श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
‘अच्छा तो आज मैं राक्षसराजके भयको उखाड़ फेंरूकूँगा। महेन्द्र (पर्वत या इन्द्र)-को भी चीर डालूँगा और अग्निको भी ठंडा कर दूँगा॥ ६९॥
‘मुझ-जैसे पुरुषको किसी छोटे-मोटे कारणवश नींदसे नहीं जगाया जायगा। अतः तुमलोग ठीक-ठीक बताओ, मेरे जगाये जानेका क्या कारण है?’॥ ७०॥
शत्रुसूदन कुम्भकर्ण जब रोषमें भरकर इस प्रकार पूछने लगा, तब राजा रावणके सचिव यूपाक्षने हाथ जोड़कर कहा—॥ ७१॥
‘महाराज! हमें देवताओंकी ओरसे तो कभी कोऽइ भय हो ही नहीं सकता। इस समय केवल एक मनुष्यसे तुमुल भय प्राप्त हुआ है, जो हमें सता रहा है॥ ७२॥
‘राजन्! इस समय एक मनुष्यसे हमारे लिये जैसा भय उपस्थित हो गया है, वैसा तो कभी दैत्यों और दानवोंसे भी नहीं हुआ था॥ ७३॥
‘पर्वताकार वानरोंने आकर इस लङ्कापुरीको चारों ओरसे घेर लिया है। सीताहरणसे संतप्त हुए श्रीरामकी ओरसे हमें तुमुल भयकी प्राप्ति हुऽइ है॥ ७४॥
‘पहले एक ही वानरने यहाँ आकर इस महापुरीको जला दिया था और हाथियों तथा साथियोंसहित राजकुमार अक्षको भी मार डाला था॥ ७५॥
‘श्रीराम सूर्यके समान तेजस्वी हैं। उन्होंने देवशत्रु पुलस्त्यकुलनन्दन साक्षात् राक्षसराज रावणको भी युद्धमें हराकर जीवित छोड़ दिया और कहा—‘लङ्काको लौट जाओ’॥ ७६॥
‘महाराजकी जो दशा देवता, दैत्य और दानव भी नहीं कर सके थे, वह रामने कर दी। उनके प्राण बड़े संकटसे बचे हैं’॥ ७७॥
युद्धमें भाऽइकी पराजयसे सम्बन्ध रखनेवाली यूपाक्षकी यह बात सुनकर कुम्भकर्ण आँखें फाड़-फाड़कर देखने लगा और यूपाक्षसे इस प्रकार बोला—॥ ७८॥
‘यूपाक्ष! मैं अभी सारी वानरसेनाको तथा लक्ष्मणसहित रामको भी रणभूमिमें परास्त करके रावणका दर्शन करूँगा॥ ७९॥
‘आज वानरोंके मांस और रक्तसे राक्षसोंको तृप्त करूँगा और स्वयं भी राम और लक्ष्मणके खून पीऊँगा’॥ ८०॥
कुम्भकर्णके बढ़े हुए रोष-दोषसे युक्त अहङ्कारपूर्ण वचन सुनकर राक्षस-योद्धाओंमें प्रधान महोदरने हाथ जोड़कर यह बात कही—॥ ८१॥
‘महाबाहो! पहले चलकर महाराज रावणकी बात सुन लीजिये। फिर गुण-दोषका विचार करनेके पश्चात् युद्धमें शत्रुओंको परास्त कीजियेगा’॥ ८२ ॥
महोदरकी यह बात सुनकर राक्षसोंसे घिरा हुआ महातेजस्वी महाबली कुम्भकर्ण वहाँसे चलनेकी तैयारी करने लगा॥ ८३ ॥
इस तरह सोये हुए भयानक नेत्र, रूप और पराक्रमवाले कुम्भकर्णको उठाकर वे राक्षस शीघ्र ही दशमुख रावणके महलमें गये॥ ८४ ॥
दशग्रीव उत्तम सिंहासनपर बैठा हुआ था, उसके पास जा सभी निशाचर हाथ जोड़कर बोले— ॥ ८५ ॥
‘राक्षसेश्वर! आपके भाई कुम्भकर्ण जाग उठे हैं। कहिये, वे क्या करें? सीधे युद्धस्थलमें ही पधारें या आप उन्हें यहाँ उपस्थित देखना चाहते हैं?॥ ८६ ॥
तब रावणने बड़े हर्षके साथ उन उपस्थित हुए राक्षसोंसे कहा— ‘मैं कुम्भकर्णको यहाँ देखना चाहता हूँ, उनका यथोचित सत्कार किया जाय’॥ ८७ ॥
तब ‘जो आज्ञा’ कहकर रावणके भेजे हुए वे सब राक्षस पुनः कुम्भकर्णके पास आ इस प्रकार बोले— ॥
‘प्रभो! सर्वराक्षसशिरोमणि महाराज रावण आपको देखना चाहते हैं। अतः आप वहाँ चलनेका विचार करें और पधारकर अपने भाईका हर्ष बढ़ावें’॥ ८९ ॥
भाईका यह आदेश पाकर महापराक्रमी दुर्जय वीर कुम्भकर्ण ‘बहुत अच्छा’ कहकर शय्यासे उठकर खड़ा हो गया॥ ९० ॥
उसने बड़े हर्ष और प्रसन्नताके साथ मुँह धोकर स्नान किया और पीनेकी इच्छासे तुरंत बलवर्धक पेय ले आनेकी आज्ञा दी॥ ९१ ॥
तब रावणके आदेशसे वे सब राक्षस तुरंत मद्य तथा नाना प्रकारके भक्ष्य पदार्थ ले आये॥ ९२ ॥
कुम्भकर्ण दो हजार घड़े मद्य गटककर चलनेको उद्यत हुआ। इससे उसमें कुछ ताजगी आ गयी तथा वह मतवाला, तेजस्वी और शक्तिसम्पन्न हो गया॥ ९३ ॥
फिर जब राक्षसोंकी सेनाके साथ कुम्भकर्ण भाईके महलकी ओर चला, उस समय वह रोषसे भरे हुए प्रलयकालके विनाशकारी यमराजके समान जान पड़ता था। कुम्भकर्ण अपने
पैरोंकी धमकसे सारी पृथ्वीको कम्पित कर रहा था॥ ९४ ॥
जैसे सूर्यदेव अपनी किरणोंसे भूतलको प्रकाशित करते हैं, उसी प्रकार वह अपने तेजस्वी शरीरसे राजमार्गको उद्भासित करता हुआ हाथ जोड़े अपने भाईके महलमें गया। ठीक उसी तरह, जैसे देवराज इन्द्र ब्रह्माजीके धाममें जाते हैं॥ ९५ ॥
राजमार्गपर चलते समय शत्रुघाती कुम्भकर्ण पर्वतशिखरके समान जान पड़ता था। नगरके बाहर खड़े हुए वानर सहसा उस विशालकाय राक्षसको देखकर सेनापतियोंसहित सहम गये॥ ९६ ॥
उनमेंसे कुछ वानरोंने शरणागतवत्सल भगवान् श्रीरामकी शरण ली। कुछ व्यथित होकर गिर पड़े। कोई पीड़ित हो सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये और जहाँ-तहाँ धराशायी हो गये और कितने ही वानर भयसे पीड़ित हो धरतीपर लेट गये॥ ९७ ॥
