श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
लगे॥ ३५ ॥
शत्रुओंको तपानेवाले राजकुमार भरत उत्सव समाप्त होनेपर नीचे गिराये गये शचीपति इन्द्रके ध्वजकी भाँति उस समय पृथ्वीपर पड़े थे, उनके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये थे, वस्त्र ढीले पड़ गये थे और सारे आभूषण टूटकर बिखर गये थे॥ ३६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७४॥
पचहत्तरवाँ सर्ग
पचहत्तरवाँ सर्ग
कौसल्याके सामने भरतका शपथ खाना
बहुत देरके बाद होशमें आनेपर जब पराक्रमी भरत उठे, तब आँसूभरे नेत्रोंसे दीन बनी बैठी हुईं माताकी ओर देखकर मन्त्रियोंके बीचमें उसकी निन्दा करते हुए बोले—॥ १ १/२ ॥
‘मन्त्रिवरो! मैं राज्य नहीं चाहता और न मैंने कभी मातासे इसके लिये बातचीत ही की है। महाराजने जिस अभिषेकका निश्चय किया था, उसका भी मुझे पता नहीं था; क्योंकि उस समय मैं शत्रुघ्नके साथ दूर देशमें था॥ २-३ ॥
‘महात्मा श्रीरामके वनवास और सीता तथा लक्ष्मणके निर्वासनका भी मुझे ज्ञान नहीं है कि वह कब और कैसे हुआ?’॥ ४ ॥
महात्मा भरत जब इस प्रकार अपनी माताको कोस रहे थे, उस समय उनकी आवाजको पहचानकर कौसल्याने सुमित्रासे इस प्रकार कहा—॥ ५ ॥
‘क्रूर कर्म करनेवाली कैकेयीके पुत्र भरत आ गये हैं। वे बड़े दूरदर्शी हैं, अतः मैं उन्हें देखना चाहती हूँ’॥ ६ ॥
सुमित्रासे ऐसा कहकर उदास मुखवाली, दुर्बल और अचेत-सी हुईं कौसल्या जहाँ भरत थे, उस स्थानपर जानेके लिये काँपती हुईं चलीं॥ ७ ॥
उसी समय उधरसे राजकुमार भरत भी शत्रुघ्नको साथ लिये उसी मार्गसे चले आ रहे थे, जिससे कौसल्याके भवनमें आना-जाना होता था॥ ८ ॥
तदनन्तर शत्रुघ्न और भरतने दूरसे ही देखा कि माता कौसल्या दुःखसे व्याकुल और अचेत होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी हैं। यह देखकर उन्हें बड़ा दुःख हुआ और वे दौड़कर उनकी गोदीसे लग गये तथा फूट-फूटकर रोने लगे। आर्या मनस्विनी कौसल्या भी दुःखसे रो पड़ीं और उन्हें छातीसे लगाकर अत्यन्त दुःखित हो भरतसे इस प्रकार बोलीं—॥ ९-१० ॥
‘बेटा! तुम राज्य चाहते थे न? सो यह निष्कण्टक राज्य तुम्हें प्राप्त हो गया; किंतु खेद यही है कि कैकेयीने जल्दीके कारण बड़े क्रूर कर्मके द्वारा इसे पाया है॥
‘क्रूरतापूर्ण दृष्टि रखनेवाली कैकेयी न जाने इसमें कौन-सा लाभ देखती थी कि उसने मेरे बेटेको चीर-वस्त्र पहनाकर वनमें भेज दिया और उसे वनवासी बना दिया॥ १२ ॥
‘अब कैकेयीको चाहिये कि मुझे भी शीघ्र ही उसी स्थानपर भेज दे, जहाँ इस समय सुवर्णमयी नाभिसे सुशोभित मेरे महायशस्वी पुत्र श्रीराम हैं॥ १३ ॥
‘अथवा सुमित्राको साथ लेकर और अग्निहोत्रको आगे करके मैं स्वयं ही सुखपूर्वक उस स्थानको प्रस्थान करूँगी, जहाँ श्रीराम निवास करते हैं॥ १४ ॥
‘अथवा तुम स्वयं ही अपनी इच्छाके अनुसार अब मुझे वहीं पहुँचा दो, जहाँ मेरे पुत्र पुरुषसिंह श्रीराम तप करते हैं॥ १५ ॥
‘यह धन-धान्यसे सम्पन्न तथा हाथी, घोड़े एवं रथोंसे भरा-पूरा विस्तृत राज्य कैकेयीने (श्रीरामसे छीनकर) तुम्हें दिलाया है’॥ १६ ॥
इस तरहकी बहुत-सी कठोर बातें कहकर जब कौसल्याने निरपराध भरतकी भर्त्सना की, तब उनको बड़ी पीड़ा हुई; मानो किसीने घावमें सूई चुभो दी हो॥ १७ ॥
वे कौसल्याके चरणोंमें गिर पड़े, उस समय उनके चित्तमें बड़ी घबराहट थी। वे बारम्बार विलाप करके अचेत हो गये। थोड़ी देर बाद उन्हें फिर चेत हुआ॥ १८ ॥
तब भरत अनेक प्रकारके शोकोंसे घिरी हुई और पूर्वोक्त रूपसे विलाप करती हुई माता कौसल्यासे हाथ जोड़कर इस प्रकार बोले— ॥ १९ ॥
‘आर्ये! यहाँ जो कुछ हुआ है, इसकी मुझे बिलकुल जानकारी नहीं थी। मैं सर्वथा निरपराध हूँ, तो भी आप क्यों मुझे दोष दे रही हैं? आप तो जानती हैं कि श्रीरघुनाथजीमें मेरा कितना प्रगाढ़ प्रेम है॥ २० ॥
‘जिसकी अनुमतिसे सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ, आर्य श्रीरामजी वनमें गये हों, उस पापीकी बुद्धि कभी गुरुसे सीखे हुए शास्त्रोंमें बताये गये मार्गका अनुसरण करनेवाली न हो॥ २१ ॥
‘जिसकी सलाहसे बड़े भाई श्रीरामको वनमें जाना पड़ा हो, वह अत्यन्त पापियों—हीन जातियोंका सेवक हो। सूर्यकी ओर मुँह करके मल-मूत्रका त्याग करे और सोयी हुई गौओंको लातसे मारे (अर्थात् वह इन पापकर्मोंके दुष्परिणामका भागी हो)॥ २२ ॥
