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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

‘मैंने भी आमका वन काटकर पलाशोंको ही सींचा है, इस कर्मके फलकी प्राप्तिके समय अब श्रीरामको खोकर मैं पश्चात्ताप कर रहा हूँ। मेरी बुद्धि कैसी खोटी है?॥

‘कौसल्ये! पिताके जीवनकालमें जब मैं केवल राजकुमार था, एक अच्छे धनुर्धरके रूपमें मेरी ख्याति फैल गयी थी। सब लोग यही कहते थे कि ‘राजकुमार दशरथ शब्द-वेधी बाण चलाना जानते हैं।’ इसी ख्यातिमें पड़कर मैंने यह एक पाप कर डाला था (जिसे अभी बताऊँगा)॥ ११ ॥

‘देवि! उस अपने ही किये हुए कुकर्मका फल मुझे इस महान् दुःखके रूपमें प्राप्त हुआ है। जैसे कोई बालक अज्ञानवश विष खा ले तो उसे भी वह विष मार ही डालता है, उसी प्रकार मोह या अज्ञानवश किये हुए दुष्कर्मका फल भी यहाँ मुझे भोगना पड़ रहा है॥

‘जैसे दूसरा कोई गँवार मनुष्य पलाशके फूलोंपर ही मोहित हो उसके कड़वे फलको नहीं जानता, उसी प्रकार मैं भी ‘शब्दवेधी बाण-विद्या’ की प्रशंसा सुनकर उसपर लट्टू हो गया। उसके द्वारा ऐसा क्रूरतापूर्ण पापकर्म बन सकता है और ऐसा भयंकर फल प्राप्त हो सकता है, इसका ज्ञान मुझे नहीं हुआ॥ १३ ॥

‘देवि! तुम्हारा विवाह नहीं हुआ था और मैं अभी युवराज ही था, उन्हीं दिनोंकी बात है। मेरी कामभावनाको बढ़ानेवाली वर्षा ऋतु आयी॥ १४ ॥

‘सूर्यदेव पृथ्वीके रसोंको सुखाकर और जगत्को अपनी किरणोंसे भलीभाँति संतप्त करके जिसमें यमलोकवर्ती प्रेत विचरा करते हैं, उस भयंकर दक्षिण दिशामें संचरण करते थे॥ १५ ॥

‘सब ओर सजल मेघ दृष्टिगोचर होने लगे और गरमी तत्काल शान्त हो गयी; इससे समस्त मेढकों, चातकों और मयूरोंमें हर्ष छा गया॥ १६ ॥

‘पक्षियोंकी पाँखें ऊपरसे भींग गयी थीं। वे नहा उठे थे और बड़ी कठिनाईसे उन वृक्षोंतक पहुँच पाते थे, जिनकी डालियोंके अग्रभाग वर्षा और वायुके झोकोंसे झूम रहे थे॥ १७ ॥

‘गिरे हुए और बारंबार गिरते हुए जलसे आच्छादित हुआ मतवाला हाथी तरङ्गरहित प्रशान्त समुद्र तथा भीगे पर्वतके समान प्रतीत होता था॥ १८ ॥

‘पर्वतोंसे गिरनेवाले स्रोत या झरने निर्मल होनेपर भी पर्वतीय धातुओंके सम्पर्कसे श्वेत, लाल और भस्मयुक्त होकर सर्पोंकी भाँति कुटिल गतिसे बह रहे थे॥ १९ ॥

‘वर्षा ऋतुके उस अत्यन्त सुखद सुहावने समयमें मैं धनुष-बाण लेकर रथपर सवार हो शिकार खेलनेके लिये सरयू नदीके तटपर गया॥ २०॥

‘मेरी इन्द्रियाँ मेरे वशमें नहीं थीं। मैंने सोचा था कि पानी पीनेके घाटपर रातके समय जब कोई उपद्रवकारी भैंसा, मतवाला हाथी अथवा सिंह-व्याघ्र आदि दूसरा कोई हिंसक जन्तु आवेगा तो उसे मारूँगा॥ २१॥

‘उस समय वहाँ सब ओर अन्धकार छा रहा था। मुझे अकस्मात् पानीमें घड़ा भरनेकी आवाज सुनायी पड़ी। मेरी दृष्टि तो वहाँतक पहुँचती नहीं थी, किंतु वह आवाज मुझे हाथीके पानी पीते समय होनेवाले शब्दके समान जान पड़ी॥ २२॥

‘तब मैंने यह समझकर कि हाथी ही अपनी सूँड़में पानी खींच रहा होगा; अतः वही मेरे बाणका निशाना बनेगा। तरकससे एक तीर निकाला और उस शब्दको लक्ष्य करके चला दिया। वह दीप्तिमान् बाण विषधर सर्पके समान भयंकर था॥ २३॥

‘वह उषःकालकी वेला थी। विषैले सर्पके सदृश उस तीखे बाणको मैंने ज्यों ही छोड़ा, त्यों ही वहाँ पानीमें गिरते हुए किसी वनवासीका हाहाकार मुझे स्पष्टरूपसे सुनायी दिया। मेरे बाणसे उसके मर्ममें बड़ी पीड़ा हो रही थी। उस पुरुषके धराशायी हो जानेपर वहाँ यह मानव-वाणी प्रकट हुई—सुनायी देने लगी—॥ २४-२५ ॥

“आह! मेरे-जैसे तपस्वीपर शस्त्रका प्रहार कैसे सम्भव हुआ? मैं तो नदीके इस एकान्त तटपर रातमें पानी लेनेके लिये आया था॥ २६॥

“किसने मुझे बाण मारा है? मैंने किसका क्या बिगाड़ा था? मैं तो सभी जीवोंको पीड़ा देनेकी वृत्तिका त्याग करके ऋषि-जीवन बिताता था, वनमें रहकर जंगली फल-मूलोंसे ही जीविका चलाता था। मुझ-जैसे निरपराध मनुष्यका शस्त्रसे वध क्यों किया जा रहा है? मैं वल्कल और मृगचर्म पहननेवाला जटाधारी तपस्वी हूँ। मेरा वध करनेमें किसने अपना क्या लाभ सोचा होगा? मैंने मारनेवालेका क्या अपराध किया था? मेरी हत्याका प्रयत्न व्यर्थ ही किया गया! इससे किसीको कुछ लाभ नहीं होगा, केवल अनर्थ ही हाथ लगेगा॥ २७—२९॥

“इस हत्यारेको संसारमें कहीं भी कोई उसी तरह अच्छा नहीं समझेगा, जैसे गुरुपत्नीगामीको। मुझे अपने इस जीवनके नष्ट होनेकी उतनी चिन्ता नहीं है; मेरे मारे जानेसे मेरे माता-पिताको जो कष्ट होगा, उसीके लिये मुझे बारंबार शोक हो रहा है। मैंने इन दोनों वृद्धोंका बहुत समयसे पालन-पोषण किया है; अब मेरे शरीरके न रहनेपर ये किस प्रकार जीवन-निर्वाह

करेंगे? घातकने एक ही बाणसे मुझे और मेरे बूढ़े माता-पिताको भी मौतके मुखमें डाल दिया। किस विवेकहीन और अजितेन्द्रिय पुरुषने हम सब लोगोंका एक साथ ही वध कर डाला?’॥ ३०—३२ १/२ ॥

