श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
बान्धवोंका यथायोग्य सम्मान किया॥ ४८ ॥
उस समय वहाँ रोते हुए उन महात्माओंका वह रोदन-शब्द पृथ्वी, आकाश, पर्वतोंकी गुफा और सम्पूर्ण दिशाओंको निरन्तर प्रतिध्वनित करता हुआ मृदङ्गकी ध्वनिके समान सुनायी पड़ता था॥ ४९ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ तीनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०३॥
एक सौ चारवाँ सर्ग
एक सौ चारवाँ सर्ग
वसिष्ठजीके साथ आती हुईं कौसल्याका मन्दाकिनीके तटपर सुमित्रा आदिके समक्ष दुःखपूर्ण उद्गार, श्रीराम, लक्ष्मण और सीताके द्वारा माताओंकी चरणवन्दना तथा वसिष्ठजीको प्रणाम करके श्रीराम आदिका सबके साथ बैठना
महर्षि वसिष्ठजी महाराज दशरथकी रानियोंको आगे करके श्रीरामचन्द्रजीको देखनेकी अभिलाषा लिये उस स्थानकी ओर चले, जहाँ उनका आश्रम था॥ १ ॥
राजरानियाँ मन्द गतिसे चलती हुईं जब मन्दाकिनीके तटपर पहुँचीं, तब उन्होंने वहाँ श्रीराम और लक्ष्मणके स्नान करनेका घाट देखा॥ २ ॥
इस समय कौसल्याके मुँहपर आँसुओंकी धारा बह चली। उन्होंने सूखे एवं उदास मुखसे दीन सुमित्रा तथा अन्य राजरानियोंसे कहा—॥ ३ ॥
‘जो राज्यसे निकाल दिये गये हैं तथा जो दूसरोंको क्लेश न देनेवाले कार्य ही करते हैं, उन मेरे अनाथ बच्चोंका यह वनमें दुर्गम तीर्थ है, जिसे इन्होंने पहले-पहल स्वीकार किया है॥ ४ ॥
‘सुमित्रे! आलस्यरहित तुम्हारे पुत्र लक्ष्मण स्वयं आकर सदा यहींसे मेरे पुत्रके लिये जल ले जाया करते हैं॥ ५ ॥
‘यद्यपि तुम्हारे पुत्रने छोटे-से-छोटा सेवा-कार्य भी स्वीकार किया है, तथापि इससे वे निन्दित नहीं हुए हैं; क्योंकि सद्गुणोंसे युक्त ज्येष्ठ भाईके प्रयोजनसे रहित जो कार्य होते हैं, वे ही सब निन्दित माने गये हैं॥ ६ ॥
‘तुम्हारा यह पुत्र भी उन क्लेशोंके योग्य नहीं है, जिन्हें आजकल वह सहन करता है। अब श्रीराम लौट चलें और निम्न श्रेणीके पुरुषोंके योग्य जो दुःखजनक कार्य उसके सामने प्रस्तुत है, उसे वह छोड़ दे—उसे करनेका अवसर ही उसके लिये न रह जाय’॥ ७ ॥
आगे जाकर विशाललोचना कौसल्याने देखा कि श्रीरामने पृथ्वीपर बिछे हुए दक्षिणाग्र कुशोंके ऊपर अपने पिताके लिये पिसे हुए इङ्गुदीके फलका पिण्ड रख छोड़ा है॥ ८ ॥
दुःखी रामके द्वारा पिताके लिये भूमिपर रखे हुए उस पिण्डको देखकर देवी कौसल्याने दशरथकी सब रानियोंसे कहा—॥ ९ ॥
‘बहनो! देखो, श्रीरामने इक्ष्वाकुकुलके स्वामी रघुकुलभूषण महात्मा पिताके लिये यह विधिपूर्वक पिण्डदान किया है॥ १० ॥
‘देवताके समान तेजस्वी वे महामना भूपाल नाना प्रकारके उत्तम भोग भोग चुके हैं। उनके लिये यह भोजन मैं उचित नहीं मानती॥ ११ ॥
‘जो चारों समुद्रोंतककी पृथ्वीका राज्य भोगकर भूतलपर देवराज इन्द्रके समान प्रतापी थे, वे भूपाल महाराज दशरथ पिसे हुए इङ्गुदी-फलका पिण्ड कैसे खा रहे होंगे?॥ १२ ॥
‘संसारमें इससे बढ़कर महान् दुःख मुझे और कोर्इ नहीं प्रतीत होता है, जिसके अधीन होकर श्रीराम समृद्धिशाली होते हुए भी अपने पिताको इङ्गुदीके पिसे हुए फलका पिण्ड दें॥ १३ ॥
‘श्रीरामने अपने पिताको इङ्गुदीका पिण्याक (पिसा हुआ फल) प्रदान किया है—यह देखकर दुःखसे मेरे हृदयके सहस्रों टुकड़े क्यों नहीं हो जाते हैं?॥ १४ ॥
‘यह लौकिकी श्रुति (लोकविख्यात कहावत) निश्चय ही मुझे सत्य प्रतीत हो रही है कि मनुष्य स्वयं जो अन्न खाता है, उसके देवता भी उसी अन्नको ग्रहण करते हैं’॥ १५ ॥
इस प्रकार शोकसे आर्त हुर्इ कौसल्याको उस समय उनकी सौतें समझा-बुझाकर उन्हें आगे ले गयीं। आश्रमपर पहुँचकर उन सबने श्रीरामको देखा, जो स्वर्गसे गिरे हुए देवताके समान जान पड़ते थे॥ १६ ॥
भोगोंका परित्याग करके तपस्वी जीवन व्यतीत करनेवाले श्रीरामको देखकर उनकी माताएँ शोकसे कातर हो गयीं और आर्तभावसे फूट-फूटकर रोती हुर्इ आँसू बहाने लगीं॥ १७ ॥
सत्यप्रतिज्ञ नरश्रेष्ठ श्रीराम माताओंको देखते ही उठकर खड़े हो गये और बारी-बारीसे उन सबके चरणारविन्दोंका स्पर्श किया॥ १८ ॥
विशाल नेत्रोंवाली माताएँ स्नेहवश जिनकी अंगुलियाँ कोमल और स्पर्श सुखद था, उन सुन्दर हाथोंसे श्रीरामकी पीठसे धूल पोंछने लगीं॥ १९ ॥
श्रीरामके बाद लक्ष्मण भी उन सभी दुःखिया माताओंको देखकर दुःखी हो गये और उन्होंने स्नेहपूर्वक धीरे-धीरे उनके चरणोंमें प्रणाम किया॥ २० ॥
