड़े धीर पुरुष भी कठिनतासे कर सकते हैं। तुमने इस तपोनिष्ठासे मुझे अपने वशमें कर लिया है ॥२०॥ दैत्यशिरोमणे! इसीसे प्रसन्न होकर मैं तुम्हें जो कुछ माँगो, दिये देता हूँ। तुम हो मरनेवाले और मैं हूँ अमर! अतः तुम्हें मेरा यह दर्शन निष्फल नहीं हो सकता ॥२१॥
नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर! इतना कहकर ब्रह्माजीने उसके चींटियोंसे खाये हुए शरीरपर अपने कमण्डलुका दिव्य एवं अमोघ प्रभावशाली जल छिड़क दिया ॥२२॥
स तत्कीचकवल्मीकात् सहओजोबलान्वितः । सर्वावयवसम्पन्नो वज्रसंहननो युवा । उत्थितस्तप्तहेमाभो विभावसुरिवैधसः ॥२३
स निरीक्ष्याम्बरे देवं हंसवाहमवस्थितम् । ननाम शिरसा भूमौ तद्दर्शनमहोत्सवः ॥२४
उत्थाय प्राञ्जलिः प्रह्व ईक्षमाणो दृशा विभुम् । हर्षाश्रुपुलकोद्भेदो गिरा गद्गदयागृणात् ॥२५
हिरण्यकशिपुरुवाच
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कल्पान्ते कालसृष्टेन योऽन्धेन तमसाऽऽवृतम् । अभिव्यनग् जगदिदं स्वयंज्योतिः स्वरोचिषा ॥२६
आत्मना त्रिवृता चेदं सृजत्यवति लुम्पति । रजः सत्त्वतमोधाम्ने पराय महते नमः ॥२७
नम आद्याय बीजाय ज्ञानविज्ञानमूर्तये । प्राणेन्द्रियमनोबुद्धिविकारैर्व्यक्तिमीयुषे ॥२८
त्वमीशिषे जगतस्तस्थुषश्च प्राणेन मुख्येन पतिः प्रजानाम् । चित्तस्य चित्तेर्मनइन्द्रियाणां पतिर्महान् भूतगुणाशयेशः ॥२९
त्वं सप्ततन्तून् वितनोषि तन्वा त्रय्या चातुर्होत्रकविद्यया च । त्वमेक आत्माऽऽत्मवतामनादि- रनन्तपारः कविरन्तरात्मा ॥३०
जैसे लकड़ीके ढेरमेंसे आग जल उठे, वैसे ही वह जल छिड़कते ही बाँस और दीमकोंकी मिट्टीके बीचसे उठ खड़ा हुआ। उस समय उसका शरीर सब अवयवोंसे पूर्ण एवं बलवान् हो गया था, इन्द्रियोंमें शक्ति आ गयी थी और मन सचेत हो गया था। सारे अंग वज्रके समान कठोर एवं तपाये हुए सोनेकी तरह चमकीले हो गये थे। वह नवयुवक होकर उठ खड़ा हुआ ।।२३।। उसने देखा कि आकाशमें हंसपर चढ़े हुए ब्रह्माजी खड़े हैं। उन्हें देखकर उसे बड़ा आनन्द हुआ। अपना सिर पृथ्वीपर रखकर उसने उनको नमस्कार किया ।।२४।। फिर अंजलि बाँधकर नम्रभावसे खड़ा हुआ और बड़े प्रेमसे अपने निर्निमेष नयनोंसे उन्हें देखता हुआ गद्गद वाणीसे स्तुति करने लगा। उस समय उसके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू उमड़ रहे थे और सारा शरीर पुलकित हो रहा था ।।२५।।
