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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

( ११८ ) सिहासनबत्तीसी.

मिल मिल बजने लगे. और वे अप्सरायें नृत्य करने लगीं और भाव बताने. इस तरहसे राजा हमेश आनंदसे रात काटताथा. और दिनको यही लिखताथा. इसी तरहसे वह रात दिन वहां व्यतीत करता और रनवासमें नहीं जाताथा. तब रानियोंके जीमें चिंता हुई कि राजा किस कारण महलमें नहीं आता ? और जुदे मंदिरमें रहता है इसका क्या सबब है ? यह मालूम किया चाहिये. यह रानियां आपसमे मत ठान राजाका खोज लेनेको तैयार हुईं और उनमेंसे चार रानियां आपसमे विचार करके कहने लगीं कि हमारा जीनाभी धिकारकासा है- और जगमेंभी हमको धिकार है कि राजा हमें छोड़ वहां बैठ रहा है. और हम यहां विरहमें दुःख पाती हैं इतने दिनों तो हम दुःख मरीं पर अब एक दिनभी बिन प्रियतम नहीं रहा जाता. यह विचार कर रातको सवार हो जिस मंदिरमें राज- बैठा कौतुक देख रहाथा. ये भी वहां जा पहुँचीं. और हाथ जोड़ बिनती कर कहनेलगीं कि, महाराज ! हमसे क्या अपराध हुआ है ? जो आप हमारी सूरत बिसरा यहां बैठे रहे हैं. यह सुन राजा हँसकर बोला कि, सुनो सुंदरियो ! तुझे किसीने सताया है और किस कारण तुम यहाँ आई ? क्या तुम्हें किसीने कुछ कहा है कि यह तुम्हारा मुखचंद्र मलीन हो रहा है ? राजाकी यह बात सुन शिर निहुडाके उन्होंने कहा कि स्वामी ! जो बात है

अठारहवीं पुतली १८. ( ११९ )

अठारहवीं पुतली १८. ( ११९ ) सो आपके सन्मुख हम प्रकाश करती हैं, तब राजाने कहा अच्छा, जो कुछ कहना हो सो कहो. तब उनमेंसे एक रानी जो चतुर थी सो बोली-महाराज ! हम अबला हैं और कभी कुछ नहीं देखा सुखहीमें उमर गँवाई और अब विरहमें काम निशिदिन हमें दहता है सो दुःख हम तुम्हारे सिवाय कससे कहें ? इस व्यथासे हमें आप बचाइये. और अपने हमसे बचन कियाथा कि हम तुम्हें पीठ न देंगे. सो इतनी मुद्दतसे तुमने बिसार दिया. इतने दिनोंतक जिस तरह हुआ हमने वियोग मारा अब हममें बल नहीं कि अब वियोग सहन करेंगी. इसी तरहकी बाते करती हुई तो सुबह होगई और वे सब मुर्तें फिर नकशीदार और दीवालें होगई. तब रानियोंने कहा की- महाराज ! जबसे तुमने मंदिर छोडा तबसे दुःखही सदा रन- वासमें हो रहा है. और उन रानियोंका पाप आपको लगता है क्योंकि सब आपही के आसरेमें हैं. ये बातें सुन राजा हँसकर बोला कि-अब जीमें तुम प्रसन्न हो. जो तुम कहोगी सोही हम करेंगे और जो मांगो सो हम देंगे. तब रानियां खुश होकर बोलीं-महाराज ! हमारे मांगनेसे जो आप देंगे तो हम मांगें. राजाने कहा-जो तुम मांगोगी सो हम देंगे. रानियोंने कहा- महाराज ! यह जो खडिया आपके हाथमें है सो हमे दो. यह सुनतेही राजाने आनंदसे हवाले की. रानियोंने लैली और छिपा रक्खी. फिर सवार हो अपने अपने महलमें आई और

लगा. इतना कथा कह रूपरेखा पुतली बोली कि-सुन राजा

[Header] (१२०) सिंहासनबत्तीसी.