‘जिसकी सम्मतिसे भैया श्रीरामने वनको प्रस्थान किया हो, उसको वही पाप लगे, जो सेवकसे भारी काम कराकर उसे समुचित वेतन न देनेवाले स्वामीको लगता है॥ २३ ॥
‘जिसके कहनेसे आर्य श्रीरामको वनमें भेजा गया हो, उसको वही पाप लगे, जो समस्त प्राणियोंका पुत्रकी भाँति पालन करनेवाले राजासे द्रोह करनेवाले लोगोंको लगता है॥ २४ ॥
‘जिसकी अनुमतिसे आर्य श्रीराम वनमें गये हों, वह उसी अधर्मका भागी हो, जो प्रजासे उसकी आयका छठा भाग लेकर भी प्रजावर्गकी रक्षा न करनेवाले राजाको प्राप्त होता है॥ २५ ॥
‘जिसकी सलाहसे भैया श्रीरामको वनमें जाना पड़ा हो, उसे वही पाप लगे, जो यज्ञमें कष्ट सहनेवाले ऋत्विजोंको दक्षिणा देनेकी प्रतिज्ञा करके पीछे इनकार कर देनेवाले लोगोंको लगता है॥ २६ ॥
‘हाथी, घोड़े और रथोंसे भरे एवं अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षासे व्याप्त संग्राममें सत्पुरुषोंके धर्मका पालन न करनेवाले योद्धाओंको जो पाप लगता है, वही उस मनुष्यको भी प्राप्त हो, जिसकी सम्मतिसे आर्य श्रीरामजीको वनमें भेजा गया हो॥ २७ ॥
‘जिसकी सलाहसे आर्य श्रीरामको वनमें प्रस्थान करना पड़ा है, वह दुष्टात्मा बुद्धिमान् गुरुके द्वारा यत्नपूर्वक प्राप्त हुआ शास्त्रके सूक्ष्म विषयका उपदेश भुला दे॥ २८ ॥
‘जिसकी सलाहसे बड़े भैया श्रीरामको वनमें भेजा गया हो, वह चन्द्रमा और सूर्यके समान तेजस्वी तथा विशाल भुजाओं और कंधोंसे सुशोभित श्रीरामचन्द्रजीको राज्यसिंहासनपर विराजमान न देख सके—वह राजा श्रीरामके दर्शनसे वञ्चित रह जाय॥ २९ ॥
‘जिसकी सलाहसे आर्य श्रीरामचन्द्रजी वनमें गये हों, वह निर्दय मनुष्य खीर, खिचड़ी और बकरीके दूधको देवताओं, पितरों एवं भगवान्को निवेदन किये बिना व्यर्थ करके खाय॥ ३० ॥
‘जिसकी सम्मतिसे श्रीरामचन्द्रजीको वनमें जाना पड़ा हो, वह पापी मनुष्य गौओंके शरीरका पैरसे स्पर्श, गुरुजनोंकी निन्दा तथा मित्रके प्रति अत्यन्त द्रोह करे॥ ३१ ॥
‘जिसके कहनेसे बड़े भैया श्रीराम वनमें गये हों, वह दुष्टात्मा गुप्त रखनेके विश्वासपर एकान्तमें कहे हुए किसीके दोषको दूसरोंपर प्रकट कर दे (अर्थात् उसे विश्वासघात करनेका पाप लगे)॥ ३२ ॥
‘जिसकी अनुमतिसे आर्य श्रीराम वनमें गये हों, वह मनुष्य उपकार न करनेवाला, कृतघ्न, सत्पुरुषोंद्वारा परित्यक्त, निर्लज्ज और जगतमें सबके द्वेषका पात्र हो॥
‘जिसकी सलाहसे आर्य श्रीराम वनमें गये हों, वह अपने घरमें पुत्रों, दासों और भृत्योंसे घिरा रहकर भी अकेले ही मिष्टान्न भोजन करनेके पापका भागी हो॥
‘जिसकी अनुमतिसे आर्य श्रीरामका वनगमन हुआ हो, वह अपने अनुरूप पत्नीको न पाकर अग्निहोत्र आदि धार्मिक कर्मोंका अनुष्ठान किये बिना संतानहीन अवस्थामें ही मर जाय॥ ३५ ॥
‘जिसकी सम्मतिसे मेरे बड़े भाई श्रीराम वनमें गये हों, वह सदा दुःखी रहकर अपनी धर्मपत्नीसे होनेवाली संतानका मुँह न देखे तथा सम्पूर्ण आयुका उपभोग किये बिना ही मर जाय॥ ३६ ॥
‘राजा, स्त्री, बालक और वृद्धोंका वध करने तथा भृत्योंको त्याग देनेमें जो पाप होता है, वही पाप उसे भी लगे॥ ३७ ॥
‘जिसकी सम्मतिसे श्रीरामका वनगमन हुआ हो, वह सदैव लाह, मधु, मांस, लोहा और विष आदि निषिद्ध वस्तुओंको बेचकर कमाये हुए धनसे अपने भरण-पोषणके योग्य कुटुम्बीजनोंका पालन करे॥ ३८ ॥
‘जिसकी रायसे श्रीराम वनमें जानेको विवश हुए हों, वह शत्रुपक्षको भय देनेवाले युद्धके प्राप्त होनेपर उसमें पीठ दिखाकर भागता हुआ मारा जाय॥ ३९ ॥
‘जिसकी सम्मतिसे आर्य श्रीराम वनमें गये हों, वह फटे-पुराने, मैले-कुचैले वस्त्रसे अपने शरीरको ढककर हाथमें खप्पर ले भीख माँगता हुआ उन्मत्तकी भाँति पृथ्वीपर घूमता फिरे॥ ४० ॥
‘जिसकी सलाहसे श्रीरामचन्द्रजीको वनमें जाना पड़ा हो, वह काम-क्रोधके वशीभूत होकर सदा ही मद्यपान, स्त्रीसमागम और द्यूतक्रीड़ामें आसक्त रहे॥ ४१ ॥
‘जिसकी अनुमतिसे आर्य श्रीराम वनमें गये हों, उसका मन कभी धर्ममें न लगे, वह अधर्मका ही सेवन करे और अपात्रको धन दान करे॥ ४२ ॥
‘जिसकी सलाहसे आर्य श्रीरामका वन-गमन हुआ हो, उसके द्वारा सहस्रोंकी संख्यामें संचित किये गये नाना प्रकारके धन-वैभवोंको लुटेरे लूट ले जायँ॥ ४३ ॥
‘जिसके कहनेसे भैया श्रीरामको वनमें भेजा गया हो, उसे वही पाप लगे, जो दोनों संध्याओंके समय सोये हुए पुरुषको प्राप्त होता है। आग लगानेवाले मनुष्यको जो पाप लगता
है, गुरुपत्नीगामीको जिस पापकी प्राप्ति होती है तथा मित्रद्रोह करनेसे जो पाप प्राप्त होता है, वही पाप उसे भी लगे॥ ४४-४५ ॥
