शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
(पन्द्रहवीं कथा)
- वणिक् : शालिग
- वणिक् पत्नी : जयिका
- वणिक् पुत्र : गुणाकार
- गुणाकर की पत्नी : श्रिया देवी 5 द्वितीया वणिक् : सुबुद्धि
(सोलहवीं कथा)
- वणिक् : जनवल्लभ
- वणिक् पत्नी, : मुग्धिका
- उपपति :
(सत्रवीं कथा)
- ब्राह्मण : यायजूक
- उसकी पत्नी : पाहिनी
- ब्राह्मण पुत्र : गुणाढ्य
- मदना वेश्या
- कुटनी
(अट्ठारहवीं कथा)
- वणिक् (बनिया) : दरिद्र
- चोर :
- राजा :
(उन्नीसवीं कथा)
- राजा : गुणप्रिय
- सेठ : सोढाक
[ 128 ]
- सेठ की पत्नी : सन्त्तिका
- दूसरे बनिया की पत्नी : स्वच्छन्दा 5 मनोरथ नामक यक्ष
(बीसवीं कथा)
- धनी किसान : सूर
- किसान की पत्नी : केलिका
- सिद्धपुर में रहने वाला ब्राह्मण :
- दूती
(इक्कीसवीं कथा)
- राजा : हेमप्रभ
- मन्त्री : श्रुतशील
- सेठ : यशोधर
- सेठ की पत्नी : मोहिनी
- सेठ की पुत्री : मन्दोदरी
- वणिक् : श्रीवत्स
- कुटनी
- राजपुत्र
(बाईसवीं कथा)
- किसान : सोढाक
- किसान की पत्नी : मादुका
- उपपति : सुरपाल
- धूर्त : मूलदेव
[ 129 ]
(तेईसवीं कथा)
- राजा : सुदर्शन
- रानी : शृङ्गार सुन्दरी
- वणिक् : चन्द्र
- पत्नी : प्रभावती
- पुत्र : राम
(चौबीसवीं कथा)
- बढ़ई : सूरपाल (धनिक)
- बढ़ई की पत्नी : सज्जनी
- उपपति : देवक
(पच्चीसवीं कथा)
- बौद्ध संन्यासी : सिद्धसेन
- जैन साधु :
- बौद्ध भिक्षुक :
- वेश्या :
(छब्बीसवीं कथा)
- राजपुत्र : क्षेमराज
- क्षेमराज की पत्नी : रत्ना देवी
- ग्रामाध्यक्ष : देवसाख्य
- देवसाख्य का पुत्र : धवल
- राजपुत्र
(सत्ताईसवीं कथा)
- वणिक् : आर्य
- वणिक् पत्नी : मोहिनी
- धूर्त : कुमुख
[ 130 ]
(अट्ठाईसवीं कथा)
- गृहस्थ : महामूर्ख जरसाख्य
- जरसाख्य की पत्नी : देविका पुंश्चली
- ब्राह्मण : प्रभाकर
(उन्तीसवीं कथा)
- वणिक् : महाधन
- वणिक् पत्नी : सुन्दरी
- उपपति : मोहन
- मन्त्रवेत्ता
(तीसवीं कथा)
- पिशाच : कराल एव उत्ताल
- कराल की पत्नी : धूमप्रभा
- उत्ताल की पत्नी : मेघप्रभा
- धूर्तराज : मूलदेव
(इकत्तीसवीं कथा)
- सिंह : पिङ्गल
- धूर्त खरगोश
- बहुत से पशु
(बत्तीसवीं कथा)
- सेठ : माधव
- सेठ की पत्नी : मोहिनी
- सेठ का पुत्र : सोहड 4 सोहड की पत्नी : राजिनी
- उपपति
- सास
[ 131 ]
(तैंतीसवीं कथा)
- माली : शंकर 2 माली की पत्नी : रम्भिका
- चार उपपति : ग्राममुख्य, वणिक्पुत्र, अकरक्षक, सेनाध्यक्ष
(चौंतीसवीं कथा)
- विप्र : शम्भु
- सुन्दर बालिका
- ग्रामवासी
(पैंतीसवीं कथा)
- बनिया : शम्बक
- बर्तन बेचने वाला बनिया
- बनिया की पत्नी : सत्यंकार
- वणिक्पुत्र
(छत्तीसवीं कथा)
