सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
[Page Header] सिंहासनबत्तीसी. (७)
पकड़कर उठाया और बिठाया, गरूरका नशा गोंको बुलाया चढ़ाथा सो सब उतर गया. तब तोबा करके पांओमेयोंने बड़ी कहने लगा क्या मैंने ऐसी तकसीर की, जो मुझपर खेवारमें कुछ हुई ? इधर उधरकी राह बाट के लोग जो वहां इकट्ठे हुए थेकहा-२स कहा तूने ऐसी बात मुँहसे निकाली और राजा सुनेगा तो अँध्रों तुझे तोपके मुँहपर रखकर उडा देगा. यह सुनतेही वह गिड़ गिड़ाने लगा. रहे सहे उसके होश और हवास ओरभी जाते रहे. जानके डरसे थलग, दम उसका होठोंपर आरहा. मिन्नत और जारीसे बारे छूटगये. राजाके उस फिरवीने वहांसे घपकी राहली. पर वह जब उस मंचानपर चढ़ता तो ऐसा बकबाद किये बिना न उतरता. एक दिन चार हरकारे राजाने एक कामको किसी- तरफ भेजेथे, वे रातको उधरसे फिरते हुए चले आतेथे और वह मंचानपर चढ़ा हुआ बक रहाथा, कि बुलाओ हमारे दीवान और अहलकारोंको कि इस जगह खारो महल और एक गढ़ बनावें सब सरंजाम लड़ाईका उसमें जमा करें कि, मैं राजा भोजसे लडूं और मारूं. जो मेरी सात पुश्तिका राज यह राजा करता है. यह सुनतेही उन चारों हरकारोंको अचंभा हुआ, और एकको उनमेंसे गुस्सा आया. एकने गजबसे कहा-इसे तँगीह करके मश्कें बांध राजाजीके पास लेचलें. दूसरेने कहा-वे इसके हकमें जो चाहें सो करें. तीसरेने कहा-इसने शराब पी है, मतवाला है, जो
वाल कहकर वह किस्सा राहका जो सुनाथा सब बयान
सिंहासनबत्तीसी. सुघर था जो बात सो बकता है. चौथेने कहा--फिर समझा जायगा कंगाल जैसे ने. आपको देर होगी आपसमें यह बातें कहकर उसकी रथ रंग और पहले मुजरा किया, और जहां भेजाथा उसका अहवाल अर्ज किया. राजाने सुनकर पूंछा कि, हमारे राज्यमें सब लोग खुश रहते हैं? और अपने अपने घरमें बैठकर हमारे हकमें क्या कहते हैं? तब उन्होंने हरएकका अह- वाल कहकर वह किस्सा राहका जो सुनाथा सब बयान किया, और कहा कि, अजब असर उस मचानका है कि, जब वह उस मचानपर चढ़कर बैठता है तब एक रऊनत उसपर चढ़जाती है और जब वह वहांसे नीचे उतरता है तब नशा उतर जाता है, फिर अपनी हालत अस्लीमें आता है. तब राजाने कहा तुम मुझे वहां ले चलो, और उसे दिखाओ, कि वह जगह कौनसी है? ऐसा कह राजा खुशी खुशीसे उठ हरकारोंको साथ लेकर उस मुकामपर गया, वहां छिपकर चुपके वहीं बैठ रहा. इतनेमें क्या सुनता है कि, वह मचानपर पांव रखतेही कहने लगा कि, लोग जल्दी जावें और राजा भोजको गढ़से पकड़- लावें. उसे जल्दी मार मेरा राज ले लें. इसमें यश और धर्म दोनों उन्हें होंगे. सुनतेही राजाको कोप हुआ और हरकारोंको साथ लेकर घरको फिर आया. रातको फिक्रके मारे नींद न आई. सात पांच करके ज्यों त्यों वह रात गँवाई. सबेरा होतेही
सिंहासनबत्तीसी. (७) स्नान करके दरबार किया. पंडितोंको और नजूमियोंको बुलाया और रातका सब अफसान जबानपर लाया. नजूमियोंने बड़ी- साय और वह दिन विचारके कहा राजा ! हमारे विचारमें कुछ यहां लक्ष्मीका लक्षण नजर आता है. और पंडितोंने कहा-इस मकानमें बहुत दौलत है सुनतेही राजाने तमाम शहरोंके बेल- दारोंको हुक्म किया कि, लाख बेलदार वहां जावो और इस मकानकी तमाम जमीन खोदो. वे बमूजिब हुक्मके रवाना हुऐ. साथ उनके सब अपने मुसाहिबोंको भेजा और आपभी सवार होकर वहां आया. बेलदारने जब चारों ओरसे खोदा और वहाँकी मट्टी दूर की तो एक पाया नजर आया. तब राजाने फरमाया अब खबरदारीसे खोदो टूट न जाय. जब खोदते २ चारों पाए सिंहासनके नजर आये तब राजाने कहा-अब इसे बाहर निकालो. लाख मजदूर उठातेथे. और जोर करतेथे पर जराभी वह जगहसे नहीं हिलताथा. तब उनमेसे एक पंडितने अर्ज की कि, महाराज ' यह सिंहासन देवताओंका या दानवोंका बनाया हुआ हे. इस जगहसे नहीं हिलेगा और न उठेगा. बलि लेगा. इसको बलि दीजिये. तब राजाने करोड़ भैंसे और बकरे वहीं बलि दिये चारों तरफ बाजे बजने लगे. और जयजयकार होने लगा. तब बलि लेकर हाथ लगातेही वह सिंहासन ऊपरको उठ आया. झाड बुहारकर एक जमीन पाकीजःपर रखदिया-
( ८ ) सिंहासनबत्तीसी.