वह पर्वतशिखरके समान ऊँचा था। उसके मस्तकपर मुकुट शोभा देता था। वह अपने तेजसे सूर्यका स्पर्श करता-सा जान पड़ता था। उस बढ़े हुए विशालकाय एवं अद्भुत राक्षसको देखकर सभी वनवासी वानर भयसे पीड़ित हो इधर-उधर भागने लगे॥ ९८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें साठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥
६० ॥
* उमाने कैलास उठानेके समय भयभीत होनेसे रावणको शाप दिया था कि ‘तेरी मृत्यु स्त्रीके कारण होगी।’ नन्दीश्वरकी वानरमूर्ति देखकर रावण हँसा था, इसलिये उन्होंने कहा था— ‘मेरे समान रूप और पराक्रमवाले ही तेरे कुलका नाश करेंगे।’ रम्भाके निमित्तसे नल-कूबरने और वरुण-कन्या पुञ्जिकस्थलाके निमित्तसे ब्रह्माजीने शाप दिया था कि ‘अनिच्छासे किसी स्त्रीके साथ सम्भोग करनेपर तेरी मृत्यु हो जायगी।’
इकसठवाँ सर्ग
इकसठवाँ सर्ग
विभीषणका श्रीरामसे कुम्भकर्णका परिचय देना और श्रीरामकी आज्ञासे वानरोंका युद्धके लिये लङ्काके द्वारोंपर डट जाना
तदनन्तर हाथमें धनुष लेकर बल-विक्रमसे सम्पन्न महातेजस्वी श्रीरामने किरीटधारी महाकाय राक्षस कुम्भकर्णको देखा॥ १ ॥
वह पर्वतके समान दिखायी देता था और राक्षसोंमें सबसे बड़ा था। जैसे पूर्वकालमें भगवान् नारायणने आकाशको नापनेके लिये डग भरे थे, उसी प्रकार वह भी डग बढ़ाता जा रहा था। सजल जलधरके समान काला कुम्भकर्ण सोनेके बाजूबन्दसे विभूषित था। उसे देखकर वानरोंकी वह विशाल सेना पुनः बड़े वेगसे भागने लगी॥ २-३ ॥
अपनी सेनाको भागते तथा राक्षस कुम्भकर्णको बढ़ते देख श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने विभीषणसे पूछा—॥ ४ ॥
‘यह लङ्कापुरीमें पर्वतके समान विशालकाय वीर कौन है, जिसके मस्तकपर किरीट शोभा पाता है और नेत्र भूरे हैं? यह ऐसा दिखायी देता है मानो बिजलीसहित मेघ हो॥ ५ ॥
‘इस भूतलपर यह एकमात्र महान् ध्वज-सा दृष्टिगोचर होता है। इसे देखकर सारे वानर इधर-उधर भाग चले हैं॥ ६ ॥
‘विभीषण! बताओ। यह इतने बड़े डील-डौलका कौन है? कोई राक्षस है या असुर? मैंने ऐसे प्राणीको पहले कभी नहीं देखा’॥ ७ ॥
अनायास ही बड़े-बड़े कर्म करनेवाले राजकुमार श्रीरामने जब इस प्रकार पूछा, तब परम बुद्धिमान् विभीषणने उन ककुत्स्थकुलभूषण रघुनाथजीसे इस प्रकार कहा—॥ ८ ॥
‘भगवन्! जिसने युद्धमें वैवस्वत यम और देवराज इन्द्रको भी पराजित किया था, वही यह विश्रवाका प्रतापी पुत्र कुम्भकर्ण है। इसके बराबर लंबा दूसरा कोई राक्षस नहीं है॥ ९ ॥
‘रघुनन्दन! इसने देवता, दानव, यक्ष, नाग, राक्षस, गन्धर्व, विद्याधर और किन्नरोंको सहस्रों बार युद्धमें मार भगाया है॥ १० ॥
‘इसके नेत्र बड़े भयंकर हैं। यह महाबली कुम्भकर्ण जब हाथमें शूल लेकर युद्धमें खड़ा हुआ, उस समय देवता भी इसे मारनेमें समर्थ न हो सके। यह कालरूप है, ऐसा समझकर वे सब-
के-सब मोहित हो गये थे॥
‘कुम्भकर्ण स्वभावसे ही तेजस्वी और महाबलवान् है। अन्य राक्षसपतियोंके पास जो बल है, वह वरदानसे प्राप्त हुआ है॥ १२ ॥
‘इस महाकाय राक्षसने जन्म लेते ही बाल्यावस्थामें भूखसे पीड़ित हो कऽइ सहस्र प्रजाजनोंको खा डाला था॥
‘जब सहस्रों प्रजाजन इसका आहार बनने लगे, तब भयसे पीड़ित हो वे सब-के-सब देवराज इन्द्रकी शरणमें गये और उन सबने उनके समक्ष अपना कष्ट निवेदन किया॥ १४ ॥
‘इससे वज्रधारी देवराज इन्द्रको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने अपने तीखे वज्रसे कुम्भकर्णको घायल कर दिया। इन्द्रके वज्रकी चोट खाकर यह महाकाय राक्षस क्षुब्ध हो उठा और रोषपूर्वक जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगा॥ १५ ॥
‘राक्षस कुम्भकर्णके बारंबार गर्जना करनेपर उसका भयंकर सिंहनाद सुनकर प्रजावर्गके लोग भयभीत हो और भी डर गये॥ १६ ॥
‘तदनन्तर कुपित हुए महाबली कुम्भकर्णने इन्द्रके ऐरावतके मुँहसे एक दाँत उखाड़ लिया और उसीसे देवेन्द्रकी छातीपर प्रहार किया॥ १७ ॥
‘कुम्भकर्णके प्रहारसे इन्द्र व्याकुल हो गये और उनके हृदयमें जलन होने लगी। यह देखकर सब देवता, ब्रह्मर्षि और दानव सहसा विषादमें डूब गये॥ १८ ॥
‘तत्पश्चात् इन्द्र उन प्रजाजनोंके साथ ब्रह्माजीके धाममें गये। वहाँ जाकर उन सबने प्रजापतिके समक्ष कुम्भकर्णकी दुष्टताका विस्तारपूर्वक वर्णन किया॥
‘इसके द्वारा प्रजाके भक्षण, देवताओंके धर्षण (तिरस्कार), ऋषियोंके आश्रमोंके विध्वंस तथा परायी स्त्रियोंके बारंबार हरण होनेकी भी बात बतायी॥ २० ॥