हिरण्यकशिपुने कहा—कल्पके अन्तमें यह सारी सृष्टि कालके द्वारा प्रेरित तमोगुणसे, घने अन्धकारसे ढक गयी थी। उस समय स्वयंप्रकाशस्वरूप आपने अपने तेजसे पुनः इसे प्रकट किया ।।२६।। आप ही अपने त्रिगुणमय रूपसे इसकी रचना, रक्षा और संहार करते हैं। आप रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणके आश्रय हैं। आप ही सबसे परे और महान् हैं। आपको मैं नमस्कार करता हूँ ।।२७।। आप ही जगत्के मूल कारण हैं। ज्ञान और विज्ञान आपकी मूर्ति हैं। प्राण, इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि विकारोंके द्वारा आपने अपनेको प्रकट किया है ।।२८।। आप मुख्यप्राण सूत्रात्माके रूपसे चराचर जगत्को अपने नियन्त्रणमें रखते
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हैं। आप ही प्रजाके रक्षक भी हैं। भगवन्! चित्त, चेतना, मन और इन्द्रियोंके स्वामी आप ही हैं। पंचभूत, शब्दादि विषय और उनके संस्कारोंके रचयिता भी महत्तत्त्वके रूपमें आप ही हैं ।।२९।। जो वेद होता, अध्वर्यु, ब्रह्मा और उद्गाता—इन ऋत्विजोंसे होनेवाले यज्ञका प्रतिपादन करते हैं, वे आपके ही शरीर हैं। उन्हींके द्वारा अग्निष्टोम आदि सात यज्ञोंका आप विस्तार करते हैं। आप ही सम्पूर्ण प्राणियोंके आत्मा हैं। क्योंकि आप अनादि, अनन्त, अपार, सर्वज्ञ और अन्तर्यामी हैं ।।३०।।
त्वमेव कालोऽनिमिषो जनाना- मायुर्लवाद्यावयवैः क्षिणोषि । कूटस्थ आत्मा परमेष्ठ्यजो महां- स्त्वं जीवलोकस्य च जीव आत्मा ।।३१ त्वत्तः परं नापरमप्यनेज- देजच्च किञ्चिद् व्यतिरिक्तमस्ति । विद्याः कलास्ते तनवश्च सर्वा हिरण्यगर्भोऽसि बृहत्त्रिपृष्ठः ।।३२ व्यक्तं विभो स्थूलमिदं शरीरं येनेन्द्रियप्राणमनोगुणांस्त्वम् । भुङ्क्षे स्थितो धामनि पारमेष्ठ्ये अव्यक्त आत्मा पुरुषः पुराणः ।।३३ अनन्ताव्यक्तरूपेण येनेदमखिलं ततम् । चिदचिच्छक्तियुक्ताय तस्मै भगवते नमः ।।३४ यदि दास्यस्यभिमतान् वरान्मे वरदोत्तम । भूतेभ्यस्त्वद्विसृष्टेभ्यो मृत्युर्मा भून्मम प्रभो ।।३५ नान्तर्बहिर्दिवा नक्तमन्यस्मादपि चायुधैः । न भूमौ नाम्बरे मृत्युर्न नरैर्न मृगैरपि ।।३६ व्यसुभिर्वासुमद्भिर्वा सुरासुरमहोरगैः । अप्रतिद्वन्द्वतां युद्धे ऐकपत्यं च देहिनाम् ।।३७ सर्वेषां लोकपालानां महिमानं यथाऽऽत्मनः । तपोयोगप्रभावाणां यन्न रिष्यति कर्हिचित् ।।३८
आप ही काल हैं। आप प्रतिक्षण सावधान रहकर अपने क्षण, लव आदि विभागोंके द्वारा लोगोंकी आयु क्षीण करते रहते हैं। फिर भी आप निर्विकार हैं। क्योंकि आप ज्ञानस्वरूप, परमेश्वर, अजन्मा, महान् और सम्पूर्ण जीवोंके जीवनदाता अन्तरात्मा हैं ।।३१।।
