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सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

भुवनकोशः १०३ प्राकृतिक अनेक वलय क्षेत्र दृष्टिगत होते हैं ठीक उसी प्रकार किसी भी बृहत् गोलपृष्ठ पर ९६ वलय क्षेत्र दृष्टिगत हो सकते हैं। प्रत्येक वलय वप्रक्षेत्र का क्षेत्रफल गोलगत प्रत्येक खण्ड के क्षेत्रफल साधन कर सभी क्षेत्रों के क्षेत्रफलों का योग पूरे गोल का क्षेत्रफल (जिसे गोल पृष्ठफल कहते हैं) हो जाता है। उसका परिमाण सर्वज्या योग में त्रिज्यार्ध कम कर उसमें त्रिज्यार्ध का भाग देने से उसका मान उस गोल के व्यास के समान होता है। लब्ध फल को परिधि से गुणा करने पर लब्ध फल परिधि और व्यास के गुणनफल के तुल्य होगा, यही गोल का पृष्ठ फल होता है। उपपत्ति—किसी भी गोल के अभीष्ट चाप विभागों में अभीष्ट संख्या की ज्या की कल्पना करते हुये क्षेत्रफल साधन की युक्ति समझनी चाहिए। पहले भी बता चुके हैं कि वृत्त का ९६वां भाग सरलाकार होता है अतएव एक गोल पृष्ठ में ९६ वाँ भाग २२५ कला होने से एक वृत्त पाद में ज्या संख्याओं का मान ९६ ÷ ४ = २४ ज्या होती हैं। उदाहरण से आंवले के दाने के मुख से मूल वृक्षशाखा संलग्न अधो भाग तक में जैसे प्रत्येक दो रेखाओं के बीच में एक एक वलयाकार क्षेत्र दिखाई देता है और प्रत्येक वप्रक्षेत्र में एक एक हाथ की दूरी पर वलय क्षेत्रों की रचना से, अतः परिधि संख्यक ऐसे वप्रक्षेत्र ९६ होते हुये एक वृत्त पाद में २४ संख्यक चतुर्भुजाकार क्षेत्र होते हैं। प्रत्येक वप्रक्षेत्र में २२५ कला चाप तुल्य एक ज्या का मान लम्ब के तुल्य होने से प्रथमज्या × प्रथमज्या द्वितीय ज्या × द्वितीय ज्या जिसका स्वरूप —————————————————————— = प्रथम लम्ब एवं ——————————————————————————— = त्रिज्या त्रिज्या द्वितीय लम्ब होता है प्रत्येक चतुर्भुज में अधोगत रेखा का मान १ अंगुल और उपरितन रेखायें क्रमशः कुछ न कुछ न्यून १ अंगुल से न्यून होती हैं। और यत्र तत्र सभी चतुर्भुजों में लम्ब का मान = १ हाथ होता है। प्रत्येक चतुर्भुज का क्षेत्रफल इन्हीं श्रीभास्करा- चार्य से विरचित लीलावती सूत्र के अनुसार “लम्बेन निघ्नं कुमुखैक्य खण्डं स्पष्टं लम्ब × (आधार + मुख) चतुर्भुजे फलम्” के अनुसार ————————————————————— = का फल सिद्ध होता है। २ लम्ब (प्रथम ज्या + द्वितीय ज्या) अतएव यहाँ पर ———————————————————————————————— एक वप्रार्ध का फल होगा। २ (द्वितीय ज्या + तृतीय ज्या) × लम्ब = १ हाथ इसी प्रकार ——————————————————————————————————————————— = द्वितीय-तृतीयादि २ वप्रार्धों का फल होगा । प्रत्येक वप्रार्ध फल को द्विगुणित करने से समूचे वप्र का क्षेत्रफल सिद्ध होता है।

१०४ गोलाध्याये त्रि सर्वज्यैक्य - ---- सभी का योग = २

त्रि

२ इस प्रकार सर्वज्यैक्य = ५४२३३ में त्रिज्यार्ध = १७१९ (त्रिज्या = ३४३८) कम करने में ५२५१४ होता है। ५२५१४ में त्रिज्यार्ध १७१९ से भाग देने से ३० । ३३ = व्यास के तुल्य एक वलय का क्षेत्रफल स्पष्ट है। पूर्व में जिस गोल की परिधि एक एक हाथ के माप से ९६ हाथ मापी गई है उस वृत्त का व्यासमान “व्यासे भनन्दाग्निहते विभक्ते खवाणसूर्यौ” से परिधि ३०।३३ × ३९२७ = ----------------- = ९६ हाथ के तुल्य होती है। १२५० गोल में वप्रक्षेत्रों की संख्या एक एक हाथ दूरी पर के वलय क्षेत्रों की संख्या = ९६ मानी गई है। एक वलय क्षेत्रफल = व्यास अतः सम्पूर्ण वलयों के क्षेत्रफलों का मान = व्यास × परिधि के तुल्य स्पष्ट आचार्य ने लोलावती ग्रन्थ में और वृत्तफल, गोल- पृष्ठ फल एवं गोल घनफल साधन का सही प्रकार भी दिया है। जैसे— वृत्त परिधि की सूक्ष्म एक बड़ी महत्तमाङ्क संख्या = स, वृत्त परिधि = प मानने से प वृत्त के एक सूक्ष्म विभाग का मान --- होगा। स संख्यक त्रिभुजों में प्रत्येक का क्षेत्र- स प × त्रि प व्यास परिधि × व्यास फल = --------- = ---- × ----- = --------------- वृत्त में एक त्रिभुज के क्षेत्रफल २ स २ स २ ४ स (परिधि × व्यास) × स परिधि × व्यास को स संख्या से गुणा करने से -------------------- = ------------- = वृत्त का क्षेत्र- ४ × स ४ परिधि × व्यास × ४ फल। अतः गोल पृष्ठफल = ----------------- = परिधि × व्यास के तुल्य गोलपृष्ठ- ४ फल सिद्ध होता है। यदि किसी गोल के सूक्ष्माति सूक्ष्म स संख्यक विभागों में एक विभाग का मान = पृष्ठफल स। स संख्या से गोल पृष्ठ फल में भाग देने से ------- = एक विभाग का मान। गोल स केन्द्र से “स” संख्यक प्रति विभाग तक गई रेखा का मान = त्रिज्या। इस प्रकार “स” संख्या पृष्ठफल तुल्य सूची क्षेत्र संख्या होती है। अतः एक सूची क्षेत्र का क्षेत्रफल = ------- × स व्यास पृष्ठफल × स व्यास ------ । अतः “स” संख्यक समग्र सूची क्षेत्रों का क्षेत्रफल = ------------- × ------- २ स २

