भारतकोश
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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

‘इसमें संदेह नहीं कि मेरा ही कोई ऐसा महान् पाप है, जिसके कारण वे दोनों शत्रुसंतापी वीर एक साथ रहकर समर्थ होते हुए मेरी रक्षा नहीं कर रहे हैं’॥ २३१/२ ॥

‘रघुनन्दन! विदेहनन्दिनीका करुणाजनक उत्तम वचन सुनकर मैंने पुनः आर्या सीतासे यह बात कही—॥

‘देवि! मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारे शोकके कारण ही सब कार्योंसे विरत हो रहे हैं। श्रीरामके दुःखी होनेसे लक्ष्मण भी संतप्त हो रहे हैं॥ २५१/२ ॥

‘किसी तरह आपका दर्शन हो गया (आपके निवास-स्थानका पता लग गया), अतः अब शोक करनेका अवसर नहीं है। भामिनि! आप इसी मुहूर्तमें अपने सारे दुःखोंका अन्त हुआ देखेंगी॥ २६१/२ ॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले वे दोनों नरश्रेष्ठ राजकुमार आपके दर्शनके लिये उत्साहित हो लङ्कापुरीको जलाकर भस्म कर देंगे॥ २७१/२ ॥

‘वरारोहे! समराङ्गणमें रौद्र राक्षस रावणको बन्धु-बान्धवोंसहित मारकर रघुनाथजी अवश्य ही आपको अपनी पुरीमें ले जायँगे॥ २८१/२ ॥

‘सती-साध्वी देवि! अब आप मुझे कोई ऐसी पहचान दीजिये, जिसे श्रीरामचन्द्रजी जानते हों और जो उनके मनको प्रसन्न करनेवाला हो॥ २९१/२ ॥

‘महाबली वीर! तब उन्होंने चारों ओर देखकर वेणीमें बाँधने योग्य इस उत्तम मणिको अपने वस्त्रसे खोलकर मुझे दे दिया॥ ३०१/२ ॥

‘रघुवंशियोंके प्रियतम श्रीराम! आपके लिये इस मणिको दोनों हाथोंमें लेकर मैंने सीतादेवीको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और यहाँ आनेके लिये मैं उतावला हो उठा॥ ३११/२ ॥

‘लौटनेके लिये उत्साहित हो मुझे अपने शरीरको बढ़ाते देख सुन्दरी जनकनन्दिनी सीता बहुत दुःखी हो गयीं। उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह चली। मेरी उछलनेकी तैयारीसे वे घबरा गयीं और शोकके वेगसे आहत हो उठीं। उस समय उनका स्वर अश्रुगद्गद हो गया था। वे मुझसे कहने लगीं— ‘महाकपे! तुम बड़े भाग्यशाली हो, जो मेरे महाबाहु प्रियतम कमलनयन श्रीरामको तथा मेरे यशस्वी देवर महाबाहु लक्ष्मणको भी अपनी आँखोंसे देखोगे’॥ ३२—३५ ॥

‘सीताजीके ऐसा कहनेपर मैंने उन मिथिलेशकुमारीसे कहा— ‘देवि! जनकनन्दिनी! आप शीघ्र मेरी पीठपर चढ़ जाइये। महाभागे! श्यामलोचने! मैं अभी सुग्रीव और लक्ष्मणसहित आपके पतिदेव श्रीरघुनाथजीका आपको दर्शन कराता हूँ’॥ ३६-३७ ॥

‘यह सुनकर सीतादेवी मुझसे बोलीं— ‘महाकपे! वानरशिरोमणे! मेरा यह धर्म नहीं है कि मैं अपने वशमें होती हुई भी स्वेच्छासे तुम्हारी पीठका आश्रय लूँ॥ ३८ ॥

‘वीर! पहले जो राक्षस रावणके द्वारा मेरे अङ्गोंका स्पर्श हो गया, उस समय वहाँ मैं क्या कर सकती थी? मुझे तो कालने ही पीड़ित कर रखा था। अतः वानरप्रवर ! जहाँ वे दोनों राजकुमार हैं, वहाँ तुम जाओ’॥ ३९१/२ ॥

‘ऐसा कहकर वे फिर मुझे संदेश देने लगीं— ‘हनुमन्! सिंहके समान पराक्रमी उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणसे, मन्त्रियोंसहित सुग्रीवसे तथा अन्य सब लोगोंसे भी मेरा कुशल-समाचार कहना और उनका पूछना॥

‘तुम वहाँ ऐसी बात कहना, जिससे महाबाहु रघुनाथजी इस दुःखसागरसे मेरा उद्धार करें॥ ४२ ॥

‘वानरोंके प्रमुख वीर! मेरे इस तीव्र शोक-वेगको तथा इन राक्षसोंद्वारा जो मुझे डराया-धमकाया जाता है, इसको भी उन श्रीरामचन्द्रजीके पास जाकर कहना। तुम्हारा मार्ग मङ्गलमय हो’॥ ४३ ॥

‘नरेश्वर! आपकी प्रियतमा संयमशीला आर्या सीताने बड़े विषादके साथ ये सारी बातें कही हैं। मेरी कही हुई इन सब बातोंपर विचार करके आप विश्वास करें कि सतीशिरोमणि सीता सकुशल हैं’॥ ४४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें सरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६७ ॥

अड़सठवाँ सर्ग

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अड़सठवाँ सर्ग

हनुमान्‌जीका सीताके संदेह और अपने द्वारा उनके निवारणका वृत्तान्त बताना

‘पुरुषसिंह रघुनन्दन! आपके प्रति स्नेह और सौहार्दके कारण देवी सीताने मेरा सत्कार करके जानेके लिये उतावले हुए मुझसे पुनः यह उत्तम बात कही— ॥ १ ॥

‘पवनकुमार! तुम दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामसे अनेक प्रकारसे ऐसी बातें कहना, जिससे वे समराङ्गणमें शीघ्र ही रावणका वध करके मुझे प्राप्त कर लें॥ २ ॥

‘शत्रुओंका दमन करनेवाले वीर! यदि तुम ठीक समझो तो यहाँ किसी गुप्त स्थानमें एक दिनके लिये ठहर जाओ। आज विश्राम करके कल सबेरे यहाँसे चले जाना॥ ३ ॥

‘वानर! तुम्हारे निकट रहनेसे मुझ मन्द-भागिनीको इस शोकविपाकसे थोड़ी देरके लिये भी छुटकारा मिल जाय॥ ४ ॥

‘तुम पराक्रमी वीर हो। जब पुनः आनेके लिये यहाँसे चले जाओगे, तब मेरे प्राणोंके लिये भी संदेह उपस्थित हो जायगा। इसमें संशय नहीं है॥ ५ ॥