‘ये करुणाभरे वचन सुनकर मेरे मनमें बड़ी व्यथा हुई। कहाँ तो मैं धर्मकी अभिलाषा रखनेवाला था और कहाँ यह अधर्मका कार्य बन गया। उस समय मेरे हाथोंसे धनुष और बाण छूटकर पृथ्वीपर गिर पड़े॥

‘रातमें विलाप करते हुए ऋषिका वह करुण वचन सुनकर मैं शोकके वेगसे घबरा उठा। मेरी चेतना अत्यन्त विलुप्त-सी होने लगी॥ ३४ १/२ ॥

‘मेरे हृदयमें दीनता छा गयी, मन बहुत दुःखी हो गया। सरयूके किनारे उस स्थानपर जाकर मैंने देखा— एक तपस्वी बाणसे घायल होकर पड़े हैं। उनकी जटाएँ बिखरी हुई हैं, घड़ेका जल गिर गया है तथा सारा शरीर धूल और खूनमें सना हुआ है। वे बाणसे बिंधे हुए पड़े थे। उनकी अवस्था देखकर मैं डर गया, मेरा चित्त ठिकाने नहीं था। उन्होंने दोनों नेत्रोंसे मेरी ओर इस प्रकार देखा, मानो अपने तेजसे मुझे भस्म कर देना चाहते हों। वे कठोर वाणीमें यों बोले—॥ ३५—३७ १/२ ॥

“राजन्! वनमें रहते हुए मैंने तुम्हारा कौन-सा अपराध किया था, जिससे तुमने मुझे बाण मारा? मैं तो माता-पिताके लिये पानी लेनेकी इच्छासे यहाँ आया था॥ ३८ १/२ ॥

“तुमने एक ही बाणसे मेरा मर्म विदीर्ण करके मेरे दोनों अन्धे और बूढ़े माता-पिताको भी मार डाला॥ ३९ १/२ ॥

“वे दोनों बहुत दुबले और अन्धे हैं। निश्चय ही प्याससे पीड़ित होकर वे मेरी प्रतीक्षामें बैठे होंगे। वे देरतक मेरे आगमनकी आशा लगाये दुःखदायिनी प्यास लिये बाट जोहते रहेंगे॥ ४० १/२ ॥

“अवश्य ही मेरी तपस्या अथवा शास्त्रज्ञानका कोई फल यहाँ प्रकट नहीं हो रहा है; क्योंकि पिताजीको यह नहीं मालूम है कि मैं पृथ्वीपर गिरकर मृत्युशय्यापर पड़ा हुआ हूँ॥ ४१ १/२ ॥

“यदि जान भी लें तो क्या कर सकते हैं; क्योंकि असमर्थ हैं और चल-फिर भी नहीं सकते हैं। जैसे वायु आदिके द्वारा तोड़े जाते हुए वृक्षको कोई दूसरा वृक्ष नहीं बचा सकता, उसी

प्रकार मेरे पिता भी मेरी रक्षा नहीं कर सकते॥ ४२ १/२ ॥

“अतः रघुकुलनरेश! अब तुम्हीं जाकर शीघ्र ही मेरे पिताको यह समाचार सुना दो। (यदि स्वयं कह दोगे तो) जैसे प्रज्वलित अग्नि समूचे वनको जला डालती है, उस प्रकार वे क्रोधमें भरकर तुमको भस्म नहीं करेंगे॥ ४३ १/२ ॥

“राजन्! यह पगडंडी उधर ही गयी है, जहाँ मेरे पिताका आश्रम है। तुम जाकर उन्हें प्रसन्न करो, जिससे वे कुपित होकर तुम्हें शाप न दें॥ ४४ १/२ ॥

“राजन्! मेरे शरीरसे इस बाणको निकाल दो। यह तीखा बाण मेरे मर्मस्थानको उसी प्रकार पीड़ा दे रहा है, जैसे नदीके जलका वेग उसके कोमल बालुकामय ऊँचे तटको छिन्न-भिन्न कर देता है'॥ ४५ १/२ ॥

'मुनिकुमारकी यह बात सुनकर मेरे मनमें यह चिन्ता समायी कि यदि बाण नहीं निकालता हूँ तो इन्हें क्लेश होता है और निकाल देता हूँ तो ये अभी प्राणोंसे भी हाथ धो बैठते हैं। इस प्रकार बाणको निकालनेके विषयमें मुझ दीन-दुःखी और शोकाकुल दशरथकी इस चिन्ताको उस समय मुनिकुमारने लक्ष्य किया॥ ४६-४७ १/२ ॥

'यथार्थ बातको समझ लेनेवाले उन महर्षिने मुझे अत्यन्त ग्लानिमें पड़ा हुआ देख बड़े कष्टसे कहा— ‘राजन्! मुझे बड़ा कष्ट हो रहा है। मेरी आँखें चढ़ गयी हैं, अङ्ग-अङ्गमें तड़पन हो रही है। मुझसे कोई चेष्टा नहीं बन पाती। अब मैं मृत्युके समीप पहुँच गया हूँ, फिर भी धैर्यके द्वारा शोकको रोककर अपने चित्तको स्थिर करता हूँ (अब मेरी बात सुनो)॥ ४८-४९ ॥

“मुझसे ब्रह्महत्या हो गयी—इस चिन्ताको अपने हृदयसे निकाल दो। राजन्! मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, इसलिये तुम्हारे मनमें ब्राह्मणवधको लेकर कोई व्यथा नहीं होनी चाहिये॥ ५० ॥

“नरश्रेष्ठ! मैं वैश्य पिताद्वारा शूद्रजातीय माताके गर्भसे उत्पन्न हुआ हूँ।' बाणसे मर्ममें आघात पहुँचनेके कारण वे बड़े कष्टसे इतना ही कह सके। उनकी आँखें घूम रही थीं। उनसे कोई चेष्टा नहीं बनती थी। वे पृथ्वीपर पड़े-पड़े छटपटा रहे थे और अत्यन्त कष्टका अनुभव करते थे। उस अवस्थामें मैंने उनके शरीरसे उस बाणको निकाल दिया। फिर तो अत्यन्त भयभीत हो उन तपोधनने मेरी ओर देखकर अपने प्राण त्याग दिये॥ ५१ ॥

'पानीमें गिरनेके कारण उनका सारा शरीर भीग गया था। मर्ममें आघात लगनेके कारण बड़े कष्टसे विलाप करके और बारंबार उच्छ्वास लेकर उन्होंने प्राणोंका त्याग किया था।

कल्याणी कौसल्ये! उस अवस्थामें सरयूके तटपर मरे पड़े मुनिपुत्रको देखकर मुझे बड़ा दुःख हुआ' ॥ ५३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६३॥

चौंसठवाँ सर्ग

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चौंसठवाँ सर्ग

राजा दशरथका अपने द्वारा मुनिकुमारके वधसे दुःखी हुए उनके माता-पिताके विलाप और उनके दिये हुए शापका प्रसंग सुनाकर कौसल्याके समीप रोते-बिलखते हुए आधी रातके समय अपने प्राणोंको त्याग देना

उन महर्षिके अनुचित वधका स्मरण करके धर्मात्मा रघुकुलनरेशने अपने पुत्रके लिये विलाप करते हुए ही रानी कौसल्यासे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

‘देवि! अनजानमें यह महान् पाप कर डालनेके कारण मेरी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो रही थीं। मैं अकेला ही बुद्धि लगाकर सोचने लगा, अब किस उपायसे मेरा कल्याण हो?॥ २ ॥