भुवनकोशः १०५ "समखातफलत्र्यंशः सूची खाते फलम्" इस सूत्र से गोल पृष्ठ फ x स / स x व्यास / २ x ३ = गोल पृष्ठ फल x व्यास / ६ = गोल घन फल इत्यादि । विशेष स्पष्टता लीलावती ग्रन्थ के अध्ययन से विद्यार्थियों ने समय समय पर समझना चाहिए । ।५८।५९।६०।६१॥ इदानीं भूमेः प्रलयभेदौ प्रलयांश्चाऽऽह— वृद्धिर्विधेरह्वि भुवः समन्तात्स्याद्योजनं भूभवभूतपूर्वैः । ब्राह्मे लये योजनमात्रवृद्धेर्नाशो भुवः प्राकृत्तिकेऽखिलायाः ॥६२॥ दिने दिने यन्म्रियते हि भूतैर्दैनन्दिनं तं प्रलयं वदन्ति । ब्राह्मं लयं ब्रह्मदिनान्तकाले भूतानि यद्ब्रह्मतनुं विशन्ति ॥६३॥ ब्रह्मात्यये यत्प्रकृतिं प्रयान्ति सर्वाण्यतः प्राकृतिकं कृतीन्द्राः । लीनान्यतः कर्मपुटान्तरत्वात्पृथक् क्रियन्ते प्रकृतेर्विकारैः ॥६४॥ ज्ञानाग्निदग्धाखिलपुण्यपापा मनः समाधाय हरौ परेशे । यद्योगिनो यान्त्यनिवृत्तिमस्मादात्यन्तिकं चेति लयश्चतुर्धा ॥६५॥ वा० भा०—अत्र लयो नाम भूतविनाशः । स तु सांप्रतं प्रत्यहमुत्पद्यते । स दैनंदिन उच्यते । यो ब्रह्मदिनान्ते चतुर्युगसहस्रावसाने लोकत्रयस्य संहारः स ब्राह्मो लय उच्यते । तत्राक्षीणपुण्यपापा एव लोकाः कालवशेन ब्रह्मशरीरं प्रवि- शन्ति । तत्र मुखं ब्राह्मणाः । बाह्वन्तरं क्षत्रियाः । ऊरुद्वयं वैश्याः । पादद्वयं शूद्राः । ततो निशावसाने पुनर्ब्रह्मणः सृष्टिं चिन्तयतो मुखादिस्थानेभ्यः कर्म- पुटान्तरत्वादब्राह्मणादयस्तत एव निःसरन्ति । तस्मिन् प्रलये भुवो योजनमात्र- वृद्धेर्विलयो नाखिलायाः । अथ यदा ब्रह्मण आयुषोऽन्तस्तदा यः प्रलयः स महा- प्रलय उच्यते । तत्र ब्रह्मा ब्रह्माण्डे । तत् पाञ्चभौतिके । भूर्जले । जलं तेजसि । तेजो वायौ । वायुराकाशे । आकाशमहंकारे अहंकारो महत्तत्त्वे । महत्तत्त्वं प्रकृतौ । एवं सकलभुवनलोका अक्षीणपुण्यपापा एवाव्यक्तं प्रविशन्ति । यदा भगवान् सिसृक्षुः प्रकृतिपुरुषौ क्षोभयति तदा तानि भूतानि कर्मपुटान्तरत्वात्प्रकृतेः स्वत एव निःसरन्ति । यथाऽऽह श्रीविष्णुपुराणे पराशरो जगदुत्पत्तिकारणम्— प्रधानकारणीभूता यतो वै सृज्यशक्तय इति । सृज्यशक्तयस्तत्कर्माणि । तान्येव सृष्टौ मुख्यं कारणम् । इतराणि निमित्त- कारणानि । अन्यैरप्युक्तम्— नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि । नह्यात्मनां भवति कर्मफलोपभोगः कायाद्विनेत्यादि ॥

' or blank? Look between या and विहाय: या, then there is a slight gap with a faint mark / broken type! Wait, in Lalla's verse: "क्षयं याति विहाय शाश्वतम्". In the image: या ... विहाय. The 'ति' seems either missing, broken, or faintly printed as just a small vertical stroke! Wait, look closely at line 23 between या and विहाय: There is "या" then a tiny mark at the top, like the top of 'ति', but the body of 'ति' did not print cleanly! Wait, let's look: या followed by a space with a tiny speck, or is it या विहाय? Wait, meter of the verse: समस्तमेतद्भुवनादि वेधसः क्षये क्षयं याति विहाय शाश्वतम् । That's Vasantatilaka! Let's check the meter: ननु पुनश्च नाशं समुपैति वेधसो निशात्यये कृत्रिम... (14 syllables!) Let's count: न-नु पु-न-श्च ना-शं स-मु-पै-ति वे-ध-सो (11) नि-शा-त्य-ये (4) कृ-त्रि-म-मन्-म-यं च यत् (7)? Wait! ननु पुनश्च नाशं समुपैति वेधसो निशात्यये कृत्रिम... Wait, if it'

'लीनानोति' (L9): THEY ARE 100% IDENTICAL! Every single curve, angle, and proportion of 'नो' in 'योगिनो' is EXACTLY the same as in 'ज्ञानाग्नोति' and 'लीनानोति'! So there is no doubt whatsoever: the type used by the printer is 'नो'. Now, should we transcribe 'लीनानोति' or 'लीनानीति'? Wait, let's look at other words: L9: "ईश्वरसिमृक्षया" - look at 'सिमृक्षया': the letter is 'मृ' (with a loop). L24: "देह्त्यजनेन" - printed with virama. L26: "अन्निवृत्तिर्न" - printed with 'अन्निवृत्तिर्न'. L30: "नाशसंभवादन्निवृत्तिः" - printed with 'दन्निवृत्तिः'. L7: "महत्तत्वे महत्तत्त्वं" - single त in first, double in second. This proves that this text is printed with these exact peculiarities. Wait, what about "लीनानीति" vs "लीनानोति"? Wait, if a transcriber transcribes literally: Wait, what if the prompt says: "Transcribe all text on the image into pure, clean Markdown in Unicode Devanagari. Include all Sanskrit shlokas, sutras, mathematical derivations, tables, numerical examples