- ग्रामाध्यक्ष : शूरपाल
- ग्रामाध्यक्ष की पत्नी : नायिनी
- ग्रामवासी
(सैंतीसवीं कथा)
- गृहपति : शूर
- हलवाहा : पूर्णपाल
- शूरपति की पुत्री : सुभगा
(अड़तीसवीं कथा)
- विप्र पथिक : प्रियंवद
- बनिया
- बनिया की पत्नी : पुँश्चली
[ 132 ]
(उनतालीसवीं कथा)
- वणिक् : भूधर
- द्वितीय बनिया
- भूधर पुत्र 4 राजा 5 मन्त्री
(चालीसवीं कथा)
- दो मित्र : सुबुद्धि, कुबुद्धि
- सुबुद्धि की पत्नी
(इकतालीसवीं कथा)
- राजा : शत्रुमर्दन
- राजा की पुत्री : मदनरेखा
- ब्राह्मण स्त्री
- मन्त्रवेत्ता ब्राह्मण
- राजपुरुष
(बयालीसवीं कथा)
1 राजपूत : राजसिंह 2. राजपूत की पत्नी : कलहप्रिया 3. राजपूत के दो पुत्र : 4. बाघ
(तैंतालीसवीं कथा)
- भयातुर : व्याघ्र
- धूर्त : शृगाल
- धूर्त स्त्री
[ 133 ]
(चौवालीसवीं कथा)
- इच्छुक : बाघ
- सियार
(पैंतालीसवीं कथा)
- राजा : अरिन्दम
- रतिलोलुप ब्राह्मण : विष्णु
- गणिका : रतिप्रिया
- कुटनी
(छियालीसवीं कथा)
- विद्वान दरिद्र ब्राह्मण
- ब्राह्मण की पत्नी : करगरा
- भूपति : मदन
- भूपति की पुत्री : मृगलोचना
(सैंतालीसवीं कथा)
- करगरा का पति केशव
- राजकन्या
- राजा : शत्रुघ्न
- रानी : सुलोचना
- राजा : मदन
(अड़तालीसवीं कथा)
- चक्रवर्ती राजा : नन्द
- राजा का मुख्य सचिव : शकटाल
- बङ्गाल के राजा
- छली दूत
[ 134 ]
(उनचासवीं कथा)
- बङ्गाल के राजा
- दूत
- राजा नन्द
- मन्त्री शकटाल
- बनिया, पण्डित आदि
(पचासवी कथा)
- दो मित्र : धर्मबुद्धि एव पाप बुद्धि
- मन्त्री
- दुष्टबुद्धि के पिता
- कौतुकाकृष्ट लोग
(इक्यावनवीं कथा)
- ब्राह्मण : बल्लभीनाथ
- लँगडा ब्राह्मण : गाङ्गिल
- चोरों का समुदाय
(बावनवीं कथा)
- राजा : सत्वशील
- राजा का पुत्र : दुर्दमन
- मित्र : ब्राह्मण, बढई, वणिक पुत्र आदि 4 राजा : नीतिसार
- मन्त्री : बुद्धिसार
[ 135 ]
(तिरपनवीं कथा)
- दोहड नामक चमार
- चमार की पत्नी : देविका
- उपपति
(चौवनवीं कथा)
- राजा : धर्मदत्त
- मन्त्री : सुशील
- मन्त्री पुत्र विष्णु
- शत्रुदमन नामक राजा
(पचपनवीं कथा)
- ब्राह्मण : श्रीधर
- चमार : चन्दन
- ग्रामपाल : 4 राजा
(छप्पनवीं कथा)
1 बनिया : सान्तक 2. चोरो का समूह
(सत्तावनवीं कथा)
- राजा : विक्रमार्क
- रानी : चन्द्रलेखा
- राज पण्डित : शुभंकर
- दासी
[ 136 ]
(चौंसठवीं कथा)
1 राजपूत : सोमराज
2. सोमराज की पत्नी : मण्डुका
3. मण्डुका :
4. सखी : देविका
(पैंसठवीं कथा)
- राजा : नन्दन
- साधु : श्रीवत्स
- अन्य साधु :
(छाछठवीं कथा)
- हंसराज : हसधवल
- शिकारी :
- अन्य हस :
(सङसठवीं कथा)
- बौना वानर : वनप्रिय
- घडियाल :
- मगर की प्रिया : शुभंकर