उन सब माताओंने श्रीरामके साथ जैसा बर्ताव किया था, वैसे ही उत्तम लक्षणोंसे युक्त दशरथनन्दन लक्ष्मणके साथ भी किया॥ २१ ॥
तदनन्तर आँसूभरे नेत्रोंवाली दुःखिनी सीता भी सभी सासुओंके चरणोंमें प्रणाम करके उनके आगे खड़ी हो गयी॥ २२ ॥
तब दुःखसे पीड़ित हुई कौसल्याने जैसे माता अपनी बेटीको हृदयसे लगा लेती है, उसी प्रकार वनवासके कारण दीन (दुर्बल) हुई सीताको छातीसे चिपका लिया और इस प्रकार कहा— ॥ २३ ॥
‘विदेहराज जनककी पुत्री, राजा दशरथकी पुत्रवधू तथा श्रीरामकी पत्नी इस निर्जन वनमें क्यों दुःख भोग रही है?॥ २४ ॥
‘बेटी! तुम्हारा मुख धूपसे तपे हुए कमल, कुचले हुए उत्पल, धूलसे ध्वस्त हुए सुवर्ण और बादलोंसे ढके हुए चन्द्रमाकी भाँति श्रीहीन हो रहा है॥ २५ ॥
‘विदेहनन्दिनि! जैसे आग अपने उत्पत्तिस्थान काष्ठको दग्ध कर देती है, उसी प्रकार तुम्हारे इस मुखको देखकर मेरे मनमें संकटरूपी अरणिसे उत्पन्न हुआ यह शोकानल मुझे जलाये देता है’॥ २६ ॥
शोकाकुल हुई माता जब इस प्रकार विलाप कर रही थी, उसी समय भरतके बड़े भाई श्रीरामने वसिष्ठजीके चरणोंमें पड़कर उन्हें दोनों हाथोंसे पकड़ लिया॥ २७ ॥
जैसे देवराज इन्द्र बृहस्पतिके चरणोंका स्पर्श करते हैं, उसी प्रकार अग्निके समान बढ़े हुए तेजवाले पुरोहित वसिष्ठजीके दोनों पैर पकड़कर श्रीरामचन्द्रजी उनके साथ ही पृथ्वीपर बैठ गये॥ २८ ॥
तदनन्तर धर्मात्मा भरत एक साथ आये हुए अपने सभी मन्त्रियों, प्रधान-प्रधान पुरवासियों, सैनिकों तथा परम धर्मज्ञ पुरुषोंके साथ अपने बड़े भाईके पास उनके पीछे जा बैठे॥ २९ ॥
उस समय श्रीरामके आसनके समीप बैठे हुए अत्यन्त पराक्रमी भरतने दिव्य दीप्तिसे प्रकाशित होनेवाले श्रीरघुनाथजीको तपस्वीके वेशमें देखकर उनके प्रति उसी प्रकार हाथ जोड़ लिये जैसे देवराज इन्द्र प्रजापति ब्रह्माके समक्ष विनीतभावसे हाथ जोड़ते हैं॥ ३० ॥
उस समय वहाँ बैठे हुए श्रेष्ठ पुरुषोंके हृदयमें यथार्थ रूपसे यह उत्तम कौतूहल-सा जाग उठा कि देखें ये भरतजी श्रीरामचन्द्रजीको सत्कारपूर्वक प्रणाम करके आज उत्तम रीतिसे उनके समक्ष क्या कहते हैं?॥ ३१ ॥
वे सत्यप्रतिज्ञ श्रीराम, महानुभाव लक्ष्मण तथा धर्मात्मा भरत—ये तीनों भाई अपने सुहृदोंसे घिरकर यज्ञशालामें सदस्योंद्वारा घिरे हुए त्रिविध अग्नियोंके समान शोभा पा रहे थे॥ ३२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ चारवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०४॥
एक सौ पाँचवाँ सर्ग
एक सौ पाँचवाँ सर्ग
भरतका श्रीरामको अयोध्यामें चलकर राज्य ग्रहण करनेके लिये कहना, श्रीरामका जीवनकी अनित्यता बताते हुए पिताकी मृत्युके लिये शोक न करनेका भरतको उपदेश देना और पिताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये ही राज्य ग्रहण न करके वनमें रहनेका ही दृढ़ निश्चय बताना
अपने सुहृदोंसे घिरकर बैठे हुए पुरुषसिंह श्रीराम आदि भाइयोंकी वह रात्रि पिताकी मृत्युके दुःखसे शोक करते हुए ही व्यतीत हुई। सबेरा होनेपर भरत आदि तीनों भाई सुहृदोंके साथ ही मन्दाकिनीके तटपर गये और स्नान, होम एवं जप आदि करके पुनः श्रीरामके पास लौट आये॥ १-२ ॥
वहाँ आकर सभी चुपचाप बैठ गये। कोई कुछ नहीं बोल रहा था। तब सुहृदोंके बीचमें बैठे हुए भरतने श्रीरामसे इस प्रकार कहा— ॥ ३ ॥
‘भैया! पिताजीने वरदान देकर मेरी माताको संतुष्ट कर दिया और माताने यह राज्य मुझे दे दिया। अब मैं अपनी ओरसे यह अकण्टक राज्य आपकी ही सेवामें समर्पित करता हूँ। आप इसका पालन एवं उपभोग कीजिये॥ ४ ॥
‘वर्षाकालमें जलके महान् वेगसे टूटे हुए सेतुकी भाँति इस विशाल राज्यखण्डको सँभालना आपके सिवा दूसरेके लिये अत्यन्त कठिन है॥ ५ ॥
‘पृथ्वीनाथ! जैसे गदहा घोड़ेकी और अन्य साधारण पक्षी गरुड़की चाल नहीं चल सकते, उसी प्रकार मुझमें आपकी गतिका—आपकी पालन-पद्धतिका अनुसरण करनेकी शक्ति नहीं है॥ ६ ॥
‘श्रीराम! जिसके पास आकर दूसरे लोग जीवननिर्वाह करते हैं, उसीका जीवन उत्तम है और जो दूसरोंका आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करता है, उसका जीवन दुःखमय है (अतः आपके लिये राज्य करना ही उचित है)॥ ७ ॥