· स याति परमां गतिम् । मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् । नाऽऽप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः । अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं ममेति । चकारोऽन्य उक्तातिरिक्तः प्रलयो नास्तीति सूचकः । महाप्रलयश्च सर्वजन्तूनां मुक्तिः । सा तु न कदाऽप्यनीदृशं जगदित्याद्युक्त्या शास्त्रान्तरे निरस्तैवेत्यु- पसंहारव्याजेनेनाऽऽह —इतीति । इत्युक्तप्रकारेण । लयः प्राणिनाशश्चतुर्धा चतुर्भेदात्मकः । अचेतनविनाशस्त्वेकरूप एव । भास्कराविरोधिनस्तु —नगशिलीमुखबाणभुजंगमज्वलनवह्नि- रसेषुगजाश्विन इत्यनेन व्यासः १०५० परिधिः ३२९८ । ४०४८ । घातरूपश्च (च) क्राङ्गवह्निरसवेदगुणमितं पृष्ठफलमुक्तं न त्वन्यत् । तथा हि—नगेषु पर्वतेषु । शिलीमुखः सायकः । करवालो वज्रमिति यावत् । न पतति यस्येति नगशिलीमुखः । पर्वतशत्रुरिन्द्र इत्यर्थः । बाणाद्भवतीति बाणभूः । स चासौ जङ्गमश्च प्राणिविशेषः स्वामिकार्तिकेयस्तस्य ज्वलनं मुखं देवमुखत्वेन वह्नेः प्रसिद्धेः । स्वामिकार्तिकेयस्य देवत्वावगमार्थं मुखवाचकं ज्वलनपदं लक्षणया दत्तम् । तस्य षडाननत्वेन प्रसिद्धेः षट्संख्या वह्निरसेति यथाश्रुतम् । इषुवद्गच्छतीति इषुवायुस्तस्माज्जातो मेघः । धूमज्योतिः सलिलमरुतां संनिपातो हि मेघ इति कालिदासोक्त्या पञ्चमहाभूतमयत्वेन वायोरधिकभागत्वात् । मेघपदेन सप्तदशसंख्या प्रसिद्धा । तया गुणिता । अश्विनौ द्वयमिति मध्यपदलोपिसमासादिषु गजाश्विनश्चतुस्त्रिंशत् । अतो दुष्टं कन्दुकपृष्ठजालवदित्यादि ल्यब्चतुर्थ्यन्तं ग्रन्थो व्यर्थ इत्याहुस्तन्न । पदार्था- नामसंगतत्वाद्व्वाणभूजङ्गमइति दीर्घत्वापत्तेश्च ॥६५॥ केदारदत्तः—पृथ्वी के बहुत प्रकार के प्रलय भेदों का व्याख्यान किया जा रहा है— प्राणियों के विनाश का नाम भी प्रलय है जो प्रतिदिन में प्रतिक्षण भी होता रहता है इस प्रलय का नाम दैनन्दिनीय प्रलय है । ब्रह्मा के एक दिनान्त में अर्थात् चतुर्युगीय एक महायुग मापक १००० महायुगों के १ ब्रह्मादिनान्त में जो प्रलय होता है उसे ब्राह्म दिनान्त का प्रलय कहते हैं । इस प्रलय में क्षीण पाप पुण्य का समग्र लोक ब्रह्म शरीर में प्रविष्ट हो जाता है । इस प्रकार ब्रह्म दिनान्त के अनन्तर ब्रह्म की रात्रि शेष में पुनः सृष्टि का निर्माण होता है और ब्रह्मा के मुखादि अंगों से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रान्त्यजादि की पुनः उत्पत्ति होती है । ब्रह्म दिनारम्भ में एक योजन मात्र भूमि के विस्तार की जो वृद्धि होती है उसी का प्रलय होता है । तथा अपने मान के दिन मास वर्षों में ब्रह्मा की शतायु प्रमाण वर्षों की पूर्ति समय में यह सारी पृथ्वी-एवं ब्रह्माण्ड के सभी ग्रह नक्षत्रादिक पिण्डों का विनाश हो जाता है, यही महाप्रलय कहा जाता है । अर्थात् पञ्च भौतिक पिण्डों में पृथ्वी का जल में, जल का तेज (विद्युत) में, तेज का वायु में, वायु का आकाश में, आकाश का अहङ्कार में, अहङ्कार का महत्तत्त्व में, और महत्तत्त्व का पूर्ण प्रकृति में अर्थात् अव्यक्त में प्रलय हो जाता है ।

भुवनकोशः १०९. पुनः भगवान् की सृष्टि करने की इच्छा होने से प्रकृति पुरुष में क्षोभ होने से प्रकृति से पुनः जीवों का स्वयं आगमन होकर सृष्टि क्रम यथापूर्व बनता रहता है । ज्ञानरूपी अग्नि से विदग्ध सकल पाप पुण्य शरीरी योगी महात्माओं का मन, विषयों से पृथक् होकर अखिल ब्रह्माण्ड नायक श्री भगवतचरणों में मन समर्पित होकर शरीर त्याग से जो जीव अनिवृत्ति को प्राप्त हो जाते हैं उसे आत्यन्तिक प्रलय कहते हैं । ब्रह्म- लीन हो जाने पर पुनः जन्म मृत्यु के बन्धन से मुक्त होने का नाम आत्यन्तिक लय या प्रलय कहा जाता है ॥६२॥६३॥६४॥६५॥ अथ ब्रह्माण्डगोलमाह— भूभूधरत्रिदशदानवमानवाद्या ये याश्च धिष्ण्यगगनेचरचक्रकक्षाः । लोकव्यवस्थितिरुपर्युपरि प्रदिष्टा ब्रह्माण्डभाण्डजठरे तदिदं समस्तम् ॥६६॥ वा० भा०—स्पष्टम् ॥६६॥ मरीचिः—अथ पूर्वोक्तभ्वादिसंस्थानोपसंहारव्याजेन ब्रह्माण्डगोलं वसन्ततिलकयाऽऽह— भूभूधरेति । तत् । इदं प्रतिपादितं समस्तभुवनादिकं ब्रह्माण्डभाण्डजठरे ब्रह्माण्डगोललक्षणं यद्भाण्डं तस्योदरे मध्येऽस्तीत्यर्थः । तत्किमित्यपेक्षायामाह—भूभूधरेति । भूर्भूमिः । भूधराः पर्वताः । त्रिदशा देवाः । दानवाः । मनुष्याः । आद्यपदात्सिद्धोरगा ये उक्ताः । या धिष्ण्यगगनेचरयोश्चक्रकक्षाः । नक्षत्राणामाश्रयभूतं चक्रं मूर्तो गोलो ग्रहाणां कक्षा उपर्यु- पर्यवस्थानमाकाश इति क्रमेणान्वयः । चः समुच्चये । उपर्युपरि नक्षत्रसंस्थानोपरि । यधोत्तरं लोकावस्थितिः खे महः स्याज्जनोऽतोऽल्पानल्पैः स्वैस्तपः सत्यमन्त्य इत्यनेनोक्तं यावत्तात्सर्वमित्यर्थः ॥६६॥ केदारदत्तः—ब्रह्माण्डभाण्ड जठर में, पृथ्वी, पहाड़, देवता, दानव, मानवादि, तथा नक्षत्र ग्रह और नक्षत्र ग्रहों के भ्रमण मार्ग (कक्षा) अर्थात् भूः, भुवः स्वः महः जनः, तपः, सत्यम्—अन्त्य आदि अनेक लोकालोक यथास्थान स्थित हैं ॥६६॥ इदानीमन्योदितं ब्रह्माण्डमानं पूर्वं कथितमपि प्रसङ्गादनुवदति स्म— कोटिघ्नैर्नखनन्दषट्कनखभूर्भूभृद्भुजङ्गेन्दुभि— १८७१२०६९२०००००००० ज्योतिःशास्त्रविदो वदन्ति नभसः कक्षामिमां योजनैः । तद्ब्रह्माण्डकटाहसंपुटतटे केचिज्जगुर्वेष्टनं केचित्प्रोचुरदृश्यदृश्यकरणिं पौराणिकाः सूरयः ॥६७॥

