श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
उसके उठते ही समराङ्गणमें खड़े हुए समस्त सैनिक भयभीत होकर भाग चले। कालदण्ड उठाये यमराजको देखकर समस्त देवता भी क्षुब्ध हो उठे॥ ३७ ॥
यमराज उस दण्डसे रावणपर प्रहार करना ही चाहते थे कि साक्षात् पितामह ब्रह्मा वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने दर्शन देकर इस प्रकार कहा— ॥ ३८ ॥
‘अमित पराक्रमी महाबाहु वैवस्वत! तुम इस कालदण्डके द्वारा निशाचर रावणका वध न करो॥ ३९ ॥
‘देवप्रवर! मैंने इसे देवताओंद्वारा न मारे जा सकनेका वर दिया है। मेरे मुँहसे जो बात निकल चुकी है, उसे तुम्हें असत्य नहीं करना चाहिये॥ ४० ॥
‘जो देवता अथवा मनुष्य मुझे असत्यवादी बना देगा, उसे समस्त त्रिलोकीको मिथ्याभाषी बनानेका दोष लगेगा, इसमें संशय नहीं है॥ ४१ ॥
‘यह कालदण्ड तीनों लोकोंके लिये भयंकर तथा रौद्र है। तुम्हारे द्वारा क्रोधपूर्वक छोड़ा जानेपर यह प्रिय और अप्रिय जनोंमें भेदभाव न रखता हुआ सामने पड़ी हुई समस्त प्रजाका संहार कर डालेगा॥ ४२ ॥
‘इस अमित तेजस्वी कालदण्डको भी पूर्वकालमें मैंने ही बनाया था। यह किसी भी प्राणीपर व्यर्थ नहीं होता है। इसके प्रहारसे सबकी मृत्यु हो जाती है॥ ४३ ॥
‘अतः सौम्य! तुम इसे रावणके मस्तकपर न गिराओ। इसकी मार पड़नेपर कोई एक मुहूर्त भी जीवित नहीं रह सकता॥ ४४ ॥
‘कालदण्ड पड़नेपर यदि यह राक्षस रावण न मरा तो अथवा मर गया तो—दोनों ही दशाओंमें मेरी बात असत्य होगी॥ ४५ ॥
‘इसलिये हाथमें उठाये हुए इस कालदण्डको तुम लङ्कापति रावणकी ओरसे हटा लो। यदि समस्त लोकोंपर तुम्हारी दृष्टि है तो आज रावणकी रक्षा करके मुझे सत्यवादी बनाओ’॥ ४६ ॥
ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा यमराजने उत्तर दिया— ‘यदि ऐसी बात है तो लीजिये मैंने इस दण्डको हटा लिया। आप हम सब लोगोंके प्रभु हैं (अतः आपकी आज्ञाका पालन करना हमारा कर्तव्य है)॥ ४७ ॥
‘परंतु वरदानसे युक्त होनेके कारण यदि मेरे द्वारा इस निशाचरका वध नहीं हो सकता तो इस समय इसके साथ युद्ध करके ही मैं क्या करूँगा?॥ ४८ ॥
‘इसलिये अब मैं इसकी दृष्टिसे ओझल होता हूँ, यों कहकर यमराज रथ और घोड़ोंसहित वहीं अन्तर्धान हो गये॥ ४९ ॥
इस प्रकार यमराजको जीतकर अपने नामकी घोषणा करके दशग्रीव रावण पुष्पकविमानपर आरूढ़ हो यमलोकसे चला गया॥ ५० ॥
तदनन्तर सूर्यपुत्र यमराज तथा महामुनि नारदजी ब्रह्मा आदि देवताओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक स्वर्गमें गये॥ ५१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २२ ॥
तेईसवाँ सर्ग
तेईसवाँ सर्ग
रावणके द्वारा निवातकवचोंसे मैत्री, कालकेयोंका वध तथा वरुणपुत्रोंकी पराजय
(अगस्त्यजी कहते हैं—रघुनन्दन!) देवेश्वर यमको पराजित करके युद्धका हौसला रखनेवाला दशग्रीव रावण अपने सहायकोंसे मिला॥ १ ॥
उसके सारे अङ्ग रक्तसे नहा उठे थे और प्रहारोंसे जर्जर हो गये थे। इस अवस्थामें रावणको देखकर उन राक्षसोंको बड़ा विस्मय हुआ॥ २ ॥
‘महाराजकी जय हो’ ऐसा कहकर रावणकी अभ्युदयकामना करके वे मारीच आदि सब राक्षस पुष्पकविमानपर बैठे। उस समय रावणने उन सबको सान्त्वना दी॥ ३ ॥
तदनन्तर वह राक्षस रसातलमें जानेकी इच्छासे दैत्यों और नागोंसे सेवित तथा वरुणके द्वारा सुरक्षित जलनिधि समुद्रमें प्रविष्ट हुआ॥ ४ ॥
नागराज वासुकिद्वारा पालित भोगवती पुरीमें प्रवेश करके उसने नागोंको अपने वशमें कर लिया और वहाँसे हर्षपूर्वक मणिमयीपुरीको प्रस्थान किया॥ ५ ॥
उस पुरीमें निवातकवच नामक दैत्य रहते थे, जिन्हें ब्रह्माजीसे उत्तम वर प्राप्त थे। उस राक्षसने वहाँ जाकर उन सबको युद्धके लिये ललकारा॥ ६ ॥
वे सब दैत्य बड़े पराक्रमी और बलशाली थे। नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण करते थे तथा युद्धके लिये सदा उत्साहित एवं उन्मत्त रहते थे॥ ७ ॥
उनका राक्षसोंके साथ युद्ध आरम्भ हो गया। वे राक्षस और दानव कुपित हो एक-दूसरेको शूल, त्रिशूल, वज्र, पट्टिश, खड्ग और फरसोंसे घायल करने लगे॥ ८ ॥
उनके युद्ध करते हुए एक वर्षसे अधिक समय व्यतीत हो गया; किंतु उनमेंसे किसी भी पक्षकी विजय या पराजय नहीं हुई॥ ९ ॥
तब त्रिभुवनके आश्रयभूत अविनाशी पितामह भगवान् ब्रह्मा एक उत्तम विमानपर बैठकर वहाँ शीघ्र आये॥ १० ॥
बूढ़े पितामहने निवातकवचोंके उस युद्ध-कर्मको रोक दिया और उनसे स्पष्ट शब्दोंमें यह बात कही— ॥
‘दानवो! समस्त देवता और असुर मिलकर भी युद्धमें इस रावणको परास्त नहीं कर सकते। इसी तरह समस्त देवता और दानव एक साथ आक्रमण करें तो भी वे तुम लोगोंका संहार नहीं कर सकते॥ १२ ॥