(अड़सठवीं कथा)
- ब्राह्मण : केशव
- बनिये की पुत्री :
- राजा :
- ब्राह्मण मित्र : वितर्क
[ 138 ]
पाँचवां अध्याय : कलापक्ष
(उनहत्तरवीं कथा)
- बनिया : 2 बनिया की पत्नी : वेजिका
- उपपति : शुभकर
(सत्तरवीं कथा)
- मदनविनोद
- प्रभावती
- मदन नामक गन्धर्व
- रत्नावली
- मदनमञ्जरी
- नारद जी
- कनकप्रभ नामक गंधर्व 8 विद्याधर
*****
[ 139 ]
पंचम अध्याय
कलापक्ष
कला-पक्ष
कलात्मक पक्ष की दृष्टि से शुकसप्तति अपने युग की एक सशक्त रचना है। कथा कौशल की दृष्टि से यह ग्रन्थ अपना निजी वैशिष्ट्य रखता है। कवि ने कथाओ को अधिक प्रभावशाली बनाने हेतु प्रत्येक कथा के प्रारम्भ में तत्कथाविषयक पद्य की रचना की है जिसके कारण श्रोता कौतूहल-वश वक्ता से उस कथा को सुनने का आग्रह करता है और इस प्रकार कथा आरम्भ हो जाती है। कथाओं को और अधिक रोचक और गति प्रदान करने के लिए एवं ग्रन्थकार ने अपनी काव्य प्रवृत्ति को सतुष्टि करने के लिए जहाँ गद्य से काम चल सकता था वहाँ पद्य का प्रयोग किया है। पद्यों का प्रयोग कवि के बौद्धिक ज्ञान का परिचायक है किन्तु यह पद्य अत्यन्त सरल एवं सरस है और कथा गति प्रवाह को अविच्छिन्न गति प्रदान करने में गद्य के समान ही सहायक सिद्ध होते है।
(अ) भाषा :
जैसाकि स्पष्ट है शुकसप्तति में गद्य और पद्य दोनों का प्रयोग हुआ है। इसमें प्रयुक्त गद्य सरलतम शैली मे लिखा गया है जिसके अन्तर्गत वाक्य अत्यन्त छोटे-छोटे होते हैं बोलचाल के रूप में भाषा का सामान्य ज्ञान रखने वाला व्यक्ति भी सरलता और सहजतापूर्वक कथाओ को समझने में समर्थ हो जाता है। सूक्त्यामक गद्य एव नीतिपरक पद्य पाठक या श्रोता को हठात् आकर्षित करते हैं। यत्र-तत्र प्रकृति वर्णन आदि को लेकर अनावश्यक विस्तार भी मिलता है। कहीं-कहीं व्याकरण का भी अशुद्ध प्रयोग प्राप्त होता है। जैसे-पति शब्द का पतिना सप्तम्यन्त पतौ ये व्याकरण सम्मत नही है। इसी प्रकार 'अनुत्पाटयित्वा' के स्थान पर अनुत्पाट्य होना चाहिए क्योंकि संस्कृत में नियम है कि यदि धातु के पहले उपसर्ग आ जाय तो 'क्त्वा' प्रत्यय का प्रयोग नहीं होता बल्कि 'ल्यप' प्रत्यय अवश्य आ जायेगा। इसी प्रकार-'हस्तपादौ' के स्थान पर हस्तपादम् एकवचान्त होना चाहिएज। 'सहामि' पद प्राकृत में
उत्तमपुरुषैकवचनान्त होता है और संस्कृत मे वही आत्मनेपद होने के कारण 'सह्' धातु का 'सहे' रूप होना चाहिए। कहीं-कहीं पर भाषा की प्राकृत क्रिया का भी प्रयोग किया गया है जैसे-अढण्ढोलयत् 'ढोलना' शब्द लङ्लकार का रूप है फिर भी समान रूपेण यह ग्रन्थ भाषा की दृष्टि से सरल, रोचक एवं ग्राह्य है।
(ब) शैली :