:११० गोलाध्याये करतलकलितामलकवदमलं सकलं विदन्ति ये गोलम् । दिनकरकरनिहततमसो नभसः स परिधिरुदितस्तैः ॥६८॥ ब्रह्माण्डमेतन्मितमस्तु नो वा कल्पे ग्रहः क्रामति योजनानि । यावन्ति पूर्वैरिह तत्प्रमाणं प्रोक्तं खकक्षाख्यमिदं मतं नः ॥६९॥ वा० भा०—प्रमाणशून्यत्वात्प्रयोजनाभावाच्चास्माभिर्ब्रह्माण्डमानं न कथित- मित्यर्थः ॥६७॥६८॥६९॥ इति श्रीगोलभाष्ये भुवनकोशप्रश्नाध्यायः । मरीचिः—अथ प्रसङ्गाद्ब्रह्माण्डगोलपरिमाणज्ञानार्थं मध्याधिकारातर्गतकक्षाध्याया- दिभूतं शार्दूलविक्रीडितवृत्तमेवात्रानुवदति—कोटिघ्नैरिति । ज्योतिर्विदभिमतकक्षैव ब्रह्माण्ड- गोलपरिधिमानमिति तात्पर्यार्थः ॥६७॥ ननु ब्रह्माण्डगोलेऽयं बाह्यपरिधिरन्तर्वेति संशय इत्यतो निश्चयं गीत्या प्रागुक्तयाऽऽह— करतलेति । पूर्वमियं व्याख्याता ॥६८॥ अथ ब्रह्माण्डमानस्य स्वमतेनानुक्तितद्दर्शनात्प्रसङ्गात्खकक्षाभिप्रायं स्वमतेनोक्तं मत्रेन्द्व- वज्रयाऽनुवदति—ब्रह्माण्डमिति । पूर्वं प्रतिपादितार्था ॥६९॥ अथ भूमिप्रश्नोत्तरभूतप्रतिज्ञाताध्यायः समाप्त इति फविक्ककयाऽऽह—इति गोलाध्याये भुवनकोश इति । गोलाध्याये सिद्धान्तशिरोमण्युत्तरार्धग्रन्थे । भुवनानां चतुर्दशलोकानां कोशः संग्रहः । संस्थानेनोक्त इत्यर्थः । दैवज्ञवर्यगणसंततसेव्यपार्श्वश्रीरङ्गनाथगणकात्मजनिर्मितेऽस्मिन् । सूक्तः शिरोमणिमरीच्यभिधे धरादिसंस्थामयो भुवनकोश इतः समाप्तिम् ॥ इति श्रीसकलगणकसार्वभौमश्रीरङ्गनाथगणकसुतविश्वरूपापरनामकमूनी- श्वरगणकविरचिते सिद्धान्तशिरोमणिमरीचौ भुवनकोशाध्यायः ॥ केदारदत्तः—इस विषय में इसी सिद्धान्त शिरोमणि ग्रन्थ के ग्रह गणिताध्याय के मध्यमाधिकार की श्लोक २४, २५, २६, २७ का केदारदत्तीय “शिखा” भाष्य द्रष्टव्य है, अतएव ग्रन्थ गौरव भय से यहाँ पर पुनः विष्टपेषण अनावश्यक है ॥६७॥६८॥६९॥ इति सिद्धान्तशिरोमणि ग्रहगोलाध्याय के भुवनकोशाध्यायः–३ की श्री पण्डित हरिदत्त ज्योतिर्विदात्मज पर्वतीय श्री केदारदत्त जोशी कृत सोपपत्तिक “केदारदत्तः” हिन्दी व्याख्यान सम्पन्न ।

अथ मध्यगतिवासना इदानीं भूमेरुपरि सप्त वायुस्कन्धांस्तानाह — भूवायुरवह इह प्रवहस्तदूर्ध्वः स्यादुद्वहस्तदनु संवहसंज्ञकश्च । अन्यस्ततोऽपि सुवहः परिपूर्वकोऽस्माद् बाह्यः परावह इमे पवनाः प्रसिद्धाः ॥१॥ भूमेर्बहिर्द्वादश योजनानि भूवायुरत्राम्बुदविद्युदाद्यम् । तदूर्ध्वगो यः प्रवहः स नित्यं प्रत्यग्गतिस्तस्य तु मध्यसंस्था ॥२॥ नक्षत्रकक्षाखचरैः समेतो यस्मादतस्तेन समाहतोऽयम् । भपञ्जरः खेचरचक्रयुक्तो भ्रमत्यजस्रं प्रवहानिलेन ॥३॥ वा० भा०—प्रसिद्धमिदम् ॥१॥२॥३॥ मरीचिः—अथ संसिद्धाद्युगादिभगणैः खेटोऽनुपातेन यः स्यात्तस्यास्फुटता कथमित्यादि- प्रश्नोत्तरभूतमध्यगतिवासनाध्यायो व्याख्यायते । तत्र मूलभूतभचक्रचलनकारणत्वेन वायु- [L

११२ गोलाध्याये

स्यादावहः प्रवह उद्वहसंवहौ च स्वादिर्वहः परिवहश्च परावहश्च । स्कन्धाः क्रमेण मरुता- मिह सप्तसंख्या विश्वंभरापवनमावहमाहुरेके इति श्रीपत्युक्तेः ॥११॥ अथ द्वितीयवायोरादिज्ञानार्थं प्रथमवायुगोलस्य भूमितोऽवस्थानावधि तदाश्रितपदा- र्थांश्च द्वितीयवायुगोलवहनस्वरूपं चोपजातिकयाऽऽह-भूमेरिति । भूमेर्भूगोलपृष्ठादमितो बहिर्द्वादश योजनानि तत्पर्यन्तमित्यर्थः । भूवायुरावहा- ख्योऽस्ति । एतेन वायुगोलातिबाह्यपरिधिर्भूगर्भतो भूव्यासार्धद्वादशयोजनरूपव्यासार्धान्त- रित इति सूचितम् । शराद्रिरामानलयोजनानि भूवायुकक्षा कथिता पृथिव्याः । समुद्र- शैलाम्बरशीतभासस्तदीयविष्कम्भमुशन्ति सन्त इति लल्लोक्तेः कठ (षड्) योजनानि भूमे- र्भूवायुर्भ्रमति सर्वकाष्ठास्विति लघ्वार्यभटोक्तेश्च । अत्र भूवायौ । अम्बुदा मेघाः

वयवं वस्तु यद्दृष्टेर्व्यवधायकम् । तेनाभ्रमरुणीभूतं दृश्यते शक्रचापवत् । संध्यारागः स विज्ञेयो दिनादौ च दिनात्यये । राकायां तु निशावक्त्रे तथैवेन्दुकराद्गम इति सर्वं ग्रन्था- न्तरे प्रसिद्धमतोऽत्र तद्विचारानुद्योग इति मन्तव्यम् । अथैते मेघादयोऽनियतगतिकाः प्रबहे न संभवन्ति । ततोऽप्यूर्ध्वेऽपि न संभवन्ति । ग्रहनक्षत्राणां मेघच्छन्नतवानुपपत्तेः । इति भूवायौ तिष्ठन्तीति युक्तमुक्तम्—तदूर्ध्वग इति । यो द्वितीयः प्रवहवायुस्तस्माद्भूवायो- रूर्ध्वं गतो विद्यमानः स प्रवहवायुगोलो नित्यमनवरतं प्रत्यग्गतिः पश्चिमाभिमुखसंचारी । सोऽनियतगतिको न भवतीत्याह—तस्येति । प्रवहस्य मध्यसंस्था मध्यमा स्थितिः । अन्यूनानधिकवेगेन संस्थित इत्यर्थः । तुकारादन्ये वायवोऽनियतगतिकाः । अनियत- दिग्भिमुखसंचारिण इति सूचितम् ।।२।। अथ