राजाभी आकर दाखिल हुवा. और अपना राजकाज करने लगा. इतना कथा कह रूपरेखा पुतली बोली कि-सुन राजा भोज ! ऐसा पदार्थ देते राजाने विलंब न किया. और ऐसी विद्या तू कहां पावेगा ? और जो पावेगा तो तुमसे दी नहीं जायगी. इससे इस आसनके ऊपर बैठनेका तू अदब छोड़दे. मैं तुझसे सच कहतीहूं तू बौरा न जा, और उस योग्य तू नहीं. वहभी सायत गुजर गई. राजा उठकर वहांसे महलमें दाखिल हुवा. तमाम रात सोचमें गुजरगई- सुबह उठ स्नान पूजामें फरागत कर फिर उसी मकानमें आया. सिंहासनके पास खडा हो चाहा कि पांव उठाकर धरें इतनेमें तारा नामक--- उन्नीसवीं- पुतली बोली-कि हे राजा ! तू अज्ञानी बावला हो- कर यह क्या करता है ? पहले मैं तुझसे एक बात कहतीहूं सो सुनकर पीछे और विचार कर. जो तुम इस सिंहासनपर चरण रक्खोगे तो सबके अपराधी होगे, मुझपर पग दिया था राजा विक्रमादित्यने. तूने अपने जीमें क्या विचारा है ? जो यह इरादा करके आया है ! मेरा हृदय जो है सो केवल कमल है और मधुकर बीर विक्रमादित्य था. तू गोबरका कीड़ा है और मुझपर पांव किस तरह रक्खेगा ? राजा बोला-सुन बाला ! तूने मुझे गोबरका

उन्नीसवीं पुतली १९. ( १२१ )

उन्नीसवीं पुतली १९. ( १२१ )

कीडा क्यों कर जाना ! तब पुतली बोली-सुन राजा भोज ! एक दिनकी कथा, एक ब्राह्मण सामुद्रिक नाम सामुद्रिक पढा हुआ था, बनमें चला जाताथा, उसके बराबर दुनियांमें कोई और पंडित न था, अनेक अनेक विद्याके भेद जानताथा, उसने दर्याफ्त किया कि इस रस्ते कोई आदमी गया है, जब उसके निशान पांवके देखे तो उसमें उर्ध्वरेखा और कमलका चिन्ह नजर आया तब वह अपने जीमें विचार करने लगा कि कोई, राजा नंगे पांव इस रस्तेसे गुजरा है इसको देखा चाहिये कि वह कहां गया है ! यह विचारकर उन पांवोंका निशान देखता हुआ जब कोशभर जा पहुँचा तो उस बनमें देखा कि एक आदमी दरख्तसे लकडिया तोडकर गठडी बांध रहा है. तब ब्राह्मण उसके पास जाकर खडा हुआ और पूंछा कि-तू यहां इस बनमें कबसे आया है ? वह बोला-महाराज ! दो घडी रात रहनेसे इधर आयाहूं तब ब्राह्मणने पुछा कि, तूने किसीको इस रास्तेसे जाते देखा है कि नहीं ! उसने कहा किं-महाराज ! मैं जिस समयसे यहां आया हूं तबसे इन बनमें मनुष्यका तो जिक्र क्या है कोई पक्षी भी नजर नहीं आया, तब फिर उस ब्राह्म- णने कहा कि देखूं तेरा पांव, यह सुनकर पांव उसने आगे रख दिया, और ब्राह्मण सब चिन्ह देख देखकर अपने जीमें कहने लगा कि, यह सबब क्या है कि सब लक्षण इसमें

(१२२) सिंहासनबत्तीसी. राजाके हैं और यह इतना दुःखी क्यों है ? फिर उसने पूछा कि- कितने दिनोंसे तूं यह काम करता है ? उसने कहा-जबसे मैंने होश संभाला हे तबसे यही उद्यम करके खाताहूं और राजा धीर विक्रमादित्यके नगरमें रहताहूं. ब्राह्मणने पूंछा कि-तू बहुत दुःख पाता है. वह बोला-महाराज ! यह भगवतकी इच्छा है कि किसीको हाथीपर चढ़ावे और किसीको पैदल फिरावे, किसीको धन दौलत बिन मांगे दे और किसीको भीख मांगे टुकडाभी न मिले ! कोई सुखमें चैन करते है कोई दुःखमें धौरा रहते है. भगवतकी गति किसीसे नहीं जाती जानी कि कौन रूप किसमें रचा है ? और जो कर्ममें लिख दिया है सो मनुष्यको भुगतना होता है ! उसके हाथ सुख दुःख हैं. इसमें किसीका कुछ जोर नहीं चलता. उससे यह बातें सुन और वह चिन्ह देख ब्राह्मणने अपने जीमें अचरज किया. कहा कि-मैंने बड़ी मह- नतसे विद्या पढीथी. सो मेरा श्रम व्यर्थ गया. और सामुद्रिकमें जो विधी लिखी है पुरुषके लक्षण देखनेकी सो झूठ गंवाई और यह कह मनमें मलीन हो विचार करता राजाके पास चला कि जाकर उसकाभी पांव देखूं कि उसमेंभी निशान है या नहीं ? और जो लक्षण पोथीके प्रमाण न मिलें तो सब पोथियां फाड जला संन्यासी हो तीर्थ यात्राको चला जाऊं. फिर संसारमें रहनेसे कुछ अर्थ नहीं और न मानूंगा क्योंकि इतनी मुद्दतकी