तब राजा सिंहासन देखकर बहुत खुश हुआ, और जब उसकी मट्टी छुड़ाकर गर्द वा गुब्बार दूरकर धोया और पोंछा तब ऐसा चमकने लगा कि, आंख किसीकी उसपर न ठहरतीथी. जिसने उस जडाऊ सिंहासनको देखा उसे खुदाकी कुदरतका तमाशा नजर आया. कारीगरोने ऐसा बनायाथा कि, किसीने न देखा न सुना. और आठ पुतलियां चारों तर्फ बनी हुईथी और एक एक फूल कमलका हर एकके हाथमें दियाथा. अगर सुरभामिनी उसे देखें तो भौचक होजावें. राजाने तमाम कारीगरोंको बुला- कर फ़रमाया कि, जितने रुपये खर्च हों सो खजानेसे लेलो, और जहांजहांका जबाहिर जाता रहा है, वहां नया जडकर जल्दी तय्यार करो. यह कहकर राजा महलमें दाखिल हुआ. सिंहासन बनने लगा, पांच महीनेमें सब तय्यार हुआ. और पुतलियां ऐसी बनकर खड़ी हुईं गोया अभी बोलती हैं और चालती हैं गरज शिरसे पांव तक खबियोंमें भरी हुई आंखें हिरनकीसी कमर चितेकीसी पांवका यह अंदाज जैसी हंसकी चाल. जिन्होने सूरत उनकी देखी अपनी आखोंकी पुतलियोंमें जगह दी. उसे देखकर पंडित राजासे सिंहासनकी हकीकत कहने लगे- हे राजा ! सुनो मरना जीना ये इख्तियार सब भगवानके है, पर मनुष्यको चाहिये कि जीते जी सब जीनेका सुख करले. यह बात राजा सुनकर बहुत खुश हुआ और कहने लगा कि, शायद पुत-
लियां भगवानने अपने हाथसे बनाई हैं ? या इन्द्रके यहांकी अप्सरा हैं ? यह कहकर पंडितोंको हुक्म किया कि, नीकी सायत, अच्छी लगन विचारो जो मैं उस सायत सिंहासनपर जाकर बैठूं। यह बात सुनतेही पंडितोंने बिचार करके कार्तिक महीनेमें एक दिन शुभ लगन ठहराई. सब भांति वह भली थी. कहा कि, उस सायत तुम उस सिंहासनपर बैठो; तब राजाने बैठनेकी बिरियां जितने राजा उसके राज्यमें थे और पंडित, करामाती दूर और नजदीक थे उन्हें न्योता भेजकर बुलाया और आप स्नान करके अच्छे कपडे पहने. पंडित वेद पढ़ने लगे और गंधर्व गीत गाने लगे. भाट यश बयान करने लगे और तरह तरहके बाजे बजने लगे. हरएक महलमें शादियां नाच, राग रंग मचे. जितने लोग आये उन सबकी जियाफत की. ब्राह्मणोंको वृत्ति गांव दिये. भूखोंको खाना और मुंहमांगे रुप्ये बगरे. नंगोको कपड़ा और माल असबाब इनायत किया. रैयतको बखसीस और इनाम दिया. तमाम शहरमें खैर खैरात बांटी. फौजको खिलत और इजाफे कर दिये. हमनशीनोंपर तरह तरहकी मिहरबा- नियां नवाजिशें फरमाई, गरज जितनेलोग उस सभामें इकट्ठे हुएथे सो सब जयजयकार करतेथे और रामका नाम लेतेथे- बीचमें सिंहासन धरा था. राजा खुशी २ श्रीगणेशको मनाता हुआ सिंहासनके पास जाकर खड़ाहूआ और दाहिना पांव बढ़ाकर
( १० ) सिंहासनबत्तीसी.