‘जिसकी सम्मतिसे आर्य श्रीरामको वनमें जाना पड़ा है, वह देवताओं, पितरों और माता-पिताकी सेवा कभी न करे (अर्थात् उनकी सेवाके पुण्यसे वञ्चित रह जाय)॥ ४६ ॥
‘जिसकी अनुमतिसे विवश होकर भैया श्रीरामने वनमें पदार्पण किया है, वह पापी आज ही सत्पुरुषोंके लोकसे, सत्पुरुषोंकी कीर्तिसे तथा सत्पुरुषोंद्वारा सेवित कर्मसे शीघ्र भ्रष्ट हो जाय॥ ४७ ॥
‘जिसकी सम्मतिसे बड़ी-बड़ी बाँह और विशाल वक्षवाले आर्य श्रीरामको वनमें जाना पड़ा है, वह माताकी सेवा छोड़कर अनर्थके पथमें स्थित रहे॥ ४८ ॥
‘जिसकी सलाहसे श्रीरामका वनगमन हुआ हो, वह दरिद्र हो, उसके यहाँ भरण-पोषण पानेके योग्य पुत्र आदिकी संख्या बहुत अधिक हो तथा वह ज्वर-रोगसे पीड़ित होकर सदा क्लेश भोगता रहे॥ ४९ ॥
‘जिसकी अनुमति पाकर आर्य श्रीराम वनमें गये हों, वह आशा लगाये ऊपरकी ओर आँख उठाकर दाताके मुँहकी ओर देखनेवाले दीन याचकोंकी आशाको निष्फल कर दे॥ ५० ॥
‘जिसके कहनेसे भैया श्रीरामने वनको प्रस्थान किया हो, वह पापात्मा पुरुष चुगला, अपवित्र तथा राजासे भयभीत रहकर सदा छल-कपटमें ही रचा-पचा रहे॥ ५१ ॥
‘जिसके परामर्शसे आर्यका वनमगन हुआ हो, वह दुष्टात्मा ऋतु-स्नानकाल प्राप्त होनेके कारण अपने पास आयी हुई सती-साध्वी ऋतुस्नाता पत्नीको ठुकरा दे (उसकी इच्छा न पूर्ण करनेके पापका भागी हो)॥ ५२ ॥
‘जिसकी सलाहसे मेरे बड़े भाईको वनमें जाना पड़ा हो, उसको वही पाप लगे, जो (अन्न आदिका दान न करने अथवा स्त्रीसे द्वेष रखनेके कारण) नष्ट हुई संतानवाले ब्राह्मणको प्राप्त होता है॥ ५३ ॥
‘जिसकी रायसे आर्यने वनमें पदार्पण किया हो, वह मलिन इन्द्रियवाला पुरुष ब्राह्मणके लिये की जाती हुई पूजामें विघ्न डाल दे और छोटे बछड़ेवाली (दस दिनके भीतरकी ब्यायी हुई) गायका दूध दुहे॥ ५४ ॥
‘जिसने आर्य श्रीरामके वनमगमनकी अनुमति दी हो, वह मूढ़ धर्मपत्नीको छोड़कर परस्त्रीका सेवन करे तथा धर्मविषयक अनुरागको त्याग दे॥ ५५॥
‘पानीको गन्दा करनेवाले तथा दूसरोंको जहर देनेवाले मनुष्यको जो पाप लगता है, वह सारा पाप अकेला वही प्राप्त करे, जिसकी अनुमतिसे विवश होकर आर्य श्रीरामको वनमें जाना पड़ा है॥ ५६॥
‘जिसकी सम्मतिसे आर्यका वनगमन हुआ हो, उसे वही पाप प्राप्त हो, जो पानी होते हुए भी प्यासेको उससे वञ्चित कर देनेवाले मनुष्यको लगता है॥ ५७॥
‘जिसकी अनुमतिसे आर्य श्रीराम वनमें गये हों, वह उस पापका भागी हो, जो परस्पर झगड़ते हुए मनुष्योंमेंसे किसी एकके प्रति पक्षपात रखकर मार्गमें खड़ा हो उनका झगड़ा देखनेवाले कलहप्रिय मनुष्यको प्राप्त होता है’॥ ५८॥
इस प्रकार पति और पुत्रसे बिछुड़ी हुई कौसल्याको शपथके द्वारा आश्वासन देते हुए ही राजकुमार भरत दुःखसे व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ५९॥
उस समय दुष्कर शपथोंद्वारा अपनी सफाई देते हुए शोकसंतप्त एवं अचेत भरतसे कौसल्याने इस प्रकार कहा—॥ ६०॥
‘बेटा! तुम अनेकानेक शपथ खाकर जो मेरे प्राणोंको पीड़ा दे रहे हो, इससे मेरा यह दुःख और भी बढ़ता जा रहा है॥ ६१॥
‘वत्स! सौभाग्यकी बात है कि शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तुम्हारा चित्त धर्मसे विचलित नहीं हुआ है। तुम सत्यप्रतिज्ञ हो, इसलिये तुम्हें सत्पुरुषोंके लोक प्राप्त होंगे’॥ ६२॥
ऐसा कहकर कौसल्याने भ्रातृभक्त महाबाहु भरतको गोदमें खींच लिया और अत्यन्त दुःखी हो उन्हें गलेसे लगाकर वे फूट-फूटकर रोने लगीं॥ ६३॥
महात्मा भरत भी दुःखसे आर्त होकर विलाप कर रहे थे। उनका मन मोह और शोकके वेगसे व्याकुल हो गया था॥ ६४॥
पृथ्वीपर पड़े हुए भरतकी बुद्धि (विवेकशक्ति) नष्ट हो गयी थी। वे अचेत-से होकर विलाप करते और बारंबार लंबी साँस खींचते थे। इस तरह शोकमें ही उनकी वह रात बीत गयी॥ ६५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पचहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७५॥
छिहत्तरवाँ सर्ग
छिहत्तरवाँ सर्ग
राजा दशरथका अन्त्यष्टिसंस्कार
इस प्रकार शोकसे संतप्त हुए केकयीकुमार भरतसे वक्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षि वसिष्ठने उत्तम वाणीमें कहा—
‘महायशस्वी राजकुमार! तुम्हारा कल्याण हो। यह शोक छोड़ो, क्योंकि इससे कुछ होने-जानेवाला नहीं है। अब समयोचित कर्तव्यपर ध्यान दो। राजा दशरथके शवको दाहसंस्कारके लिये ले चलनेका उत्तम प्रबन्ध करो’॥ २ ॥
