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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ
५५४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ चतुर्थ परिच्छेद

यत्तु कैश्चिद् द्वैतिभिरुच्यते—भेदस्य पारमार्थिकत्वेन मुक्तौ जीवस्येश्वरभावाभावेऽपि तत्रापीश्वर इव पृथगपहतपाप्मत्वादिगुणसम्भवादविरोध इति, तत्तूच्छम्, तथा सति जीवस्यापहतपाप्मत्वादिकमस्तीति न तस्य ब्रह्मलिङ्गत्वमिति शङ्कापरिहारालाभेन ‘उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु’ इति सूत्रविरोधात् । ‘ब्राह्मेण जैमिनिः’ इति सूत्रे जीवगतस्यापहतपाप्मत्वादेः, ‘उपन्यासादिभ्यः’ इत्यत्रादिशब्दार्थत्वेन परेषामप्यभिमतस्य ‘जक्षन् क्रीडन् रममाणः’ इत्यादिश्रुत्युदितस्य जक्षणादेश्च ब्राह्मत्वनिर्देशविरो-

* और कुछ द्वैतवादियोंने कहा है कि भेद पारमार्थिक है, इसलिए यद्यपि जीवका ईश्वरभाव नहीं हो सकता है, तथापि मुक्त जीवमें ईश्वरके समान अलग अपहतपाप्मत्व आदि गुणोंकी अवस्थिति हो सकती है, अतः कोई विरोध नहीं है, परन्तु यह पक्ष अत्यन्त तुच्छ है, क्योंकि ऐसा माननेपर जीवमें अपहतपाप्मत्व आदि गुण रह सकते हैं, इसलिए वह गुणाष्टक ब्रह्मका बोध करानेमें लिङ्ग नहीं हो सकेगा, अतः शङ्काके समाधानका † लाभ न होनेके कारण ‘उत्तराच्चेत्’ इत्यादि सूत्रके साथ विरोध होगा, तथा ‘ब्राह्मेण जैमिनिः’ इस सूत्रमें जीवगत अपहतपाप्मत्व आदिकी और ‘उपन्यासादिभ्यः’ इसमें स्थित आदिशब्दके अर्थरूपसे दूसरों का भी अभिमत ‘जक्षन् क्रीडन्’ इत्यादि श्रुतिमें कथित जक्षण आदिकी ब्रह्मसम्बन्धिताका निर्देश भी विरुद्ध होगा। जीव और ब्रह्मके भेदपक्षमें


* अब इस ग्रन्थसे यह बतलाना चाहते हैं कि सिद्धान्तीने कहा है कि मुक्त पुरुषोंके अपहतपाप्मत्व आदि आठ गुण ईश्वरभावापत्ति के बिना नहीं हो सकते हैं, अतः मुक्त पुरुषकी ईश्वरभावापत्ति कहनी चाहिए, और पारमार्थिक जीवेश्वरभेदवादमें मुक्त पुरुषको लेकर कहे गये उक्त आठ गुणोंकी उपपत्ति नहीं हो सकती है, परन्तु इस विषयमें जीवेश्वरभेदका अवलम्बन करनेवाले कुछ लोग कहते हैं कि पारमार्थिक भेदवादमें भी श्रुति और सूत्रोंसे निरूपित आठ गुण ईश्वरभावापत्तिके बिना भी रह सकते हैं, इस मतके परिहारके लिए उक्त भेदवादियोंका अनुवाद करके खण्डन करते हैं।

† तात्पर्यार्थ यह है कि यदि ईश्वरमें रहनेवाले अपहतपाप्मत्व आदि की अपेक्षा जीवमें अलग ही अपहतपाप्मत्व आदि गुण माने जायें, तो ‘उत्तराच्चेत्’ इस सूत्रके अंशसे पूर्वमें जो शङ्का की गई थी—उसका ‘आविर्भूतस्वरूपस्तु’ इस अंशसे परिहार किया गया है, इस परिहार-भागसे यदि मुक्त जीवमें आठ गुणोंका आविर्भाव माना जाय, तो भी ठीकठीक परिहार नहीं होगा, क्योंकि मुक्त और ब्रह्मके भेदपक्षमें उक्त गुण जीवसाधारण होंगे, इससे ब्रह्मसाधारणत्वरूप ब्रह्म-लिङ्गकी प्राप्ति न होनेके कारण दहराकाशमें ईश्वरत्वके निर्णायक आठ गुण नहीं होंगे, यह भाव है।