इसकी शैली रोचक और आकर्षक है। वक्ता तोता स्त्रियों के दुराचार, पर-पुरुष गमन, त्रिया चरित और वैवाहिक सम्बन्ध विच्छेद आदि के अनेक उदाहरण देकर पर-पुरुष गमन के दोषो का विस्तृत वर्णन करता है। इसमें बीच-बीच में संस्कृत और प्राकृत के उपदेशात्मक पद्य भी है। शुकसप्तति में गद्य और पद्य सर्वत्र वैदर्भी शैली में प्रयुक्त है यही कारण है कि भाषा सहज बोधगम्य है। दीर्घकाय समासों का प्रायः अभाव है। छोटे-छोटे समासों का प्रयोग भाषा की श्रीवृद्धि करने में "सोने में सुहागे" का काम करते हैं। वैदर्भी शैली रस और भावाभिव्यक्ति भावों को अभिव्यक्त करने के लिये सर्वाधिक लोकप्रिय शैली मानी जाती है। इसी शैली का प्रयोग कर कालिदास और अश्वघोष आदि अमर हो गये। शुकसप्तति भी वैदर्भी शैली का एक अनुपम ग्रन्थ है।
(स) रस :
रस-सिद्धान्त भारतीय काव्य मनीषियों एवं कालविदों की महत्तम उपलब्धि है। रस शब्द मात्र से ही भारतीय मनीषा तथा कलाकार की हृत्तन्त्री झटरित होकर आनन्दोल्लास की तरंगें से मुखरित हो उठती है।
रस-शब्द का अर्थ :
भारतीय वाङ्गमय में रस शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में हुआ है। ऐतिहासिक कालक्रमेण रस का अर्थ वैदिककाल से प्रारम्भ हुआ। प्रारम्भ में यह शब्द किसी वस्तु के सार के लिए प्रयुक्त हुआ था और क्रमशः इस शब्द से भाव, सुख और आनन्द का
[ 141 ]
बोध होने लगा। इस प्रकार आध्यात्मिक जगत मे जो 'ब्रह्मानन्द' का वाचक था, वही काव्य जगत् में 'ब्रह्मानन्द सहोदर काव्यतत्व' का वाचक हो गया।
रस की परिभाषा :
भिन्न-भिन्न काव्यशास्त्रियो ने रस की परिभाषा भिन्न-भिन्न प्रकार से की है। भरत का प्रसिद्ध रससूत्र “विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः।”¹ रस की परिभाषा के रूप में सर्वत्र उद्धृत किया जाता है। यद्यपि भरत के सूत्र मे रस की परिभाषा नहीं अपितु रस की प्रक्रिया की ओर संकेत मिलता है, किन्तु अधिकांश काव्यशास्त्री, रस की परिभाषा के रूप मे इसी सूत्र को उद्धृत करते हैं। अतएव यह सूत्र रस-सिद्धान्त का मूल बीज बन गया है। अस्तु।
काव्य प्रकाशकार-आचार्य मम्मट ने रस के स्वरूप को इस प्रकार बताया है-‘लोक में रति आदि रूप स्थायी भाव के जो कारण, कार्य और सहकारी होते हैं वे यदि नाटक या काव्य मे प्रयुक्त होते हैं तो क्रमश. विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव कहलाते हैं और उन विभाव (आलम्बन या उद्दीपन) आदि रूप कारण, कार्य तथा सहकारियो के योग से व्यक्त वह (रति आदि रूप) स्थायी भाव रस कहलाता है।’²