‘इन्द्रने कहा— ‘भगवन्! यदि यह नित्यप्रति इसी प्रकार प्रजाजनोंका भक्षण करता रहा तो थोड़े ही समयमें सारा संसार सूना हो जायगा’॥ २१ ॥
‘इन्द्रकी यह बात सुनकर सर्वलोकपितामह ब्रह्माने सब राक्षसोंको बुलाया और कुम्भकर्णसे भी भेंट की॥ २२ ॥
‘कुम्भकर्णको देखते ही स्वयम्भू प्रजापति थर्रा उठे। फिर अपनेको सँभालकर वे उस राक्षससे बोले—॥ २३ ॥
“कुम्भकर्ण! निश्चय ही इस जगत्का विनाश करनेके लिये ही विश्ववाने तुझे उत्पन्न किया है; अतः मैं शाप देता हूँ, आजसे तू मुर्देके समान सोता रहेगा' ॥
‘ब्रह्माजीके शापसे अभिभूत होकर वह रावणके सामने ही गिर पड़ा। इससे रावणको बड़ी घबराहट हुई और उसने कहा— ॥ २५ ॥
“प्रजापते! अपने द्वारा लगाया और बढ़ाया हुआ सुवर्णरूप फल देनेवाला वृक्ष फल देनेके समय नहीं काटा जाता है। यह आपका नाती है, इसे इस प्रकार शाप देना कदापि उचित नहीं है॥ २६ ॥
“आपकी बात कभी झूठी नहीं होती, इसलिये अब इसे सोना ही पड़ेगा, इसमें संशय नहीं है; परंतु आप इसके सोने और जागनेका कोई समय नियत कर दें' ॥ २७ ॥
‘रावणका यह कथन सुनकर स्वयम्भू ब्रह्माने कहा— ‘यह छः मासतक सोता रहेगा और एक दिन जगेगा॥ २८ ॥
“उस एक दिन ही यह वीर भूखा होकर पृथ्वीपर विचरेगा और प्रज्वलित अग्निके समान मुँह फैलाकर बहुत-से लोगोंको खा जायगा' ॥ २९ ॥
‘महाराज! इस समय आपत्तिमें पड़कर और आपके पराक्रमसे भयभीत होकर राजा रावणने कुम्भकर्णको जगाया है॥ ३० ॥
‘यह भयानक पराक्रमी वीर अपने शिविरसे निकला है और अत्यन्त कुपित हो वानरोंको खा जानेके लिये सब ओर दौड़ रहा है॥ ३१ ॥
‘जब कुम्भकर्णको देखकर ही आज सारे वानर भाग चले, तब रणभूमिमें कुपित हुए इस वीरको ये आगे बढ़नेसे कैसे रोक सकेंगे?॥ ३२ ॥
‘सब वानरोंसे यह कह दिया जाय कि यह कोई व्यक्ति नहीं, कायाद्वारा निर्मित ऊँचा यन्त्रमात्र है। ऐसा जानकर वानर निर्भय हो जायँगे' ॥ ३३ ॥
विभीषणके सुन्दर मुखसे निकली हुई यह युक्तियुक्त बात सुनकर श्रीरघुनाथजीने सेनापति नीलसे कहा— ॥
‘अग्निनन्दन! जाओ, समस्त सेनाओंकी मोर्चेबंदी करके युद्धके लिये तैयार रहो और लङ्काके द्वारों तथा राजमार्गोंपर अधिकार जमाकर वहीं डटे रहो॥ ३५ ॥
'पर्वतोंके शिखर, वृक्ष और शिलाएँ एकत्र कर लो तथा तुम और सब वानर अस्त्र-शस्त्र एवं पत्थर लिये तैयार रहो'॥ ३६ ॥
श्रीरघुनाथजीकी यह आज्ञा पाकर वानरसेनापति कपिश्रेष्ठ नीलने वानरसैनिकोंको यथोचित कार्यके लिये आदेश दिया॥ ३७ ॥
तदनन्तर गवाक्ष, शरभ, हनुमान् और अङ्गद आदि पर्वताकार वानर पर्वतशिखर लिये लङ्काके द्वारपर डट गये॥ ३८ ॥
विजयोल्लाससे सुशोभित होनेवाले वीर वानर श्रीरामचन्द्रजीकी पूर्वोक्त आज्ञा सुनकर वृक्षोंद्वारा शत्रुसेनाको पीड़ित करने लगे॥ ३९ ॥
तदनन्तर हाथोंमें शैल-शिखर और वृक्ष लिये वानरोंकी वह भयंकर सेना पर्वतके समीप घिरी हुई मेघोंकी बड़ी भारी उग्र घटाके समान सुशोभित होने लगी॥ ४० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें इकसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६१ ॥
बासठवाँ सर्ग
बासठवाँ सर्ग
कुम्भकर्णका रावणके भवनमें प्रवेश तथा रावणका रामसे भय बताकर उसे शत्रुसेनाके विनाशके लिये प्रेरित करना
महापराक्रमी राक्षसशिरोमणि कुम्भकर्ण निद्रा और मदसे व्याकुल हो अलसाया हुआ-सा शोभाशाली राजमार्गसे जा रहा था॥ १ ॥
वह परम दुर्जय वीर हजारों राक्षसोंसे घिरा हुआ यात्रा कर रहा था। सड़कके किनारेपर जो मकान थे, उनमेंसे उसके ऊपर फूल बरसाये जा रहे थे॥ २ ॥
उसने राक्षसराज रावणके रमणीय एवं विशाल भवनका दर्शन किया, जो सोनेकी जालीसे आच्छादित होनेके कारण सूर्यदेवके समान दीप्तिमान् दिखायी देता था॥ ३ ॥
जैसे सूर्य मेघोंकी घटामें छिप जायँ, उसी प्रकार कुम्भकर्णने राक्षसराजके महलमें प्रवेश किया और राजसिंहासनपर बैठे हुए अपने भाईको दूरसे ही देखा, मानो देवराज इन्द्रने दिव्य कमलासनपर विराजमान स्वयम्भू ब्रह्माका दर्शन किया हो॥ ४ ॥
राक्षसोंसहित कुम्भकर्ण अपने भाईके भवनमें जाते समय जब-जब एक-एक पैर आगे बढ़ाता था, तब-तब पृथ्वी काँप उठती थी॥ ५ ॥
भाईके भवनमें जाकर जब वह भीतरकी कक्षामें प्रविष्ट हुआ, तब उसने अपने बड़े भाईको उद्विग्न अवस्थामें पुष्पक विमानपर विराजमान देखा॥ ६ ॥
कुम्भकर्णको उपस्थित देख दशमुख रावण तुरंत उठकर खड़ा हो गया और बड़े हर्षके साथ उसे अपने समीप बुला लिया॥ ७ ॥
महाबली कुम्भकर्णने सिंहासनपर बैठे हुए अपने भाईके चरणोंमें प्रणाम किया और पूछा — ‘कौन-सा कार्य आ पड़ा है?’॥ ८ ॥
रावणने उछलकर बड़ी प्रसन्नताके साथ कुम्भकर्णको हृदयसे लगा लिया। भाई रावणने उसका आलिंगन करके यथावत्रूपसे अभिनन्दन किया॥ ९ ॥