वसिष्ठजीका वचन सुनकर धर्मज्ञ भरतने पृथ्वीपर पड़कर उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम किया और मन्त्रियोंद्वारा पिताके सम्पूर्ण प्रेतकर्मका प्रबन्ध करवाया॥ ३ ॥
राजा दशरथका शव तेलके कड़ाहसे निकालकर भूमिपर रखा गया। अधिक समयतक तेलमें पड़े रहनेसे उनका मुख कुछ पीला हो गया। उसे देखनेसे ऐसा जान पड़ता था, मानो भूमिपाल दशरथ सो रहे हों॥ ४ ॥
तदनन्तर मृत राजा दशरथको धो-पोंछकर नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित उत्तम शय्या (विमान) पर सुलाकर उनके पुत्र भरत अत्यन्त दुःखी हो विलाप करने लगे— ॥ ५ ॥
‘राजन्! मैं परदेशमें था और आपके पास पहुँचने भी नहीं पाया था, तबतक ही धर्मज्ञ श्रीराम और महाबली लक्ष्मणको वनमें भेजकर आपने इस तरह स्वर्गमें जानेका निश्चय कैसे कर लिया?॥ ६ ॥
‘महाराज! अनायास ही महान् कर्म करनेवाले पुरुषसिंह श्रीरामसे हीन इस दुःखी सेवकको छोड़ आप कहाँ चले जायँगे?॥ ७ ॥
‘तात! आप स्वर्गको चल दिये और श्रीरामने वनका आश्रय लिया—ऐसी दशामें आपके इस नगरमें निश्चिन्ततापूर्वक प्रजाके योगक्षेमकी व्यवस्था कौन करेगा?॥ ८ ॥
‘राजन्! आपके बिना यह पृथ्वी विधवाके समान हो गयी है, अतः इसकी शोभा नहीं हो रही है। यह पुरी भी मुझे चन्द्रहीन रात्रिके समान श्रीहीन प्रतीत होती है’॥ ९ ॥
इस प्रकार दीनचित्त होकर विलाप करते हुए भरतसे महामुनि वसिष्ठने फिर कहा— ॥ १० ॥
‘महाबाहो! इन महाराजके लिये जो कुछ भी प्रेतकर्म करने हैं, उन्हें बिना विचारे शान्तचित्त होकर करो’॥ ११ ॥
तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर भरतने वसिष्ठजीकी आज्ञा शिरोधार्य की तथा ऋत्विक्, पुरोहित और आचार्य— सबको इस कार्यके लिये जल्दी करनेको कहा— ॥
राजाकी अग्निशालासे जो अग्नियाँ बाहर निकाली गयी थीं, उनमें ऋत्विजों और याजकोंद्वारा विधिपूर्वक हवन किया गया॥ १३ ॥
तत्पश्चात् महाराज दशरथके प्राणहीन शरीरको पालकीमें बिठाकर परिचारकगण उन्हें श्मशानभूमिको ले चले। उस समय आँसुओंसे उनका गला रुँध गया था और मन-ही-मन उन्हें बड़ा दुःख हो रहा था॥ १४ ॥
मार्गमें राजकीय पुरुष राजाके शवके आगे-आगे सोने, चाँदी तथा भाँति-भाँतिके वस्त्र लुटाते चलते थे॥
श्मशानभूमिमें पहुँचकर चिता तैयार की जाने लगी, किसीने चन्दन लाकर रखा तो किसीने अगर, कोई-कोई गुग्गुल तथा कोई सरल, पद्मक और देवदारुकी लकड़ियाँ ला-लाकर चितामें डालने लगे। कुछ लोगोंने तरह-तरहके सुगन्धित पदार्थ लाकर छोड़े। इसके बाद ऋत्विजोंने राजाके शवको चितापर रखा॥
उस समय अग्निमें आहुति देकर उनके ऋत्विजोंने वेदोक्त मन्त्रोंका जप किया। सामगान करनेवाले विद्वान् शास्त्रीय पद्धतिके अनुसार साम-श्रुतियोंका गायन करने लगे॥ १८ ॥
(इसके बाद चितामें आग लगायी गयी) तदनन्तर राजा दशरथकी कौसल्या आदि रानियाँ बूढ़े रक्षकोंसे घिरी हुई यथायोग्य शिबिकाओं तथा रथोंपर आरूढ़ होकर नगरसे निकलीं तथा शोकसे संतप्त हो श्मशानभूमिमें आकर अश्वमेधान्त यज्ञोंके अनुष्ठाता राजा दशरथके शवकी परिक्रमा करने लगीं। साथ ही ऋत्विजोंने भी उस शवकी परिक्रमा की॥ १९-२० ॥
उस समय वहाँ करुण क्रन्दन करती हुई सहस्रों शोकार्त रानियोंका आर्तनाद कुररियोंके चीत्कारके समान सुनायी देता था॥ २१ ॥
दाहकर्मके पश्चात् विवश होकर रोती हुई वे राजरानियाँ बारंबार विलाप करके सवारियोंसे ही सरयूके तटपर जाकर उतरीं॥ २२ ॥
भरतके साथ रानियों, मन्त्रियों और पुरोहितोंने भी राजाके लिये जलाञ्जलि दी, फिर सब-के-सब नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए नगरमें आये और दस दिनोंतक भूमिपर शयन करते हुए उन्होंने बड़े दुःखसे अपना समय व्यतीत किया॥ २३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें छिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७६॥
सतहत्तरवाँ सर्ग
सतहत्तरवाँ सर्ग
भरतका पिताके श्राद्धमें ब्राह्मणोंको बहुत धन-रत्न आदिका दान देना, तेरहवें दिन अस्थि-संचयका शेष कार्य पूर्ण करनेके लिये पिताकी चिताभूमिपर जाकर भरत और शत्रुघ्नका विलाप करना और वसिष्ठ तथा सुमन्त्रका उन्हें समझाना
तदनन्तर दशाह व्यतीत हो जानेपर राजकुमार भरतने ग्यारहवें दिन आत्मशुद्धिके लिये स्नान और एकादशाह श्राद्धका अनुष्ठान किया, फिर बारहवाँ दिन आनेपर उन्होंने अन्य श्राद्ध कर्म (मासिक और सपिण्डीकरण श्राद्ध) किये॥ १ ॥
उसमें भरतने ब्राह्मणोंको धन, रत्न, प्रचुर अन्न, बहुमूल्य वस्त्र, नाना प्रकारके रत्न, बहुत-से बकरे, चाँदी और बहुतेरी गौएँ दान कीं॥ २ ॥
