सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
पृष्ठ 675, कुल 723 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रश्नाध्यायः ५७३ भवतीति भावः ॥ एवं च ज्ञाताक्षांशपुरादभीष्टपुरयोजनान्तरज्ञाने । ज्ञाताक्षांश- पुराद्दृङ्मण्डलसंन्निवेशादिनाऽभीष्टपुराक्षांशज्ञानं प्रश्नार्थः ॥ एतदुत्तरं गोलयुक्त्येति सूचितम् ॥२५, २६, २७॥ केदारदत्तः—देशविशेष में पलांश (अक्षांश) ज्ञान— उज्जयिनी से भूपरिधि के चतुर्थांश में जो नगर प्राग्दिशा में है, तथा उज्जयिनी से भूपरिधि चतुर्थांश में जो नगर पश्चिम में है, तथा उस नगर से भगवान् शङ्कर की ईशान दिशा में जो नगर है, तथा उज्जयिनी से नैर्ऋत्य दिशा में जो नगर है, उन उन नगरों का अक्षांश मान क्या है ? हे गोलक्षेत्रज्ञान में विचक्षण गणितज्ञ ! क्षणमात्र में चित्त में चिन्तना करके शीघ्र बताओ । उद्दिष्ट नगर की दिग्ज्या को पलभा से गुणा कर एकत्र त्रिज्या से, अन्यत्र १२ से भाग देने पर, अपसार योजन के भुज और कोटिज्या का ज्ञान हो जाता है । दक्षिण दिशा में दोनों का अन्तर उत्तर दिशा में दोनों का योग, भूचतुर्थांश से अधिक अपसार योजन में व्यस्त संस्कार से अक्षांशज्ञान हो जाता है । जैसे—उज्जयिनी खमध्य से पूर्व में ९० अंश की दूरी पर— अपसार योजन = ९०° की ज्या = ३४३८ कोटिज्या = ० दिग्ज्या × दोर्ज्या = ०, कोटिज्या × पलभा = ० अतः दिग्ज्या × दोर्ज्या कोटिज्या × पलभा ───────────── = ० तथा ──────────────── = ० ३४३८ १२ योग वियोग = ० ± ० = ० ० × १२ ───────── = ० अत एव उज्जैन से पूर्वदिशा ९०° की दूरी पर यमकोटि का प.क अक्षांश = ० . दूसरे प्रश्न में भी अक्षांश = ० होने से लङ्का अर्थात् विषुवद्वृत्तधरातलगत यम- कोटि से पश्चिमस्थ नगर में भी अक्षांश मान = ० शून्य होता है । तृतीय प्रश्न में— दिग्ज्या = २४३१ को अपसार योजन की भुजज्या = त्रिज्या से गुणा और भाग देने २४३१ × ३४३८ पर ───────────── = २४३१ ३४३८ दोर्ज्या × १ तथा निरक्ष देश में पलभा = ० × ─────────── = ० १२ दोनों का योग = ० + २४३१ = २४३१ का चाप = ४५ = अक्षांश, पलभा = १२ तथा पलकर्ण १६।५८।१४ ।