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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

छठी पुतली ६. ( ५१ )

छठी पुतली ६. ( ५१ )

बहुतही खुश हुआ, रातभर वहीं रहा. जब सुबह हुई तब सूर्य निकला जो कुछ अहवाल ब्राह्मणने कहाथा वह सब वहा देखकर वीरोंसे कहा-एक बात मेरे जीमें आती है. कि मेरे तईं ले जाकर इस खंभपर बिठलादो. और भगवानका ध्यानकर अपने स्थानको जाओ. तब वीरोंने उसे खंभ पर ले जाकर बिठा दिया और वे अपने मकानको गये. ज्यों ज्यों वह बढ़ने लगा त्यों त्यों राजा अपने दिलमें खौप करने लगा जितना सूर्यके नजदीक पहुँचताथा उतनाही गर्मीसे जला जाताथा। निदान सूर्यके निकट पहुंच जलकर अंगार होगया. जब खंभ बराबर रथके पहुंचा और रथवान्ने एक मुर्दा जला हुवा देखा तब अपने रथके घोडोंकी बाग खेंची. सूर्यने बैंककर देखा कि, खंभपर जला हुआ एक आदमी लग रहा. है. सूर्य त्राहि त्राहि कर बोले कि-यह साहस आदमीका नहीं. यह कोई योगी है या देवता या कोई गंधर्व. इस मुर्देके होते मैं इस जगह किसतरह भोजन करूंगा ? यह कहकर सूर्यने अमृत ले, इसपर छिडकाया तब राजा राम रामकर पुकार उठा और देखकर सूर्यको दंड- वत् कर हाथ जोड़ कहने लगा कि, धन्य, है भाग्य मेरा और मेरे कुलका जो आपके दर्शन पाये और मैंने इस जन्ममें यज्ञ दान किये थे इसीके सबबने तुम्हारे चरण देखे जिन्दगीका जो फल था सो मुझे मिला. इच्छा संसारमें सबकी है, लेकिन जिस

राजा था उसका मैं बेटा हूं. मेरा नाम विक्रम है. आपकी कथा मैंने

( ५२ ) सिंहासनबत्तीसी. पर तुम्हारी मिहरबानी हो उसीको दर्शन मिलताहै. यह सुनकर सूर्य बोले कि-तू कौन है ? तेरा क्या नाम है ? तुझे देख देख के मेरे जीमे तरस आतीहै. अपना नाम तू जल्दीसे कह तब राजा बोला कि-स्वामी ! नगर अंबावतीमें गंधर्वसेन नाम जो राजा था उसका मैं बेटा हूं. मेरा नाम विक्रम है. आपकी कथा मैंने एक ब्राह्मणके मुंहसे सुनीथी. तब मुझे आपके दर्शनकी इच्छा हुई और आपकी तवज्जोहसे आपके चरण देखे. अब मेरे ताईं आज्ञा दीजिये तो मै विदा हूं. यह सुन सूर्यने हँसकर अपना कुंडल उतारकर राजाको दिया और कहा अब तूं निडर राज कर. फिर सूर्यका रथ आगे बड़ा और खंभभी घटने लगा. जब राजा अकेला रहगया तब बीरोंको अपने पास बुलाया वे आकर हाजिर हुये. उनके कांधेपर सवार होके अपने मकानको आया. जब शहरमें दाखिल होने लगा तब सामनेसे एक गुंसाई आया, और राजासे अपने योगकी मतिसे कहा-महाराज ! जो आप सूर्यके पाससे कुंडल लायेहो सो मुझे दान दीजिये, और यश धर्म, बड़ाई लीजिये. राजा बोला-ऐ मतिहीन ! ऐसा योग तूने कब कमाया ? जो तू कुंडल मांगता है. वह संन्यासी कहने लगा कि-महाराज ! मैंने योग तो कुछ नहीं साधा. पर सुनाथा, कि, राजा विक्रम बडा दानी है इससे मैंने आपको जांचा. राजाने हँसकर कुंडल उतार उसके हाथ दिया. वह खुश होता हुआ अपने घरमें गया. कामकंदला यह बात सुनाकर कहने लगी-

सातवीं पुतली ७. ( ५३ )