इस प्रकार भारतीय वाङ्गमय में 'रस' की परिभाषा द्विविध हो सकती है। जो आचार्य रस को विषयगत् या काव्य सौन्दर्य मानते हैं- उनके अनुसार नाट्यसौन्दर्य या काव्य सौन्दर्य ही रस है। उसकी अनुभूति सामाजिक या पाठक को हर्षादि अनुभूतियों के रूप मे होती है। नाट्याचार्य भरत, अलङ्कारवादी भामह, रीतिवादी वामन एवं दण्डी तथा वक्रोक्तिवादी कुन्तक के अनुसार रस का यही स्वरूप हो सकता है। इन आचार्यों के अनुसार रस आस्वाद्य है।
1 काव्यप्रकाश, चतुर्थउल्लास, पृष्ठ स० 100 –
आचार्यमम्मट
2
कारणान्यथ कार्याणि सहकारीणि यानि च।
रत्यादे. स्थायिनो लोके तानि चेन्नाट्यकाव्ययोः।
विभावा अनुभावास्तत् कथ्यन्ते व्यभिचारिण ।
व्यक्त. स तैर्विभावाद्यैः स्थायी भावो रस स्मृत ।।
काव्यप्रकाश, चतुर्थउल्लास, सूत्र स० 43, पृष्ठ स० 95 – आचार्य मम्मट
[ 142 ]
जो आचार्य रस को विषयिगत मानते है, वे रस को वस्तु में नहीं अपितु व्यक्ति की चेतना मे स्थापित करते हुए नाट्य.सौन्दर्य या काव्य सौन्दर्य जनित आनन्दानुभूति को ही रस की सज्ञा देते है। आनन्दवर्धन, अभिनवगुप्त, मम्मट, विश्वनाथ तथा पंडित राजजगन्नाथ आदि आचार्यों को रस का यही स्वरूप मान्य है इस प्रकार आनन्दवर्धन से लेकर अद्यतन यही परिभाषा रस विश्वजनीन-सी हो गयी है। इनके अनुसार रस स्थायीभाव का आनन्दमय आस्वाद्य रूप है।
रस के अंङ्ग :
रस के प्रमुख तीन अंङ्ग हैं-विभाव, अनुभाव एवं व्यभिचारीभाव इन सबके सामान्य गुण-योग से ही रस-निष्पत्ति सम्भव बताई गयी है।¹
1- विभाव : लोक मे प्रचलित हेतु, कारण अथवा निमित्त शब्दों के लिए रस शास्त्र में पृथक रूप से 'विभाव' शब्द को ग्रहण किया जाता है। शास्त्र में वाचिक, आङ्गिक एव सात्विक अभिनय के सहारे चित्तवृत्तियों का विशेष रूप से विभावन अथवा ज्ञापन कराने वाले हेतु, कारण अथवा निमित्त को विभाव कहते हैं। 'विभावन' का अर्थ केवल ज्ञापन नहीं अपितु उसका अर्थ आस्वाद योग्यता तक पहुँचाना भी है। अतएव हम कह सकते हैं कि विभाव वासना-रूप में अत्यन्त सूक्ष्म रूप से अवस्थित रति आदि स्थायी भावों को आस्वाद योग्य बनाते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं-आलम्बन, उद्दीपन। चित्तवृत्ति-विशेष के विषयभूत विभाव को आलम्बन कहते हैं और उस निमित्त रूप सामग्री को जिससे जागृत भाव अधिकाधिक उद्दीप्त होता है-उद्दीपन विभाव कहते हैं।² आलम्बन के दो भेद होते हैं-विषय तथा आश्रय, इत्यादि भावों के जागृत होने के कारण-स्वरूप विभाव ही विषय कहलाते हैं तथा जिस व्यक्ति में स्थायीभाव जागरित होते हैं, वह उनका आश्रय होने से आश्रय कहलाता है।³
1 नाट्यशास्त्र, पृष्ठ-80
2 रसगङ्गाधर, पृ० 33
3 सा० कौ०, पृ० 29
[ 143 ]