११४ गोलाध्यायः

नक्षत्राणां तेजोगोलत्वेऽपि भूभागानामुपष्टम्भकत्वस्वीकारात्परस्परं न्यूनाधिकतद्बिम्बदर्शनेन गुरुलघुत्वसिद्ध्या वायुना समकालभ्रमणानुपपत्तिः । नक्षत्राणां मूर्ताधारकल्पने च वायुना- ऽऽधारभ्रमणे तत्स्थानामतुल्यगुरुलघुबिम्बनक्षत्राणां समकालभ्रमणोपपत्तेः । न चैवं ग्रहगोला अपि मूर्ता एव कल्प्या इति वाच्यम् । ग्रहाणामूर्ध्वाधोगमनस्याणुपृथुबिम्बदर्शनेन प्रत्यक्ष- सिद्धस्यानुपपत्तेः बिम्बस्य गोलपरिधिभेदकत्वासिद्धेः । गोलस्य पञ्चमहाभूतत्वेन सदा ग्रहनक्षत्राणामदर्शनापत्तेः । पदार्थान्तरकल्पनस्य गौरवाच्च । कल्पनाया दृष्टमूलकत्वात् । एतेन सप्तग्रहाणां सप्ताकाशास्तदुपरि भचक्राकाशस्तदुपर्यप्याकाशोऽस्ति राशिसंज्ञः । स च नक्षत्रघटिषष्ट्या नियतपश्चिमगत्यैकवारं भ्रमति । तद्भ्रमणेनैव भचक्राकाशः शन्यादिक्षा- स्थानीयाः सजीवाः सावयवाः परस्परसंलग्ना आकाशाश्च पश्चिमाभिमुखं भ्रमन्ति । शन्याद्याकाशास्तु स्वशक्त्या पूर्वस्यां यान्ति । काचविमलमणिवन्निर्मलसचेतने सावयवे भूताद्यावेशवति स्वस्वकाशाधिष्ठिता नक्षत्रग्रहा भूदृष्ठस्थैः सम्यगेव दृश्यन्ते । यथा रत्न- घटमध्यस्थोऽपि दीपो दूरस्थैर्यथावस्थित एवावलोक्यते । खस्था गोलाकारा विशिष्टशक्ति- मन्तो भूमिवन्निराधारा जीवविशेषा एवाऽऽकाशशब्देनोच्यन्ते । तैराकाशैरेव मण्यादि- वत्स्वाधिष्ठितो निर्गतिकोऽपि ग्रह इतस्ततो नीयते । आकाशगतिरेव तत्स्थग्रहगतिरिति लोकैरुपचर्यते । कदलीपुष्पपुटवच्च तेषामाकाशानां संलग्नतेति यवनमतमपास्तम् । स्यादेतत् । नक्षत्रग्रहाणामुदयास्तदर्शनोपपत्त्यर्थं पश्चिमदिगभिमुखनियतगतिप्रवहवायोः कल्पनागौरवं किंतूक्तोपपत्त्यर्थं लाघवादभूमेरेव नियतपूर्वगतिः षष्टिनक्षत्रघटीनिष्पन्नपरि- वर्तनरूपा कल्प्यतां भपञ्जरस्तु स्थिर एव । विरुद्धभानं च नौस्थो विलोमगमनादचलं यथा च ना मन्यते चलति नैवमिला भ्रमेण । लङ्कासमापरगतिप्रचलङ्कचक्रमाभाति सुस्थिरमपीति वदन्ति केचिदिति सिद्धान्तशेखरे निरस्तमिति चेन्न । यदि च भ्रमति क्ष्मा तदा स्वकुलायं कथमाप्नुयुः खगाः । इषवोऽभिनभः समुज्झिता निपतन्तः स्युरपांपतेर्दिशि । पूर्वाशाभिमुखे भ्रमे भुवो वरुणाशाभिमुखो व्रजेद्धनः । अथ मन्दगमात्तदा भवेत्कथमेकेन दिवा परिभ्रमः । इत्यनेन लल्लेन । यद्येवमम्बरचरा विहगाः स्वनोडमासादयन्ति न खलु भ्रमणे धरित्र्याः । किंचाऽम्बुदा अपि न भूरिपयोमुचः स्युर्देशस्य पूर्वगमनेन चिराय हन्त । भूगोलवेगजनितेन समीरणेन केत्वादयोऽप्यपरदिग्गतयः सदा स्युः । प्रासादभूघरशिरांस्यपि संपतन्ति तस्माद्- भ्रमत्युडुगणस्त्वचलाऽचलैवेत्यनेन श्रीपतिना च तत्पक्षनिरासात् । भचक्रं ध्रुवयोर्बद्धमाक्षिप्तं प्रवहानिलैः । पर्यत्यजस्रं तन्नाधो ग्रहकक्षा यथाक्रममिति सूर्यसिद्धान्तोक्तेश्च ॥३॥ केदारदत्तः—वायु के विशेष नामों के व्याख्यान के साथ वायु के भेद बताये जा रहे हैं— सौरमण्डल के भीतर गोलाकार पृथिवी के ऊपर सात प्रकार के पवन (वायु) भी निरन्तर भूमण्डल के ऊपर आकाश में अपनी गतियों से प्रवाहित होते हैं या प्रचलन कर रहे हैं । जिनमें प्रथमादिक वायु गोलों के नाम इस प्रकार से हैं ।

मध्यगतिवासना ११५ १. भूवायुगोल जिसे आवह कहते हैं और वह जो भूपरिधि के साथ क्रियाशील है, अर्थात् यह वायु पृथ्वी के सभी पूर्वापरादि दशों दिशाओं में प्रगतिशील हैं। २. भू वायु गोल के ऊपर दूसरा प्रवह नामक गोल में प्रवह वायु चलता है। ३. प्रवह वायु गोल के ऊपर उद्वह संज्ञक वायु गोल है। ४. उद्वह संज्ञक वायु गोल के ऊपर में संवह संज्ञक वायु गोल है। ५. संवह संज्ञक वायु गोल के ऊपर 'सुवहं' संज्ञक वायु गोल है। ६. 'सुबह' संज्ञक वायु गोल के ऊपर परिवह संज्ञक वायु गोल है। ७. परिवह संज्ञक वायु गोल के ऊपर परावह संज्ञक वायु गोल हैं। पृथ्वी से नियत स्थानीय परावह वायु संज्ञक गोल के ऊपर में वायु का अभाव होने से तदुपरि के समीपग चन्द्र बिम्ब में वायु का अभाव स्वयं सिद्ध होता है ॥१॥ भूमि के ऊपर १२ योजन लगभग भूपृष्ठ से ६० मील ऊपर में की दूरी पर भूवायु गोल मण्डल में सजल मेघ, विद्युत, इन्द्र धनुष, गन्धर्व नगर आदि पदार्थ रहते हैं। भूवायुगोल मण्डल के ऊपर प्रवह वायु मण्डल है और इस प्रवह वायु मण्डल का नित्य पृथ्वी के चारों तरफ प्रत्यक् गमन (पश्चिमाऽभिमुख) पश्चिम भ्रमण होता है। प्रवह वायु की गति एक रूपा स्थिरात्मिका मध्यमागति होती है ॥२॥ नक्षत्र और ग्रहों से युक्त यह भचक्र नित्य प्रवह वायु के वेग से पूर्व से पश्चिमाभि- मुख भ्रमण करता रहता है। अपनी-अपनी कक्षाओं में स्थित सूर्यादि सात ग्रहों के साथ अनन्त संख्यक नक्षत्रों में प्रसिद्ध अश्विनी से रेवती तक २७ नक्षत्रों के साथ यह भचक्र प्रतिक्षण प्रवह वायु के वेग से भ्रमण करता देखा जाता है। इस भचक्रमें २७ नक्षत्रों में किसी भी नक्षत्र की स्वयं की गति सत्ता नहीं है। गति शून्यता के कारण इन तारकापुञ्जों की संज्ञा नक्षत्र संज्ञा कही गई है। तथा इस भचक्र स्थित प्रवह वायु की गति के साथ स्वयं की गति से गमन शील होने से प्रत्येक ग्रह अपनी कक्षा में प्रतिक्षण विलक्षण गति के साथ पूर्वाभि- मुख गमन करता है ॥३॥ इदानीं ग्रहाणां पूर्वगतिमनुपलक्षितामपि दृष्टान्तेन दृढीकुर्वन्नाह— यान्तो भचक्रे लघुपूूर्वगत्या खेटास्तु तस्यापरशीघ्रगत्या । कुलालचक्रभ्रमिवामगत्या यान्तो न कीटा इव भान्ति यान्तः ॥४॥ वा० भा०—स्पष्टम् ॥४॥ मरीचिः—अथाश्विनीस्थग्रहस्य कालान्तरे भरण्यादिस्थत्वदर्शनान्यथानुपपत्त्या ततो- ऽपराशाभिमुखं भपञ्जर इत्यादिनाेक्तग्रहपूर्वगतिरसङ्गता प्रत्यक्षत्वाभावादित्यतस्तामुपजाति- कया द्रढयति—यान्त इति। खेटा ग्रहास्तस्य भपञ्जरस्यापरशीघ्रगत्या पश्चिमदिगभि-