सातवीं पुतली ७. ( ५३ ) राजा ! तुझमें इतनी शक्ती हो तो तूभी इस सिंहासनपर बैठ. यह बात सुन राजा मनमलीन तो महलमें गया. दूसरे दिन राजा मनमें गुस्सा खाताहुआ फिर सिंहासनपर बैठनेको चला और वररुचि पुरोहितसे कहा कि-इस बेर में पुतलीके रोकनेसे न रुकूँगा आज सिंहासनपर मै जरूर बढूंगा. जब राजाने अपना पांव उठाकर सिंहासनपर बैठनेको चाहा कि, पांव रक्खूं तब कामोदी नाम— ━━━━━━━━━━━━━━━━ सातवीं पुतली- ❧❧❧ कहने लगी- और पांव तले आन गिरी, तब राजाने यह देख दुखित होके पांव खेंचलिया. और उस पुतलीसे कहा-तू किस कारण पांवतले आन गिरी ? तब इसने कथा शुरू की कि, हम जो हैं अबला सो रातयुगकी हैं. राजा ! तेरा अवतार कलियुगमें हुआ. हमैं पहले एक मर्दको छोड दूसरेका मुँह नजरसे नहीं देखा. हम पहले अपना माजरा कहती हैं कि, विश्वकर्माने तो हमें जन्म दिया और बाहुबल राजाके पास आकर रहीं उसने राजा वीर वि- क्रमादित्यको हमें दिया, वह अपने घर ले आया. जब हम वहांसे बि- छुड़ीं तबसे कभी सुख नहीं पाया. जो उस राजाके बराबर होवै सोही इस

बयान कर. तब पुतली बोली-सुन राजा ! विक्रमका अहवाल.

( ५४ ) सिंहासनबत्तीसी.

सिंहासनपर बैठे राजा बोला-विक्रममें वस्फ क्या थे ? तू वे मुझसे बयान कर. तब पुतली बोली-सुन राजा ! विक्रमका अहवाल. एक दिन राजा वीर विक्रमादित्य अपने घरमें दोपहर रातको सोता था और-तमाम शहर नींदमे यहांतरु गाफिल था कि, जो किसी आदमीकी आवाज न आतीथी. इतनेमे उत्तर दिशाकी तरफ नदीके पार एक स्त्री ढाढे मारके रो उठी. उसका आवाज राजाके कान पडगया. तब राजा अपने मनमें चिन्ता करने लगा कि, हमारे नगरमें कोई दुखी आया है कि, वह अपने दुःखमे कूक मार मार रो रहा है. यह बात दिलमें बिचार ढाल तलवार हाथमें ले उधरको चला. और नदीके किनारेपर पहुँचकर वस्त्र छोड लंगोट मार पैरकर पार हुआ और थोडा आगे बढ़कर देखा तो एक अति सुंदरी जवान नारी खड़ी कूकमार रो रही है. उसके पास जाकर राजाने पूंछा कि, पुरुषका तुझे वियोग है ? या पुत्रका शाक है ? सो कह ! या तुझे सौनका साल है ? इनने दुःखोंमें किस दुखरो तू रोतीहै ? जो कुछ तुझे व्यापा है सो मुझे कह ? तब वह कहने लगी-सुन राजा ! हमारा बालम चोरी करताथा इतनेमें शहरके कोतवालने उसे पकड़कर शूली दिया है. और मैं उसकी मुहब्बतसे कुछ खाना खिलानेको लाईहूं और चाहती हूं उसे भोजन करवाऊं. पर शूली ऊंची है और मेरा हाथ उसके मुंह तलक नहीं पहुंचता. इस दुःखसे रोतीहूं और बहुत यत्न करतीहूं पर पहुंचने नहीं पाती. अब नरपतिने कहा यह तो थो-

[शीर्षक] सातवी पुतली ७. (५५)

[शीर्षक] सातवी पुतली ७. (५५)

डीसी बात है इसके वास्ते तू क्या रोतीहै ? उससे जवाब दिय कि, मुझे यह थोडी बहुतही है. तब राजा बोला-मेरे कांधेपर चढ उसे खिलादे. तब वह कंकालिन राजाके कांधेपर चढी, उस शूलीपर चढ जो टेंगाथा उसे खवाने लगी. तब रक्त राजाके बदनपर गिरन लगा. राजाने मनमें सोचा कि, यह कोई और है। यह मनुष्य नहीं इसने मुझे धोखा दिया. तब अपने जीमें राजाने सोचकर पूंछा कि, कह सुंदरी ! तेरा पिया भोजन करता है कि नहीं ? तब कंकालिन बोली-रुचिसे खा चुका, अब इसका पेट भरगया. इसवास्ते मुझे कांधसे उतार. जब हेठ उतरी तब राजाने कहा उसने चाहसे खाया ? तब कंकालिन हंस- कर बोली-तू मांग जो मुझे चाहिये होय ? मैं तुझसे बहुत खुश हुई. मैं कंकालिन हूं अपने जीमें मुझसे मत डर. तब वह बोला- मैं तुझसे क्या डरूंगा और क्या मागूंगा ? तैंने तो मईको मेरे कांधपर चढ खवाया सो तू मुझे क्या देगी ? वह फिर बोली कि-राजा ! तू इसके ख्यालमें मत पड़ कि, मैंने क्या किया और क्या न किया ? जो तुझे इच्छा होय सो मांगले. राजाने हंसकर कहा कि-अन्नपूर्णा मुझे दो और जगत्में यश लो. वह बोली-अन्नपूर्णा मेरी छोटी बहन है. तू मेरे साथ चल मैं तुझे दूंगी. इस तरह आपसमें दोनो वहांसे बचन कर चले. आगे २ कंकालिन पीछे पीछे राजा नदीके किनारे जा पहुंचे वहां एक मंदिर था, उसके द्वारे कंकालिनने ताली मारी और अन्नपू-

