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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

अनुभात का उपाय · १४३ अनुवाद सूत्र—(योगी को) प्रत्येक अनुभवदशा में अपने संवेदन के द्वारा प्रत्येक ज्ञेय-विषय का विश्लेषण करते-करते (उसमें अनुस्यूत) स्पन्दतत्त्व का निभालन करते रहना चाहिये । इस विधि से सारे प्रमेयवर्ग को एक ही तत्त्व में लय करना चाहिये । ऐसा करने से दूसरे के द्वारा पीड़ा नहीं पहुँचाई जा सकती है ॥४४॥ वृत्ति—(योगी) विशुद्ध संवेदन के द्वारा प्रत्येक ज्ञेय विषय का विश्लेषण करके, १प्रतिसमय प्रबुद्ध अर्थात् स्वरूपविकास की अवस्था में अवस्थित रहे। इस प्रकार (भावना के बल से) प्रत्येक विषय को एक ही तत्त्व के सद्भाव पर अर्थात् शुद्ध-विद्यात्मक स्पन्दसत्ता पर चढ़ाये अर्थात् दोनों को अभिन्न बनाये। ऐसा करने से उसको दूसरे अर्थात् आगे कहे जानेवाले कलासमूह के द्वारा पीड़ा नहीं पहुँचाई जा सकती है ॥४४॥ विवरण प्रस्तुत सूत्र में 'प्रबुद्धः' और 'सर्वदा' इन दो शब्दों की पृष्ठभूमि में विशेष अभिप्राय है । उनको समझना अतीव आवश्यक है, क्योंकि तभी सूत्र का अर्थ अच्छी प्रकार हृदयङ्गम हो सकता है । 'प्रबुद्धः' शब्द से यहाँ पर ऐसे सावधान और जागरूक योगी का अभिप्राय है जिसकी दिव्यदृष्टि किसी भी ज्ञेय विषय का साक्षात्कार करने के समय, उसके वास्तविक स्वरूपभूत स्पन्दतत्त्व को पहचानने में २पटु हो । साथ ही वह ऐसा प्रमाता हो जिसको अपने स्वातन्त्र्य की असीमता का अनुभव ३हुआ हो । 'सर्वदा' शब्द से किसी भी ज्ञेयविषय की साक्षात्कारकालीन तीन कोटियों का अभि- प्राय है : किसी भी ज्ञेयविषय के साक्षात्कार को तीन कोटियां होती हैं जिनको पारिभाषिक शब्दों में आदिकोटि, मध्यकोटि और अन्तकोटि कहते हैं । इनको दूसरे शब्दों में 'बाह्य इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण किये जाने से पहले का तद्विषयक इच्छाकाल', 'इन्द्रियों के द्वारा बाह्य स्थूल रूप में ग्रहण काल' और ग्रहण किये जाने के उपरान्त फिर भी संवेदन में 'विश्रान्तिकाल' कहते हैं। आदिकोटि और अन्तकोटि पर प्रत्येक ज्ञेयविषय अहंविमर्शात्मक प्रमातृभाव के साथ तादात्म्यरूप में अवस्थित रहता है । मध्यकोटि अर्थात् बाह्य इन्द्रियों के द्वारा स्थूलरूप में ग्रहण किये जाने के समय पर ही वह, मायाशक्ति रूप स्वातन्त्र्य के द्वारा, अहंरूपता से अलग होकर 'इदं' के द्वारा वाच्य, स्थूल पाञ्चभौतिक रूप में स्थिति प्राप्त कर लेता है। शब्द, स्पर्श आदि विषयों के इसी रूप को 'संसार-भाव' कहा जाता है क्योंकि यही रूप परिवर्तन- शील होता है । १. यहाँ पर 'प्रतिसमय' शब्द से ज्ञेयविषय की आदिकोटि, मध्यकोटि और अन्तकोटि— इन तीन अनुभवदशाओं का अभिप्राय है । २. अनिमीलितसम्यग्ज्ञानदृष्टिः जाग्रदेव । (स्प० का० वि०, ४. १४) ३. असंकुचितस्वातन्त्र्यशक्तिः । (शिवसूत्र, २. ९ की ६५वीं टिप्पणी)