‘जैसे फलकी इच्छा रखनेवाले किसी पुरुषने एक वृक्ष लगाया, उसे पाल-पोसकर बड़ा किया; फिर उसके तने मोटे हो गये और वह ऐसा विशाल वृक्ष हो गया कि किसी नाटे कदके पुरुषके लिये उसपर चढ़ना अत्यन्त कठिन था। उस वृक्षमें जब फूल लग जायँ, उसके बाद भी यदि वह फल न दिखा सके तो जिसके लिये उस वृक्षको लगाया गया था, वह उद्देश्य पूरा न हो
सका। ऐसी स्थितिमें उसे लगानेवाला पुरुष उस प्रसन्नताका अनुभव नहीं करता, जो फलकी प्राप्ति होनेसे सम्भावित थी। महाबाहो ! यह एक उपमा है, इसका अर्थ आप स्वयं समझ लें (अर्थात् पिताजीने आप-जैसे सर्वसद्गुणसम्पन्न पुत्रको लोकरक्षाके लिये उत्पन्न किया था। यदि आपने राज्यपालनका भार अपने हाथमें नहीं लिया तो उनका वह उद्देश्य व्यर्थ हो जायगा)। इस राज्यपालनके अवसरपर आप श्रेष्ठ एवं भरण-पोषणमें समर्थ होकर भी यदि हम भृत्योंका शासन नहीं करेंगे तो पूर्वोक्त उपमा ही आपके लिये लागू होगी॥ ८—१०॥
‘महाराज! विभिन्न जातियोंके सङ्घ और प्रधान-प्रधान पुरुष आप शत्रुदमन नरेशको सब ओर तपते हुए सूर्यकी भाँति राज्यसिंहासनपर विराजमान देखें॥ ११॥
‘ककुत्स्थकुलभूषण! इस प्रकार आपके अयोध्याको लौटते समय मतवाले हाथी गर्जना करें और अन्तःपुरकी स्त्रियाँ एकाग्रचित्त होकर प्रसन्नता-पूर्वक आपका अभिनन्दन करें’॥ १२॥
इस प्रकार श्रीरामसे राज्य-ग्रहणके लिये प्रार्थना करते हुए भरतजीकी बात सुनकर नगरके भिन्न-भिन्न मनुष्योंने उसका भलीभाँति अनुमोदन किया॥ १३॥
तब शिक्षित बुद्धिवाले अत्यन्त धीर भगवान् श्रीरामने यशस्वी भरतको इस तरह दुःखी हो विलाप करते देख उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—॥ १४॥
‘भाई! यह जीव ईश्वरके समान स्वतन्त्र नहीं है, अतः कोई यहाँ अपनी इच्छाके अनुसार कुछ नहीं कर सकता। काल इस पुरुषको इधर-उधर खींचता रहता है॥ १५॥
‘समस्त संग्रहोंका अन्त विनाश है। लौकिक उन्नतियोंका अन्त पतन है। संयोगका अन्त वियोग है और जीवनका अन्त मरण है॥ १६॥
‘जैसे पके हुए फलोंको पतनके सिवा और किसीसे भय नहीं है, उसी प्रकार उत्पन्न हुए मनुष्योंको मृत्युके सिवा और किसीसे भय नहीं है॥ १७॥
‘जैसे सुदृढ़ खम्भेवाला मकान भी पुराना होनेपर गिर जाता है, उसी प्रकार मनुष्य जरा और मृत्युके वशमें पड़कर नष्ट हो जाते हैं॥ १८॥
‘जो रात बीत जाती है, वह लौटकर फिर नहीं आती है। जैसे यमुना जलसे भरे हुए समुद्रकी ओर जाती ही है, उधरसे लौटती नहीं॥ १९॥
‘दिन-रात लगातार बीत रहे हैं और इस संसारमें सभी प्राणियोंकी आयुका तीव्र गतिसे नाश कर रहे हैं। ठीक वैसे ही जैसे सूर्यकी किरणें ग्रीष्म-ऋतुमें जलको शीघ्रतापूर्वक सोखती
रहती हैं॥ २० ॥
‘तुम अपने ही लिये चिन्ता करो, दूसरेके लिये क्यों बार-बार शोक करते हो। कोई इस लोकमें स्थित हो या अन्यत्र गया हो, जिस किसीकी भी आयु तो निरन्तर क्षीण ही हो रही है॥ २१ ॥
‘मृत्यु साथ ही चलती है, साथ ही बैठती है और बहुत बड़े मार्गकी यात्रामें भी साथ ही जाकर वह मनुष्यके साथ ही लौटती है॥ २२ ॥
‘शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयीं, सिरके बाल सफेद हो गये। फिर जरावस्थासे जीर्ण हुआ मनुष्य कौन-सा उपाय करके मृत्युसे बचनेके लिये अपना प्रभाव प्रकट कर सकता है?॥ २३ ॥
‘लोग सूर्योदय होनेपर प्रसन्न होते हैं, सूर्यास्त होनेपर भी खुश होते हैं; किंतु यह नहीं जानते कि प्रतिदिन अपने जीवनका नाश हो रहा है॥ २४ ॥
‘किसी ऋतुका प्रारम्भ देखकर मानो वह नयीनयी आयी हो (पहले कभी आयी ही न हो), ऐसा समझकर लोग हर्षसे खिल उठते हैं, परंतु यह नहीं जानते कि इन ऋतुओंके परिवर्तनसे प्राणियोंके प्राणोंका (आयुका) क्रमशः क्षय हो रहा है॥ २५ ॥
‘जैसे महासागरमें बहते हुए दो काठ कभी एक-दूसरेसे मिल जाते हैं और कुछ कालके बाद अलग भी हो जाते हैं, उसी प्रकार स्त्री, पुत्र, कुटुम्ब और धन भी मिलकर बिछुड़ जाते हैं; क्योंकि इनका वियोग अवश्यम्भावी है॥ २६-२७ ॥
‘इस संसारमें कोई भी प्राणी यथासमय प्राप्त होनेवाले जन्म-मरणका उल्लङ्घन नहीं कर सकता। इसलिये जो किसी मरे हुए व्यक्तिके लिये बारंबार शोक करता है, उसमें भी यह सामर्थ्य नहीं है कि वह अपनी ही मृत्युको टाल सके॥ २८ ॥
‘जैसे आगे जाते हुए यात्रियों अथवा व्यापारियोंके समुदायसे रास्तेमें खड़ा हुआ पथिक यों कहे कि मैं भी आप लोगोंके पीछे-पीछे आऊँगा और तदनुसार वह उनके पीछे-पीछे जाय, उसी प्रकार हमारे पूर्वज पिता-पितामह आदि जिस मार्गसे गये हैं, जिसपर जाना अनिवार्य है तथा जिससे बचनेका कोई उपाय नहीं है, उसी मार्गपर स्थित हुआ मनुष्य किसी औरके लिये शोक कैसे करे?॥ २९-३० ॥