उसने चाहा कि उसपर रक्खें, इतनेमें ये पुतलियां खिलाखिला- कर हँसीं ओर सबने यह देखा. राजा अपने मनमें जरा रुककर 'वेनिहायत शरमिंदा हो कुछ दहशत खाई. कुछ उसे अचंभा हुआ कि ये बेजान पुतलियां जानदार क्योंकर हुईं ? गश खाकर गजबमे आकर पाव उधरसे खैंचलिया, और पुतलियोंसे कहने लगा कि, तुमने क्या देखी ? ओर क्यों हँसी ? ये सब बात मुझसे बयान करो. क्या मैं बली गजाका बेटा यशस्वी नहीं ? या क्षत्रियोंमें कायर हूं ? या नामर्द हूं ? या बेरहम हूं ? या ओर राजा मेरे हुकममें नहीं ? या मैं पंडित नहीं ? या मेरे यहां पद्मिनी नारी नहीं ? या मैं राजनीति नहीं जानता ? या मैं किसीकी मजलिसमे नींच होकर बैठा ? फिर किस बातमें मैं नालायक हूं ? मेरे दिलमें शंक पडा है सो मुझे तुम बताओ ! ये बात राजाके मुखसे सुनकर उनमेंसे रत्नमंजरी नामक--
पहली पुतली
बोली:--हे राजा, दिल लगाकर मेरी बात सुनो और यह किस्सा मैं तुमसे बयान करता हूं. तुम गुणग्राहक और कदरदान हो ! जो तुमने बातें कहीं सो सब दुरुस्त है सूर्यसेभी तुम्हारे तेजके आगकी ज्वाला अधिक है पर उतना गर्व मत करो. पुरानी कथा सुनो इससंसारका अंत नहीं. भगवान्ने
सिंहासनबत्तीसी. ( ११ ) इसमें किस्म किस्म और रंग रंगके जवाहर पैदा किये हैं. एक एक कदमपर दौलतका गंज है. और एक एफ कोसपर आबहयातका चश्म है, पर तुम कमवक्त हो इससे नहीं पहचाना अपने दिलमें क्या समझेहो ? तुम जैसे इस दुनियामें करोड़ों पड़े हैं तुमने इतनेहीमें मग- रूर होकर अपने ताईं भुला दिये. ओर यह जिसका सिंहासन है उस राजाके यहां तुमसा एक एक अदना नौकर था. यह सुनकर राजाको गुस्सा आया. और कहने लगा कि-इस सिंहासनको अभी मैं तोड़े डालताहूं. इतनेमें वररुचि पुरोहित बोला, राजा ! यह इनसाफसे दूर है, इसवास्ते पुतलीकी बात कान देकर सुन लो. और जो कछु करना हो सो फिर कल्लो. राजाने कहा तू इसका अहवाल कह. तब पुतली बोली-मैं क्या कहूं १ राजा । इतनाही सुन, तुम जलकर खाक होयगे और जब तमाम हकीकत उस राजाकी सुनोगे तब औरभी शरमिंदा होंगे. और अपने दिनोंको रोवो गे. लोगोंके आगेभी हल्के होओगे इसके कहवानेसे न कहना ना भला है हम तो उसी रोज मरचुकी थीं और सिंहासन फूट चुका था जिस रोजसे राजा विक्रमादित्यसे बिछुडीं. अब हम क्या डर है ? इतनेमें दिवान राजाका पुतलीसे कहने लगा-किसलिये तू अपने राजाको बयान नहीं करती ? गुस्सा छोडदे और अब बात कर. क्या वह भेद छिपा रखती है ? तब पुतली बोली कि-एक शकबंधी राजा बड़ा बली था. और नगर अंबावतीमें राज
और तमाम दुनियाका दान देनेवाला था, आगे मै उसकी कथा
( १२ ) सिंहासनबत्तीसी.
