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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
४५८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

प्रकार श्रीकृष्ण-कीर्तनसे गुरुपत्नीगमन और सुवर्णकी चोरी आदि महापातक नष्ट हो जाते हैं। अगम्यागमन आदि महापापोंसे युक्त मनुष्य भी अन्तकालमें एक बार श्रीकृष्णनामका कीर्तन कर ले तो वह उससे पापमुक्त हो जाता है। जो जिह्वा कलिकालमें श्रीकृष्णके गुणोंका कीर्तन नहीं करती, वह दुष्टा मुँहमें न रहे, रसातलको चली जाय। जो कलियुगमें श्रीकृष्णके गुणोंका प्रयत्नपूर्वक कीर्तन करती है, वह जिह्वा अपने मुखमें हो या दूसरेके मुखमें, वन्दना करने योग्य है। जो दिन-रात श्रीकृष्णके गुणोंका कीर्तन नहीं करती, वह जिह्वा नहीं—मुखमें कोई पापमयी लता है, जिसे जिह्वाके नामसे पुकारा जाता है। जो 'श्रीकृष्ण-कृष्ण-कृष्ण-श्रीकृष्ण' इस प्रकार श्रीकृष्णनामका कीर्तन नहीं करती, वह रोगरूपिणी जिह्वा सौ टुकड़े होकर गिर जाय*।

जो श्रीकृष्णके नामकी इस महिमाका प्रातःकाल उठकर पाठ करता है, उसके लिये निश्चय ही मैं कल्याणदाता होता हूँ। जो तीनों सन्ध्याओंके समय श्रीकृष्णनामके माहात्म्यका पाठ करता है, वह जीते-जी सम्पूर्ण कामनाओंको और मरनेपर परम गतिको पाता है।

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श्रीकृष्णके बालस्वरूपका ध्यान, दामोदरमन्त्रके अधिकारी शिष्य और गुरुका लक्षण और श्रीमद्भागवतकी महिमा

श्रीभगवान् कहते हैं—ब्रह्मन्! अब मैं ध्यानका वर्णन करता हूँ। शोभाशाली उद्यानसे घिरी हुई एक सुवर्णमयी स्थली है। उसमें जगमगाते हुए रत्नोंका बना हुआ एक प्रकाशमान मण्डप है। उसके भीतर कल्पवृक्ष शोभा पा रहा है। उसके नीचे उद्दीप्त रत्नमय सिंहासन है, जिसके ऊपर कमलका आसन है। उसके ऊपर बालगोपाल श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण विराजमान हैं। उनके श्रीअंगोंकी कान्ति महानील-मणिके समान श्याम है। उनकी अत्यन्त बाल्यावस्था है। मुखके समीपतक चिकने काले, घुँघराले बाल बिखरे हुए हैं। उनसे उनके मुग्ध मुखारविन्दकी ऐसी शोभा हो रही है, मानो खिले हुए कमलपर भ्रमरोंके समूह छा रहे हों। उनके नेत्र नीलकमलके समान परम सुन्दर हैं। फूलके समान खिले हुए गाल हिलते हुए कुण्डलोंसे अतिशय सुशोभित हो रहे हैं। उनकी नुकीली नाक, लाल ओष्ठ और मन्द-मुसकानसे सुशोभित मुख सभी सुन्दर हैं। कण्ठमें अनेकानेक चमकते हुए आभूषण उनकी शोभा बढ़ा रहे हैं। वे विकसित कमलके समान बघनखा पहने हुए हैं। उनके नेत्र सुन्दर हैं। गौओंकी धूलि पड़नेसे उनका वक्षःस्थल धूसरित हो रहा है। उनके सभी अंग हृष्ट-पुष्ट हैं। सुवर्णमय अलंकारोंसे उनकी दीप्ति बढ़ रही है। मनोहर पिण्डलियों और जाँघोंसे सुशोभित कटिप्रदेशमें करधनी बँधी हुई है, जिसकी क्षुद्रघण्टिकाओंसे मधुर झनकार हो रही है। बन्धुजीव पुष्पके समान लाल-लाल हथेली और लाल कमलके समान चरणोंकी उदार शोभासे वे सुशोभित हैं। वे मन्द-मन्द हँस रहे हैं। उनके दाहिने हाथमें खीर है और बायें हाथमें वे तुरंतका निकाला हुआ शुद्ध माखन लिये हुए हैं। गायें और गोपियाँ उन्हें घेरकर बैठी हैं। इन्द्र आदि देवता भी उनके चरणोंमें मस्तक


* पततां शतखण्डा तु सा जिह्वा रोगरूपिणी। श्रीकृष्णकृष्णकृष्णेति श्रीकृष्णोति न जल्पति ॥
\hspace{300pt}(स्क० पु०, वै० मा० मा० १५। ६६)$

  • वैष्णवखण्ड-मार्गशीर्षमास-माहात्म्य * ४५९

झुकाते हैं। शेषनाग और वज्र आदिसे उपलक्षित उन देवाधिदेव भगवान् श्रीकृष्णका चिन्तन करके भक्तिभावसे नम्र हो प्रातःकाल उनकी पूजा करे और माखन-मिश्री, दही-दूध एवं कमल आदि अर्पण करके उन्हें प्रसन्न करे।

जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल आस्तिक भावसे युक्त होकर सदा इसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करता है, वह शीघ्र ही इस लोकमें समग्र लक्ष्मीको प्राप्त करता है और मृत्युके पश्चात् शुद्ध परम धाममें गमन करता है। उनका लोकमनोहर मन्त्र पहले ही बतलाया गया है। उसका नाम है श्रीमद्दामोदर-मन्त्र (श्रीदामोदराय नमः)। इस मन्त्रके कौन-कौन अधिकारी हैं, उनका वर्णन सुनो। इस मन्त्रराजका उपदेश किसी अयोग्य व्यक्तिको नहीं देना चाहिये। यह शीघ्र सिद्धि प्रदान करनेवाला एक रहस्य है, इसलिये यत्नपूर्वक इसकी रक्षा करनी चाहिये। आलसी, मलिन, क्लेशग्रस्त, दम्भी, मोहयुक्त, दरिद्र, रोगी, क्रोधी, रागी, भोगलोलुप, दोषदर्शी, ईर्ष्या रखनेवाला, शठ, कटुवादी, अन्यायपूर्वक धन कमानेवाला, परस्त्रियोंमें आसक्त रहनेवाला, विद्वानोंका वैरी, मूर्ख, अपनेको पण्डित माननेवाला, व्रतभ्रष्ट, जीविकाके क्लेशसे युक्त, चुगलखोर, दुष्टचित्त, बहुभोजी, निर्दयतापूर्ण चेष्टावाला, दुष्टोंका नेता, कंजूस, पापी, भयंकर, आश्रितोंको भय देनेवाला—इस प्रकारके दुर्गुणोंसे युक्त शिष्यको इस मन्त्रके उपदेशके लिये कभी नहीं ग्रहण करना चाहिये। यदि कोई ग्रहण करता है तो शिष्यका दोष प्रायः गुरुमें भी आ जाता है। मन्त्रीका दोष राजामें, स्त्रीका दोष पतिमें और शिष्यका दोष गुरुमें आता है—इसमें कोई सन्देह नहीं। इसलिये गुरुको चाहिये कि वह सदा शिष्यकी परीक्षा लेकर ही उसे ग्रहण करे।

जो मन, वाणी और शरीरसे गुरुकी सेवामें तत्पर रहनेवाला हो, जिसमें चोरीकी वृत्तिका सर्वथा अभाव हो, जो आस्तिक होनेके साथ ही मोक्षके लिये उद्योगशील हो, ब्रह्मचर्यका पालन करता हो, सदा दृढ़तापूर्वक व्रतमें स्थित रहता हो, जिसकी पापमें प्रवृत्ति न हो, जिसका चित्त प्रसन्न और अन्तःकरण निर्मल हो, जिसमें शठताका अभाव हो, जो शुद्ध, परोपकारी और स्वार्थकामनासे रहित हो, अपने तन, मन और धनसे गुरुको सन्तुष्ट रखनेवाला हो, आश्रितजनोंको प्रसन्न रखनेवाला और पवित्र हो—ऐसे ही शिष्यको मन्त्रका उपदेश दे, अन्यथा नहीं।

अब गुरुका लक्षण बतलाता हूँ। जिसका चित्त सम और शान्त हो, जो क्रोधरहित, सब लोगोंका सुहृद्, साधु, महात्मा, लोकमें सबपर समान दृष्टि रखनेवाला हो, वह गुरु कहा गया है। जो सदा मेरे व्रतको धारण करता है, वैष्णवगण जिसे सम्मानकी दृष्टिसे देखते हैं, जो मेरी कथावार्तामें अनुरक्त और मेरे उत्सवोंमें संलग्न रहता है, जो दयासागर, पूर्णकाम, सर्वभूतोपकारी, सब ओरसे निःस्पृह, सिद्ध, सर्वविद्याविशारद, समस्त संशयोंको निवारण करनेवाला और आलस्यरहित है, जो सब कालोंका ज्ञाता है तथा सबपर अनुग्रह रखता है, ऐसा आदरणीय ब्राह्मण गुरु कहा गया है। पूर्वोक्त लक्षणोंसे युक्त शिष्य ऐसे गुरुसे मेरी प्राप्ति करानेवाले मार्गशीर्षमासमें उक्त दामोदर-मन्त्रका उपदेश ग्रहण करे।

विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह वैष्णवोंके व्रतोंको स्वीकार करे। जो मुझे प्रिय लगनेवाले परम उत्तम श्रीमद्भागवतपुराणका पाठ करता है, उसे प्रत्येक अक्षरपर कपिला गौके दानका फल मिलता है। जो प्रतिदिन श्रीमद्भागवतके आधे या चौथाई श्लोकका पाठ करता अथवा सुनता है, उसे सहस्र गोदानका फल मिलता है। जो प्रतिदिन पवित्रचित्त हो भागवतके श्लोकका पाठ करता है, उसे अठारह पुराणोंके पाठ करनेका फल मिलता है। जहाँ नित्य मेरी कथा होती है, वहाँ वैष्णवगण स्थित होते हैं। जो सदा मेरी

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* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

पूजा करते हैं, वे मनुष्य कलियुगके बाहर हैं। जो कलियुगमें अपने घरपर प्रतिदिन भागवतशास्त्रकी पूजा करते हैं, उनके ऊपर मैं प्रसन्न होता हूँ। बेटा! जितने दिनोंतक घरमें भागवतशास्त्र रहता है, उतने दिनोंतक पितर दूध, घी और मधुके साथ जल पीते हैं। जो भक्तिपूर्वक वैष्णव विद्वान्‌को भागवतशास्त्र देते हैं, वे मेरे लोकमें निवास करते हैं। जो अपने घरपर सदा भागवतशास्त्रकी पूजा करते हैं, उनके उस पूजनसे सब देवता प्रलयकालतकके लिये तृप्त हो जाते हैं। सदा मेरी प्रसन्नताके लिये सबको वैष्णव-शास्त्रोंका संग्रह करना चाहिये। कलियुगमें जहाँ-जहाँ परम पवित्र भागवतशास्त्र रहता है, वहाँ-वहाँ मैं सम्पूर्ण देवताओंके साथ सदैव निवास करता हूँ। वहीं सम्पूर्ण तीर्थ, नदी, नद, सरोवर, यज्ञ, सातों पुरी तथा सम्पूर्ण पवित्र पर्वत निवास करते हैं। धर्मबुद्धि पुरुषको पापके नाश और मोक्षकी प्राप्तिके लिये सदा भागवतशास्त्र श्रवण करना चाहिये। श्रीमद्भागवत परम पवित्र, आयु, आरोग्य तथा पुष्टिको देनेवाला है। इसके पढ़ने और सुननेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो परम उत्तम श्रीमद्भागवतको न तो सुनते हैं और न सुनकर प्रसन्न ही होते हैं, उनपर सदा यमराजका प्रभुत्व रहता है, यह सर्वथा सत्य बात है। जिसके घरमें भागवतका एक या आधा श्लोक भी लिखकर रखा हुआ है, उसके यहाँ मैं स्वयं निवास करता हूँ। जो मेरी कथा बाँचता है, मेरी कथा सुननेमें संलग्न रहता है और मेरी कथा सुनकर जिसका मन प्रसन्न होता है, उस मनुष्यको मैं कभी नहीं छोड़ता। जो श्रीमद्भागवतका दर्शन करके उठकर खड़ा हो जाता और बारंबार प्रणामके द्वारा उसका सम्मान करता है, उसको देखकर मुझे अनुपम प्रसन्नता होती है। जो दूरसे भागवतशास्त्रको देखकर उसके सामने जाता है, उसे पग-पगपर अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं। जो श्रीमद्भागवतको सुनते हैं, मैं उनके वशमें होता हूँ। जो वस्त्र, आभूषण, पुष्प, धूप, दीप और नाना प्रकारके उपहारोंके साथ भक्तिपूर्वक मेरी प्रसन्नताके लिये श्रीमद्भागवत सुनते हैं, वे मुझे वशमें कर लेते हैं। ठीक उसी तरह जैसे साध्वी स्त्री अपने श्रेष्ठ पतिको वशमें कर लेती है।