‘तुम्हें न देखनेसे होनेवाला शोक दुःख-पर-दुःख उठानेसे पराभव तथा दुर्गतिमें पड़ी हुई मुझ दुःखियाको और भी संताप देता रहेगा॥ ६ ॥

‘वीर! वानरराज! मेरे सामने यह महान् संदेह-सा खड़ा हो गया है कि तुम जिनके सहायक हो, उन वानरों और भालुओंके होते हुए भी रीछों और वानरोंकी वे सेनाएँ तथा वे दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण इस अपार पारावारको कैसे पार करेंगे?॥ ७-८ ॥

‘निष्पाप पवनकुमार! तीन ही भूतोंमें इस समुद्रको लाँघनेकी शक्ति देखी जाती है— विनतानन्दन गरुड़में, वायुदेवतामें और तुममें॥ ९ ॥

‘वीर! जब इस प्रकार इस कार्यका साधन दुष्कर हो गया है, तब इसकी सिद्धिके लिये तुम कौन-सा समाधान (उपाय) देखते हो। कार्यसिद्धिके उपाय जाननेवालोंमें तुम श्रेष्ठ हो, अतः मेरी बातका उत्तर दो॥ १० ॥

‘विपक्षी वीरोंका नाश करनेवाले कपिश्रेष्ठ! इसमें संदेह नहीं कि इस कार्यकी सिद्धिके लिये तुम अकेले ही बहुत हो, तथापि तुम्हारे बलका यह उद्रेक तुम्हारे लिये ही यशकी वृद्धि करनेवाला होगा (श्रीरामके लिये नहीं)॥ ११ ॥

‘यदि श्रीराम अपनी सम्पूर्ण सेनाके साथ यहाँ आकर युद्धमें रावणको मार डालें और विजयी होकर मुझे अपनी पुरीको ले चलें तो यह उनके लिये यशकी वृद्धि करनेवाला होगा॥ १२ ॥

‘जिस प्रकार राक्षस रावणने वीरवर भगवान् श्रीरामके भयसे ही उनके सामने न जाकर छलपूर्वक वनसे मेरा अपहरण किया था, उस तरह श्रीरघुनाथजीको मुझे नहीं प्राप्त करना चाहिये (वे रावणको मारकर ही मुझे ले चलें)॥ १३ ॥

‘शत्रुसेनाका संहार करनेवाले ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम यदि अपने सैनिकोंद्वारा लङ्काको पददलित करके मुझे अपने साथ ले जायँ तो यह उनके योग्य पराक्रम होगा॥ १४ ॥

‘महात्मा श्रीराम संग्राममें शौर्य प्रकट करनेवाले हैं, अतः जिस प्रकार उनके अनुरूप पराक्रम प्रकट हो सके, वैसा ही उपाय तुम करो’॥ १५ ॥

‘सीतादेवीके उस अभिप्राययुक्त, विनयपूर्ण और युक्तिसंगत वचनको सुनकर अन्तमें मैंने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १६ ॥

‘देवि! वानर और भालुओंकी सेनाके स्वामी कपिश्रेष्ठ सुग्रीव बड़े शक्तिशाली हैं। वे आपका उद्धार करनेके लिये दृढ़ निश्चय कर चुके हैं॥ १७ ॥

‘उनके पास पराक्रमी, शक्तिशाली और महाबली वानर हैं, जो मनके संकल्पके समान तीव्र गतिसे चलते हैं। वे सब-के-सब सदा उनकी आज्ञाके अधीन रहते हैं॥ १८ ॥

‘नीचे, ऊपर और अगल-बगलमें कहीं भी उनकी गति नहीं रुकती है। वे अमिततेजस्वी वानर बड़े-से-बड़े कार्य आ पड़नेपर भी कभी शिथिल नहीं होते हैं॥ १९ ॥

‘वायुमार्ग (आकाश)-का अनुसरण करनेवाले उन महाभाग बलवान् वानरोंने अनेक बार इस पृथ्वीकी परिक्रमा की है॥ २० ॥

‘वहाँ मुझसे बढ़कर तथा मेरे समान शक्तिशाली बहुतसे वानर हैं। सुग्रीवके पास कोऽइ ऐसा वानर नहीं है, जो मुझसे किसी बातमें कम हो॥ २१ ॥

‘जब मैं ही यहाँ आ गया, तब फिर उन महाबली वानरोंके आनेमें क्या संदेह हो सकता है? आप जानती होंगी कि दूत या धावन बनाकर वे ही लोग भेजे जाते हैं, जो निम्नश्रेणीके होते हैं। अच्छी श्रेणीके लोग नहीं भेजे जाते॥ २२ ॥

‘अतः देवि! अब संताप करनेकी आवश्यकता नहीं है। आपका मानसिक दुःख दूर हो जाना चाहिये। वे वानरयूथपति एक ही छलाँगमें लङ्कामें पहुँच जायँगे॥ २३॥

‘महाभागे! वे पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण भी उदयाचलपर उदित होनेवाले चन्द्रमा और सूर्यकी भाँति मेरी पीठपर बैठकर आपके पास आ जायँगे॥ २४॥

‘आप शीघ्र ही देखेंगी कि सिंहके समान पराक्रमी शत्रुनाशक श्रीराम और लक्ष्मण हाथमें धनुष लिये लङ्काके द्वारपर आ पहुँचे हैं॥ २५॥

‘नख और दाढ़ें ही जिनके आयुध हैं, जो सिंह और बाघके समान पराक्रमी हैं तथा बड़े-बड़े गजराजोंके समान जिनकी विशाल काया है, उन वीर वानरोंको आप शीघ्र ही यहाँ एकत्र हुआ देखेंगी॥ २६॥

‘लङ्कावर्ती मलयपर्वतके शिखरोंपर पहाड़ों और मेघोंके समान विशाल शरीरवाले प्रधान-प्रधान वानर आकर गर्जना करेंगे और आप शीघ्र ही उनका सिंहनाद सुनेंगी॥ २७॥

‘आपको जल्दी ही यह देखनेका भी सौभाग्य प्राप्त होगा कि शत्रुओंका दमन करनेवाले श्रीरघुनाथजी वनवासकी अवधि पूरी करके आपके साथ अयोध्यामें जाकर वहाँके राज्यपर अभिषिक्त हो गये हैं’॥ २८॥