‘(तुम दोनोंमें वरदानजनित शक्ति एक-सी है) इसलिये मुझे तो यह अच्छा लगता है कि तुमलोगोंके साथ इस राक्षसकी मैत्री हो जाय; क्योंकि सुहृदोंके सभी अर्थ (भोग्य-पदार्थ) एक-दूसरेके लिये समान होते हैं—पृथक्-पृथक् बँटे नहीं रहते हैं। निःसंदेह ऐसी ही बात है’॥ १३ ॥
तब वहाँ रावणने अग्निको साक्षी बनाकर निवातकवचोंके साथ मित्रता कर ली। इससे उसको बड़ी प्रसन्नता हुई॥ १४ ॥
फिर निवातकवचोंसे उचित आदर पाकर वह एक वर्षतक वहीं टिका रहा। उस स्थानपर दशाननको अपने नगरके समान ही प्रिय भोग प्राप्त हुए॥ १५ ॥
उसने निवातकवचोंसे सौ प्रकारकी मायाओंका ज्ञान प्राप्त किया। उसके बाद वह वरुणके नगरका पता लगाता हुआ रसातलमें सब ओर घूमने लगा॥ १६ ॥
घूमते-घूमते वह अश्म नामक नगरमें जा पहुँचा, जहाँ कालकेय नामक दानव निवास करते थे। कालकेय बड़े बलवान् थे। रावणने वहाँ उन सबका संहार करके शूर्पणखाके पति उत्कट बलशाली अपने बहनोई महाबली विद्युज्जिह्वको, जो उस राक्षसको समराङ्गणमें चाट जाना चाहता था, तलवारसे काट डाला॥ १७-१८ १/२ ॥
उसे परास्त करके रावणने दो ही घड़ीमें चार सौ दैत्योंको मौतके घाट उतार दिया। तत्पश्चात् उस राक्षसराजने वरुणका दिव्य भवन देखा, जो श्वेत बादलोंके समान उज्ज्वल और कैलास पर्वतके समान प्रकाशमान था॥ १९-२० ॥
वहीं सुरभि नामकी गौ भी खड़ी थी, जिसके थनोंसे दूध झर रहा था। कहते हैं, सुरभिके ही दूधकी धारासे क्षीरसागर भरा हुआ है॥ २१ ॥
रावणने महादेवजीके वाहनभूत महावृषभकी जननी सुरभिदेवीका दर्शन किया, जिससे शीतल किरणोंवाले निशाकर चन्द्रमाका प्रादुर्भाव हुआ है (सुरभिसे क्षीरसमुद्र और क्षीरसमुद्रसे चन्द्रमाका आविर्भाव हुआ है)॥ २२ ॥
उन्हीं चन्द्रदेवके उत्पत्तिस्थान क्षीरसमुद्रका आश्रय लेकर फेन पीनेवाले महर्षि जीवन धारण करते हैं। उस क्षीरसागरसे ही सुधा तथा स्वधाभोजी पितरोंकी स्वधा प्रकट हुई है॥ २३
॥
लोकमें जिनको सुरभि नामसे पुकारा जाता है, उन परम अद्भुत गोमाताकी परिक्रमा करके रावणने नाना प्रकारकी सेनाओंसे सुरक्षित महाभयंकर वरुणालयमें प्रवेश किया॥ २४ ॥
वहाँ प्रवेश करके उसने वरुणके उत्तम भवनको देखा, जो सदा ही आनन्दमय उत्सवसे परिपूर्ण, अनेक जलधाराओं (फौवारों)-से व्याप्त तथा शरत्कालके बादलोंके समान उज्ज्वल था॥ २५ ॥
तदनन्तर वरुणके सेनापतियोंने समरभूमिमें रावणपर प्रहार किया। फिर रावणने भी उन सबको घायल करके वहाँके योद्धाओंसे कहा—‘तुमलोग राजा वरुणसे शीघ्र जाकर मेरी यह बात कहो—॥ २६ ॥
‘राजन्! राक्षसराज रावण युद्धके लिये आया है, आप चलकर उससे युद्ध कीजिये अथवा हाथ जोड़कर अपनी पराजय स्वीकार कीजिये। फिर आपको कोई भय नहीं रहेगा’॥ २७ ॥
इसी बीचमें सूचना पाकर महात्मा वरुणके पुत्र और पौत्र क्रोधसे भरे हुए निकले। उनके साथ ‘गौ’ और ‘पुष्कर’ नामक सेनाध्यक्ष भी थे॥ २८ ॥
वे सब-के-सब सर्वगुणसम्पन्न तथा उगते हुए सूर्यके तुल्य तेजस्वी थे। इच्छानुसार चलनेवाले रथोंपर आरूढ़ हो अपनी सेनाओंसे घिरकर वे वहाँ युद्धस्थलमें आये॥ २९ ॥
फिर तो वरुणके पुत्रों और बुद्धिमान् रावणमें बड़ा भयंकर युद्ध छिड़ गया, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था॥
राक्षस दशग्रीवके महापराक्रमी मन्त्रियोंने एक ही क्षणमें वरुणकी सारी सेनाको मार गिराया॥ ३१ ॥
युद्धमें अपनी सेनाकी यह अवस्था देख वरुणके पुत्र उस समय बाण-समूहोंसे पीड़ित होनेके कारण कुछ देरके लिये युद्ध-कर्मसे हट गये॥ ३२ ॥
भूतलपर स्थित होकर उन्होंने जब रावणको पुष्पक-विमानपर बैठा देखा, तब वे भी शीघ्रगामी रथोंद्वारा तुरंत ही आकाशमें जा पहुँचे॥ ३३ ॥
अब बराबरका स्थान मिल जानेसे रावणके साथ उनका भारी युद्ध छिड़ गया। उनका वह आकाश-युद्ध देव-दानव-संग्रामके समान भयंकर जान पड़ता था॥ ३४ ॥
उन वरुण-पुत्रोंने अपने अग्नितुल्य तेजस्वी बाणोंद्वारा युद्धस्थलमें रावणको विमुख करके बड़े हर्षके साथ नाना प्रकारके स्वरोंमें महान् सिंहनाद किया॥ ३५॥
राजा रावणको तिरस्कृत हुआ देख महोदरको बड़ा क्रोध हुआ। उसने मृत्युका भय छोड़कर युद्धकी इच्छासे वरुण-पुत्रोंकी ओर देखा॥ ३६॥
वरुणके घोड़े युद्धमें हवासे बातें करनेवाले थे और स्वामीकी इच्छाके अनुसार चलते थे। महोदरने उनपर गदासे आघात किया। गदाकी चोट खाकर वे घोड़े धराशायी हो गये॥ ३७॥
वरुण-पुत्रोंके योद्धाओं और घोड़ोंको मारकर उन्हें रथहीन हुआ देख महोदर तुरंत ही जोर-जोरसे गर्जना करने लगा॥ ३८॥
महोदरकी गदाके आघातसे वरुण-पुत्रोंके वे रथ घोड़ों और श्रेष्ठ सारथियोंसहित चूर-चूर हो पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ३९॥
महात्मा वरुणके वे शूरवीर पुत्र उन रथोंको छोड़कर अपने ही प्रभावसे आकाशमें खड़े हो गये। उन्हें तनिक भी व्यथा नहीं हुई॥ ४०॥