मार्गशीर्षमासमें मथुरासेवनका माहात्म्य और ग्रन्थका उपसंहार

श्रीभगवान् कहते हैं— मथुरा नामसे विख्यात जो मेरा उत्तम क्षेत्र है, वह मेरी परम प्रिय प्रशस्त एवं रमणीय जन्मभूमि है। चतुर्मुख! मथुरामें जहाँ कहीं भी मनुष्य स्नान करता है, घोर पापसे मुक्त हो जाता है। सब धर्मोंसे रहित दुष्टात्मा पुरुषोंके लिये पापनाशिनी मथुरा नरककी पीड़ा दूर करनेवाली है। कृतघ्न, शराबी, चोर तथा प्रतिज्ञा भंग करनेवाला मनुष्य मथुरामें जाकर घोर पापसे मुक्त हो जाता है। जो किसी दूसरे प्रसंगसे अथवा व्यापार या नौकरीके लिये भी जाते हैं, वे भी मथुरामें स्नान करनेमात्रसे पापरहित होकर स्वर्गलोकमें चले जाते हैं। मथुराका नाम लेनेवाले लोगोंकी भी मुक्ति होती है। जो मनुष्य वहाँ तीन रात भी निवास करते हैं, वे अपने दर्शन तथा चरणरेणुके स्पर्शसे भी दूसरोंको पवित्र कर देते हैं। जैसे छोटी-छोटी चिनगारियाँ घास-फूसके बड़े भारी ढेरको भी जला डालती हैं, उसी प्रकार मथुरापुरी बड़े-बड़े पापोंको भस्म कर देती है। अन्य स्थानोंमें किया हुआ पाप तीर्थस्थानमें जानेसे नष्ट होता है, किंतु तीर्थोंमें किया हुआ पाप वज्रलेप हो जाता है*। चतुरानन! अन्य स्थानोंमें जिस पापका


* अन्यत्र हि कृतं पापं तीर्थमासाद्य नश्यति। तीर्थेषु यत्कृतं पापं वज्रलेपो भविष्यति॥ (स्क० पु० वै० मा० मा० १७। १७)

* वैष्णवखण्ड-मार्गशीर्षमास-माहात्म्य *४६१

भोग दस वर्षमें पूरा होता है, वह मथुरामें दस दिनमें ही पूरा हो जाता है। स्वर्ग, पाताल, अन्तरिक्ष तथा मनुष्यलोकमें मथुरापुरीके समान मेरा प्रिय क्षेत्र दूसरा नहीं है।

तीर्थराज प्रयागमें एक हजार वर्षतक निवास करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह मथुरापुरीमें केवल अगहनमें निवास करनेसे मिल जाता है। जिसने कभी मथुरापुरी नहीं देखी है और उसे देखनेकी इच्छा रखता है, उसकी कहीं भी मृत्यु क्यों न हो, वह मथुरामें जन्म लेता है। मेरे प्रिय भक्तो! तुम मथुरापुरीमें निवास करो, निवास करो। वहाँ गोपकन्याओंसे घिरा हुआ मैं सदैव निवास करता हूँ। संसारमें डूबे हुए शिष्यो! मेरी बात सुनो—यदि तुम घनीभूत आनन्द पाना चाहते हो, तो मथुरापुरीमें निवास करो। अहो! यह संसार बड़ा अंधा है, आँखें होते हुए भी नहीं देखता। मुक्तिदायिनी मथुराके होते हुए भी सदा जन्म-मरणरूपी संसार-चक्रका ही सेवन करता है। सौभाग्यवश अनुपम मनुष्ययोनि पाकर भी जिन्होंने मथुरापुरी नहीं देखी, उनकी आयु व्यर्थ ही बीत गयी। अहो! यह कैसी बुद्धिकी दुर्बलता है, मोहकी कितनी अद्भुत महिमा है कि मनुष्य मथुरापुरीका सेवन नहीं करते। जो मथुरापुरीको पाकर भी अन्यत्र जानेकी अभिलाषा करता है, वह अज्ञानसे ही सम्पन्न है। जो पापकी राशियोंसे आक्रान्त हैं, दरिद्रतासे पराजित हैं और जिनकी कहीं भी गति नहीं है, उन सबके लिये मेरी मथुरापुरी आश्रय है। यह सारसे भी अतिशय सारभूत स्थान है, गोपनीयसे भी अति गोपनीय परम रहस्य है। उत्तम गतिकी खोज करनेवाले पुरुषोंके लिये मथुरापुरी परम गति है। योगयुक्त ब्रह्मज्ञानी मनीषी पुरुषकी जो गति होती है, वही मथुरामें प्राणत्याग करनेवाले मनुष्यकी भी होती है। संसारमें काशी आदि पुरियाँ भी मोक्ष देनेके लिये प्रसिद्ध हैं तथापि उनमें मथुरा ही धन्य है; क्योंकि वह मनुष्योंको चार प्रकारकी मुक्ति प्रदान करती है। मथुरामें आकर मरे हुए कीट, पतंग आदि भी चतुर्भुजरूप हो जाते हैं। मथुरामें जिसे साँप डँस लेता है, जो पशुओंसे मारे जाते हैं, आगमें जलकर या पानीमें डूबकर मरते हैं—इस प्रकार अपमृत्यु पानेवाले लोग भी मेरे लोकमें जाते हैं। जो कामना रखनेवाले पुरुषोंको धर्म, अर्थ और काम देनेवाली है, मनुष्योंको मुक्ति प्रदान करती है और भक्तिकी इच्छा रखनेवालोंको भक्ति देती है, उस मथुराका कौन विद्वान् पुरुष आश्रय नहीं लेगा। ऐसी महिमामयी मधुपुरी मार्गशीर्षमासमें सेवन करने योग्य है। मार्गशीर्षमासमें जो पूर्णिमा होती है, उसमें जो पुण्य किया जाता है, वह मुझे अधिक प्रसन्न करनेवाला होता है। पुष्कर और मथुरामें पूर्णिमा तिथिको स्नान अवश्य करना चाहिये। मार्गशीर्षकी पूर्णिमा अनन्त फल देनेवाली है। अतः सब प्रकारके प्रयत्नोंसे उसका आदर करना चाहिये। जो भक्तिपूर्वक मेरे परम प्रिय मार्गशीर्षमासका व्रत करता है, वह पुत्ररहित हो तो पुत्र पाता है, निर्धन हो तो उसे धन मिलता है, विद्यार्थी हो तो विद्या और रूपार्थी हो तो रूप प्राप्त करता है। ब्राह्मण ब्रह्मतेजको पाता है, क्षत्रिय विजयी होता है, वैश्य खजानेका मालिक होता है और शूद्र पापसे शुद्ध होता है। तीनों लोकोंमें जो दुर्लभ वस्तु है, वह सब मनुष्य मार्गशीर्षमासमें स्नान एवं व्रत करनेसे प्राप्त कर लेता है। मुझको वशमें करनेवाली उत्तम भक्ति सर्वथा दुर्लभ है। वह भी इस मार्गशीर्षमासका माहात्म्य श्रवण करनेपर प्राप्त हो जाती है।

मार्गशीर्षमास-माहात्म्य सम्पूर्ण

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९. वैष्णवखण्ड (श्रीमद्भागवत-माहात्म्य)

४६२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

श्रीमद्भागवत-माहात्म्य

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परीक्षित् और वज्रनाभका समागम, शाण्डिल्य मुनिके मुखसे भगवान्‌की लीलाके रहस्य और व्रजभूमिके महत्त्वका वर्णन

महर्षि व्यास कहते हैं—
श्रीसच्चिदानन्दघनस्वरूपिणे
कृष्णाय चानन्तसुखाभिवर्षिणे।
विश्वोद्भवस्थाननिरोधहेतवे
नुमो वयं भक्तिरसाप्तयेऽनिशम्॥

'जिनका स्वरूप सच्चिदानन्दघन है, जो अपने सौन्दर्य और माधुर्यादि गुणोंसे सबका मन अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं और सदा-सर्वदा अनन्त सुखकी वर्षा करते रहते हैं, जिनकी ही शक्तिसे इस विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होते हैं—उन भगवान् श्रीकृष्णको हम भक्तिरसका आस्वादन करनेके लिये नित्य-निरन्तर प्रणाम करते हैं।'

नैमिषारण्यक्षेत्रकी बात है, श्रीसूतजी स्वस्थ चित्तसे अपने आसनपर बैठे हुए थे। उस समय भगवान्‌की अमृतमयी लीलाकथाके रसिक, उसके रसास्वादनमें अत्यन्त कुशल शौनकादि ऋषियोंने सूतजीको प्रणाम करके उनसे यह प्रश्न किया।

ऋषियोंने पूछा—सूतजी! धर्मराज युधिष्ठिर जब मथुरामण्डलमें अनिरुद्धनन्दन वज्रका और हस्तिनापुरमें अपने पौत्र परीक्षित्‌का राज्याभिषेक करके हिमालयपर चले गये, तब राजा वज्र और परीक्षित्‌ने कैसे-कैसे कौन-कौन-सा कार्य किया?

सूतजी बोले—शौनकादि ब्रह्मर्षियो! जब धर्मराज युधिष्ठिर आदि पाण्डवगण स्वर्गारोहणके लिये हिमालय चले गये, तब सम्राट् परीक्षित् एक दिन मथुरा गये। उनकी इस यात्राका उद्देश्य इतना ही था कि वहाँ जाकर वज्रनाभसे मिल-जुल आयें। जब वज्रनाभको यह समाचार मालूम हुआ कि मेरे पितातुल्य परीक्षित् मुझसे मिलनेके लिये आ रहे हैं, तब उनका हृदय प्रेमसे भर गया। उन्होंने नगरसे आगे बढ़कर उनकी अगवानी की, चरणोंमें प्रणाम किया और बड़े प्रेमसे उन्हें वे अपने महलमें ले आये। वीर परीक्षित् भगवान् श्रीकृष्णके परम प्रेमी भक्त थे। उनका मन नित्य-निरन्तर आनन्दघन श्रीकृष्णचन्द्रमें ही रमता रहता था। उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णके प्रपौत्र वज्रनाभका बड़े प्रेमसे आलिंगन किया। इसके बाद अन्तःपुरमें जाकर भगवान् श्रीकृष्णकी पत्नियोंको नमस्कार किया। श्रीकृष्ण-पत्नियोंने भी सम्राट् परीक्षित्‌का अत्यन्त सम्मान किया। वे जब आरामसे बैठ गये, तब उन्होंने वज्रनाभसे यह बात कही।

राजा परीक्षित्‌ने कहा—तुम्हारे पिता और पितामहोंने मेरे पिता-पितामहको बड़े-बड़े संकटोंसे बचाया है। मेरी रक्षा भी उन्होंने ही की है।

