संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७७७
| १७१ काञ्चनाक्षी—सुवर्णके समान उद्दीप्त नेत्रोंवाली, १७२ कामधेनुः—भक्तोंकी मनोवांछा पूर्ण करनेमें कामधेनुके समान अथवा कामधेनुस्वरूपा, १७३ कीर्तिकृत्—अपने सुयशका विस्तार करनेवाली, १७४ क्लेशनाशिनी—अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेशरूप पाँच क्लेशोंका नाश करनेवाली, १७५ क्रतुश्रेष्ठा—यज्ञोंसे श्रेष्ठ—अश्वमेध आदि यज्ञोंसे अधिक फल देनेवाली, १७६ क्रतुफला—जिसमें स्नान करनेसे यज्ञोंका फल प्राप्त होता है, ऐसी, १७७ कर्मबन्धविभेदिनी—शुभाशुभकर्मजनित बन्धनका नाश करनेवाली। १ | १९६ कमनीयजला—कमनीय अर्थात् स्वच्छ जलवाली, १९७ कम्रा—मनोहर स्वरूपवाली, १९८ कपर्दिसुकपर्दगा—भगवान् शंकरके सुन्दर जटाजूटमें वास करनेवाली। ४<br>१९९ कालकूटप्रशमनी—भगवान् शंकरके पीये हुए कालकूट नामक विषकी ज्वालाको शान्त करनेवाली, २०० कदम्बकुसुमप्रिया—कदम्बके पुष्पोंमें रुचि रखनेवाली, २०१ कालिन्दी—कलिन्दकन्या यमुनास्वरूपा, २०२ केलिललिता—क्रीडासे मनोहर प्रतीत होनेवाली, २०३ कलकल्लोलमालिका—मनोहर लहरोंकी श्रेणियोंसे सुशोभित। ५ |
| १७८ कमलाक्षी—कमलके समान या कमलरूप नेत्रोंवाली, १७९ क्लमहरा—सांसारिक क्लेशको हर लेनेवाली, १८० कृशानुSpanद्युतिः—आधिदैविक स्वरूपमें अग्नि और सूर्यके समान कान्तिवाली, १८१ करुणार्द्रा—करुणारससे भीगी हुई, १८२ कल्याणी—मंगलस्वरूपा, १८३ कलिकल्मषनाशिनी—कलिकालमें होनेवाले पापोंका नाश करनेवाली। २ | २०४ क्रान्तलोकत्रया—स्वर्ग, भूतल और पाताल तीनों लोकोंको अपनी धारासे आक्रान्त करनेवाली, २०५ कण्डूः—अविद्या और उसके कार्यको खण्डित करनेवाली, २०६ कण्डूतनयवत्सला—कण्डू शब्द मृकण्डुका वाचक है, उनके पुत्र मार्कण्डेयजीपर वात्सल्य स्नेह रखनेवाली, २०७ खड्गिनी—देवी-रूपसे खड्ग धारण करनेवाली, २०८ खड्गधाराभा—तलवारकी धारके समान उज्ज्वल कान्तिवाली, २०९ खगा—आकाशमें प्रवाहित होनेवाली, २१० खण्डेन्दुधारिणी—अर्धचन्द्र धारण करनेवाली। ६ |
| १८४ कामरूपा—इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली, १८५ क्रियाशक्तिः—क्रियाशक्ति, १८६ कमलोत्पलमालिनी—कमल और उत्पलोंकी माला धारण करनेवाली, १८७ कूटस्था—ब्रह्मस्वरूपा, १८८ करुणारूप—दयामयी, १८९ कान्ता—कान्तिमती, १९० कूर्मयाना—कच्छपरूप वाहनवाली, १९१ कलावती—चौंसठ कलाओंको जाननेवाली। ३ | २११ खेखेलगामिनी—आकाशमें लीलापूर्वक चलनेवाली, २१२ खस्था—आकाश अथवा ब्रह्ममें स्थित, २१३ खण्डेन्दutilकप्रिया—चन्द्रभाल शिवकी प्रिया अथवा अर्धचन्द्राकार तिलकसे प्रसन्न होनेवाली, २१४ खेचरी—आकाशमें विचरण करनेवाली, २१५ खेचरीवन्द्या—आकाशमें विहार करनेवाली सिद्धांगनाओंकी वन्दनीया, २१६ ख्यातिः—प्रतिष्ठास्वरूपा, २१७ ख्यातिप्रदायिनी—प्रतिष्ठा देनेवाली। ७ |
| १९२ कमला—लक्ष्मीस्वरूपा, १९३ कल्पलतिका—कल्पलताके समान सब कामनाओंको पूर्ण करनेवाली, १९४ काली—कालिकास्वरूपा, १९५ कलुषवैरिणी—पापोंका नाश करनेवाली, |
१. काञ्चनाक्षी कामधेनुः कीर्तिकृत्क्लेशनाशिनी। क्रतुश्रेष्ठा क्रतुफला कर्मबन्धविभेदिनी॥
२. कमलाक्षी क्लमहरा कृशानुSpanद्युतिः। करुणार्द्रा च कल्याणी कलिकल्मषनाशिनी॥
३. कामरूपा क्रियाशक्तिः कमलोत्पलमालिनी। कूटस्था करुणा कान्ता कूर्मयाना कलावती॥
४. कमला कल्पलतिका काली कलुषवैरिणी। कमनीयजला कम्रा कपर्दिसुकपर्दगा॥
५. कालकूटप्रशमनी कदम्बकुसुमप्रिया। कालिन्दी केलिललिता कलकल्लोलमालिका॥
६. क्रान्तलोकत्रया कण्डूः कण्डूतनयवत्सला। खड्गिनी खड्गधाराभा खगा खण्डेन्दुधारिणी॥
७. खेखेलगामिनी खस्था खण्डेन्दutilकप्रिया। खेचरी खेचरीवन्द्या ख्यातिः ख्यातिप्रदायिनी॥