उन्होंने धनुषोंपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और महोदरको क्षत-विक्षत करके एक साथ कुपित हो रावणको घेर लिया॥ ४१॥
फिर वे अत्यन्त कुपित हो किसी महान् पर्वतपर जलकी धारा गिरानेवाले मेघोंके समान धनुषसे छूटे हुए वज्र-तुल्य भयंकर सायकोंद्वारा रावणको विदीर्ण करने लगे॥ ४२॥
यह देख दशग्रीव प्रलयकालकी अग्निके समान रोषसे प्रज्वलित हो उठा और उन वरुण-पुत्रोंके मर्मस्थानोंपर महाघोर बाणोंकी वर्षा करने लगा॥ ४३॥
पुष्पकविमानपर बैठे हुए उस दुर्धर्ष वीरने उन सबके ऊपर विचित्र मूसलों, सैकड़ों भल्लों, पट्टिशों, शक्तियों और बड़ी-बड़ी शतघ्नियोंका प्रहार किया॥ ४४ १/२ ॥
उन अस्त्र-शस्त्रोंसे घायल हो वे पैदल वीर पुनः युद्धके लिये आगे बढ़े; परंतु पैदल होनेके कारण रावणकी उस अस्त्र-वर्षासे ही सहसा संकटमें पड़कर बड़ी भारी कीचड़में फँसे हुए साठ वर्षके हाथीके समान कष्ट पाने लगे॥ ४५-४६॥
वरुणके पुत्रोंको दुःखी एवं व्याकुल देख महाबली रावण महान् मेघके समान बड़े हर्षसे गर्जना करने लगा॥ ४७॥
जोर-जोरसे सिंहनाद करके वह निशाचर पुनः नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा वरुण-पुत्रोंको मारने लगा, मानो बादल अपनी धारावाहिक वृष्टिसे वृक्षोंको पीड़ित कर रहा हो॥ ४८ ॥
फिर तो वे सभी वरुण-पुत्र युद्धसे विमुख हो पृथ्वीपर गिर पड़े। तत्पश्चात् उनके सेवकोंनें उन्हें रणभूमिसे हटाकर शीघ्र ही घरोंमें पहुँचा दिया॥ ४९ ॥
तदनन्तर उस राक्षसने वरुणके सेवकोंसे कहा—‘अब वरुणसे जाकर कहो कि वे स्वयं युद्धके लिये आवें’। तब वरुणके मन्त्री प्रभासने रावणसे कहा—॥ ५० ॥
‘राक्षसराज! जिन्हें तुम युद्धके लिये बुला रहे हो, वे जलके स्वामी महाराज वरुण संगीत सुननेके लिये ब्रह्मलोकमें गये हुए हैं॥ ५१ ॥
‘वीर! राजा वरुणके चले जानेपर यहाँ युद्धके लिये व्यर्थ परिश्रम करनेसे तुम्हें क्या लाभ? उनके जो वीर पुत्र यहाँ मौजूद थे, वे तो तुमसे परास्त हो ही गये’॥
मन्त्रीकी यह बात सुनकर राक्षसराज रावण वहाँ अपने नामकी घोषणा करके बड़े हर्षसे सिंहनाद करता हुआ वरुणालयसे बाहर निकल गया॥ ५३ ॥
वह जिस मार्गसे आया था, उसीसे लौटकर आकाशमार्गसे लङ्काकी ओर चल दिया॥ ५४॥*
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तेईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २३ ॥
* कुछ प्रतियोंमें तेईसवें सर्गके बाद पाँच प्रक्षिप्त सर्ग उपलब्ध होते हैं, जिनमें रावणकी दिग्विजय-यात्राका विस्तारपूर्वक वर्णन है। अनावश्यक विस्तारके भयसे यहाँ उनको नहीं लिया गया है।
चौबीसवाँ सर्ग
चौबीसवाँ सर्ग
रावणद्वारा अपहृत हुई देवता आदिकी कन्याओं और स्त्रियोंका विलाप एवं शाप, रावणका रोती हुई शूर्पणखाको आश्वासन देना और उसे खरके साथ दण्डकारण्यमें भेजना
लौटते समय दुरात्मा रावण बड़े हर्षमें भरा था। उसने मार्गमें अनेकानेक नरेशों, ऋषियों, देवताओं और दानवोंकी कन्याओंका अपहरण किया॥ १ ॥
वह राक्षस जिस कन्या अथवा स्त्रीको दर्शनीय रूप-सौन्दर्यसे युक्त देखता, उसके रक्षक बन्धुजनोंका वध करके उसे विमानपर बिठाकर रोक लेता था॥ २ ॥
इस प्रकार उसने नागों, राक्षसों, असुरों, मनुष्यों, यक्षों और दानवोंकी भी बहुत-सी कन्याओंको हरकर विमानपर चढ़ा लिया॥ ३ ॥
उन सबने एक साथ ही दुःखके कारण नेत्रोंसे आँसू बहाना आरम्भ किया। शोकाग्नि और भयसे प्रकट होनेवाले उनके आँसुओंकी एक-एक बूँद वहाँ आगकी चिनगारी-सी जान पड़ती थी॥ ४ ॥
जैसे नदियाँ सागरको भरती हैं, उसी प्रकार उन समस्त सुन्दरियोंने भय और शोकसे उत्पन्न हुए अमङ्गलजनक अश्रुओंसे उस विमानको भर दिया॥ ५ ॥
नागों, गन्धर्वों, महर्षियों, दैत्यों और दानवोंकी सैकड़ों कन्याएँ उस विमानपर रो रही थीं॥ ६ ॥
उनके केश बड़े-बड़े थे। सभी अङ्ग सुन्दर एवं मनोहर थे। उनके मुखकी कान्ति पूर्ण चन्द्रमाकी छबिको लज्जित करती थी। उरोजोंके तटप्रान्त उभरे हुए थे। शरीरका मध्यभाग हीरेके चबूतरेके समान प्रकाशित होता था। नितम्ब-देश रथके कूबर-जैसे जान पड़ते थे और उनके कारण उनकी मनोहरता बढ़ रही थी। वे सभी स्त्रियाँ देवाङ्गनाओंके समान कान्तिमती और तपाये हुए सुवर्णके समान सुनहरी आभासे उद्भासित होती थीं॥ ७-८ ॥
सुन्दर मध्यभागवाली वे सभी सुन्दरियाँ शोक, दुःख और भयसे त्रस्त एवं विह्वल थीं। उनकी गरम-गरम निःश्वासवायुसे वह पुष्पकविमान सब ओरसे प्रज्वलित-सा हो रहा था और जिसके भीतर अग्निकी स्थापना की गयी हो, उस अग्निहोत्रगृहके समान जान पड़ता था॥ ९ १/२ ॥