वज्रनाभ बोले—महाराज! आप मुझसे जो कुछ कह रहे हैं, वह सर्वथा आपके अनुरूप है। आपके पिताने भी मुझे धनुर्वेदकी शिक्षा देकर मेरा महान् उपकार किया है। इसलिये मुझे किसी बातकी तनिक भी चिन्ता नहीं है। क्योंकि उनकी कृपासे मैं क्षत्रियोचित शूरवीरतासे भली-भाँति सम्पन्न हूँ। मुझे चिन्ता है, तो केवल एक बातकी। सचमुच वह बहुत बड़ी चिन्ता है। आप उसके सम्बन्धमें कुछ विचार कीजिये। वह चिन्ता यह है कि यद्यपि मैं मथुरामण्डलके राज्यपर अभिषिक्त हूँ, तथापि मैं यहाँ निर्जन वनमें ही रहता हूँ। इस

  • वैष्णवखण्ड-श्रीमद्भागवत-माहात्म्य * ४६३ बातका मुझे कुछ भी पता नहीं है कि यहाँकी प्रजा कहाँ चली गयी; क्योंकि राज्यका सुख तो तभी है जब प्रजा रहे। जब वज्रनाभने परीक्षित्से यह बात कही, तब उन्होंने वज्रनाभका सन्देह मिटानेके लिये महर्षि शाण्डिल्यको बुलवाया। ये ही महर्षि शाण्डिल्य पहले नन्द आदि गोपोंके पुरोहित थे। परीक्षित्का सन्देश पाते ही महर्षि शाण्डिल्य वहाँ आ पहुँचे। वज्रनाभने विधिपूर्वक उनका स्वागत-सत्कार किया और वे एक ऊँचे आसनपर विराजमान हुए एवं उनको सान्त्वना देते हुए कहने लगे। शाण्डिल्यजीने कहा - प्रिय परीक्षित् और वज्रनाभ ! मैं तुमलोगोंसे व्रजभूमिका रहस्य बतलाता हूँ। तुम एकाग्र होकर सुनो ! 'व्रज' शब्दका अर्थ है व्याप्ति। व्यापक होनेके कारण ही इस भूमिका नाम 'व्रज' पड़ा है। सत्त्व, रज, तम - इन तीन गुणोंसे अतीत जो परब्रह्म है, वही व्यापक है। इसलिये उसे 'व्रज' कहते हैं। वह सदानन्दस्वरूप, परम ज्योतिर्मय और अविनाशी है। जीवन्मुक्त पुरुष उसीमें स्थित रहते हैं। इस परब्रह्मस्वरूप व्रजधाममें नन्दनन्दन भगवान् श्रीकृष्णका निवास है। उनका एक-एक अंग सच्चिदानन्दस्वरूप है। वे आप्तकाम हैं। प्रेमरसमें डूबे हुए रसिकजन ही उनका अनुभव करते हैं। 'काम' शब्दका अर्थ है - कामना, अभिलाषा; व्रजमें भगवान् श्रीकृष्णके वांछित पदार्थ हैं- गौएँ, ग्वालबाल, गोपियाँ और उनके साथ लीला-विहार आदि; वे सब-के-सब यहाँ नित्य प्राप्त हैं। इसीसे श्रीकृष्णको 'आप्तकाम' कहा गया है। भगवान् श्रीकृष्णकी यह रहस्यलीला प्रकृतिसे परे है। वे जिस समय प्रकृतिके साथ खेलने लगते हैं, उस समय दूसरे लोग भी उनकी लीलाका अनुभव करते हैं। प्रकृतिके साथ होनेवाली लीलामें ही रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणके द्वारा सृष्टि, स्थिति और प्रलयकी प्रतीति होती है। इस प्रकार यह निश्चय होता है कि भगवान्‌की लीला दो प्रकारकी है - एक वास्तवी और दूसरी व्यावहारिकी। वास्तवी लीला स्वसंवेद्य है - उसे स्वयं भगवान् और उनके रसिक भक्तजन ही जानते हैं। जीवोंके सामने जो लीला होती है, वह व्यावहारिकी लीला है। वास्तवी लीलाके बिना व्यावहारिकी लीला नहीं हो सकती; परंतु व्यावहारिक लीलाका वास्तवी लीलाके राज्यमें कभी प्रवेश नहीं हो सकता। तुम दोनों भगवान्‌की जिस लीलाको देख रहे हो, यह व्यावहारिक लीला है। यह पृथ्वी और स्वर्ग आदि लोक इसी लीलाके अन्तर्गत हैं। इसी पृथ्वीपर यह मथुरामण्डल है। यहीं वह व्रजभूमि है, जिसमें भगवान्‌की वह वास्तवी रहस्यलीला गुप्तरूपसे सदा होती रहती है। वह कभी-कभी प्रेमपूर्ण हृदयवाले रसिक भक्तोंको सब ओर दीखने लगती है। कभी अट्ठाईसवें द्वापरके अन्तमें जब भगवान्‌की रहस्य-लीलाके अधिकारी भक्तजन यहाँ एकत्र होते हैं, जैसा कि इस समय भी कुछ काल पहले हुए थे, उस समय भगवान् अपने अन्तरंग प्रेमियोंके साथ अवतार लेते हैं। उनके अवतारका यह प्रयोजन होता है कि रहस्यलीलाके अधिकारी भक्तजन भी अन्तरंग परिकरोंके साथ सम्मिलित होकर लीला-रसका आस्वादन कर सकें। इस प्रकार जब भगवान् अवतार ग्रहण करते हैं, उस समय भगवान्‌के अभिमत प्रेमी देवता और ऋषि आदि भी सब ओर अवतार लेते हैं। अभी-अभी जो अवतार हुआ था, उसमें भगवान् अपने सभी प्रेमियोंकी अभिलाषाएँ पूर्ण करके अब अन्तर्धान हो चुके हैं। इससे यह निश्चय हुआ कि यहाँ पहले तीन प्रकारके भक्तजन उपस्थित थे; ऐसा माननेमें तनिक भी सन्देहके लिये गुंजाइश नहीं है। उन तीनोंमें प्रथम तो उनकी श्रेणी है, जो भगवान्‌के नित्य 'अन्तरंग' पार्षद हैं - जिनका भगवान्‌से कभी वियोग होता ही नहीं। दूसरे वे हैं, जो एकमात्र भगवान्‌को पानेकी इच्छा रखते .279 Skandpuran_Section_17_1_Frontublic Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

४६४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


हैं—उनकी अन्तरंग लीलामें अपना प्रवेश चाहते हैं। तीसरी श्रेणीमें देवता आदि हैं। इनमेंसे जो देवता आदिके अंशसे अवतीर्ण हुए थे, उन्हें भगवान्ने ब्रजभूमिसे हटाकर पहले ही द्वारका पहुँचा दिया था; फिर जब ब्राह्मणोंके शापसे यदुवंशका संहार करनेके लिये साम्बके पेटसे मूसल प्रकट हुआ और उस मूसलके चूरेसे प्रभासक्षेत्रमें एरका नामकी घास उत्पन्न हो गयी, उस समय परस्पर कलह होनेपर सभी यदुवंशी उन एरकाओंसे एक-दूसरेको मारकर मर गये। इस प्रकार भगवान्ने उस मूसलके मार्गसे यदुकुलमें उत्पन्न हुए देवताओंको स्वर्गमें भेजकर पुनः अपने-अपने अधिकारपर स्थापित कर दिया। तथा जिन्हें एकमात्र भगवान्को ही पानेकी इच्छा थी, उन्हें प्रेमानन्दस्वरूप बनाकर श्रीकृष्णने सदाके लिये अपने नित्य अन्तरंग पार्षदोंमें सम्मिलित कर लिया। जो नित्य पार्षद हैं, वे यद्यपि यहाँ गुप्तरूपसे होनेवाली नित्यलीलामें सदा ही रहते हैं, परंतु जो उनके दर्शनके अधिकारी नहीं हैं, ऐसे पुरुषोंके लिये वे भी अदृश्य हो गये हैं। जो लोग व्यावहारिक लीलामें स्थित हैं, वे नित्यलीलाका दर्शन पानेके अधिकारी नहीं हैं; इसीलिये यहाँ आनेवालोंको सब ओर निर्जन वन—सूना-ही-सूना दिखायी देता है, क्योंकि वे वास्तविक लीलामें स्थित भक्तजनोंको देख नहीं सकते।<br><br>इसलिये वज्रनाभ! तुम्हें तनिक भी चिन्ता न करनी चाहिये। तुम मेरी आज्ञासे यहाँ बहुत-से गाँव बसाओ; इससे निश्चय ही तुम्हारेमनोरथोंकी सिद्धि होगी। भगवान् श्रीकृष्णने जहाँ जैसी लीला की है, उसके अनुसार उस स्थानका नाम रखकर तुम अनेकों गाँव बसाओ और इस प्रकार परम उत्तम ब्रजभूमिका सम्यक् प्रकारसे सेवन करते रहो। गोवर्धन, दीर्घपुर (डीग), मथुरा, महावन (गोकुल), नन्दिग्राम (नन्दगाँव) और वृहत्सानु (बरसाना) आदिमें तुम्हें अपने लिये छावनी बनवानी चाहिये और उन-उन स्थानोंमें रहकर भगवान्की लीलाके स्थल नदी, पर्वत, कन्दरा, सरोवर और कुण्ड तथा कुंज-वन आदिका सेवन करते रहना चाहिये। ऐसा करनेसे तुम्हारे राज्यमें प्रजा बहुत ही सम्पन्न होगी और तुम भी अत्यन्त प्रसन्न रहोगे। यह ब्रजभूमि सच्चिदानन्दमयी है—इसके कण-कणमें भगवान् श्रीकृष्ण रम रहे हैं; अतः तुम्हें हर तरहसे प्रयत्नपूर्वक इस भूमिका सेवन करना चाहिये। मैं आशीर्वाद देता हूँ; मेरी कृपासे भगवान्की लीलाके जितने भी स्थल हैं, सबकी तुम्हें ठीक-ठीक पहचान हो जायगी। वज्रनाभ! एक और बड़े महत्त्वकी बात बतलाता हूँ। इस ब्रजभूमिका सेवन करते रहनेसे तुम्हें किसी दिन उद्धवजी मिल जायँगे। फिर तो अपनी माताओंसहित तुम उन्हींसे इस भूमिका तथा भगवान्की लीलाका रहस्य भी जान लोगे।<br><br>मुनिवर शाण्डिल्यजी उन दोनोंको इस प्रकार समझा-बुझाकर भगवान् श्रीकृष्णका स्मरण करते हुए अपने आश्रमपर चले गये। उनकी बातें सुनकर राजा परीक्षित् और वज्रनाभ दोनों ही बहुत प्रसन्न हुए।

यमुना और श्रीकृष्णपत्नियोंका संवाद, कीर्तनोत्सवमें उद्धवजीका प्रकट होना

सूतजी कहने लगे—महाराज परीक्षित्‌को भगवान् श्रीकृष्णने ही जीवन-दान दिया था; अतः वेउनके पौत्र वज्रनाभके लिये क्या नहीं कर सकते थे? अखिल भूमण्डलके सम्राट् तो थे ही, उनकी

* वैष्णवखण्ड-श्रीमद्भागवत-माहात्म्य * ४६५


आज्ञा कौन नहीं मानता? उन्होंने इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली)-से हजारों बड़े-बड़े सेठोंको बुलवाकर उन्हें मथुरामें रहनेकी जगह दी। इनके अतिरिक्त मथुरामण्डलके ब्राह्मणोंको, जो भगवान्‌के बड़े ही प्रेमी थे, बुलवाया और उन्हें आदरके योग्य समझकर मथुरानगरीमें बसाया। इस प्रकार राजा परीक्षित्‌की सहायता और महर्षि शाण्डिल्यकी कृपासे वज्रनाभने क्रमशः उन सभी स्थानोंकी खोज की, जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण अपने प्रेमी गोप-गोपियोंके साथ नाना प्रकारकी लीलाएँ करते थे। लीलास्थानोंका ठीक-ठीक निश्चय हो जानेपर उन्होंने वहाँ-वहाँकी लीलाके अनुसार उस-उस स्थानका नामकरण किया, भगवान्‌के लीलाविग्रहोंकी स्थापना की तथा उन-उन स्थानोंपर अनेकों गाँव बसाये। स्थान-स्थानपर भगवान्‌के नामसे कुण्ड और कुएँ खुदवाये। कुंज और बगीचे लगवाये, शिव आदि देवताओंकी स्थापना की तथा गोविन्ददेव, हरिदेव आदि नामोंसे भगवद्विग्रह स्थापित किये। इन सब शुभ कर्मोंके द्वारा वज्रनाभने अपने राज्यमें सब ओर एकमात्र श्रीकृष्णभक्तिका प्रचार किया और ऐसा करके वे बड़े ही प्रसन्न हुए। उनके प्रजाजनोंको भी बड़ा आनन्द था। वे सदा भगवान्‌के मधुर नाम तथा लीलाओंके कीर्तनमें संलग्न हो परमानन्दके समुद्रमें डूबे रहते थे और सदा ही वज्रनाभके राज्यकी प्रशंसा किया करते थे।