‘तदनन्तर उस घड़ेको उठाकर मैंने सरयूके उत्तम जलसे भरा और उसे लेकर मुनिकुमारके बताये हुए मार्गसे उनके आश्रमपर गया॥ ३ ॥

‘वहाँ पहुँचकर मैंने उनके दुबले, अन्धे और बूढ़े माता-पिताको देखा, जिनका दूसरा कोई सहायक नहीं था। उनकी अवस्था पंख कटे हुए दो पक्षियोंके समान थी॥ ४ ॥

‘वे अपने पुत्रकी ही चर्चा करते हुए उसके आनेकी आशा लगाये बैठे थे। उस चर्चाके कारण उन्हें कुछ परिश्रम या थकावटका अनुभव नहीं होता था। यद्यपि मेरे कारण उनकी वह आशा धूलमें मिल चुकी थी तो भी वे उसीके आसरे बैठे थे। अब वे दोनों सर्वथा अनाथ-से हो गये थे॥ ५ ॥

‘मेरा हृदय पहलेसे ही शोकके कारण घबराया हुआ था। भयसे मेरा होश ठिकाने नहीं था। मुनिके आश्रमपर पहुँचकर मेरा वह शोक और भी अधिक हो गया॥ ६ ॥

‘मेरे पैरोंकी आहट सुनकर वे मुनि इस प्रकार बोले—‘बेटा! देर क्यों लगा रहे हो? शीघ्र पानी ले आओ॥ ७ ॥

‘“तात! जिस कारणसे तुमने बड़ी देरतक जलमें क्रीड़ा की है, उसी कारणको लेकर तुम्हारी यह माता तुम्हारे लिये उत्कण्ठित हो गयी है; अतः शीघ्र ही आश्रमके भीतर प्रवेश करो॥ ८ ॥

‘“बेटा! तात! यदि तुम्हारी माताने अथवा मैंने तुम्हारा कोई अप्रिय किया हो तो उसे तुम्हें अपने मनमें नहीं लाना चाहिये; क्योंकि तुम तपस्वी हो॥ ९ ॥

‘हम असहाय हैं, तुम्हीं हमारे सहायक हो। हम अन्धे हैं, तुम्हीं हमारे नेत्र हो। हमलोगोंके प्राण तुम्हींमें अटके हुए हैं। बताओ, तुम बोलते क्यों नहीं हो?’॥ १०॥

‘मुनिको देखते ही मेरे मनमें भय-सा समा गया। मेरी जबान लड़खड़ाने लगी। कितने अक्षरोंका उच्चारण नहीं हो पाता था। इस प्रकार अस्पष्ट वाणीमें मैंने बोलनेका प्रयास किया॥ ११॥

‘मानसिक भयको बाहरी चेष्टाओंसे दबाकर मैंने कुछ कहनेकी क्षमता प्राप्त की और मुनिपर पुत्रकी मृत्युसे जो संकट आ पड़ा था, वह उनपर प्रकट करते हुए कहा—॥ १२॥

“महात्मन्! मैं आपका पुत्र नहीं, दशरथ नामका एक क्षत्रिय हूँ। मैंने अपने कर्मवश यह ऐसा दुःख पाया है, जिसकी सत्पुरुषोंने सदा निन्दा की है॥ १३॥

“भगवन्! मैं धनुष-बाण लेकर सरयूके तटपर आया था। मेरे आनेका उद्देश्य यह था कि कोऽइ जंगली हिंसक पशु अथवा हाथी घाटपर पानी पीनेके लिये आवे तो मैं उसे मारूँ॥ १४॥

“थोड़ी देर बाद मुझे जलमें घड़ा भरनेका शब्द सुनायी पड़ा। मैंने समझा कोऽइ हाथी आकर पानी पी रहा है, इसलिये उसपर बाण चला दिया॥ १५॥

“फिर सरयूके तटपर जाकर देखा कि मेरा बाण एक तपस्वीकी छातीमें लगा है और वे मृतप्राय होकर धरतीपर पड़े हैं॥ १६॥

“उस बाणसे उन्हें बड़ी पीड़ा हो रही थी, अतः उस समय उन्हींके कहनेसे मैंने सहसा वह बाण उनके मर्म-स्थानसे निकाल दिया॥ १७॥

“बाण निकलनेके साथ ही वे तत्काल स्वर्ग सिधार गये। मरते समय उन्होंने आप दोनों पूजनीय अंधे पिता-माताके लिये बड़ा शोक और विलाप किया था॥ १८॥

“इस प्रकार अनजानमें मेरे हाथसे आपके पुत्रका वध हो गया है। ऐसी अवस्थामे मेरे प्रति जो शाप या अनुग्रह शेष हो, उसे देनेके लिये आप महर्षि मुझपर प्रसन्न हों’॥ १९॥

‘मैंने अपने मुँहसे अपना पाप प्रकट कर दिया था, इसलिये मेरी क्रूरतासे भरी हुऽइ वह बात सुनकर भी वे पूज्यपाद महर्षि मुझे कठोर दण्ड—भस्म हो जानेका शाप नहीं दे सके॥ २० ॥

‘उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह चली और वे शोकसे मूर्च्छित होकर दीर्घ निःश्वास लेने लगे। मैं हाथ जोड़े उनके सामने खड़ा था। उस समय उन महातेजस्वी मुनिने मुझसे कहा—॥ २१

“राजन्! यदि यह अपना पापकर्म तुम स्वयं यहाँ आकर न बताते तो शीघ्र ही तुम्हारे मस्तकके सैकड़ों-हजारों टुकड़े हो जाते॥ २२ ॥

“नरेश्वर! यदि क्षत्रिय जान-बूझकर विशेषतः किसी वानप्रस्थीका वध कर डाले तो वह वज्रधारी इन्द्र ही क्यों न हो, वह उसे अपने स्थानसे भ्रष्ट कर देता है॥

“तपस्यामें लगे हुए वैसे ब्रह्मवादी मुनिपर जान-बूझकर शस्त्रका प्रहार करनेवाले पुरुषके मस्तकके सात टुकड़े हो जाते हैं॥ २४ ॥

“तुमने अनजानमें यह पाप किया है, इसीलिये अभीतक जीवित हो। यदि जान-बूझकर किया होता तो समस्त रघुवंशियोंका कुल ही नष्ट हो जाता, अकेले तुम्हारी तो बात ही क्या है?’॥ २५ ॥

‘उन्होंने मुझसे यह भी कहा— ‘नरेश्वर! तुम हम दोनोंको उस स्थानपर ले चलो, जहाँ हमारा पुत्र मरा पड़ा है। इस समय हम उसे देखना चाहते हैं। यह हमारे लिये उसका अन्तिम दर्शन होगा’॥ २६ ॥

‘तब मैं अकेला ही अत्यन्त दुःखमें पड़े हुए उन दम्पतिको उस स्थानपर ले गया, जहाँ उनका पुत्र कालके अधीन होकर पृथ्वीपर अचेत पड़ा था। उसके सारे अङ्ग खूनसे लथपथ हो रहे थे, मृगचर्म और वस्त्र बिखरे पड़े थे। मैंने पत्नीसहित मुनिको उनके पुत्रके शरीरका स्पर्श कराया॥ २७-२८ ॥

‘वे दोनों तपस्वी अपने उस पुत्रका स्पर्श करके उसके अत्यन्त निकट जाकर उसके शरीरपर गिर पड़े। फिर पिताने पुत्रको सम्बोधित करके उससे कहा— ॥ २९ ॥