उन्नीसवीं पुतली १९. ( १२३ )

उन्नीसवीं पुतली १९. ( १२३ ) मेहनत झूठ कर्मके पीछे गवाई तो आगे संसारमें क्या फल मिलेगा ! उससे भगवद्भजन करना अच्छा है इस लिये कि, स्वार्थ न हो तो परमार्थ तो होगा यह विचार करता करता राजाके पास जाकर पहुँचा, और राजाको आशीद दी. तब राजाने दंडवत् करके कहा कि-देवता ! तुम इतना मन मलीन होगये इसका कारण क्या ? क्या दुःख तुम्हारे मनमें उपजा है ? सो मुझसे कहो ? ब्राह्मणने कहा कि-राजा ! तू पहले अपना चरण मुझे दिखा तो मेरे चित्तका संदेह जाय. तब राजाने अपना पांव ब्राह्मणको दिखाया और उसने कुछ लक्षण उसमें न पाया. वह देख शीश नवाय चुप होरहा और अपने जीमें कहने लगा कि, पोथियां सब जला संसारको त्याग वैराग्य ले देश देश फिरिये. यह तो अपने जीमें विचार कर रहाथा, राजाने कहा-पंडित ! तूं क्यो क्रोधकर शिर डुलाय पछताय चुप हो रहा है ? अपने मनकी बात मुझे कह कि तूने अपने मनमें क्या ठानी है ? तब ब्राह्मण बोला कि-सुनो महाराज ! मेरे पास सामुद्रिक पोथी है और बारह बरस मैंने पढकर याद की है सो मेहनत मेरी निष्फल गई इस वास्ते संसारसे मेरा जी उदास हुआ है. राजाने हँसकर कहा कि-यह तुमने प्रत्यक्ष क्यों कर देखा. वह बोला-महाराज ! एक मैंने बडा दुःख देखा कि जिसके पावमें ऊर्ध्व रेखा और कमल था और उसकी रोजी यह

( १२४ ) सिंहासनबत्तीसी.

थी कि, लकड़ियां बनमेंसे लाता और बेंचकर खाता ! यह देखकर मैंने जो तेरा पाव देखा कोई अच्छा लक्षण न पाया और तू सारे नगरका राज करता है इससे मेरे जीमें क्रोध हुआ है. इससे अब घर जाकर ग्रंथ जला देश, त्याग करूंगा. राजाने कहा-ब्राह्मण ! सुन मैं तुझे बुलाकर कहता हूं और ग्रंथ साधकर तुझे दिखसाताहूं तब तेरा जी पतीआवेगा. किसीके लक्षण गुप्त होते हैं और किरासे प्रकट. तब ब्राह्मणने कहा- महाराज ! यह मैं किस तरहसे जानूं. तबही राजाने छुरी मँगवा तलुवोंकी खाल चीर लक्षण दिखला दिये. ब्राह्मणने देखा कि कमल और उर्ध्वरेखा है वह देखकर उसके जीको संतोष हुआ और कहा कि-हे कि विप्र ! ऐसी विद्या पढी हुई किस काम आती है कि जिसके सब भेद मालूम न हो इस तरहके लक्षण देख ब्राह्मण अवाक् हुआ. फिर राजाको आशीद दे अपने घरके गया. इतना किस्सा कह पुतली बोली कि-सुन राजा भोज ! कब इस योग्य तू हुवा ? जो सिंहासनपर बैठनेकी अच्छा करता है ? और जो इतना साहस करे सोही इस सिंहासनपर बैठे नाम, धर्म, यश आदमीके जानेसे नहीं जाता. जैसा फूल नहीं रहता और उसकी सुगंध अंतरमें रह जाती है. यह सुनकर राजाको कुछ चेत हुआ और कहने लगा कि, यह संसार स्थिर नहीं, जैसी तरूवरकी छाय है वैसीही दुनियाकी गति है. जिस

बीसवीं पुतली २० (१२५)