एक दिनकी बात है, भगवान् श्रीकृष्णकी सोलह हजार रानियाँ यमुनाके तटपर स्नानके लिये गयीं। वे सभी निरन्तर भगवान्‌की विरह-वेदनासे व्याकुल रहती थीं। यमुनाजी भी भगवान्‌की ही पत्नी थीं, पर उनपर भगवान्‌के वियोगका कुछ असर न था। श्रीकृष्णकी पत्नियोंने देखा—यमुनाजी बहुत प्रसन्न हैं, उनके अंदरसे आनन्दकी लहरें उठ रही हैं। सौतकी यह प्रसन्नता देखकर भी रानियोंके मनमें डाह नहीं हुई। वे सरलभावसे पूछ बैठीं।

श्रीकृष्णकी रानियोंने कहा—बहिन कालिन्दी! जैसे हम सब श्रीकृष्णकी धर्मपत्नी हैं, वैसे ही तुम भी तो हो। हम तो उनकी विरहाग्निमें जली जा रही हैं, उनके वियोगदुःखसे हमारा हृदय व्यथित हो रहा है; किंतु तुम्हारी यह स्थिति नहीं है, तुम प्रसन्न हो। इसका क्या कारण है? कल्याणी! कुछ बताओ तो सही।

उनका प्रश्न सुनकर यमुनाजी हँस पड़ीं। साथ ही यह सोचकर कि मेरे प्रियतमकी पत्नी होनेके कारण ये भी मेरी ही बहिनें हैं, पिघल गयीं; उनका हृदय दयासे द्रवित हो उठा। अतः वे इस प्रकार कहने लगीं।

यमुनाजी बोलीं—अपनी आत्मामें ही रमण करनेके कारण भगवान् श्रीकृष्ण आत्माराम हैं और उनकी आत्मा हैं—श्रीराधाजी। मैं दासीकी भाँति राधाजीकी सेवा करती रहती हूँ; अवश्य ही उनकी सेवाका यह फल है कि मैं प्रसन्न हूँ। उनकी दासताके प्रभावसे ही विरह-शोक मुझे छू भी नहीं सकता। भगवान् श्रीकृष्णकी जितनी भी रानियाँ हैं, सब-की-सब श्रीराधाके ही अंशका विस्तार हैं। भगवान् श्रीकृष्ण और राधा सदा एक-दूसरेके सम्मुख हैं, उनका परस्पर नित्य संयोग है, इसलिये राधाके स्वरूपमें अंशतः विद्यमान जो श्रीकृष्णकी अन्य रानियाँ हैं, उनको भी भगवान्‌का नित्य संयोग प्राप्त है। श्रीकृष्ण ही राधा हैं और राधा ही श्रीकृष्ण हैं। उन दोनोंका प्रेम ही वंशी है तथा राधाकी प्यारी सखी चन्द्रावली भी श्रीकृष्णचरणोंके नखरूपी चन्द्रमाओंकी सेवामें आसक्त रहनेके कारण ही 'चन्द्रावली' नामसे कही जाती है। श्रीराधा और श्रीकृष्णकी सेवामें उसकी बड़ी लालसा, बड़ी लगन है। इसीलिये वह कोई दूसरा स्वरूप धारण

४६६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

नहीं करती। मैंने श्रीराधामें ही रुक्मिणी आदिका भी समावेश देखा है। यह सब तरहसे निश्चित बात है कि तुमलोगोंका भी श्रीकृष्णसे वियोग नहीं हुआ है; किंतु तुम इस रहस्यको इस रूपमें जानती नहीं हो, इसीलिये इतनी व्याकुल हो रही हो। इसी प्रकार पहले भी जब अक्रूर श्रीकृष्णको नन्दगाँवसे मथुरामें ले आये थे, उस अवसरपर जो गोपियोंको श्रीकृष्णसे विरहकी प्रतीति हुई थी, वह भी वास्तविक विरह नहीं, केवल विरहका आभास था। इस बातको जबतक वे नहीं जानती थीं, तबतक उन्हें बड़ा कष्ट था; फिर जब उद्धवजीने आकर उनका समाधान किया, तब वे इस बातको समझ सकीं। उद्धवजीने उनके इस विरहको विरहाभास ही बतलाया, वास्तवमें तो उनका भगवान्‌से नित्य संयोग था। यदि तुम्हें भी उद्धवजीका सत्संग प्राप्त हो जाय, तो तुम सब भी अपने प्रियतम श्रीकृष्णके साथ नित्य विहारका सुख प्राप्त कर लोगी।

**सूतजी कहते हैं—**ऋषिगण! जब उन्होंने इस प्रकार समझाया, तब श्रीकृष्णकी पत्नियाँ सदा प्रसन्न रहनेवाली यमुनाजीसे पुनः बोलीं। उस समय उनके हृदयमें इस बातकी बड़ी लालसा थी कि किसी उपायसे उद्धवजीका दर्शन हो, जिससे हमें अपने प्रियतमके नित्य संयोगका सौभाग्य प्राप्त हो सके।

**श्रीकृष्णपत्नियोंने कहा—**सखी! तुम्हारा ही जीवन धन्य है; क्योंकि तुम्हें कभी भी अपने प्राणनाथके वियोगका दुःख नहीं भोगना पड़ता। जिन श्रीराधिकाजीकी कृपासे तुम्हारे अभीष्ट अर्थकी सिद्धि हुई है, उनकी अब हमलोग भी दासी हुईं। किंतु तुम अभी कह चुकी हो कि उद्धवजीके मिलनेपर ही हमारे सभी मनोरथ पूर्ण होंगे; इसलिये कालिन्दी! अब ऐसा कोई उपाय बताओ, जिससे उद्धवजी भी शीघ्र ही मिल जायँ।

**सूतजी कहते हैं—**श्रीकृष्णकी रानियोंने जब यमुनाजीसे इस प्रकार कहा, तब वे भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रकी सोलह कलाओंका चिन्तन करती हुई उनसे कहने लगीं—‘‘उद्धवजी भगवान् श्रीकृष्णके मन्त्री थे। जब भगवान् अपने परमधामको पधारने लगे, तब उन्होंने मन्त्री उद्धवसे कहा—'उद्धव! साधना करनेकी भूमि है बदरिकाश्रम, अतः अपनी साधना पूर्ण करनेके लिये तुम वहीं जाओ।' भगवान्‌की इस आज्ञाके अनुसार उद्धवजी इस समय अपने साक्षात् स्वरूपसे बदरिकाश्रममें विराजमान हैं और वहाँ जानेवाले जिज्ञासु लोगोंको भगवान्‌के बताये हुए ज्ञानका उपदेश करते रहते हैं। साधनकी फलरूपा भूमि है—ब्रजभूमि; इसे भी इसके रहस्योंसहित भगवान्‌ने पहले ही उद्धवको दे दिया था। किंतु वह फलभूमि यहाँसे भगवान्‌के अन्तर्धान होनेके साथ ही स्थूल दृष्टिसे परे जा चुकी है; इसीलिये इस समय यहाँ उद्धव प्रत्यक्ष दिखायी नहीं पड़ते। फिर भी एक स्थान है, जहाँ उद्धवजीका दर्शन हो सकता है। गोवर्धन पर्वतके निकट भगवान्‌की लीलासहचरी गोपियोंकी विहार-स्थली है; वहाँकी लता, अंकुर और बेलोंके रूपमें अवश्य ही उद्धवजी वहाँ निवास करते हैं। लताओंके रूपमें उनके रहनेका यही उद्देश्य है कि भगवान्‌की प्रियतमा गोपियोंकी चरणरज उनपर पड़ती रहे। उद्धवजीके सम्बन्धमें एक निश्चित बात यह भी है कि उन्हें भगवान्‌ने अपना उत्सव-स्वरूप प्रदान किया है। भगवान्‌का उत्सव उद्धवजीका अंग है, वे उससे अलग नहीं रह सकते; इसलिये अब तुमलोग वज्रनाभको साथ लेकर वहाँ जाओ और कुसुम सरोवरके पास ठहरो। भगवद्भक्तोंकी मण्डली एकत्रित करके वीणा, वेणु और मृदंग आदि बाजोंके साथ भगवान्‌के नाम और लीलाओंके कीर्तन, भगवत्सम्बन्धी काव्य-कथाओंके श्रवण तथा भगवद्गुणगानसे युक्त सरस संगीतोंद्वारा महान् उत्सव आरम्भ करो। इस प्रकार जब उस महान्

* वैष्णवखण्ड-श्रीमद्भागवत-माहात्म्य * ४६७

उत्सवका विस्तार होगा, तब निश्चय है कि वहाँ उद्धवजीका दर्शन मिलेगा। उद्धवजी ही भलीभाँति तुम सब लोगोंके मनोरथ पूर्ण करेंगे।'

सूतजी कहते हैं—यमुनाजीकी बतायी हुई बातें सुनकर श्रीकृष्णकी रानियाँ बहुत प्रसन्न हुईं। उन्होंने यमुनाजीको प्रणाम किया और वहाँसे लौटकर वज्रनाभ तथा परीक्षित्से वे सारी बातें कह सुनायीं। सब बातें सुनकर परीक्षित्को बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने वज्रनाभ तथा श्रीकृष्णपत्नियोंको उसी समय साथ ले उस स्थानपर पहुँचकर तत्काल वह सब कार्य आरम्भ करवा दिया, जो कि यमुनाजीने बताया था। गोवर्धनके निकट वृन्दावनके भीतर कुसुम सरोवरपर, जो सखियोंकी विहार-स्थली है, वहाँ ही श्रीकृष्णकीर्तनका उत्सव आरम्भ हुआ। श्रीराधाजी तथा उनके प्रियतम श्रीकृष्णकी वह लीलाभूमि जब साक्षात् संकीर्तनकी शोभासे सम्पन्न हो गयी, उस समय वहाँ रहनेवाले सभी भक्तजन एकाग्र हो गये; उनकी दृष्टि, उनके मनकी वृत्ति कहीं अन्यत्र न जाती थी। तदनन्तर सबके देखते-देखते वहाँ फैले हुए तृण, गुल्म और लताओंके समूहसे प्रकट होकर श्रीउद्धवजी सबके सामने आये। उनका शरीर श्यामवर्ण था, उसपर पीताम्बर शोभा पा रहा था। वे गलेमें वनमाला और गुंजाकी माला धारण किये हुए थे तथा मुखसे बारंबार गोपीवल्लभ श्रीकृष्णकी मधुर लीलाओंका गान कर रहे थे। उद्धवजीके आगमनसे उस संकीर्तनोत्सवकी शोभा कई गुनी बढ़ गयी। उस समय सभी लोग आनन्दके समुद्रमें निमग्न हो अपना सब कुछ भूल गये, सारी सुध-बुध खो बैठे। थोड़ी देर बाद जब उनकी चेतना दिव्य लोकसे नीचे आयी, अर्थात् जब उन्हें होश हुआ तब उद्धवजीको भगवान् श्रीकृष्णके स्वरूपमें उपस्थित देख, अपना मनोरथ पूर्ण हो जानेके कारण प्रसन्न हो वे उनकी पूजा करने लगे।