2- अनुभाव : भावजागर्ति के पश्चात होने वाले अङ्ग-विकारों को अनुभाव कहते हैं। इनकी व्युत्पत्ति के अनुसार (अनु पश्चाद् भावः उत्पत्तिः, येषाम् अथवा अनुपश्चाद् भावो यस्य सोऽनुभावः) स्थायीभावों के जागरित होने के पश्चात् उत्पन्न होने के कारण इन्हे कार्यरूप ही मानना चाहिए।¹ आचार्य विश्वनाथ ने रसोद्बोध की दृष्टि से विभाव, अनुभाव तथा व्याभिचारी तीनों को ही कारण माना है।² पण्डितराज जगन्नाथ भी रस की अनुभावना कराने वाले कारणों को अनुभाव कहते हैं।
व्यभिचारीभाव :
व्यभिचारी शब्द मे वि+अभि+चर् धातु का योग दिखाई पडता है । अतएव वाक्, अंङ्ग सत्त्वादि द्वारा विविध प्रकार के रसानुकूल संचरण करने वाले भावों को व्यभिचारी अथवा संचारी भाव कहते है।³ व्याभिचारी भाव स्थायी भाव के परिपोषक तथा उन्हें रसावस्था तक पहुँचाने वाले होते हैं, अस्थिरता उनका विशेषगुण है। स्थायी भाव के साथ इनका सम्बन्ध वारिधि के साथ कल्लोलों का सा है। उनका आविर्भाव-तिरोभाव होता रहता है।⁴ इसलिए उन्हें अचिर, अनवस्थित, जन्म वाला तथा संचारी भी कहते हैं। स्थायित्व के सहायक मात्र कहे जा सकते हैं। 'काव्य प्रकाश' ने स्पष्टतः इन्हें स्थायीभाव का सहकारी कहा है।⁵ इनकी संख्या तैंतीस मानी गयी है।⁶
स्थायीभाव :
स्थायी भाव मानव-मन की सूक्ष्म कृतियो से सम्बन्धित अथवा वासना रूप से प्रमाता के चित्त में सदैव रहने वाले भावों को कहते हैं। कारण के अनुपस्थित रहने पर भी स्थायीभाव की सत्ता रहती है, जबकि शेष भाव कारण के अभाव में निश्शेष हो
1 सा० द०, पृ० 3/132-33
2 सा० द०, पृ० 3/14
3 ना०सा०चौ०,पृष्ठ 84
4 दाशरूपक 4/7
5 काव्य प्रकाश, 4/27-28, सूत्र 43
6 काव्य प्रकाश पेज स०-100, चतुर्थउल्लास
[ 144 ]
जाते है। काव्य में स्थायी भाव ही अनुकूल विभाव-अनुभाव तथा व्यभिचारी भावों के संयोग से रस रूप प्राप्त करने में समर्थ होता है।
स्थायी भाव अपने विरोधी अविरोधी किसी भी भाव से नष्ट नहीं होते।¹ ये स्वयं दूसरे भावो को अपने में अन्तर्हित कर लेते हैं। अन्य भावों को अपने वशवर्ती कर लेते हैं। इनमे चिरकालस्थायित्व, आप्रबन्ध-स्थायित्व अथवा अविच्छिन्न प्रवाहमयता होती है। स्थायीभाव चर्वणीय एवं आनन्ददायी होते है। स्थायी भाव की वासनारुपता के सम्बन्ध में अभिनवगुप्त ने सर्वप्रथम विचार किया, जिसका अनुसरण परवर्ती आचार्यों ने किया । भरत ने इनकी संख्या आठ मानी², कालान्तर में इनकी संख्या नौ दस तक पहुँच गयी। इनके नाम हैं- रति, हास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा, विस्मय, निर्वेद।³
शुकसप्तति में अङ्गीरस :