‘जैसे नदियोंका प्रवाह पीछे नहीं लौटता, उसी प्रकार दिन-दिन ढलती हुई अवस्था फिर नहीं लौटती है। उसका क्रमशः नाश हो रहा है, यह सोचकर आत्माको कल्याणके साधनभूत धर्ममें लगावे; क्योंकि सभी लोग अपना कल्याण चाहते हैं॥ ३१ ॥
‘तात! हमारे पिता धर्मात्मा थे। उन्होंने पर्याप्त दक्षिणाएँ देकर प्रायः सभी परम शुभकारक यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। उनके सारे पाप धुल गये थे। अतः वे महाराज स्वर्गलोकमें गये हैं॥ ३२॥
‘वे भरण-पोषणके योग्य परिजनोंका भरण करते थे। प्रजाजनोंका भलीभाँति पालन करते थे और प्रजाजनोंसे धर्मके अनुसार कर आदिके रूपमें धन लेते थे— इन सब कारणोंसे हमारे पिता उत्तम स्वर्गलोकमें पधारे हैं॥ ३३॥
‘सर्वप्रिय शुभ कर्मों तथा प्रचुर दक्षिणवाले यज्ञोंके अनुष्ठानोंसे हमारे पिता पृथ्वीपति महाराज दशरथ स्वर्गलोकमें गये हैं॥ ३४॥
‘उन्होंने नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा यज्ञपुरुषकी आराधना की, प्रचुर भोग प्राप्त किये और उत्तम आयु पायी थी, इसके बाद वे महाराज यहाँसे स्वर्गलोकको पधारे हैं॥
‘तात! अन्य राजाओंकी अपेक्षा उत्तम आयु और श्रेष्ठ भोगोंको पाकर हमारे पिता सदा सत्पुरुषोंके द्वारा सम्मानित हुए हैं; अतः स्वर्गवासी हो जानेपर भी वे शोक करनेयोग्य नहीं हैं॥ ३६॥
‘हमारे पिताने जराजीर्ण मानव-शरीरका परित्याग करके दैवी सम्पत्ति प्राप्त की है, जो ब्रह्मलोकमें विहार करानेवाली है॥ ३७॥
‘कोऽई भी ऐसा विद्वान्, जो तुम्हारे और मेरे समान शास्त्र-ज्ञान-सम्पन्न एवं परम बुद्धिमान् है, पिताजीके लिये शोक नहीं कर सकता॥ ३८॥
‘धीर एवं प्रज्ञावान् पुरुषको सभी अवस्थाओंमें ये नाना प्रकारके शोक, विलाप तथा रोदन त्याग देने चाहिये॥
‘इसलिये तुम स्वस्थ हो जाओ, तुम्हारे मनमें शोक नहीं होना चाहिये। वक्ताओंमें श्रेष्ठ भरत! तुम यहाँसे जाकर अयोध्यापुरीमें निवास करो; क्योंकि मनको वशमें रखनेवाले पूज्य पिताजीने तुम्हारे लिये यही आदेश दिया है॥ ४०॥
‘उन पुण्यकर्मा महाराजने मुझे भी जहाँ रहनेकी आज्ञा दी है, वहीं रहकर मैं उन पूज्य पिताके आदेशका पालन करूँगा॥ ४१॥
‘शत्रुदमन भरत! पिताकी आज्ञाकी अवहेलना करना मेरे लिये कदापि उचित नहीं है। वे तुम्हारे लिये भी सर्वदा सम्मानके योग्य हैं; क्योंकि वे ही हमलोगोंके हितैषी बन्धु और जन्मदाता
थे॥ ४२ ॥
‘रघुनन्दन! मैं इस वनवासरूपी कर्मके द्वारा पिताजीके ही वचनका जो धर्मात्माओंको भी मान्य है, पालन करूँगा॥ ४३ ॥
‘नरश्रेष्ठ! परलोकपर विजय पानेकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको धार्मिक, क्रूरतासे रहित और गुरुजनोंका आज्ञापालक होना चाहिये॥ ४४ ॥
‘मनुष्योंमें श्रेष्ठ भरत! हमारे पूज्य पिता दशरथके शुभ आचरणोंपर दृष्टिपात करके तुम अपने धार्मिक स्वभावके द्वारा आत्माकी उन्नतिके लिये प्रयत्न करो’॥
सर्वशक्तिमान् महात्मा श्रीराम एक मुहूर्ततक अपने छोटे भाई भरतसे पिताकी आज्ञाका पालन करानेके उद्देश्यसे ये अर्थयुक्त वचन कहकर चुप हो गये॥ ४६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०५॥
एक सौ छठाँ सर्ग
एक सौ छठाँ सर्ग
भरतकी पुनः श्रीरामसे अयोध्या लौटने और राज्य ग्रहण करनेकी प्रार्थना
ऐसा अर्थयुक्त वचन कहकर जब श्रीराम चुप हो गये, तब धर्मात्मा भरतने मन्दाकिनीके तटपर प्रजावत्सल धर्मात्मा श्रीरामसे यह विचित्र बात कही— 'शत्रुदमन रघुवीर! इस जगतमें जैसे आप हैं, वैसा दूसरा कौन हो सकता है?॥ १-२ ॥
'कोऽइ भी दुःख आपको व्यथित नहीं कर सकता। कितनी ही प्रिय बात क्यों न हो, वह आपको हर्षोत्फुल्ल नहीं कर सकती। वृद्ध पुरुषोंके सम्माननीय होकर भी आप उनसे संदेहकी बातें पूछते हैं॥ ३ ॥
'जैसे मरे हुए जीवका अपने शरीर आदिसे कोऽइ सम्बन्ध नहीं रहता, उसी प्रकार जीते-जी भी वह उनके सम्बन्धसे रहित है। जैसे वस्तुके अभावमें उसके प्रति राग-द्वेष नहीं होता, वैसे ही उसके रहनेपर भी मनुष्यको राग-द्वेषसे शून्य होना चाहिये। जिसे ऐसी विवेकयुक्त बुद्धि प्राप्त हो गयी है, उसको संताप क्यों होगा?॥ ४ ॥