राजपुत्र भरतने राजाके पारलौकिक हितके लिये बहुत-से दास, दासियाँ, सवारियाँ तथा बड़े-बड़े घर भी ब्राह्मणोंको दिये॥ ३ ॥
तदनन्तर तेरहवें दिन प्रातःकाल महाबाहु भरत शोकसे मूर्च्छित होकर विलाप करने लगे॥ ४ ॥
उस समय रोनेसे उनका गला भर आया था, वे पिताके चितास्थानपर अस्थिसंचयके लिये आये और अत्यन्त दुःखी होकर इस प्रकार कहने लगे—'तात! आपने मुझे जिन ज्येष्ठ भ्राता श्रीरघुनाथजीके हाथमें सौंपा था, उनके वनमें चले जानेपर आपने मुझे सूनेमें ही छोड़ दिया (इस समय मेरा कोई सहारा नहीं)॥ ५-६ ॥
'तात! नरेश्वर! जिन अनाथ हुई देवीके एकमात्र आधार पुत्रको आपने वनमें भेज दिया, उन माता कौसल्याको छोड़कर आप कहाँ चले गये?'॥ ७ ॥
पिताकी चिताका वह स्थानमण्डल भस्मसे भरा हुआ था, अत्यन्त दाहके कारण कुछ लाल दिखायी देता था। वहाँ पिताकी जली हुई हड्डियाँ बिखरी हुई थीं। पिताके शरीरके निर्वाणका वह स्थान देखकर भरत अत्यन्त विलाप करते हुए शोकमें डूब गये॥ ८ ॥
उस स्थानको देखते ही वे दीनभावसे रोकर पृथ्वीपर गिर पड़े। जैसे इन्द्रका यन्त्रबद्ध ऊँचा ध्वज ऊपरको उठाये जाते समय खिसककर गिर पड़ा हो॥ ९ ॥
तब उनके सारे मन्त्री उन पवित्र व्रतवाले भरतके पास आ पहुँचे, जैसे पुण्योंका अन्त होनेपर स्वर्गसे गिरे हुए राजा ययातिके पास अष्टक आदि राजर्षि आ गये थे॥ १० ॥
भरतको शोकमें डूबा हुआ देख शत्रुघ्न भी अपने पिता महाराज दशरथका बारंबार स्मरण करते हुए अचेत होकर पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ११ ॥
वे समय-समयपर अनुभवमें आये हुए पिताके लालन-पालनसम्बन्धी उन-उन गुणोंका स्मरण करके अत्यन्त दुःखी हो सुध-बुध खोकर उन्मत्तके समान विलाप करने लगे— ॥ १२ ॥
हाय! मन्थरासे जिसका प्राकट्य हुआ है, कैकेयीरूपी ग्राहसे जो व्याप्त है तथा जो किसी प्रकार भी मिटाया नहीं जा सकता, उस वरदानमय शोकरूपी उग्र समुद्रने हम सब लोगोंको अपने भीतर निमग्न कर दिया है॥ १३ ॥
‘तात! आपने जिनका सदा लाड़-प्यार किया है तथा जो सुकुमार और बालक हैं, उन रोते-बिलखते हुए भरतको छोड़कर आप कहाँ चले गये?॥ १४ ॥
‘भोजन, पान, वस्त्र और आभूषण—इन सबको अधिक संख्यामें एकत्र करके आप हम सब लोगोंसे अपनी रुचिकी वस्तुएँ ग्रहण करनेको कहते थे। अब कौन हमारे लिये ऐसी व्यवस्था करेगा?॥ १५ ॥
‘आप-जैसे धर्मज्ञ महात्मा राजासे रहित होनेपर पृथ्वीको फट जाना चाहिये। इस फटनेके अवसरपर भी जो यह फट नहीं रही है, यह आश्चर्यकी बात है॥ १६ ॥
‘पिता स्वर्गवासी हो गये और श्रीराम वनमें चले गये। अब मुझमें जीवित रहनेकी क्या शक्ति है? अब तो मैं अग्निमें ही प्रवेश करूँगा॥ १७ ॥
‘बड़े भाई और पितासे हीन होकर इक्ष्वाकुवंशी नरेशोंद्वारा पालित इस सूनी अयोध्यामें मैं प्रवेश नहीं करूँगा; तपोवनको ही चला जाऊँगा’॥ १८ ॥
उन दोनोंका विलाप सुनकर और उस संकटको देखकर समस्त अनुचर-वर्गके लोग पुनः अत्यन्त शोकसे व्याकुल हो उठे॥ १९ ॥
उस समय भरत और शत्रुघ्न दोनों भाई विषादग्रस्त और थकित होकर टूटे सींगोंवाले दो बैलोंके समान पृथ्वीपर लोट रहे थे॥ २० ॥
तदनन्तर दैवी प्रकृतिसे युक्त और सर्वज्ञ वसिष्ठजी, जो इन श्रीराम आदिके पिताके पुरोहित थे, भरतको उठाकर उनसे इस प्रकार बोले— ॥ २१ ॥
‘प्रभो! तुम्हारे पिताके दाहसंस्कार हुए यह तेरहवाँ दिन है; अब अस्थिसंचयका जो शेष कार्य है, उसके करनेमें तुम यहाँ विलम्ब क्यों लगा रहे हो?॥ २२ ॥
‘भूख-प्यास, शोक-मोह तथा जरा-मृत्यु—ये तीन द्वन्द्व सभी प्राणियोंमें समानरूपसे उपलब्ध होते हैं। इन्हें रोकना सर्वथा असम्भव है—ऐसी स्थितिमें तुम्हें इस तरह शोकाकुल नहीं होना चाहिये’॥ २३ ॥
तत्त्वज्ञ सुमन्त्रने भी शत्रुघ्नको उठाकर उनके चित्तको शान्त किया तथा समस्त प्राणियोंके जन्म और मरणकी अनिवार्यताका उपदेश सुनाया॥ २४ ॥
उस समय उठे हुए वे दोनों यशस्वी नरश्रेष्ठ वर्षा और धूपसे मलिन हुए दो अलग-अलग इन्द्रध्वजोंके समान प्रकाशित हो रहे थे॥ २५ ॥
वे आँसू पोंछते हुए दीनतापूर्ण वाणीमें बोलते थे। उन दोनोंकी आँखें लाल हो गयी थीं तथा मन्त्रीलोग उन दोनों राजकुमारोंको दूसरी-दूसरी क्रियाएँ शीघ्र करनेके लिये प्रेरित कर रहे थे॥ २६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सतहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७७॥
अठहत्तरवाँ सर्ग
अठहत्तरवाँ सर्ग