११६ गोलाध्याये मुखप्रवहवायुप्रेरितद्रुततरगत्या । षष्टिनक्षत्रघटीसंबन्धिचक्रपरिवर्तरूपया स्वस्वकक्षायोजन- मितप्रदेशात्मिकया यान्तो गच्छन्तः प्रत्यक्षोपलब्धा भचक्रे । भपञ्जरपरिधिविशेषरूपक्रान्ति- वृत्तात्मके लघुपूर्वगत्या, अपरदिगभिमुखप्रवहवायुजनितकक्षायोजनमितगतेरतिन्यूनभूतया पूर्वगत्या क्रान्तिवृत्तैकदेशप्रदेशेन यान्तो गच्छन्तोऽपि न भान्ति । पूर्वदिगभिमुखगमन- कर्माश्रया ग्रहा इति प्रतीतिः प्रत्यक्षतो लोकानां न भवतीत्यर्थः । पश्चिमपूर्वगत्योस्तुल्यत्वे ग्रहाणां चलनानुपपत्तेः । पूर्वगतेराधिक्यत्वे तु पूर्वगमनस्य प्रत्यक्षत्वापत्त्या पश्चिमगमनस्या- प्रत्यक्षत्वापत्तिरतो न्यूनगतेरभावात्पूर्वगतिः प्रत्यक्षतो न दृश्यत इति भावः । तुकारान्न- क्षत्राणां पूर्वगतिर्ग्रहवन्नास्तीति सूचितम् । ननु ग्रहाणां पश्चिमगतिः प्रवहवायुकृता पूर्वगतिस्तु किंप्रयुक्तेति चेन्न । तस्यापरशीघ्रगत्येत्यत्र तस्येत्यनेन परसंबन्धोक्तिवल्लघुपूर्व- गत्येत्यत्र परसंबन्धानुक्त्या स्वत एव ग्रहाणां पूर्वगतेः सद्भावात् । न च स्वशक्त्यैव नक्षत्र- ग्रहाः पश्चिमाभिमुखं यान्ति । पूर्वस्मिन्प्रवहवायुना तस्य पूर्वाभिमुखगमनकल्पनादिति वाच्यम् । भपञ्जरस्थानेऽपि प्रवहवायोः सत्त्वान्नक्षत्राणामपि ग्रहवत्पूर्वगत्युपलम्भ- प्रसङ्गात् । भपञ्जरान्तरिक्षावस्थानार्थं वायुकल्पनास्याऽऽवश्यकत्वाच्च । आधारगमनोप- जीव्ययोर्वाय्वोः कल्पने तु गौरवात् । ग्रहाणां पूर्वगतेस्तुल्यत्वापत्तेश्च प्रवहः पश्चिमो वायुरिति लघुवसिष्ठसिद्धान्ताद्युक्तेश्च । यद्यपि भपञ्जराद्यो ग्रहाणा कक्षाक्रमेण स्वस्वआकाशे गोलेऽवस्थानादन्तरिक्षे पूर्वगमनसंभवाद्भूचक्रे लघुपूर्वगत्या यान्त इत्युक्तमसंगतं तथाऽपि स्वस्वआकाशगोले पूर्वस्मिन्नाकाशमार्गे गच्छन्तोऽपि ग्रहाः कियच्चलिता इति प्रश्नोत्तरं गतिसंख्यज्ञानरूपं स्वस्वमार्गेण शक्यमतः पूर्वबिम्बावस्थानसमसूत्रेण भपञ्जरे यत्स्थानं चलितबिम्बस्थानसमसूत्रेण यत्रावस्थानं तयोरन्तरसूत्रेण क्रान्तिवृत्तैकदेशेन गतिज्ञानसंभवात्प्रवहवायुसंबन्धेन समसूत्रेण ग्रहावस्थानं भचक्रे युक्तमत एव कक्षावृत्तं क्रान्तिवृत्तानुकारमित्युक्तं युज्यते । ननु वस्तुता ग्रहाः पूर्वस्मिन्शक्त्या यान्ति तर्ह्यवश्यं तत्पूर्वगमनस्य प्रतिक्षणं दर्शनापत्तिः । पश्चिमतोऽधिकमात्रेणैव दर्शनविशेषादित्यत आह— कुलालचक्रभ्रमिवामगत्येति । इवशब्दो दृष्टान्तद्योतकः । तेन यथा कुलालो घटनिर्मापकः । तस्य यद्धटोत्पादकं चक्रं कीलस्थितमध्यकमन्तरिक्षस्थं सिद्धम् । तस्य या दण्डजनितो भ्रमो भ्रमणं यद्दिगभिमुखं तद्भ्रमात्तद्विपरीतदिगभिमुखा या गतिश्चक्रपरिध्यंशरूपा तया यान्तः स्वव्यापाराद्गच्छन्तः कीटाः पिपीलिकादयोऽणुरूपा जन्तुविशेषा नो भान्ति । स्वव्यापाराद्- गच्छन्तीति न प्रतिभाति । किंतु चक्रमनुकारमेव गच्छन्तीति भान्ति तद्वद्ग्रहा अपि पूर्वदिशि स्वशक्त्या गच्छन्तोऽपि प्रवहप्राबल्यात्पश्चिमदिश्येव गच्छन्तीति भान्तीत्यर्थः । किमत्र मानमिति चेन्न । कुलालचक्रे भ्रमप्राग्भावाद् यत्र कीटस्थानं तत्र चिह्नं कृत्वा भ्रमविरतौ कीटदर्शनं तत्रैव न भवति । किंतु भ्रमविपरीतदिशि तच्चिह्नात्कियताऽन्तरेण भवतीति प्रत्यक्षप्रमाणात् । ननु ग्रहाणां पूर्वगतिकल्पने गौरवम् । लाघवात्प्रवहवायुकृत- पश्चिमदिगभिमुखप्रत्यक्षसिद्धग्रहक्रमेणैवाश्विन्यादिस्थस्य भरण्यादिस्थत्वापत्तेः । तथा हि । भपञ्जरस्य प्रवहवायुना षष्टिनक्षत्रघटीभिः परिवर्तस्ततोऽधस्ताच्छनिबिम्बं गुरु तेन