“बेटा! आज तुम मुझे न तो प्रणाम करते हो और न मुझसे बोलते ही हो। तुम धरतीपर क्यों सो रहे हो? क्या तुम हमसे रूठ गये हो?॥ ३० ॥

“बेटा! यदि मैं तुम्हारा प्रिय नहीं हूँ तो तुम अपनी इस धर्मात्मा माताकी ओर तो देखो। तुम इसके हृदयसे क्यों नहीं लग जाते हो? वत्स! कुछ तो बोलो॥ ३१ ॥

“अब पिछली रातमें मधुर स्वरसे शास्त्र या पुराण आदि अन्य किसी ग्रन्थका विशेषरूपसे स्वाध्याय करते हुए किसके मुँहसे मैं मनोरम शास्त्रचर्चा सुनूँगा?॥ ३२ ॥

“अब कौन स्नान, संध्योपासना तथा अग्निहोत्र करके मेरे पास बैठकर पुत्रशोकके भयसे पीड़ित हुए मुझ बूढ़ेको सान्त्वना देता हुआ मेरी सेवा करेगा?॥ ३३ ॥

“अब कौन ऐसा है, जो कन्द, मूल और फल लाकर मुझ अकर्मण्य, अन्नसंग्रहसे रहित और अनाथको प्रिय अतिथिकी भाँति भोजन करायेगा॥ ३४ ॥

“बेटा! तुम्हारी यह तपस्विनी माता अन्धी, बूढ़ी, दीन तथा पुत्रके लिये उत्कण्ठित रहनेवाली है। मैं (स्वयं अन्धा होकर) इसका भरण-पोषण कैसे करूँगा?॥

“पुत्र! ठहरो, आज यमराजके घर न जाओ। कल मेरे और अपनी माताके साथ चलना॥ ३६ ॥

“हम दोनों शोकसे आर्त, अनाथ और दीन हैं। तुम्हारे न रहनेपर हम शीघ्र ही यमलोककी राह लेंगे॥

“तदनन्तर सूर्यपुत्र यमराजका दर्शन करके मैं उनसे यह बात कहूँगा—धर्मराज मेरे अपराधको क्षमा करें और मेरे पुत्रको छोड़ दें, जिससे यह अपने माता-पिताका भरण-पोषण कर सके॥ ३८ ॥

“ये धर्मात्मा हैं, महायशस्वी लोकपाल हैं। मुझ-जैसे अनाथको वह एक बार अभय दान दे सकते हैं॥

“बेटा! तुम निष्पाप हो, किंतु एक पापकर्मा क्षत्रियने तुम्हारा वध किया है, इस कारण मेरे सत्यके प्रभावसे तुम शीघ्र ही उन लोकोंमें जाओ, जो अस्त्रयोधी शूरवीरोंको प्राप्त होते हैं। बेटा! युद्धमें पीठ न दिखानेवाले शूरवीर सम्मुख युद्धमें मारे जानेपर जिस गतिको प्राप्त होते हैं, उसी उत्तम गतिको तुम भी जाओ॥ ४०-४१ ॥

‘वत्स! राजा सगर, शैब्य, दिलीप, जनमेजय, नहुष और धुन्धुमार जिस गतिको प्राप्त हुए हैं, वही तुम्हें भी मिले॥ ४२ ॥

“स्वाध्याय और तपस्यासे समस्त प्राणियोंके आश्रयभूत जिस परब्रह्मकी प्राप्ति होती है, वही तुम्हें भी प्राप्त हो। वत्स! भूमिदाता, अग्निहोत्री, एकपत्नीव्रती, एक हजार गौओंका दान करनेवाले, गुरुकी सेवा करनेवाले तथा महाप्रस्थान आदिके द्वारा देहत्याग करनेवाले पुरुषोंको जो गति मिलती है, वही तुम्हें भी प्राप्त हो॥

“हम-जैसे तपस्वियोंके इस कुलमें पैदा हुआ कोई पुरुष बुरी गतिको नहीं प्राप्त हो सकता। बुरी गति तो उसकी होगी, जिसने मेरे बान्धवरूप तुम्हें अकारण मारा है?’॥ ४५ ॥

‘इस प्रकार वे दीनभावसे बारम्बार विलाप करने लगे। तत्पश्चात् अपनी पत्नीके साथ वे पुत्रको जलाञ्जलि देनेके कार्यमें प्रवृत्त हुए॥ ४६ ॥

‘इसी समय वह धर्मज्ञ मुनिकुमार अपने पुण्य-कर्मोंके प्रभावसे दिव्य रूप धारण करके शीघ्र ही इन्द्रके साथ स्वर्गको जाने लगा॥ ४७ ॥

‘इन्द्रसहित उस तपस्वीने अपने दोनों बूढ़े पिता-माताको एक मुहूर्ततक आश्वासन देते हुए उनसे बातचीत की; फिर वह अपने पितासे बोला— ॥ ४८ ॥

“‘मैं आप दोनोंकी सेवासे महान् स्थानको प्राप्त हुआ हूँ, अब आपलोग भी शीघ्र ही मेरे पास आ जाइयेगा’॥ ४९ ॥

‘यह कहकर वह जितेन्द्रिय मुनिकुमार उस सुन्दर आकारवाले दिव्य विमानसे शीघ्र ही देवलोकको चला गया॥ ५० ॥

‘तदनन्तर पत्नीसहित उन महातेजस्वी तपस्वी मुनिने तुरंत ही पुत्रको जलाञ्जलि देकर हाथ जोड़े खड़े हुए मुझसे कहा— ॥ ५१ ॥

“‘राजन्! तुम आज ही मुझे भी मार डालो; अब मरनेमें मुझे कष्ट नहीं होगा। मेरे एक ही बेटा था, जिसे तुमने अपने बाणका निशाना बनाकर मुझे पुत्रहीन कर दिया॥ ५२ ॥

“‘तुमने अज्ञानवश जो मेरे बालककी हत्या की है, उसके कारण मैं तुम्हें भी अत्यन्त भयंकर एवं भलीभाँति दुःख देनेवाला शाप दूँगा॥ ५३ ॥

‘राजन्! इस समय पुत्रके वियोगसे मुझे जैसा कष्ट हो रहा है, ऐसा ही तुम्हें भी होगा। तुम भी पुत्रशोकसे ही कालके गालमें जाओगे॥ ५४ ॥

“‘नरेश्वर! क्षत्रिय होकर अनजानमें तुमने वैश्यजातीय मुनिका वध किया है, इसलिये शीघ्र ही तुम्हें ब्रह्महत्याका पाप तो नहीं लगेगा तथापि जल्दी ही तुम्हें भी ऐसी ही भयानक और प्राण लेनेवाली अवस्था प्राप्त होगी। ठीक उसी तरह, जैसे दक्षिणा देनेवाले दाताको उसके अनुरूप फल प्राप्त होता है,॥ ५५-५६ ॥

‘इस प्रकार मुझे शाप देकर वे बहुत देरतक करुणाजनक विलाप करते रहे; फिर वे दोनों पति-पत्नी अपने शरीरोंको जलती हुई चितामें डालकर स्वर्गको चले गये॥ ५७ ॥

‘देवि! इस प्रकार बालस्वभावके कारण मैंने पहले शब्दवेधी बाण मारकर और फिर उस मुनिके शरीरसे बाणको खींचकर जो उनका वधरूपी पाप किया था, वह आज इस पुत्रवियोगकी चिन्तामें पड़े हुए मुझे स्वयं ही स्मरण हो आया है॥ ५८ ॥