प्रभो! कार्य, कारण, चल और अचल ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जो आपसे भिन्न हो। समस्त विद्या और कलाएँ आपके शरीर हैं। आप त्रिगुणमयी मायासे अतीत स्वयं ब्रह्म हैं। यह स्वर्णमय ब्रह्माण्ड आपके गर्भमें स्थित है। आप इसे अपनेमेंसे ही प्रकट करते हैं ।।३२।। प्रभो! यह व्यक्त ब्रह्माण्ड आपका स्थूल शरीर है। इससे आप इन्द्रिय, प्राण और मनके विषयोंका उपभोग करते हैं। किन्तु उस समय भी आप अपने परम ऐश्वर्यमय स्वरूपमें ही स्थित रहते हैं। वस्तुतः आप पुराणपुरुष, स्थूल-सूक्ष्मसे परे ब्रह्मस्वरूप ही हैं ।।३३।। आप अपने अनन्त और अव्यक्त स्वरूपसे सारे जगत्में व्याप्त हैं। चेतन और अचेतन दोनों ही आपकी शक्तियाँ हैं। भगवन्! मैं आपको नमस्कार करता हूँ ।।३४।। प्रभो! आप समस्त वरदाताओंमें श्रेष्ठ हैं। यदि आप मुझे अभीष्ट वर देना चाहते हैं, तो ऐसा वर दीजिये कि आपके बनाये हुए किसी भी प्राणीसे—चाहे वह मनुष्य हो या पशु, प्राणी हो या अप्राणी, देवता हो या दैत्य अथवा नागादि किसीसे भी मेरी मृत्यु न हो। भीतर-बाहर, दिनमें, रात्रिमें, आपके बनाये प्राणियोंके अतिरिक्त और भी किसी जीवसे, अस्त्र-शस्त्रसे, पृथ्वी या आकाशमें—कहीं भी मेरी मृत्यु न हो। युद्धमें कोई मेरा सामना न कर सके। मैं समस्त प्राणियोंका एकच्छत्र सम्राट् होऊँ ।।३५-३७।। इन्द्रादि समस्त लोकपालोंमें जैसी आपकी महिमा है, वैसी ही मेरी भी हो। तपस्वियों और योगियोंको जो अक्षय ऐश्वर्य प्राप्त है, वही मुझे भी दीजिये ।।३८।। इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे हिरण्यकशिपोर्वरयाचनं नाम तृतीयोऽध्यायः ।।३।।
१. प्रा० पा०—स्तथा विभो। २. प्रा० पा०—अन्यथैव । *यद्यपि वैष्णवपद (वैकुण्ठादि नित्यधाम) अविनाशी हैं, परन्तु हिरण्यकशिपु अपनी आसुरी बुद्धिके कारण उनको कल्पके अन्तमें नष्ट होनेवाला ही मानता था। तामसी बुद्धिमें सब बातें विपरीत ही दीखा करती हैं।
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अथ चतुर्थोऽध्यायः
हिरण्यकशिपुके अत्याचार और प्रह्लादके गुणोंका वर्णन
नारद उवाच
एवं वृतः शतधृतिर्हिरण्यकशिपोरथ ।
प्रादात्तत्तपसा प्रीतो वरांस्तस्य सुदुर्लभान् ॥१
ब्रह्मोवाच
तातेमे दुर्लभाः पुंसां यान् वृणीषे वरान् मम ।
तथापि वितराम्यङ्ग वरान् यदपि दुर्लभान् ॥२
ततो जगाम भगवानमोघानुग्रहो विभुः ।
पूजितोऽसुरवर्येण स्तूयमानः प्रजेश्वरैः ॥३
एवं लब्धवरो दैत्यो बिभ्रद्धेममयं वपुः ।
भगवत्यकरोद् द्वेषं भ्रातुर्वधमनुस्मरन् ॥४
स विजित्य दिशः सर्वा लोकांश्च त्रीन् महासुरः ।