शत्रुघ्नका रोष, उनका कुब्जाको घसीटना और भरतजीके कहनेसे उसे मूर्च्छित अवस्थामें छोड़ देना
तेरहवें दिनका कार्य पूर्ण करके श्रीरामचन्द्रजीके पास जानेका विचार करते हुए शोकसंतप्त भरतसे लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्नने इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
‘भैया! जो दुःखके समय अपने तथा आत्मीयजनोंके लिये तो बात ही क्या है, समस्त प्राणियोंको भी सहारा देनेवाले हैं, वे सत्त्वगुणसम्पन्न श्रीराम एक स्त्रीके द्वारा वनमें भेज दिये गये (यह कितने खेदकी बात है)॥ २ ॥
‘तथा वे जो बल और पराक्रमसे सम्पन्न लक्ष्मण नामधारी शूरवीर हैं, उन्होंने भी कुछ नहीं किया। मैं पूछता हूँ कि उन्होंने पिताको कैद करके भी श्रीरामको इस संकटसे क्यों नहीं छुड़ाया?॥ ३ ॥
‘जब राजा एक नारीके वशमें होकर बुरे मार्गपर आरूढ़ हो चुके थे, तब न्याय और अन्यायका विचार करके उन्हें पहले ही कैद कर लेना चाहिये था’॥ ४ ॥
लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्न जब इस प्रकार रोषमें भरकर बोल रहे थे, उसी समय कुब्जा समस्त आभूषणोंसे विभूषित हो उस राजभवनके पूर्वद्वारपर आकर खड़ी हो गयी॥ ५ ॥
उसके अङ्गोंमें उत्तमोत्तम चन्दनका लेप लगा हुआ था तथा वह राजरानियोंके पहनने योग्य विविध वस्त्र धारण करके भाँति-भाँतिके आभूषणोंसे सज-धजकर वहाँ आयी थी॥ ६ ॥
करधनीकी विचित्र लड़ियों तथा अन्य बहुसंख्यक सुन्दर अलंकारोंसे अलंकृत हो वह बहुत-सी रस्सियोंमें बँधी हुई वानरीके समान जान पड़ती थी॥ ७ ॥
वही सारी बुराइयोंकी जड़ थी। वही श्रीरामके वनवासरूपी पापका मूल कारण थी। उसपर दृष्टि पड़ते ही द्वारपालने उसे पकड़ लिया और बड़ी निर्दयताके साथ घसीट लाकर शत्रुघ्नके हाथमें देते हुए कहा— ॥ ८ ॥
‘राजकुमार! जिसके कारण श्रीरामको वनमें निवास करना पड़ा है और आपलोगोंके पिताने शरीरका परित्याग किया है, वह क्रूर कर्म करनेवाली पापिनी यही है। आप इसके साथ जैसा बर्ताव उचित समझें करें’॥
द्वारपालकी बातपर विचार करके शत्रुघ्नका दुःख और बढ़ गया। उन्होंने अपने कर्तव्यका निश्चय किया और अन्तःपुरमें रहनेवाले सब लोगोंको सुनाकर इस प्रकार कहा— ॥ १०॥
‘इस पापिनीने मेरे भाइयों तथा पिताको जैसा दुःसह दुःख पहुँचाया है, अपने उस क्रूर कर्मका वैसा ही फल यह भी भोगे’॥ ११॥
ऐसा कहकर शत्रुघ्नने सखियोंसे घिरी हुई कुब्जाको तुरंत ही बलपूर्वक पकड़ लिया। वह डरके मारे ऐसा चीखने-चिल्लाने लगी कि वह सारा महल गूँज उठा॥ १२॥
फिर तो उसकी सारी सखियाँ अत्यन्त संतप्त हो उठीं और शत्रुघ्नको कुपित जानकर सब ओर भाग चलीं॥ १३॥
उसकी सम्पूर्ण सखियोंने एक जगह एकत्र होकर आपसमें सलाह की कि ‘जिस प्रकार इन्होंने बलपूर्वक कुब्जाको पकड़ा है, उससे जान पड़ता है, ये हमलोगोंमेंसे किसीको जीवित नहीं छोड़ेंगे॥ १४॥
‘अतः हमलोग परम दयालु, उदार, धर्मज्ञ और यशस्विनी महारानी कौसल्याकी शरणमें चलें। इस समय वे ही हमारी निश्चल गति हैं’॥ १५॥
शत्रुओंका दमन करनेवाले शत्रुघ्न रोषमें भरकर कुब्जाको जमीनपर घसीटने लगे। उस समय वह जोर-जोरसे चीत्कार कर रही थी॥ १६॥
जब मन्थरा घसीटी जा रही थी, उस समय उसके नाना प्रकारके विचित्र आभूषण टूट-टूटकर पृथ्वीपर इधर-उधर बिखरे जाते थे॥ १७॥
आभूषणोंके उन टुकड़ोंसे वह शोभाशाली विशाल राजभवन नक्षत्रमालाओंसे अलंकृत शरत्कालके आकाशकी भाँति अधिक सुशोभित हो रहा था॥ १८॥
बलवान् नरश्रेष्ठ शत्रुघ्न जिस समय रोषपूर्वक मन्थराको जोरसे पकड़कर घसीट रहे थे, उस समय उसे छुड़ानेके लिये कैकेयी उनके पास आयी। तब उन्होंने उसे धिक्कारते हुए उसके प्रति बड़ी कठोर बातें कहीं—उसे रोषपूर्वक फटकारा॥ १९॥
शत्रुघ्नके वे कठोर वचन बड़े ही दुःखदायी थे। उन्हें सुनकर कैकेयीको बहुत दुःख हुआ। वह शत्रुघ्नके भयसे थर्रा उठी और अपने पुत्रकी शरणमें आयी॥ २०॥
शत्रुघ्नको क्रोधमें भरा हुआ देख भरतने उनसे कहा—‘सुमित्राकुमार! क्षमा करो। स्त्रियाँ सभी प्राणियोंके लिये अवध्य होती हैं॥ २१॥
‘यदि मुझे यह भय न होता कि धर्मात्मा श्रीराम मातृघाती समझकर मुझसे घृणा करने लगेंगे तो मैं भी इस दुष्ट आचरण करनेवाली पापिनी कैकेयीको मार डालता॥ २२ ॥
‘धर्मात्मा श्रीरघुनाथजी तो इस कुब्जाके भी मारे जानेका समाचार यदि जान लें तो वे निश्चय ही तुमसे और मुझसे बोलना भी छोड़ देंगे’॥ २३ ॥