‘देवि! अपथ्य वस्तुओंके साथ अन्नरस ग्रहण कर लेनेपर जैसे शरीरमें रोग पैदा हो जाता है, उसी प्रकार यह उस पापकर्मका फल उपस्थित हुआ है। अतः कल्याणि! उन उदार महात्माका शापरूपी वचन इस समय मेरे पास फल देनेके लिये आ गया है’॥ ५९ १/२ ॥

ऐसा कहकर वे भूपाल मृत्युके भयसे त्रस्त हो अपनी पत्नीसे रोते हुए बोले— ‘कौसल्ये! अब मैं पुत्रशोकसे अपने प्राणोंका त्याग करूँगा। इस समय मैं तुम्हें अपनी आँखोंसे देख नहीं पाता हूँ; तुम मेरा स्पर्श करो॥ ६०-६१ ॥

‘जो मनुष्य यमलोकमें जानेवाले (मरणासन्न) होते हैं, वे अपने बान्धवजनोंको नहीं देख पाते हैं। यदि श्रीराम आकर एक बार मेरा स्पर्श करें अथवा यह धनवैभव और युवराजपद स्वीकार कर लें तो मेरा विश्वास है कि मैं जी सकता हूँ॥ ६२ १/२ ॥

‘देवि! मैंने श्रीरामके साथ जो बर्ताव किया है, वह मेरे योग्य नहीं था; परंतु श्रीरामने मेरे साथ जो व्यवहार किया है, वह सर्वथा उन्हींके योग्य है॥ ६३ १/२ ॥

‘कौन बुद्धिमान् पुरुष इस भूतलपर अपने दुराचारी पुत्रका भी परित्याग कर सकता है? (एक मैं हूँ, जिसने अपने धर्मात्मा पुत्रको त्याग दिया) तथा कौन ऐसा पुत्र है, जिसे घरसे निकाल दिया जाय और वह पिताको कोसेतक नहीं? (परंतु श्रीराम चुपचाप चले गये। उन्होंने मेरे विरुद्ध एक शब्द भी नहीं कहा)॥ ६४ १/२ ॥

‘कौसल्ये! अब मेरी आँखें तुम्हें नहीं देख पाती हैं, स्मरण-शक्ति भी लुप्त होती जा रही है। उधर देखो, ये यमराजके दूत मुझे यहाँसे ले जानेके लिये उतावले हो उठे हैं॥ ६५ १/२ ॥

‘इससे बढ़कर दुःख मेरे लिये और क्या हो सकता है कि मैं प्राणान्तके समय सत्यपराक्रमी धर्मज्ञ रामका दर्शन नहीं पा रहा हूँ॥ ६६ १/२ ॥

‘जिनकी समता करनेवाला संसारमें दूसरा कोऽइ नहीं है, उन प्रिय पुत्र श्रीरामके न देखनेका शोक मेरे प्राणोंको उसी तरह सुखाये डालता है, जैसे धूप थोड़े-से जलको शीघ्र सुखा देती है॥ ६७ १/२ ॥

‘वे मनुष्य नहीं देवता हैं, जो आपके पंद्रहवें वर्ष वनसे लौटनेपर श्रीरामका सुन्दर मनोहर कुण्डलोंसे अलंकृत मुख देखेंगे॥ ६८ १/२ ॥

‘जो कमलके समान नेत्र, सुन्दर भौंहें, स्वच्छ दाँत और मनोहर नासिकासे सुशोभित श्रीरामके चन्द्रोपम मुखका दर्शन करेंगे, वे धन्य हैं॥ ६९ १/२ ॥

‘जो मेरे श्रीरामके शरच्चन्द्रसदृश मनोहर और प्रफुल्ल कमलके समान सुवासित मुखका दर्शन करेंगे, वे धन्य हैं। जैसे (मूढ़ता आदि अवस्थाओंको त्यागकर अपने उच्च) मार्गमें स्थित शुक्रका दर्शन करके लोग सुखी होते हैं, उसी प्रकार वनवासकी अवधि पूरी करके पुनः अयोध्यामें लौटकर आये हुए श्रीरामको जो लोग देखेंगे वे ही सुखी होंगे॥ ७०-७१ १/२ ॥

‘कौसल्ये! मेरे चित्तपर मोह छा रहा है, हृदय विदीर्ण-सा हो रहा है, इन्द्रियोंसे संयोग होनेपर भी मुझे शब्द, स्पर्श और रस आदि विषयोंका अनुभव नहीं हो रहा है॥ ७२ १/२ ॥

‘जैसे तेल समाप्त हो जानेपर दीपककी अरुण प्रभा विलीन हो जाती है, उसी प्रकार चेतनाके नष्ट होनेसे मेरी सारी इन्द्रियाँ ही नष्ट हो चली हैं॥ ७३ ॥

‘जिस प्रकार नदीका वेग अपने ही किनारेको काट गिराता है, उसी प्रकार मेरा अपना ही उत्पन्न किया हुआ शोक मुझे वेगपूर्वक अनाथ और अचेत किये दे रहा है॥ ७४ ॥

‘हा महाबाहु रघुनन्दन! हा मेरे कष्टोंको दूर करनेवाले श्रीराम! हा पिताके प्रिय पुत्र! हा मेरे नाथ! हा मेरे बेटे! तुम कहाँ चले गये?॥ ७५ ॥

‘हा कौसल्ये! अब मुझे कुछ नहीं दिखायी देता। हा तपस्विनि सुमित्रे! अब मैं इस लोकसे जा रहा हूँ। हा मेरी शत्रु, क्रूर, कुलाङ्गार कैकेयि! (तेरी कुटिल इच्छा पूरी हुईऽ)’॥ ७६ ॥

इस प्रकार श्रीराम-माता कौसल्या और सुमित्राके निकट शोकपूर्ण विलाप करते हुए राजा दशरथके जीवनका अन्त हो गया॥ ७७ ॥

अपने प्रिय पुत्रके वनवाससे शोकाकुल हुए राजा दशरथ इस प्रकार दीनतापूर्ण वचन कहते हुए आधी रात बीतते-बीतते अत्यन्त दुःखसे पीड़ित हो गये और उसी समय उन उदारदर्शी नरेशने अपने प्राणोंको त्याग दिया॥ ७८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६४॥

पैंसठवाँ सर्ग

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पैंसठवाँ सर्ग

वन्दीजनोंका स्तुतिपाठ, राजा दशरथको दिवंगत हुआ जान उनकी रानियोंका करुण विलाप

तदनन्तर रात बीतनेपर दूसरे दिन सबेरे ही वन्दीजन (महाराजकी स्तुति करनेके लिये) राजमहलमें उपस्थित हुए॥ १ ॥

व्याकरण-ज्ञानसे सम्पन्न (अथवा उत्तम अलङ्कारोंसे विभूषित) सूत, उत्तमरूपसे वंशपरम्पराका श्रवण करानेवाले मागध और सङ्गीतशास्त्रका अनुशीलन करनेवाले गायक अपने-अपने मार्गके अनुसार पृथक्-पृथक् यशोगान करते हुए वहाँ आये॥ २ ॥

उच्चस्वरसे आशीर्वाद देते हुए राजाकी स्तुति करनेवाले उन सूत-मागध आदिका शब्द राजमहलोंके भीतरी भागमें फैलकर गूँजने लगा॥ ३ ॥