दशग्रीवके वशमें पड़ी हुईं वे शोकाकुल अबलाएँ सिंहके पंजेमें पड़ी हुईं हरिणियोंके समान दुःखी हो रही थीं। उनके मुख और नेत्रोंमें दीनता छा रही थी और उन सबकी अवस्था सोलह वर्षके लगभग थी॥ १० १/२ ॥
कोई सोचती थी, क्या यह राक्षस मुझे खा जायगा? कोई अत्यन्त दुःखसे आर्त हो इस चिन्तामें पड़ी थी कि क्या यह निशाचर मुझे मार डालेगा?॥ ११ १/२ ॥
वे स्त्रियाँ माता, पिता, भाई तथा पतिकी याद करके दुःखशोकमें डूब जातीं और एक साथ करुणाजनक विलाप करने लगती थीं॥ १२ १/२ ॥
‘हाय! मेरे बिना मेरा नन्हा-सा बेटा कैसे रहेगा। मेरी माँकी क्या दशा होगी और मेरे भाई कितने चिन्तित होंगे’ ऐसा कहकर वे शोकके सागरमें डूब जाती थीं॥
‘हाय! अपने उन पतिदेवसे बिछड़कर मैं क्या करूँगी? (कैसे रहूँगी)। हे मृत्युदेव! मेरी प्रार्थना है कि तुम प्रसन्न हो जाओ और मुझ दुखियाको इस लोकसे उठा ले चलो। हाय! पूर्व-जन्ममें दूसरे शरीरद्वारा हमने कौन-सा ऐसा पाप किया था, जिससे हम सब-की-सब दुःखसे पीड़ित हो शोकके समुद्रमें गिर पड़ी हैं। निश्चय ही इस समय हमें अपने इस दुःखका अन्त होता नहीं दिखायी देता॥ १४—१६॥
‘अहो! इस मनुष्यलोकको धिक्कार है! इससे बढ़कर अधम दूसरा कोई लोक नहीं होगा; क्योंकि यहाँ इस बलवान् रावणने हमारे दुर्बल पतियोंको उसी तरह नष्ट कर दिया, जैसे सूर्यदेव उदय लेनेके साथ ही नक्षत्रोंको अदृश्य कर देते हैं॥ १७ १/२ ॥
‘अहो! यह अत्यन्त बलवान् राक्षस वधके उपायोंमें ही आसक्त रहता है। अहो! यह पापी दुराचारके पथपर चलकर भी अपने-आपको धिक्कारता नहीं है॥ १८ १/२ ॥
‘इस दुरात्माका पराक्रम इसकी तपस्याके सर्वथा अनुरूप है, परंतु यह परायी स्त्रियोंके साथ जो बलात्कार कर रहा है, यह दुष्कर्म इसके योग्य कदापि नहीं है॥
‘यह नीच निशाचर परायी स्त्रियोंके साथ रमण करता है, इसलिये स्त्रीके कारण ही इस दुर्बुद्धि राक्षसका वध होगा’॥ २० १/२ ॥
उन श्रेष्ठ सती-साध्वी नारियोंने जब ऐसी बातें कह दीं, उस समय आकाशमें देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और वहाँ फूलोंकी वर्षा होने लगी॥ २१ १/२ ॥
पतिव्रता साध्वी स्त्रियोंके इस तरह शाप देनेपर रावणकी शक्ति घट गयी, वह निस्तेज-सा हो गया और उसके मनमें उद्वेग-सा होने लगा॥ २२ १/२ ॥
इस प्रकार उनका विलाप सुनते हुए राक्षसराज रावणने निशाचरोंद्वारा सत्कृत हो लङ्कापुरीमें प्रवेश किया॥ २३ १/२ ॥
इसी समय इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली भयंकर राक्षसी शूर्पणखा, जो रावणकी बहिन थी, सहसा सामने आकर पृथ्वीपर गिर पड़ी॥ २४ १/२ ॥
रावणने अपनी उस बहिनको उठाकर सान्त्वना दी और पूछा—‘भद्रे! तुम अभी मुझसे शीघ्रतापूर्वक कौन-सी बात कहना चाहती थी?’॥ २५ १/२ ॥
शूर्पणखाके नेत्रोंमें आँसू भरे थे, उसकी आँखें रोते-रोते लाल हो गयी थीं। वह बोली—‘राजन्! तुम बलवान् हो, इसीलिये न तुमने मुझे बलपूर्वक विधवा बना दिया है?॥ २६ १/२ ॥
‘राक्षसराज! तुमने रणभूमिमें अपने बल-पराक्रमसे चौदह हजार कालकेय नामक दैत्योंका वध कर दिया है॥ २७ १/२ ॥
‘तात! उन्हींमें मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर आदरणीय मेरे महाबली पति भी थे। तुमने उन्हें भी मार डाला। तुम नाममात्रके भाई हो। वास्तवमें मेरे शत्रु निकले!॥ २८ १/२ ॥
‘राजन्! सगे भाई होकर भी तुमने स्वयं ही अपने हाथों मेरा (मेरे पतिदेवका) वध कर डाला। अब तुम्हारे कारण मैं ‘वैधव्य’ शब्दका उपभोग करूँगी—विधवा कहलाऊँगी॥ २९ १/२ ॥
‘भैया! तुम मेरे पिताके तुल्य हो। मेरे पति तुम्हारे दामाद थे, क्या तुम्हें युद्धमें अपने दामाद या बहनोईकी भी रक्षा नहीं करनी चाहिये थी? तुमने स्वयं ही युद्धमें अपने दामादका वध किया है; क्या अब भी तुम्हें लज्जा नहीं आती?’॥ ३० १/२ ॥
रोती और कोसती हुई बहिनके ऐसा कहनेपर दशग्रीवने उसे सान्त्वना देकर समझाते हुए मधुर वाणीमें कहा—॥ ३१ १/२ ॥
‘बेटी! अब रोना व्यर्थ है, तुम्हें किसी तरह भयभीत नहीं होना चाहिये। मैं दान, मान और अनुग्रहद्वारा यत्नपूर्वक तुम्हें संतुष्ट करूँगा॥ ३२ १/२ ॥
‘मैं युद्धमें उन्मत्त हो गया था, मेरा चित्त ठिकाने नहीं था, मुझे केवल विजय पानेकी धुन थी, इसलिये लगातार बाण चलाता रहा। समराङ्गणमें जूझते समय मुझे अपने-परायेका ज्ञान नहीं रह जाता था। मैं रणोन्मत्त होकर प्रहार कर रहा था, इसलिये ‘दामाद’ को पहचान न सका॥ ३३-३४ ॥
‘बहिन! यही कारण है जिससे युद्धमें तुम्हारे पति मेरे हाथसे मारे गये। अब इस समय जो कर्तव्य प्राप्त है, उसके अनुसार मैं सदा तुम्हारे हितका ही साधन करूँगा॥ ३५ ॥
‘तुम ऐश्वर्यशाली भाई खरके पास चलकर रहो। तुम्हारा भाई महाबली खर चौदह हजार राक्षसोंका अधिपति होगा। वह उन सबको जहाँ चाहेगा भेजेगा और उन सबको अन्न, पान एवं वस्त्र देनेमें समर्थ होगा॥ ३६ १/२ ॥