‘आपके अत्यन्त शोकसे बहुत ही पीड़ित होनेपर भी जिनकी वाणीमें कभी दीनता नहीं आने पाती, उन मिथिलेशकुमारीको जब मैंने प्रिय एवं मङ्गलमय वचनोंद्वारा सान्त्वना देकर प्रसन्न किया, तब उनके मनको कुछ शान्ति मिली’॥ २९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें अड़सठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६८॥

॥ सुन्दरकाण्ड समाप्त ॥

युद्धकाण्ड

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॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

युद्धकाण्ड

पहला सर्ग

हनुमान्‌जीकी प्रशंसा करके श्रीरामका उन्हें हृदयसे लगाना और समुद्रको पार करनेके लिये चिन्तित होना

हनुमान्‌जीके द्वारा यथावत्रूपसे कहे हुए इन वचनोंको सुनकर भगवान् श्रीराम बड़े प्रसन्न हुए और इस प्रकार उत्तम वचन बोले—॥ १ ॥

‘हनुमान्‌ने बड़ा भारी कार्य किया है। भूतलपर ऐसा कार्य होना कठिन है। इस भूमण्डलमें दूसरा कोई तो ऐसा कार्य करनेकी बात मनके द्वारा सोच भी नहीं सकता॥ २ ॥

‘गरुड़, वायु और हनुमान्‌को छोड़कर दूसरे किसीको मैं ऐसा नहीं देखता, जो महासागरको लाँघ सके॥ ३ ॥

‘देवता, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग और राक्षस— इनमेंसे किसीके लिये भी जिसपर आक्रमण करना असम्भव है तथा जो रावणके द्वारा भलीभाँति सुरक्षित है, उस लङ्कापुरीमें अपने बलके भरोसे प्रवेश करके कौन वहाँसे जीवित निकल सकता है?॥ ४ १/२ ॥

‘जो हनुमान्‌के समान बल-पराक्रमसे सम्पन्न न हो, ऐसा कौन पुरुष राक्षसोंद्वारा सुरक्षित अत्यन्त दुर्जय लङ्कामें प्रवेश कर सकता है॥ ५ १/२ ॥

‘हनुमान्‌ने समुद्र-लङ्घन आदि कार्योंके द्वारा अपने पराक्रमके अनुरूप बल प्रकट करके एक सच्चे सेवकके योग्य सुग्रीवका बहुत बड़ा कार्य सम्पन्न किया है॥ ६ ॥

‘जो सेवक स्वामीके द्वारा किसी दुष्कर कार्यमें नियुक्त होनेपर उसे पूरा करके तदनुरूप दूसरे कार्यको भी (यदि वह मुख्य कार्यका विरोधी न हो) सम्पन्न करता है, वह सेवकोंमें उत्तम कहा गया है॥ ७ ॥

‘जो एक कार्यमें नियुक्त होकर योग्यता और सामर्थ्य होनेपर भी स्वामीके दूसरे प्रिय कार्यको नहीं करता (स्वामीने जितना कहा है, उतना ही करके लौट आता है) वह मध्यम श्रेणीका सेवक बताया गया है॥

‘जो सेवक मालिकके किसी कार्यमें नियुक्त होकर अपनेमें योग्यता और सामर्थ्यके होते हुए भी उसे सावधानीसे पूरा नहीं करता, वह अधम कोटिका कहा गया है॥ ९ ॥

‘हनुमान्ने स्वामीके एक कार्यमें नियुक्त होकर उसके साथ ही दूसरे महत्त्वपूर्ण कार्योंको भी पूरा किया, अपने गौरवमें भी कमी नहीं आने दी—अपने-आपको दूसरोंकी दृष्टिमें छोटा नहीं बनने दिया और सुग्रीवको भी पूर्णतः संतुष्ट कर दिया॥ १० ॥

‘आज हनुमान्ने विदेहनन्दिनी सीताका पता लगाकर—उन्हें अपनी आँखों देखकर धर्मके अनुसार मेरी, समस्त रघुवंशकी और महाबली लक्ष्मणकी भी रक्षा की है॥ ११ ॥

‘आज मेरे पास पुरस्कार देने योग्य वस्तुका अभाव है, यह बात मेरे मनमें बड़ी कसक पैदा कर रही है कि यहाँ जिसने मुझे ऐसा प्रिय संवाद सुनाया, उसका मैं कोई वैसा ही प्रिय कार्य नहीं कर पा रहा हूँ॥ १२ ॥

‘इस समय इन महात्मा हनुमान्को मैं केवल अपना प्रगाढ़ आलिङ्गन प्रदान करता हूँ, क्योंकि यही मेरा सर्वस्व है’॥ १३ ॥

ऐसा कहते-कहते रघुनाथजीके अङ्ग-प्रत्यङ्ग प्रेमसे पुलकित हो गये और उन्होंने अपनी आज्ञाके पालनमें सफलता पाकर लौटे हुए पवित्रात्मा हनुमान्जीको हृदयसे लगा लिया॥ १४ ॥

फिर थोड़ी देरतक विचार करके रघुवंशशिरोमणि श्रीरामने वानरराज सुग्रीवको सुनाकर यह बात कही—॥

‘बन्धुओ! सीताकी खोजका काम तो सुचारुरूपसे सम्पन्न हो गया; किंतु समुद्रतककी दुस्तरताका विचार करके मेरे मनका उत्साह फिर नष्ट हो गया॥ १६ ॥

‘महान् जलराशिसे परिपूर्ण समुद्रको पार करना तो बड़ा ही कठिन काम है। यहाँ एकत्र हुए ये वानर समुद्रके दक्षिण तटपर कैसे पहुँचेंगे॥ १७ ॥

‘मेरी सीताने भी यही संदेह उठाया था, जिसका वृत्तान्त अभी-अभी मुझसे कहा गया है। इन वानरोंके समुद्रके पार जानेके विषयमें जो प्रश्न खड़ा हुआ है, उसका वास्तविक उत्तर क्या है?’॥ १८ ॥

हनुमान्‌जीसे ऐसा कहकर शत्रुसूदन महाबाहु श्रीराम शोकाकुल होकर बड़ी चिन्तामें पड़ गये॥ १९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें पहला सर्ग पूरा हुआ॥ १ ॥

दूसरा सर्ग

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दूसरा सर्ग

सुग्रीवका श्रीरामको उत्साह प्रदान करना

इस प्रकार शोकसे संतप्त हुए दशरथनन्दन श्रीरामसे सुग्रीवने उनके शोकका निवारण करनेवाली बात कही— ॥

‘वीरवर! आप दूसरे साधारण मनुष्योंकी भाँति क्यों संताप कर रहे हैं? आप इस तरह चिन्तित न हों। जैसे कृतघ्न पुरुष सौहार्दको त्याग देता है, उसी तरह आप भी इस संतापको छोड़ दें॥ २ ॥