'नरेश्वर! जिसे आपके समान आत्मा और अनात्माका ज्ञान है, वही संकटमें पड़नेपर भी विषाद नहीं कर सकता॥
'रघुनन्दन! आप देवताओंकी भाँति सत्त्वगुणसे सम्पन्न, महात्मा, सत्यप्रतिज्ञ, सर्वज्ञ, सबके साक्षी और बुद्धिमान् हैं॥ ६ ॥
'ऐसे उत्तम गुणोंसे युक्त और जन्म-मरणके रहस्यको जाननेवाले आपके पास असह्य दुःख नहीं आ सकता॥ ७ ॥
'जब मैं परदेशमें था, उस समय नीच विचार रखनेवाली मेरी माताने मेरे लिये जो पाप कर डाला, वह मुझे अभीष्ट नहीं है; अतः आप उसे क्षमा करके मुझपर प्रसन्न हों॥ ८ ॥
'मैं धर्मके बन्धनमें बँधा हूँ, इसलिये इस पाप करनेवाली एवं दण्डनीय माताको मैं कठोर दण्ड देकर मार नहीं डालता॥ ९ ॥
'जिनके कुल और कर्म दोनों ही शुभ थे, उन महाराज दशरथसे उत्पन्न होकर धर्म और अधर्मको जानता हुआ भी मैं मातृवधरूपी लोकनिन्दित कर्म कैसे करूँ?॥ १० ॥
‘महाराज मेरे गुरु, श्रेष्ठ यज्ञकर्म करनेवाले, बड़े-बूढ़े, राजा, पिता और देवता रहे हैं और इस समय परलोकवासी हो चुके हैं, इसीलिये इस भरी सभामें मैं उनकी निन्दा नहीं करता हूँ॥ ११ ॥
‘धर्मज्ञ रघुनन्दन! कौन ऐसा मनुष्य है, जो धर्मको जानते हुए भी स्त्रीका प्रिय करनेकी इच्छासे ऐसा धर्म और अर्थसे हीन कुत्सित कर्म कर सकता है?॥ १२ ॥
‘लोकमें एक प्राचीन किंवदन्ती है कि अन्तकालमें सब प्राणी मोहित हो जाते हैं—उनकी बुद्धि नष्ट हो जाती है। राजा दशरथने ऐसा कठोर कर्म करके उस किंवदन्तीकी सत्यताको प्रत्यक्ष कर दिखाया॥ १३ ॥
‘पिताजीने क्रोध, मोह और साहसके कारण ठीक समझ कर जो धर्मका उल्लङ्घन किया है, उसे आप पलट दें—उसका संशोधन कर दें॥ १४ ॥
‘जो पुत्र पिताकी की हुई भूलको ठीक कर देता है, वही लोकमें उत्तम संतान माना गया है। जो इसके विपरीत बर्ताव करता है, वह पिताकी श्रेष्ठ संतति नहीं है॥ १५ ॥
‘अतः आप पिताकी योग्य संतान ही बने रहें। उनके अनुचित कर्मका समर्थन न करें। उन्होंने इस समय जो कुछ किया है, वह धर्मकी सीमासे बाहर है। संसारमें धीर पुरुष उसकी निन्दा करते हैं॥ १६ ॥
‘कैकेयी, मैं, पिताजी, सुहृद्गण, बन्धु-बान्धव, पुरवासी तथा राष्ट्रकी प्रजा—इन सबकी रक्षाके लिये आप मेरी प्रार्थना स्वीकार करें॥ १७ ॥
‘कहाँ वनवास और कहाँ क्षात्रधर्म? कहाँ जटाधारण और कहाँ प्रजाका पालन? ऐसे परस्परविरोधी कर्म आपको नहीं करने चाहिये॥ १८ ॥
‘महाप्राज्ञ! क्षत्रियके लिये पहला धर्म यही है कि उसका राज्यपर अभिषेक हो, जिससे वह प्रजाका भलीभाँति पालन कर सके॥ १९ ॥
‘भला कौन ऐसा क्षत्रिय होगा, जो प्रत्यक्ष सुखके साधनभूत प्रजापालनरूप धर्मका परित्याग करके संशयमें स्थित, सुखके लक्षणसे रहित, भविष्यमें फल देनेवाले अनिश्चित धर्मका आचरण करेगा?॥ २० ॥
‘यदि आप क्लेशसाध्य धर्मका ही आचरण करना चाहते हैं तो धर्मानुसार चारों वर्णोंका पालन करते हुए ही कष्ट उठाइये॥ २१ ॥
‘धर्मज्ञ रघुनन्दन! धर्मके ज्ञाता पुरुष चारों आश्रमोंमें गार्हस्थ्यको ही श्रेष्ठ बतलाते हैं, फिर आप उसका परित्याग क्यों करना चाहते हैं?॥ २२ ॥
‘मैं शास्त्रज्ञान और जन्मजात अवस्था दोनों ही दृष्टियोंसे आपकी अपेक्षा बालक हूँ, फिर आपके रहते हुए मैं वसुधाका पालन कैसे करूँगा?॥ २३ ॥
‘मैं बुद्धि और गुण दोनोंसे हीन हूँ, बालक हूँ तथा मेरा स्थान आपसे बहुत छोटा है; अतः मैं आपके बिना जीवन-धारण भी नहीं कर सकता, राज्यका पालन तो दूरकी बात है॥ २४ ॥
‘धर्मज्ञ रघुनन्दन! पिताका यह सारा राज्य श्रेष्ठ और निष्कण्टक है, अतः आप बन्धु-बान्धवोंके साथ स्वधर्मानुसार इसका पालन कीजिये॥ २५ ॥
‘मन्त्रज्ञ रघुवीर! मन्त्रोंके ज्ञाता महर्षि वसिष्ठ आदि सभी ऋत्विज् तथा मन्त्री, सेनापति और प्रजा आदि सारी प्रकृतियाँ यहाँ उपस्थित हैं। ये सब लोग यहीं आपका राज्याभिषेक करें॥ २६ ॥
‘हमलोगोंके द्वारा अभिषिक्त होकर आप मरुद्गणोंसे अभिषिक्त हुए इन्द्रकी भाँति वेगपूर्वक सब लोकोंको जीतकर प्रजाका पालन करनेके लिये अयोध्याको चलें॥
‘वहाँ देवता, ऋषि और पितरोंका ऋण चुकायें, दुष्ट शत्रुओंका भलीभाँति दमन करें तथा मित्रोंको उनके इच्छानुसार वस्तुओंद्वारा तृप्त करते हुए आप ही अयोध्यामें मुझे धर्मकी शिक्षा देते रहें॥ २८ ॥
‘आर्य! आपका अभिषेक सम्पन्न होनेपर सुहृद्गण प्रसन्न हों और दुःख देनेवाले आपके शत्रु भयभीत होकर दसों दिशाओंमें भाग जायँ॥ २९ ॥