इसके बाद कुम्भकर्ण सुन्दर दिव्य सिंहासनपर बैठा। उस आसनपर बैठकर महाबली कुम्भकर्णने क्रोधसे लाल आँखें किये रावणसे पूछा— ॥ १० १/२ ॥
'राजन्! किसलिये तुमने बड़े आदरके साथ मुझे जगाया है? बताओ,यहाँ तुम्हें किससे भय प्राप्त हुआ है? अथवा कौन परलोकका पथिक होनेवाला है?'॥ ११ १/२ ॥
तब रावण अपने पास बैठे हुए कुपित भार्इ कुम्भकर्णसे रोषसे चञ्चल आँखें किये बोला—॥ १२ १/२ ॥
'महाबली वीर! तुम्हारे सोये-सोये दीर्घकाल व्यतीत हो गया। तुम गाढ़ निद्रामें निमग्न होनेके कारण नहीं जानते कि मुझे रामसे भय प्राप्त हुआ है॥ १३ १/२ ॥
'ये दशरथकुमार बलवान् श्रीमान् राम सुग्रीवके साथ समुद्र लाँघकर यहाँ आये हैं और हमारे कुलका विनाश कर रहे हैं॥ १४ १/२ ॥
'हाय! देखो तो सही, समुद्रमें पुल बाँधकर सुखपूर्वक यहाँ आये हुए वानरोंने लङ्काके समस्त वनों और उपवनोंको एकार्णवमय बना दिया है—यहाँ वानररूपी जलका समुद्र-सा लहरा रहा है॥ १५ १/२ ॥
'हमारे जो मुख्य-मुख्य राक्षस वीर थे, उन्हें वानरोंने युद्धमें मार डाला; किंतु रणभूमिमें वानरोंका संहार होता मुझे किसी तरह नहीं दिखायी देता। युद्धमें कभी कोर्इ वानर पहले जीते नहीं गये हैं॥ १६-१७ ॥
'महाबली वीर! इस समय हमारे ऊपर यही भय उपस्थित हुआ है। तुम इससे हमारी रक्षा करो और आज इन वानरोंको नष्ट कर दो। इसीलिये हमने तुम्हें जगाया है॥ १८ ॥
'हमारा सारा खजाना खाली हो गया है; अतः मुझपर अनुग्रह करके तुम इस लङ्कापुरीकी रक्षा करो; अब यहाँ केवल बालक और वृद्ध ही शेष रह गये हैं॥ १९ ॥
'महाबाहो! तुम अपने इस भार्इके लिये अत्यन्त दुष्कर पराक्रम करो। परंतप! आजसे पहले कभी किसी भार्इसे मैंने ऐसी अनुनय-विनय नहीं की थी॥ २० ॥
'तुम्हारे ऊपर मेरा बड़ा स्नेह है और मुझे तुमसे बड़ी आशा है। राक्षसशिरोमणे! तुमने देवासुर-संग्रामके अवसरोंपर अनेक बार प्रतिद्वन्द्वीका स्थान लेकर रणभूमिमें देवताओं और असुरोंको भी परास्त किया है॥
'अतः भयंकर पराक्रमी वीर! तुम्हीं यह सारा पराक्रमपूर्ण कार्य सम्पन्न करो; क्योंकि समस्त प्राणियोंमें तुम्हारे समान बलवान् मुझे दूसरा कोर्इ नहीं दिखायी देता है॥ २३ ॥
‘तुम युद्धप्रेमी तो हो ही, अपने बन्धु-बान्धवोंसे भी बड़ा प्रेम रखते हो। इस समय तुम मेरा यही प्रिय और उत्तम हित करो। अपने तेजसे शत्रुओंकी सेनाको उसी तरह व्यथित कर दो, जैसे वेगसे उठी हुई प्रचण्ड वायु शरद्-ऋतुके बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है’॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें बासठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६२ ॥
तिरसठवाँ सर्ग
तिरसठवाँ सर्ग
कुम्भकर्णका रावणको उसके कुकृत्योंके लिये उपालम्भ देना और उसे धैर्य बँधाते हुए युद्धविषयक उत्साह प्रकट करना
राक्षसराज रावणका यह विलाप सुनकर कुम्भकर्ण ठहाका मारकर हँसने लगा और इस प्रकार बोला— ॥
‘भाईसाहब! पहले (विभीषण आदिके साथ) विचार करते समय हमलोगोंने जो दोष देखा था, वही तुम्हें इस समय प्राप्त हुआ है; क्योंकि तुमने हितैषी पुरुषों और उनकी बातोंपर विश्वास नहीं किया था॥ २ ॥
‘तुम्हें शीघ्र ही अपने पापकर्मका फल मिल गया। जैसे कुकर्मी पुरुषोंका नरकोंमें पड़ना निश्चित है, उसी प्रकार तुम्हें भी अपने दुष्कर्मका फल मिलना अवश्यम्भावी था॥ ३ ॥
‘महाराज! केवल बलके घमंडसे तुमने पहले इस पापकर्मकी कोई परवा नहीं की। इसके परिणामका कुछ भी विचार नहीं किया था॥ ४ ॥
‘जो ऐश्वर्यके अभिमानमें आकर पहले करनेयोग्य कार्योंको पीछे करता है और पीछे करनेयोग्य कार्योंको पहले कर डालता है, वह नीति तथा अनीतिको नहीं जानता है॥ ५ ॥
‘जो कार्य उचित देश-काल न होनेपर विपरीत स्थितिमें किये जाते हैं, वे संस्कारहीन अग्नियोंमें होमे गये हविष्यकी भाँति केवल दुःखके ही कारण होते हैं॥ ६ ॥
‘जो राजा सचिवोंके साथ विचार करके क्षय, वृद्धि और स्थानरूपसे उपलक्षित साम, दान और दण्ड—इन तीनों कर्मोंके पाँच^१ प्रकारके प्रयोगको काममें लाता है, वही उत्तम नीति-मार्गपर विद्यमान है, ऐसा समझना चाहिये॥ ७ ॥
‘जो नरेश नीतिशास्त्रके अनुसार मन्त्रियोंके साथ क्षय^२ आदिके लिये उपयुक्त समयका विचार करके तदनुरूप कार्य करता है और अपनी बुद्धिसे सुहृदोंकी भी पहचान कर लेता है, वही कर्तव्य और अकर्तव्यका विवेक कर पाता है॥ ८ ॥
‘राक्षसराज! नीतिज्ञ पुरुषको चाहिये कि धर्म, अर्थ या कामका अथवा सबका अपने समयपर सेवन करे अथवा तीनों द्वन्द्वोंका—धर्म-अर्थ, अर्थ-धर्म और काम-अर्थ इन सबका भी उपयुक्त समयमें ही सेवन करे^३॥
