भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६३ ൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘ सर्वाननेति । सर्वाण्या- | 'सर्वानन' इत्यादि । समस्त मुख, ननानि शिरांसि ग्रीवाश्चास्येति | शिर और ग्रीवाएँ इसीकी हैं, सर्वाननशिरोग्रीवः । सर्वेषां भूता- | इसलिये यह सर्वाननशिरोग्रीव है । नां गुहायां बुद्धौ शेत इति सर्व- | यह समस्त प्राणियोंकी गुहा—बुद्धि- भूतगुहाशयः । सर्वव्यापी स | में शयन करता है इसलिये सर्वभूत- भगवानैश्वर्यादिसमष्टिः । उक्तं | गुहाशय है। वह सर्वव्यापी और च— | भगवान्—ऐश्वर्यादिकी समष्टिरूप "ऐश्वर्यस्य समग्रस्य | है। कहा भी है—"समग्र ऐश्वर्य, धर्मस्य यशसः श्रियः । | धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य— ज्ञानवैराग्ययोश्चैव | इन छः का नाम भग है।" भगवान्में षण्णां भग इतीरणा ॥" | ये सब ऐसे ही हैं इसलिये वह सर्वगत (वि० पु० ६ । ५ । ७४) | भगवति यस्मादेवं तस्मात् | और शिव (मङ्गलरूप) है ॥११॥ सर्वगतः शिवः ॥ ११ ॥ | ═══════════ किञ्च— | तथा— महान्प्रभुर्वै पुरुषः सत्त्वस्यैष प्रवर्तकः । सुनिर्मलामिमां प्राप्तिमीशानो ज्योतिरव्ययः ॥१२॥ यह महान्, परमसमर्थ, शरीररूप पुरमें शयन करनेवाला, इस [ स्वरूपास्थितिरूप ] निर्मल प्राप्तिके उद्देश्यसे अन्तःकरणको प्रेरित करने- वाला, सबका शासक, प्रकाशस्वरूप और अविनाशी है ॥ १२ ॥ महानिति । महान्प्रभुः समर्थो | 'महान्' इत्यादि । वह महान्, वै निश्चयेन जगदुदयस्थितिसंहारे | प्रभु अर्थात् जगत्के उत्पत्ति, स्थिति • | और संहारमें निश्चय ही समर्थ और सत्त्वस्यान्तःकरणस्यैष प्रवर्तकः | सत्त्व यानी अन्तःकरणका प्रेरक है । प्रेरयिता । किमर्थमुद्दिश्य ? सुनिर्म- | किस प्रयोजनके उद्देश्यसे उसका