देवासुरमनुष्येन्द्रान् गन्धर्वगरुडोरगान् ॥५
सिद्धचारणविद्याध्रानृषीन् पितृपतीन् मनून् ।
यक्षरक्षःपिशाचेशान् प्रेतभूतपतीनथ ॥६
सर्वसत्त्वपतीञ्जित्वा वशमानीय विश्वजित् ।
जहार लोकपालानां स्थानानि सह तेजसा ॥७
देवोद्यानश्रिया जुष्टमध्यास्ते स्म त्रिविष्टपम् ।
महेन्द्रभवनं साक्षान्निर्मितं विश्वकर्मणा ।
त्रैलोक्यलक्ष्म्यायतन्मध्युवासाखिलर्द्धिमत् ॥८
यत्र विद्रुमसोपाना महामारकता भुवः ।
यत्र स्फाटिककुड्यानि वैदूर्यस्तम्भपङ्क्तयः ॥९
यत्र चित्रवितानानि पद्मरागासनानि च । पयःफेननिभाः शय्या मुक्तादामपरिच्छदाः ॥१०
नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर! जब हिरण्यकशिपुने ब्रह्माजीसे इस प्रकारके अत्यन्त दुर्लभ वर माँगे, तब उन्होंने उसकी तपस्यासे प्रसन्न होनेके कारण उसे वे वर दे दिये ॥१॥ ब्रह्माजीने कहा—बेटा! तुम जो वर मुझसे माँग रहे हो, वे जीवोंके लिये बहुत ही दुर्लभ हैं; परन्तु दुर्लभ होनेपर भी मैं तुम्हें वे सब वर दिये देता हूँ ॥२॥ [नारदजी कहते हैं—] ब्रह्माजीके वरदान कभी झूठे नहीं होते। वे समर्थ एवं भगवद्रूप ही हैं। वरदान मिल जानेके बाद हिरण्यकशिपुने उनकी पूजा की। तत्पश्चात् प्रजापतियोंसे अपनी स्तुति सुनते हुए वे अपने लोकको चले गये ॥३॥ ब्रह्माजीसे वर प्राप्त करनेपर हिरण्यकशिपुका शरीर सुवर्णके समान कान्तिमान् एवं हृष्ट-पुष्ट हो गया। वह अपने भाईकी मृत्युका स्मरण करके भगवान्से द्वेष करने लगा ॥४॥ उस महादैत्यने समस्त दिशाओं, तीनों लोकों तथा देवता, असुर, नरपति, गन्धर्व, गरुड़, सर्प, सिद्ध, चारण, विद्याधर, ऋषि, पितरोंके अधिपति, मनु, यक्ष, राक्षस, पिशाचराज, प्रेत, भूतपति एवं समस्त प्राणियोंके राजाओंको जीतकर अपने वशमें कर लिया। यहाँतक कि उस विश्व-विजयी दैत्यने लोकपालोंकी शक्ति और स्थान भी छीन लिये ॥५-७॥ अब वह नन्दनवन आदि दिव्य उद्यानोंके सौन्दर्यसे युक्त स्वर्गमें ही रहने लगा था। स्वयं विश्वकर्माका बनाया हुआ इन्द्रका भवन ही उसका निवासस्थान था। उस भवनमें तीनों लोकोंका सौन्दर्य मूर्तिमान् होकर निवास करता था। वह सब प्रकारकी सम्पत्तियोंसे सम्पन्न था ॥८॥ उस महलमें मूँगेकी सीढ़ियाँ, पन्नेकी गचें, स्फटिकमणिकी दीवारें, वैदूर्यमणिके खंभे और माणिककी कुर्सियाँ थीं। रंग-बिरंगे चँदोवे तथा दूधके फेनके समान शय्याएँ, जिनपर मोतियोंकी झालरें लगी हुई थीं, शोभायमान हो रही थीं ॥९-१०॥
कूजद्भिर्नूपुरैर्देव्यः शब्दयन्त्य इतस्ततः । रत्नस्थलीषु पश्यन्ति सुदतीः सुन्दरं मुखम् ॥११