‘रघुनन्दन! जब सीताका समाचार मिल गया और शत्रुके निवास-स्थानका पता लग गया, तब मुझे आपके इस दुःख और चिन्ताका कोई कारण नहीं दिखायी देता॥ ३ ॥

‘रघुकुलभूषण! आप बुद्धिमान्, शास्त्रोंके ज्ञाता विचारकुशल और पण्डित हैं, अतः कृतात्मा पुरुषकी भाँति इस अर्थदूषक प्राकृत बुद्धिका परित्याग कर दीजिये॥ ४ ॥

‘बड़े-बड़े नाकोंसे भरे हुए समुद्रको लाँघकर हमलोग लङ्कापर चढ़ाई करेंगे और आपके शत्रुको नष्ट कर डालेंगे॥ ५ ॥

‘जो पुरुष उत्साहशून्य, दीन और मन-ही-मन शोकसे व्याकुल रहता है, उसके सारे काम बिगड़ जाते हैं और वह बड़ी विपत्तिमें पड़ जाता है॥ ६ ॥

‘ये वानरयूथपति सब प्रकारसे समर्थ एवं शूरवीर हैं। आपका प्रिय करनेके लिये इनके मनमें बड़ा उत्साह है। ये आपके लिये जलती आगमें भी प्रवेश कर सकते हैं। समुद्रको लाँघने और रावणको मारनेका प्रसंग चलनेपर इनका मुँह प्रसन्नतासे खिल जाता है। इनके इस हर्ष और उत्साहसे ही मैं इस बातको जानता हूँ तथा इस विषयमें मेरा अपना तर्क (निश्चय) भी सुदृढ़ है॥ ७ ॥

‘आप ऐसा कीजिये, जिससे हमलोग पराक्रम-पूर्वक अपने शत्रु पापाचारी रावणका वध करके सीताको यहाँ ले आवें॥ ८ ॥

‘रघुनन्दन! आप ऐसा कोई उपाय कीजिये, जिससे समुद्रपर सेतु बँध सके और हम उस राक्षसराजकी लङ्कापुरीको देख सकें॥ ९ ॥

‘त्रिकूटपर्वतके शिखरपर बसी हुई लङ्कापुरी एक बार दीख जाय तो आप यह निश्चित समझिये कि युद्धमें रावण दिखायी दिया और मारा गया॥ १०॥

‘वरुणके निवासभूत घोर समुद्रपर पुल बाँधे बिना तो इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर भी लङ्काको पददलित नहीं कर सकते॥ ११॥

‘अतः जब लङ्काके निकटतक समुद्रपर पुल बँध जायगा, तब हमारी सारी सेना उस पार चली जायगी। फिर तो आप यही समझिये कि अपनी जीत हो गयी; क्योंकि इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले ये वानर युद्धमें बड़ी वीरता दिखानेवाले हैं॥ १२॥

‘अतः राजन्! आप इस व्याकुल बुद्धिका आश्रय न लें—बुद्धिकी इस व्याकुलताको त्याग दें; क्योंकि यह समस्त कार्योंको बिगाड़ देनेवाली है और शोक इस जगत्में पुरुषके शौर्यको नष्ट कर देता है॥ १३॥

‘मनुष्यको जिसका आश्रय लेना चाहिये, उस शौर्यका ही वह अवलम्बन करे; क्योंकि वह कर्ताको शीघ्र ही अलंकृत कर देता है—उसके अभीष्ट फलकी सिद्धि करा देता है॥ १४॥

‘अतः महाप्राज्ञ श्रीराम! आप इस समय तेजके साथ ही धैर्यका आश्रय लें। कोई वस्तु खो गयी हो या नष्ट हो गयी हो, उसके लिये आप-जैसे शूरवीर महात्मा पुरुषोंको शोक नहीं करना चाहिये; क्योंकि शोक सब कामोंको बिगाड़ देता है॥ १५॥

‘आप बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ और सम्पूर्ण शास्त्रोंके मर्मज्ञ हैं। अतः हम-जैसे मन्त्रियों एवं सहायकोंके साथ रहकर अवश्य ही शत्रुपर विजय प्राप्त कर सकते हैं॥ १६॥

‘रघुनन्दन! मुझे तो तीनों लोकोंमें ऐसा कोई वीर नहीं दिखायी देता, जो रणभूमिमें धनुष लेकर खड़े हुए आपके सामने ठहर सके॥ १७॥

‘वानरोंपर जिसका भार रखा गया है, आपका वह कार्य बिगड़ने नहीं पायेगा। आप शीघ्र ही इस अक्षय समुद्रको पार करके सीताका दर्शन करेंगे॥ १८॥

‘पृथ्वीनाथ! अपने हृदयमें शोकको स्थान देना व्यर्थ है। इस समय तो आप शत्रुओंके प्रति क्रोध धारण कीजिये। जो क्षत्रिय मन्द (क्रोधशून्य) होते हैं, उनसे कोई चेष्टा नहीं बन पाती; परंतु जो शत्रुके प्रति आवश्यक रोषसे भरा होता है, उससे सब डरते हैं॥ १९॥

‘नदियोंके स्वामी घोर समुद्रको पार करनेके लिये क्या उपाय किया जाय, इस विषयमें आप हमारे साथ बैठकर विचार कीजिये; क्योंकि आपकी बुद्धि बड़ी सूक्ष्म है॥ २०॥

‘यदि हमारे सैनिक समुद्रको लाँघ गये तो यही निश्चय रखिये कि अपनी जीत अवश्य होगी। सारी सेनाका समुद्रके उस पार पहुँच जाना ही अपनी विजय समझिये॥ २१ ॥

‘ये वानर संग्राममें बड़े शूरवीर हैं और इच्छानुसार रूप धारण कर सकते हैं। ये पत्थरों और पेड़ोंकी वर्षा करके ही उन शत्रुओंका संहार कर डालेंगे॥ २२ ॥

‘शत्रुसूदन श्रीराम! यदि किसी प्रकार मैं इस वानर-सेनाको समुद्रके उस पार पहुँची देख सकूँरु तो मैं रावणको युद्धमें मरा हुआ ही समझता हूँ॥ २३ ॥

‘बहुत कहनेसे क्या लाभ! मेरा तो विश्वास है कि आप सर्वथा विजयी होंगे; क्योंकि मुझे ऐसे ही शकुन दिखायी देते हैं और मेरा हृदय भी हर्ष एवं उत्साहसे भरा है’॥ २४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें दूसरा सर्ग पूरा हुआ॥ २ ॥