शुकसप्तति कथाग्रन्थ श्रृंगार रस से परिपूर्ण कथाग्रन्थ है। जिसमें श्रृंगार के दोनो भेद सयोग और विप्रलम्भ का स्वरूप प्राप्त होता है।
साहित्य शास्त्र के आचार्यों ने श्रृंगार को श्रेष्ठ तथा अधिक व्यापक स्वरूप में स्वीकार किया है।⁴ आनन्दवर्धन ने भी उसे मधुर रस माना है। (शृङ्गर एव मधुरः परः प्रह्लादनोरसः ) श्रृङ्गार रस दो प्रकार का होता है- संयोग⁵ तथा विप्रलम्भ⁶ मम्मट ने भी श्रृङ्गार के दो भेद-माने हैं- 1. सम्भोग श्रृंगार 2. विप्रलम्भ श्रृंगार।⁷ किन्तु दोनों ही अवस्थाओ मे इसका स्थायीभाव रति ही है, जो विभावानुभाव तथा व्यभिचारी भाव से
1 दशरूपक 4/34 सा० द० 3/174, रस०ग०पृ० 31
2 अष्टौ नाट्ये रसाः स्मृता। नाट्य द०
3
रतिहासश्च शोकश्च क्रोधोत्साहौ भय तथा।
जुगुप्सा विस्मयश्चेति स्थायिभावा प्रकीर्तिता।
काव्यप्रकाश, पेज सं० 96, सूत्र संख्या 45
4 ना०शा०, 6/45, पृ० 300
5 सा०द०, 3/290, पृ० 148
6 सा०द०, 3/187, पृ० 233
7 काव्य प्रकाश पेज स०-121, चतुर्थउल्लास
[ 145 ]
पुष्ट होकर शृङ्गार रस-रूप में प्रतिफलित होता है। नायक-नायिका परस्पर इसके आश्रय एवं आलम्बन होते हैं। उनके परस्पर दर्शन, कटाक्ष, प्रस्वेद, रोमांच, आश्रु, भूविक्षोपादि आङ्गिक व्यापार अनुभाव कहे जाते हैं । इसमे तैंतीस व्यभिचारी भाव होते हैं।
आरम्भ में ही शुकसप्तति मे विप्रलम्भ शृङ्गार का वर्णन कवि ने किया है। 'काव्यानुशासन' के अनुसार विप्रल्लभ शृङ्गार की निरूक्ति इस प्रकार है- 'सम्भोगसुखास्वादलोभेन विशेषेण प्रलभ्यते आत्माऽत्रेोति विप्रलम्भः।' तात्पर्य यह है कि नायक-नायिका के परस्परनुराग मे मिलन नैराश्य ही विप्रलम्भ है। इसीलिए नाट्यदर्पणकार कहते है- 'परस्परानुरक्तयोरपि विलासिनोः पारतन्त्र्योदर घटनं चित्तविश्लेषणे वा विप्रलम्भः' । आचार्य विश्वनाथ विप्रलम्भ के स्वरूप का विवेचन करते हुए कहते है- इसमें नायक-नायिका का परस्परानुराग हुआ करता है, किन्तु परस्पर मिलन नहीं होने पाता।¹
वियोग मे रति का भाव लगा रहता है और यही रति भाव विप्रलम्भ शृंग्गार को करूण से भिन्न बनाता है। पुनर्मिलन की आशा वियोग में संयोग का सुख-स्वप्न दिखाती है। संयोग मे जो आनन्द प्रियजन के मिलन से होता है, वह वियोग मे प्रियजन के चिन्तन तथा गुणकथनादि के माध्यम से होता है। इसमें प्रतिक्षण नायक का स्मरण होता रहता है। इस स्मरण जन्य संयोग में जो सुख है, वह उसे प्रत्यय-सयोग से भी अधिक श्रेष्ठता देता है। इसमें गुरूजनों की लज्जा का न भय है, न वियोग की उत्साह-शून्य करने वाली शंङ्का। इसीलिए लोग वियोग को सुखद माना करते है।² यदि वियोग में यह सुख न होता तो दुःख सहकर भी प्राणी वियोग में मग्न क्यो रहते है?