‘यह तुम्हारा मौसेरा भाई निशाचर खर सब कुछ करनेमें समर्थ है और आदेशका सदा पालन करता रहेगा॥ ३७ १/२ ॥
‘यह वीर (मेरी आज्ञासे) शीघ्र ही दण्डकारण्यकी रक्षामें जानेवाला है; महाबली दूषण इसका सेनापति होगा॥ ३८ १/२ ॥
‘वहाँ शूरवीर खर सदा तुम्हारी आज्ञाका पालन करेगा और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले राक्षसोंका स्वामी होगा’॥ ३९ १/२ ॥
ऐसा कहकर दशग्रीवने चौदह हजार पराक्रमशाली राक्षसोंकी सेनाको खरके साथ जानेकी आज्ञा दी। उन भयङ्कर राक्षसोंसे घिरा हुआ खर शीघ्र ही दण्डकारण्यमें आया और निर्भय होकर वहाँका अकण्टक राज्य भोगने लगा। उसके साथ शूर्पणखा भी वहाँ दण्डकवनमें रहने लगी॥ ४०—४२
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें चौबीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २४ ॥
पचीसवाँ सर्ग
पचीसवाँ सर्ग
यज्ञोंद्वारा मेघनादकी सफलता, विभीषणका रावणको पर-स्त्री-हरणके दोष बताना, कुम्भीनसीको आश्वासन दे मधुको साथ ले रावणका देवलोकपर आक्रमण करना
खरको राक्षसोंकी भयङ्कर सेना देकर और बहिनको धीरज बँधाकर रावण बहुत ही प्रसन्न और स्वस्थचित्त हो गया॥ १ ॥
तदनन्तर बलवान् राक्षसराज रावण लङ्काके निकुम्भिला नामक उत्तम उपवनमें गया। उसके साथ बहुत-से सेवक भी थे॥ २ ॥
रावण अपनी शोभा एवं तेजसे अग्निके समान प्रज्वलित हो रहा था। उसने निकुम्भिलामें पहुँचकर देखा, एक यज्ञ हो रहा है, जो सैकड़ों यूपोंसे व्याप्त और सुन्दर देवालयोंसे सुशोभित है॥ ३ ॥
फिर वहाँ उसने अपने पुत्र मेघनादको देखा, जो काला मृगचर्म पहने हुए तथा कमण्डलु, शिखा और ध्वज धारण किये बड़ा भयङ्कर जान पड़ता था॥ ४ ॥
उसके पास पहुँचकर लङ्केश्वरने अपनी भुजाओंद्वारा उसका आलिङ्गन किया और पूछा—‘बेटा! यह क्या कर रहे हो? ठीक-ठीक बताओ’॥ ५ ॥
(मेघनाद यज्ञके नियमानुसार मौन रहा) उस समय पुरोहित महातपस्वी द्विजश्रेष्ठ शुक्राचार्यने, जो यज्ञ-सम्पत्तिकी समृद्धिके लिये वहाँ आये थे, राक्षसशिरोमणि रावणसे कहा—॥ ६ ॥
‘राजन्! मैं सब बातें बता रहा हूँ, ध्यान देकर सुनिये—आपके पुत्रने बड़े विस्तारके साथ सात यज्ञोंका अनुष्ठान किया है॥ ७ ॥
‘अग्निष्टोम, अश्वमेध, बहुसुवर्णक, राजसूय, गोमेध तथा वैष्णव—ये छ: यज्ञ पूर्ण करके जब इसने सातवाँ माहेश्वर यज्ञ, जिसका अनुष्ठान दूसरोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ है, आरम्भ किया, तब आपके इस पुत्रको साक्षात् भगवान् पशुपतिसे बहुत-से वर प्राप्त हुए॥ ८-९ ॥
‘साथ ही इच्छानुसार चलनेवाला एक दिव्य आकाशचारी रथ भी प्राप्त हुआ है, इसके सिवा तामसी नामकी माया उत्पन्न हुईँ है, जिससे अन्धकार उत्पन्न किया जाता है॥ १० ॥
‘राक्षसेश्वर! संग्राममें इस मायाका प्रयोग करनेपर देवता और असुरोंको भी प्रयोग करनेवाले पुरुषकी गतिविधिका पता नहीं लग सकता॥ ११ ॥
‘राजन्! बाणोंसे भरे हुए दो अक्षय तरकस, अटूट धनुष तथा रणभूमिमें शत्रुका विध्वंस करनेवाला प्रबल अस्त्र—इन सबकी प्राप्ति हुई है॥ १२ ॥
‘दशानन! तुम्हारा यह पुत्र इन सभी मनोवाञ्छित वरोंको पाकर आज यज्ञकी समाप्तिके दिन तुम्हारे दर्शनकी इच्छासे यहाँ खड़ा है’॥ १३ ॥
यह सुनकर दशग्रीवने कहा—‘बेटा! तुमने यह अच्छा नहीं किया है; क्योंकि इस यज्ञसम्बन्धी द्रव्योंद्वारा मेरे शत्रुभूत इन्द्र आदि देवताओंका पूजन हुआ है॥ १४ ॥
‘अस्तु, जो कर दिया, सो अच्छा ही किया; इसमें संशय नहीं है। सौम्य! अब आओ, चलो। हमलोग अपने घरको चलें’॥ १५ ॥
तदनन्तर दशग्रीवने अपने पुत्र और विभीषणके साथ जाकर पुष्पकविमानसे उन सब स्त्रियोंको उतारा, जिन्हें हरकर ले आया था। वे अब भी आँसू बहाती हुईं गद्गदकण्ठसे विलाप कर रही थीं॥ १६ ॥
वे उत्तम लक्षणोंसे सुशोभित होती थीं और देवताओं, दानवों तथा राक्षसोंके घरकी रत्न थीं। उनमें रावणकी आसक्ति जानकर धर्मात्मा विभीषणने कहा—॥ १७ ॥
‘राजन्! ये आचरण यश, धन और कुलका नाश करनेवाले हैं। इनके द्वारा जो प्राणियोंको पीड़ा दी जाती है, उससे बड़ा पाप होता है। इस बातको जानते हुए भी आप सदाचारका उल्लङ्घन करके स्वेच्छाचारमें प्रवृत्त हो रहे हैं॥ १८ ॥
‘महाराज! इन बेचारी अबलाओंके बन्धु-बान्धवोंको मारकर आप इन्हें हर लाये हैं और इधर आपका उल्लङ्घन करके—आपके सिरपर लात रखकर मधुने मौसेरी बहिन कुम्भीनसीका अपहरण कर लिया’॥ १९ ॥
रावण बोला—‘मैं नहीं समझता कि तुम क्या कह रहे हो। जिसका नाम तुमने मधु बताया है, वह कौन है?’॥
तब विभीषणने अत्यन्त कुपित होकर भाई रावणसे कहा—‘सुनिये, आपके इस पापकर्मका फल हमें बहिनके अपहरणके रूपमें प्राप्त हुआ है॥ २१ ॥