तीसरा सर्ग

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तीसरा सर्ग

हनुमान्‌जीका लङ्काके दुर्ग, फाटक, सेना-विभाग और संक्रम आदिका वर्णन करके भगवान्‌ श्रीरामसे सेनाको कूच करनेकी आज्ञा देनेके लिये प्रार्थना करना

सुग्रीवके ये युक्तियुक्त और उत्तम अभिप्रायसे पूर्ण वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने उन्हें स्वीकार किया और फिर हनुमान्‌जीसे कहा— ॥ १ ॥

‘मैं तपस्यासे पुल बाँधकर और समुद्रको सुखाकर सब प्रकारसे महासागरको लाँघ जानेमें समर्थ हूँ॥ २ ॥

‘वानरवीर! तुम मुझे यह तो बताओ कि उस दुर्गम लङ्कापुरीके कितने दुर्ग हैं। मैं देखे हुएके समान उसका सारा विवरण स्पष्टरूपसे जानना चाहता हूँ॥ ३ ॥

‘तुमने रावणकी सेनाका परिमाण, पुरीके दरवाजोंको दुर्गम बनानेके साधन, लङ्काकी रक्षाके उपाय तथा राक्षसोंके भवन—इन सबको सुखपूर्वक यथावत्-रूपसे वहाँ देखा है। अतः इन सबका ठीक-ठीक वर्णन करो; क्योंकि तुम सब प्रकारसे कुशल हो’॥ ४-५ ॥

श्रीरघुनाथजीका यह वचन सुनकर वाणीके मर्मको समझनेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ पवनकुमार हनुमान्‌ने श्रीरामसे फिर कहा— ॥ ६ ॥

‘भगवन्! सुनिये। मैं सब बातें बता रहा हूँ। लङ्काके दुर्ग किस विधिसे बने हैं, किस प्रकार लङ्कापुरीकी रक्षाकी व्यवस्था की गयी है, किस तरह वह सेनाओंसे सुरक्षित है, रावणके तेजसे प्रभावित हो राक्षस उसके प्रति कैसा स्नेह रखते हैं, लङ्काकी समृद्धि कितनी उत्तम है, समुद्र कितना भयंकर है, पैदल सैनिकोंका विभाग करके कहाँ कितने सैनिक रखे गये हैं और वहाँके वाहनोंकी कितनी संख्या है—इन सब बातोंका मैं वर्णन करूँगा। ऐसा कहकर कपिश्रेष्ठ हनुमान्‌ने वहाँकी बातोंको ठीक-ठीक बताना आरम्भ किया॥ ७—९ ॥

‘प्रभो! लङ्कापुरी हर्ष और आमोद-प्रमोदसे पूर्ण है। वह विशाल पुरी मतवाले हाथियोंसे व्याप्त तथा असंख्य रथोंसे भरी हुई है। राक्षसोंके समुदाय सदा उसमें निवास करते हैं॥ १० ॥

‘उस पुरीके चार बड़े-बड़े दरवाजे हैं, जो बहुत लंबे-चौड़े हैं। उनमें बहुत मजबूत किवाड़ लगे हैं और मोटी-मोटी अर्गलाएँ हैं॥ ११ ॥

‘उन दरवाजोंपर बड़े विशाल और प्रबल यन्त्र लगे हैं। जो तीर और पत्थरोंके गोले बरसाते हैं। उनके द्वारा आक्रमण करनेवाली शत्रुसेनाको आगे बढ़नेसे रोका जाता है॥ १२ ॥

‘जिन्हें वीर राक्षसगणोंने बनाया है, जो काले लोहेकी बनी हुई हैं, भयंकर और तीखी हैं तथा जिनका अच्छी तरह संस्कार किया गया है, ऐसी सैकड़ों शतघ्नियां* (लोहेके कांटोंसे भरी हुई चार हाथ लंबी गदाएँ) उन दरवाजोंपर सजाकर रखी गयी हैं॥ १३ ॥

‘उस पुरीके चारों ओर सोनेका बना हुआ बहुत ऊँचा परकोटा है, जिसको तोड़ना बहुत ही कठिन है। उसमें मणि, मूँगे, नीलम और मोतियोंका काम किया गया है॥ १४ ॥

‘परकोटोंके चारों ओर महाभयंकर, शत्रुओंका महान् अमङ्गल करनेवाली, ठंडे जलसे भरी हुई और अगाध गहराईसे युक्त कई खाइयाँ बनी हुई हैं, जिनमें ग्राह और बड़े-बड़े मत्स्य निवास करते हैं॥ १५ ॥

‘उक्त चारों दरवाजोंके सामने उन खाइयोंपर मचानोंके रूपमें चार संक्रम* (लकड़ीके पुल) हैं, जो बहुत ही विस्तृत हैं। उनमें बहुत-से बड़े-बड़े यन्त्र लगे हुए हैं और उनके आस-पास परकोटेपर बने हुए मकानोंकी पंक्तियाँ हैं॥ १६ ॥

‘जब शत्रुकी सेना आती है, तब यन्त्रोंके द्वारा उन संक्रमोंकी रक्षा की जाती है तथा उन यन्त्रोंके द्वारा ही उन्हें सब ओर खाइयोंमें गिरा दिया जाता है और वहाँ पहुँची हुई शत्रु-सेनाओंको भी सब ओर फेंक दिया जाता है॥ १७ ॥

‘उनमेंसे एक संक्रम तो बड़ा ही सुदृढ़ और अभेद्य है। वहाँ बहुत बड़ी सेना रहती है और वह सोनेके अनेक खंभों तथा चबूतरोंसे सुशोभित है॥ १८ ॥

‘रघुनाथजी! रावण युद्धके लिये उत्सुक होता हुआ स्वयं कभी क्षुब्ध नहीं होता—स्वस्थ एवं धीर बना रहता है। वह सेनाओंके बारंबार निरीक्षणके लिये सदा सावधान एवं उद्यत रहता है॥ १९ ॥

‘लङ्कापर चढ़ाई करनेके लिये कोई अवलम्ब नहीं है। वह पुरी देवताओंके लिये भी दुर्गम और बड़ी भयावनी है। उसके चारों ओर नदी, पर्वत, वन और कृत्रिम (खाई, परकोटा आदि)—ये चार प्रकारके दुर्ग हैं॥ २० ॥

‘रघुनन्दन! वह बहुत दूरतक फैले हुए समुद्रके दक्षिण किनारेपर बसी हुई है। वहाँ जानेके लिये नावका भी मार्ग नहीं है; क्योंकि उसमें लक्ष्यका भी किसी प्रकार पता रहना सम्भव नहीं है॥ २१ ॥