बीसवीं पुतली २० (१२५) तरह चंद्र सूर्य आते जाते हैं उसी तरह मनुष्यका जीना मरना है. जैसे कोई सपनेमें कौतुक देखता है वैसा ही जगका रूप नजर आता है. और मनुष्यदेह धरके अनेक दुःख भोग करते हैं. पर सुख यह है कि, जो हरीभजन हो. इतना ज्ञान राजा अपने जीमें विचार वहाँसे उठ अपने मंदिरमें गया. रात जैसी तैसी काटी, प्रभात होते ही फिर वहां आन मौजूद हुआ और पुत- लियोंसे पूंछा कि अब मैं क्या करूं ? तुम मुझे कहो. तब. चंद्र ज्योति नामवाली- बीसवीं पुतली- कहने लगी-महाराज ! मै समझाकर कथा आपके आगे कहता हूं. एक दिन राजा बीर विक्रमादित्यने खुश होकर रासमंडलीके प्रधानको आज्ञा दी कि यह कार्तिकमहीना धर्मका महीना है. इसमें कुछ हरिका भजन मन लगाकर करना चाहिये शरदपूनो ठाकुरकी रास लीला करो. प्रधानने राजाकी आज्ञा पाय देश देखके राजा और पंडितोंको न्योता भेज बुलाया और जितने नगरके योगी थे उन कोभी खबर दे तलब किया. और जितने देवता थे उनकोभी मंत्रोंसे आवाहन करके बिठलाया, रास होने लगा. चारों ओरसे जगजय कार शब्द होने लगा. और राजा एक एकका शिष्टाचार मनुहार करकर फूलमाल ठाकुरका प्रसाद देने लगा. राजाने देखा सब देवता

( १२६ ) सिंहासनबत्तीसी.

आये. पर चंद्रमा नहीं आये. अपने जीमें विचार बैतालपर सवार हो चंद्रलोकको गया. वहां जा सन्मुख हो दंडवत् की और हाथ जोड़ कर कहा-स्वामी ! मेरा क्या अपराध है ? जो अपने कृपा न की और सबने मेरेपर कृपा की है. बिना तुम्हारे मेरा काम आधा है अब काम मेरा सुधारिये. आपको धर्म होगा. तुम्हें संसारमें यश और कीर्ति मिलेगी. जो कदाचित् आप इसमें विलंब कीजियेगा तो मैं हत्या दूंगा. तब चंद्रमाने हँसकर कोमल मधुर बचनसे कहा-राजा ! मैं तुझसे सत्यकर कहताहूं तू अपने जीमें उदास न हो. मेरे आनेसे संसारमें अंधकार होजायगा. इस लिये मेरा आना नहीं बनता. तुझे अभिलाषा थी मेरे दर्शनकी सो तेरी इच्छा पूरी होगई. और तेरा काम सुफल होगा. तू अपने नगरमें जा. जो काम तूने आरंभ किया है सो पूर्ण कर. इस तरहसे राजाको समझा अमृत दे विदा किया. राजाने शिर चढ़ाले लिया, और दंडवत् कर अपने नगरको चला रास्तेमें देखा कि यमराजके दो दूत एक ब्राह्मणका जीव लिये जाते हैं. राजाने वह देवदृष्टिसे जाना और उस ब्राह्मणके जीवने राजा- को देख दूतसे कहा कि-इस राजाको भेटना है. राजाने उस ब्राह्म- णकी आवाज सुनकर कहा कि-भाई तुम कौन हो ? तब उन दोनोंने समझाकर राजासे कहा कि-हम यमके भेजेसे उज्जैन नगरीको गये थे. ब्राह्मणका जीव लेकर अपने स्वामीके पास जाते

बीसवीं पुतली २० \hfill ( १२७ )

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हैं. राजाने उससे कहा पहले उस ब्राह्मणको तुम हमें दिख दो और पीछे अपने कामको जाओ. वे दूत राजाको साथ ले नगरमें गये. जहां उस ब्राह्मणका देह पड़ा था वहां दिखाया. राजा देखतेही उस ब्राह्मणका शीश निहुबा अपने मनमें कहने लगा कि, यह तो हमाराही पुरोहित है. तब राजाने दूतोंको बाताम लगा नजर बचा वह अमृत उसके मुँहमें डाल दिया. ब्राह्मण रामका नाम ले उठ खडा हुआ. ब्राह्मणने राजाको प्रमाण कर- तेही आशीष दिया और दूतोंसे हाथ जोड विनती कर कहा कि—यह जीवदान मैंने तुमसे पाया. यह देखकर दूतोंने अपने जीमें अचंभा किया कि अब हम जाकर क्या जवाब देवेंगे ? यह विचार करते हुए दूतोंने यमराके पास जा सब राहकी अवस्था कही. यम सुनकर चुप होरहा और राजा ब्राह्मणका हाथ पकड अपने मंदिरको लाया. और बहुतसा दान दे उसको बिदा किया. यह कथा सुनाकर चंद्रज्योति नाम पुतली बोली कि, हे राजा भोज ! ऐसा पुरुषार्थ तू कर सके तो आसनपर बैठ नहीं तो उसके खयालसे दर गुजर, इस तरहसे सुन राजा वहांसे उठ अपने मंदिरमें आया. रात तो जिस तिस तरहसे काटी. सुबह होतेही स्नान ध्यान कर तैयार हो फिर सिंहासनके पास जा खडा हुआ. चाहता था कि उठकर पांव धरें तब अनुरोधवती नामवाली—