१४४ स्पन्दकारिका साधारण रूप में संसारी 'पशु' ज्ञेयविषयों के १ दकोटि और अन्तकोटिवाले रूप से परिचित नहीं होते हैं, क्योंकि उनको स्वरूप-परिचय ही नहीं होता है। ऊपर से वे उनके मध्यकोटिवाले स्थूल एवं परिवर्तनशील रूप को ही उनका वास्तविक रूप समझ कर प्रमाद में पड़े रहते हैं। यही एक महती विडम्बना है। अतः सूत्रकार ने उपरिनिर्दिष्ट 'प्रबुद्धः' और 'सर्वदा' शब्दों का प्रयोग करके सम्यक् ज्ञानदृष्टि से युक्त योगियों को, साक्षात्कार की तीनों कोटियों पर ज्ञेयविषयों के वास्तविक स्वरूप को ही दृष्टि में रखने का उपदेश दिया है। इसके अतिरिक्त सूत्र में उस उपाय को भी समझाया गया है जिसको अपनाने से योगीजन प्रत्येक प्रकार की अनुभवदशा में केवल स्वरूपाभास पर ही अवस्थित रहने की क्षमता प्राप्त कर लेते हैं। वह उपाय है—'अपने सद्दिमर्श के द्वारा प्रत्येक ज्ञेयविषय का स्वरूपविश्लेषण करके उसके वास्तविक रूप को पहचानना'। उदाहरण के तौर पर यदि 'घट' का स्वरूपविश्लेषण किया जाये, तो यह समझने में देर नहीं लगती कि स्थूल आकार, ऊँचाई, गोलाई, ललाई इत्यादि इसका वास्तविक स्वरूप नहीं बन सकते हैं, क्योंकि ये सारे कल्पित, परिवर्तनशील और नश्वर हैं। फलतः इन सबों को काटकर शेष जो कुछ बचता है, वह इसका संवेदनात्मक रूप है जो कि 'चित्कला की अहंविमर्शमयी स्पन्दना के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। इसी प्रकार, स्वरूप-विश्लेषणात्मक पद्धति का अभ्यास करनेवाले योगी को किसी समय स्वयं ही यह अनुभूति हो जाती है कि सारा विश्व वास्तव में स्वरूपस्पन्दना ही है। भगवान् २आशुतोष ने इसी सिद्धान्त को अपनी सूत्रात्मक भाषा में इस प्रकार समझाया है— "सावधान योगी, प्रत्येक अनुभवदशा में अन्यथा उपपत्तिरूप अज्ञानात्मक ज्ञान का अन्न खाते रहते हैं।" इसका भाव यह कि योगी लोग प्रत्येक भाव पर चढ़ी हुई, तथाकथित प्रमेयता की कालिमा को, स्वरूप-विश्लेषणात्मक अनुसन्धान की मसकली से घिस-घिस कर, उसके वास्तविक निर्मल स्वरूप का साक्षात्कार करके ही दम लेते हैं। फिर उनके लिये तथाकथित जन्म-मरण अथवा सांसारिक द्वन्द्वात्मकता का कोई भी बखेड़ा ३अवशिष्ट नहीं रहता है ॥४४॥ १. चिता सिद्धं यत्तु न तदचिदिति वक्तुं समुचितम् । तयासिद्धं नाचिन्नचिदपि कदाचित् क्वचिदपि ॥ चितो द्वारैः सिद्धं यदपि च समस्तं तदपि चित् । (भा० प्रथम भाग, ४१२ पृष्ठ) २. ज्ञानमन्नम् । (शिवसूत्र, २.९) ३. मृत्युञ्च कालञ्च कलाकलापं विकारजालं प्रतिपत्तिसात्म्यम् । ऐकात्म्यनानात्म्यवितर्कजातं तदा स सर्वं कवलीकरोति ॥ (अर्धशिखा शिवमन्त्र, १.६ में उदाहृत)

सूत्र—(ज्ञानी लोगों ने) शब्दराशि से उद्भूत शक्तिवर्ग की वश्यता में पड़े हुए