‘हमारे नाना सुमालीके जो बड़े भार्इ माल्यवान् नामसे विख्यात, बुद्धिमान् और बड़े-बूढ़े निशाचर हैं, वे हमारी माता कैकसीके ताऊ हैं। इसी नाते वे हमलोगोंके भी बड़े नाना हैं। उनकी पुत्री अनला हमारी मौसी हैं। उन्हींकी पुत्री कुम्भीनसी है। हमारी मौसी अनलाकी बेटी होनेसे ही यह कुम्भीनसी हम सब भाइयोंकी धर्मतः बहिन होती है॥ २२—२४ ॥
‘राजन्! आपका पुत्र मेघनाद जब यज्ञमें तत्पर हो गया, मैं तपस्याके लिये पानीके भीतर रहने लगा और महाराज! भैया कुम्भकर्ण भी जब नींदका आनन्द लेने लगे, उस समय महाबली राक्षस मधुने यहाँ आकर हमारे आदरणीय मन्त्रियोंको, जो राक्षसोंमें श्रेष्ठ थे, मार डाला और कुम्भीनसीका अपहरण कर लिया॥ २५-२६ ॥
‘महाराज! यद्यपि कुम्भीनसी अन्तःपुरमें भलीभाँति सुरक्षित थी तो भी उसने आक्रमण करके बलपूर्वक उसका अपहरण किया। पीछे इस घटनाको सुनकर भी हमलोगोंने क्षमा ही की। मधुका वध नहीं किया; क्योंकि जब कन्या विवाहके योग्य हो जाय तो उसे किसी योग्य पतिके हाथमें सौंप देना ही उचित है। हम भाइयोंको अवश्य यह कार्य पहले कर देना चाहिये था॥ २७ १/२ ॥
‘हमारे यहाँसे जो बलपूर्वक कन्याका अपहरण हुआ है, यह आपकी इस दूषित बुद्धि एवं पापकर्मका फल है, जो आपको इसी लोकमें प्राप्त हो गया। यह बात आपको भलीभाँति विदित हो जानी चाहिये’॥ २८ १/२ ॥
विभीषणकी यह बात सुनकर राक्षसराज रावण अपनी की हुर्इ दुष्टतासे पीड़ित हो तपे हुए जलवाले समुद्रके समान संतप्त हो उठा। वह रोषसे जलने लगा और उसके नेत्र लाल हो गये। वह बोला—॥ २९-३० ॥
‘मेरा रथ शीघ्र ही जोतकर आवश्यक सामग्रीसे सुसज्जित कर दिया जाय। मेरे शूरवीर सैनिक रणयात्राके लिये तैयार हो जायें। भार्इ कुम्भकर्ण तथा अन्य मुख्य-मुख्य निशाचर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो सवारियोंपर बैठें। आज रावणका भय न माननेवाले मधुका समराङ्गणमें वध करके मित्रोंको साथ लिये युद्धकी इच्छासे देवलोककी यात्रा करूँगा’॥ ३१-३२ १/२ ॥
रावणकी आज्ञासे युद्धमें उत्साह रखनेवाले श्रेष्ठ राक्षसोंकी चार हजार अक्षौहिणी सेना नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये शीघ्र लङ्कासे बाहर निकली॥ ३३ १/२ ॥
मेघनाद समस्त सैनिकोंको साथ लेकर सेनाके आगे-आगे चला। रावण बीचमें था और कुम्भकर्ण पीछे-पीछे चलने लगा॥ ३४ १/२ ॥
विभीषण धर्मात्मा थे। इसलिये वे लङ्कामें ही रहकर धर्मका आचरण करने लगे। शेष सभी महाभाग निशाचर मधुपुरकी ओर चल दिये॥ ३५ १/२ ॥
गदहे, ऊँट, घोड़े, शिशुमार (सूँस) और बड़े-बड़े नाग आदि दीप्तिमान् वाहनोंपर आरूढ़ हो सब राक्षस आकाशको अवकाशरहित करते हुए चले॥ ३६ १/२ ॥
रावणको देवलोकपर आक्रमण करते देख सैकड़ों दैत्य भी उसके पीछे-पीछे चले, जिनका देवताओंके साथ वैर बँध गया था॥ ३७ १/२ ॥
मधुपुरमें पहुँचकर दशमुख रावणने वहाँ कुम्भीनसीको तो देखा, किंतु मधुका दर्शन उसे नहीं हुआ॥ ३८ १/२ ॥
उस समय कुम्भीनसीने भयभीत हो हाथ जोड़कर राक्षसराजके चरणोंपर मस्तक रख दिया॥ ३९ १/२ ॥
तब राक्षसप्रवर रावणने कहा—‘डरो मत’; फिर उसने कुम्भीनसीको उठाया और कहा—‘मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?’॥ ४० १/२ ॥
वह बोली—‘दूसरोंको मान देनेवाले राक्षसराज! महाबाहो! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो आज यहाँ मेरे पतिका वध न कीजिये; क्योंकि कुलवधुओंके लिये वैधव्यके समान दूसरा कोर्इ भय नहीं बताया जाता है। वैधव्य ही नारीके लिये सबसे बड़ा भय और सबसे महान् संकट है॥ ४१-४२ १/२ ॥
‘राजेन्द्र! आप सत्यवादी हों—अपनी बात सच्ची करें। मैं आपसे पतिके जीवनकी भीख माँगती हूँ, आप मुझ दुःखिया बहिनकी ओर देखिये, मुझपर कृपा कीजिये। महाराज! आपने स्वयं भी मुझे आश्वासन देते हुए कहा था कि ‘डरो मत।’ अतः अपनी उसी बातकी लाज रखिये’॥ ४३ १/२ ॥
यह सुनकर रावण प्रसन्न हो गया। वह वहाँ खड़ी हुर्इ अपनी बहिनसे बोला—‘तुम्हारे पति कहाँ हैं? उन्हें शीघ्र मुझे सौंप दो। मैं उन्हें साथ लेकर देवलोकपर विजयके लिये जाऊँगा’॥ ४४-४५ ॥
‘तुम्हारे प्रति करुणा और सौहार्दके कारण मैंने मधुके वधका विचार छोड़ दिया है।’ रावणके ऐसा कहनेपर राक्षসকन्या कुम्भीनसी अत्यन्त प्रसन्न-सी होकर अपने सोये हुए पतिके पास गयी और उस निशाचरको उठाकर बोली—॥ ४६ १/२ ॥
‘राक्षसप्रवर! ये मेरे भाई महाबली दशग्रीव पधारे हैं और देवलोकपर विजय पानेकी इच्छा लेकर वहाँ जा रहे हैं। इस कार्यके लिये ये आपको भी सहायक बनाना चाहते हैं; अतः आप अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ इनकी सहायताके लिये जाइये॥ ४७-४८ ॥