इक्कीसवीं पुतली-

( १२८ ) सिंहासनबत्तीसी. इक्कीसवीं पुतली- बोली-हे राजा ! क्या तू अपनी बड़ाई करता है ? और इस अनीतिकी कौनसी बड़ाई है ? पहले मुझसे बात सुन के पीछे उसपर बैठ, माधवनाम एक बड़ा गुणी ब्राह्मणथा. उसकी तारीफहो नहीं सकती जो मैं करूं वह योगी होकर तमाम पृथ्वीमें फिर कर आया कहीं ठहरकर रहने न पाया. मानो वह कामदेवकाही अवतार था, स्त्री देखतेही उसे मोहित हो जाती थी. ए राजा ! वह सब विद्या पढ़ा था और अति चतुर था. मर्त्यलोकमें वैसे मनुष्य कम पैदा होते हैं. जिस राजाका सेवा करनेको जाता था वहां पहले तो उसका आदर मान होता था और जब वह अपने गुणको प्रकाश करता तब वह राजा उसकी देशसे निकाल देता. इस तरहसे देश देश भटकता दुःख पाता फि रताथा. कई एक दिनमें वह कामा नगरीमें आन पहुँचा, उस नग- रीका राजा कामसेन नाम था. उसके यहां कामकंदला नाम एक रंडी थी. वह गोया उर्वशीकाही अवतार थी. गंधर्वविद्यामें वह चतुर थी. माधवभी उसी राजाके द्वारपर जा पहुँचा. द्वारपालोंसे कहा राजाको जाकर हमारा समाचार कहो, आपके दर्शनको एक ब्राह्मण आया है. ड्योढ़ीदार उसकी बात सुनी अन- सुनी करगया. वह ब्राह्मण वहीं बैठ गया. ज्यो ज्यो वहांसे मृदं- गवा आवाज और गानेकी ध्वनि आती थी, त्यों त्यों यह शिर

धुन २ कर कहताथा कि, राजा भी मूर्ख है और उसकी सभा भी मूखोंकी है जो बिचार नहीं करती. यही बात पांच सात दफे कही. द्वारपाल खफा हो ब्राह्मणको देख राजाके डरो कुछ कह तो न सके पर राजाके सम्मुख जा हाथ जोडकर खडे हुए. महाराजने जो उनकी तरफ देखा तब उन्होंने विनती करके कहा कि,-महाराज ! द्वारपर एक ब्राह्मण विदेशी दुर्बल आन बैठा है! शिर डुला डुलाकर बैठा है और कहता है कि, वह राजा और उसकी सभाके लोग अति मूर्ख हैं, जो गुण विचार नहीं करते. तब राजाने उन द्वारपालोंसे कहा कि, जाकर उसे पूछो उनको मूर्ख तूने किस लिये कहा ? उन्होंने राजाके आज्ञा पाय पौरपर आय ब्राह्मणसे पूछा-महाराजने आज्ञा की है कि, उनके गुणमें दोष कौनसा है ? वह तुम बताओ तो हम तुम्हारी बात सच जाने. उसने कहा-बारह आदमी चार चार तीन तरफमें खडे हुए जो मृदंग बजाते हैं तिनमेंसे पूर्व मुखवालोंमें एक मृदंगीके अँगूठा नहीं है इसके समपर थाप हलकी पडती है इससे मैने सबको झूठ कहा है. न मानो तो तुम जाकर यह सच है या नहीं सो देखो वे दौडे हुये राजाके पास आये और सब बाते राजासे सुनाई. तब राजाने पूर्वमुखके चारों मृदंगियोंको बुला एक एकका हाथ देखलिया उनमें एकका अँगूठा मोमका बनाकर