ब्राह्मी आदि शक्तियाँ १४५ [ ब्राह्मी आदि शक्तियाँ ] पूर्वसूत्र में कहा गया कि जागरूक योगियों को 'दूसरा' पीड़ा नहीं पहुँचा सकता है। अतः अगले सूत्र में इसी रहस्य का उद्घाटन किया जा रहा है कि पीड़ा पहुँचानेवाला वह दूसरा कौन है और वह किस प्रकार पीड़ा पहुँचाता है ? :- शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य भोग्यताम् । कलाविलुप्तविभवो गतः सन् स पशुः स्मृतः ॥४५॥ शब्दराशिरकारादिक्षकारान्तः तत्समुद्भूतस्य कादिवर्गात्मकस्य ब्राह्म्यादि- शक्तिसमूहस्य; भोग्यतां गतः पुरुषो, ब्राह्म्यादीनां कलाभिः ककाराद्यक्षरैर्विलुप्तविभवः स्वस्वभावात् प्रच्यवितः पशुरुच्यते ॥४५॥ अनुवाद सूत्र—(ज्ञानी लोगों ने) शब्दराशि से उद्भूत शक्तिवर्ग की वश्यता में पड़े हुए (स्वतन्त्र) पतिप्रमाता को ही पशुप्रमाता का नाम दिया है। (उसके वश्यता में पड़ने का कारण यह है कि) कला समूह ने उसके असीम वैभव (स्वातन्त्र्य) को पूर्णतया नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है ॥४५॥ वृत्ति—'अकार' से लेकर 'क्षकार' तक के वर्णसमुदाय को शब्दराशि कहते हैं। पुरुष (स्वतन्त्र पतिप्रमाता) उसी शब्दराशि से उद्भूत और 'कवर्ग' इत्यादि वर्गों का रूप धारण करनेवाली ब्राह्मी इत्यादि (पशु) शक्तियों के समुदाय का वशवर्ती बना है। इस अवस्था में उसको 'पशु' कहते हैं, क्योंकि इन्हीं ब्राह्मी इत्यादि शक्तियों के साथ सम्बन्धित कलाओं ने अर्थात् 'ककार' इत्यादि स्थूल अक्षर समुदाय ने उसके विभव को नष्ट-भ्रष्ट किया है अर्थात् उसको स्वभाव से च्युत किया है ॥४५॥ विवरण तांत्रिक शैवदर्शन का यह एक प्रसिद्ध सिद्धान्त है कि पतिप्रमाता की अभिन्न एवं स्पन्दमयी विमर्शशक्ति (सर्वस्वतन्त्र संवित् शक्ति) ही भेदरूप बहिर्विमर्श की अवस्था में, वैखरी वाणी के द्वारा उच्चार्यमाण स्थूल वर्णसमुदाय के रूप में प्रसृत होती है। यह वर्ण- समुदाय वस्तुतः शक्तिरूप होने के कारण पदों, वाक्यों, बड़े-बड़े ग्रन्थों या संसार के सारे आदान-प्रदानों की बातों का रूप धारण करके विकल्प कल्पनाओं का एक ऐसा अंडबंड जंजाल उत्पन्न कर देता है कि स्वयं स्वतन्त्र पतिप्रमाता हो उसमें उलझ-पुलझ कर अस्वतन्त्र पशुप्रमाता बन जाता है। वर्ण चूं कि शक्तिरूप ही हैं, अतः हलचल को जन्म देना उनका स्वभाव है। वे अच्छी या बुरी जैसी भी हलचल उत्पन्न करें, पशु तदनुसार कार्य करने के लिये मजबूर होता है। प्रतिक्षण बातों के बतंगड़ बनते रहते हैं, विकल्पों की श्रृंखलायें उलझती रहती हैं और संसारभाव में पड़ा हुआ पशुवर्ग अशान्ति की भट्ठी में घुसता जा रहा है। १ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

सूत्र में इसी सिद्धान्त का उल्लेख सूत्रात्मक शब्दों में किया गया है कि—'कलासमूह

१४६ स्पन्दकारिका सूत्र में इसी सिद्धान्त का उल्लेख सूत्रात्मक शब्दों में किया गया है कि—'कलासमूह ने स्वतन्त्र की स्वतन्त्रता को मटियामेट कर रखा है।' शास्त्रीय शब्दों में 'क' से लेकर 'ह' तक के सारे सस्वर व्यञ्जनसमुदाय को कलासमूह कहते हैं । फलतः कलासमूह ही वह 'दूसरा' है जो असावधान पशुप्रमाता को पग-पग पर शतशः बाधाओं में डाल देता है । इस सम्बन्ध में, स्थूल शब्दराशि के रूप में, विमर्शशक्ति की बहिर्मुखीन प्रसारप्रक्रिया की अतीव गम्भीर और दुरूह सैद्धान्तिक विवेचना आगम-शास्त्रों में प्रस्तुत की गई है। उसका विस्तृत एवं सर्वाङ्गीण वर्णन करना यहाँ पर संभव नहीं है, क्योंकि ऐसा करने से प्रस्तुत विषय के दुरूह और अरुचिकर बन जाने की आशंका है। अतः पाठकों का ध्यान इस ओर आकर्षित करने के लिए निम्नलिखित पंक्तियों में कई प्रमुख बातों का आंशिक रूप में उल्लेख किया जा रहा है । 