र्गाने प्रकट होके उससे कहा कि-यह भूपाल कौन है? वह बोली कि-यह राजा विक्रम है इसने मेरी सेवा की है. और मैंने इससे वचन हारा है अगर मेरी मोहब्बत तेरे दिलमें हो तो अन्नपूर्णा इसे दे. तब हंसकर उसने राजाको एक थैली दी. और कहा कि-इसमेंसे जितनी खानेकी चीज तुम मागोगे उतनी पाओगे. तब राजाने हाथ फैला लेली. और वहांसे खग हो नदीके किनारे आन स्नान ध्यान कर निश्चिन्त हुआ कि इतनेमें एक ब्राह्मण वहां आन पहुंचा. उसको राजाने पास बुलाया और कहा कि-कुछ भोजन करोगे? उसने कहा-मुझे भूख लगी है, जो आप देओगे तो मैं खाऊंगा! राजा बोला-क्या खाओगे? किस चीजपर तुम्हारी रूरत है? तब ब्राह्मण बोला-इस वखत मिले तो पकवान खाऊंगा. राजा अपने मनमें सोचने लगा:- जो इसदम पकवान न पहुँचेगा तो मैं ब्राह्मणसे झूठा हूगा. इतनी बात मनमें बिचार थैलीमें हाथ डालकर जो निकाला तो देखा कि पकवानही निकला. ब्राह्मणने पेट भरकर खाया और बोला-महाराज! भोजन तो मैं किया, अब इसकी दक्षि- णाभी दीजिये. तब राजाने कहा-महाराज! आप जो दक्षिणा मांगोगे सो मैं दूंगा, ब्राह्मण बोला-यह थैली मैं दक्षिणा पाऊ तो आनंदसे अपने घर जाऊं थैली ब्राह्मणको देकर राजा अपने महलमें आया. इतनी कथा कहकर वह राजा भोजसे

आठवी पुतली ८. ( ५७ )

आठवी पुतली ८. ( ५७ ) फिर बोली कि-इतनी मेहनतसे थैली पाई और ब्राह्मणको देनेमें बार न लगाई. ऐसा साहसी और ऐसा दानी जो तू हो तो इस सिंहासनपर बैठ और नहीं तो पातक होगा. वहभी मुहूर्त राजाका टल गया जब दूसरे दिन फिर राजा सिंहासनपर बैठनेको आया, तब पुष्पावती - आठवीं पुतली- बोली-हे राजा भोज ! तूने जो सिंहासनपर बैठनेका चित्त किया है सो इसकी आशा मनसे छोडदे. राजा बोला-मैं किसतरह छोड़ं? तब पुतलीने कथा शुरू की कि, एक दिन राजा बीर विक्रमा- दित्य अपने दरबारमे बैठाथा उसवखत सब राजा मुजरेको हाजिर थे. इतनेमें एक बढई ने आकर सलाम किया और कहा, महाराज ! मैं आपके दर्शनको आयाहूं और एक घोड़ा आपके लिये लाया हूं. राजाने आज्ञा की कि-ले आ. बढ़ईने जो हिकमतका घोडा बनाया था सो नजर किया. राजाने घोडेको देख उससे पूंछा-कि, इसमे क्या २ गुण हैं ? बढ़ईने कहा-महाराज ! इसमें ये गुण हैं कि, न यह कुछ खाता है. न कुछ पीता है. और जहां चाहो तहां ले जाता है. दर्याई घोडेके बराबर है. घोडा इस वख्त चालाकीसे एक जगह

