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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६३ ൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘ सर्वाननेति । सर्वाण्या- | 'सर्वानन' इत्यादि । समस्त मुख, ननानि शिरांसि ग्रीवाश्चास्येति | शिर और ग्रीवाएँ इसीकी हैं, सर्वाननशिरोग्रीवः । सर्वेषां भूता- | इसलिये यह सर्वाननशिरोग्रीव है । नां गुहायां बुद्धौ शेत इति सर्व- | यह समस्त प्राणियोंकी गुहा—बुद्धि- भूतगुहाशयः । सर्वव्यापी स | में शयन करता है इसलिये सर्वभूत- भगवानैश्वर्यादिसमष्टिः । उक्तं | गुहाशय है। वह सर्वव्यापी और च— | भगवान्—ऐश्वर्यादिकी समष्टिरूप "ऐश्वर्यस्य समग्रस्य | है। कहा भी है—"समग्र ऐश्वर्य, धर्मस्य यशसः श्रियः । | धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य— ज्ञानवैराग्ययोश्चैव | इन छः का नाम भग है।" भगवान्में षण्णां भग इतीरणा ॥" | ये सब ऐसे ही हैं इसलिये वह सर्वगत (वि० पु० ६ । ५ । ७४) | भगवति यस्मादेवं तस्मात् | और शिव (मङ्गलरूप) है ॥११॥ सर्वगतः शिवः ॥ ११ ॥ | ═══════════ किञ्च— | तथा— महान्प्रभुर्वै पुरुषः सत्त्वस्यैष प्रवर्तकः । सुनिर्मलामिमां प्राप्तिमीशानो ज्योतिरव्ययः ॥१२॥ यह महान्, परमसमर्थ, शरीररूप पुरमें शयन करनेवाला, इस [ स्वरूपास्थितिरूप ] निर्मल प्राप्तिके उद्देश्यसे अन्तःकरणको प्रेरित करने- वाला, सबका शासक, प्रकाशस्वरूप और अविनाशी है ॥ १२ ॥ महानिति । महान्प्रभुः समर्थो | 'महान्' इत्यादि । वह महान्, वै निश्चयेन जगदुदयस्थितिसंहारे | प्रभु अर्थात् जगत्के उत्पत्ति, स्थिति • | और संहारमें निश्चय ही समर्थ और सत्त्वस्यान्तःकरणस्यैष प्रवर्तकः | सत्त्व यानी अन्तःकरणका प्रेरक है । प्रेरयिता । किमर्थमुद्दिश्य ? सुनिर्म- | किस प्रयोजनके उद्देश्यसे उसका

१६३ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३

१६३ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ लामिमां स्वरूपावस्थालक्षणां प्राप्तिं | प्रवर्त्तक है ?—इस स्वरूपावस्थिति- परमपदप्राप्तिम् । ईशान ईशिता । | रूप सुनिर्मल प्राप्ति यानी परमपदकी ज्योतिः परिशुद्धो विज्ञानप्रकाशः । | प्राप्तिके उद्देश्यसे । तथा वह ईशान अव्ययोऽविनाशी ॥ १२ ॥ | —शासक, ज्योतिः—विशुद्धविज्ञान- | प्रकाशस्वरूप और अव्यय— | अविनाशी है ॥१२॥ अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः । हृदा मन्वीशो मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥१३॥ यह अङ्गुष्ठमात्र, पुरुष, अन्तरात्मा, सर्वदा जीवोंके हृदयमें स्थित, ज्ञानाधिपति एवं हृदयस्थित मनके द्वारा सुरक्षित है । जो इसे जानते हैं वे अमर हो जाते हैं ॥ १३ ॥ अङ्गुष्ठमात्र इति । अङ्गुष्ठमा- | 'अङ्गुष्ठमात्रः' इत्यादि । अपनी त्रोऽभिव्यक्तिस्थानहृदयसुषिरपरि- | अभिव्यक्तिके स्थान हृदयाकाशके माणापेक्षया पुरुषः पूर्णत्वात्पुरि | परिमाणकी अपेक्षासे यह अङ्गुष्ठमात्र शयनाद्वा । अन्तरात्मा सर्वस्या- | है, पूर्ण अथवा शरीररूप पुरमें न्तरात्मभूतः स्थितः । सदा | शयन करनेके कारण पुरुष है, जनानां हृदये संनिविष्टो हृदय- | अन्तरात्मा अर्थात् सबके अन्तरात्म- स्थेन मनसाभिगुप्तः । मन्वीशो | स्वरूपसे स्थित है । सर्वदा जीवोंके ज्ञानेशः । य एतद्विदुरमृतास्ते | हृदयमें स्थित है, हृदयस्थित मनके भवन्ति ॥ १३ ॥ | द्वारा सुरक्षित है और मन्वीश— | ज्ञानाध्यक्ष है । जो इसे जानते हैं वे | अमर हो जाते हैं ॥ १३ ॥

अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६५

अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६५ परमेश्वरके सर्वात्मभाव या विराट्-स्वरूपका वर्णन पुरुषोऽन्तरात्मेत्युक्तं पुनरपि | वह परमेश्वर पुरुष एवं अन्तरात्मा है—यह कहा गया, अब सबकी सर्वात्मानं दर्शयति—सर्वस्य | तद्रूपता प्रदर्शित करनेके लिये श्रुति तावन्मात्रत्वप्रदर्शनार्थम् । उक्तं | फिर भी उसका सर्वात्मभाव दिखलाती है । कहा भी है—"अध्यारोप और च--"अध्यारोपापवादाभ्यां नि- | अपवादके द्वारा निष्प्रपञ्चको प्रपञ्चित ष्प्रपञ्चं प्रपञ्च्यते" इति । | किया जाता है" इत्यादि । सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥१४॥ वह सहस्र शिर, सहस्र नेत्र और सहस्र चरणोंवाला है तथा पूर्ण है । वह भूमिको सब ओरसे व्याप्त कर अनन्तरूपसे उसका अतिक्रमण करके स्थित है । [ अथवा ऐसा अर्थ करना चाहिये कि नाभिसे ऊपर दश अङ्गुल परिमाणवाले हृदयमें स्थित है ] ॥ १४ ॥ सहस्राण्यनन्तानि शीर्षाण्य- | इसके सहस्र अर्थात् अनन्त शिर हैं इसलिये यह सहस्रशिरवाला है । स्येति सहस्रशीर्षा । पुरुषः पूर्णः । | पुरुष अर्थात् पूर्ण है । इसी प्रकार एवमुत्तरत्र योजनीयम् । स भूमिं | आगेके विशेषणोंका भी अर्थ कर लेना १. अध्यारोप और अपवाद ये वेदान्तके पारिभाषिक शब्द हैं । किसी सत्य वस्तुमें असत्य पदार्थका भ्रम होना अध्यारोप है, जैसे रज्जुमें सर्पकी भ्रान्ति; तथा उस असत्य पदार्थके बाधपूर्वक परमार्थ-सत्यको प्रदर्शित कराना अपवाद है, जैसे कल्पित सर्पके निराकरणद्वारा उसकी अधिष्ठानभूता रज्जुका भान । इसी प्रकार निष्प्रपञ्च ब्रह्ममें मायाका आरोप करके प्रपञ्चप्रतीतिका व्यवस्था की जाती है और प्रपञ्चके अपवादद्वारा शुद्ध ब्रह्मका साक्षात्कार कराया जाता है । परन्तु वस्तुतः ये दोनों प्रपञ्चके ही अन्तर्गत हैं, अखण्ड चिन्मात्र शुद्ध ब्रह्ममें तो किसी भी प्रकारके अध्यारोप या अपवादका अवकाश ही नहीं है । इस प्रकार अध्यारोप और अपवाद- के द्वारा उस निर्विशेषका सविशेषरूपसे वर्णन किया जाता है ।

१६६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ भुवनं सर्वतोऽन्तर्बहिश्च वृत्वा | चाहिये । * वह भूमि अर्थात् संसार- | को सर्वतः—बाहर और भीतरसे व्याप्यात्यतिष्ठदतीत्य भुवनं सम- | व्याप्त करके संसारका भी अतिक्रमण | करके स्थित है। दशाङ्गुल अर्थात् धितिष्ठति। दशाङ्गुलमनन्तमपार- | अनन्त--अपार रूपसे । अथवा मित्यर्थः। अथवा नाभेरुपार दशा- | नाभिसे ऊपर जो दश अङ्गुल | परिमाणवाला हृदय है उसमें स्थित ङ्गुलं हृदयं तत्राधितिष्ठति ॥१४॥ | है॥ १४ ॥ ननु सर्वात्मत्वे सप्रपञ्चं ब्रह्म | किन्तु सर्वात्मक होनेपर तो ब्रह्म | सप्रपञ्च ( सविशेष ) सिद्ध होगा, स्यात्तद्व्यतिरेकेणाभावादित्याह-- | क्योंकि उससे अतिरिक्त प्रपञ्चकी सत्ता | ही नहीं है, इसपर श्रुति कहती है— पुरुष एवेदग्ँ सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥१५॥ जो कुछ भूत और भविष्यत् है एवं जो अन्नके द्वारा वृद्धिको प्राप्त होता है वह सब पुरुष ही है; तथा वही अमृतत्व ( मुक्ति ) का भी प्रभु है ॥ १५ ॥ पुरुष एवेदमिति । पुरुष एवेदं | 'पुरुष एवेदम्' इत्यादि । यह | जो अन्नसे बढ़ता है तथा यह जो सर्वं यदन्नेनातिरोहति यदिदं | वर्तमान दिखायी देता है तथा जो दृश्यते वर्तमानं यद्भूतं यच्च भव्यं | कुछ भूत और भविष्यत् है वह सब | पुरुष ही है। इसके सिवा, वह भविष्यत् । किञ्च—उतामृतत्व- | अमृतत्वका ईशान है अर्थात् अमरण-

  • अर्थात् सहस्र यानी अनन्त अक्षि ( नेत्र ) और पाद ( चरण ) होनेके कारण वह सहस्राक्ष और सहस्रपाद है।

अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६७

स्येशानोऽमरणधर्मत्वस्य कैवल्य- | धर्मत्व यानी कैवल्यपदका भी प्रभु | है । तथा जो अन्नसे बढ़ता है, जो स्येशानः । यच्चान्नेनातिरोहति | विद्यमान है उसका यह स्वामी यद्वर्तते तस्येशानः ॥ १५ ॥ | है ॥ १५ ॥

पुनरपि निर्विशेषं प्रतिपाद- | फिर भी उसको निर्विशेष प्रति- यितुं दर्शयति— | पादन करनेके लिये श्रुति दिखलाती | है— सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १६ ॥ उसके सब ओर हाथ-पाँव हैं, सब ओर आँख, शिर और मुख हैं तथा वह सर्वत्र कर्णोंवाला है एवं लोकमें सबको व्याप्त करके स्थित है ॥ १६ ॥ सर्वत इति । सर्वतः | 'सर्वतः' इत्यादि । उसके सब पाणयः पादाश्चेति सर्वतः- | ओर हाथ-पाँव हैं इसलिये वह सर्वतः- पाणिपादं तत् । सर्वतोऽक्षीणि | पाणिपाद है, तथा सब ओर आँख, शिरांसि मुखानि च यस्य तत्सर्व- | शिर और मुख हैं इसलिये सर्वतो- तोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिः | ऽक्षिशिरोमुख है । उसके सब ओर श्रवणमस्येति श्रुतिमत् । लोके | श्रुति-कर्ण हैं इसलिये वह सर्वतः प्राणिनिकाये सर्वमावृत्य संव्या- | श्रुतिमान् है । तथा यह लोकमें | अर्थात् प्राणिसमूहमें सबको आवृत प्य तिष्ठति ॥ १६ ॥ | —व्याप्त करके स्थित है ॥ १६ ॥