'अकार' से लेकर 'क्षकार' तक के वर्णसमुदाय को 'शब्दराशि' कहते हैं । इसका शास्त्रीय नाम१ 'मातृका' है । वास्तव में मातृकाशक्ति, सारी भेदपूर्ण वाचक और वाच्यरूप स्थूल शब्दराशि को अपने गर्भ में, अभेदरूप में अर्थात् केवल स्पन्दनामय २विमर्श रूप में, धारण करनेवाली पराशक्ति ही है। इसका रूप पूर्ण३ अहन्तारूप स्वातन्त्र्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । स्वतन्त्र चेतनारूप होने के कारण यह स्वयं 'अ' से 'क्ष' तक के ४स्थूल एवं सूक्ष्म वर्णसमुदाय के रूप में प्रसृत होकर, अनन्त प्रकार के वाचकों और वाच्यों के विश्व को अव- भासित कर लेती है । फलतः यह सारे विश्व की माता तो है, परन्तु ऐसी माता है जिसका परिचय सिद्ध पुरुषों के अतिरिक्त और किसी को नहीं है । न जानी ५हुई माता को ही 'मातृका' कहते हैं । दूसरी ओर कई आचार्यों ने इस शब्द को मातृकावाचक के स्थान पर परिवारवाचक मानकर, इसकी दूसरी प्रकार की व्याख्या भी प्रस्तुत की है— 'अ' से 'क्ष' तक की स्थूल शब्दराशि सर्वस्वतन्त्र चित्शक्ति का ही बहिर्मुखीन प्रसार है। भेद-पदवी पर उतरते ही यह शब्दराशि आठ वर्गों में बँट जाती है और शक्ति स्वयं भी १. मालिनीविजयोत्तर तन्त्र में शब्दराशि का 'न' से लेकर 'फ' तक का दूसरा क्रम भी प्रस्तुत किया गया है। इसको 'मालिनी' कहते हैं। भट्टकल्लट को शायद वर्णमाला का यह क्रम मान्य नहीं रहा होगा, क्योंकि उसने अपनी वृत्ति में मातृका-क्रम (अ से क्ष तक) का ही उल्लेख किया है। २. सा हि भगवती अशेषवाच्यवाचकात्मकजगदभेदचमत्कारात्मकशब्दराशिविमर्शपरमार्था.... ........॥ (स्व० तं०, ११.१९९) ३. स्वातन्त्र्यशक्तिरेवास्य सनातनी पूर्णाहन्तारूपा । (स्प० नि०, ३.१३) ४. 'स्थूल' से व्यक्त ध्वनिरूप और 'सूक्ष्म' से अव्यक्त ध्वनिरूप अर्थात् क्रमशः मुख से बोले जानेवाले और मन में चिन्त्यमान वर्णों का अभिप्राय है। वैखरीरूप और मध्यमारूप होने के कारण दोनों व्यक्त पदवी पर ही अवस्थित हैं । ५. अज्ञाता माता मातृका विश्वजननी । (शिवसूत्रविमर्शिनी, १.४)

प्रकाशरूप शिव और विमर्शरूपा शक्ति की सामरस्य अवस्था ही सारे विश्व की