वे सूतगण स्तुति कर रहे थे; इतनेहीमें पाणिवादक (हाथोंसे ताल देकर गानेवाले) वहाँ आये और राजाओंके बीते हुए अद्भुत कर्मोंका बखान करते हुए तालगतिके अनुसार तालियाँ बजाने लगे॥ ४ ॥

उस शब्दसे वृक्षोंकी शाखाओंपर बैठे हुए तथा राजकुलमें ही विचरनेवाले पिंजड़ेमें बंद शुक आदि पक्षी जागकर चहचहाने लगे॥ ५ ॥

शुक आदि पक्षियों तथा ब्राह्मणोंके मुखसे निकले हुए पवित्र शब्द, वीणाओंके मधुर नाद तथा गाथाओंके आशीर्वादयुक्त गानसे वह सारा भवन गूँज उठा॥ ६ ॥

तदनन्तर सदाचारी तथा परिचर्याकुशल सेवक, जिनमें स्त्रियों और खोजोंकी संख्या अधिक थी, पहलेकी भाँति उस दिन भी राजभवनमें उपस्थित हुए॥ ७ ॥

स्नानविधिके ज्ञाता भृत्यजन विधिपूर्वक सोनेके घड़ोंमें चन्दनमिश्रित जल लेकर ठीक समयपर आये॥ ८ ॥

पवित्र आचार-विचारवाली स्त्रियाँ, जिनमें कुमारी कन्याओंकी संख्या अधिक थी, मङ्गलके लिये स्पर्श करने योग्य गौ आदि, पीनेयोग्य गङ्गाजल आदि तथा अन्य उपकरण—दर्पण, आभूषण और वस्त्र आदि ले आयीं॥ ९ ॥

प्रातःकाल राजाओंके मङ्गलके लिये जो-जो वस्तुएँ लायी जाती हैं, उनका नाम आभिहारिक है। वहाँ लायी गयी सारी आभिहारिक सामग्री समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, विधिके अनुरूप, आदर और प्रशंसाके योग्य उत्तम गुणसे युक्त तथा शोभायमान थी॥ १० ॥

सूर्योदय होनेतक राजाकी सेवाके लिये उत्सुक हुआ सारा परिजनवर्ग वहाँ आकर खड़ा हो गया। जब उस समयतक राजा बाहर नहीं निकले, तब सबके मनमें यह शङ्का हो गयी कि महाराजके न आनेका क्या कारण हो सकता है?॥ ११ ॥

तदनन्तर जो कोसलनरेश दशरथके समीप रहनेवाली स्त्रियाँ थीं, वे उनकी शय्याके पास जाकर अपने स्वामीको जगाने लगीं॥ १२ ॥

वे स्त्रियाँ उनका स्पर्श आदि करनेके योग्य थीं; अतः विनीतभावसे युक्तिपूर्वक उन्होंने उनकी शय्याका स्पर्श किया। स्पर्श करके भी वे उनमें जीवनका कोई चिह्न नहीं पा सकीं॥ १३ ॥

सोये हुए पुरुषकी जैसी स्थिति होती है, उसको भी वे स्त्रियाँ अच्छी तरह समझती थीं; अतः उन्होंने हृदय एवं हाथके मूलभागमें चलनेवाली नाड़ियोंकी भी परीक्षा की, किंतु वहाँ भी कोई चेष्टा नहीं प्रतीत हुई। फिर तो वे काँप उठीं। उनके मनमें राजाके प्राणोंके निकल जानेकी आशङ्का हो गयी॥ १४ ॥

वे जलके प्रवाहके सम्मुख पड़े हुए तिनकोंके अग्रभागकी भाँति काँपती हुई प्रतीत होने लगीं। संशयमें पड़ी हुई उन स्त्रियोंको राजाकी ओर देखकर उनकी मृत्युके विषयमें जो शङ्का हुई थी, उसका उस समय उन्हें पूरा निश्चय हो गया॥ १५ ॥

पुत्रशोकसे आक्रान्त हुई कौसल्या और सुमित्रा उस समय मरी हुईके समान सो गयी थीं और उस समयतक उनकी नींद नहीं खुल पायी थी॥ १६ ॥

सोयी हुई कौसल्या श्रीहीन हो गयी थीं। उनके शरीरका रंग बदल गया था। वे शोकसे पराजित एवं पीड़ित हो अन्धकारसे आच्छादित हुई तारिकाके समान शोभा नहीं पा रही थीं॥ १७ ॥

राजाके पास कौसल्या थीं और कौसल्याके समीप देवी सुमित्रा थीं। दोनों ही निद्रामग्न हो जानेके कारण शोभाहीन प्रतीत होती थीं। उन दोनोंके मुखपर शोकके आँसू फैले हुए थे॥ १८ ॥

उस समय उन दोनों देवियोंको निद्रामग्न देख अन्तःपुरकी अन्य स्त्रियोंने यही समझा कि सोते अवस्थामें ही महाराजके प्राण निकल गये हैं॥ १९ ॥

फिर तो जैसे जंगलमें यूथपति गजराजके अपने वासस्थानसे अन्यत्र चले जानेपर हथिनियाँ करुण चीत्कार करने लगती हैं, उसी प्रकार वे अन्तःपुरकी सुन्दरी रानियाँ अत्यन्त दुःखी हो उच्चस्वरसे आर्तनाद करने लगीं॥ २० ॥

उनके रोनेकी आवाजसे कौसल्या और सुमित्राकी भी नींद टूट गयी और वे दोनों सहसा जाग उठीं॥ २१ ॥

कौसल्या और सुमित्राने राजाको देखा, उनके शरीरका स्पर्श किया और ‘हा नाथ!’ की पुकार मचाती हुई वे दोनों रानियाँ पृथ्वीपर गिर पड़ीं॥ २२ ॥

कोसलराजकुमारी कौसल्या धरतीपर लोटने और छटपटाने लगीं। उनका धूलि-धूसरित शरीर शोभाहीन दिखायी देने लगा, मानो आकाशसे टूटकर गिरी हुई कोई तारा धूलमें लोट रही हो॥ २३ ॥

राजा दशरथके शरीरकी उष्णता शान्त हो गयी थी। इस प्रकार उनका जीवन शान्त हो जानेपर भूमिपर अचेत पड़ी हुई कौसल्याको अन्तःपुरकी उन सारी स्त्रियोंने मरी हुई नागिनके समान देखा॥ २४ ॥

तदनन्तर पीछे आयी हुई महाराजकी कैकेयी आदि सारी रानियाँ शोकसे संतप्त होकर रोने लगीं और अचेत होकर गिर पड़ीं॥ २५ ॥

उन क्रन्दन करती हुई रानियोंने वहाँ पहलेसे होनेवाले प्रबल आर्तनादको और भी बढ़ा दिया। उस बढ़े हुए आर्तनादसे वह सारा राजमहल पुनः बड़े जोरसे गूँज उठा॥

कालधर्मको प्राप्त हुए राजा दशरथका वह भवन डरे, घबराये और अत्यन्त उत्सुक हुए मनुष्योंसे भर गया। सब ओर रोने-चिल्लानेका भयंकर शब्द होने लगा। वहाँ राजाके सभी बन्धु-बान्धव शोक-संतापसे पीड़ित होकर जुट गये। वह सारा भवन तत्काल आनन्दशून्य हो दीन-दुःखी एवं व्याकुल दिखायी देने लगा॥ २७-२८ ॥