श्रीमद्भागवतका माहात्म्य, भागवतश्रवणसे श्रोताओंको भगवद्धामकी प्राप्ति

सूतजी कहते हैं—उद्धवजीने वहाँ एकत्र हुए सब लोगोंको श्रीकृष्णकीर्तनमें लगा देखकर सभीका सत्कार किया और राजा परीक्षित्को हृदयसे लगाकर कहा।

उद्धवजी बोले—राजन्! तुम्हारा मन इस श्रीकृष्णकीर्तनके उत्सवमें रम रहा है, अतः तुम धन्य हो; तुम्हारा अन्तःकरण सदा ही केवल श्रीकृष्ण-भक्तिसे परिपूर्ण रहता है। तात! तुम जो कुछ कर रहे हो, सब तुम्हारे अनुरूप ही है। क्यों न हो, श्रीकृष्णने ही तुम्हें शरीर और वैभव प्रदान किया है; अतः तुम्हारा उनके प्रपौत्रपर प्रेम होना स्वाभाविक ही है। इसमें

४६८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

तनिक भी सन्देह नहीं कि समस्त द्वारकावासियोंमें ये लोग सबसे बढ़कर धन्यवादके पात्र हैं, जिन्हें व्रजमें निवास करानेके लिये भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनको आज्ञा की थी। श्रीकृष्णका मनरूपी चन्द्रमा राधाके मुखकी प्रभारूप चाँदनीसे युक्त हो उनकी लीलाभूमि वृन्दावनको अपनी किरणोंसे सुशोभित करता हुआ यहाँ सदा प्रकाशमान रहता है। श्रीकृष्णचन्द्र नित्य परिपूर्ण हैं, प्राकृत चन्द्रमाकी भाँति उनमें वृद्धि और क्षयरूप विकार नहीं होते। उनकी जो सोलह कलाएँ हैं, उनसे सहस्रों चिन्मय किरणें निकलती रहती हैं; इससे उनके सहस्रों भेद हो जाते हैं। इन सभी कलाओंसे युक्त, नित्य परिपूर्ण श्रीकृष्ण इस व्रजभूमिमें सदा ही विद्यमान रहते हैं। इस भूमिमें और उनके स्वरूपमें कुछ अन्तर नहीं है। राजेन्द्र परीक्षित्! इस प्रकार विचार करनेपर सभी व्रजवासी भगवान्‌के अंगमें स्थित हैं। शरणागतोंका भय दूर करनेवाले जो ये वज्र हैं, इनका स्थान श्रीकृष्णके दाहिने चरणमें है। श्रीकृष्णका प्रकाश प्राप्त हुए बिना किसीको भी अपने स्वरूपका बोध नहीं हो सकता। जीवोंके अन्तःकरणमें जो श्रीकृष्णतत्त्वका प्रकाश है, उसपर सदा मायाका पर्दा पड़ा रहता है। अट्ठाईसवें द्वापरके अन्तमें जब भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं ही सामने प्रकट होकर मायाका पर्दा उठा लेते हैं, उस समय जीवोंको उनका प्रकाश प्राप्त होता है। किंतु अब वह समय तो बीत गया; इसलिये उनके प्रकाशकी प्राप्तिके लिये अब दूसरा उपाय बतलाया जा रहा है, सुनो। अट्ठाईसवें द्वापरके अतिरिक्त समयमें यदि कोई श्रीकृष्णतत्त्वका प्रकाश पाना चाहे, तो उसे वह श्रीमद्भागवतसे ही प्राप्त हो सकता है। भगवान्‌के भक्त जहाँ जब कभी श्रीमद्भागवतशास्त्रका कीर्तन और श्रवण करते हैं, वहाँ उस समय भगवान् श्रीकृष्ण साक्षात्रूपसे विराजमान रहते हैं। जहाँ श्रीमद्भागवतके एक या आधे श्लोकका ही पाठ होता है, वहाँ भी श्रीकृष्ण अपनी प्रियतमा गोपियोंके साथ विद्यमान रहते हैं। जिन बड़भागियोंने प्रतिदिन श्रीमद्भागवतशास्त्रका सेवन किया है, उन्होंने अपने पिता, माता और पत्नी—तीनोंके ही कुलका भलीभाँति उद्धार कर दिया। श्रीमद्भागवतके स्वाध्याय और श्रवणसे ब्राह्मणोंको विद्याका प्रकाश (बोध) प्राप्त होता है, क्षत्रियलोग शत्रुओंपर विजय पाते हैं, वैश्योंको धन मिलता है और शूद्र स्वस्थ—नीरोग बने रहते हैं। श्रीमद्भागवतसे स्त्रियों तथा अन्त्यज आदि अन्य लोगोंकी भी इच्छा पूर्ण होती है। अतः कौन ऐसा भाग्यवान् पुरुष है, जो श्रीमद्भागवतका नित्य ही सेवन न करेगा। अनेकों जन्मोंतक साधना करते-करते जब मनुष्य पूर्ण सिद्ध हो जाता है, तब उसे श्रीमद्भागवतकी प्राप्ति होती है। भागवतसे भगवान्‌का प्रकाश मिलता है, जिससे भगवद्भक्ति उत्पन्न होती है। पूर्वकालमें भगवान्‌ने श्रीमद्भागवतका उपदेश देकर कहा—'ब्रह्मन्! तुम अपने मनोरथकी सिद्धिके लिये सदा ही इसका सेवन करते रहो।' ब्रह्माजी श्रीमद्भागवतका उपदेश पाकर बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने श्रीकृष्णकी नित्य-प्राप्तिके लिये तथा सात आवरणोंको भंग करनेके लिये श्रीमद्भागवतका सप्ताह-पारायण किया।

**उद्धवजी कहते हैं—**श्रीमद्भागवतके माहात्म्यके सम्बन्धमें यह आख्यायिका मैंने अपने गुरु श्रीबृहस्पतिजीसे सुनी, और उनसे भागवतका उपदेश प्राप्त कर उनके चरणोंमें प्रणाम करके मैं बहुत ही प्रसन्न हुआ। तत्पश्चात् मैंने भी एक मासतक श्रीमद्भागवत-कथाका भलीभाँति रसास्वादन किया। उतनेसे ही मैं भगवान् श्रीकृष्णका प्रियतम सखा हो गया। इसके पश्चात् भगवान्‌ने मुझे व्रजमें अपनी प्रियतमा गोपियोंकी सेवामें

  • वैष्णवखण्ड-श्रीमद्भागवत-माहात्म्य * ४६९

लगाया। यद्यपि भगवान् अपने लीला-परिकरोंके साथ नित्य विहार करते रहते हैं, इसलिये गोपियोंका श्रीकृष्णसे कभी भी वियोग नहीं होता; तथापि जो भ्रमसे विरहवेदनाका अनुभव कर रही थीं, उन गोपियोंके प्रति भगवान्ने मेरे मुखसे सन्देश कहलाया। उस सन्देशको अपनी बुद्धिके अनुसार ग्रहण कर गोपियाँ तुरंत ही विरह-वेदनासे मुक्त हो गयीं। मैं भागवतके इस रहस्यको तो नहीं समझ सका, परंतु उसका चमत्कार मैंने प्रत्यक्ष देखा। इसके बहुत समयके बाद जब ब्रह्मादि देवता भगवान्से अपने परम धाममें पधारनेकी प्रार्थना करके चले गये, उस समय पीपलके वृक्षकी जड़के पास अपने सामने खड़े हुए मुझे भगवान्ने श्रीमद्भागवत-विषयक उस रहस्यका स्वयं ही उपदेश किया और मेरी बुद्धिमें उसका दृढ़ निश्चय करा दिया। उसीके प्रभावसे मैं बदरिकाश्रममें रहकर भी यहाँ व्रजकी लताओं और बेलोंमें निवास करता हूँ। उसीके बलसे यहाँ नारदकुण्डपर सदा स्वेच्छानुसार विराजमान रहता हूँ। भगवान्के भक्तोंको श्रीमद्भागवतके सेवनसे श्रीकृष्ण-तत्त्वका प्रकाश प्राप्त हो सकता है, इस कारण यहाँ उपस्थित हुए इन सभी भक्तजनोंके कार्यकी सिद्धिके लिये मैं श्रीमद्भागवतका पाठ करूँगा; किंतु इस कार्यमें तुम्हें ही सहायता करनी पड़ेगी।

सूतजी कहते हैं—यह सुनकर राजा परीक्षित् उद्धवजीको प्रणाम करके उनसे बोले।

परीक्षित्ने कहा—हरिदास उद्धवजी! आप निश्चिन्त होकर श्रीमद्भागवत-कथाका कीर्तन करें और इस कार्यमें मुझे जिस प्रकारकी सहायता करनी आवश्यक हो, उसके लिये आज्ञा दें।

सूतजी कहते हैं—परीक्षित्का यह वचन सुनकर उद्धवजी मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए और बोले।

उद्धवजीने कहा—राजन्! भगवान् श्रीकृष्णने जबसे इस पृथ्वीतलका परित्याग कर दिया है, तबसे यहाँ अत्यन्त बलवान् कलियुगका प्रभुत्व हो गया है। जिस समय यह शुभ अनुष्ठान यहाँ आरम्भ हो जायगा, बलवान् कलियुग अवश्य ही इसमें बहुत बड़ा विघ्न डालेगा। इसलिये तुम दिग्विजयके लिये जाओ और कलियुगको जीतकर अपने वशमें करो। इधर, मैं तुम्हारी सहायतासे वैष्णवी रीतिका सहारा लेकर एक महीनेतक यहाँ श्रीमद्भागवत-कथाका रसास्वादन कराऊँगा और इस प्रकार भागवत-कथाके रसका प्रसार करके इन सभी श्रोताओंको भगवान् मधुसूदनके नित्य गोलोकधाममें पहुँचा दूँगा।

सूतजी कहते हैं—उद्धवजीकी बात सुनकर राजा परीक्षित् पहले तो कलियुगपर विजय पानेके विचारसे बड़े ही प्रसन्न हुए; परंतु पीछे यह सोचकर कि मुझे भागवत-कथाके श्रवणसे वंचित ही रहना पड़ेगा, चिन्तासे व्याकुल हो उठे। उस समय उन्होंने उद्धवजीसे अपना अभिप्राय इस प्रकार प्रकट किया।

परीक्षित् बोले—हे तात! आपकी आज्ञाके अनुसार तत्पर होकर मैं कलियुगको तो अवश्य ही अपने वशमें करूँगा, परंतु श्रीमद्भागवतकी प्राप्ति मुझे कैसे होगी? मैं भी आपके चरणोंकी शरणमें आया हूँ, अतः मुझपर भी आपको अनुग्रह करना चाहिये।

सूतजी कहते हैं—उनके इस वचनको सुनकर उद्धवजी पुनः बोले।

उद्धवजीने कहा—राजन्! तुम्हें तो किसी भी बातके लिये किसी प्रकार भी चिन्ता न करनी चाहिये; क्योंकि इस भागवतशास्त्रके प्रधान अधिकारी तो तुम्हीं हो। संसारके मनुष्य नाना प्रकारके कर्मोंमें रचे-पचे हुए हैं, वे लोग आजतक प्रायः भागवत-श्रवणकी बात भी नहीं जानते। तुम्हारे ही प्रसादसे इस भारतवर्षमें

४७० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

रहनेवाले अधिकांश मनुष्य श्रीमद्भागवत-कथाकी प्राप्ति होनेपर उस नित्य सनातन सुखस्वरूप परमात्माको प्राप्त करेंगे। महर्षि भगवान् श्रीशुकदेवजी साक्षात् नन्दनन्दन श्रीकृष्णके स्वरूप हैं। वे ही तुम्हें श्रीमद्भागवतकी कथा सुनायेंगे, इसमें तनिक भी सन्देहकी बात नहीं है। राजन्! उस कथाके श्रवणसे तुम ब्रजेश्वर श्रीकृष्णके नित्यधामको प्राप्त करोगे। इसके पश्चात् इस पृथ्वीपर श्रीमद्भागवत-कथाका प्रचार होगा। अतः राजेन्द्र परीक्षित् ! तुम जाओ और कलियुगको जीतकर अपने वशमें करो।