(५८) सिंहासनबत्तीसी. ठहरता न था. कूद फांद रहा था. ज्यों ज्यों राजा' देखताथा त्यों त्यों रीझताथा. आखिर पसंद करके कहा कि, इसको इस मैदानमे फेरकर दिखायो. ज्योंही उसने कोडा किया. फिर तो गर्दही नजर आतीथी. और घोडा मालूम न होताथा. जब ऐसे गुण घोडेमे राजाने देख, तब दीवानको बुलाकर कहा कि- एक लाख रुपये इसे दो. दीवानने अर्ज की-कि, महाराज ! यह काठका घोडा और लाख रुपये इनाम मुनासिब नहीं. राजाने दो लाख रुपये फरमाया. तब उस दीवानने उसके हवाले कर दिये. और अपने दिलमें सोचा जो कुछ और तकरार करूंगा तो रुपये और बढेंगे. वह बढई रुपय ले अपने घरको गया. घोडा थानपर बांधा और वह यह कहतेहुये चला गया, कि, इसपर सवार होते कोडा न कीजो, न ऐड मारियो पर किस्मतका लिखा कोई मिटा नहीं सकता. जो बात हुई चहती है, सो होतीही है कई दिनके बाद राजाने घोडा मंगवाया और अपने मुसाहिबोंसे फरमाया कि, कोई तुममेंसे सवार होकर इस घोडेको फेरे तो हम देखें यह बात सुनकर वे एकेकका मुंह देखने लगे. घोडेकी चालाकीसे कोई न चढा. तब राजा झुंझलाकर बोला - घोडेको साज लगाकर तैयार कर आओ. यह बात सुनक' एककी जगह हजार आदमी दौडे और जल्दी तैयार कर लाए. तब राजा सवार होकर वहां फेरने लगा, कि, वह चाहताथा कि आसन जमाकर घोडेको अपने काबूमें लावे पर वह रानोंसे

आठवीं पुतली ८. ( ६१ )

आठवीं पुतली ८. ( ६१ )

निकला जाताथा और पारेकी तरह जगहपर ठहरता न याथे. छलावेकी मानिंद छलवल कर रहाथा. राजा खुशीके मारे बढ़- ईकी बात भूल गया. और घडेको कौडा दिया. चाबुक लगा तेही वो आग बबूला होकर ऐसा उडा कि समुद्रपार लेगया. और एक जंगलमे दरख्तके ऊपरसे गिरा आप रानोंसे निकल गया. राजाभी दरख्तपरसे लडखडाता हुआ नीचे गिर पडा और यह हालत हुई कि मृतकसा हो गया. जब कितनी देर गयी. तब कुछ उसे होश आया, तब अपने दिलमें कहने लगा कि- देश, नगर, राजपट, रैयत और अपने पराये सबके सब छूटे किस्मत, यहां मुझे लेआई देखिये आगे क्या होय ! यह मनमें बिचार कर धीरज बाध उठकर वहांसे आगे चला, ऐसे महाब- नमें जा पडा कि निकलना फिर मुश्कील हुआ, पर ज्यों त्यों उस जंगलसे भूला भटका दश दिनम सातकोस राह चलकर फिर ऐसे एक बनमे जा पहुँचा कि, उसमें ऐसा अँधियारा था कि, हाथको हाथ न सूझताथा और चारो तरफ, झेग, गैंडे चिते बल्कि सब परिंदे बोल रहेथे. उनकी डरावनी आवाजें सुनकर राजा सहमा जाता था. कभी पूर्व, कभी पश्चिम, कभी दक्षिण, कभी उत्तर, भटका भटका फिरता था पर कहीं राह न मिलतीथी. इस तरह दुःख भोगता हुआ पंद्रह दिनके बाद एक तरफ जा निकला. वहां एक तमाशा नजर आया कि, एक. मकान है और उसके बाहर बडा दरख्त और दो बड़े

( ५८ ) सिंहासनबत्तीसी.

हुए थे, उस दरख्तपर एक बंदरिया बैठी थी. कभी नीचे उत- रती है, और कभी ऊपर चढ़ती है. राजा यह कौतुक छिपाहुवा देखता रहा ! इतनेमें निगाह राजकी ऊपर गई तो क्या देखता है कि उस हवेलीपर एक बालाखाना है. जब दरख्तपर चढगया तो देखा कि, वहां एक पलंग बिछा है और सब ऐशका असबाब धरा है. तब मनमें कहा-अभी जाहीर होना अच्छा नहीं. पहिले यह मालूम करूं कि, कौन यहां आता है और कौन जाता है. जब ठीक दो पहर दिन हुआ तब एक सिद्ध वहां आया और बाईंतरफ जो कुआ था उसमेंसे उसने एक तूंबा जल निकाला जब वह बंदरिया निकल आई तब सिद्धने एक चुल्लू पानी उसपर डाल दिया तो वह खूबसूरत स्त्री होगई और उस रूपवती स्त्रीसे योगीने भोग किया. जब तीसरा पहर हुआ तब योगीने दूसरे कुआसे पानी खींच उसपर छींटा मारा फिर वह वैसीकी बंदरी बनगई. और दरख्तपर चढी और योगीभी पहाड़की गुफामें जाकर बैठा और अपना योग करने लगा. इतनेमें राजाने प्रकट हो चतुराई कर बाँए कुवेसे जल निकाल उस बंदरीपर छींटा मारा फिर वह ऐसी सुंदरी नारी हुई कि गोया इंद्रके अखाडेका अप्सरा है. और राजाको देख लाजसे मुँह फेर लिया. कामके बाण राजाके आन लगे प्रेमकर उसको अपने पास बिठाया. जब उसने आँखें प्यारकी देखी तब हंस