आत्माके देहावस्थान और इन्द्रिय-सम्बन्धराहित्यका निरूपण उपाधिभूतपाणिपादादीन्द्रि- | उपाधिभूत पाणिपादादिके अध्या- याध्यारोपणाज्ज्ञेयस्य तद्वत्ताशङ्का | रोपसे ऐसी आशङ्का न हो जाय कि | ज्ञेय ( ब्रह्म ) उनसे युक्त है इसी मा भूदित्येवमर्थमुत्तरतो मन्त्रः— | प्रयोजनसे आगेका मन्त्र है—

१६८ श्ववेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३

१६८ श्ववेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहत् ॥१७॥ वह समस्त इन्द्रियवृत्तियोंके रूपमें अवभासित होता हुआ भी समस्त इन्द्रियोंसे रहित है, तथा सबका प्रभु, शासक और सबका आश्रय एवं कारण है ॥ १७ ॥ सर्वेन्द्रियेति । सर्वाणि च तानी- | 'सर्वेन्द्रिय०' इत्यादि । श्रोत्रादि न्द्रियाणि श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्य- | इन्द्रियोंसे लेकर अन्तःकरणपर्यन्त न्तःकरणपर्यन्तानि सर्वेन्द्रियग्रह- | जो समस्त इन्द्रियाँ हैं वे सर्वेन्द्रिय-पदके ग्रहणसे गृहीत होती हैं । णेन गृह्यन्ते । अन्तःकरणबहि- | अन्तःकरण और बाह्य करण जिसकी ष्करणोपाधिभूतः सर्वेन्द्रियगुणै- | उपाधि हैं वह परमात्मा उन समस्त रध्यवसायसंकल्पश्रवणादिभिर्गुण- | इन्द्रियोंके अध्यवसाय, संकल्प एवं वदाभासत इति सर्वेन्द्रियगुणा- | श्रवणादि गुणोंसे गुणवान्-सा भासता है । इसलिये वह सर्वेन्द्रियगुणाभास भासम् । सर्वेन्द्रियैर्व्यापृतमिव | है । तात्पर्य यह है कि उसे समस्त तज्ज्ञेयमित्यर्थः । "ध्यायतीव | इन्द्रियसे व्यापारयुक्त-सा जानना लेलायतीव" (बृ० उ० ४।३।७) | चाहिये; जैसा कि "ध्यान करता हुआ-सा, चेष्टा करता हुआ-सा" इति श्रुतेः । कस्मात्पुनः कारणा- | इत्यादि श्रुतिसे ज्ञात होता है । तद्व्यापृतमिवेति गृह्यते ? इत्याह- | किन्तु वह किस कारणसे व्यापारयुक्त-सा ग्रहण किया जाता है [ वास्तवमें 'सर्वेन्द्रियविवर्जितम्' सर्वकरण- | व्यापार करता है-ऐसा क्यों नहीं माना जाता ? ] इसपर श्रुति कहती रहितमित्यर्थः । अतो न च | है--'सर्वेन्द्रियविवर्जितम्' अर्थात् वह समस्त इन्द्रियोंसे रहित है । करणव्यापारैर्व्यापृतं तज्ज्ञेयम् । | अतः उसे इन्द्रियोंके व्यापारोंसे व्यापारवान् नहीं जानना चाहिये ।

अध्याय शाङ्करभाष्यार्थ १६९

अध्याय शाङ्करभाष्यार्थ १६९ सर्वस्य जगतः प्रभुमीशानम् । | वह समस्त जगत्का प्रभु और सर्वस्य शरणं परायणं बृहत्कारणं | शासक है तथा सबका शरण— च ॥१७॥ | आश्रय और बृहत्—कारण है ॥१७॥ किञ्च— | तथा— नवद्वारे पुरे देही हँसो लेलायते बहिः । वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च ॥१८॥ सम्पूर्ण स्थावर-जंगम जगत्का स्वामी यह हंस ( परमात्मा ) देहा- भिमानी होकर नव द्वारवाले [ देहरूप ] पुरमें बाह्य विषयोंको ग्रहण करनेके लिये चेष्टा किया करता है ॥ १८ ॥ नवद्वार इति । नवद्वारे शिरसि | 'नवद्वारे' इत्यादि । [ दो | आँख, दो नाक, दो कान और सप्तद्वाराणि द्वे अवाची पुरे देही | एक मुख—इन ] सात शिरके और | [ गुदा एवं लिङ्ग ] दो निम्न- विज्ञानात्मा भूत्वा कार्यकारणो- | भागके इस प्रकार नौ द्वारोंवाले | शरीरमें देही—विज्ञानात्मा यानी भूत पाधिः सन्हंसः परमात्मा हन्त्य- | और इन्द्रियरूप उपाधिवाला होकर | यह हंस—परमात्मा बाह्य विषयोंको विद्यात्मकं कार्यमिति, लेलायते | ग्रहण करनेके लिये चेष्टा करता— | चलता है। यह अविद्याजनित कार्यका चलति बहिर्विषयग्रहणाय । वशी | हनन करता है इसलिये हंस है। तथा | यह स्थावर-जंगम समस्त लोकका सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य | वशी ( स्वामी ) है ॥ १८ ॥ च ॥१८॥ |