भरतजीकी यह बात सुनकर लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्न मन्थराके वधरूपी दोषसे निवृत्त हो गये और उसे मूर्च्छित अवस्थामें ही छोड़ दिया॥ २४ ॥
मन्थरा कैकेयीके चरणोंमें गिर पड़ी और लंबी साँस खींचती हुई अत्यन्त दुःखसे आर्त हो करुण विलाप करने लगी॥ २५ ॥
शत्रुघ्नके पटकने और घसीटनेसे आर्त एवं अचेत हुई कुब्जाको देखकर भरतकी माता कैकेयी धीरे-धीरे उसे आश्वासन देने—होशमें लानेकी चेष्टा करने लगी। उस समय कुब्जा पिंजड़ेमें बँधी हुई क्रौञ्चीकी भाँति कातर दृष्टिसे उसकी ओर देख रही थी॥ २६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अठहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७८॥
उन्नासीवाँ सर्ग
उन्नासीवाँ सर्ग
मन्त्री आदिका भरतसे राज्य ग्रहण करनेके लिये प्रस्ताव तथा भरतका अभिषेक-सामग्रीकी परिक्रमा करके श्रीरामको ही राज्यका अधिकारी बताकर उन्हें लौटा लानेके लिये चलनेके निमित्त व्यवस्था करनेकी सबको आज्ञा देना
तदनन्तर चौदहवें दिन प्रातःकाल समस्त राजकर्मचारी मिलकर भरतसे इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥
‘महायशस्वी राजकुमार! जो हमारे सर्वश्रेष्ठ गुरु थे, वे महाराज दशरथ तो अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मणको वनमें भेजकर स्वयं स्वर्गलोकको चले गये, अब इस राज्यका कोई स्वामी नहीं है; इसलिये अब आप ही हमारे राजा हों। आपके बड़े भाईको स्वयं महाराजने वनवासकी आज्ञा दी और आपको यह राज्य प्रदान किया! अतः आपका राजा होना न्यायसङ्गत है। इस सङ्गतिके कारण ही आप राज्यको अपने अधिकारमें लेकर किसीके प्रति कोई अपराध नहीं कर रहे हैं॥ २-३ ॥
‘राजकुमार रघुनन्दन! ये मन्त्री आदि स्वजन, पुरवासी तथा सेठलोग अभिषेककी सब सामग्री लेकर आपकी राह देखते हैं॥ ४ ॥
‘भरतजी! आप अपने माता-पितामहोंके इस राज्यको अवश्य ग्रहण कीजिये। नरश्रेष्ठ! राजाके पदपर अपना अभिषेक कराइये और हमलोगोंकी रक्षा कीजिये’॥
यह सुनकर उत्तम व्रतको धारण करनेवाले भरतने अभिषेकके लिये रखी हुई कलश आदि सब सामग्रीकी प्रदक्षिणा की और वहाँ उपस्थित हुए सब लोगोंको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ६ ॥
‘सज्जनो! आपलोग बुद्धिमान् हैं, आपको मुझसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। हमारे कुलमें सदा ज्येष्ठ पुत्र ही राज्यका अधिकारी होता आया है और यही उचित भी है॥ ७ ॥
‘श्रीरामचन्द्रजी हमलोगोंके बड़े भाई हैं, अतः वे ही राजा होंगे। उनके बदले मैं ही चौदह वर्षोंतक वनमें निवास करूँगा॥ ८ ॥
‘आपलोग विशाल चतुरङ्गिणी सेना, जो सब प्रकारसे सबल हो, तैयार कीजिये। मैं अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामचन्द्रजीको वनसे लौटा लाऊँगा॥ ९ ॥
‘अभिषेकके लिये संचित हुई इस सारी सामग्रीको आगे करके मैं श्रीरामसे मिलनेके लिये वनमें चलूँगा और उन नरश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीका वहीं अभिषेक करके यज्ञसे लायी जानेवाली अग्निके समान उन्हें आगे करके अयोध्यामें ले आऊँगा॥ १०-११॥
‘परंतु जिसमें लेशमात्र मातृभाव शेष है, अपनी माता कहलानेवाली इस कैकेयीको मैं कदापि सफलमनोरथ नहीं होने दूँगा। श्रीराम यहाँके राजा होंगे और मैं दुर्गम वनमें निवास करूँगा॥ १२॥
‘कारीगर आगे जाकर रास्ता बनायें, ऊँची-नीची भूमिको बराबर करें तथा मार्गमें दुर्गम स्थानोंकी जानकारी रखनेवाले रक्षक भी साथ-साथ चलें’॥ १३॥
श्रीरामचन्द्रजीके लिये ऐसी बातें कहते हुए राजकुमार भरतसे वहाँ आये हुए सब लोगोंने इस प्रकार सुन्दर एवं परम उत्तम बात कही— ॥ १४॥
‘भरतजी! ऐसे उत्तम वचन कहनेवाले आपके पास कमलवनमें निवास करनेवाली लक्ष्मी अवस्थित हों; क्योंकि आप राजाके ज्येष्ठ पुत्र श्रीरामको स्वयं ही इस पृथिवीका राज्य लौटा देना चाहते हैं’॥ १५॥
उन लोगोंका कहा हुआ वह परम उत्तम आशीर्वचन जब कानमें पड़ा, तब उसे सुनकर राजकुमार भरतको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन सबकी ओर देखकर भरतके मुखमण्डलमें सुशोभित होनेवाले नेत्रोंसे हर्षजनित आँसुओंकी बूँदें गिरने लगीं॥ १६॥
भरतके मुखसे श्रीरामको ले आनेकी बात सुनकर उस सभाके सभी सदस्यों और मन्त्रियोंसहित समस्त राजकर्मचारी हर्षसे खिल उठे। उनका सारा शोक दूर हो गया और वे भरतसे बोले—‘नरश्रेष्ठ! आपकी आज्ञाके अनुसार राजपरिवारके प्रति भक्तिभाव रखनेवाले कारीगरों और रक्षकोंको मार्ग ठीक करनेके लिये भेज दिया गया है’॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें उन्नासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७९॥