करताथा, बड़ा उसका दबदबा था, देवताओंका पूजनेवाला और तमाम दुनियाका दान देनेवाला था, आगे मै उसकी कथा तेरेवास्ते कहती हूं राजा ! कान देके सुनो. उपामस्वयंवर उस नगरीका राजा था, जातका ब्राह्मण पर बड़ा राजा हुआ, तब गंधर्वसेन उसका नाम हर तरफ बजने लगा और उसके घरमे चारि वर्णकी रानियां थीं-ब्राह्मणी, क्षत्रिया, वैश्या, शूद्रा. उसमें जो ब्राह्मणी थी सो बहुत अच्छी सूरत और नाज़ुक थी. इसके एक बेटा हुआ सो बड़ा पंडित हुआ. ब्राह्मणीत उसका नाम रक्खा. ऐसा ऐ राजा ! कोई दुनियामें पंडित न था, जित- ने इल्म थे सो सब उसने पढेथे. यहांतक कि, मौतकाभी अहवाल कहदेता. और क्षत्रियासे तीन बेटे हुए, उन्होंने क्षत्रियोंका धर्म अक्तियार किया, एकका नाम शंख, दूसरेका नाम विक्रम, ती- सरेका नाम भर्तृहरि. एकसे एक बली था सब जगमें उनका नाम मशहूर था और उ हे कल्पवृक्ष दुनियाके लोग कहतेथे और बेश्यासे बेटा जो हुआ उनका नाम चंद्र रक्खा, वह बड़ा सुखी और रहमदिल था, शूद्रीसे जो बेटा हुआ उसका नाम धन्वंतरि रक्खा था, वैद्योमें वह बड़ा वैद्य था, छह बेटे राजाके हुए, एकसे एक अच्छे गरज़ अमरसिंहके घरानेमे सबके सब खूब हुए, और वह जो ब्राह्मणीसे हुआथा वही राजा- की दीवानी करताथा, उसमे जब कोई तक़सीर हुई तब राजाने
[header] सिंहासनबत्तीसी. ( १३ )
खिदमत लेली. वह लड़का वहांसे निकलकर धारापुरमें आया. अय राजा ! वहां सब तुम्हारे बुजुर्ग थे. उसे उन सबोंने माना, बड़ी आव भगत की. वहाका राजा तुम्हारा बाप था. कितनी मुद्दतके बाद उसने दगा करके उस राजाको मारडाला और आप वहांका राज लेकर उज्जैन नगरीमें आया और यहां आकर मरगया. शंख जो बडा बेटा क्षत्रियाके पेटका था सो वहां आकर वहांका राजा हुआ, राज करने लगा. और औ यह अहवाल है कि, एकरोज पंडितोंने आकर राजा शंखसे कहा कि, तेरा दुश्मन दुनियामें पैदा हुआ. यह बात पंडितोंके मुंहं सुनकर वह भौचक रहगया. ब्राह्मण कहने लगे-हम सब शास्त्र देखा है, उससे यही अहवाल निकलता है, कि, जो हमने तुझसे कहा. मगर एक बात और है कि हम उसे मुंहसे निकाल नहीं सकते. तब राजाने कहा-खैर, जो तुमने यह बात कही तो वहभी कहो ! तब उन्होंने कहा-हमारे विचारमें यह आता है कि, शंखको मार राजा विक्रम यह राज करे. यह बात सुनकर राजा हंसा और कहने लगा, ये पंडित बावले हैं, उन्हें कुछ ज्ञान नहीं. इसलिये ऐसी बात कहते हैं. यह बात अनसुनी कर राजा चुप रहा. पण्डित अपने दिलमें शरमिंदा हुए कि, हमारे शास्त्रको इसने झूठा जाना और हमको दिवाना ठहराया. जब कितने एक दिन इस बातपर गुजरे तब पण्डित अपने मकान-
(१४) सिंहासनबत्तीसी.
नोंमें बैठकर नजूम देखने लगे. उनमेंसे एक पंडित बोला-मेरे विचारमें यह आता है कि, राजा विक्रम कहीं नजदीक आन पहुँचा है. तब दूसरा उनमेंसे बोला-यहाँके किसी जंगलमें है. और एक उनमेंसे कहने लगा, उस जंगलमें एक तालाबभी है, वहीं अखाड़ा करके रहा है. तब एक ब्राह्मण उनमेंसे उठ खड़ा हुआ और जंगलको चला. वहां जाकर क्या देखता है कि, एक तालाब उसी राजा विक्रम तपस्या करता है मट्टीका एक महादेव बनाकर उसकी पूजा करता है और दंडवत् कर रहा है यह देखकर पंडित उलटा आया और सब पंडितोंको साथ लेकर राजाके नेारा गया और राजासे कहने लगा कि, तुम हमारे शास्त्रको झूठ मानते थे पर अब हम देखके आये हैं. फलाने जंगलमें राजा विक्रमादित्य आन पहुँचा. राजा शंख उस रोज सुनकर चुप रहा. सुबहको उठा और उस बनमें जातेही छिपकर देखने लगा कि, वह क्या करता है जहां राजा वीर विक्रमादित्य बैठा था वहांसे वह उठा पर तालावमें नहाकर फिर अपने आसनपर आकर बैठा और उसी तरहसे महादेवकी पूजा करने लगा. ओर यह : राजाभी निकलकर वहां जाकर खड़ा हुआ. जब वह विक्रम : महादेवकी पूजा कर चुका तब उसी महादेवकी पिण्डीपर उसने : पेशाब किया. जितने लोग राजाके साथ आयेथे, वे सब कहने : लगे कि, इसकी बुद्धि मारी गई है, कि पूजेहुये देवपर इसने