१७० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३

१७० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ ब्रह्मका निर्विशेष रूप एवं तावत्सर्वात्मकं ब्रह्म प्रति- इसप्रकार यहाँतक ब्रह्मका सर्वात्म- पादितम् । इदानीं निर्विकारा- भावसे प्रतिपादन किया गया; अब नन्दस्वरूपेणानुदितानस्तमितज्ञा- अपने निर्विकार चिदानन्दस्वरूपसे तथा कभी उदित एवं अस्त न होनेवाले नात्मनावस्थितं परमात्मानं दर्श- ज्ञानस्वरूपसे स्थित परमात्माको यितुमाह— प्रदर्शित करनेके लिये श्रुति कहती है— अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः । स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम् ॥१९॥ वह हाथ-पाँवसे रहित होकर भी वेगवान् और ग्रहण करनेवाला है, नेत्रहीन होकर भी देखता है और कर्णरहित होकर भी सुनता है। वह सम्पूर्ण वेद्यवर्गको जानता है, किन्तु उसे जाननेवाला कोई नहीं है। उसे [ ऋषियोंने ] सबका आदि, पूर्ण एवं महान् कहा है ॥१९॥ अपाणिपाद इति । नास्य 'अपाणिपादः' इत्यादि । इसके पाणि और पाद नहीं हैं, इसलिये पाणिपादावित्यपाणिपादः । यह अपाणिपाद है । [ पैर जवनो दूरगामी । ग्रहीता पाण्य- न होनेपर भी ] जवन—दूरगामी है और ग्रहीता—हाथ न होने- भावेऽपि सर्वग्राही । पश्यति सर्व- पर भी सबको ग्रहण करनेवाला मचक्षुरपि सन् । शृणोत्यकर्णो- है। यह नेत्रहीन होनेपर भी सबको देखता है, कर्णहीन होनेपर भी ऽपि । स वेत्ति वेद्यं सर्वज्ञत्वाद- सुनता है और अमनस्क होनेपर भी मनस्कोऽपि । न च तस्यास्ति सर्वज्ञ होनेके कारण वेद्यवर्गको जानता है। किन्तु कोई उसे जाननेवाला वेत्ता “नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा” नहीं है, जैसा कि “इससे भिन्न

अध्याय ३ शाङ्करभाष्यार्थ १७१

अध्याय ३ शाङ्करभाष्यार्थ १७१

(बृ० उ० ३।७।२३) इति श्रुतेः। कोई द्रष्टा नहीं है" इस श्रुतिसे सिद्ध तमाहुरग्र्यं प्रथमं सर्वकारणत्वा- होता है। उसे [ऋषियोंने] सबका कारण होनेसे अग्र्य-प्रथम और पुरुष त्पुरुषं पूर्णं महान्तम् ॥१९॥ -पूर्ण एवं महान् कहा है ॥१९॥

आत्मज्ञानसे शोकनिवृत्तिका निरूपण
किञ्च— तथा—
अणोरणीयान्महतो महीया-
नात्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्तोः ।
तमक्रतुं पश्यति वीतशोको
धातुः प्रसादान्महिमानमीशम् ॥२०॥
`यह अणुसे भी अणु और महान्से भी महान् आत्मा इस जीवके
अन्तःकरणमें स्थित है। उस विषयभोगसंकल्पशून्य महिमामय आत्माको
जो विधाताकी कृपासे ईश्वररूपसे देखता है वह शोकरहित हो
जाता है ॥२०॥`
अणोरणीयानिति । अणोः | 'अणोरणीयान्' इत्यादि । अणु
सूक्ष्मादप्यणीयानणुतरः । महतो | अर्थात् सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर, महत्-
महत्त्वपरिमाणान्महीयान्महत्तरः । | [आकाशादि] महत्त्वयुक्त परिमाणों-
से भी महत्तर—ऐसा जो आत्मा है
स चात्मास्य जन्तोर्ब्रह्मादि- | वह इस जीवके अर्थात् ब्रह्मासे
स्तम्बपर्यन्तस्य प्राणिजातस्य | लेकर स्तम्बपर्यन्त सभी प्राणियोंके
गुहायां हृदये निहित आत्मभूतः | गुहा—हृदयमें निहित है; अर्थात्
उनका स्वरूपभूत होकर स्थित
-स्थित इत्यर्थः । तमात्मानमक्रतुं | है। जो पुरुष अक्रतु—विषय-
विषयभोगसङ्कल्परहितमात्मनो | भोगके संकल्पसे रहित, अपने ही

१७२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३

१७२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३

महिमानं कर्मनिमित्तवृद्धिक्षय- | महिमान्वित स्वरूप और कर्मके कारण रहितमीशं पश्यत्ययमहमस्मीति | होनेवाले वृद्धि एवं क्षयसे रहित ईश्वर- | रूप उस आत्माको देखता है; अर्थात् साक्षाज्जानाति यः स वीतशोको | 'यही मैं हूँ' इस प्रकार साक्षात् जानता | है, वह शोकरहित हो जाता है । किन्तु भवति । केन तर्ह्यसौ पश्यति ? | यह देखता किसकी सहायतासे है ? धातुरीश्वरस्य प्रसादात् । प्रसन्ने | [ इसपर कहते हैं— ] विधाता यानी | ईश्वरकी कृपासे, क्योंकि ईश्वरके प्रसन्न हि परमेश्वरे तद्याथात्म्यज्ञान- | होनेपर ही उसके वास्तविक स्वरूप- मुत्पद्यते । अथवेन्द्रियाणि धातवः | का ज्ञान होता है । अथवा शरीरको | धारण करनेके कारण इन्द्रियाँ ही धातु शरीरस्य धारणात्तेषां प्रसादा- | हैं, उनके प्रसाद यानी विषयोंमें दोष- द्विषयदोषदर्शनमलाद्यपनयनात् । | दर्शनके द्वारा मलादिकी निवृत्ति | होनेपर उसे देखता है, अन्यथा अन्यथा दुर्विज्ञेय आत्मा कामिभिः | सकाम प्राकृत पुरुषोंके लिये तो प्राकृतपुरुषैः ॥ २० ॥ | आत्मा दुर्विज्ञेय ही है ॥२०॥