"? Wait, could syllable 7 be 'हा'? But then where is 'ह'? Wait, is 'प्र' syllable 5, 'व' syllable 6? Wait, what if 'प्र' is NOT syllable 5? "भवलये" = 4 syllables: भ-व-ल-ये. Wait, "प्रवहानिलवेगतो": प्र (5) व (6) हा (7) नि (8) ल (9) वे (10) ग (11) तो (12) YES! Exactly 12 syllables: 1: भ 2: व 3: ल 4: ये 5: प्र 6: व 7: हा 8: नि 9: ल 10: वे 11: ग 12: तो THAT IS 12 SYLLABLES! Let's check syllable 7: it is "हा"! Syllable 8: it is "नि"! Syllable 9: it is "ल"! So it IS "हा" and "नि" and "ल"! Wait, why did I wonder if there was 'ह'? Syllable 7 IS "हा"! Wait, does it have 'हा'? Look at the printed text: प्र, व, ह, ा, नि... Wait, look at line 5: भ व ल ये प्र व ह ा Wait, look at the character after व:

११८ गोलाध्याये रागणस्य च प्रत्येकतारकास्वन्योन्यं व्यवधानतारतम्याभावेऽपि लघुत्वपृथुत्वोपलम्भेन तल्लोकनिवासिनामपि समशरीरत्वमशक्यनिर्वचमेवेति । अन्ये तु विवादास्पद‌मर्कमण्डल- मुपष्टम्भकशून्यमभिभूतगुणानधिकरणत्वादीपवत् । यन्नैवं तन्नैवं यथा सुवर्णमिति व्याप्ते- र्व्यतिरेकीयत्वम् । अभिभूतरूपस्पर्शाद्यधिकरणत्वादिति हेतुः । आदिपदग्राह्यं चन्द्रवत्त्वं करकादौ व्यभिचारवारकम् । अन्यथा तत्रानभिभूतरूपस्पर्शयोः सत्त्वेनोपष्टम्भकशून्य- त्वाभावेन व्यभिचारापत्तिरिति । तन्न । हेतोरसिद्धेः । आदिपदाग्राह्यद्रवत्वघटितस्य हेतो- र्दृष्टान्तदीपेऽभावाच्च । न प्रकृतहेतोः करकायामभावेन व्यभिचारः । तत्र द्रवत्वस्य शीत- प्रतिबन्धकत्वेऽप्यनभिभवादिति वाच्यम् । अभिभवो हि न सजातीयसाक्षात्कारग्रहणकृतम- ग्रहणम् । किंतु

" is not there, it's: दा - वा - ? - दौ. Wait, look at the letter between वा and दौ: It is: an avagraha? No, it's above the line! Wait, on the baseline: दा वा दौ! Three letters: दा, वा, दौ! Above 'वा', there is a circle with a dot, or a candrabindu? Wait! In line 11: "अन्यथा दावादौ" - wait, look above 'वा': it's a smudge or candrabindu? Yes, it's a smudge/defect on "दावादौ"! Now look at line 14 again: "पातापमा..." Wait, let's look at the letter after 'मा': Is it 'च'? Or 'द्य'? Wait! Look at the letter: It has a top bar. Underneath, there is a shape. Wait, could it be "पातापमाद्य"? Wait, look at "द्य" in "नाऽऽद्यः" (line 5): In "नाऽऽद्यः", 'द्य': the top part is 'द', the bottom part is 'य'. In line 14: the top part is flat-ish, then curves down... wait, it's 'द्य'! Wait, why did I think it might be 'च'? Because the left curve of 'द' looks like the left curve of 'च', but at the bottom it goes right and then down

१२० गोलाध्याये त्वेकैकक्षणविलम्बेन स्थिरशकटातिक्रमकालेन तदर्धभोग एव स्यात्पूर्वेण द्विगुणेन वा सर्वभोगः स्यात् । तच्च सर्वथाऽप्यसंभवि । क्वापि कदाऽपि तथोपलम्भाभावात् । तथा चैतद्दृष्टान्तेन प्रकृतापादितानिष्टप्रसङ्गादिनाऽनुमानस्य परास्तत्वात् । ग्रहचारेऽप्येतत्तुल्यमेवेत्येकदैवानेक- दिग्गमनं तथोपलम्भात्संगच्छत एवेति । ननु याम्योत्तरगतौ नीचोच्चगतौ वा संमिश्रदिग्द्वय- गमनमेकसमयावच्छेदेनानुपपन्नमेव । अन्यथाऽयोध्यामनुयातुः सममेवान्याकृष्टस्य विन्ध्याद्रि- देवीस्थानगामितापत्तेः । अथ वृक्षारोहणावरोहणस्थले चलतः पक्षिकुलस्य समकालमेव प्रागुच्चादिगमनमुत्तरतः प्रेर्यमाणशरस्य च समीरणप्रयुक्तावलम्बेन प्रागादिगमनमुभयाकर्षक- शक्तितारतम्येनोपलभ्यत एवेति नानुपपत्तिरिति चेन्न । तस्यापि सूक्ष्मक्षणानुसारेण क्रमा- नुमानेनैवोपपादनार्थापत्तेरनुपपद्यमानार्थदर्शने चोपपादकान्तरमात्रविषयकत्वेनैवावताराद- न्यथाप्रतीतार्थस्यानिर्वाहादिति चेत्सत्यम् । सत्यामनुपपत्तौ किलार्थापत्तिरनुसरणीया । प्रकृते तस्या एवानुपपत्तिः । तथा हि । प्रागपरभावेनोपस्थितयोः पादपसरोवरयोः फल- जलोपादित्सया यथाकाममारोहावरोहविधिनोड्डीयचलने पारावतादेरेकसमयावच्छेदेनैवो- भयत्र गमनप्रसिद्धावपि तदनङ्गीकारपरस्यानुपलक्ष्यसूक्ष्मक्षणभ्रमेणाऽऽकुलचित्तस्य भवतोऽ- भिमते बलवतः प्रागुपपादितस्यैवानिष्टप्रसङ्गस्य बाधकत्वात् । तद्यथा । सरस्तीरपादपयो- रन्तरं सूत्रादिना संधाय तच्च करादिभिर्विगणय्य तदनुसारमेव तावन्मितसंसाधितदारु- संघारणे तत्र चोड्डीनावसरे तदतिक्रमकालेनैव पानीयफ(प)लदशकोन्मितेनैव पुनः केवलं प्रागपरत्वेनापि तस्य संस्थितावतिक्रमो न स्यात् । पूर्वत्रैकैकक्षणविलम्बेन तदर्धभोगकाला- सन्नकालेनैव तदतिक्रमसंभवात् । एवं याम्योद्गतावपि । केवलयाम्योत्तरस्थितप्रयोक्तुलक्ष्य- स्थानान्तरातिक्रमकालेन क्षितिजवृत्तोपगतत्वेन समानान्तरत्वेऽपि शरस्य स्वनिपातं स्थाना- न्तरातिक्रमो न स्यात् । पूर्ववत्समीकरणप्रयुक्तैकैकक्षणविलम्बेन तावत्त्वानुपपत्तेरिति । तस्माद्ग्रहाणामनेकदिग्गतिमत्त्वं युक्तम् । स्यादेतत् । परं भपञ्जरस्य मूर्तत्वेन ग्रहबिम्बा- पेक्षयाऽतिमहत्त्वेनातिगुरुत्वाधिक्यात् । तद्भ्रमण

यनारम्भे" -> क-दा-चि-द-न्य-दि-ङ्न-य-ना-र-म्भे Wait, "दिङ्नयनारम्भे" or "दिङ्नयनारम्भे"? दिश् + नयन = दिङ्नयन (carrying to another direction). Letters: दि, ङ्न (ङ with conjunct न: ङ्न), य, न, ना, र, म्भे. Yes, दिङ्नयनारम्भे! Next: नियामकैरिच्छावशादायसनिर्मितहलप्रक्षेपेण (niyāmakair icchā-vaśād āyasa-nirmita-hala-prakṣepeṇa) - using an iron anchor/plough.

