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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

इसका अनुमोदन किया था॥ ११ ॥

इस काव्यके एक सर्गका श्रवण करनेमात्रसे ही मनुष्य एक हजार अश्वमेध और दस हजार वाजपेय यज्ञोंका फल पा लेता है॥ १२ ॥

जिसने इस लोकमें रामायणकी कथा सुन ली, उसने मानो प्रयाग आदि तीर्थों, गङ्गा आदि पवित्र नदियों, नैमिषारण्य आदि वनों और कुरुक्षेत्र आदि पुण्यक्षेत्रोंकी यात्रा पूरी कर ली॥ १३ १/२ ॥

जो सूर्यग्रहणके समय कुरुक्षेत्रमें एक भार सुवर्णका दान करता है और जो लोकमें प्रतिदिन रामायण सुनता है, वे दोनों समान पुण्यके भागी होते हैं॥ १४ १/२ ॥

जो उत्तम श्रद्धासे सम्पन्न हो श्रीरघुनाथजीकी कथा सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता और विष्णुलोकमें जाता है॥ १५ १/२ ॥

जो पूर्वकालमें वाल्मीकिद्वारा निर्मित इस आर्षरामायण आदिकाव्यका सदा भक्तिभावसे श्रवण करता है, वह भगवान् विष्णुका सारूप्य प्राप्त कर लेता है॥ १६ १/२ ॥

इसके श्रवणसे स्त्री-पुत्रोंकी प्राप्ति होती है, धन और संतति बढ़ती है। इसे पूर्णतः सत्य समझकर मनको वशमें रखते हुए इसका श्रवण करना चाहिये। यह परम उत्तम रामायणकाव्य गायत्रीका स्वरूप है॥ १७-१८ ॥

जो पुरुष प्रतिदिन भक्तिभावसे श्रीरघुनाथजीके इस चरित्रको सुनता या पढ़ता है, वह निष्पाप होकर दीर्घ आयु प्राप्त कर लेता है॥ १९ ॥

जो कल्याण-प्राप्तिकी इच्छा रखता है, उसे नित्यनिरन्तर श्रीरघुनाथजीका चिन्तन करना चाहिये। ब्राह्मणोंको प्रतिदिन यह प्रबन्धकाव्य सुनाना चाहिये॥ २० ॥

जो इस श्रीरघुनाथ-चरित्रका पाठ पूर्ण कर लेता है, वह प्राणान्त होनेपर भगवान् विष्णुके ही धाममें जाता है; इसमें संशय नहीं है॥ २१ ॥

इतना ही नहीं, उसके पिता, पितामह, प्रपितामह, वृद्ध प्रपितामह तथा उनके भी पिता भगवान् विष्णुको प्राप्त कर लेते हैं, इसमें संशय नहीं है॥ २२ ॥

श्रीराघवेन्द्रका यह चरित्र सदा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थोंको देनेवाला है। इसलिये प्रतिदिन यत्नपूर्वक निरन्तर इस उत्तम काव्यका श्रवण करना चाहिये॥ २३ ॥

जो रामायणकाव्यके श्लोकके एक चरण या एक पदका भक्तिभावसे श्रवण करता है, वह ब्रह्माजीके धाममें जाता है और सदा उनके द्वारा पूजित होता है॥ २४ ॥

इस प्रकार इस पुरातन आख्यानका आपलोग विश्वासपूर्वक पाठ करें। आपका कल्याण हो और भगवान् विष्णुके बलकी जय हो॥ २५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ ग्यारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १११ ॥

॥ उत्तरकाण्ड सम्पूर्ण ॥

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण समाप्त