ब्राह्मी आदि शक्तियाँ १४७ ब्राह्मी इत्यादि आठ प्रकार के विकल्परूप शक्ति-परिवार का रूप धारण करके, प्रत्येक वर्ग की एक एक अधिष्ठात्री देवी के रूप में अवस्थित रहती है। इन शक्तियों का प्रधान काम यह है कि ये अपने वास्तविक चित्-रूप को चारों ओर से घेरकर उसको आड़ में रखती हैं। परिवार वही होता है जो अपने जन्मदाता को चारों ओर से घेरकर बैठता हो। १ब्राह्मी इत्यादि शक्तियों का परिवार भी पशुभूमिका पर अपनी ही जन्मदात्री चित्-शक्ति को घेरकर इस प्रकार बैठा रहता है कि सर्वसाधारण जीवों को उसका (चित्-शक्ति का) आभास भी नहीं मिलता है। फलतः आठ शक्तियों के परिवार को 'मातृका' कहते हैं। मातृका शक्ति के उपर्निर्दिष्ट बहिर्मुखीन प्रसार की प्रक्रिया का लेखा-जोखा भगवान् शङ्कर ने स्वयं प्रस्तुत किया है। प्रकाशरूप शिव और विमर्शरूपा शक्ति की सामरस्य अवस्था ही सारे विश्व की आत्मभूत और आधारभूत सत्ता है। इस सत्ता का स्वरूप केवल महामन्त्ररूप 'अहं-विमर्श' ही है। 'अ' २अर्थात् अनुत्तर-तत्त्व और 'ह' अर्थात् अनाहत-शक्तितत्त्व की संपुट-दशा अर्थात् प्रत्याहार-दशा ही 'अहंता' है। उसके गर्भ में सारी शब्दराशि, मोर के अण्डरस के न्याय से, भेदरहित अहंवरूप में ही अवस्थित है। पारिभाषिक शब्दों में इसी को 'परा वाणी' कहते हैं। स्थूल वाच्यवाचकमय विश्व का अवभासन करने की ओर उन्मुख होने की दशा में यह अहंवरूपा विमर्शशक्ति 'इच्छाशक्ति' का रूप धारण कर लेती है। अनन्तर ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति— इन दो रूपों में अङ्कुरित हो जाती है। इन दो रूपों में अङ्कुरित होते ही वह मायापदवी पर उतरकर स्वयं उत्पादित अनन्त उपाधियों के रंगों से, अपने को ही रंगकर, न जाने कितने अतर्क्य रूपों में प्रसूत होती है। इसी बहिर्मुखीन प्रसार प्रक्रिया में वह मातृका का रूप धारण करके दो ३प्रकार, नव प्रकार और पचास प्रकार के भेदों में विभक्त हो जाती है। इन भेदों का लेखा-जोखा इस प्रकार है। दो प्रकार के भेद ४बीज और योनि—'अ' से 'अः' तक के सारे स्वरसमुदाय को 'बीज' और 'क' से 'क्ष' तक के सारे व्यंजन-समुदाय को 'योनि' कहते हैं। ५बीज से शिवभाग और १. एतदेव च ब्राह्म्यादिमातृणां मातृत्वं यत्तस्य परिवारभावेन तिष्ठन्ति, विकल्पा हि चिद्रूपस्य जीवस्य परितो वारणात् परिवार एव, मातृशब्दो ह्यत्र परिवारवाच्येव न जननीवाचकः। (ई० प्र० भा०, २.१.१) २. अत एव प्रत्याहारयुक्त्या अनुत्तरानाहताभ्यामेव शिवशक्तिभ्यां गर्भीकृतम्, एतदात्मकमेव विश्वम्, इति महामन्त्रवीर्यात्मनोऽहंविमर्शस्य तत्त्वम् । (शिवसूत्रवि०, २.७) ३. तत्र तावत्समापन्ना मातृभावं विभिद्यते । द्विधा च नवधा चैव पञ्चाशद्धा च मालिनी ॥ (मा० वि०, ३. ९-१०) ४. बीजयोन्यात्मकाद् भेदाद् द्विधा बीजं स्वरा मताः । कादिभिश्च स्मृता योनिः........................... ॥ (मा० वि० ३. १०-११) ५. यद् बीजं तत्र शिवः शक्तियोंनिरित्यभिधीयते ॥ (तत्रैव, ३. १२)

१४८ स्पन्दकारिका योनि से शक्तिभाग का अभिप्राय है। व्याकरण में वर्णित संस्थानता के नियम से दोनों एक दूसरे में अन्तर्निहित हैं। नव¹ प्रकार के भेद १. अवर्ग 'अ' से 'अः' तक (अमा) २. कवर्ग 'क' से 'ङ' तक (कामा) ३. चवर्ग 'च' से 'ञ' तक (चार्वङ्गी) ४. टवर्ग 'ट' से 'ण' तक (टङ्कधारिणी) ५. तवर्ग 'त' से 'न' तक (तारा) ६. पवर्ग 'प' से 'म' तक (पार्वती) ७. यवर्ग 'य' से 'व' तक (यक्षिणी) ८. शवर्ग 'श' से 'ह' तक (शारिका) ९. क्षवर्ग 'क्ष' (अनुत्तर एवं अनाहत के संघट्ट को अभिव्यक्त करनेवाला कूटबीज) वर्गभेद के विषय में यह बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि वास्तव में वर्णसमाम्नाय के १ से ८ तक के ही वर्ग मुख्य हैं। 