‘वह दुर्गम पुरी पर्वतके शिखरपर बसायी गयी है और देवपुरीके समान सुन्दर दिखायी देती है, हाथी, घोड़ोंसे भरी हुई वह लङ्का अत्यन्त दुर्जय है॥ २२ ॥

‘खाइयाँ, शतघ्नियों और तरह-तरहके यन्त्र दुरात्मा रावणकी उस लङ्कानगरीकी शोभा बढ़ाते हैं॥ २३ ॥

‘लङ्काके पूर्वद्वारपर दस हजार राक्षस रहते हैं, जो सब-के-सब हाथोंमें शूल धारण करते हैं। वे अत्यन्त दुर्जय और युद्धके मुहानेपर तलवारोंसे जूझनेवाले हैं॥

‘लङ्काके दक्षिण द्वारपर चतुरंगिणी सेनाके साथ एक लाख राक्षस योद्धा डटे रहते हैं। वहाँके सैनिक भी बड़े बहादुर हैं॥ २५ ॥

‘पुरीके पश्चिम द्वारपर दस लाख राक्षस निवास करते हैं। वे सब-के-सब ढाल और तलवार धारण करते हैं तथा सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञानमें निपुण हैं॥ २६ ॥

‘उस पुरीके उत्तर द्वारपर एक अर्बुद (दस करोड़) राक्षस रहते हैं। जिनमेंसे कुछ तो रथी हैं और कुछ घुड़सवार। वे सभी उत्तम कुलमें उत्पन्न और अपनी वीरताके लिये प्रशंसित हैं॥ २७ ॥

‘लङ्काके मध्यभागकी छावनीमें सैकड़ों सहस्र दुर्जय राक्षस रहते हैं, जिनकी संख्या एक करोड़से अधिक है॥

‘किंतु मैंने उन सब संक्रमणोंको तोड़ डाला है, खाइयाँ पाट दी हैं, लङ्कापुरीको जला दिया है और उसके परकोटोंको भी धराशायी कर दिया है। इतना ही नहीं, वहाँके विशालकाय राक्षसोंकी सेनाका एक चौथाई भाग नष्ट कर डाला है॥ २९ ॥

‘हमलोग किसी-न-किसी मार्ग या उपायसे एक बार समुद्रको पार कर लें; फिर तो लङ्काको वानरोंके द्वारा नष्ट हुई ही समझिये॥ ३० ॥

‘अङ्गद, द्विविद, मैन्द, जाम्बवान्, पनस, नल और सेनापति नील—इतने ही वानर लङ्काविजय करनेके लिये पर्याप्त हैं। बाकी सेना लेकर आपको क्या करना है?॥

‘रघुनन्दन! ये अङ्गद आदि वीर आकाशमें उछलते-कूदते हुए रावणकी महापुरी लङ्कामें पहुँचकर उसे पर्वत, वन, खाई, दरवाजे, परकोटे और मकानोंसहित नष्ट करके सीताजीको यहाँ ले आयेंगे॥ ३२ ॥

‘ऐसा समझकर आप शीघ्र ही समस्त सैनिकोंको सम्पूर्ण आवश्यक वस्तुओंका संग्रह करके कूच करनेकी आज्ञा दीजिये और उचित मुहूर्तसे प्रस्थानकी इच्छा कीजिये’॥ ३३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें तीसरा सर्ग पूरा हुआ॥ ३ ॥


* शतघ्नी च चतुर्हस्ता लोहकंटकिनी गदा। इति वैजयन्ती।

* मालूम होता है ‘संक्रम’ इस प्रकारके पुल थे, जिन्हें जब आवश्यकता होती, तभी यन्त्रोंद्वारा गिरा दिया जाता था। इसीसे शत्रु की सेना आनेपर उसे खाईमें गिरा देनेकी बात कही गयी है।

चौथा सर्ग

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चौथा सर्ग

श्रीराम आदिके साथ वानर-सेनाका प्रस्थान और समुद्र-तटपर उसका पड़ाव

हनुमान्‌जीके वचनोंको क्रमशः यथावत्-रूपसे सुनकर सत्यपराक्रमी महातेजस्वी भगवान् श्रीरामने कहा— ॥ १ ॥

‘हनुमन्! मैं तुमसे सच कहता हूँ—तुमने उस भयानक राक्षसकी जिस लङ्कापुरीका वर्णन किया है, उसे मैं शीघ्र ही नष्ट कर डालूँगा॥ २ ॥

‘सुग्रीव! तुम इसी मुहूर्तमें प्रस्थानकी तैयारी करो। सूर्यदेव दिनके मध्य भागमें जा पहुँचे हैं। इसलिये इस विजय* नामक मुहूर्तमें हमारी यात्रा उपयुक्त होगी॥ ३ ॥

‘रावण सीताको हरकर ले जाय; किंतु वह जीवित बचकर कहाँ जायगा? सिद्ध आदिके मुँहसे लङ्कापर मेरी चढ़ाईका समाचार सुनकर सीताको अपने जीवनकी आशा बँध जायगी; ठीक उसी तरह जैसे जीवनका अन्त उपस्थित होनेपर यदि रोगी अमृतका (अमृतत्वके साधनभूत दिव्य ओषधिका) स्पर्श कर ले अथवा अमृतोपम द्रवभूत ओषधिको पी ले तो उसे जीनेकी आशा हो जाती है॥ ४ ॥

‘आज उत्तराफाल्गुनी नामक नक्षत्र है। कल चन्द्रमाका हस्त नक्षत्रसे योग होगा। इसलिये सुग्रीव! हमलोग आज ही सारी सेनाओंके साथ यात्रा कर दें॥

‘इस समय जो शकुन प्रकट हो रहे हैं और जिन्हें मैं देख रहा हूँ, उनसे यह विश्वास होता है कि मैं अवश्य ही रावणका वध करके जनकनन्दिनी सीताको ले आऊँगा॥ ६ ॥

‘इसके सिवा मेरी दाहिनी आँखका ऊपरी भाग फड़क रहा है। वह भी मानो मेरी विजय-प्राप्ति और मनोरथसिद्धिको सूचित कर रहा है’॥ ७ ॥

यह सुनकर वानरराज सुग्रीव तथा लक्ष्मणने भी उनका बड़ा आदर किया। तत्पश्चात् अर्थवेत्ता (नीतिनिपुण) धर्मात्मा श्रीरामने फिर कहा—॥ ८ ॥

‘इस सेनाके आगे-आगे एक लाख वेगवान् वानरोंसे घिरे हुए सेनापति नील मार्ग देखनेके लिये चलें॥ ९ ॥