आत्मस्वरूपके विषयमें ब्रह्मवेत्ताका अनुभव उक्तमर्थं द्रढयितुं मन्त्रदृगनु- | उपर्युक्त अर्थको पुष्ट करनेके लिये भवं दर्शयति— | श्रुति मन्त्रद्रष्टाका अनुभव दिखाती है— वेदाहमेतमजरं पुराणं सर्वात्मानं सर्वगतं विभुत्वात् । जन्मनिरोधं प्रवदन्ति यस्य ब्रह्मवादिनो हि प्रवदन्ति नित्यम् ॥२१॥

१. अथवासे लेकर जो व्याख्या है वह मूलमें 'धातुप्रसादात्' पाठ मानकर की गयी है।

अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७३

ब्रह्मवेत्तालोग जिसके जन्मका अभाव बतलाते हैं, और जिसे नित्य कहते हैं उस जराशून्य पुरातन सर्वात्माको, जो विभु होनेके कारण सर्वगत है, मैं जानता हूँ ॥ २१ ॥ वेदाहमेतमिति । वेद जाने- 'वेदाहमेतम्' इत्यादि । इस ऽहमेतमजरं विपरिणामधर्मवर्जितं अजर अर्थात् विपरिणामधर्मशून्य और पुराणं पुरातनं सर्वात्मानं सर्वेषा- पुराण—पुरातन सर्वात्माको सबके मात्मभूतं सर्वगतं विभुत्वादाकाश- स्वरूपभूतको, जो विभु—आकाशके वद्व्यापकत्वात् । यस्य च जन्म- समान व्यापक होनेके कारण सर्वगत निरोधमुत्पत्त्यभावं प्रवदन्ति ब्रह्म- है तथा ब्रह्मवेत्तालोग जिसके जन्म- वादिनो हि नित्यम् । स्पष्टोऽर्थः का अभाव नित्य बतलाते हैं, मैं ॥ २१ ॥ जानता हूँ। शेष अर्थ स्पष्ट है ॥२१॥*

इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यपरमहंसपरिव्राजकाचार्य- श्रीमच्छङ्करभगवत्प्रणीते श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्ये तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

  • श्रीशङ्करानन्दजीने इस मन्त्रके उत्तरार्धकी व्याख्या इस प्रकार की है—"जन्म च निरोधश्च जन्मनिरोधमुत्पत्तिनाशावित्यर्थः प्रवदन्ति प्रकर्षेण कथयन्ति मूढा इति शेषः, यस्य आत्मनः······ब्रह्मवादिनः उत्पन्नतत्त्वसाक्षात्कारा हि प्रसिद्धाः प्रवदन्ति प्रकर्षेण कथयन्ति नित्यम्।" अर्थात् "जन्म और निरोधका नाम जन्मनिरोध है यानी उत्पत्ति और नाश-इन्हें मूढलोग जिस आत्माके बतलाते हैं और जिसे ब्रह्मवादीलोग —जिन्हें तत्त्वसाक्षात्कार हो गया है नित्य प्रतिपादन करते हैं।" भाष्यकी अपेक्षा यह अर्थ अधिक उपयुक्त जान पड़ता है, क्योंकि भाष्यके अनुसार अर्थ करनेसे यहाँ 'प्रवदन्ति' क्रियाका दूसरी बार प्रयोग होनेका कोई प्रयोजन नहीं जान पड़ता।

चतुर्थ अध्याय

चतुर्थ अध्याय परमेश्वरसे सद्बुद्धिके लिये प्रार्थना गहनत्वादस्यार्थस्य भूयो भूयो | [ प्रस्तुत ] विषय गम्भीर होनेके | कारण इसका पुनः-पुनः निरूपण। वक्तव्य इति चतुर्थोऽध्याय | करना आवश्यक है, इसलिये अब | चतुर्थ अध्याय आरम्भ किया आरभ्यते— | जाता है— य एकोऽवर्णो बहुधा शक्तियोगा- द्धर्णाननेकान्निहितार्थो दधाति । वि चैति चान्ते विश्वमादौ स देवः स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥ १ ॥ सृष्टिके आरम्भमें जो एक और निर्विशेष होकर भी अपनी शक्तिके द्वारा बिना किसी प्रयोजनके ही नाना प्रकारके अनेकों वर्ण (विशेष रूप) धारण करता है तथा अन्तमें भी जिसमें विश्व लीन हो जाता है वह प्रकाश- स्वरूप परमात्मा हमें शुभ बुद्धिसे संयुक्त करे ॥ १ ॥ य एक इति । य एकोऽद्वि- | ‘य एको’ इत्यादि । जो तीयः परमात्मावर्णो जात्यादि- | परमात्मा सृष्टिके आरम्भमें एक— रहितो निर्विशेष इत्यर्थः । बहुधा | अद्वितीय और अवर्ण—जाति नानाशक्तियोगाद्वर्णाननेकान्नि- | आदिसे रहित अर्थात् निर्विशेष | होनेपर भी शक्तिके योगसे निहितार्थ हितार्थोऽगृहीतप्रयोजनः स्वार्थ- | —कोई प्रयोजन न लेकर अर्थात् निरपेक्ष इत्यर्थः । दधाति विदधा- | स्वार्थकी अपेक्षा न करके बहुधा— | नाना प्रकारके अनेकों वर्ण (विशेष-

अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७५

अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७५

त्यादौ । वि चैति व्येति चान्ते | रूप ) धारण करता है तथा अन्तमें प्रलयकाले । चशब्दान्मध्येऽपि | —प्रलयकालमें जिसमें विश्व लीन यस्मिन्विश्वं स देवो द्योतनस्व- | हो जाता है। ‘चान्ते’ के ‘च’ शब्द- भावो विज्ञानैकरस इत्यर्थः । स | से यह तात्पर्य है कि मध्यमें भी नोऽस्माञ्छुभया बुद्ध्या संयुनक्तु | जिसमें विश्व स्थित है वह देव— | प्रकाशस्वरूप अर्थात् विज्ञानैकरस संयोजयतु ॥ १ ॥ | परमात्मा हमें शुभ बुद्धिसे संयुक्त | करे ॥ १ ॥ परमात्माकी सर्वरूपता यस्मात्स एव स्रष्टा तस्मिन्नेव | क्योंकि वही जगत्का रचयिता | है और उसीमें उसका लय होता है लयस्तस्मात्स एव सर्वं न ततो | अतः वही सर्वरूप है, उससे भिन्न | कुछ भी नहीं है—यह बात आगेके विभक्तमस्तीत्याह मन्त्रत्रयेण— | तीन मन्त्रोंसे कही जाती है— तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः । तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदापस्तत्प्रजापतिः ॥ २ ॥ वही अग्नि है, वही सूर्य है, वही वायु है, वही चन्द्रमा है, वही शुक्र (शुद्ध) है, वही ब्रह्म है, वही जल है और वही प्रजापति है ॥२॥ तदेवेति । तदेवात्मतत्त्वमग्निः। | ‘तदेवाग्निः’ इत्यादि । वह | आत्मतत्त्व ही अग्नि है, वही सूर्य तदादित्यः । एवशब्दः सर्वत्र | है। आगे ‘तदेव शुक्रम्’ ऐसा देखा संबध्यते तदेव शुक्रमिति दर्श- | जाता है इसलिये ‘एव’ शब्दका | सबके साथ सम्बन्ध है। शेष अर्थ नात् । शेषमृजु । तदेव शुक्रं | सरल है । वही शुक्र यानी शुद्ध है

१७६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४

१७६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ शुद्धमन्यदपि दीप्तिमन्नक्षत्रादि । तथा और भी जो दीप्तिशाली नक्षत्रादि पदार्थ हैं वह भी वही है, तद्ब्रह्म हिरण्यगर्भात्मा तदापः स तथा वही ब्रह्म—हिरण्यगर्भस्वरूप है, वही जल है और वही विराट्- प्रजापतिर्विराडात्मा ॥ २ ॥ रूप प्रजापति है ॥ २ ॥ त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी । त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः ॥ ३॥ तू स्त्री है, तू पुरुष है, तू ही कुमार या कुमारी है और तू ही वृद्ध होकर दण्डके सहारे चलता है तथा तू ही [ प्रपञ्चरूपसे ] उत्पन्न होने- पर अनेकरूप हो जाता है ॥ ३ ॥ स्पष्टो मन्त्रार्थः ॥ ३ ॥ | इस मन्त्रका अर्थ स्पष्ट है ॥ ३॥ नीलः पतङ्गो हरितो लोहिताक्ष- स्तडिद्गर्भ ऋतवः समुद्राः । अनादिमत्त्वं विभुत्वेन वर्तसे यतो जातानि भुवनानि विश्वा ॥ ४ ॥ तू ही नीलवर्ण भ्रमर, हरितवर्ण एवं लाल आँखोंवाला जीव ( शुकादि निकृष्ट प्राणी ), मेघ तथा [ ग्रीष्मादि ] ऋतु और [ सप्त ] समुद्र है । तू अनादि है और सर्वत्र व्याप्त होकर स्थित है तथा तुझहीसे सम्पूर्ण लोक उत्पन्न हुए हैं ॥ ४ ॥ नील इति । त्वमेवेति सर्वत्र 'नीलः' इत्यादि । यहाँ 'त्वमेव' ( तू ही ) इस पदका सबके साथ संबध्यते । त्वमेव नीलः पतङ्गो सम्बन्ध है । तू ही नीलवर्ण पतङ्ग-

अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७७

अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७७ ❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦ भ्रमरः, पतनाद्गच्छतीति पतङ्गः । भ्रमर है। नीचे गिरते चलनेके कारण हरितो लोहिताक्षः शुकादि- भ्रमरको पतङ्ग कहते हैं। तू ही निकृष्टाः प्राणिनस्त्वमेवेत्यर्थः । हरित लोहिताक्ष है, अर्थात् शुकादि निकृष्ट प्राणिवर्ग भी तू ही है। तू तडिद्गर्भो मेघ ऋतवः समुद्राः । ही तडिद्गर्भ—मेघ, ऋतु एवं समुद्र यस्मात्त्वमेव सर्वस्यात्मभूतस्त- है। इस प्रकार क्योंकि तू ही सब- का आत्मा है इसलिये तू अनादि स्मादनादिस्त्वमेव त्वमेवाद्यन्त- है—तेरा आदि और अन्त नहीं शून्यः, विभुत्वेन व्यापकत्वेन है, जिससे कि विभु अर्थात् व्यापक यतो जातानि भुवनानि विश्वानि होनेके कारण, सम्पूर्ण भुवन उत्पन्न ॥ ४ ॥ हुए हैं ॥ ४ ॥ ❧❧❧ प्रकृति और जीवके सम्बन्धका विचार इदानीं तेजोऽबन्नलक्षणां प्रकृतिं अब छान्दोग्योपनिषद्में प्रसिद्ध तेज, अप् और अन्नरूपा प्रकृतिको छान्दोग्योपनिषत्प्रसिद्धामजारूप- श्रुति अजारूपसे कल्पित करके कल्पनया दर्शयति— दिखलाती है— अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः । अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः ॥ ५ ॥ अपने अनुरूप बहुत-सी प्रजा उत्पन्न करनेवाली एक लोहित, शुक्ल और कृष्णवर्णा अजा (बकरी—प्रकृति) को एक अज (बकरा—जीव) सेवन करता हुआ भोगता है और दूसरा अज उस भुक्तभोगाको त्याग देता है ॥ ५ ॥