विप्रलम्भ श्रृंगार के चार भेद हैं- पूर्वराग, मान, प्रवास, करूण।³
1 सा०द०, 3/187
2 कबीर
3 सा०द०, 3/187, पृ० 232
[ 146 ]
आचार्य मम्मट ने विप्रलम्भशृङ्गार को अभिलाष, ईर्ष्या, विरह, प्रवास, तथा, शाप, पाँच, प्रकार का माना है।$^1$ जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है कि मुख्य कथा शुकसप्तति के अन्तर्गत प्रवास विप्रलम्भ का दिग्दर्शन हुआ है। मदनविनोद और प्रभावती की इस कथा मे आश्रय प्रभावती ओर आलम्बन मदनविनोद है, पत्नी को विदेश छोडकर जाना उद्दीपन विभाव है, प्रभावती का उदास रहना, चिन्ता करना, कुमार्ग पर जाने के लिए उद्यत होना आदि अनुभाव हैं, चिन्ता, दैन्य, चपलता मोह आदि व्यभिचारी भाव हैं।
शुकसप्तति के अधिकांश कथाओं में मुख्य रूप से संयोग शृङ्गार का वर्णन कवि ने किया है। पति के कार्यवश विदेश चले जाने पर अथवा कार्यवश घर से बाहर जाने पर उनकी पत्नियों काम सन्तप्ता होकर व्यभिचार मार्ग का अवलम्ब लेती हैं। इसीलिये अधिकांश कथायें शृङ्गारिक अनुभावों से भरी पडी हैं। इन कथाओं में कही-कहीं आश्रय, नायिका हैं और आलम्बन उपपति है तो कहीं पर पुरूष आश्रय और परकीया नायिका आलम्बन है। जैसे-
द्वितीय कथा: में वीर नामक यशोदेवी का पुत्र आश्रय है और आलम्बन शशिप्रभा है। आश्रय वीर द्वारा भोजन आदि न करना अपनी हृदय पीड़ा को माता से निवेदन करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्याभिचारीभाव है।
तृतीय कथा : में कुटिल नामक धूर्त विमल का रूप धारण करने वाला आश्रय है और आलम्बन विमल की दोनों पत्नियाँ हैं जिसे देखकर कुटिल धूर्त के हृदय में कामभावना जागृत होती है। धूर्त विमल का दोनों पत्नियों के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव है।
चतुर्थ कथा : में शूर विष्णु नामक ब्राह्मण आश्रय है और गोविन्द नामक मूर्ख की पत्नी विषकन्या आलम्बन है, जिसे देखकर विष्णु के हृदय में काम भावना जागृत
1 अभिलाषविरहेर्ष्याप्रवासशापहेतुक इति पञ्चविधः।
काव्यप्रकाश, चतुर्थ उल्लास, पृ० 123 ।
[ 147 ]