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मुक्तके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहितं ५५५


धाच्च । भेदे तेषां गुणानां सत्यत्वेन 'चितितन्मात्रेण' इति सूत्रोक्तस्य मुक्तजीवानां चैतन्यमात्रत्वस्य 'एवमपि' इति सिद्धान्तसूत्रेऽङ्गीकारविरोधाच्च, 'सम्पद्याविर्भावः' इत्यधिकरणविरोधाच्च । तत्र हि 'स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते' इति श्रुतौ आगन्तुना केनचिद्रूपेणाभिनिष्पत्तिर्नोच्यते स्वेनशब्दवैयर्थ्यापत्तेः । येन रूपेण आगन्तुना स्वयमभिनिष्पद्यते तस्यात्मीयत्वस्याऽवक्तव्यत्वात् । तस्मादात्मवाचिश्वशब्दोपादानाद् नित्यसिद्धेन स्वस्वरूपेणैवाभिनिष्पत्तिर्विवक्षिता, न तु केनचिद्धर्मेणेति व्यवस्थापितम् ।

किञ्चेदमपहतपाप्मत्वादि जीवस्य मुक्तावागन्तुकं चेत्, 'सम्पद्याविर्भावः' इति मुक्तावागन्तुक रूपनिषेधेन 'पराभिध्यानात्तु तिरोहितम्' 'उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु' इत्यपहतपाप्मत्वादेर्बन्धमुक्तयोस्तिरोभावा-


उन गुणोंके सत्य होनेसे 'चितितन्मात्रेण' इस सूत्रमें कथित मुक्त जीवोंके चैतन्यमात्रत्वका जो 'एवमपि' इत्यादि सूत्रमें अङ्गीकार किया गया है, वह विरुद्ध होगा और सम्पद्याविर्भावः' * इस अधिकरणके साथ भी विरोध होगा, क्योंकि सम्पद्याधिकरणमें आगन्तुक किसी धर्मसे अभिनिष्पत्ति नहीं कही जा सकती है, क्योंकि वैसा माननेसे 'स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते' इस श्रुतिमें उक्त स्वेनशब्दके साथ विरोध होगा, कारण कि जिस आगन्तुक स्वरूपसे अपने आप अभिव्यक्त होता है, उसमें आत्मीयत्व नहीं रह सकता, इससे आत्माके वाचक स्वशब्दका श्रुतिमें उपादान होनेसे नित्यसिद्ध स्वरूपसे ही अभिनिष्पत्ति विवक्षित है, आगन्तुक किसी धर्मसे नहीं, ऐसा व्यवस्थापन किया गया है ।

किञ्च, यदि अपहतपाप्मत्व आदि धर्म मुक्तिमें जीवके आगन्तुक माने जायेंगे तो 'सम्पद्याविर्भावः' इससे मुक्तिमें आगन्तुक धर्मोंके निषेधसे 'पराभिध्यानात्तु तिरोहितम्' 'उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु' इत्यादि सूत्रोंसे अपहतपाप्मत्वादिका बन्ध और मुक्तिमें क्रमशः तिरोभाव और आविर्भावके


* किञ्च, अपहतपाप्मत्व आदि आठ गुण मुक्तिमें उत्पन्न होते हैं अथवा स्वतःसिद्ध ही हैं, इस प्रकारके दो विकल्प करके प्रथम विकल्पके समाधानपूर्वक द्वितीयका इस ग्रन्थसे एक प्रकारसे शेष रखते हैं, यह भाव है ।

५५६ | सिद्धान्तलेशसंग्रहे | [ चतुर्थ परिच्छेद

विर्भावप्रतिपादनेन च विरोधः स्यादिति नित्यसिद्धं वाच्यमिति बन्धस्य मिथ्यात्वं दुर्वारम्, नित्यसिद्धमपहतपाप्मत्वं हि सर्वदा पाप्मरहितत्वम् । न च वस्तुतः सर्वदा पाप्मरहिते पाप्मसम्बन्धः, तन्मूलककर्तृत्वभोक्तृत्वसम्बन्धो वा पारमार्थिकः सम्भवति । एवं च जीवस्येश्वराभेदोऽपि दुर्वारः, श्रुतिबोध्यतदभेदविरोधिबन्धस्य सत्यत्वाभावात् । अन्यथा संसारिणि नित्यसिद्धसत्यसङ्कल्पतिरोधानोक्त्ययोगाच्च । नहि जीवस्य संसारदशायाम-