‘धर्म, अर्थ और काम—इन तीनोंमें धर्म ही श्रेष्ठ है; अतः विशेष अवसरोंपर अर्थ और कामकी उपेक्षा करके भी धर्मका ही सेवन करना चाहिये—इस बातको विश्वसनीय पुरुषोंसे सुनकर भी जो राजा या राजपुरुष नहीं समझता अथवा समझकर भी स्वीकार नहीं करता, उसका अनेक शास्त्रोंका अध्ययन व्यर्थ ही है॥ १० ॥
‘राक्षसशिरोमणे! जो मनस्वी राजा मन्त्रियोंसे अच्छी तरह सलाह करके समयके अनुसार दान, भेद और पराक्रमका, इनके पूर्वोक्त पाँच प्रकारके योगका, नय और अनयका तथा ठीक समयपर धर्म, अर्थ और कामका सेवन करता है, वह इस लोकमें कभी दुःख या विपत्तिका भागी नहीं होता॥ ११-१२ ॥
‘राजाको चाहिये कि वह अर्थतत्त्वज्ञ एवं बुद्धिजीवी मन्त्रियोंकी सलाह लेकर जो अपने लिये परिणाममें हितकर दिखायी देता हो, वही कार्य करे॥ १३ ॥
‘जो पशुके समान बुद्धिवाले किसी तरह मन्त्रियोंके भीतर सम्मिलित कर लिये गये हैं, वे शास्त्रके अर्थको तो जानते नहीं, केवल धृष्टतावश बातें बनाना चाहते हैं॥ १४ ॥
‘शास्त्रके ज्ञानसे शून्य और अर्थशास्त्रसे अनभिज्ञ होते हुए भी प्रचुर सम्पत्ति चाहनेवाले उन अयोग्य मन्त्रियोंकी कही हुई बात कभी नहीं माननी चाहिये॥
‘जो लोग धृष्टताके कारण अहितकर बातको हितका रूप देकर कहते हैं, वे निश्चय ही सलाह लेनेयोग्य नहीं हैं। अतः उन्हें इस कार्यसे अलग कर देना चाहिये। वे तो काम बिगाड़नेवाले ही होते हैं॥ १६ ॥
‘कुछ बुरे मन्त्री साम आदि उपायोंके ज्ञाता शत्रुओंके साथ मिल जाते हैं और अपने स्वामीका विनाश करनेके लिये ही उससे विपरीत कर्म करवाते हैं॥ १७ ॥
‘जब किसी वस्तु या कार्यके निश्चयके लिये मन्त्रियोंकी सलाह ली जा रही हो, उस समय राजा व्यवहारके द्वारा ही उन मन्त्रियोंको पहचाननेका प्रयत्न करे, जो घूस आदि लेकर शत्रुओंसे मिल गये हैं और अपने मित्र-से बने रहकर वास्तवमें शत्रुंका काम करते हैं॥
‘जो राजा चंचल है—आपातरमणीय वचनोंको सुनकर ही संतुष्ट हो जाता है और सहसा बिना सोचे-विचारे ही किसी भी कार्यकी ओर दौड़ पड़ता है, उसके इस छिद्र (दुर्बलता)-को शत्रुलोग उसी तरह ताड़ जाते हैं, जैसे क्रौंच पर्वतके छेदको पक्षी। (क्रौंचपर्वतके छेदसे होकर पक्षी जैसे पर्वतके उस पार आते-जाते हैं, उसी तरह शत्रु भी राजाके उस छिद्र या कमजोरीसे लाभ उठाते हैं)॥ १९ ॥
‘जो राजा शत्रुकि अवहेलना करके अपनी रक्षाका प्रबन्ध नहीं करता है, वह अनेक अनर्थोंका भागी होता और अपने स्थान (राज्य)-से नीचे उतार दिया जाता है॥
‘तुम्हारी प्रिय पत्नी मन्दोदरी और मेरे छोटे भाई विभीषणने पहले तुमसे जो कुछ कहा था, वही हमारे लिये हितकर था। यों तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करो’॥
कुम्भकर्णकी यह बात सुनकर दशमुख रावणने भौंहें टेढ़ी कर लीं और कुपित होकर उससे कहा—॥ २२ ॥
‘तुम माननीय गुरु और आचार्यकी भाँति मुझे उपदेश क्यों दे रहे हो? इस तरह भाषण देनेका परिश्रम करनेसे क्या लाभ होगा? इस समय जो उचित और आवश्यक हो, वह काम करो॥ २३ ॥
‘मैंने भ्रमसे, चितके मोहसे अथवा अपने बल-पराक्रमके भरोसे पहले जो तुमलोगोंकी बात नहीं मानी थी, उसकी इस समय पुनः चर्चा करना व्यर्थ है॥ २४ ॥
‘जो बात बीत गयी, सो तो बीत ही गयी। बुद्धिमान् लोग बीती बातके लिये बारंबार शोक नहीं करते हैं। अब इस समय हमें क्या करना चाहिये, इसका विचार करो। अपने पराक्रमसे मेरे अनीतिजनित दुःखको शान्त कर दो॥ २५ १/२ ॥
‘यदि मुझपर तुम्हारा स्नेह है, यदि अपने भीतर यथेष्ट पराक्रम समझते हो और यदि मेरे इस कार्यको परम कर्तव्य समझकर हृदयमें स्थान देते हो तो युद्ध करो॥
‘वही सुहृद् है, जो सारा कार्य नष्ट हो जानेसे दुःखी हुए स्वजनपर अकारण अनुग्रह करता है तथा वही बन्धु है, जो अनीतिके मार्गपर चलनेसे संकटमें पड़े हुए पुरुषोंकी सहायता करता है’॥ २७ १/२ ॥
रावणको इस प्रकार धीर एवं दारुण वचन बोलते देख उसे रुष्ट समझकर कुम्भकर्ण धीरे-धीरे मधुर वाणीमें कुछ कहनेको उद्यत हुआ॥ २८ १/२ ॥
उसने देखा मेरे भाईकी सारी इन्द्रियाँ अत्यन्त विक्षुब्ध हो उठी हैं; अतः कुम्भकर्णने धीरे-धीरे उसे सान्त्वना देते हुए कहा—॥ २९ १/२ ॥
‘शत्रुदमन महाराज! सावधान होकर मेरी बात सुनो। राक्षसराज! संताप करना व्यर्थ है। अब तुम्हें रोष त्यागकर स्वस्थ हो जाना चाहिये॥ ३०-३१ ॥
‘पृथ्वीनाथ! मेरे जीते-जी तुम्हें मनमें ऐसा भाव नहीं लाना चाहिये। तुम्हें जिसके कारण संतप्त होना पड़ रहा है, उसे मैं नष्ट कर दूँगा॥ ३२ ॥