तस्मिन्महेन्द्रभवने महाबलो१ महामना निर्जितलोक एकराट् । रेमेऽभिवन्द्याङ्घ्रियुगः सुरादिभिः प्रतापितैरूर्जितचण्डशासनः ॥१२
तमङ्ग मत्तं मधुनोरुगन्धिना विवृत्तताम्राक्षमशेषधिष्ण्यपाः । उपासतोपायनपाणिभिर्विना
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त्रिभिस्तपोयोगबलौजसां पदम् ।।१३
जगुर्महेन्द्रासनमोजसा स्थितं विश्वावसुस्तुम्बुरुरस्मदादयः२ । गन्धर्वसिद्धा ऋषयोऽस्तुवन्मुहु- र्विद्याधरा अप्सरसश्च पाण्डव ।।१४
स एव वर्णाश्रमिभिः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । इज्यमानो हविर्भागानग्रहीत् स्वेन तेजसा ।।१५
अकृष्टपच्या तस्यासीत् सप्तद्वीपवती मही । तथा कामदुघा द्यौस्तु नानाश्र्चर्यपदं नभः ।।१६
रत्नाकराश्च रत्नौघांस्तत्पत्न्यश्चोहूरूर्मिभिः । क्षारसीधुघृतक्षौद्रदधिक्षीरामृतोदकाः ।।१७
शैला द्रोणीभिराक्रीडं सर्वर्तुषु गुणान् द्रुमाः । दधार लोकपालानामेक एव पृथग्गुणान् ।।१८
सर्वांगसुन्दरी अप्सराएँ अपने नूपुरोंसे रुन-झुन ध्वनि करती हुई रत्नमय भूमिपर इधर-उधर टहला करती थीं और कहीं-कहीं उसमें अपना सुन्दर मुख देखने लगती थीं ।।११।। उस महेन्द्रके महलमें महाबली और महामनस्वी हिरण्यकशिपु सब लोकोंको जीतकर, सबका एकच्छत्र सम्राट् बनकर बड़ी स्वतन्त्रतासे विहार करने लगा। उसका शासन इतना कठोर था कि उससे भयभीत होकर देव-दानव उसके चरणोंकी वन्दना करते रहते थे ।।१२।। युधिष्ठिर! वह उत्कट गन्धवाली मदिरा पीकर मतवाला रहा करता था। उसकी आँखें लाल-लाल और चढ़ी हुई रहतीं। उस समय तपस्या, योग, शारीरिक और मानसिक बलका वह भंडार था। ब्रह्मा, विष्णु और महादेवके सिवा और सभी देवता अपने हाथोंमें भेंट ले-लेकर उसकी सेवामें लगे रहते ।।१३।। जब वह अपने पुरुषार्थसे इन्द्रासनपर बैठ गया, तब युधिष्ठिर! विश्वावसु, तुम्बुरु तथा हम सभी लोग उसके सामने गान करते थे। गन्धर्व, सिद्ध, ऋषिगण, विद्याधर और अप्सराएँ बार-बार उसकी स्तुति करती थीं ।।१४।।
युधिष्ठिर! वह इतना तेजस्वी था कि वर्णाश्रमधर्मका पालन करनेवाले पुरुष जो बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले यज्ञ करते, उनके यज्ञोंकी आहुति वह स्वयं छीन लेता ।।१५।। पृथ्वीके सातों द्वीपोंमें उसका अखण्ड राज्य था। सभी जगह बिना ही जोते-बोये धरतीसे अन्न पैदा होता था। वह जो कुछ चाहता, अन्तरिक्षसे उसे मिल जाता तथा आकाश उसे भाँति-भाँतिकी आश्चर्यजनक वस्तुएँ दिखा-दिखाकर उसका मनोरंजन करता था ।।१६।। इसी प्रकार खारे
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