लगाया गयाथा, यह तमाशा राजा देख बहुत प्रसन्न हुआ और ब्राह्मणको ऊपर बुलाया, वह जाकर सम्मुख हुआ तब राजाने दंडवत् किया और उसने आशीष दी. फिर शिष्टाचार कर गद्दीपर बिठाया, जैसे वस्त्र आभूषण आप पहने थे वैसेही मँगवाकर ब्राह्मणको पहनाये और कामकंदलाको बुलाकर आज्ञा की कि, यह महागुणी है इसलिये इसके आगे अपना गुण तू प्रकाश कर कि जिससे यह प्रसन्न होवे. कामकंदला राजाकी आज्ञा पाय अपना गुण जाहीर करने लगी. उसने संगीत नृत्यका आरंभ किया. रंगके सीसे भरे हुए सीसपर धर मुँहसे मोती पिरोती हुई हाथोंसे बले उछालती हुई और सब साज स्वर मिलाये हुई नाचती थी. इसमें फूलोंकी और अतरकी खुशबू पाकर एक भौंरा उडता हुआ आकार उसके कुचकी विटनीपर बैठा और डंक मारा, उसके बदनमें पीर हुई तब बिचारा कि, जो कुछभी हरकत करती हूं तो तालभंग होगा और मेरे गुणकी हँसी हो जायगी. इतना जीमें सोच भें- डार बिचारकर श्वास कुचकी राह निकाली. पवन लगतेही वह भौंरा उड़गया. तब माधव उस गुणको देखतेही मोहित होकर बोला कि,-हे सुंदरी ! धन्य है तुझे और तेरे करतबको. यह कहके प्रसन्न होकर वस्त्र और आभूषण जो राजाने दियेथे वह सब उतार उसको दिये यह देख राजा और मंत्री आपसमें

कहने लगे कि, देखो इस ब्राह्मणने क्या मूर्खता की है. इस वेश्याको ये कपडे और तमाम जबाहिर एक आनमें बख्स दिया यह जातका भिखारी यहा हमारे आगे सखावत दिखाता है. तब राजाने खफा हो ब्राह्मणसे पूँछा कि-तू इसके किस गुणपर रीझा वह मेरे आगे बयान कर. ब्राह्मणने कहा-सुन, राजा ! तूभी मूर्ख है और तेरी सभाभी मूढ है. तेरी सभामें यह ऐसा गुण प्रकाश करे सोभी कोई नहीं जानता; क्योंकि इसके कुचपर भौंरा आन बैठाथा सो इसने अपनी श्वास रोक कुचकी राह निकाल उसे उड़ा दिया. यह इसका चतुरताका काम देख सब कुछ मैंने इसे बख्स दिया. माधवने जब यह बात कही तब राजा लज्जित हो बोला कि-इसी समय मेरे नगरसे निकलजा अब जो सुनूँगा कि तू इस नगरमें है तो मैं बँधवाकर दरियामें डूबा दूंगा, तब माधवने कहा, महाराज ! मुझसे ऐसा क्या- अपराध हुआ है ? जो आप मुझे देशसे निकाले देते हो. राजाने कहा, मैंने जो कुछ तुझे दियाथा सो तूने मेरेही आगे दान कर दिया. क्या मेरे पास देनेको कुछ तुझे न था, जो तूने दिया ? यह सुनकर माधव मनमें मलीन हो राजसभासे निकल बाहर जा एक वृक्षके नीचे व्याकुल खडा होकर अपने जीमें कहने लगा कि, माता बेटेको विष दे और पिता पुत्रको बेंचे और राजा सर्वस्व ले तो कोई शरण किसकी ले ? फिर कहने लगा

( १३२ ) सिंहासनबत्तीसी. कि, राजाने मुझे निकाला अब मैं कहा रहूं, यों अनेक भाँतिकी चिंताकर कामकंदलाका नाम लैले रोताथा. और इधर काम कंदलाभी राजासे बहना करके बिदा हुई और एक आदमी दौड़ाया कि यह ब्राह्मण बाहर जाने न पावे उसे ढूंढ ले जाकर मेरे मकानमे बिठा, वह आदमी गया और ब्राह्मणको ले जाकर कामकंदलाके मंदिरमे बिठा दिया. इधरसे यह भी तुरत जा पहुंची. और वह दोनों आपसमें बैठकर प्रेमकी बाते करने लगे तब उस ब्राम्हणने कहा-मुझे राजाने देशसे निकाल दिया है और तूने अपने घरमे बुला बिठलाया; जो यह बात राजा सुनेगा तो मेरा प्राण पहिलेही जायगा. इससे में तो दुःखसे छुटूंगा पर तुझेभी राजा अतिकष्ट देगा इसमें ऐसी बात करनी उचित नहीं है कि अपनी तो जान जाय और जगमें हँसाई होय इसवास्ते प्रेम जो है सो दुःखकी खान है, जिसने प्रेमके पँडेमें पाँव दिया उसने कभीही सुख न पाया. ये बातें माधवके मुखसे सुनकर कामकंदलाने कहा कि, अब तो मै इस पंथमे आई जो कुछ करे सो भगवान् है इतना कह सब साज बाज घरसे मँगवाकर अपनी विद्या जाहीर करने लगी जितनी विद्या उसे याद थी उतनी ही जब प्रकाश कर चुकी तब माधवने उन्हें यंत्रोंके साथ अपने पास जो गुप्त था सोही सब प्रकाश करके दिखाया. जब रात थोडीसी रहगई तब

इक्कीसवीं पुतली २१. ( १३३ )