‘महाराज! अवश्य ही सब अवस्थाओंमें मुझे तुम्हारे हितकी बात कहनी चाहिये। अतः मैंने बन्धुभाव और भ्रातृ-स्नेहके कारण ही ये बातें कही हैं॥ ३३ ॥
‘इस समय एक भाईको स्नेहवश जो कुछ करना उचित है, वही करूँगा। अब रणभूमिमें मेरे द्वारा किया जानेवाला शत्रुओंका संहार देखो॥ ३४ ॥
‘महाबाहो! आज युद्धके मुहानेपर मेरे द्वारा भाईसहित रामके मारे जानेके पश्चात् तुम देखोगे कि वानरोंकी सेना किस तरह भागी जा रही है॥ ३५ ॥
‘महाबाहो! आज मैं संग्रामभूमिमें रामका सिर काट लाऊँगा। उसे देखकर तुम सुखी होना और सीता दुःखमें डूब जायगी॥ ३६ ॥
‘लङ्कामें जिन राक्षसोंके सगे-सम्बन्धी मारे गये हैं, वे भी आज रामकी मृत्यु देख लें। यह उनके लिये बहुत ही प्रिय बात होगी॥ ३७ ॥
‘अपने भाई-बन्धुओंके मारे जानेसे जो लोग अत्यन्त शोकमें डूबे हुए हैं, आज युद्धमें शत्रुका नाश करके मैं उनके आँसू पोंछूँगा॥ ३८ ॥
‘आज पर्वतके समान विशालकाय वानरराज सुग्रीवको समराङ्गणमें खूनसे लथपथ होकर गिरे हुए देखोगे, जो सूर्यसहित मेघके समान दृष्टिगोचर होंगे॥
‘निष्पाप निशाचरराज! ये राक्षस तथा मैं—सब लोग दशरथपुत्र रामको मार डालनेकी इच्छा रखते हैं और तुम्हें इस बातके लिये आश्वासन देते हैं तो भी तुम सदा व्यथित क्यों रहते हो?॥ ४० ॥
‘राक्षसराज! पहले मेरा वध करके ही राम तुम्हें मार सकेंगे; किंतु मैं अपने विषयमें रामसे संताप या भय नहीं मानता॥ ४१ ॥
‘शत्रुओंको संताप देनेवाले अनुपम पराक्रमी वीर! इस समय तुम इच्छानुसार मुझे युद्धके लिये आदेश दो। शत्रुओंसे जूझनेके लिये तुम्हें दूसरे किसीकी ओर देखनेकी आवश्यकता नहीं है॥ ४२ ॥
‘तुम्हारे महाबली शत्रु यदि इन्द्र, यम, अग्नि, वायु, कुबेर और वरुण भी हों तो मैं उनसे भी युद्ध करूँगा तथा उन सबको उखाड़ फेंकूँगा॥ ४३ १/२ ॥
‘मेरा पर्वतके समान विशाल शरीर है। मैं हाथमें तीखा त्रिशूल धारण करता हूँ और मेरी दाढ़ें भी बहुत तीखी हैं। मेरे सिंहनाद करनेपर इन्द्र भी भयसे थर्रा उठेंगे॥ ४४ १/२ ॥
‘अथवा यदि मैं शस्त्र त्याग करके भी वेगपूर्वक शत्रुओंको रौंदता हुआ रणभूमिमें विचरने लगूँ तो कोऽइ भी जीवित रहनेकी इच्छावाला पुरुष मेरे सामने नहीं ठहर सकता॥ ४५ १/२ ॥
‘मैं न तो शक्तिसे, न गदासे, न तलवारसे और न पैने बाणोंसे ही काम लूँगा। रोषसे भरकर केवल दोनों हाथोंसे ही वज्रधारी इन्द्र-जैसे शत्रुको भी मौतके घाट उतार दूँगा॥ ४६ १/२ ॥
‘यदि राम आज मेरी मुट्ठीका वेग सह लेंगे तो मेरे बाणसमूह अवश्य ही उनका रक्त पान करेंगे॥ ४७ १/२ ॥
‘राजन्! मेरे रहते हुए तुम किसलिये चिन्ताकी आगसे झुलस रहे हो? मैं तुम्हारे शत्रुओंका विनाश करनेके लिये अभी रणभूमिमें जानेको उद्यत हूँ॥ ४८ १/२ ॥
‘तुम्हें रामसे जो घोर भय हो रहा है, उसे त्याग दो। मैं रणभूमिमें राम, लक्ष्मण और महाबली सुग्रीवको अवश्य मार डालूँगा॥ ४९ १/२ ॥
‘युद्ध उपस्थित होनेपर मैं राक्षसोंका संहार करनेवाले उस हनुमान्को भी जीवित नहीं छोड़ूँगा, जिसने लङ्का जलायी थी। साथ ही अन्य वानरोंको भी खा जाऊँगा। आज मैं तुम्हें अलौकिक एवं महान् यश प्रदान करना चाहता हूँ॥ ५०-५१ ॥
‘राजन्! यदि तुम्हें इन्द्र अथवा स्वयम्भू ब्रह्मासे भी भय है तो मैं उस भयको भी उसी तरह नष्ट कर दूँगा, जैसे सूर्य रात्रिके अन्धकारको॥ ५२ ॥
‘मेरे कुपित होनेपर देवता भी धराशायी हो जायँगे। (फिर मनुष्यों और वानरोंकी तो बात ही क्या है?) मैं यमराजको भी शान्त कर दूँगा। सर्वभक्षी अग्निका भी भक्षण कर जाऊँगा॥ ५३ ॥
‘नक्षत्रोंसहित सूर्यको भी पृथ्वीपर मार गिराऊँगा, इन्द्रका भी वध कर डालूँगा और समुद्रको भी पी जाऊँगा॥ ५४ ॥
‘पर्वतोंको चूर-चूर कर दूँगा। भूमण्डलको विदीर्ण कर डालूँगा। आज मेरे द्वारा खाये जानेवाले सब प्राणी दीर्घकालतक सोकर उठे हुए मुझ कुम्भकर्णका पराक्रम देखें। यह सारी त्रिलोकी आहार बन जाय तो भी मेरा पेट नहीं भर सकता॥ ५५-५६ ॥
‘दशरथकुमार श्रीरामका वध करके मैं तुम्हें उत्तरोत्तर सुखकी प्राप्ति करानेवाले सुख-सौभाग्यको देना चाहता हूँ। लक्ष्मणसहित रामका वध करके सभी प्रधान-प्रधान वानरयूथपतियोंको खा जाऊँगा॥ ५७॥
‘राजन्! अब मौज करो, मदिरा पीओ और मानसिक दुःखको दूर करके सब कार्य करो। आज मेरे द्वारा राम यमलोक पहुँचा दिये जायँगे; फिर तो सीता चिरकाल (सदा)-के लिये तुम्हारे अधीन हो जायगी’॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६३ ॥
१. कार्यको आरम्भ करनेका उपाय, पुरुष और द्रव्यरूप सम्पत्ति, देश-कालका विभाग, विपत्तिको टालनेका उपाय और कार्यकी सिद्धि—ये पाँच प्रकारके योग हैं।