आठवीं पुतली ८. (६१)

आठवीं पुतली ८. (६१)

कर बोली कि-महाराज ! हमारी ओर और दृष्टिसे मत देखो, क्योंकि, हम तपस्विनी हैं. जो हम सरापेंगी तो तुम भस्म हो जाओगे राजा बोला कि-शाप मुझे न लगेगा. मैं राजा वीर विक्रमादित्य हूं. कोई मेरा क्या कर सक्ता है ? मेरे हुक्ममें ताल बेताल हैं. विक्रमका नाम सुनतेही वह राजाके चरणपर गिरपड़ी. और कहा महाराज ! तुम नरेश हो. हमारा उप- देश सुनो. जल्दी यहांसे जाओ अभी यती आवेगा तो मुझे और तुम्हें दोनोंको शाप देकर जलादेगा. तब नरपति बोला-कि, हम यतीके सामने न होंगे, तो हमारा कुछ वह कर न सकेगा. पर स्त्रीहत्या लेनी उचित नहीं; क्योंकि स्त्री हत्या लेनेसे आ- खिरको नरक भोग करना पडताहै. फिर राजाने कहा कि-उस सिद्धने तुझे कहां पाया ? तब वह बोली कि, कामदेव मेरा बाप है और पुष्पवती मेरी मा है. मैने उनके कुलमें अवतार लिया था. जब बारह बरसकी में होगई तब उन्होंने मुझे एक आज्ञा की सो मैंने न मानी. इतनेही अपराधसे माता पिताने क्रोधकर मुझे यतीको दे डाला. और मुझे यह अपने वश करके इस बनमें ले आया. और यहां आकार बंदरी करके रूखपर चढा दिया. इस शक्लसे एक बरस गुजरा कि, मैं इस बनमें पडी हूं. सच है कि, किस्मतके लिखेको कोई मिटा नहीं सक्ता, यह मनमें सोचकर चुपकी हूं. तब राजा बोला-मेरा जी

( ६२ ) सिंहासनबत्तीसी. चाहता है कि, तुझे अपने घर ले जाऊ. तब वह बोली—महाराज ! यह बात तो मेरेभी दिलमें आती है. पर क्योंकर जाऊं ! तुम्हारा नगर समुद्रके पार है. तब राजाने बचन दिया कि, मै तुझे ले चलूंगा. समुद्र लांघनेकी फिक्र अपने मनमें मतकर. इस तरह ले जाऊंगा कि, तुझे मालूमभी न होगा. यों दोनोंने आपसमे बातें कर रैन आनंदसे निकाल और सुबह होतेही राजाने पानी दूसरे कुएसे निकाल उसपर छिडक दिया कि, फिर वह बंदरिया हो कर दरख्तपर जा चढी और राजाभी वहीं छुप रहा. उसी दम योगी आन पहुँचा. वही यत्न योगीने कर छिन एक वहां सुरता खुशी की. जब योगी चलने लगा तब वह सुंदरी बोली—महाराज ! मेरी एक विनती सुनिये. कुछ प्रसाद मैं आपके पास मांगती हूं सो तुम मुझे कृपा कर दीजिये. यह सुन योगीने हँसकर एक कमलका फूल उसे दिया और कहा कि, एक लाल हररोज इस कमलसे पैदा होगा और कभी न कुम्हलायगा. इसे तू अच्छी तरहसे रखना. यह सुनकर उसने अपनी चोलीमे रखलिया. और दिल उसका खुश हुआ. योगी फिर उसे बंदरी बनाने आप चला गया. राजाने आकर फेर कुएसे पानी निकालकर उसे नारी बनायी. और उसने यह कमलका फूल राजाको दिखाया और कहा कि-महाराज ! एक अद्भुत चरित्र है कि इसमेंसे एक लाल हररोज निकलेगा

आठवी पुतली ८ ( ६३ )