‘पुरुषप्रवर! आज आप मेरी माताके कलङ्कको धो-पोंछकर पूज्य पिताजीको भी निन्दासे बचाइये॥ ३० ॥
‘मैं आपके चरणोंमें माथा टेककर याचना करता हूँ। आप मुझपर दया कीजिये। जैसे महादेवजी सब प्राणियोंपर अनुग्रह करते हैं, उसी प्रकार आप भी अपने बन्धु-बान्धवोंपर कृपा कीजिये॥ ३१ ॥
‘अथवा यदि आप मेरी प्रार्थनाको ठुकराकर यहाँसे वनको ही जायँगे तो मैं भी आपके साथ जाऊँगा’॥ ३२ ॥
'ग्लानिमें पड़े हुए भरतने मनोभिराम राजा श्रीरामको उनके चरणोंमें माथा टेककर प्रसन्न करनेकी चेष्टा की तथापि उन सत्त्वगुणसम्पन्न रघुनाथजीने पिताकी आज्ञामें ही दृढ़तापूर्वक स्थित रहकर अयोध्या जानेका विचार नहीं किया॥ ३३ ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी वह अद्भुत दृढ़ता देखकर सब लोग एक ही साथ दुःखी भी हुए और हर्षको भी प्राप्त हुए। ये अयोध्या नहीं जा रहे हैं—यह सोचकर वे दुःखी हुए और प्रतिज्ञा-पालनमें उनकी दृढ़ता देखकर उन्हें हर्ष हुआ॥ ३४ ॥
उस समय ऋत्विज्, पुरवासी, भिन्न-भिन्न समुदायके नेता और माताएँ अचेत-सी होकर आँसू बहाती हुईं पूर्वोक्त बातें कहनेवाली भरतकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगीं और सबने उनके साथ ही योग्यतानुसार श्रीरामजीके सामने विनीत होकर उनसे अयोध्या लौट चलनेकी याचना की॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ छठाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०६॥
एक सौ सातवाँ सर्ग
एक सौ सातवाँ सर्ग
श्रीरामका भरतको समझाकर उन्हें अयोध्या जानेका आदेश देना
जब भरत पुनः इस प्रकार प्रार्थना करने लगे, तब कुटुम्बीजनोंके बीचमें सत्कारपूर्वक बैठे हुए लक्ष्मणके बड़े भाऽइ श्रीमान् रामचन्द्रजीने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १ ॥
‘भाऽइ! तुम नृपश्रेष्ठ महाराज दशरथके द्वारा केकय-राजकन्या माता कैकेयीके गर्भसे उत्पन्न हुए हो; अतः तुमने जो ऐसे उत्तम वचन कहे हैं, वे सर्वथा तुम्हारे योग्य हैं॥
‘भैया! आजसे बहुत पहलेकी बात है—पिताजीका जब तुम्हारी माताजीके साथ विवाह हुआ था, तभी उन्होंने तुम्हारे नानासे कैकेयीके पुत्रको राज्य देनेकी उत्तम शर्त कर ली थी॥ ३ ॥
‘इसके बाद देवासुर-संग्राममें तुम्हारी माताने प्रभावशाली महाराजकी बड़ी सेवा की; इससे संतुष्ट होकर राजाने उन्हें वरदान दिया॥ ४ ॥
‘उसीकी पूर्तिके लिये प्रतिज्ञा कराकर तुम्हारी श्रेष्ठ वर्णवाली यशस्विनी माताने उन नरश्रेष्ठ पिताजीसे दो वर माँगे॥ ५ ॥
‘पुरुषसिंह! एक वरके द्वारा इन्होंने तुम्हारे लिये राज्य माँगा और दूसरेके द्वारा मेरा वनवास। इनसे इस प्रकार प्रेरित होकर राजाने वे दोनों वर इन्हें दे दिये॥
‘पुरुषप्रवर! इस प्रकार उन पिताजीने वरदानके रूपमें मुझे चौदह वर्षोंतक वनवासकी आज्ञा दी है॥
‘यही कारण है कि मैं सीता और लक्ष्मणके साथ इस निर्जन वनमें चला आया हूँ। यहाँ मेरा कोऽइ प्रतिद्वन्द्वी नहीं है। मैं यहाँ पिताजीके सत्यकी रक्षामें स्थित रहूँगा॥
‘राजेन्द्र! तुम भी उनकी आज्ञा मानकर शीघ्र ही राज्यपदपर अपना अभिषेक करा लो और पिताको सत्यवादी बनाओ—यही तुम्हारे लिये उचित है॥ ९ ॥
‘धर्मज्ञ भरत! तुम मेरे लिये पूज्य पिता राजा दशरथको कैकेयीके ऋणसे मुक्त करो, उन्हें नरकमें गिरनेसे बचाओ और माताका भी आनन्द बढ़ाओ॥ १० ॥
‘तात! सुना जाता है कि बुद्धिमान्, यशस्वी राजा गयने गय-देशमें ही यज्ञ करते हुए पितरोंके प्रति एक कहावत कही थी॥ ११ ॥
‘(वह इस प्रकार है—) बेटा पुत् नामक नरकसे पिताका उद्धार करता है, इसलिये वह पुत्र कहा गया है। वही पुत्र है, जो पितरोंकी सब ओरसे रक्षा करता है॥
‘बहुत-से गुणवान् और बहुश्रुत पुत्रोंकी इच्छा करनी चाहिये। सम्भव है कि प्राप्त हुए उन पुत्रोंमेंसे कोऽइ एक भी गयाकी यात्रा करे?॥ १३ ॥
‘रघुनन्दन! नरश्रेष्ठ भरत! इस प्रकार सभी राजर्षियोंने पितरोंके उद्धारका निश्चय किया है, अतः प्रभो! तुम भी अपने पिताका नरकसे उद्धार करो॥ १४ ॥
‘वीर भरत! तुम शत्रुघ्न तथा समस्त ब्राह्मणोंको साथ लेकर अयोध्याको लौट जाओ और प्रजाको सुख दो॥
‘वीर! अब मैं भी लक्ष्मण और सीताके साथ शीघ्र ही दण्डकारण्यमें प्रवेश करूँगा॥ १६ ॥
‘भरत! तुम स्वयं मनुष्योंके राजा बनो और मैं जंगली पशुओंका सम्राट् बनूँगा। अब तुम अत्यन्त हर्षपूर्वक श्रेष्ठ नगर अयोध्याको जाओ और मैं भी प्रसन्नतापूर्वक दण्डकवनमें प्रवेश करूँगा॥ १७ ॥