१७८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४

१७८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ अजामेकामिति । अजां प्रकृतिं | 'अजामेकाम्' इत्यादि । सरूपा लोहितशुक्लकृष्णां तेजोऽबन्नलक्षणां | —एक समान आकारवाली बहुत- बह्वीः प्रजाः सृजमानामुत्पाद- | सी प्रजा उत्पन्न करनेवाली लोहित- यन्तीं ध्यानयोगानुगतदृष्टां देवा- | शुक्ल-कृष्णा—तेज, अप् और अन्न- त्मशक्तिं वा सरूपाः समानाकारा | रूपा अजा—प्रकृतिको अथवा ध्यान- अजो ह्येको विज्ञानात्मानादिकाम- | योगमें स्थित ब्रह्मवादियोंद्वारा देखी कर्मविनाशितः स्वयमात्मानं | गयी देवात्मशक्तिको एक अज-- | विज्ञानात्मा, जो अनादि काम और | कर्मद्वारा स्वरूपसे भ्रष्ट कर दिया मन्यमानो जुषमाणः सेवमानो- | गया है, इस प्रकृतिको ही अपना ऽनुशेते भजते । अन्य आचार्योप- | स्वरूप मानकर सेवन करता हुआ देशप्रकाशावसादिताविद्यान्धकारो | भोगता है और दूसरा गुरुदेवके जहाति त्यजति ॥ ५ ॥ | उपदेशरूप प्रकाशसे अविद्यान्धकार- | के नष्ट हो जानेके कारण इसे छोड़ | देता है ॥ ५ ॥ जीव और ईश्वरकी विलक्षणता इदानीं सूत्रभूतौ परमार्थ- | अब परमार्थतत्त्वका निश्चय वस्त्ववधारणार्थमुपन्यस्येते— | करानेके लिये दो सूत्रभूत मन्त्रोंका | उल्लेख किया जाता है— द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्य- नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ ६ ॥ सदा परस्पर मिलकर रहनेवाले दो सखा ( समान नामवाले ) सुपर्ण ( सुन्दर गतिवाले पक्षी ) एक ही वृक्षको आश्रित किये हुए हैं ।

अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७९

अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७९

उनमें एक उसके स्वादिष्ट फलोंको भोगता है और दूसरा उन्हें न भोगता हुआ देखता रहता है ॥ ६ ॥

द्वेति । द्वा द्वौ विज्ञानपरमा- | 'द्वा सुपर्णा' इत्यादि । द्वा-- त्मानौ । सुपर्णा सुपर्णौ शोभन- | दो विज्ञानात्मा और परमात्मा, जो सुपर्ण पतनौ शोभनगमनौ सुपर्णौ पक्षि- | हैं अर्थात् शुभ पतन--शुभ गमन- सामान्याद्वा सुपर्णौ सयुजा | वाले होनेसे सुपर्ण हैं, अथवा सयुजौ सर्वदा संयुक्तौ । सखाया | पक्षियोंके समान होनेसे जो सुपर्ण सखायौ समानाख्यानौ समा- | कहलाते हैं, और सयुज्--सर्वदा नाभिव्यक्तिकारणौ । एवंभूतौ | संयुक्त रहते हैं तथा सखा हैं-- सन्तौ समानमेकं वृक्षं वृक्षमिवो- | जिनके आख्यान ( नाम ) यानी च्छेदसामान्याद्वृक्षं शरीरं परि- | अभिव्यक्तिके कारण समान हैं । षस्वजाते परिष्वक्तवन्तौ समा- | ऐसे वे दोनों समान यानी एक ही श्रितवन्तावेतौ । | वृक्षको--वृक्षके समान नाशमें | समानता होनेके कारण शरीर वृक्ष | है, उसे परिष्वक्त किये हैं अर्थात् | ये दोनों उसपर आश्रित हैं । तयोरन्योऽविद्याकामवासनाश्र- | उनमें एक--अविद्या, काम और यलिङ्गोपाधिर्विज्ञानात्मा पिप्पलं | वासनाओके आश्रयभूत लिङ्गदेहरूप कर्मफलं सुखदुःखलक्षणं स्वादु | उपाधिवाला विज्ञानात्मा अविवेकवश अनेकविचित्रवेदनास्वादरूपमत्ति | उसके स्वादु--अनेक विचित्र वेदना- उपभुङ्क्तेऽविवेकतः । अनश्नन्नन्यो | रूप खादवाले पिप्पल--सुख- नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः परमे- | दुःखरूप कर्मफलोंको भोगता है श्वरोऽभिचाकशीति सर्वमपि पश्य- | तथा अन्यं--नित्यशुद्धबुद्धमुक्त- न्नास्ते ॥ ६ ॥ | स्वरूप परमात्मा उन्हें न भोगता हुआ | उन सभीको देखता रहता है ॥६॥

१८० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४

१८० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ तत्रैवं सति— | ऐसा होनेपर— समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नो- ऽनीशया शोचति मुह्यमानः । जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीश- मस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥ ७ ॥ उस एक ही वृक्षपर जीव [ देहात्मभावमें ] डूबकर मोहग्रस्त हो दीनभावसे शोक करता है । जिस समय यह [ अनेकों योगमार्गोसे ] सेवित और देहादिसे भिन्न ईश्वर और उसकी महिमाको देखता है उस समय शोकरहित हो जाता है ॥ ७ ॥ समाने वृक्षे शरीरे पुरुषो | एक ही वृक्ष यानी शरीरमें पुरुष | —भोक्ता जीव अविद्या, काम, कर्म, भोक्ताविद्याकामकर्मफलरागादि- | कर्मफल और रागादिके भारी भारसे गुरुभाराक्रान्तोऽलाबुरिव समुद्र- | आक्रान्त हो समुद्रके जलमें डूबे हुए | तूँबेके समान यानी निश्चय ही जले निमग्नो निश्चयेन देहात्म- | देहात्मभावको प्राप्त हुआ—'यह भावमापन्नः'अयमेवाहममुष्य पुत्रो- | देह मैं हूँ, मैं अमुकका पुत्र हूँ, | उसका नाती हूँ, कृश हूँ, स्थूल हूँ, ऽस्य नप्ता कृशः स्थूलो गुणवान्नि- | गुणवान् हूँ, गुणहीन हूँ, सुखी हूँ, र्गुणः सुखी दुःखी'इत्येवंप्रत्ययो | दुःखी हूँ' इस प्रकारके प्रत्ययोंवाला | हो, ऐसा समझकर कि इस देहसे नान्योऽस्त्यस्मादिति जायते म्रि- | भिन्न कोई और नहीं है जन्मता, यते संयुज्यते च संबन्धिवान्धवैः। | मरता एवं अपने सम्बन्धी वन्धुओंसे | संयुक्त होता है । अतः अनीशतासे अतोऽनीशया 'न कस्यचित्सम- | —'मैं किसी कार्यके लिये समर्थ नहीं र्थोऽहं पुत्रो मम नष्टो मृता मे | हूँ, मेरा पुत्र नष्ट हो गया, स्त्री मर

[अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थं १८१

[अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थं १८१


संस्कृतहिन्दी अनुवाद
भार्या किं मे जीवितेन' इत्येवं दीन-गयी अब मेरे जीनेसे क्या लाभ है?'
इस प्रकारका दीनभाव ही अनीशा
भावोऽनीशा तया शोचति सन्त-(असमर्थता) है उससे युक्त होकर
और मोहग्रस्त होकर यानी अनर्थके
प्यते मुह्यमानोऽनेकानर्थप्रकारै-अनेकों प्रकारोंसे अविवेकवश विचित्र
रविवेकतया विचित्रतामापद्यमानः।स्थितिको प्राप्त होकर शोक अर्थात्
सन्ताप करता है।
स एव प्रेततिर्यङ्मनुष्यादि-वही प्रेत, तिर्यक् एवं मनुष्यादि
योनिष्वापतन्दुःखमापन्नः कदा-योनियोंमें पड़कर दुःख भोगता है।
जब कभी अनेक जन्मोंके सञ्चित
चिदनेकजन्मशुद्धधर्मसञ्चयन-पुण्यकर्मविपाकसे कोई परमकृपालु
निमित्तं केनचित्परमकारुणिकेनआचार्य उसे योगमार्गका उपदेश
दर्शितयोगमार्गोऽहिंसासत्यब्रह्म-कर देते हैं तो वह अहिंसा, सत्य,
ब्रह्मचर्य एवं सर्वत्यागके द्वारा समा-
चर्यसर्वत्यागसमाहितात्मा सन्हितचित्त और शमादि साधनोंसे
शमादिसम्पन्नो जुष्टं सेवितमनेक-सम्पन्न हो अनेक योगमार्गोंसे सेवित
योगमार्गैर्यदा यस्मिन्काले पश्यतिअन्य यानी वृक्ष (देह) रूप
उपाधिसे भिन्न, संसारधर्मशून्य,
ध्यायमानोऽन्यं वृक्षोपाधिलक्षणा-क्षुधादिसे असंस्पृष्ट, सर्वान्तर्यामी ईश्वर
द्विलक्षणमसंसारिणमशनायाद्यसं-परमात्माका ध्यान करता हुआ उसे
देखता है। अर्थात् 'मैं यह हूँ, अर्थात्
स्पृष्टं सर्वान्तरं परमात्मानमीशम्मैं सबमें समान और समस्त प्राणियोंके
'अयमह मस्मीत्यात्मा सर्वस्य समःभीतर स्थित आत्मा हूँ, अविद्याजनित
सर्वभूतान्तरस्थो नेतरोऽविद्या-उपाधिसे परिच्छिन्न मायात्मा नहीं
हूँ' इस प्रकार साक्षात्कार करता है
जनितोपाधिपरिच्छिन्नो मायात्मा'और उसकी विभूतिरूप महिमाको
इति विभूतिं महिमानमिति जगद्रूप-देखता है यानी यह जगद्रूप महिमा

१८२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४

१८२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ ❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦ मस्यैव महिमा परमेश्वरस्येति | इस परमात्माकी ही है—ऐसा जिस | समय देखता है उस समय यह यदैवं पश्यति तदा वीतशोको | शोकरहित हो जाता है । अर्थात् | सम्पूर्ण शोकसागरसे मुक्त यानी भवति । सर्वस्माच्छोकसागराद्वि- | कृतकृत्य हो जाता है । अथवा | [ ऐसा अर्थ करना चाहिये कि ] मुच्यते कृतकृत्यो भवतीत्यर्थः । | जिस समय इस भोक्ता जीवको यह अथवा जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीश- | योगिसेवित अन्य-ईश्वररूप अर्थात् | इस प्रत्यगात्माकी ही महिमारूप मस्यैव प्रत्यगात्मनो महिमानम् | देखता है उस समय शोकरहित हो इति तदा वीतशोको भवति ॥७॥ | जाता है ॥७॥ ब्रह्मकी अधिष्ठानरूपता और उसके ज्ञानसे कृतार्थता इदानीं तद्विदां कृतार्थतां | अब श्रुति ब्रह्मवेत्ताओंकी कृतार्थता दर्शयति— | प्रदर्शित करती है— ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः । यस्तं न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते ॥ ८ ॥ जिसमें समस्त देवगण अधिष्ठित हैं उस अक्षर परव्योममें ही वेदत्रय स्थित हैं [ अर्थात् वे भी उसीका प्रतिपादन करते हैं ] । जो उसको नहीं जानता वह वेदोंसे ही क्या कर लेगा ? जो उसे जानते हैं वे तो ये कृतार्थ हुए स्थित हैं ॥ ८ ॥ ऋच इति । वेदत्रयवेद्येऽक्षरे | 'ऋचः' इत्यादि । वेदत्रयवेद्य परमे व्योमन्व्योम्याकाशकल्पे | अक्षर परमाकाशमें—आकाशसदृश