आठवी पुतली ८ ( ६३ ) यह बात बुद्धिबाहर है. राजाने कहा अचरज नहीं. भगवान्‌को सब शक्ति है और वह क्या क्या नहीं करता ? ये बातें कर रात ऐशमें काटी और प्रभात होतेही उन कंगूरोसे एक लाल गिरा. दोनोंने यह तमाशा देखा तब राजाने कहा कि, चंचले ! अब यहां ठहरना उचित नहीं. बेहतर यह है कि, मेरे देशको चलो. यह बात राजाकी सुनकर वह बोली-सुनो महाराज ! एक मेरी अधीनी मैं पांव पडकर जो आपको कहतीहू सो सुनो महाराज ! आप बडे दानी हो. ऐसा दानी आजतक नहीं सुना ऐसा न हो कि, किसीको मुझे दान करदो. मैं दासी होकर आपकी हरव- खत सेवा करूंगी. तब राजा बोला-कि, यह नहीं होसक्ता कि, कोई अपनी नारी परपुरुषको देय यह काम तो धर्मविरुद्ध है और लोकविरुद्ध हे. इस तरह उसकी खातिर जमा कर दोनों बीरोंको बुलाया. वे आकर हाजिर हुए. उन्होंसे कहा कि, जल्दी हमारे देशको ले चलो. वे बीर उन दोनोंको तख्तपर बिठा हवाकी तरह लेकर उडे, वे तो यों अपने शहरकी तरफ गये. और योगी जो यहां आया और उस सुन्दरीको न पाया, तब पछता पछता मनमार मुंझाय रहा निदान राजा अपने नग- रके पास आया और सिंहासनमे उतर उस राजकन्याका हाथ पकड शहरको लेचला. रास्तेमें उसने देखा कि, किसीका एक खूबसूरत लडका दरवाजेपर खेल रहा है. राजास्त्रीके दायें

( ६४ ) सिंहासनबत्तीसी. कमलका फूल देखकर वह लडका रोने लगा. और विकल विकल बोला कि, मैं यह फूल लूंगा तब राजाने कमल रानीके हाथसे ले लडकेको दिया. लडका फल ले हंसता हुआ अपने घरमें गया. राजाभी अपने मंदिरमें जा विराजमान हुआ. जब सुबह हुआ तब उस कमलके फूलमेंसे एक लाल गिरा, लडकेके बापने उसे देख उठा लिया. और कमलको छिपा रक्खा. इसी रंगसे हररोज लाल निकलने लगे कि, एक दिन कितनेक लाल वह लेकर बाजारमें बेचनेको गया वह खबर कोतवालको हुई, तब कोतवालने उसे पकडवा मंगवाया और पूंछा कि-तू बनि- या हे और तूने इतने लाल कहां पाये ? तब वो कहने लगा कि, ये हमारेही घरके हैं. पर उसकी बात न सुन उसे बहुतसी सियासत कर लाल लेकर राजाके पास आया. और सब वह अहवाल बताया. तब राजाने कहा कि-उसको मिलादो. और उसे पूछा कि, तूने ये लाल कहां पाये ? राजाने उसे कहा कि, जो तू सच मुझसे कहेगा तो मैं तुझे औरभी दौलत दूंगा और झूठ कहेगा तो देशसे निकाल दूंगा. उसने अर्ज की सुनो भूपाल ! द्वार खेलता था मेरा बल, उसके हाथमें कोई कम- लका फूल दे गया. और उसने आन मुझे दिया. मैने रातभर उसे अपने पास रखलिया. सुबह होतेही उसमेंसे एक लाल गिरा और अब हररोज एक एक लाल योंही निकलता है. और

नववीं पुतली (६१)

नववीं पुतली (६१)

अबभी वह फल मेरे घरमें है. राजन कहा-वाह ! तूने सब अच्छी बातें कहीं. अब तू ये लाल लेकर अपने घरको जा. इस कोतवालने बहुत बुरा काम किया, जो बेतहकीक ही पकड़ लाया इनसे न्याय अब यह है कि, लाख रुपये कोतवाल तुझे दंड दे. यह कह कोतवालसे लाख रुपये दिलवाये और उसे घरको भेज दिया ये बातें कह फिर पुतली बोली-सुन राजा भोज ! वीर विक्रमादित्यके गुण और धर्म. तू मूर्ख है. कुछ उसकी हकीकत नहीं जानता. वैसे राजाको तू अपने आगे हीन कर मानता है. और अपने ताईं मनमें तू अधिक समझता है ये बातें पुतलीसे सुन राजा उस दिन योंही अउता पछता रहगया. वह साअतभी जाती रही. सुबहको दूसरे दिन राजा सिंहासनके पास खडा हुआ और पुतलीसे पूंछने लगा कि, तू खुश तो है ? तुम्हारे मुँहसे कथा सुनकर मुझे निहायत खुशी पैदा होती है. यह सुन मधुमालती-

नववीं पुतली ९- बोली-सुन राजा भोज ! यहां बैठकर, मैं एक दिनकी कथा राजा बीर विक्रमादित्यकी कहती हूं. एक दिन राजाने होम करनेका आरंभ किया. जहांतक देशके ब्रा- ह्मण थे, उन्होंको न्योता भेज बुलाया और जितने उसके देशके राजा और साहुकार थे वेभी हाजिर ५

( ६६ ) सिंहासनबत्तीसी.