**सूतजी कहते हैं—**उद्धवजीके इस प्रकार कहनेपर राजा परीक्षित्ने उनकी परिक्रमा करके उन्हें प्रणाम किया और दिग्विजयके लिये चले गये। इधर वज्रने भी अपने पुत्र प्रतिबाहुको अपनी राजधानी मथुराका राजा बना दिया और माताओंको साथ ले उसी स्थानपर, जहाँ उद्धवजी प्रकट हुए थे, जाकर श्रीमद्भागवत सुननेकी इच्छासे रहने लगे। तदनन्तर उद्धवजीने वृन्दावनमें गोवर्धन पर्वतके निकट एक महीनेतक श्रीमद्भागवत-कथाके रसकी धारा बहायी। उस रसका आस्वादन करते समय प्रेमी श्रोताओंकी दृष्टिमें सब ओर भगवान्की सच्चिदानन्दमयी लीला प्रकाशित हो गयी और उन्हें सर्वत्र श्रीकृष्णचन्द्रका साक्षात्कार होने लगा। उस समय सभी श्रोताओंने अपनेको भगवान्के स्वरूपमें स्थित देखा। वज्रनाभने श्रीकृष्णके दाहिने चरणकमलमें अपनेको स्थित देखा और श्रीकृष्णके विरहशोकसे मुक्त होकर उस स्थानपर अत्यन्त सुशोभित होने लगे। वज्रनाभकी वे रोहिणी आदि माताएँ भी रासकी रजनीमें प्रकाशित होनेवाले श्रीकृष्णरूपी चन्द्रमाके विग्रहमें अपनेको कला और प्रभाके रूपमें स्थित देख बहुत ही विस्मित हुईं तथा अपने प्राणप्यारेकी विरह-वेदनासे छुटकारा पाकर उनके परम धाममें प्रविष्ट हो गयीं। इनके अतिरिक्त भी जो श्रोतागण वहाँ उपस्थित थे, वे भी भगवान्की नित्य अन्तरंग लीलामें सम्मिलित होकर इस स्थूल व्यावहारिक जगत्से तत्काल अन्तर्धान हो गये। वे सभी सदा ही गोवर्धन पर्वतके कुंज और झाड़ियोंमें, वृन्दावन-काम्यवन आदि वनोंमें तथा वहाँकी दिव्य गौओंके बीचमें श्रीकृष्णके साथ विचरते हुए अनन्त आनन्दका अनुभव करते रहते हैं। जो लोग श्रीकृष्णके प्रेममें मग्न हैं, उन भावुक भक्तोंको उनके दर्शन भी होते हैं।

**सूतजी कहते हैं—**जो लोग इस भगवत्प्राप्तिकी कथाको सुनेंगे और कहेंगे, उन्हें भगवान् मिल जायेंगे और उनके दुःखोंका सदाके लिये अन्त हो जायगा।


श्रीमद्भागवतका स्वरूप, प्रमाण, श्रोता-वक्ताके लक्षण, श्रवणविधि और माहात्म्य

**सूतजी कहते हैं—**ऋषिगण ! श्रीमद्भागवत और श्रीभगवान्का स्वरूप सदा एक ही है और वह है सच्चिदानन्दमय। भगवान् श्रीकृष्णमें जिनकी लगन लगी है, उन भावुक भक्तोंके हृदयमें जो भगवान्के माधुर्य भावको अभिव्यक्त करनेवाला, उनके दिव्य माधुर्य-रसका आस्वादन करानेवाला सर्वोत्कृष्ट वचन है, उसे श्रीमद्भागवत समझो। जो वाक्य ज्ञान, विज्ञान, भक्ति एवं इनके अंगभूत साधनचतुष्टयको प्रकाशित करनेवाला है तथा जो मायाका मर्दन करनेमें समर्थ है, उसे भी तुम श्रीमद्भागवत समझो। श्रीमद्भागवत अनन्त, अक्षरस्वरूप है; इसका नियत प्रमाण भला कौन

* वैष्णवखण्ड-श्रीमद्भागवत-माहात्म्य * ४७१


जान सकता है? पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने ब्रह्माजीके प्रति चार श्लोकोंमें इसका दिग्दर्शनमात्र कराया था। विप्रगण! इस भागवतकी अपार गहराईमें डुबकी लगाकर इसमेंसे अपनी अभीष्ट वस्तुको प्राप्त करनेमें केवल ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि ही समर्थ हैं, दूसरे नहीं। परंतु जिनकी बुद्धि आदि वृत्तियाँ परिमित हैं, ऐसे मनुष्योंका हितसाधन करनेके लिये श्रीव्यासजीने परीक्षित् और शुकदेवजीके संवादके रूपमें जिसका गायन किया है, उसीका नाम श्रीमद्भागवत है। उस ग्रन्थकी श्लोकसंख्या अठारह हजार है। इस भवसागरमें जो प्राणी कलिरूपी ग्राहसे ग्रस्त हो रहे हैं, उनके लिये वह श्रीमद्भागवत ही सर्वोत्तम अवलम्बन है।

श्रोता दो प्रकारके माने गये हैं—प्रवर (उत्तम) तथा अवर (अधम)। प्रवर श्रोताओंके ‘चातक’, ‘हंस’, ‘शुक’ और ‘मीन’ आदि कई भेद हैं। अवरके भी ‘वृक’, ‘भूरुण्ड’, ‘वृष’ और ‘उष्ट्र’ आदि अनेकों भेद बतलाये गये हैं। ‘चातक’ कहते हैं पपीहेको। वह जैसे बादलसे बरसते हुए जलमें ही स्पृहा रखता है, दूसरे जलको छूता ही नहीं—उसी प्रकार जो श्रोता सब कुछ छोड़कर केवल श्रीकृष्णसम्बन्धी शास्त्रोंके श्रवणका व्रत ले लेता है, वह ‘चातक’ कहा गया है। जैसे हंस दूधके साथ मिलकर एक हुए जलसे निर्मल दूध ग्रहण कर लेता और पानीको छोड़ देता है, उसी प्रकार जो श्रोता अनेकों शास्त्रोंका श्रवण करके भी उसमेंसे सार भाग अलग करके ग्रहण करता है, उसे ‘हंस’ कहते हैं। जिस प्रकार भलीभाँति पढ़ाया हुआ तोता अपनी मधुर वाणीसे शिक्षकको तथा पास आनेवाले दूसरे लोगोंको भी प्रसन्न करता है, उसी प्रकार जो श्रोता कथावाचक व्यासके मुँहसे उपदेश सुनकर उसे सुन्दर और परिमित वाणीमें पुनः सुना देता और व्यास एवं अन्यान्य श्रोताओंको अत्यन्त आनन्दित करता है, वह ‘शुक’ कहलाता है। जैसे क्षीरसागरमें मछली मौन रहकर अपलक आँखोंसे देखती हुई सदा दुग्ध पान करती रहती है, उसी प्रकार जो कथा सुनते समय निर्निमेष नयनोंसे देखता हुआ मुँहसे कभी एक शब्द भी नहीं निकालता और निरन्तर कथारसका ही आस्वादन करता रहता है, वह प्रेमी श्रोता ‘मीन’ कहा गया है। ये प्रवर अर्थात् उत्तम श्रोताओंके भेद बताये गये। अब अवर यानी अधम श्रोता बताये जाते हैं। ‘वृक’ कहते हैं भेड़ियेको। जैसे भेड़िया वनके भीतर वेणुकी मीठी आवाज सुननेमें लगे हुए मृगोंको डरानेवाली भयानक गर्जना करता है, वैसे ही जो मूर्ख कथाश्रवणके समय रसिक श्रोताओंको उद्विग्न करता हुआ बीच-बीचमें जोर-जोरसे बोल उठता है, वह ‘वृक’ कहलाता है। हिमालयके शिखरपर एक भूरुण्ड जातिका पक्षी होता है। वह किसीके शिक्षाप्रद वाक्य सुनकर वैसा ही बोला करता है, किन्तु स्वयं उससे लाभ नहीं उठाता। इसी प्रकार जो उपदेशकी बात सुनकर उसे दूसरोंको तो सिखाये, पर स्वयं आचरणमें न लाये, ऐसे श्रोताको ‘भूरुण्ड’ कहते हैं। ‘वृष’ कहते हैं बैलको। उसके सामने मीठे-मीठे अंगूर हों या कड़वी खली, दोनोंको वह एक-सा ही मानकर खाता है। उसी प्रकार जो सुनी हुई सभी बातें ग्रहण करता है, पर सार और असार वस्तुका विचार करनेमें उसकी बुद्धि अंधी—असमर्थ होती है, ऐसा श्रोता ‘वृष’ कहलाता है। जिस प्रकार ऊँट माधुर्यगुणसे युक्त आमको भी छोड़कर केवल नीमकी ही पत्ती चबाता है, उसी प्रकार जो भगवान्‌की मधुर कथाको छोड़कर उसके विपरीत संसारी बातोंमें रमता रहता है, उसे ‘उष्ट्र’ कहते हैं। ये कुछ थोड़े-से भेद यहाँ बताये गये। इनके अतिरिक्त भी प्रवर-अवर दोनों

४७२

  • संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

प्रकारके श्रोताओंके 'भ्रमर' और 'गर्दभ' आदि बहुत-से भेद हैं; इन सब भेदोंको उन-उन श्रोताओंके स्वाभाविक आचार-व्यवहारोंसे परखना चाहिये। जो वक्ताके सामने उन्हें विधिवत् प्रणाम करके बैठे और अन्य संसारी बातोंको छोड़कर केवल श्रीभगवान्‌की लीला-कथाओंको ही सुननेकी इच्छा रखे, समझनेमें अत्यन्त कुशल हो, नम्र हो, हाथ जोड़े रहे, शिष्यभावसे उपदेश ग्रहण करे और भीतर श्रद्धा तथा विश्वास रखे, इसके सिवा जो कुछ सुने उसका बराबर चिन्तन करता रहे, जो बात समझमें न आवे, उसे पूछे और पवित्र भावसे रहे तथा श्रीकृष्णके भक्तोंपर सदा ही प्रेम रखता हो—ऐसे ही श्रोताको वक्तालोग उत्तम श्रोता कहते हैं। अब वक्ताके लक्षण बतलाते हैं। जिसका मन सदा भगवान्‌में लगा रहे, जिसे किसी भी वस्तुकी अपेक्षा न हो, जो सबका सुहृद् और दीनोंपर दया करनेवाला हो तथा अनेकों युक्तियोंसे तत्त्वका बोध करा देनेमें चतुर हो, उसी वक्ताका मुनिलोग भी सम्मान करते हैं।

विप्रगण! अब मैं भारतवर्षकी भूमिपर श्रीमद्भागवत-कथाका सेवन करनेके लिये जो आवश्यक विधि है, उसे बतलाता हूँ; आप सुनें। इस विधिके पालनसे श्रोताकी सुख-परम्पराका विस्तार होता है। श्रीमद्भागवतका सेवन चार प्रकारका है—सात्त्विक, राजस, तामस और निर्गुण। जिसमें यज्ञकी भाँति तैयारी की गयी हो, बहुत-सी पूजासामग्रियोंके कारण जो अत्यन्त शोभासम्पन्न दिखायी दे रहा हो और बड़े ही परिश्रमसे बहुत उतावलीके साथ सात दिनोंमें ही जिसकी समाप्ति की जाय, वह प्रसन्नतापूर्वक किया हुआ श्रीमद्भागवतका सेवन 'राजस' है। एक या दो महीनेमें धीरे-धीरे कथाके रसका आस्वादन करते हुए बिना परिश्रमके जो श्रवण होता है, वह पूर्ण आनन्दको बढ़ानेवाला 'सात्त्विक' सेवन कहलाता है। तामस सेवन वह है जो कभी भूलसे छोड़ दिया जाय और याद आनेपर फिर आरम्भ कर दिया जाय, इस प्रकार एक वर्षतक आलस्य और अश्रद्धाके साथ चलाया जाय। यह 'तामस' सेवन भी न करनेकी अपेक्षा अच्छा और सुख ही देनेवाला है। जब वर्ष, महीना और दिनोंके नियमका आग्रह छोड़कर सदा ही प्रेम और भक्तिके साथ श्रवण किया जाय, तब वह सेवन 'निर्गुण' माना गया है। राजा परीक्षित् और शुकदेवके संवादमें भी जो भागवतका सेवन हुआ था, वह निर्गुण ही बताया गया है। उसमें जो सात दिनोंकी बात आती है, वह राजाकी आयुके बचे हुए दिनोंकी संख्याके अनुसार है, सप्ताहकथाका नियम करनेके लिये नहीं।