सिंहासनबत्तीसी. ( १५ ) थूता. तब एक पंडित उनमेंसे बोला कि, उठो महाराज! यह तुमने क्या किया ! तब वह बोला, कि हम जातिके ब्राह्मण हैं देवताको पूजें या मिट्टीको ! तब ब्राह्मणोंने कहा, राजा ! कुछ हम अच्छा नहीं देखते, क्योंकि तुम्हारी मत कुमत होगई. जब मरनेका दिन आदमीका नजदीक आताहै तो उसका मति मारी जाती है. तब राजा बोला, तुम दिवाने होगये हो और मुझेभी बावला बनाते हो, जो भगवानने लिखा है वही होवेगा उसको कोईभी मिटा नहीं सकता. तब पंडित आपसमें कहने लगे इस राजाने क्या अपना अकाज किया है ? तब राजा शंखने बिक्र- मको मारनेकी यह फिकिर की कि सात लकीर कोयलेरो जादूकी काढी और उनपर भुस फैला दिया जो जरा मालूम न हो. और उन लकीरोंका यह गुण था कि, जो उनके ऊपर पांव धरे सो बावला होजाय. और एक खीरा मँगाकर जादू किया और एक छुरी पढकर हाथमे रक्खा. उस छुरी खीरेका यह असर था कि जो उस छुरीसे खीरा काटे उसका शिर कट जाय. पंडितोने कहा-आप उ० बुलाओ. उन, लकीरोंपर पाव धरके जो आवेगा तो वह दिवाना हो जावेगा. बावला होकर यह खीरा जो अपने हाथसे लेकर काटेगा तो शिर उसका कट जायगा. जितने क्षत्रिय राजाके साथ आयेथे वे सब अपने दिलमें फिक्रमंद हुए कि, इस राजाने दगा किया है. यह क्षत्रियोंका धर्म नहीं.
( १६ ) सिंहासनबत्तीसी.
राजाने विक्रमादित्यको बुलाके कहा-हम तुम बैठकर एकजगह खीरा खावें. वह राजा योगी था, और इस इल्मको जानता था. उन लकीरोंसे बचकर सिंहासनके पास जाकर खडा रहा. खीरा और छुरा उसके हाथमेंसे लेलो. दाहिने हाथमें छुरी रक्खी और बाये हाथमे खीरा लिया. राजा शंख गाफील था फुरती करके छतसे छुरी मारी और राजाका काम तमाम किया. यह बात रत्नमं- जरीने जाहिर की और कहा कि-हे राजा ! तूं इस बातका सुन. खुदा जो रहम करे तो तिनकेसे पहाड करे और गजब करे तो पहाड़से जो तिनका किताबमें जो लिखा है, वह कभी झूठ नहीं होता. जब मांके पेटमें इन्सान आता है चार बातें साथ लाता है नफा और नुकसान दुःख और सुख. तीन लोक और चौदह भुवन फिरे लेकिन किस्मतका लिखा नहीं मिटता. भाईको मारा, दिलमें खुश हुआ उसके लोहूका माथेपर टीका लगा लिया. चलकर सिंहासनपर बैठा और चंवर ढुलवाया. उस राजाकी रानी उसके साथ सती हुई तब यह राजनीतिसे न्याय करने लगा. और जितने राजा उसके राजमें ये सब सुनकर खुश हुए. मुजरेको आये और दोनों वक्त दरबारमें हाजिर रहने लगे. इसी तरहसे राजा राज करने लगा. कितनें एक दिनोंके बाद एक दिन राजा शिकारको चला. तब कुत्ते, बाज, बहरी और जितने शिकारी जानवर थे सो सब साथ लिये. और जितने अच्छे-
पहली पुतली १. ( १७ )
[Page Header] पहली पुतली १. ( १७ )