हुए, भाट, भिकारी, सुनकर सब धाय धाय आए और, देश देशके राजा अपने सब लोगोंको ले ले आये, और जितने देवता थे वेभी सबके सब आये. राजा अपने आसनपर बैठा, यज्ञ होने लगी, कि, एक बूढा ब्राह्मण उस समय आया. राजा अपने यज्ञके मंत्र पढ़ता था. ब्राह्मणको दूरसे देखके मनमेही दंडवत् कि, उस पंडितको आगमविद्यासे मालूम होगया इसवास्ते हाथ बढ़ा- कर राजाको आसीस दी कि, चिरंजीव हो. जब राजाने मंत्रसे फुर्सत पाई तब उस ब्राह्मणसे कहा कि-महाराज ! आपने बहुत मंद काम किया कि, बिना प्रणाम मुझे आशीर्वाद दिया “ जबतक पांव न लागे कोई । वह आशीष पापसम होई ” तब ब्राह्मणने कहा-राजा ! जब तूने अपने मनमें दंडवत् की तभी मैंने आशीष दी. यह बात सुन राजाने लाख रुपये ब्राह्मणको दिये, तब ब्राह्मण हँसकर कहने लगा कि-महाराज ! इतने रुपयोंमें मेरा निर्वाह न होवेगा. ऐसा कुछ विचार कर दीजिये कि, जिसमें मेरा काम हो. तब राजाने पांच लाख रुपये उसे दिये. वह लेकर अपने घरको गया और जो जो ब्राह्मण उस यज्ञमें थे उनकोभी बहुत कुछ दिया. इसवास्ते राजा भोज ? मैंने तेरे आगे यह बात कही कि तू सिंहासनपर बैठनेके योग्य नहीं. सिंहकी बराबरी सियार नहीं कर सकता और हंसकी बराबरी कौवेसे नहीं होसक्ती

दशवीं पुतली १०. ( ६७ )

दशवीं पुतली १०. ( ६७ ) और बंदरके गलेमें मोतीकी माला नहीं शोभती और गधे- पर पाखर नहीं फबती, इसवास्ते मेरा कहा तू मान और इस ख्यालसे दर गुजर, नहीं तो नाहक किसीदिन मेरा प्राण जायगा. यह बात सुनकर राजा चुप रहा और वह दिनभी गुजर गया. जब रात हुई अंदेश कर सुबहको बदस्तूर सिंहा- सनके पास आया और चाहा कि, पाँव धरें, तब मेगावती- दशवीं पुतली- हँसकर बोली-हे राजा भोज ! पहले तुम मुझसे यह बात सुनलो. पीछे इस सिंहासनपर बैठो तब राजा बोला, तू कथा कह मेरा जीभी सुननेको चाहता है. राजा वहां आसन बिछाय बैठ गया. और पुतली कहने लगी-सुन राजा ! एकदिन वसंतऋतुमें टेसू फुला हुआथा. मोर मोराया हुआ कोयल कूक रहीथी. हवा चल रहीं थी. राजा वीर विक्रमादित्य अपने बागमें बैठा हुआ हिंडोल झूलताथा. इतनेमें एक वियोगी किसी देशसे भूला भटका आ निकला. राजाके पांवपर गिरपड़ा और कहने लगा कि,-स्वामी मैंने बहुत दुःख पाया और अब मैं आपकी शरण आया हूं, और उसकी सूरत बनगई थी कि तमाम लोहू बदनका सूख गया था और आँखसे कम