भारतवर्षके अतिरिक्त अन्य स्थानोंमें भी त्रिगुण (सात्त्विक, राजस और तामस) अथवा निर्गुण सेवन अपनी रुचिके अनुसार करना चाहिये। तात्पर्य यह कि जिस किसी प्रकार भी हो सके, श्रीमद्भागवतका सेवन, उसका श्रवण करना ही चाहिये। जो केवल श्रीकृष्णकी लीलाओंके ही श्रवण, कीर्तन एवं रसास्वादनके लिये लालायित रहते और मोक्षकी भी इच्छा नहीं रखते उनका तो श्रीमद्भागवत ही धन है तथा जो संसारके दुःखोंसे घबड़ाकर अपनी मुक्ति चाहते हैं, उनके लिये भी यही इस भवरोगकी ओषधि है। अतः इस कलिकालमें इसका प्रयत्नपूर्वक सेवन करना चाहिये। इनके अतिरिक्त जो लोग विषयभोगोंमें ही परायण रहनेवाले हैं, सांसारिक सुखोंकी ही जिन्हें सदा चाह रहती है, उनके लिये भी अब इस कलियुगमें सामर्थ्य, धन और विधि-विधानका ज्ञान न होनेके कारण कर्ममार्ग (यज्ञादि)-से मिलनेवाली सिद्धि अत्यन्त

* वैष्णवखण्ड-श्रीमद्भागवत-माहात्म्य * ४७३

दुर्लभ हो गयी है। ऐसी दशामें उन्हें भी सब प्रकारसे अब इस भागवतकथाका ही सेवन करना चाहिये। यह श्रीमद्भागवतकी कथा धन, पुत्र, स्त्री, हाथी-घोड़े आदि वाहन, यश, मकान और निष्कण्टक राज्य भी दे सकती है। सकाम भावसे भागवतका सहारा लेनेवाले मनुष्य इस संसारमें मनोवांछित उत्तम भोगोंको भोगकर अन्तमें श्रीमद्भागवतके ही संगसे श्रीहरिके परमधामको प्राप्त हो जाते हैं।

जिनके यहाँ श्रीमद्भागवतकी कथा-वार्ता होती हो तथा जो लोग उस कथाके श्रवणमें लगे रहते हों, उनकी सेवा और सहायता अपने शरीर और धनसे करनी चाहिये। उन्हींके अनुग्रहसे सहायता करनेवाले पुरुषको भी भागवत-सेवनका पुण्य प्राप्त होता है। कामना दो वस्तुओंकी होती है—श्रीकृष्णकी और धनकी। श्रीकृष्णके सिवा जो कुछ भी चाहा जाय यह सब धनके अन्तर्गत है, उसकी 'धन' संज्ञा है। श्रोता और वक्ता भी दो प्रकारके माने गये हैं, एक श्रीकृष्णको चाहनेवाले और दूसरे धनको चाहनेवाले। जैसा वक्ता, वैसा ही श्रोता भी हो तो वहाँ कथामें रस मिलता है, अतः सुखकी वृद्धि होती है। यदि दोनों विपरीत विचारके हों तो रसाभास हो जाता है, अतः फलकी हानि होती है। किंतु जो श्रीकृष्णको चाहनेवाले वक्ता और श्रोता हैं, उन्हें विलम्ब होनेपर भी सिद्धि अवश्य मिलती है। श्रीकृष्णकी चाह रखनेवाला सर्वथा गुणहीन हो और उसकी विधिमें कुछ कमी रह जाय तो भी, यदि उसके हृदयमें प्रेम है तो, वही उसके लिये सर्वोत्तम विधि है। सकाम पुरुषको कथाकी समाप्तिके दिनतक स्वयं सावधानीके साथ सभी विधियोंका पालन करना चाहिये। भागवतकथाके श्रोता और वक्ता दोनोंके ही पालन करनेयोग्य विधि यह है—प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करके अपना नित्यकर्म पूरा कर ले। फिर भगवान्‌का चरणामृत पीकर पूजाके सामानसे श्रीमद्भागवतकी पुस्तक और गुरुदेव (व्यास)-का पूजन करे। इसके पश्चात् अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक श्रीमद्भागवतकी कथा स्वयं कहे अथवा सुने। दूध या खीरका मौन भोजन करे। नित्य ब्रह्मचर्यका पालन और भूमिपर शयन करे। क्रोध और लोभ आदिको त्याग दे। प्रतिदिन कथाके अन्तमें कीर्तन करे और कथा समाप्त होनेपर रात्रिमें जागरण करे। समाप्ति होनेपर ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें दक्षिणासे सन्तुष्ट करे। कथावाचक गुरुको वस्त्र, आभूषण आदि देकर गौ भी अर्पण करे। इस प्रकार विधि-विधान पूर्ण करनेपर मनुष्यको स्त्री, घर, पुत्र, राज्य और धन आदि जो-जो उसे अभीष्ट होता है, वह सब मनोवांछित फल प्राप्त होता है। परंतु सकामभाव बहुत बड़ी विडम्बना है, वह श्रीमद्भागवतकी कथामें शोभा नहीं देता। श्रीशुकदेवजीके मुखसे कहा हुआ यह श्रीमद्भागवतशास्त्र तो कलियुगमें साक्षात् श्रीकृष्णकी प्राप्ति करानेवाला और नित्य प्रेमानन्द प्रदान करनेवाला है। इसका तुच्छ कामनाके लिये उपयोग उचित नहीं है।

श्रीमद्भागवत-माहात्म्य सम्पूर्ण

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४७४ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

वैशाखमास-माहात्म्य

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वैशाखमासकी श्रेष्ठता; उसमें जल, व्यजन, छत्र, पादुका और अन्न आदि दानोंकी महिमा

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥

'भगवान् नारायण, नरश्रेष्ठ नर, देवी सरस्वती तथा महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके भगवान्‌की विजय-कथासे परिपूर्ण इतिहास-पुराण आदिका पाठ करना चाहिये।'

**सूतजी कहते हैं—**राजा अम्बरीषने परमेष्ठी ब्रह्माके पुत्र देवर्षि नारदसे पुण्यमय वैशाखमासका माहात्म्य इस प्रकार पूछा—'ब्रह्मन्! मैंने आपसे सभी महीनोंका माहात्म्य सुना। उस समय आपने यह कहा था कि सब महीनोंमें वैशाखमास श्रेष्ठ है। इसलिये यह बतानेकी कृपा करें कि वैशाख-मास क्यों भगवान् विष्णुको प्रिय है और उस समय कौन-कौन-से धर्म भगवान् विष्णुके लिये प्रीतिकारक हैं?'

**नारदजीने कहा—**वैशाखमासको ब्रह्माजीने सब मासोंमें उत्तम सिद्ध किया है। वह माताकी भाँति सब जीवोंको सदा अभीष्ट वस्तु प्रदान करनेवाला है। धर्म, यज्ञ, क्रिया और तपस्याका सार है। सम्पूर्ण देवताओंद्वारा पूजित है। जैसे विद्याओंमें वेद-विद्या, मन्त्रोंमें प्रणव, वृक्षोंमें कल्पवृक्ष, धेनुओंमें कामधेनु, देवताओंमें विष्णु, वर्णोंमें ब्राह्मण, प्रिय वस्तुओंमें प्राण, नदियोंमें गंगाजी, तेजोंमें सूर्य, अस्त्र-शस्त्रोंमें चक्र, धातुओंमें सुवर्ण, वैष्णवोंमें शिव तथा रत्नोंमें कौस्तुभमणि है, उसी प्रकार धर्मके साधनभूत महीनोंमें वैशाखमास सबसे उत्तम है। संसारमें इसके समान भगवान् विष्णुको प्रसन्न करनेवाला दूसरा कोई मास नहीं है। जो वैशाखमासमें सूर्योदयसे पहले स्नान करता है, उससे भगवान् विष्णु निरन्तर प्रीति करते हैं। पाप तभीतक गर्जते हैं, जबतक जीव वैशाखमासमें प्रातःकाल जलमें स्नान नहीं करता। राजन्! वैशाखके महीनेमें सब तीर्थ आदि देवता (तीर्थके अतिरिक्त) बाहरके जलमें भी सदैव स्थित रहते हैं। भगवान् विष्णुकी आज्ञासे मनुष्योंका कल्याण करनेके लिये वे सूर्योदयसे लेकर छः दण्डके भीतरतक वहाँ मौजूद रहते हैं।

वैशाखके समान कोई मास नहीं है, सत्ययुगके समान कोई युग नहीं है, वेदके समान कोई शास्त्र नहीं है और गंगाजीके समान कोई तीर्थ नहीं है।* जलके समान दान नहीं है, खेतीके समान धन नहीं है और जीवनसे बढ़कर कोई लाभ नहीं है। उपवासके समान कोई तप नहीं, दानसे बढ़कर कोई सुख नहीं, दयाके समान धर्म नहीं, धर्मके समान मित्र नहीं, सत्यके समान यश नहीं, आरोग्यके समान उन्नति नहीं, भगवान् विष्णुसे बढ़कर कोई रक्षक नहीं और वैशाखमासके समान संसारमें कोई पवित्र मास नहीं है। ऐसा विद्वान् पुरुषोंका मत है। वैशाख श्रेष्ठ मास है और शेषशायी भगवान् विष्णुको सदा प्रिय है। सब दानोंसे जो पुण्य होता है और सब तीर्थोंमें जो फल होता है, उसीको मनुष्य वैशाखमासमें केवल जलदान करके प्राप्त कर लेता है। जो जलदानमें असमर्थ है, ऐसे ऐश्वर्यकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषको उचित है कि वह दूसरेको;


* न माधवसमो मासो न कृतेन युगं समम्। न च वेदसमं शास्त्रं न तीर्थं गङ्गया समम्॥ (स्क० पु०, वै० वै० मा० २।१)

* वैष्णवखण्ड-वैशाखमास-माहात्म्य *४७५

प्रबोध करे, दूसरेको जलदानका महत्त्व समझावे। यह सब दानोंसे बढ़कर हितकारी है। जो मनुष्य वैशाखमें सड़कपर यात्रियोंके लिये प्याऊ लगाता है, वह विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। नृपश्रेष्ठ! प्रपादान (पौंसला या प्याऊ) देवताओं, पितरों तथा ऋषियोंको अत्यन्त प्रीति देनेवाला है। जिसने प्याऊ लगाकर रास्तेके थके-माँदे मनुष्योंको सन्तुष्ट किया है, उसने ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवताओंको सन्तुष्ट कर लिया है। राजन्! वैशाखमासमें जलकी इच्छा रखनेवालेको जल, छाया चाहनेवालेको छाता और पंखेकी इच्छा रखनेवालेको पंखा देना चाहिये। राजेन्द्र! जो प्याससे पीड़ित महात्मा पुरुषके लिये शीतल जल प्रदान करता है, वह उतने ही मात्रसे दस हजार राजसूय यज्ञोंका फल पाता है। धूप और परिश्रमसे पीड़ित ब्राह्मणको जो पंखा डुलाकर हवा करता है, वह उतने ही मात्रसे निष्पाप होकर भगवान्का पार्षद हो जाता है। जो मार्गसे थके हुए श्रेष्ठ द्विजको वस्त्रसे भी हवा करता है, वह उतनेसे ही मुक्त हो भगवान् विष्णुका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। जो शुद्ध चित्तसे ताड़का पंखा देता है, वह सब पापोंका नाश करके ब्रह्मलोकको जाता है। जो विष्णुप्रिय वैशाखमासमें पादुका दान करता है, वह यमदूतोंका तिरस्कार करके विष्णुलोकमें जाता है। जो मार्गमें अनाथोंके ठहरने लिये विश्रामशाला बनवाता है, उसके पुण्य-फलका वर्णन किया नहीं जा सकता। मध्याह्नमें आये हुए ब्राह्मण अतिथिको यदि कोई भोजन दे, तो उसके फलका अन्त नहीं है। राजन्! अन्नदान मनुष्योंको तत्काल तृप्त करनेवाला है, इसलिये संसारमें अन्नके समान कोई दान नहीं है। जो मनुष्य मार्गके थके हुए ब्राह्मणके लिये आश्रय देता है, उसके पुण्यफलका वर्णन किया नहीं जा सकता। भूपाल! जो अन्नदाता है, वह माता-पिता आदिका भी विस्मरण करा देता है। इसलिये तीनों लोकोंके निवासी अन्नदानकी ही प्रशंसा करते हैं। माता और पिता केवल जन्मके हेतु हैं, पर जो अन्न देकर पालन करता है, मनीषी पुरुष इस लोकमें उसीको पिता कहते हैं।