‘सेनापति नील! तुम सारी सेनाको ऐसे मार्गसे शीघ्रतापूर्वक ले चलो, जिसमें फल-मूलकी अधिकता हो, शीतल छायासे युक्त सघन वन हो, ठंडा जल मिल सके और मधु भी उपलब्ध हो

सके॥ १० ॥

‘सम्भव है दुरात्मा राक्षस रास्तेके फल-मूल और जलको विष आदिसे दूषित कर दें, अतः तुम मार्गमें सतत सावधान रहकर उनसे इन वस्तुओंकी रक्षा करना॥

‘वानरोंको चाहिये कि जहाँ गड्ढे, दुर्गम वन और साधारण जंगल हों, वहाँ सब ओर कूद-फाँदकर यह देखते रहें कि कहीं शत्रुओंकी सेना तो नहीं छिपी है (ऐसा न हो कि हम आगे निकल जायँ और शत्रु अकस्मात् पीछेसे आक्रमण कर दे)॥ १२ ॥

‘जिस सेनामें बाल, वृद्ध आदिके कारण दुर्बलता हो, वह यहाँ किष्किन्धामें ही रह जाय; क्योंकि हमारा यह युद्धरूपी कृत्य बड़ा भयंकर है, अतः इसके लिये बल-विक्रमसम्पन्न सेनाको ही यात्रा करनी चाहिये॥ १३ ॥

‘सैकड़ों और हजारों महाबली कपिकेसरी वीर महासागरकी जलराशिके समान भयंकर एवं अपार वानर-सेनाके अग्रभागको अपने साथ आगे बढ़ाये चलें॥ १४ ॥

‘पर्वतके समान विशालकाय गज, महाबली गवय तथा मतवाले साँड़की भाँति पराक्रमी गवाक्ष सेनाके आगे-आगे चलें॥ १५ ॥

‘उछल-कूदकर चलनेवाले कपियोंके पालक वानरशिरोमणि ऋषभ इस वानर-सेनाके दाहिने भागकी रक्षा करते हुए चलें॥ १६ ॥

‘गन्धहस्तीके समान दुर्जय और वेगशाली वानर गन्धमादन इस वानर-वाहिनीके वामभागमें रहकर इसकी रक्षा करते हुए आगे बढ़ें॥ १७ ॥

‘जैसे देवराज इन्द्र ऐरावत हाथीपर आरूढ़ होते हैं, उसी प्रकार मैं हनुमानके कंधेपर चढ़कर सेनाके बीचमें रहकर सारी सेनाका हर्ष बढ़ाता हुआ चलूँगा॥ १८ ॥

‘जैसे धनाध्यक्ष कुबेर सार्वभौम नामक दिग्गजकी पीठपर बैठकर यात्रा करते हैं, उसी प्रकार कालके समान पराक्रमी लक्ष्मण अंगदपर आरूढ़ होकर यात्रा करें॥ १९ ॥

‘महाबाहु ऋक्षराज जाम्बवान्, सुषेण और वानर वेगदर्शी—ये तीनों वानर सेनाके पृष्ठभागकी रक्षा करें’॥

रघुनाथजीका यह वचन सुनकर महापराक्रमी वानरशिरोमणि सेनापति सुग्रीवने उन वानरोंको यथोचित आज्ञा दी॥ २१ ॥

तब वे समस्त महाबली वानरगण अपनी गुफाओं और शिखरोंसे शीघ्र ही निकलकर उछलते-कूदते हुए चलने लगे॥ २२ ॥

तत्पश्चात् वानरराज सुग्रीव और लक्ष्मणके सादर अनुरोध करनेपर सेनासहित धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजी दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थित हुए॥ २३ ॥

उस समय सैकड़ों, हजारों, लाखों और करोड़ों वानरोंसे, जो हाथीके समान विशालकाय थे, घिरे हुए श्रीरघुनाथजी आगे बढ़ने लगे॥ २४ ॥

यात्रा करते हुए श्रीरामके पीछे वह विशाल वानरवाहिनी चलने लगी। उस सेनाके सभी वीर सुग्रीवसे पालित होनेके कारण हृष्ट-पुष्ट एवं प्रसन्न थे॥ २५ ॥

उनमेंसे कुछ वानर उस सेनाकी रक्षाके लिये उछलते-कूदते हुए चारों ओर चक्कर लगाते थे, कुछ मार्गशोधनके लिये कूदते-फाँदते आगे बढ़ जाते थे, कुछ वानर मेघोंके समान गर्जते, कुछ सिंहोंके समान दहाड़ते और कुछ किलकारियाँ भरते हुए दक्षिण दिशाकी ओर अग्रसर हो रहे थे॥ २६ ॥

वे सुगन्धित मधु पीते और मीठे फल खाते हुए मञ्जरीपुञ्ज धारण करनेवाले विशाल वृक्षोंको उखाड़कर कंधोंपर लिये चल रहे थे॥ २७ ॥

कुछ मतवाले वानर विनोदके लिये एक दूसरेको ढो रहे थे। कोऽइ अपने ऊपर चढ़े हुए वानरको झटककर दूर फेंक देते थे। कोऽइ चलते-चलते ऊपरको उछल पड़ते थे और दूसरे वानर दूसरों-दूसरोंको ऊपरसे धक्के देकर नीचे गिरा देते थे॥ २८ ॥

श्रीरघुनाथजीके समीप चलते हुए वानर यह कहते हुए गर्जना करते थे कि ‘हमें रावणको मार डालना चाहिये। समस्त निशाचरोंका भी संहार कर देना चाहिये’॥

सबसे आगे ऋषभ, नील और वीर कुमुद—ये बहुसंख्यक वानरोंके साथ रास्ता ठीक करते जाते थे॥ ३० ॥

सेनाके मध्यभागमें राजा सुग्रीव, श्रीराम और लक्ष्मण—ये तीनों शत्रुसूदन वीर अनेक बलशाली एवं भयंकर वानरोंसे घिरे हुए चल रहे थे॥ ३१ ॥

शतबलि नामका एक वीर वानर दस करोड़ वानरोंके साथ अकेला ही सारी सेनाको अपने नियन्त्रणमें रखकर उसकी रक्षा करता था॥ ३२ ॥

सौ करोड़ वानरोंसे घिरे हुए केसरी और पनस— ये सेनाके एक (दक्षिण) भागकी तथा बहुत-से वानर सैनिकोंको साथ लिये गज और अर्क—ये उस वानर-सेनाके दूसरे (वाम) भागकी रक्षा करते थे॥ ३३ ॥