इक्कीसवीं पुतली २१. ( १३३ )

कामकंदलासे कहा कि-महाराज ! तुमने तो श्रम बहुत किया अब चलकर आराम कीजिये. यह कह माधवको रंगमहलमें ले गई और जितनी खुशी थी सो सब की, जब की. जब सुबह हुआ तब दोनोंके जीमें राजाकी बात याद आई और सुध बुध जाती रही. तब घबराकर माधवने कहा कि-सुन सुंदरी ! रात तो आनंदमें कटी और अब जो मे यहां रहूंगा तो दोनोंके प्राण जाँयगे इसवास्ते अब कुछ यत्न कीजिये, जिससे निर्द्वंद्व आनंदमें रहेंगे. मैंने एक बात जीमें विचारी है. अब मे यहांसे पहले जाउँ और कुछ उपाय कर फिर आकर तुझेभी यहांसे ले जाऊंगा. तू अपना जी मजबूतसे रखना. मैं जरूर आकार तुझसे मिलूँगा. यह बचन मैं तुझे देकर जाताहूं इतनी बातें सुनतेही वह तो मूर्च्छा खाके गिर पड़ी और माधवने उठकर राह ली. और वहांसे निकलके वन वन फिरने लगा. और हाय कामकंदला ! हाय कामकंदला ! करने लगा. इधर उसेभी सखियोंने गुलाबका नीर छिड़ककर उठाया. जब कुछ होश आया तब वह भी माधव माधव पुकारने लगी और खाना पीना सब त्याग किया बहुतेरा सखियों समझाती थीं पर उसके जीमें एक न आती थी. ज्यों ज्यों गुलाब वा कपुर चंदन लालाकर लगाती थीं, त्यों त्यों दाह चौगुनी बढतीथी. किसी तरहसे शीतलता न होती थी. जब कोई माधवका नाम और गुण सुनाताथा तभी

( ११४ ) सिंहासनबत्तीसी. उसे जरा आराम आताथा. उधर माधवभी गटक भटक अपने जीमें विचारने लगा कि, अब संसारमें कौन है ? जिसके निकट जाइये जो हमारा दुःख दूर करे. तब उसमेंही उसे याद आया कि, आजतक हम सुनते हैं कि राजा वीरविक्रमादित्य परदुःखनिवारक हैं भला उसके पास जाइये और देखिये कि लोग सच कहते है या झूठ ! यह मनमें विचार कर उज्जैन नगरीको चला गया और वहां जाकर लोगोंसे पूँछा कि, वहां राजाकी भेंट आधीन की क्योंकर होसकती है ! तब उस नगरका वासी बोला कि-गोदावरी नदीके किनारे शिवजीका मठ है, उस मठमे राजा शिवजीके दर्शनको नित आता है, वहां तू जा तो तेरा मनोरथ पूर्ण होगा. यह सुनकर वह गया और उस मठके द्वारेकी चौखटपर लिखा कि, मैं ब्राह्मण विदेशी अतिदुःखित हूं. और बिरहसे व्याकुल हो तुम्हारे नगरमें आया हूं. यह सुनकर कि राजा परदुःखनिवारक है. और जो यह दुःख मेरा जायगा तोही मैं अपना प्राण रखूंगा नही तो तीसरे दिन गोदावरीमे प्राणत्याग करूंगा. यह विचार मुकर्रर जीमें मैने ठहराया है कि तुमराजा हो और सदा गौब्राह्मणकी रक्षा करते आये हो और अबभी करोगे. इस वास्ते मैंने अपने मनकी बात सब प्रकाश कहदी है. इतनी बातें कह पुतलीने राजा भोजसे कहा कि-सुन राजाभोज !

इक्कीसवीं पुतली २१. ( १३५ )

इक्कीसवीं पुतली २१. ( १३५ ) राजा बीरविक्रमादित्यका यह नियम था कि, अन्नदुःखी, वस्त्र- दुःखी द्रव्यदुःखी, भूमिदुःखी, विरहदुःखी, और किसी तरहका दुःखी नगरमें आवे तो राजा सुनकर जबतक उसका दुःख न मिटा देता तबतक जलका तो क्या जिक्र है ! पर त- म्बूनभी न चीरताथा. सबेरे गजा महादेवजीके दर्शनको गया तो दर्शन कर परिक्रमा करने लगा. जब राजा ऊंची दृष्टि करके देखे तो कोई दुःखी अपने दुखकी अवस्था लिख गया है राजाने सब बाँच महादेवजीको दंडवत् कर मंदिरमें आया और सेवकको आज्ञा की कि, माधवनाम ब्राह्मण हमारे नगरमें आया है इसवास्ते जो कोई उसे ढूँढ लावे तो मुंहमांगा द्रव्य पावेगा ऐसा कहा. यह सुन लोग नगरमें ढूँढनेको निकले. घाट घाट टोला महल्ला, बा बगीचे सब नगर ढूँढ फिरे कहीं ठिकाना उसका न पाया. तब राजाने एक दूतीको बुलाकर आज्ञा की कि, जो तू उसे ढूँढ लावे तो मुंहमांगा द्रव्य पावे. उसने कहा महाराज ! यह क्या कठिन बात है अभी जाकर ढूँढ लाती हूं यह कह उसने लिखाथा वहां जाकर मंदि- रके पास बैठ रही सांझसमय वह भी भटकता हुआ आन पहुँचा. उसने उसे देख मनमें विचारा कि, हो नहो यह सच विरही है किसलिये कि, मुंह पीला आसूं जारी तन क्षीण मन मलीन हो रहा है. यह तो यही विचार कर रहीथी कि, वह ब्राह्मण