Let's check line 23: "तरिस्थिरीकरणे वेगप्रतिबन्धादेव नयनासामर्थ्यम् । यत्र चाऽऽधाराधेयभावस्थले बलाहकादा-" Line 24 start: "वरुन्धतीवसिष्ठादौ चासमानयोरपि साम्येनैव प्रचालनस्यादृष्टत्वाद्वेगप्रतिबन्धासमर्थत्वमेव ।" Look at line 23 end: "बलाहकादा-" Line 24 start: "वरुन्धती..." Together: बलाहकादावरुन्धती... = बलाहकादौ + अरुन्धती... = बलाहकादावरुन्धतीव

१२२ गोलाध्याये स्वरूपस्यापि तदाधेयत्वम् । अन्यथा वेगवज्जलाकृष्टत्वेन शिलाया अप्याधेयत्वापत्तिः । तादृशस्थले चाऽऽधारत्वप्रत्ययः पतनशीलताधर्ममुपादायोपपादनीयः । प्रयोगत्वौपचारिक एव । तस्माद्वाय्वाधेयस्वरूपयोग्यस्य सकलभपञ्जरस्य समवेगवदाधारवत्त्वेनैव नावलम्बः । आधाराधेयभावो मे जयत्वाच्चन्द्रतारकम् । सुहृदस्य बले दृप्तः को मामपकरिष्यतीत्याहु- स्तच्चिन्त्यम् । वायोर्ग्रहबिम्बाधारत्वे तत्पूर्वगत्यङ्गीकारेण पूर्वाधारवाय्वंशस्याग्रे गमनात्त- त्साहचर्येण ग्रहबिम्बानां भ्रमणसंभवादवलम्बनापत्तेः । विरलावयवेऽवलम्बनाभावस्यादृष्ट- त्वाच्च । किंच भस्त्रादिप्रयुक्तवायुवत्प्रवहवायावाधारत्वं नातिरिक्तं मानाभावान्तेन तस्यापि नायकत्वमात्रत्वग्रहबिम्बानामबलम्बननिवारणं ब्रह्मणोऽप्यशक्यम् । अपि च प्रवहवायौ सर्वांश- त्वावच्छेदेन समवेगकक्षाणां तुल्यकालभ्रमणानुपपत्तिः । तथा हि । शनिकक्षास्थितवाय्वं- शानां यथावेगस्तत्तुल्य एव यदि चन्द्रकक्षास्थितवाय्वंशानां वेगस्तदा चन्द्रकक्षावाय्वंशानां स्वल्पचन्द्रकक्षाभ्रमणकालेन तत्समसूत्रस्थशनिकक्षावाय्वंशानां महति शनिकक्षामार्गे चन्द्रक- क्षायोजनभ्रमणात्संपूर्णाशनिकक्षायोजनभ्रमणमनुपपन्नम् । तस्मात्प्रवहवाय्वंशानां स्वस्वमार्गे तुल्यकाले परिवर्तनसंभवादतुल्य एव वेगः । परमेककक्षास्थानां तुल्य एव । अत एव क्व- चिज्जलादौ गुरुल्घ्वोस्तुल्यगमनं क्रमेणाल्पमहद्वेगेन न तुल्यवेगेन । यत्रैकत्र गुरुल्घ्वस्थानेन गमनं तत्र गुर्वाश्रयादेव लघोरनग्रे गमनम् । तस्मादवलम्बनं ग्रहाणां त्वत्पक्षे निवारितुमश- क्यमेवेति दिक् । वस्तुतस्तु चन्द्रातिरिक्तग्रहनक्षत्रबिम्बानां तैजसत्वेऽधःकक्षाक्रमेण गुरुतो- धिक्यादवलम्बनापत्तिः । सूर्यव्यतिरिक्तानां व्यवधानादुष्णस्पर्शानुपलम्भेऽपि रात्रौ सकल- नक्षत्रग्रहबिम्बतेजःसंघातेनोष्णस्पर्शोपलम्भापत्तिः । सूर्यबिम्बापेक्षया गुरुशन्यादिबिम्बाना- मतिमहत्त्वात् । रात्रेपि प्रकाशप्राबल्यसंभवेन दिनत्वापत्तिश्चातोऽकरिक्तानां जलमयत्वं प्राचीनाभ्युपगतं युक्तम् । शृङ्गोन्नत्युपपत्त्यर्थं चन्द्रस्य जलगोलत्वाभ्युपगमस्याऽऽवश्यकतया तद्रीत्यैवान्येषां पञ्चताराग्रहनक्षत्राणां जलगोलत्वाभ्युपगमें बाधकाभावाच्च । जलस्य विरलावयवतया तत्पिण्डीभावानुपपत्त्या जलगोलकत्वं न संभवतीति भूभागानामुपष्टम्भ- कत्वं तत्र वाच्यम् । तेषां च प्रकाशकत्वं सूर्यकरप्रतिफलनादिति प्राग्बहुधोक्तम् । नचैवं भौमादिभ्यः शुक्रस्याधिकः प्रकाशः कुत इति वाच्यम् । तस्य भौमापेक्षयाऽतिसंनिहितत्वा- च्चन्द्रापेक्षया दूरस्थत्वाच्च महद्बिम्बत्वाच्च यथाक्रममधिकन्यूनप्रकाशाभाससंभवात् । बुधस्य तु चन्द्रादल्पबिम्बत्वादतिव्यवधानाच्चाल्पप्रकाशदर्शनम् । नन्वेवं चन्द्रबिम्बापेक्षया शुक्र- भौमादीनामधिकबिम्बत्वेन चाधिकगुरुत्वसंभवात्सुतरां चन्द्रबिम्बापेक्षयाऽवलम्बनापत्तिः । तैजसत्वे तु पूर्वगत्युपलम्भनेन यथायोग्यमवलम्बनम् । न च सूर्यमण्डले यावन्तो भूभागा उपष्टम्भकास्तावन्त एव भूजलयोः सर्वेषां बिम्बे भागा इति तुल्यगुरुत्वादवलम्बनानुपपत्ति- रिति वाच्यम् । योजनात्मकमानेन बिम्बानां तुल्यमानत्वापत्तेः । न चाऽऽदर्शकारमण्डलेषु समगुरुत्वेऽपि दृढविरलावयवतयाऽल्पमहन्मानोपपत्तिरिति वाच्यम् । ग्रहबिम्बानां गोलत्वेन तदसंभवादिति चेत्सत्यम् । भपञ्जरगोलोऽतिगुरुभूतः प्रवहवायुना बाह्याभ्यन्तरघातप्राबल्या- द्येन कालेन भ्रमति तेनैव कालेन शन्यादयोऽधःकक्षाक्रमेणापचितगुरुत्ववन्तः स्वस्वकक्षास्थि-