बहुसंख्यक भालुओंसे घिरे हुए सुषेण और जाम्बवान्—ये दोनों सुग्रीवको आगे करके सेनाके पिछले भागकी रक्षा कर रहे थे॥ ३४ ॥

उन सबके सेनापति कपिश्रेष्ठ वानरशिरोमणि वीरवर नील उस सेनाकी सब ओरसे रक्षा एवं नियन्त्रण कर रहे थे॥ ३५ ॥

दरीमुख, प्रजङ्घ, जम्भ और रभस—ये वीर सब ओरसे वानरोंको शीघ्र आगे बढ़नेकी प्रेरणा देते हुए चल रहे थे॥ ३६ ॥

इस प्रकार वे बलोन्मत्त कपि-केसरी वीर बराबर आगे बढ़ते गये। चलते-चलते उन्होंने पर्वतश्रेष्ठ सह्यगिरिको देखा, जिसके आस-पास और भी सैकड़ों पर्वत थे॥ ३७ ॥

रास्तेमें उन्हें बहुत-से सुन्दर सरोवर और तालाब दिखायी दिये, जिनमें मनोहर कमल खिले हुए थे। श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा थी कि रास्तेमें कोई किसी प्रकारका उपद्रव न करे। भयंकर कोपवाले श्रीरामचन्द्रजीके इस आदेशको जानकर समुद्रके जलप्रवाहकी भाँति अपार एवं भयंकर दिखायी देनेवाली वह विशाल वानरसेना भयभीत-सी होकर नगरोंके समीपवर्ती स्थानों और जनपदोंको दूरसे ही छोड़ती चली जा रही थी। विकट गर्जना करनेके कारण भयानक शब्दवाले समुद्रकी भाँति वह महाघोर जान पड़ती थी॥ ३८-३९१/२ ॥

वे सभी शूरवीर कपिकुञ्जर हाँके गये अच्छे घोड़ोंकी भाँति उछलते-कूदते हुए तुरंत ही दशरथनन्दन श्रीरामके पास पहुँच जाते थे॥ ४०१/२ ॥

हनुमान् और अंगद—इन दो वानर वीरोंद्वारा ढोये जाते हुए वे नरश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मण शुक्र और बृहस्पति—इन दो महाग्रहोंसे संयुक्त हुए चन्द्रमा और सूर्यके समान शोभा पा रहे थे॥ ४११/२ ॥

उस समय वानरराज सुग्रीव और लक्ष्मणसे सम्मानित हुए धर्मात्मा श्रीराम सेनासहित दक्षिण दिशाकी ओर बढ़े जा रहे थे॥ ४२१/२ ॥

लक्ष्मणजी अंगदके कंधेपर बैठे हुए थे। वे शकुनोंके द्वारा कार्यसिद्धिकी बात अच्छी तरह जान लेते थे। उन्होंने पूर्णकाम भगवान् श्रीरामसे मङ्गलमयी वाणीमें कहा— ॥ ४३१/२ ॥

‘रघुनन्दन! मुझे पृथ्वी और आकाशमें बहुत अच्छे-अच्छे शकुन दिखायी देते हैं। ये सब आपके मनोरथकी सिद्धिको सूचित करते हैं। इनसे निश्चय होता है कि आप शीघ्र ही रावणको मारकर हरी हुऽइ सीताजीको प्राप्त करेंगे और सफलमनोरथ होकर समृद्धिशालिनी अयोध्याको पधारेंगे॥ ४४-४५१/२ ॥

‘देखिये सेनाके पीछे शीतल, मन्द, हितकर और सुखमय समीर चल रहा है। ये पशु और पक्षी पूर्ण मधुर स्वरमें अपनी-अपनी बोली बोल रहे हैं। सब दिशाएँ प्रसन्न हैं। सूर्यदेव निर्मल दिखायी दे रहे हैं। भृगुनन्दन शुक्र भी अपनी उज्ज्वल प्रभासे प्रकाशित हो आपके पीछेकी दिशामें प्रकाशित हो रहे हैं। जहाँ सप्तर्षियोंका समुदाय शोभा पाता है, वह ध्रुवतारा भी निर्मल दिखायी देता है। शुद्ध और प्रकाशमान समस्त सप्तर्षिगण ध्रुवको अपने दाहिने रखकर उनकी परिक्रमा करते हैं॥ ४६—४८ ॥

‘हमारे साथ ही महामना इक्ष्वाकुवंशियोंके पितामह राजर्षि त्रिशंकु अपने पुरोहित वसिष्ठजीके साथ हमलोगोंके सामने ही निर्मल कान्तिसे प्रकाशित हो रहे हैं॥ ४९ ॥

‘हम महामनस्वी इक्ष्वाकुवंशियोंके लिये जो सबसे उत्तम है, वह विशाखा नामक युगल नक्षत्र निर्मल एवं उपद्रवशून्य (मंगल आदि दुष्ट ग्रहोंकी आक्रान्तिसे रहित) होकर प्रकाशित हो रहा है॥ ५० ॥

‘राक्षसोंका नक्षत्र मूल, जिसके देवता निर्ऋरुति हैं, अत्यन्त पीड़ित हो रहा है। उस मूलके नियामक धूमकेतुसे आक्रान्त होकर वह संतापका भागी हो रहा है॥ ५१ ॥

‘यह सब कुछ राक्षसोंके विनाशके लिये ही उपस्थित हुआ है; क्योंकि जो लोग कालपाशमें बँधे होते हैं, उन्हींका नक्षत्र समयानुसार ग्रहोंसे पीड़ित होता है॥

‘जल स्वच्छ और उत्तम रससे पूर्ण दिखायी देता है, जंगलोंमें पर्याप्त फल उपलब्ध होते हैं, सुगन्धित वायु अधिक तीव्रगतिसे नहीं बह रही है और वृक्षोंमें ऋतुओंके अनुसार फूल लगे हुए हैं॥ ५३ ॥

‘प्रभो! व्यूहबद्ध वानरी सेना बड़ी शोभासम्पन्न जान पड़ती है। तारकामय संग्रामके अवसरपर देवताओंकी सेनाएँ जिस तरह उत्साहसे सम्पन्न थीं, इसी प्रकार आज ये वानर-सेनाएँ भी हैं। आर्य! ऐसे शुभ लक्षण देखकर आपको प्रसन्न होना चाहिये’॥ ५४ ॥

अपने भाऽइ श्रीरामको आश्वासन देते हुए हर्षसे भरे सुमित्राकुमार लक्ष्मण जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय वानरोंकी सेना वहाँकी सारी भूमिको घेरकर आगे बढ़ने लगी॥ ५५ ॥