सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभुवनकोशः १०३ प्राकृतिक अनेक वलय क्षेत्र दृष्टिगत होते हैं ठीक उसी प्रकार किसी भी बृहत् गोलपृष्ठ पर ९६ वलय क्षेत्र दृष्टिगत हो सकते हैं। प्रत्येक वलय वप्रक्षेत्र का क्षेत्रफल गोलगत प्रत्येक खण्ड के क्षेत्रफल साधन कर सभी क्षेत्रों के क्षेत्रफलों का योग पूरे गोल का क्षेत्रफल (जिसे गोल पृष्ठफल कहते हैं) हो जाता है। उसका परिमाण सर्वज्या योग में त्रिज्यार्ध कम कर उसमें त्रिज्यार्ध का भाग देने से उसका मान उस गोल के व्यास के समान होता है। लब्ध फल को परिधि से गुणा करने पर लब्ध फल परिधि और व्यास के गुणनफल के तुल्य होगा, यही गोल का पृष्ठ फल होता है। उपपत्ति—किसी भी गोल के अभीष्ट चाप विभागों में अभीष्ट संख्या की ज्या की कल्पना करते हुये क्षेत्रफल साधन की युक्ति समझनी चाहिए। पहले भी बता चुके हैं कि वृत्त का ९६वां भाग सरलाकार होता है अतएव एक गोल पृष्ठ में ९६ वाँ भाग २२५ कला होने से एक वृत्त पाद में ज्या संख्याओं का मान ९६ ÷ ४ = २४ ज्या होती हैं। उदाहरण से आंवले के दाने के मुख से मूल वृक्षशाखा संलग्न अधो भाग तक में जैसे प्रत्येक दो रेखाओं के बीच में एक एक वलयाकार क्षेत्र दिखाई देता है और प्रत्येक वप्रक्षेत्र में एक एक हाथ की दूरी पर वलय क्षेत्रों की रचना से, अतः परिधि संख्यक ऐसे वप्रक्षेत्र ९६ होते हुये एक वृत्त पाद में २४ संख्यक चतुर्भुजाकार क्षेत्र होते हैं। प्रत्येक वप्रक्षेत्र में २२५ कला चाप तुल्य एक ज्या का मान लम्ब के तुल्य होने से प्रथमज्या × प्रथमज्या द्वितीय ज्या × द्वितीय ज्या जिसका स्वरूप —————————————————————— = प्रथम लम्ब एवं ——————————————————————————— = त्रिज्या त्रिज्या द्वितीय लम्ब होता है प्रत्येक चतुर्भुज में अधोगत रेखा का मान १ अंगुल और उपरितन रेखायें क्रमशः कुछ न कुछ न्यून १ अंगुल से न्यून होती हैं। और यत्र तत्र सभी चतुर्भुजों में लम्ब का मान = १ हाथ होता है। प्रत्येक चतुर्भुज का क्षेत्रफल इन्हीं श्रीभास्करा- चार्य से विरचित लीलावती सूत्र के अनुसार “लम्बेन निघ्नं कुमुखैक्य खण्डं स्पष्टं लम्ब × (आधार + मुख) चतुर्भुजे फलम्” के अनुसार ————————————————————— = का फल सिद्ध होता है। २ लम्ब (प्रथम ज्या + द्वितीय ज्या) अतएव यहाँ पर ———————————————————————————————— एक वप्रार्ध का फल होगा। २ (द्वितीय ज्या + तृतीय ज्या) × लम्ब = १ हाथ इसी प्रकार ——————————————————————————————————————————— = द्वितीय-तृतीयादि २ वप्रार्धों का फल होगा । प्रत्येक वप्रार्ध फल को द्विगुणित करने से समूचे वप्र का क्षेत्रफल सिद्ध होता है।