२. जब अपनी वृद्धि और शत्रुकि हानिका समय हो तब दण्डोपयोगी यान (युद्धयात्रा) उचित है। अपनी और शत्रुकि समान स्थिति हो तो सामपूर्वक संधि कर लेना उचित है। तथा जब अपनी हानि और शत्रुकि वृद्धिका समय हो, तब उसे कुछ देकर उसका आश्रय ग्रहण करना उचित होता है।
३. यहाँ यह बात कही गयी है कि शास्त्रके अनुसार प्रातःकाल धर्मका, मध्याह्नकालमें अर्थका और रात्रिमें कामसेवनका विधान है; अतः उन-उन समयोंमें धर्म आदिका सेवन करना चाहिये अथवा प्रातःकालमें धर्म और अर्थरूप द्वन्द्वका, मध्याह्नकालमें अर्थ और धर्मका और रात्रिमें काम और अर्थका सेवन करे। जो हर समय केवल कामका ही सेवन करता हे, वह पुरुषोंमें अधम कोटिका है।
चौंसठवाँ सर्ग
चौंसठवाँ सर्ग
महोदरका कुम्भकर्णके प्रति आक्षेप करके रावणको बिना युद्धके ही अभीष्ट वस्तुकी प्राप्तिका उपाय बताना
अपनी भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले विशालकाय एवं बलवान् राक्षस कुम्भकर्णका यह वचन सुनकर महोदरने कहा—॥ १ ॥
‘कुम्भकर्ण! तुम उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए हो; परंतु तुम्हारी दृष्टि (बुद्धि) निम्नश्रेणीके लोगोंके समान है। तुम ढीठ और घमंडी हो, इसलिये सभी विषयोंमें क्या कर्तव्य है—इस बातको नहीं जान सकते॥ २ ॥
‘कुम्भकर्ण! हमारे महाराज नीति और अनीतिको नहीं जानते हैं, ऐसी बात नहीं है। तुम केवल अपने बचपनके कारण धृष्टतापूर्वक इस तरहकी बातें कहना चाहते हो॥ ३ ॥
‘राक्षसशिरोमणि रावण देश-कालके लिये उचित कर्तव्यको जानते हैं और अपने तथा शत्रुपक्षके स्थान, वृद्धि एवं क्षयको अच्छी तरह समझते हैं॥ ४ ॥
‘जिसने वृद्ध पुरुषोंकी उपासना या सत्संग नहीं किया है और जिसकी बुद्धि गँवारोंके समान है, ऐसा बलवान् पुरुष भी जिस कर्मको नहीं कर सकता—जिसे अनुचित समझता है, वैसे कर्मको कोर्इ बुद्धिमान् पुरुष कैसे कर सकता है ?॥ ५ ॥
‘जिन अर्थ, धर्म और कामको तुम पृथक्-पृथक् आश्रयवाले बता रहे हो, उन्हें ठीक-ठीक समझनेकी तुम्हारे भीतर शक्ति ही नहीं है॥ ६ ॥
‘सुखके साधनभूत जो त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ एवं काम) हैं, उन सबका एकमात्र कर्म ही प्रयोजक है (क्योंकि जो कर्मानुष्ठानसे रहित है, उसका धर्म, अर्थ अथवा काम—कोर्इ भी पुरुषार्थ सफल नहीं होता)। इसी तरह एक पुरुषके प्रयत्नसे सिद्ध होनेवाले सभी शुभाशुभ व्यापारोंका फल यहाँ एक ही कर्ताको प्राप्त होता है (इस प्रकार जब परस्पर विरुद्ध होनेपर भी धर्म और कामका अनुष्ठान एक ही पुरुषके द्वारा होता देखा जाता है, तब तुम्हारा यह कहना कि केवल धर्मका ही अनुष्ठान करना चाहिये, धर्मविरोधी कामका नहीं, कैसे संगत हो सकता है?)॥ ७ ॥
‘निष्कामभावसे किये गये धर्म (जप, ध्यान आदि) और अर्थ (धनसाध्य यज्ञ, दान आदि) —ये चित्तशुद्धिके द्वारा यद्यपि निःश्रेयस (मोक्ष)-रूप फलकी प्राप्ति करानेवाले हैं तथापि कामना-विशेषसे स्वर्ग एवं अभ्युदय आदि अन्य फलोंकी भी प्राप्ति कराते हैं। पूर्वोक्त जपादिरूप या क्रियामय नित्य-धर्मका लोप होनेपर अधर्म और अनर्थ प्राप्त होते हैं और उनके रहते हुए प्रत्यवायजनित फल भोगना पड़ता है (परंतु काम्य-कर्म न करनेसे प्रत्यवाय नहीं होता, यह धर्म और अर्थकी अपेक्षा कामकी विशेषता है)॥ ८ ॥
‘जीवोंको धर्म और अधर्मके फल इस लोक और परलोकमें भी भोगने पड़ते हैं। परंतु जो कामनाविशे ोषके उद्देश्यसे यत्नपूर्वक कर्मोंका अनुष्ठान करता है, उसे यहाँ भी उसके सुख-मनोरथकी प्राप्ति हो जाती है। धर्म आदिके फलकी भाँति उसके लिये कालान्तर या लोकान्तरकी अपेक्षा नहीं होती है (इस तरह काम धर्म और अर्थसे विलक्षण सिद्ध होता है)॥ ९ ॥
‘यहाँ राजाके लिये कामरूपी पुरुषार्थका सेवन उचित है ही*। ऐसा ही राक्षसराजने अपने हृदयमें निश्चित किया है और यही हम मन्त्रियोंकी भी सम्मति है। शत्रुके प्रति साहसपूर्ण कार्य करना कौन-सी अनीति है (अतः इन्होंने जो कुछ किया है, उचित ही किया है)॥ १० ॥
‘तुमने युद्धके लिये अकेले अपने ही प्रस्थान करनेके विषयमें जो हेतु दिया है (अपने महान् बलके द्वारा शत्रुको परास्त कर देनेकी जो घोषणा की है) उसमें भी जो असंगत एवं अनुचित बात कही गयी है, उसे मैं तुम्हारे सामने रखता हूँ॥ ११ ॥
‘जिन्होंने पहले जनस्थानमें बहुत-से अत्यन्त बलशाली राक्षसोंको मार डाला था, उन्हीं रघुवंशी वीर श्रीरामको तुम अकेले ही कैसे परास्त करोगे?॥ १२ ॥
‘जनस्थानमें श्रीरामने पहले जिन महान् बलशाली निशाचरोंको मार भगाया था, वे आज भी इस लङ्कापुरीमें विद्यमान हैं और उनका वह भय अबतक दूर नहीं हुआ है। क्या तुम उन राक्षसोंको नहीं देखते हो?॥ १३ ॥