अच्छे गुलचले ओर तीरंदाज थे, साथ लिये, जाकर एक जंग- लमें पहुंचे वहां हिरनके पीछे राजाने अपना घोड़ा डाला. तब राजा आगे बढ़गया और सबके साथ कोई भी न पहुँचा. एक बड़े जंगलमे राजा जा निकला और वहा जाकर सोच करने लगा कि, मैं कहां आया ? राहभी भूला और साथभी गवाँया इतनेमें जो निगाह की तो एक बड़ा दरख्त देखा और उस- दरख्तकी फुनगीपर चढ़गया वहांसे देखने लगा, जंगलही- जंगल नजर आताथा. मगर एक तरफ जो देखा तो एक शहर नजर आया. उसको देखकर राजाकी एक ढाढ़ससी बँधी वह नगर जो देखा तो निहायत आबाद है. कबूतर वहां उड रहे हैं चीलहे मडरा रही हैं. सूर्य्यकी झलकसे हवेलियोंके कलश चमक रहे हैं यह देख कहने लगा कि, यह नया शहर मैने देखा. कल इसे छीनलूगा. और इस नगरके राजाका दीवान जिसका नाम लूनबरन था वह कौवेके भेससे रहता था. उस तरफसे खडा हुआ आताथा. उसने यह राजा मुँहसे बात सुनी और बहुत दिलमे खपा हुवा. गुस्सेसे उसके मुँहमें बीट करदी. राजा गजवमें आया. इतनेमें लोग कुछ उसके वहां आप पहुँचे, उनके साथ होकर अपने शहरमें दाखिल होगया. और दीवानको हुक्म किया कि जहानमे जहां तक कौवे हैं वे सब पकड़ लावो. यह सुनतेही चारों तरफ बहेलिये
( १८ ) सिंहासनबत्तीसी दौड़े और कौवे पकड़ पकड़ लाये, और पींजरेमें बंद किये राजाने जाकर उन कौवोंसे कहा-अरे चांडाळा ! वह कौनसा कौवा था कि जिसने हमारे मुँहपर बीट की ? तुम सच कहोगे तो हम सबको छोड़ देंगे, नहीं कहोगे तो सबको मार डालेंगे. यह राजाकी बात सुनके सब कौवे बोले-महाराज ! हममें कोई कौवा नहीं रहा जो पकड़ा नहीं आया और वह काम हमसे नहीं हुआ. तब राजा जियादः खफा हुआ और बोला कि- तुम सबके सिवाय वह कौन कौवा है कि जिसने यह काम किया ? तब उन्होंने कहा-महाराज ! सच पूछते हो तो हम कहते हैं, बाहुबल एक राजा है, उदय अस्तग उसका राज है, और उसका दीवान लूतबरन बड़ा दानी बहुत होशियार पंडित है, वह कौवेके भेसमें रहता है. यह काम उसका हो तो हो; क्योंकि कौवेकी सूरत एक वह बच रहा है. तब राजाने कहा वह किस तरहसे हमारे पास आवै ? उसका बयान कुछ समझ- कर मुझे इलाज बताओ ? कोई तुम्हारे यहांसे वकील जाय और उसको ले आवै, तुम अपने यहांसे दो कौवोंको भेजदो और वे जाकर उसको यहां ले आवें. तब उन्हींमेंसे दो कौवे वहीं गये. उनकी लूतबरनने बहुतसी आव भगत की और पूँछा कि, तुम यहां किसलिये आयेहो ? तब वे बोले महाराज ! तुम्हारे वगर हम सब कौवे मारे जातेहैं. इसवास्ते जो तुम राजा
पहली पुतली १. ( १९ )
पहली पुतली १. ( १९ )
विक्रमादित्यके पास चलो तो हम सबोंकी जान बचे तब लूतबरन बोला-धन्य भाग जो तुम मेरे पास अपना मतलब समझकर आयेहो. जो कुछ काम मुझसे होगा उसके लिये मैं कभी ना न करूंगा. यह कहकर अपने राजाके पास आया और राजासे हुक्म लेकर उनके साथ गया. जब सब कौवोंने उस दीवानको देखा तब वे राजासे कहने लगे कि-महाराज ! आप जिसका नाम लेतेथे वह यही आता है. राजाने देखकर उसे आदर करके आधी गद्दीपर बिठाया और क्षेम कुशल पूंछी. वो आसीस देकर बोला राजा ! किसलिये तुमने मुझे याद किया ! और किसवास्ते इन सबको बंद किया ! जब लूतबरनने यह बात पूछी तब राजा विक्रम कहने लगां-मैं एकदिन शिकारको गयाथा. इत्तिफाकन जंगलमें राह भूलगया तब एक बरगदपर चढकर चारों तरफ देखने लगा इतनेमें एक कौवेने मुझपर बीट करदी. इसलिये मैंने सब कौवोंको बंद किया. जबतक इन- मेंसे कोई सच न कहेगा तबतक एक कौवा इनमेंसे न छोडूंगा. बल्कि जानसे इन सबको मारूंगा. फिर लूतबरन बोला-महाराज ! यह काम सब मेरा है. जब तुम्हें मैंने मगरूर देखा तब मेरे मनमें गुस्सा आया, और अकल मेरी उसवक्त जाती रही. यह सुनकर राजा हँसा. और बिगड़कर कहने लगा. मुझे मगरूर क्यों न हो ? राजा मैं हूं, दाता मैं हूं, सिपाही