उन यशस्वी भूपालशिरोमणिको दिवङ्गत हुआ जान उनकी सारी पत्नियाँ उन्हें चारों ओरसे घेरकर अत्यन्त दुःखी हो जोर-जोरसे रोने लगीं और उनकी दोनों बाँहें पकड़कर अनाथकी भाँति करुण-विलाप करने लगीं॥ २९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पैंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६५॥

छाछठवाँ सर्ग

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छाछठवाँ सर्ग

राजाके लिये कौसल्याका विलाप और कैकेयीकी भर्त्सना, मन्त्रियोंका राजाके शवको तेलसे भरे हुए कड़ाहमें सुलाना, रानियोंका विलाप, पुरीकी श्रीहीनता और पुरवासियोंका शोक

बुझी हुई आग, जलहीन समुद्र तथा प्रभाहीन सूर्यकी भाँति शोभाहीन हुए दिवङ्गत राजाका शव देखकर कौसल्याके नेत्रोंमें आँसू भर आये। वे अनेक प्रकारसे शोकाकुल होकर राजाके मस्तकको गोदमें ले कैकेयीसे इस प्रकार बोलीं— ॥ १-२ ॥

‘दुराचारिणी क्रूर कैकेयी! ले, तेरी कामना सफल हुई। अब राजाको भी त्यागकर एकाग्रचित्त हो अपना अकण्टक राज्य भोग॥ ३ ॥

‘राम मुझे छोड़कर वनमें चले गये और मेरे स्वामी स्वर्ग सिधारे। अब मैं दुर्गम मार्गमें साथियोंसे बिछुड़कर असहाय हुई अबलाकी भाँति जीवित नहीं रह सकती॥

‘नारीधर्मको त्याग देनेवाली कैकेयीके सिवा संसारमें दूसरी कौन ऐसी स्त्री होगी जो अपने लिये आराध्य देवस्वरूप पतिका परित्याग करके जीना चाहेगी?॥ ५ ॥

‘जैसे कोई धनका लोभी दूसरोंको विष खिला देता है और उससे होनेवाले हत्याके दोषोंपर ध्यान नहीं देता, उसी प्रकार इस कैकेयीने कुब्जाके कारण रघुवंशियोंके इस कुलका नाश कर डाला॥ ६ ॥

‘कैकेयीने महाराजको अयोग्य कार्यमें लगाकर उनके द्वारा पत्नीसहित श्रीरामको वनवास दिलवा दिया। यह समाचार जब राजा जनक सुनेंगे, तब मेरे ही समान उनको भी बड़ा कष्ट होगा॥ ७ ॥

‘मैं अनाथ और विधवा हो गयी—यह बात मेरे धर्मात्मा पुत्र कमलनयन श्रीरामको नहीं मालूम है। वे तो यहाँसे जीते-जी अदृश्य हो गये हैं॥ ८ ॥

‘पति-सेवारूप मनोहर तप करनेवाली विदेहराजकुमारी सीता दुःख भोगनेके योग्य नहीं है। वह वनमें दुःखका अनुभव करके उद्विग्न हो उठेगी॥ ९ ॥

‘रातके समय भयानक शब्द करनेवाले पशु-पक्षियोंकी बोली सुनकर भयभीत हो सीता श्रीरामकी ही शरण लेगी—उन्हींकी गोदमें जाकर छिपेगी॥ १० ॥

‘जो बूढ़े हो गये हैं, कन्याएँमात्र ही जिनकी संतति हैं, वे राजा जनक भी सीताकी ही बारम्बार चिन्ता करते हुए शोकमें डूबकर अवश्य ही अपने प्राणोंका परित्याग कर देंगे॥ ११ ॥

‘मैं भी आज ही मृत्युका वरण करूँगी। एक पतिव्रताकी भाँति पतिके शरीरका आलिङ्गन करके चिताकी आगमें प्रवेश कर जाऊँगी’॥ १२ ॥

पतिके शरीरको हृदयसे लगाकर अत्यन्त दुःखसे आर्त हो करुण विलाप करती हुईं तपस्विनी कौसल्याको राजकाज देखनेवाले मन्त्रियोंने दूसरी स्त्रियोंद्वारा वहाँसे हटवा दिया॥ १३ ॥

फिर उन्होंने महाराजके शरीरको तेलसे भरे हुए कड़ाहमें रखकर वसिष्ठ आदिकी आज्ञाके अनुसार शवकी रक्षा आदि अन्य सब राजकीय कार्योंकी सँभाल आरम्भ कर दी॥ १४ ॥

वे सर्वज्ञ मन्त्री पुत्रके बिना राजाका दाह-संस्कार न कर सके, इसलिये उनके शवकी रक्षा करने लगे॥

जब मन्त्रियोंने राजाके शवको तैलके कड़ाहमें सुलाया, तब यह जानकर सारी रानियाँ ‘हाय! ये महाराज परलोकवासी हो गये’ ऐसा कहती हुईं पुनः विलाप करने लगीं॥ १६ ॥

उनके मुखपर नेत्रोंसे आँसुओंके झरने झर रहे थे। वे अपनी भुजाओंको ऊपर उठाकर दीनभावसे रोने और शोकसंतप्त हो दयनीय विलाप करने लगीं॥ १७ ॥

वे बोलीं—‘हा महाराज! हम सत्यप्रतिज्ञ एवं सदा प्रिय बोलनेवाले अपने पुत्र श्रीरामसे तो बिछुड़ी ही थीं, अब आप भी क्यों हमारा परित्याग कर रहे हैं?॥ १८ ॥

‘श्रीरामसे बिछुड़कर हम सब विधवाएँ इस दुष्ट विचारवाली सौत कैकेयीके समीप कैसे रहेंगी?॥ १९ ॥

‘जो हमारे और आपके भी रक्षक और प्रभु थे, वे मनस्वी श्रीरामचन्द्र राजलक्ष्मीको छोड़कर वन चले गये॥

‘वीरवर श्रीराम और आपके भी न रहनेसे हमारे ऊपर बड़ा भारी संकट आ गया, जिससे हम मोहित हो रही हैं। अब सौत कैकेयीके द्वारा तिरस्कृत हो हम यहाँ कैसे रह सकेंगी?॥ २१ ॥

‘जिसने राजाका तथा सीतासहित श्रीराम और महाबली लक्ष्मणका भी परित्याग कर दिया, वह दूसरे किसका त्याग नहीं करेगी?॥ २२ ॥

रघुकुलनरेश दशरथकी वे सुन्दरी रानियाँ महान् शोकसे ग्रस्त हो आँसू बहाती हुईं नाना प्रकारकी चेष्टाएँ और विलाप कर रही थीं। उनका आनन्द लुट गया था॥

महामना राजा दशरथसे हीन हुईं वह अयोध्यापुरी नक्षत्रहीन रात्रि और पतिविहीना नारीकी भाँति श्रीहीन हो गयी थी॥ २४ ॥

नगरके सभी मनुष्य आँसू बहा रहे थे। कुलवती स्त्रियाँ हाहाकार कर रही थीं। चौराहे तथा घरोंके द्वार सूने दिखायी देते थे। (वहाँ झाड़-बुहार, लीपने-पोतने तथा बलि अर्पण करने आदिकी क्रियाएँ नहीं होती थीं।) इस प्रकार वह पुरी पहलेकी भाँति शोभा नहीं पाती थी॥

राजा दशरथ शोकवश स्वर्ग सिधारे और उनकी रानियाँ शोकसे ही भूतलपर लोटती रहीं। इस शोकमें ही सहसा सूर्यकी किरणोंका प्रचार बंद हो गया और सूर्यदेव अस्त हो गये। तत्पश्चात् अन्धकारका प्रचार करती हुईं रात्रि उपस्थित हुईं॥ २६ ॥