‘दशरथकुमार श्रीराम अत्यन्त कुपित हुए सिंहके समान पराक्रमी एवं भयंकर हैं, क्या तुम उनसे भिड़नेका साहस करते हो? क्या जान-बूझकर सोये हुए सर्पको जगाना चाहते हो? तुम्हारी मूर्खतापर आश्चर्य होता है!॥ १४ ॥
‘श्रीराम सदा ही अपने तेजसे देदीप्यमान हैं। वे क्रोध करनेपर अत्यन्त दुर्जय और मृत्युके समान असह्य हो उठते हैं। भला कौन योद्धा उनका सामना कर सकता है?॥ १५ ॥
‘हमारी यह सारी सेना भी यदि उस अजेय शत्रु का सामना करनेके लिये खड़ी हो तो उसका जीवन भी संशयमें पड़ सकता है। अतः तात! युद्धके लिये तुम्हारा अकेले जाना मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगता है॥ १६॥
‘जो सहायकोंसे सम्पन्न और प्राणोंकी बाजी लगाकर शत्रुओंका संहार करनेके लिये निश्चित विचार रखनेवाला हो, ऐसे शत्रुको अत्यन्त साधारण मानकर कौन असहाय योद्धा वशमें लानेकी इच्छा कर सकता है?॥
‘राक्षसशिरोमणे! मनुष्योंमें जिनकी समता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है तथा जो इन्द्र और सूर्यके समान तेजस्वी हैं, उन श्रीरामके साथ युद्ध करनेका हौसला तुम्हें कैसे हो रहा है?’॥ १८॥
रोषके आवेशसे युक्त कुम्भकर्णसे ऐसा कहकर महोदरने समस्त राक्षसोंके बीचमें बैठे हुए लोकोंको रुलानेवाले रावणसे कहा—॥ १९॥
‘महाराज! आप विदेहकुमारीको अपने सामने पाकर भी किसलिये विलम्ब कर रहे हैं? आप जब चाहें तभी सीता आपके वशमें हो जायगी॥ २०॥
‘राक्षसराज! मुझे एक ऐसा उपाय सूझा है, जो सीताको आपकी सेवामें उपस्थित करके ही रहेगा। आप उसे सुनिये। सुनकर अपनी बुद्धिसे उसपर विचार कीजिये और ठीक जँचे तो उसे काममें लाइये॥ २१॥
‘आप नगरमें यह घोषित करा दें कि महोदर, द्विजह्व, संह्लादी, कुम्भकर्ण और वितर्दन—ये पाँच राक्षस रामका वध करनेके लिये जा रहे हैं॥ २२॥
‘हमलोग रणभूमिमें जाकर प्रयत्नपूर्वक श्रीरामके साथ युद्ध करेंगे। यदि आपके शत्रुओंपर हम विजय पा गये तो हमारे लिये सीताको वशमें करनेके निमित्त दूसरे किसी उपायकी आवश्यकता ही नहीं रह जायगी॥ २३॥
‘यदि हमारा शत्रु अजेय होनेके कारण जीवित ही रह गया और हम भी युद्ध करते-करते मारे नहीं गये तो हम उस उपायको काममें लायेंगे, जिसे हमने मनसे सोचकर निश्चित किया है॥ २४॥
रामनामसे अङ्कित बाणोंद्वारा अपने शरीरको घायल कराकर खूनसे लथपथ हो हम यह कहते हुए युद्धभूमिसे यहाँ लौटेंगे कि हमने राम और लक्ष्मणको खा लिया है। उस समय हम
आपके पैर पकड़कर यह भी कहेंगे कि हमने शत्रुको मारा है। इसलिये आप हमारी इच्छा पूरी कीजिये॥ २५-२६ ॥
‘पृथ्वीनाथ! तब आप हाथीकी पीठपर किसीको बिठाकर सारे नगरमें यह घोषणा करा दें कि भाई और सेनाके सहित राम मारा गया॥ २७ ॥
‘शत्रुदमन! इतना ही नहीं, आप प्रसन्नता दिखाते हुए अपने वीर सेवकोंको उनकी अभीष्ट वस्तुएँ, तरहतर हकी भोग-सामग्रियाँ, दास-दासी आदि, धन-रत्न, आभूषण, वस्त्र और अनुलेपन दिलावें। अन्य योद्धाओंको भी बहुत-से उपहार दें तथा स्वयं भी खुशी मनाते हुए मद्यपान करें॥ २८-२९ ॥
‘तदनन्तर जब लोगोंमें सब ओर यह चर्चा फैल जाय कि राम अपने सुहृदोंसहित राक्षसोंके आहार बन गये और सीताके कानोंमें भी यह बात पड़ जाय, तब आप सीताको समझानेके लिये एकान्तमें उसके वासस्थानपर जायें और तरह-तरहसे धीरज बँधाकर उसे धन-धान्य, भाँति-भाँतिके भोग और रत्न आदिका लोभ दिखावें॥
‘राजन्! इस प्रवञ्चनासे अपनेको अनाथ माननेवाली सीताका शोक और भी बढ़ जायगा और वह इच्छा न होनेपर भी आपके अधीन हो जायगी॥ ३२ ॥
‘अपने रमणीय पतिको विनष्ट हुआ जान वह निराशा तथा नारी-सुलभ चपलताके कारण आपके वशमें आ जायगी॥ ३३ ॥
‘वह पहले सुखमें पली हुई है और सुख भोगनेके योग्य है; परंतु इन दिनों दुःखसे दुर्बल हो गयी है। ऐसी दशामें अब आपके ही अधीन अपना सुख समझकर सर्वथा आपकी सेवामें आ जायगी॥ ३४ ॥
‘मेरे देखनेमें यही सबसे सुन्दर नीति है। युद्धमें तो श्रीरामका दर्शन करते ही आपको अनर्थ (मृत्यु)-की प्राप्ति हो सकती है; अतः आप युद्धस्थलमें जानेके लिये उत्सुक न हों, यहीं आपके अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि हो जायगी। बिना युद्धके ही आपको सुखका महान् लाभ होगा॥ ३५ ॥
‘महाराज! जो राजा बिना युद्धके ही शत्रुपर विजय पाता है, उसकी सेना नष्ट नहीं होती। उसका जीवन भी संशयमें नहीं पड़ता, वह पवित्र एवं महान् यश पाता तथा दीर्घकालतक लक्ष्मी एवं उत्तम कीर्तिका उपभोग करता है’॥ ३६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें चौंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६४ ॥