प्रतिपादनसे विरोध होगा, इससे अपहतपाप्मत्व आदिको नित्यसिद्ध मानना चाहिए, इससे बन्धका मिथ्यात्व दुर्वार है । क्योंकि नित्यसिद्ध अपहतपाप्मत्व—सर्वदा पाप्मसम्बन्धसे रहितत्वरूप ही है । अतः वास्तविक पापसम्बन्धसे जो रहित है, उसमें पापका सम्बन्ध हो ही नहीं सकता है, तथा पापसम्बन्धमूलक कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदिके सम्बन्ध भी नहीं रह सकते । बन्धके मिथ्या होनेपर जीवका ईश्वरके साथ अभेद भी दुर्वार है, क्योंकि * श्रुतिसे बोधित ब्रह्माभेदका विरोधी संसार सत्य नहीं हो सकता है। यदि संसारके मिथ्यात्वका अङ्गीकार न करके जीव और ब्रह्मका अभेद न माना जाय, तो नित्यसिद्ध सत्यसङ्कल्पत्व आदिका तिरोधान जो ‘पराभिध्यानात्’ इत्यादि सूत्रमें सूत्रकारने कहा है, वह अयुक्त हो जायगा, क्योंकि अन्य लोग भी जीवकी संसारदशामें एकाध अर्थको विषय करनेवाला एक


* यदि यहांपर शङ्का हो कि संसारके मिथ्यात्वके प्रतिपादनसे क्या लाभ है, क्योंकि उसके क्षय होनेपर भी जीव और ब्रह्मका अभेद बोधित हो सकता है । इस प्रकारके भास्करके मतको लेकर कहते हैं कि संसारको सत्य माननेपर परमात्मामें रहनेवाले नित्यमुक्तत्वका भी सत्यत्वरूपसे ही अङ्गीकार करना चाहिए, इससे परमार्थस्वरुप विरुद्ध धर्मोंसे आक्रान्त जीव और ब्रह्मका अग्नि और हिमके समान श्रुतिसे बोधित अभेद हो ही नहीं सकता है ।

† यदि शङ्का हो कि तिरोधानका प्रयोग कैसे हो सकता है ? तो इसपर कहना चाहिए कि जीवमें रहनेवाले नित्यसिद्ध सत्यसङ्कल्पत्वका तिरोधान ‘पराभिध्यानात्तु०’ इत्यादि सूत्रसे कहा जाता है। अथवा ईश्वरगत सत्यसङ्कल्पत्वका जीवके प्रति तिरोधान उक्त सूत्रसे कहा जाता है। इस प्रकारके दो विकल्प करके प्रथम विकल्पका इस ग्रन्थसे परिहार करते हैं, तात्पर्य यह है कि पूर्वपक्षी साधारण अर्थको विषय करनेवाले एक सत्यसङ्कल्पको भी तिरोहित नहीं मानता है, तो सब धर्मोंको विषय करनेवाले सत्यसङ्कल्पको कैसे मानेगा ?


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मुक्तिके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहिते ५५७


नुवर्तमानो यत्किञ्चिदर्थगोचरः कश्चिदस्त्यवितथसंकल्पस्तिरोहित इति परैरपीष्यते । किन्त्वीश्वरस्य यन्नित्यसिद्धं निरवग्रहं सत्यसङ्कल्पत्वम्, तदेव जीवस्य संसारदशायामीश्वराभेदानभिव्यक्त्या स्वकीयत्वेनाऽनवभासमानं तं प्रति तिरोहितमित्येव समर्थनीयमिति घट्टकुटीप्रभातवृत्तान्तः ।

नन्वपहतपाप्मत्वं न पाप्मविरहः, किन्तु पाप्महेतुकर्माचरणेऽपि पापोत्पत्तिप्रतिबन्धकशक्तियोगित्वमिति न तस्य नित्यसिद्धत्वेन बन्धस्य मिथ्यात्वप्रसङ्गः । एवं सत्यसङ्कल्पत्वमपि शक्तिरूपेण निर्वायमिति