( १३६ ) सिंहासनबत्तीसी. जहां आय और एक बार हाय कामकंदला, हाय कामकंदला ! पुकार उठा. चट उसने जा उसका हाथ पकड लिया और कहा मै तेरे ढूंढनेके लिये राजाकी आज्ञा पायके आयी तू उठ मेरे साथ जल्दी चल तेरा मनोरथ होगा. तेरे दुःखसे राजा निपट निपट दुःखी है यह सुनतेही उसके साथ वह होलिया. उसे ले यह दूती राजाके सम्मुख आई और कहने लगी कि, हे महाराज ! यह वही वियोगी है जिसके लिये आपने यह दुःख पाया है. तब राजाने उस ब्राह्मणसे पूंछा कि, महाराज ! आप वियोगसे किससे व्याकुल हो रहे हो सो सब बात मेरे आगे कहो तब उसने एक आह भरकर कहा-महाराज कामकंदला वियोगसे मेरी यह गती हुई हे वह राजा कामसेन पास है तू धर्मात्मा है और मैं तेरे पास आया हूं. तू मुझे उसको दिला दे तो मेरी जान बचेगी. यह बात सुनतेही राजा हँसकर बोला-सुन विप्र ! वह तो वेश्या है तूने उसके प्रेममें अपना सब धर्म कर्म छोड़ दिया यह तुझे उचित नहीं है. तब माधवने कहा महाराज ! प्रेमका पंथ न्यारा है जो नर प्रेम करते है सो अपना तन मन धर्म कर्म सब समर्पण करते है, प्रेमकी कहानी तो अकथनीय है यह मुझसे नहीं कही जाती. राजाने ये बाते सुनी और उसे अपने साथ ले मदिरमें गया और सब रानियोंके आज्ञा की कि, तुम

इकीसवीं पुतली २१. (१३७)

इकीसवीं पुतली २१. (१३७)

बनाव सिंगार करके आओ. रानियां जब सिंगार कर आई तब उस विप्रसे राजाने कहा इनमेंसे जिसे तुम्हारी इच्छा होगी उसको लो और अपने मनमें दुःख न कर चैन करो. तब उसने जवाब दिया कि, महाराज ! मैं आपके आगे सत्य कहताहूं कि मेरी आंखमें वह बस रही इस लिये और कुछ मेरी दृष्टिपे नहीं आता. चातककी तृषा स्वातीके बूँदसे बुझती है और जलपर उसे रुचि नहीं वैसी है प्रेमकी दृढता. यह दृढता विप्रकी देख राजाने अपने मनमें बिचार किया कि इसे साथ ले जाकर काम- कंदलाको दिलाऊं. अन्यथा इसके मनको स्थिरता नहीं होगी. यह बात राजाने बिचार विप्रसे कहा. देवता ! तुम स्नान पूजा कर कुछ खाओ. तब तलक मैंभी अपने लोगोंको बुला तुझे साथ ले चलूंगा. और उसे तुझे दिलाऊंगा तू अपने मनमें किसी बातकी चिंता मत्कर मैने तुझसे यह बचन किया. तब विप्र अपने खाने पीने लगा और राजाने प्रधानको बुलाकर आज्ञा की कि, मेरे डेरे नगरके बाहर निकालो चार घडीके बाद कामनगरकी तरफ मेरा कूच है इस वास्ते सबको खबर दो. इसमें कितनी एक देरके पीछे राजाभी तैयार हो विप्रको साथ ले कूचकर डेरोंमें जा दाखिलाआ. और जितने राजाके नौकर थे वह सब रिका- बमें हाजिर थे राजा वहांसे कूच दरकूच जाताथा, कितने एक मंजिलोंके बाद कामा नगरी दस कोस इधर डेरा किया.