अस्सीवाँ सर्ग
अस्सीवाँ सर्ग
अयोध्यासे गङ्गातटकतक सुरम्य शिविर और कूप आदिसे युक्त सुखद राजमार्गका निर्माण
तत्पश्चात् ऊँची-नीची एवं सजल-निर्जल भूमिक ज्ञान रखनेवाले, सूत्रकर्म (छावनी आदि बनानेके लिये सूत धारण करने) में कुशल, मार्गकी रक्षा आदि अपने कर्ममें सदा सावधान रहनेवाले शूर-वीर, भूमि खोदने या सुरङ्ग आदि बनानेवाले, नदी आदि पार करनेके लिये तुरंत साधन उपस्थित करनेवाले अथवा जलके प्रवाहको रोकनेवाले वेतनभोगी कारीगर, थवई, रथ और यन्त्र आदि बनानेवाले पुरुष, बढ़ई, मार्गरक्षक, पेड़ काटनेवाले, रसोइये, चूनेसे पोतने आदिका काम करनेवाले, बाँसकी चटाई और सूप आदि बनानेवाले, चमड़ेका चारजामा आदि बनानेवाले तथा रास्तेकी विशेष जानकारी रखनेवाले सामर्थ्यशाली पुरुषोंने पहले प्रस्थान किया॥ १—३॥
उस समय मार्ग ठीक करनेके लिये एक विशाल जनसमुदाय बड़े हर्षके साथ वनप्रदेशकी ओर अग्रसर हुआ, जो पूर्णिमाके दिन उमड़े हुए समुद्रके महान् वेगकी भाँति शोभा पा रहा था॥ ४ ॥
वे मार्ग-निर्माणमें निपुण कारीगर अपना-अपना दल साथ लेकर अनेक प्रकारके औजारोंके साथ आगे चल दिये॥ ५॥
वे लोग लताएँ, बेलें, झाड़ियाँ, ठूँठे वृक्ष तथा पत्थरोंको हटाते और नाना प्रकारके वृक्षोंको काटते हुए मार्ग तैयार करने लगे॥ ६ ॥
जिन स्थानोंमें वृक्ष नहीं थे, वहाँ कुछ लोगोंने वृक्ष भी लगाये। कुछ कारीगरोंने कुल्हाड़ों, टंकों (पत्थर तोड़नेके औजारों) तथा हँसियोंसे कहीं-कहीं वृक्षों और घासोंको काट-काटकर रास्ता साफ किया॥ ७॥
अन्य प्रबल मनुष्योंने जिनकी जड़ें नीचेतक जमी हुई थीं, उन कुश, कास आदिके झुरमुटोंको हाथोंसे ही उखाड़ फेंका। वे जहाँ-तहाँ ऊँचे-नीचे दुर्गम स्थानोंको खोद-खोदकर बराबर कर देते थे। दूसरे लोग कुओं और लंबे-चौड़े गड्ढोंको धूलोंसे ही पाट देते थे। जो स्थान नीचे होते, वहाँ सब ओरसे मिट्टी डालकर वे उन्हें शीघ्र ही बराबर कर देते थे॥ ८-९ ॥
उन्होंने जहाँ पुल बाँधनेके योग्य पानी देखा, वहाँ पुल बाँध दिये। जहाँ कँकरीली जमीन दिखायी दी, वहाँ उसे ठोक-पीटकर मुलायम कर दिया और जहाँ पानी बहनेके लिये मार्ग बनाना आवश्यक समझा, वहाँ बाँध काट दिया। इस प्रकार विभिन्न देशोंमें वहाँकी आवश्यकताके अनुसार कार्य किया॥ १० ॥
छोटे-छोटे सोतोंको, जिनका पानी सब ओर बह जाया करता था, चारों ओरसे बाँधकर शीघ्र ही अधिक जलवाला बना दिया। इस तरह थोड़े ही समयमें उन्होंने भिन्न-भिन्न आकार-प्रकारके बहुत-से सरोवर तैयार कर दिये, जो अगाध जलसे भरे होनेके कारण समुद्रके समान जान पड़ते थे॥ ११ ॥
निर्जल स्थानोंमें नाना प्रकारके अच्छे-अच्छे कुएँ और बावड़ी आदि बनवा दिये, जो आस-पास बनी हुई वेदिकाओंसे अलंकृत थे॥ १२ ॥
इस प्रकार सेनाका वह मार्ग देवताओंके मार्गकी भाँति अधिक शोभा पाने लगा। उसकी भूमिपर चूना-सुर्खी और कंकरीट बिछाकर उसे कूट-पीटकर पक्का कर दिया गया था। उसके किनारे-किनारे फूलोंसे सुशोभित वृक्ष लगाये गये थे। वहाँके वृक्षोंपर मतवाले पक्षी चहक रहे थे। सारे मार्गको पताकाओंसे सजा दिया गया था, उसपर चन्दनमिश्रित जलका छिड़काव किया गया था तथा अनेक प्रकारके फूलोंसे वह सड़क सजायी गयी थी॥
मार्ग बन जानेपर जहाँ-तहाँ छावनी आदि बनानेके लिये जिन्हें अधिकार दिया गया था, कार्यमें दत्त-चित्त रहनेवाले उन लोगोंने भरतकी आज्ञाके अनुसार सेवकोंको काम करनेका आदेश देकर जहाँ स्वादिष्ट फलोंकी अधिकता थी उन सुन्दर प्रदेशोंमें छावनियाँ बनवायीं और जो भरतको अभीष्ट था, मार्गके भूषणरूप उस शिविरको नाना प्रकारके अलंकारोंसे और भी सजा दिया॥ १५-१६ ॥
वास्तु-कर्मके ज्ञाता विद्वानोंने उत्तम नक्षत्रों और मुहूर्तोंमें महात्मा भरतके ठहरनेके लिये जो-जो स्थान बने थे, उनकी प्रतिष्ठा करवायी॥ १७ ॥
मार्गमें बने हुए वे निवेश (विश्राम-स्थान) इन्द्रपुरीके समान शोभा पाते थे। उनके चारों ओर खाइयाँ खोदी गयी थीं, धूल-मिट्टीके ऊँचे ढेर लगाये गये थे। खेमोंके भीतर इन्द्रनीलमणिकी बनी हुई प्रतिमाएँ सजायी गयी थीं। गलियों और सड़कोंसे उनकी विशेष शोभा होती थी। राजकीय गृहों और देवस्थानोंसे युक्त वे शिविर चूने पुते हुए प्राकारों (चहारदीवारियों)से घिरे थे। सभी विश्रामस्थान पताकाओंसे सुशोभित थे। सर्वत्र बड़ी-बड़ी सड़कोंका सुन्दर ढंगसे निर्माण