है तो अपनी कथा कह दे कि, किसकारण ऐसी गति

( ६८ ) सिंहासनबत्तीसी. सूझताथा, अन्नपाणी सब छोड दियाथा. किसी तरह धीरज नहीं धरता था. राजा ज्यों ज्यों समझाता था त्यों त्यों वह विरहसे व्याकुल हो हो रोता था. तब राजाने कहा-तू अपने जीको सँभाल और इतना दुःखी क्यो है ? और अब जो यहां आया है तो अपनी कथा कह दे कि, किसकारण ऐसी गति हुई है; और किसके गमसे तेरा यह शकल बन गई है ? तू किस देशसे आया है और क्या तेरा नाम है ? वह एक आह सर्द दिल पुर दर्दसे खैंचकर बोला-नगर कलंजर देश है मेरा. मैं मतिहीन ओर दुर्बुद्धि हूं. एक यतीने मेरे आगे यह बात कहीथी कि, एक खूब सूरत स्त्री एक जगह है, वैसी सुंदरी कोई जगहमें नहीं ! गोया कामदेवसे पैदा हुई है. बल्कि तीनों लोकोंमें वैसी न होगी. और लाखों राजा जी लगा उसके यहा आते हैं और जल जल जाते हैं पर, उसे नहीं पाते. राजाने पूछा-किसलिये ये जलते हैं. तब वह हकीकत कहने लगा कि-उसके बापने वहां एक आग भड़काई है, और एक कड़ाह भर घी चढ़ाकर रक्खा है. वह घी बडा खौलता है और यह उसकी शर्त है कि, जो उस कड़ाहमें स्नानकर जीता बच निकले उससे अपनी कन्याकी सादी करूंगा. यह बात उस योगीसे सुनकर मैंभी वहां गया था सो मैने अपनी आँखोंसे, वह तमाशा देख हैरान हुआ और वहां हजारों राजा देश देशके लाखों नौकर, चाकर, साथ लेकर

दसवीं पुतली १०. (६९)

दसवीं पुतली १०. (६९)

आते हैं और यह देख पछताकर जाते हैं. उनमेंसे जो इरादः कर्ता है सो उस कड़ाहमें गिरकर भुन जाता है. जब शक्ल उस राजकन्याकी नजर आई तब सुध बुध मैंने गँवाय अपनी हालत यह उसके इश्कमें बनाई है. यह बात उसके मुखसे सुनकर राजाने कहा-आज तुम यहांही रहो. कल तुम हम मिलकर वहा चलेंगे और उसे तुम्हे दिला देंगे. अपनी खातिर जमा रक्खो यह राजाकी बात सुन उसको समाधान हुआ. यह देख राजाने उसे स्नान करवा कुछ खिलाय अपनी सभामें बैठाकर यह हुकुम किया कि जितने संगीतविद्यावाले हैं सो सब तैयार हो हो आज यहां आकर हाजिर होवें और अपना अपना मुजरा बतलावें. राजाकी यह आज्ञा पायके सब आन हाजिर हुए. और अपना अपना गुण जाहिर करने लगे. राजाने उससे कहा कि-इनमेंसे जिस रंडीको तुम चाहो उस हम तुम्हें देंगे. तुम यहां बैठकर सुख भोग करो और उसका ख्याल दिलसे भुलदो. यह बात राजाकी सुनकर वह वियोगी बोला- महाराज ! सिंह अगर सात दिन उपवास करै तौभी घास न चरे. सिवाय उसके मुझे किसी औरकी इच्छा नहीं. इसी तरह तमाम रात बीत गई. जब सुबह हुवा तब राजाने स्नान पूजा कर उन बीरोंको याद किया. वे तुर्तही आन हाजिर हुआ. और अर्ज किया कि, महाराज ! हमको क्या हुकुम है ? हम

दशवीं पुतली १०. (७१)

दशवीं पुतली १०. (७१)

कूदतेही जलके राख हो गया बैतालने देखा और तुरंत अमृत ले आया और राजाके ऊपर डाला. अमृत पडतेही राजा 'राम राम' करके खड़ा हो गया. और जितने ब्राह्मण वहां थे सो सब जयजयकार करने लगे. वहां जो राजकन्या थी उसने आतेही फूलोंका हार राजाके गलेमें डाल दिया. वह जयमाला जब राजाको पहना दी तब सब लोग अचंभेमें रहगये कि, यह राजा कोई अजब तरहका आया है, जो जल गया फिर जीता उठा. यह काम मनुष्यका नहीं, यह कोई देवता है, जिसने ऐसा काम किया. राजाकी नियत पूरी है. तब उस कन्याके ब्याहकी तयारी हुई. राजाके मुल्कके जितने लोग वहां हाजिर थे वे सब खुश हुए. और मंदिरमेंभी रानियां मंगलाचार करने लगीं. इस तरह राजासे शादी कर दहेजमें " जवाहर जोड़े घोड़े, हाथी, पालकी और तमाम माल असबाब कई करोड़का दिया. यह देकर आधा राज्य संकल्प कर दिया. और दास दासीभी बहुतसे दिये. तब यह बिरही जो इसके साथ था सो देख देख बहुत खुश हुआ. जब ये सब दे ले चुके तब राजाने बिदा माँगी. उस राजाने सब असबाब और माल उस ब्याही हुई दुलहिन समेत साथ उसके कर रुखसत किया. और कहा- अपने देशको तुम जाओ. और हमपर दया माया राखियो. हमारा मुख इसलायक नहीं कि तुम्हारी कुछ तारीफ करें. जैसा साहस तुमने किया वैसा न हमने आँखोंसे देखा