[header] ( २० ) सिंहासनबत्तीसी. मैं हूं. और कौनसी बात मुझमें नहीं है? सो तुम कहो, तब वह बोला-वह जो नगर तुमने नजर भरके देखा है उसका में सब बयान करताहूं. राजा बाहुबल नाम वहांका कदीम राजा है. और गंधर्वसेन बाप तुम्हारा उसका दीवान था. राजाको उसकी तरफसे कुछ बेइतबारी हुई तब उसे छुड़ादिया. वह नगर अंबावतीमें आया और उस जगहका राजा हुआ. उसका बेटा तूं विक्रम है. तुझे जगमें कौन नहीं जानता? पर जबतक राजा बाहुबल तुझे राजतिलक न देगा तबतक तेरा राज अचल न होगा और वह जो यह तेरी ख़बर पावेगा तब वही तेरेपर चढ़कर दौड़ेगा और तुझे आकर एक घड़ीमें राखके बराबर करदेगा इस वास्ते तुझे जो मैं सलाह दूंगा उसे मान और किसी तरहसे उस राजाके पास जाकर राजाको मोहबत दिलाकर तिलक उससे ले, जिससे यहांका अचल राज तू करे. राजा विक्रम बड़ा अकलमंद था, इसवास्ते इस बातपर कायम रहा ऐसी बातें लतबरनसे सुनकर कुछ दिलमें न लाया और हँसकर कानदे सब सुनी. फिर लतबरनने कहा-जो तुम्हें चलना हो तो हमारे साथ चलो और पंडितोंसों अच्छी साअत दिखाकर चलनेकी तैयारी करो. दूसरे दिन सुबहके वक्त राजा लतबरन मंत्रीके साथ होकर चला और राजा बाहुबलके नगरमें जाकर पहुंचा तब उस दीवानने राजा विक्रमसों
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी लिप्यंतरण दिया गया है:
कहा-यहां बैठो और मैं अपने राजाको तुम्हारे आनेकी खबर दूं. यह बात राजासे कहकर लूनबरन अपने राजाके मंदिरमें गया उसको प्रणाम किया. और सब समाचार और अपनी हकीकतसमेत राजाका अहवाल कहने लगा-महाराज ? गंधर्व- सेनका बेटा विक्रम आपके दर्शनके लिये आया है. यह बात बाहुबल राजाने सुनकर उसको तुरंत अंदर बुलाया. तब लूनब- रन राजा विक्रमको लाया और अपने राजासे मिलाया. राजा उससे उठकर मिला और आदर करके आधे आसनपर बिठाया और क्षेम कुशल पूछी बाद उसके रहनेके लिये मकान बताया राजा उठकर उस मकानमें आया, वहा रहने लगा. जब दस पांच दिन बीतगये तब दीवानसे राजा विक्रमने कहा-हमें तुम विदा करवा दो, तो हम अपने स्थानको जावें तब मंत्री कहने लगा-हमारे राजाका यह स्वभाव है कि जो उनसे मिलनेको आताहै उसे अपना रुखसत नहीं करते, तुम रुखसत मांगो और जिस बातकी ख्वाहिश हो सो कहो, अपने जीमें कुछ शर्म न करो. तब राजा बोला-मुझे कुछ नहीं चाहिये. जो कोई जो बर चाहे सो मुझसे ले. तब दीवान बोला-राजा ! यह हमारी बात सुनो. इस राजाके घरमें एक सिंहासन है सो वह सिंहासन पहले महादेवजीने राजा इंद्रको दियाथा और इंद्र राजाने इसको दिया. उस सिंहासनमें ऐसा गुण है कि, जो उसपर बैठे
( १२ ) सिंहासनबत्तीसी. सो सात द्वीप और नौ खंड पृथ्वीका अजीत होकर राज करे और बहुतसा जबाहिर उसमें जटा है. और उस सिंहासनमें बत्तीस पुतलियांभी बनी हैं. अमृत देकर उनको सांचेमें ढाला है. तुम रुखसत होते हुए वह सिंहासन राजाजी मांगो कि उसपर बैठकर आनंदसे राज करेंगे. यह रातको दीवाननें सलाह दी. और सुबहको राजाके दरबारमें दीवानने जाके खबर दी कि, महाराज ! विक्रम रुखसत होताहै और आपके पास आनेको बाहर खडा है. यह सुनकर राजा फिर फौरन दरवाजेपर आया ओर विक्रमने देखकर अपना माथा नवाया राजानें विक्रमसे कहा जो तुम्हारे जीमें आवे सो मांगो मैं खुश होकर तुमको वही दूंगा तब विक्रम बोला-महाराज ! जो आपने मुझपर दया की है, तो वह सिंहासन मुझे बकशो, जो इंद्रने आपको दिया है. यह बात सुनकर राजा बोला-अच्छा, सिंहासन तो हमने तुम्हें दिया, पर, यह काम मंत्रीका है, इसे तुम नहीं जानतेथे. यह कहकर सिंहासन मँगाया और पान तिलक देकर उस सिंहासनपर बिठाया और कहा कि-तुम अजीत हुए. अब किसी बातकी चिंता मनमे न करना, गंधर्वसेन मेरा बडा दोस्त था और तू उसके खान- दानमें बडा नामवर हुवा. इस तरहसे राजा विक्रमको आसीस देकर रुखसत किया. राजा वहांसे अपने घरमें आया.