सत्यसङ्कल्प तिरोहित है, ऐसा यदि नहीं मानते हैं, तो सर्वार्थको विषय करनेवाला सत्यसङ्कल्प तिरोहित है, ऐसा कैसे मान सकते हैं ? किन्तु ‡ ईश्वरका निरवद्य जो नित्यसिद्ध सत्यसङ्कल्पत्व है, उसीका, जीवकी संसारदशामें ईश्वरके साथ अभेदकी अनभिव्यक्तिसे अपने प्रति स्वसम्बन्धित्वेन अनवभासमान होकर उसके प्रति, तिरोधान होता है, ऐसा समर्थन करना होगा, इससे घट्टकुटीप्रभातवृत्तान्त ही प्रसक्त होगा ।

यदि शङ्का हो कि* पापसम्बन्धसे रहितत्व अपहतपाप्मत्व नहीं है, किन्तु पापके हेतुभूत कर्मोंका आचरण करनेपर भी पापकी उत्पत्तिमें प्रतिबन्धक-शक्तिसम्बन्धितारूप है, इसलिए उसके नित्यसिद्ध होनेपर भी संसारमें मिथ्यात्वकी प्रसक्ति नहीं हो सकती, इसी प्रकार शक्तिरूपसे† सत्यसङ्कल्पत्वकी भी व्याख्या करनी चाहिए, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उस प्रकारके


‡ यदि द्वितीय विकल्पका अङ्गीकार किया जाय, तो आखिरमें सिद्धान्तीका ही पक्ष मानना होगा, इससे पारमार्थिक भेद नहीं मान सकते हैं, यह भाव है ।

* इस ग्रन्थसे भेदवादी यह शङ्का करता है कि अपहतपाप्मत्वका परिष्कार हम ऐसा करते हैं कि जिससे संसार वास्तविक माना जाय, तो भी अपहतपाप्मत्वके साथ विरोध नहीं है ।

† क्लिद्य, निषिद्ध कर्मोंका आचरण करनेपर भी पापकी उत्पत्तिमें प्रतिबन्धकरूप जिस शक्तिकी तुम अपहतपाप्मशब्दके अर्थरूपसे कल्पना करते हो, उसकी क्या इसलिए कल्पना करते हो कि विद्याके उदयके पूर्वमें पापका प्रतिबन्ध हो, अथवा विद्याके बाद ? तुम्हारे मतमें होनेवाली मुक्तिके पूर्वमें पापका प्रतिबन्ध हो अथवा तुम्हारे मतके अनुसार मुक्तिके कालमें देह आदिके रहनेके कारण कदाचित् पापके हेतुभूत निषिद्ध कर्मोंका आचरण हो सकता है, अतः उसका प्रतिबन्ध हो ? इस प्रकारके तीन विकल्पोंका मनमें निश्चय करके क्रमशः इस ग्रन्थसे उन विकल्पोंका परिहार करते हैं ।

५५८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ चतुर्थ परिच्छेद

नेश्वरभेदप्रसङ्ग इति चेत्, मैवम् ; एवं शब्दार्थकल्पने प्रमाणाभावात् । नहि पापजननप्रतिबन्धिका शक्तिः संसाररूपपरिभ्रमणदशायां पापानुत्पत्त्यर्थं कल्पनीया, तदानीं तदुत्पत्तेरिष्टत्वात् । विद्योदयप्रभृति तु विद्यामाहात्म्यादेवाऽश्लेपः 'तदधिगम उत्तरपूर्वाघयोरश्लेपविनाशौ तद्व्यपदेशात्' ( उ० मी० अ० ४ पा० १ सू० १३ ) इति सूत्रेण दर्शितः । तत एव मुक्तावप्यश्लेप उपपद्यत इति व्यर्था शक्तिकल्पना । तस्मादुदाहृतश्रुतिसूत्रानुसारिभिर्मुक्तजीवानां यावत्सर्वमुक्ति वस्तुसच्चैतन्यमात्रत्वाविरोधिवद्धपुरुषाविद्याकृतनिरवग्रहैश्वर्यतदनुगुणगुणकलापविशिष्टनिरतिशयानन्दस्फुरण- समृद्धनिस्सन्धिबन्धपरमेश्वरभावापत्तिरादर्त्तव्येति सिद्धम् ॥ ५ ॥