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वैशाखमासमें विविध वस्तुओंके दानका महत्त्व तथा वैशाखस्नानके नियम

नारदजी कहते हैं—वैशाखमासमें धूपसे तपे और थके-माँदे ब्राह्मणोंको श्रमनाशक सुखद पलंग देकर मनुष्य कभी जन्म-मृत्यु आदिके क्लेशोंसे कष्ट नहीं पाता। जो वैशाखमासमें पहननेके लिये कपड़े और बिछावन देता है, वह उसी जन्ममें सब भोगोंसे सम्पन्न हो जाता है और समस्त पापोंसे रहित हो ब्रह्मनिर्वाण (मोक्ष)-को प्राप्त होता है। जो तिनकेकी बनी हुई या अन्य खजूर आदिके पत्तोंकी बनी हुई चटाई दान करता है, उसकी उस चटाईपर साक्षात् भगवान् विष्णु शयन करते हैं। चटाई देनेवाला बैठने और बिछाने आदिमें सब ओरसे सुखी रहता है। जो सोनेके लिये चटाई और कम्बल देता है, वह उतने ही मात्रसे मुक्त हो जाता है। निद्रासे दुःखका नाश होता है, निद्रासे थकावट दूर होती है और वह निद्रा चटाईपर सोनेवालेको सुखपूर्वक आ जाती है। धूपसे कष्ट पाये हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणको जो सूक्ष्मतर वस्त्र दान करता है, वह पूर्ण आयु और परलोकमें उत्तम गतिको पाता है। जो पुरुष ब्राह्मणको फूल और

४७६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

रोली देता है, वह लौकिक भोगोंका भोग करके मोक्षको प्राप्त होता है। जो खस, कुश और जलसे वासित चन्दन देता है, वह सब भोगोंमें देवताओंकी सहायता पाता है तथा उसके पाप और दुःखकी हानि होकर परमानन्दकी प्राप्ति होती है। वैशाखके धर्मको जाननेवाला जो पुरुष गोरोचन और कस्तूरीका दान करता है, वह तीनों तापोंसे मुक्त होकर परम शान्तिको प्राप्त होता है। जो विश्रामशाला बनवाकर प्याउसहित ब्राह्मणको दान करता है, वह लोकोंका अधिपति होता है। जो सड़कके किनारे बगीचा, पोखरा, कुआँ और मण्डप बनवाता है, वह धर्मात्मा है, उसे पुत्रोंकी क्या आवश्यकता है। उत्तम शास्त्रका श्रवण, तीर्थयात्रा, सत्संग, जलदान, अन्नदान, पीपलका वृक्ष लगाना तथा पुत्र—इन सातको विज्ञ पुरुष सन्तान मानते हैं। जो वैशाखमासमें तापनाशक तक्र दान करता है, वह इस पृथ्वीपर विद्वान् और धनवान् होता है। धूपके समय मट्ठेके समान कोई दान नहीं, इसलिये रास्तेके थके-माँदे ब्राह्मणको मट्ठा देना चाहिये। जो वैशाखमासमें धूपकी शान्तिके लिये दही और खाँड़ दान करता है तथा विष्णुप्रिय वैशाखमासमें जो स्वच्छ चावल देता है, वह पूर्ण आयु और सम्पूर्ण यज्ञोंका फल पाता है। जो पुरुष ब्राह्मणके लिये गोघृत अर्पण करता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाकर विष्णुलोकमें आनन्दका अनुभव करता है। जो दिनके तापकी शान्तिके लिये सायंकालमें ब्राह्मणको ऊख दान करता है, उसको अक्षय पुण्य प्राप्त होता है। जो वैशाखमासमें शामको ब्राह्मणके लिये फल और शर्बत देता है, उससे उसके पितरोंको निश्चय ही अमृतपानका अवसर मिलता है। जो वैशाखके महीनेमें पके हुए आमके फलके साथ शर्बत देता है, उसके सारे पाप निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं। जो वैशाखकी अमावास्याको पितरोंके उद्देश्यसे कस्तूरी, कपूर, बेला और खसकी सुगन्धसे वासित शर्बतसे भरा हुआ घड़ा दान करता है, वह छियानबे घड़ा दान करनेका पुण्य पाता है।

वैशाखमें तेल लगाना, दिनमें सोना, कांस्यके पात्रमें भोजन करना, खाटपर सोना, घरमें नहाना, निषिद्ध पदार्थ खाना, दुबारा भोजन करना तथा रातमें खाना—ये आठ बातें त्याग देनी चाहिये*। जो वैशाखमें व्रतका पालन करनेवाला पुरुष पद्म-पत्तेमें भोजन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकमें जाता है। जो विष्णुभक्त पुरुष वैशाखमासमें नदी-स्नान करता है, वह तीन जन्मोंके पापसे निश्चय ही मुक्त हो जाता है। जो प्रातःकाल सूर्योदयके समय किसी समुद्रगामिनी नदीमें वैशाख-स्नान करता है, वह सात जन्मोंके पापसे तत्काल छूट जाता है। जो मनुष्य सात गंगाओंमेंसे किसीमें ऊषःकालमें स्नान करता है, वह करोड़ों जन्मोंमें उपार्जित किये हुए पापसे निस्सन्देह मुक्त हो जाता है। जाह्नवी (गंगा), वृद्ध गंगा (गोदावरी), कालिन्दी (यमुना), सरस्वती, कावेरी, नर्मदा और वेणी—ये सात गंगाएँ कही गयी हैं।† वैशाखमास आनेपर जो प्रातःकाल बावलियोंमें स्नान करता है, उसके महापातकोंका नाश हो जाता है। कन्द, मूल, फल, शाक, नमक, गुड़, बेर, पत्र, जल और तक्र—जो भी वैशाखमें दिया जाय, वह सब अक्षय होता है।


* तैलाभ्यङ्गं दिवास्वापं तथा वै कांस्यभोजनम्। खट्वानिद्रां गृहे स्नानं निषिद्धस्य च भक्षणम्॥
वैशाखे वर्जयेदष्टौ द्विभुक्तं नक्तभोजनम्।
(स्क० पु०, वै० वै० मा० ४।१-२)
† जाह्नवी वृद्धगङ्गा च कालिन्दी च सरस्वती। कावेरी नर्मदा वेणी सप्तगङ्गा प्रकीर्तिता॥ (स्क० पु०, वै० वै० मा० ४।१५)

  • वैष्णवखण्ड-वैशाखमास-माहात्म्य * | ४७७ ---|---

ब्रह्मा आदि देवता भी बिना दिये हुए कोई वस्तु नहीं पाते। जो दानसे हीन है, वह निर्धन होता है। अतः सुखकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको वैशाखमासमें अवश्य दान करना चाहिये। सूर्यदेवके मेषराशिमें स्थित होनेपर भगवान् विष्णुके उद्देश्यसे अवश्य प्रातःकाल स्नान करके भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। कोई महीरथ नामक एक राजा था, जो कामनाओंमें आसक्त और अजितेन्द्रिय था। वह केवल वैशाख-स्नानके सुयोगसे स्वतः वैकुण्ठधामको चला गया। वैशाखमासके देवता भगवान् मधुसूदन हैं। अतएव वह सफल मास है। वैशाखमासमें भगवान्‌की प्रार्थनाका मन्त्र इस प्रकार है—
मधुसूदन देवेश वैशाखे मेषगे रवौ।
प्रातःस्नानं करिष्यामि निर्विघ्नं कुरु माधव॥
‘हे मधुसूदन! हे देवेश्वर माधव! मैं मेषराशिमें सूर्यके स्थित होनेपर वैशाखमासमें प्रातःस्नान करूँगा, आप इसे निर्विघ्न पूर्ण कीजिये।’
तत्पश्चात् निम्नांकित मन्त्रसे अर्घ्य प्रदान करे—
वैशाखे मेषगे भानौ प्रातःस्नानपरायणः।
अर्घ्यं तेऽहं प्रदास्यामि गृहाण मधुसूदन॥ | ‘सूर्यके मेषराशिपर स्थित रहते हुए वैशाख-मासमें प्रातःस्नानके नियममें संलग्न होकर मैं आपको अर्घ्य देता हूँ। मधुसूदन! इसे ग्रहण कीजिये।’
इस प्रकार अर्घ्य समर्पण करके स्नान करे। फिर वस्त्रोंको पहनकर सन्ध्या-तर्पण आदि सब कर्मोंको पूरा करके वैशाखमासमें विकसित होनेवाले पुष्पोंसे भगवान् विष्णुकी पूजा करे। उसके बाद वैशाखमासके माहात्म्यको सूचित करनेवाली भगवान् विष्णुकी कथा सुने। ऐसा करनेसे कोटि जन्मोंके पापोंसे मुक्त होकर मनुष्य मोक्षको प्राप्त होता है। यह शरीर अपने अधीन है, जल भी अपने अधीन ही है, साथ ही अपनी जिह्वा भी अपने वशमें है। अतः इस स्वाधीन शरीरसे स्वाधीन जलमें स्नान करके स्वाधीन जिह्वासे ‘हरि’ इन दो अक्षरोंका उच्चारण करे। जो वैशाखमासमें तुलसीदलसे भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, वह विष्णुकी सायुज्य मुक्तिको पाता है। अतः अनेक प्रकारके भक्तिमार्गसे तथा भाँति-भाँतिके व्रतोंद्वारा भगवान् विष्णुकी सेवा तथा उनके सगुण या निर्गुण स्वरूपका अनन्य चित्तसे ध्यान करना चाहिये।

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वैशाखमासमें छत्रदानसे हेमकान्तका उद्धार

नारदजी कहते हैं—एक समय विदेहराज जनकके घर दोपहरके समय श्रुतदेव नामसे विख्यात एक श्रेष्ठ मुनि पधारे, जो वेदोंके ज्ञाता थे। उन्हें देखकर राजा बड़े उल्लासके साथ उठकर खड़े हो गये और मधुपर्क आदि सामग्रियोंसे उनकी विधिपूर्वक पूजा करके राजाने उनके चरणोदकको अपने मस्तकपर धारण किया। इस प्रकार स्वागत-सत्कारके पश्चात् जब वे आसनपर विराजमान हुए, तब विदेहराजके प्रश्नके अनुसार वैशाखमासके माहात्म्यका वर्णन करते हुए वे इस प्रकार बोले। | श्रुतदेवने कहा—राजन्! जो लोग वैशाखमासमें धूपसे सन्तप्त होनेवाले महात्मा पुरुषोंके ऊपर छाता लगाते हैं, उन्हें अनन्त पुण्यकी प्राप्ति होती है। इस विषयमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं। पहले वंगदेशमें हेमकान्त नामसे विख्यात एक राजा हो गये हैं। वे कुशकेतुके पुत्र परम बुद्धिमान् और शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ थे। एक दिन वे शिकार खेलनेमें आसक्त होकर एक गहन वनमें जा घुसे। वहाँ अनेक प्रकारके मृग और वराह आदि जन्तुओंको मारकर जब वे बहुत