‘भरत! सूर्यकी प्रभाको तिरोहित कर देनेवाला छत्र तुम्हारे मस्तकपर शीतल छाया करे। अब मैं भी धीरे-धीरे इन जंगली वृक्षोंकी घनी छायाका आश्रय लूँगा॥ १८ ॥
‘भरत! अतुलित बुद्धिवाले शत्रुघ्न तुम्हारी सहायतामें रहें और सुविख्यात सुमित्राकुमार लक्ष्मण मेरे प्रधान मित्र (सहायक) हैं; हम चारों पुत्र अपने पिता राजा दशरथके सत्यकी रक्षा करें। तुम विषाद मत करो’॥ १९ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ सातवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०७॥
एक सौ आठवाँ सर्ग
एक सौ आठवाँ सर्ग
जाबालिका नास्तिकोंके मतका अवलम्बन करके श्रीरामको समझाना
जब धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजी भरतको इस प्रकार समझा-बुझा रहे थे, उसी समय ब्राह्मणशिरोमणि जाबालिने उनसे यह धर्मविरुद्ध वचन कहा—॥ १ ॥
‘रघुनन्दन! आपने ठीक कहा, परंतु आप श्रेष्ठ बुद्धिवाले और तपस्वी हैं; अतः आपको गँवार मनुष्यकी तरह ऐसा निरर्थक विचार मनमें नहीं लाना चाहिये॥ २ ॥
‘संसारमें कौन पुरुष किसका बन्धु है और किससे किसको क्या पाना है? जीव अकेला ही जन्म लेता और अकेला ही नष्ट हो जाता है॥ ३ ॥
‘अतः श्रीराम! जो मनुष्य माता या पिता समझकर किसीके प्रति आसक्त होता है, उसे पागलके समान समझना चाहिये; क्योंकि यहाँ कोऽइ किसीका कुछ भी नहीं है॥ ४ ॥
‘जैसे कोऽइ मनुष्य दूसरे गाँवको जाते समय बाहर किसी धर्मशालामें एक रातके लिये ठहर जाता है और दूसरे दिन उस स्थानको छोड़कर आगेके लिये प्रस्थित हो जाता है, इसी प्रकार पिता, माता, घर और धन— ये मनुष्योंके आवासमात्र हैं। ककुत्स्थकुलभूषण! इनमें सज्जन पुरुष आसक्त नहीं होते हैं॥ ५-६ ॥
‘अतः नरश्रेष्ठ! आपको पिताका राज्य छोड़कर इस दुःखमय, नीचे-ऊँचे तथा बहुकण्टकाकीर्ण वनके कुत्सित मार्गपर नहीं चलना चाहिये॥ ७ ॥
‘आप समृद्धिशालिनी अयोध्यामें राजाके पदपर अपना अभिषेक कराइये। वह नगरी प्रोषितभर्तृका नारीकी भाँति एक वेणी धारण करके आपकी प्रतीक्षा करती है॥ ८ ॥
‘राजकुमार! जैसे देवराज इन्द्र स्वर्गमें विहार करते हैं, उसी प्रकार आप बहुमूल्य राजभोगोंका उपभोग करते हुए अयोध्यामें विहार कीजिये॥ ९ ॥
‘राजा दशरथ आपके कोऽइ नहीं थे और आप भी उनके कोऽइ नहीं हैं। राजा दूसरे थे और आप भी दूसरे हैं; इसलिये मैं जो कहता हूँ, वही कीजिये॥ १० ॥
‘पिता जीवके जन्ममें निमित्तकारणमात्र होता है। वास्तवमें ऋतुमती माताके द्वारा गर्भमें धारण किये हुए वीर्य और रजका परस्पर संयोग होनेपर ही पुरुषका यहाँ जन्म होता है॥ ११ ॥
‘राजाको जहाँ जाना था, वहाँ चले गये। यह प्राणियोंके लिये स्वाभाविक स्थिति है। आप तो व्यर्थ ही मारे जाते (कष्ट उठाते) हैं॥ १२ ॥
‘जो-जो मनुष्य प्राप्त हुए अर्थका परित्याग करके धर्मपरायण हुए हैं, उन्हीं-उन्हींके लिये मैं शोक करता हूँ, दूसरोंके लिये नहीं। वे इस जगतमें धर्मके नामपर केवल दुःख भोगकर मृत्युके पश्चात् नष्ट हो गये हैं॥
‘अष्टका आदि जितने श्राद्ध हैं, उनके देवता पितर हैं—श्राद्धका दान पितरोंको मिलता है। यही सोचकर लोग श्राद्धमें प्रवृत्त होते हैं; किन्तु विचार करके देखिये तो इसमें अन्नका नाश ही होता है। भला, मरा हुआ मनुष्य क्या खायेगा॥ १४ ॥
‘यदि यहाँ दूसरेका खाया हुआ अन्न दूसरेके शरीरमें चला जाता हो तो परदेशमें जानेवालोंके लिये श्राद्ध ही कर देना चाहिये; उनको रास्तेके लिये भोजन देना उचित नहीं है॥ १५ ॥
‘देवताओंके लिये यज्ञ और पूजन करो, दान दो, यज्ञकी दीक्षा ग्रहण करो, तपस्या करो और घर-द्वार छोड़कर संन्यासी बन जाओ इत्यादि बातें बतानेवाले ग्रन्थ बुद्धिमान् मनुष्योंने दानकी ओर लोगोंकी प्रवृत्ति करानेके लिये ही बनाये हैं॥ १६ ॥
‘अतः महामते! आप अपने मनमें यह निश्चय कीजिये कि इस लोकके सिवा कोऽइ दूसरा लोक नहीं है (अतः वहाँ फल भोगनेके लिये धर्म आदिके पालनकी आवश्यकता नहीं है)। जो प्रत्यक्ष राज्यलाभ है, उसका आश्रय लीजिये, परोक्ष (पारलौकिक लाभ) को पीछे ढकेल दीजिये॥ १७ ॥
‘सत्पुरुषोंकी बुद्धि, जो सब लोगोंके लिये राह दिखानेवाली होनेके कारण प्रमाणभूत है, आगे करके भरतके अनुरोधसे आप अयोध्याका राज्य ग्रहण कीजिये’॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ आठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०८॥