वहाँ पधारे हुए सुहृदोंने किसी भी पुत्रके बिना राजाका दाह-संस्कार होना नहीं पसंद किया। अब राजाका दर्शन अचिन्त्य हो गया, यह सोचते हुए उन सबने उस तैलपूर्ण कड़ाहमें उनके शवको सुरक्षित रख दिया॥ २७ ॥

सूर्यके बिना प्रभाहीन आकाश तथा नक्षत्रोंके बिना शोभाहीन रात्रिकी भाँति अयोध्यापुरी महात्मा राजा दशरथसे रहित हो श्रीहीन प्रतीत होती थी। उसकी सड़कों और चौराहोंपर आँसुओंसे अवरुद्ध कण्ठवाले मनुष्योंकी भीड़ एकत्र हो गयी थी॥ २८ ॥

झुंड-के-झुंड स्त्री और पुरुष एक साथ खड़े होकर भरत-माता कैकेयीकी निन्दा करने लगे। उस समय महाराजकी मृत्युसे अयोध्यापुरीमें रहनेवाले सभी लोग शोकाकुल हो रहे थे। कोई भी शान्ति नहीं पाता था॥ २९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें छाछठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६६॥

सरसठवाँ सर्ग

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सरसठवाँ सर्ग

मार्कण्डेय आदि मुनियों तथा मन्त्रियोंका राजाके बिना होनेवाली देशकी दुरवस्थाका वर्णन करके वसिष्ठजीसे किसीको राजा बनानेके लिये अनुरोध

अयोध्यामें लोगोंकी वह रात रोते-कलपते ही बीती। उसमें आनन्दका नाम भी नहीं था। आँसुओंसे सब लोगोंके कण्ठ भरे हुए थे। दुःखके कारण वह रात सबको बड़ी लम्बी प्रतीत हुई थी॥ १ ॥

जब रात बीत गयी और सूर्योदय हुआ, तब राज्यका प्रबन्ध करनेवाले ब्राह्मणलोग एकत्र हो दरबारमें आये॥ २ ॥

मार्कण्डेय, मौद्गल्य, वामदेव, कश्यप, कात्यायन, गौतम और महायशस्वी जाबालि—ये सभी ब्राह्मणश्रेष्ठ राजपुरोहित वसिष्ठजीके सामने बैठकर मन्त्रियोंके साथ अपनी अलग-अलग राय देने लगे॥ ३-४ ॥

वे बोले— 'पुत्रशोकसे इन महाराजके स्वर्गवासी होनेके कारण यह रात बड़े दुःखसे बीती है, जो हमारे लिये सौ वर्षोंके समान प्रतीत हुई थी॥ ५ ॥

'महाराज दशरथ स्वर्ग सिधारे। श्रीरामचन्द्रजी वनमें रहने लगे और तेजस्वी लक्ष्मण भी श्रीरामके साथ ही चले गये॥ ६ ॥

'शत्रुओंको संताप देनेवाले दोनों भाई भरत और शत्रुघ्न केकयदेशके रमणीय राजगृहमें नानाके घरमें निवास करते हैं॥ ७ ॥

'इक्ष्वाकुवंशी राजकुमारोंमेंसे किसीको आज ही यहाँका राजा बनाया जाय; क्योंकि राजाके बिना हमारे इस राज्यका नाश हो जायगा॥ ८ ॥

'जहाँ कोई राजा नहीं होता, ऐसे जनपदमें विद्युन्मालाओंसे अलंकृत महान् गर्जन करनेवाला मेघ पृथ्वीपर दिव्य जलकी वर्षा नहीं करता॥ ९ ॥

'जिस जनपदमें कोई राजा नहीं, वहाँके खेतोंमें मुट्ठी-के-मुट्ठी बीज नहीं बिखेरे जाते। राजासे रहित देशमें पुत्र पिता और स्त्री पतिके वशमें नहीं रहती॥ १० ॥

'राजहीन देशमें धन अपना नहीं होता है। बिना राजाके राज्यमें पत्नी भी अपनी नहीं रह पाती है। राजारहित देशमें यह महान् भय बना रहता है। (जब वहाँ पति-पत्नी आदिका सत्य

सम्बन्ध नहीं रह सकता) तब फिर दूसरा कोऽइ सत्य कैसे रह सकता है?॥ ११ ॥

‘बिना राजाके राज्यमें मनुष्य कोऽइ पञ्चायत-भवन नहीं बनवाते, रमणीय उद्यानका भी निर्माण नहीं करवाते तथा हर्ष और उत्साहके साथ पुण्यगृह (धर्मशाला, मन्दिर आदि) भी नहीं बनवाते हैं॥ १२ ॥

‘जहाँ कोऽइ राजा नहीं, उस जनपदमें स्वभावतः यज्ञ करनेवाले द्विज और कठोर व्रतका पालन करनेवाले जितेन्द्रिय ब्राह्मण उन बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान नहीं करते, जिनमें सभी ऋत्विज् और सभी यजमान होते हैं॥

‘राजारहित जनपदमें कदाचित् महायज्ञोंका आरम्भ हो भी तो उनमें धनसम्पन्न ब्राह्मण भी ऋत्विजोंको पर्याप्त दक्षिणा नहीं देते (उन्हें भय रहता है कि लोग हमें धनी समझकर लूट न लें)॥ १४ ॥

‘अराजक देशमें राष्ट्रको उन्नतिशील बनानेवाले उत्सव, जिनमें नट और नर्तक हर्षमें भरकर अपनी कलाका प्रदर्शन करते हैं, बढ़ने नहीं पाते हैं तथा दूसरे-दूसरे राष्ट्रहितकारी संघ भी नहीं पनपने पाते हैं॥ १५ ॥

‘बिना राजाके राज्यमें वादी और प्रतिवादीके विवादका सन्तोषजनक निपटारा नहीं हो पाता अथवा व्यापारियोंको लाभ नहीं होता। कथा सुननेकी इच्छावाले लोग कथावाचक पौराणिकोंकी कथाओंसे प्रसन्न नहीं होते॥

‘राजारहित जनपदमें सोनेके आभूषणोंसे विभूषित हुऽइ कुमारियाँ एक साथ मिलकर संध्याके समय उद्यानोंमें क्रीड़ा करनेके लिये नहीं जाती हैं॥ १७ ॥

‘बिना राजाके राज्यमें धनीलोग सुरक्षित नहीं रह पाते तथा कृषि और गोरक्षासे जीवन-निर्वाह करनेवाले वैश्य भी दरवाजा खोलकर नहीं सो पाते हैं॥ १८ ॥

‘राजासे रहित जनपदमें कामी मनुष्य नारियोंके साथ शीघ्रगामी वाहनोंद्वारा वनविहारके लिये नहीं निकलते हैं॥ १९ ॥

‘जहाँ कोऽइ राजा नहीं होता, उस जनपदमें साठ वर्षके दन्तार हाथी घंटे बाँधकर सड़कोंपर नहीं घूमते हैं॥ २० ॥

‘बिना राजाके राज्यमें धनुर्विद्याके अभ्यासकालमें निरन्तर लक्ष्यकी ओर बाण चलानेवाले वीरोंकी प्रत्यञ्चा तथा करतलका शब्द नहीं सुनायी देता है॥ २१ ॥