‘मेरे नाते आपपर इनका स्नेह है, आपको जामाता मानकर ये आपके प्रति अनुराग रखते हैं; अतः आपको इनके कार्यकी सिद्धिके लिये अवश्य सहायता करनी चाहिये।’ पत्नीकी यह बात सुनकर मधुने ‘तथास्तु’ कहकर सहायता देना स्वीकार कर लिया॥ ४९ ॥
फिर वह न्यायोचित रीतिसे निकट जाकर निशाचरशिरोमणि राक्षसराज रावणसे मिला। मिलकर उसने धर्मके अनुसार उसका स्वागत-सत्कार किया॥
मधुके भवनमें यथोचित आदर-सत्कार पाकर पराक्रमी दशग्रीव वहाँ एक रात रहा, फिर सबेरे उठकर वहाँसे जानेको उद्यत हुआ॥ ५१ ॥
मधुपुरसे यात्रा करके महेन्द्रके तुल्य पराक्रमी राक्षसराज रावण सायंकालतक कुबेरके निवास-स्थान कैलास पर्वतपर जा पहुँचा। वहाँ उसने अपनी सेनाका पड़ाव डालनेका विचार किया॥ ५२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें पचीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २५ ॥
छब्बीसवाँ सर्ग
छब्बीसवाँ सर्ग
रावणका रम्भापर बलात्कार करना और नलकूबरका रावणको भयंकर शाप देना
जब सूर्य अस्ताचलको चले गये, तब पराक्रमी दशग्रीवने अपनी सेनाके साथ कैलासपर ही रातमें ठहर जाना ठीक समझा॥ १ ॥
(उसने वहीं छावनी डाल दी) फिर, कैलासके ही समान श्वेत कान्तिवाले निर्मल चन्द्रदेवका उदय हुआ और नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित निशाचरोंकी वह विशाल सेना गाढ़ निद्रामें निमग्न हो गयी॥ २ ॥
परंतु महापराक्रमी रावण उस पर्वतके शिखरपर चुपचाप बैठकर चन्द्रमाकी चाँदनीसे सुशोभित होनेवाले उस पर्वतके विभिन्न स्थानोंकी (जो सम्पूर्ण कामभोगके उपयुक्त थे) नैसर्गिक छटा निहारने लगा॥ ३ ॥
कहीं कनेरके दीप्तिमान् कानन शोभा पाते थे, कहीं कदम्ब और बकुल (मौलसिरी) वृक्षोंके समूह अपनी रमणीयता बिखेर रहे थे, कहीं मन्दाकिनीके जलसे भरी हुई और प्रफुल्ल कमलोंसे अलंकृत पुष्करिणियाँ शोभा दे रही थीं, कहीं चम्पा, अशोक, पुंनाग (नागकेसर), मन्दार, आम, पाड़र, लोध्र, प्रियङ्गु, अर्जुन, केतक, तगर, नारिकेल, प्रियाल और पनस आदि वृक्ष अपने पुष्प आदिकी शोभासे उस पर्वत-शिखरके वन्यप्रान्तको उद्भासित कर रहे थे॥ ४—६ ॥
मधुर कण्ठवाले कामार्त किन्नर अपनी कामिनियोंके साथ वहाँ रागयुक्त गीत गा रहे थे, जो कानोंमें पड़कर मनका आनन्द-वर्धन करते थे॥ ७ ॥
जिनके नेत्र-प्रान्त मदसे कुछ लाल हो गये थे, वे मदमत्त विद्याधर युवतियोंके साथ क्रीडा करते और हर्षमग्न होते थे॥ ८ ॥
वहाँसे कुबेरके भवनमें गाती हुई अप्सराओंके गीतकी मधुर ध्वनि घण्टानादके समान सुनायी पड़ती थी॥ ९ ॥
वसन्त-ऋतुके सभी पुष्पोंकी गन्धसे युक्त वृक्ष हवाके थपेड़े खाकर फूलोंकी वर्षा करते हुए उस समूचे पर्वतको सुवासित-सा कर रहे थे॥ १० ॥
विविध कुसुमोंके मधुर मकरन्द तथा परागसे मिश्रित प्रचुर सुगन्ध लेकर मन्द-मन्द बहती हुई सुखद वायु रावणकी काम-वासनाको बढ़ा रही थी॥ ११ ॥
संगीतकी मीठी तान, भाँति-भाँतिके पुष्पोंकी समृद्धि, शीतल वायुका स्पर्श, पर्वतके (रमणीयता आदि) आकर्षक गुण, रजनीकी मधुवेला और चन्द्रमाका उदय—उद्दीपनके इन सभी उपकरणोंके कारण वह महापराक्रमी रावण कामके अधीन हो गया और बारम्बार लंबी साँस खींचकर चन्द्रमाकी ओर देखने लगा॥ १२-१३ ॥
इसी बीचमें समस्त अप्सराओंमें श्रेष्ठ सुन्दरी, पूर्ण-चन्द्रमुखी रम्भा दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो उस मार्गसे आ निकली॥ १४ ॥
उसके अङ्गोंमें दिव्य चन्दनका अनुलेप लगा था और केशपाशमें पारिजातके पुष्प गुँथे हुए थे। दिव्य पुष्पोंसे अपना शृङ्गार करके वह प्रिय-समागमरूप दिव्य उत्सवके लिये जा रही थी॥ १५ ॥
मनोहर नेत्र तथा काञ्चीकी लड़ियोंसे विभूषित पीन जघन-स्थलको वह रतिके उत्तम उपहारके रूपमें धारण किये हुए थी॥ १६ ॥
उसके कपोल आदिपर हरिचन्दनसे चित्र-रचना की गयी थी। वह छहों ऋतुओंमें होनेवाले नूतन पुष्पोंके आर्द्र हारोंसे विभूषित थी और अपनी अलौकिक कान्ति, शोभा, द्युति एवं कीर्तिसे युक्त हो उस समय दूसरी लक्ष्मीके समान जान पड़ती थी॥ १७ ॥
उसका मुख चन्द्रमाके समान मनोहर था और दोनों सुन्दर भौंहें कमान-सी दिखायी देती थीं। वह सजल जलधरके समान नील रंगकी साड़ीसे अपने अङ्गोंको ढके हुए थी॥ १८ ॥
उसकी जाँघोंका चढ़ाव-उतार हाथीकी सूँड़के समान था। दोनों हाथ ऐसे कोमल थे, मानो (देहरूपी रसालकी डालके) नये-नये पल्लव हों। वह सेनाके बीचसे होकर जा रही थी, अतः रावणने उसे देख लिया॥ १९ ॥
देखते ही वह कामदेवके बाणोंका शिकार हो गया और खड़ा होकर उसने अन्यत्र जाती हुई रम्भाका हाथ पकड़ लिया। बेचारी अबला लाजसे गड़ गयी; परंतु वह निशाचर मुसकराता हुआ उससे बोला— ॥ २० ॥