विद्वद्गुरोर्विहितविश्वजिदध्वरस्य
श्रीसर्वतोमुखमहाव्रतयाजिसूनोः ।


अपहतपाप्मत्वका अर्थ करनेमें कोई प्रमाण नहीं है, क्योंकि * पापोत्पत्तिमें प्रतिबन्धक शक्तिकी संसाररूपके विद्यमानत्वकालमें पापके अनुत्पादके लिए कल्पना नहीं कर सकते हैं, कारण कि उस कालमें पापकी उत्पत्ति इष्ट ही है । और विद्याके उदित होनेपर तो विद्याके प्रभावसे ही पापका सम्बन्ध नहीं रहेगा, यह 'तदधिगम०' इत्यादि सूत्रसे स्पष्ट बतलाया गया है, इसीसे मुक्तिमें भी पापका असम्बन्ध हो सकता है, इसलिए शक्तिकी कल्पना व्यर्थ है । इससे उदाहृत श्रुति और सूत्रोंका अनुसरण करनेवालेको यह माननां चाहिए कि जब तक सब जीवोंकी मुक्ति न हो जाय, तब तक मुक्त जीवोंकी — वस्तुसत् चैतन्यमात्रत्वका विरोध न करनेवाले बद्ध पुरुषकी अविद्यासे सम्पादित निरवग्रह ऐश्वर्य और इस ऐश्वर्यके अनुकूल गुणसमूहसे युक्त निरतिशयानन्दके स्फुरणसे समृद्ध — परमेश्वरभावापत्ति है ॥५॥

अनेक विद्वानोंके गुरु, विश्वजित् आदि अनेक याग करनेवाले, श्रीसर्वतोमुखमहाव्रतयाजी आचार्य दीक्षितसे उत्पन्न, भगवान् शङ्करजीके परमभक्त श्रीरङ्ग-


* तत्त्वसाक्षात्कारके प्राप्त होनेसे विद्याके पूर्वकालमें रहनेवाले पापका विनाश होता है और विद्याके उत्तरकालमें होनेवाले पापसे भी सम्बन्ध नहीं होता है, क्योंकि विद्यासे पूर्वोत्तर पापोंका नाश होता है, श्रुति, स्मृति आदि प्रमाणोंसे सिद्ध है, यह 'तदधिगमे' इत्यादि सूत्रका अर्थ है।

मुक्तिके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५५९


श्रीरङ्गराजमखिनः श्रितचन्द्रमौले-
रस्त्यप्पदीक्षित इति प्रथितस्तनूजः ॥१॥

तन्त्राण्यधीत्य सकलानि सदाऽव्यदात-
व्याख्यानकौशलकलाविशदीकृतानि ।
आम्नायमूलमनुरुध्य च सम्प्रदायम्
सिद्धान्तभेदलवसङ्ग्रहमित्यकार्षीत् ॥२॥

सिद्धान्तरीतिषु मया भ्रमदूषितेन
स्यादन्यथाऽपि लिखितं यदि किञ्चिदस्य
संशोधने सहृदयाः सदया भवन्तु
सत्सम्प्रदायपरिशीलननिर्विशङ्काः ॥३॥

॥ इति पदवाक्यप्रमाणपारावारपारीणसर्वतन्त्रस्वतन्त्रश्रीमदप्पदीक्षितविरचिते
शास्त्रसिद्धान्तलेशसङ्ग्रहे चतुर्थः परिच्छेदः ॥


राजाध्वरीके पुत्र प्रसिद्ध विद्वान् अप्पदीक्षितने व्याख्यानकी कुशलकलाओंसे विस्तारित अनेक शास्त्रोंका अध्ययन कर और सदा वेदानुसारी सम्प्रदायका अनुसरण करके अद्वैतवेदान्तसिद्धान्तके पृथक्-पृथक् स्वरूपोंका संक्षेपसे संग्रह किया है ॥ १–२ ॥

यदि भ्रमवश सिद्धान्तोंकी रीतियोंमें मेरे द्वारा कुछ हेर-फेर हो गया हो, तो परिशुद्धसम्प्रदायके परिशीलनसे सन्देहरहित सहृदय पुरुष उसको शोधने की दया करें ॥ ३ ॥

श्रीसिद्धान्तलेशके वेदान्ताचार्यश्रीपं०मूलशङ्करव्यास-विरचित भाषानुवादमें चतुर्थ परिच्छेदका भाषानुवाद समाप्त॥


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