पहली पुतली १. ( २३ )
पहली पुतली १. ( २३ )
और अपने जीमें बहुतसा खुश हुआ, और जितने उस राजाके दुश्मन थे उनके जीमें रंज हुआ राजाके देशके लोगोंने बहुत खुशीकी और सब द्वीपद्वीपके राजा खिदमतके वास्ते आये, और जो राजा गरूर था उसका वहां जाकर राज छीन लेलीया, और अपना राज करता, गरज उदयसे अस्ततक खूब उसने अपना राज किया, सब रैय्यत आनंदसो उस राजमें बसती थी, और जो क्षत्रिय थे सो सब उनको डरते थे और जो कोई देश विदेश जाता था सो वहां विक्रमका धर्म सुनता था, और सब मुल्क आबाद देखता था, कहीं दुःखी उसे नजर न आता था, डाड और बांध उसके राजभरमे किसीने कानसे न सुना, बल्कि घर घर आवाज वेद और पुराणकी आती थी, और जितने लोग थे वे सब स्नान ध्यान करके तीनो वख्त अपने भगवानकी यादमें रहते थे, अपने घरमें सब राजा किसी सभा करके खुश रहते थे, राजा राजप्रजा सुखी, इसके एक दिन राजा विक्रमादित्यने सभा की ओर सब पंडितोंको बुलाया, और पंडितोंसे राजाने पूँछा कि--मेरे जीमें है कि अब मै संवत बांधूं, सो तुमसो पूँछताहूँ कि, मै इसबातके लायक हूँ कि नहीं हूं ? सो तुम शास्त्र देखकर मुझसे विचारके कहो, सब पंडितोंने विचार करके राजासे कहा--महाराज ! अब जो तुम्हारा प्रताप है सो तीनो भुवनोमें छाय रहाहै, इस वास्ते जो
( २४ ) सिंहासनबत्तीसी.
कुछ तुम्हें करना है सो कीजिये. दुश्मन तुम्हारा कोई नहीं राजाने यह सुनकर पंडितोंसे कहा कि—अब तुम बताओ कि, किस बुद्धीसे संवत् बांधू ? जो कुछ शास्त्रकी रीतिमे मुनासिब हो तिस तरहसे हमें कहो ? तब पंडितोंने कहा—पहले तो तुम अजीतमाल पहनो, फिर उसके बाद देश देशके ब्राह्मण और जमीनदार, राजा और अपने सब कुटुंबके लोग बुलावो. सवालाख कन्यादान सवालाख ब्राह्मणोंको करो. और जितने ब्राह्मण तुम्हारे मुल्कके हैं उनकी वृत्ति करदो. एक बरसका खजाना जमीदारोंको माफ करो और जो भूखा, कंगाल इस बरसमें आवे उसको वृत्तिका हुक्म करो. इसी तौरसे राजाने सब काम किया. और सिवा इसके जो जो दान पुण्य किया उनका बयान किससे हो ? एक बरसतक राजा अपने घरमें बैठे पुराण सुनता रहा और इस तरहसे संवत् बांधा, कि तमाम दुनियाके लोक धन्य धन्य करतेथे. यह सब अहवाल राजाको रत्नमंजरीने सुनाया और राजा विक्रमादि- त्यका यश गाया. और कहा—राजा भोज ! जो तुम इतने हो तो इस सिंहासनपर बैठो. सुनके राजाने कहा सच है जो कुछ तूने कहा यह बात मुझेभी पसंद आई. इतना कहकर राजा अपनी सभामें जाकर बैठा. और दीवान मुसदियोंको बुलाया कि, तुम सब तैयारी संवत् बांधनेकी करो. इस दिनकी वह