एक सौ नौवाँ सर्ग
एक सौ नौवाँ सर्ग
श्रीरामके द्वारा जाबालिके नास्तिक मतका खण्डन करके आस्तिक मतका स्थापन
जाबालिका यह वचन सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीरामचन्द्रजीने अपनी संशयरहित बुद्धिके द्वारा श्रुतिसम्मत सदुक्तिका आश्रय लेकर कहा— ॥ १ ॥
‘विप्रवर! आपने मेरा प्रिय करनेकी इच्छासे यहाँ जो बात कही है, वह कर्तव्य-सी दिखायी देती है; किंतु वास्तवमें करनेयोग्य नहीं है। वह पथ्य-सी दीखनेपर भी वास्तवमें अपथ्य है॥ २ ॥
‘जो पुरुष धर्म अथवा वेदकी मर्यादाको त्याग देता है, वह पापकर्ममें प्रवृत्त हो जाता है। उसके आचार और विचार दोनों भ्रष्ट हो जाते हैं; इसलिये वह सत्पुरुषोंमें कभी सम्मान नहीं पाता है॥ ३ ॥
‘आचार ही यह बताता है कि कौन पुरुष उत्तम कुलमें उत्पन्न हुआ है और कौन अधम कुलमें, कौन वीर है और कौन व्यर्थ ही अपनेको पुरुष मानता है तथा कौन पवित्र है और कौन अपवित्र?॥ ४ ॥
‘आपने जो आचार बताया है, उसे अपनानेवाला पुरुष श्रेष्ठ-सा दिखायी देनेपर भी वास्तवमें अनार्य होगा। बाहरसे पवित्र दीखनेपर भी भीतरसे अपवित्र होगा। उत्तम लक्षणोंसे युक्त-सा प्रतीत होनेपर भी वास्तवमें उसके विपरीत होगा तथा शीलवान्-सा दीखनेपर भी वस्तुतः वह दुःशील ही होगा॥ ५ ॥
‘आपका उपदेश चोला तो धर्मका पहने हुए है, किंतु वास्तवमें अधर्म है। इससे संसारमें वर्ण-संकरताका प्रचार होगा। यदि मैं इसे स्वीकार करके वेदोक्त शुभकर्मोंका अनुष्ठान छोड़ दूँ और विधिहीन कर्मोंमें लग जाऊँ तो कर्तव्य-अकर्तव्यका ज्ञान रखनेवाला कौन समझदार मनुष्य मुझे श्रेष्ठ समझकर आदर देगा? उस दशामें तो मैं इस जगत्में दुराचारी तथा लोकको कलङ्कित करनेवाला समझा जाऊँगा॥ ६-७ ॥
‘जहाँ अपनी की हुईँ प्रतिज्ञा तोड़ दी जाती है, उस वृत्तिके अनुसार बर्ताव करनेपर मैं किस साधनसे स्वर्गलोक प्राप्त करूँगा तथा आपने जिस आचारका उपदेश दिया है, वह किसका है, जिसका मुझे अनुसरण करना होगा; क्योंकि आपके कथनानुसार मैं पिता आदिमेंसे किसीका कुछ भी नहीं हूँ॥ ८ ॥
‘आपके बताये हुए मार्गसे चलनेपर पहले तो मैं स्वेच्छाचारी हूँगा। फिर यह सारा लोक स्वेच्छाचारी हो जायगा; क्योंकि राजाओंके जैसे आचरण होते हैं, प्रजा भी वैसा ही आचरण करने लगती है॥ ९ ॥
‘सत्यका पालन ही राजाओंका दयाप्रधान धर्म है— सनातन आचार है, अतः राज्य सत्यस्वरूप है। सत्यमें ही सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित है॥ १० ॥
‘ऋषियों और देवताओंने सदा सत्यका ही आदर किया है। इस लोकमें सत्यवादी मनुष्य अक्षय परम धाममें जाता है॥ ११ ॥
‘झूठ बोलनेवाले मनुष्यसे सब लोग उसी तरह डरते हैं, जैसे साँपसे। संसारमें सत्य ही धर्मकी पराकाष्ठा है और वही सबका मूल कहा जाता है॥ १२ ॥
‘जगतमें सत्य ही ईश्वर है। सदा सत्यके ही आधारपर धर्मकी स्थिति रहती है। सत्य ही सबकी जड़ है। सत्यसे बढ़कर दूसरा कोई परम पद नहीं है॥ १३ ॥
‘दान, यज्ञ, होम, तपस्या और वेद—इन सबका आधार सत्य ही है; इसलिये सबको सत्यपरायण होना चाहिये॥ १४ ॥
‘एक मनुष्य सम्पूर्ण जगत्का पालन करता है, एक समूचे कुलका पालन करता है, एक नरकमें डूबता है और एक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है॥ १५ ॥
‘मैं सत्यप्रतिज्ञ हूँ और सत्यकी शपथ खाकर पिताके सत्यका पालन स्वीकार कर चुका हूँ, ऐसी दशामें मैं पिताके आदेशका किसलिये पालन नहीं करूँ?॥ १६ ॥
‘पहले सत्यपालनकी प्रतिज्ञा करके अब लोभ, मोह अथवा अज्ञानसे विवेकशून्य होकर मैं पिताके सत्यकी मर्यादा भङ्ग नहीं करूँगा॥ १७ ॥
‘हमने सुना है कि जो अपनी प्रतिज्ञा झूठी करनेके कारण धर्मसे भ्रष्ट हो जाता है, उस चञ्चल चित्तवाले पुरुषके दिये हुए हव्य-कव्यको देवता और पितर नहीं स्वीकार करते हैं॥ १८ ॥
‘मैं इस सत्यरूपी धर्मको समस्त प्राणियोंके लिये हितकर और सब धर्मोंमें श्रेष्ठ समझता हूँ। सत्पुरुषोंने जटा-वल्कल आदिके धारणरूप तापस धर्मका पालन किया है, इसलिये मैं भी उसका अभिनन्दन करता हूँ॥
‘जो धर्मयुक्त प्रतीत हो रहा है, किंतु वास्तवमें अधर्मरूप है, जिसका नीच, क्रूर, लोभी और पापाचारी पुरुषोंने सेवन किया है, ऐसे क्षात्रधर्मका (पिताकी आज्ञा भङ्ग करके राज्य ग्रहण