'वरारोहे! कहाँ जा रही हो? किसकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये स्वयं चल पड़ी हो? किसके भाग्योदयका समय आया है, जो तुम्हारा उपभोग करेगा?॥ २१ ॥
'कमल और उत्पलकी सुगन्ध धारण करनेवाले तुम्हारे इस मनोहर मुखारविन्दका रस अमृतका भी अमृत है। आज इस अमृत-रसका आस्वादन करके कौन तृप्त होगा?॥ २२ ॥
‘भीरु! परस्पर सटे हुए तुम्हारे ये सुवर्णमय कलशोंके सदृश सुन्दर पीन उरोज किसके वक्षःस्थलोंको अपना स्पर्श प्रदान करेंगे?॥ २३ ॥
‘सोनेकी लड़ियोंसे विभूषित तथा सुवर्णमय चक्रके समान विपुल विस्तारसे युक्त तुम्हारे पीन जघनस्थलपर जो मूर्तिमान् स्वर्ग-सा जान पड़ता है, आज कौन आरोहण करेगा?॥ २४ ॥
‘इन्द्र, उपेन्द्र अथवा अश्विनीकुमार ही क्यों न हों, इस समय कौन पुरुष मुझसे बढ़कर है? भीरु! तुम मुझे छोड़कर अन्यत्र जा रही हो, यह अच्छा नहीं है॥ २५ ॥
‘स्थूल नितम्बवाली सुन्दरी! यह सुन्दर शिला है, इसपर बैठकर विश्राम करो। इस त्रिभुवनका जो स्वामी है, वह मुझसे भिन्न नहीं है—मैं ही सम्पूर्ण लोकोंका अधिपति हूँ॥ २६ ॥
‘तीनों लोकोंके स्वामीका भी स्वामी तथा विधाता यह दशमुख रावण आज इस प्रकार विनीतभावसे हाथ जोड़कर तुमसे याचना करता है। सुन्दरी! मुझे स्वीकार करो'॥ २७ ॥
रावणके ऐसा कहनेपर रम्भा काँप उठी और हाथ जोड़कर बोली—‘प्रभो! प्रसन्न होइये—मुझपर कृपा कीजिये। आपको ऐसी बात मुँहसे नहीं निकालनी चाहिये; क्योंकि आप मेरे गुरुजन हैं—पिताके तुल्य हैं॥ २८ ॥
‘यदि दूसरे कोई पुरुष मेरा तिरस्कार करनेपर उतारू हों तो उनसे भी आपको मेरी रक्षा करनी चाहिये। मैं धर्मतः आपकी पुत्रवधू हूँ—यह आपसे सच्ची बात बता रही हूँ'॥ २९ ॥
रम्भा अपने चरणोंकी ओर देखती हुई नीचे मुँह किये खड़ी थी। रावणकी दृष्टि पड़नेमात्रसे भयके कारण उसके रोंगटे खड़े हो गये थे। उस समय उससे रावणने कहा—॥ ३० ॥
‘रम्भे! यदि यह सिद्ध हो जाय कि तुम मेरे बेटेकी बहू हो, तभी मेरी पुत्रवधू हो सकती हो, अन्यथा नहीं।' तब रम्भाने ‘बहुत अच्छा' कहकर रावणको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ३१ ॥
‘राक्षसशिरोमणे! धर्मके अनुसार मैं आपके पुत्रकी ही भार्या हूँ। आपके बड़े भाई कुबेरके पुत्र मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं॥ ३२ ॥
‘वे तीनों लोकोंमें ‘नलकूबर' नामसे विख्यात हैं तथा धर्मानुष्ठानकी दृष्टिसे ब्राह्मण और पराक्रमकी दृष्टिसे क्षत्रिय हैं॥ ३३ ॥
‘वे क्रोधमें अग्नि और क्षमामें पृथ्वीके समान हैं। उन्हीं लोकपालकुमार प्रियतम नलकूबरको आज मैंने मिलनेके लिये संकेत दिया है॥ ३४ ॥
‘यह सारा श्रृङ्गार मैंने उन्हींके लिये धारण किया है; जैसे उनका मेरे प्रति अनुराग है, उसी प्रकार मेरा भी उन्हींके प्रति प्रगाढ़ प्रेम है, दूसरे किसीके प्रति नहीं॥ ३५ ॥
‘शत्रुओंका दमन करनेवाले राक्षसराज! इस सत्यको दृष्टिमें रखकर आप इस समय मुझे छोड़ दीजिये; वे मेरे धर्मात्मा प्रियतम उत्सुक होकर मेरी प्रतीक्षा करते होंगे॥ ३६ ॥
‘उनकी सेवाके इस कार्यमें आपको यहाँ विघ्न नहीं डालना चाहिये। मुझे छोड़ दीजिये। राक्षसराज! आप सत्पुरुषोंद्वारा आचरित धर्मके मार्गपर चलिये॥ ३७ ॥
‘आप मेरे माननीय गुरुजन हैं, अतः आपको मेरी रक्षा करनी चाहिये।’ यह सुनकर दशग्रीवने उसे नम्रतापूर्वक उत्तर दिया— ॥ ३८ ॥
‘रम्भे! तुम अपनेको जो मेरी पुत्रवधू बता रही हो, वह ठीक नहीं जान पड़ता। यह नाता-रिश्ता उन स्त्रियोंके लिये लागू होता है, जो किसी एक पुरुषकी पत्नी हों। तुम्हारे देवलोककी तो स्थिति ही दूसरी है। वहाँ सदासे यही नियम चला आ रहा है कि अप्सराओंका कोई पति नहीं होता। वहाँ कोई एक स्त्रीके साथ विवाह करके नहीं रहता है’॥ ३९ १/२ ॥
ऐसा कहकर उस राक्षसने रम्भाको बलपूर्वक शिलापर बैठा लिया और कामभोगमें आसक्त हो उसके साथ समागम किया॥ ४० १/२ ॥
उसके पुष्पहार टूटकर गिर गये, सारे आभूषण अस्त-व्यस्त हो गये। उपभोगके बाद रावणने रम्भाको छोड़ दिया। उसकी दशा उस नदीके समान हो गयी जिसे किसी गजराजने क्रीडा करके मथ डाला हो; वह अत्यन्त व्याकुल हो उठी॥ ४१ १/२ ॥
वेणी-बन्ध टूट जानेसे उसके खुले हुए केश हवामें उड़ने लगे—उसका श्रृङ्गार बिगड़ गया। कर-पल्लव काँपने लगे। वह ऐसी लगती थी—मानो फूलोंसे सुशोभित होनेवाली किसी लताको हवाने झकझोर दिया हो॥ ४२ १/२ ॥
लज्जा और भयसे काँपती हुई वह नलकूबरके पास गयी और हाथ जोड़कर उनके पैरोंपर गिर पड़ी॥ ४३ १/२ ॥
रम्भाको इस अवस्थामें देखकर महामना नलकूबरने पूछा— ‘भद्रे! क्या बात है? तुम इस तरह मेरे पैरोंपर क्यों पड़ गयीं?’॥ ४४ १/२ ॥
वह थर-थर काँप रही थी। उसने लंबी साँस खींचकर हाथ जोड़ लिये और जो कुछ हुआ था, वह सब ठीक-ठीक बताना आरम्भ किया— ॥ ४५ १/२ ॥