'क्ष' को मात्र औपचारिकता से ही एक पृथक् वर्ग में रखा गया है, क्योंकि इसका अन्तर्भाव 'क' और 'स' के रूप में पहले ही आठ वर्गों में हो जाता है। इन दो वर्णों का संयुक्त-रूप होने के कारण यह स्वयं कोई स्वतन्त्र वर्ण नहीं है। इसको अलग वर्गरूप में रखने का कारण केवल इतना है कि यह अनुत्तर वाचक 'ककार' और विसर्गवाचक 'सकार' का संयुक्तरूप एक ²कूटबीज है जो कि इस बात को अभिव्यक्त करता है कि मातृका का प्रत्येक वर्ण, शिवभाग और शक्तिभाग का संघट्टरूप है। यही कारण है कि इसको शब्दराशि के अन्त में रखा गया है। पचास प्रकार के भेद—शब्दराशि के ³प्रत्येक अक्षर को अलग-अलग शक्तिरूप मानकर सोलह स्वरों और चौंतीस व्यंजनों के रूप में पचास भेदों की कल्पना की गई है। वर्णसमाम्नाय के आठ वर्ग वास्तव में भेदभूमिका पर अवतीर्ण विमर्शशक्ति के ही आठ⁴ रूप हैं। इनके नाम इस प्रकार हैं—'माहेशी, ब्राह्मी, कौमारी, वैष्णवी, ऐन्द्री, याम्या, चामुण्डा और योगेशी'। इन आठ शक्तियों को पारिभाषिक शब्दों में 'पीठेश्वरियाँ' कहते हैं। इनकी क्रिया द्विमुखी है। साधारण पशुओं के लिए ये प्रतिक्षण अधिकाधिक विकल्प-परम्पराओं को जन्म १. नवधा वर्गभेदतः ॥ (तत्रैव) २. तदियत्पर्यन्तं यन्मातृकायास्तत्त्वं तदेव ककार-सकारप्रत्याहारेण, अनुत्तरविसर्गसंघट्टसारेण कूटबीजेन प्रदर्शितमन्ते। (शिवसूत्रवि०, २.७) ३. प्रतिवर्णविभेदेन शतार्धकिरणोज्ज्वला। रणोज्ज्वला। (मा० वि०, ३. ११) ४. तदेव शक्तिभेदेन माहेश्वर्यादि चाष्टकम्। (मा० वि०, ३. १२)

ब्राह्मी आदि शक्तियाँ १४९ देती रहती हैं। ये अतीव भयानक हैं और ब्रह्मरंध्र में वर्तमान चित्-शक्ति को आड़ में रखकर, अनन्त प्रकार के स्थूल, अर्थात् वाणी के द्वारा अभिलापात्मक और सूक्ष्म, अर्थात् मानसिक संकल्प-विकल्पात्मक वाचकों और वाच्यों के इशारों पर, अज्ञानी जीवों को न जाने कितने और कैसे नाच नचती¹ रहती हैं। दूसरी ओर जिन भाग्यशाली पुरुषों में ईश्वरीय अनुग्रह से सद्विवेक का उदय हुआ हो उनको ये इसी शब्दराशि में अन्तर्निहित शाक्तबल की अनुभूति करवा कर शिवभाव पर पहुँचाने में पथप्रदर्शन भी करती हैं। आखिरकार वाणी ही मनुष्य को मार भी लेती है और तार भी लेती है। मातृका-शक्ति के ये उपर्युक्त आठ भेद केवल विषय को सुगम बनाने के लिये प्रधानरूप में स्वीकारे गये हैं। वस्तुस्थिति तो यह है कि संसार में प्रतिक्षण वाच्यवाचकात्मक विकल्प-परम्पराओं की जितनी भी अगणित श्रृंखलाओं की अनन्त कड़ियाँ प्रसर में आती हैं, वे तो शक्ति के ही अनन्त रूप हैं। अतः उनको यथावत् रूप में गिना नहीं जा सकता है। यह अनन्त प्रकार का शक्तिवर्ग भिन्न-भिन्न प्रकृतिवाले प्रमाताओं को भिन्न-भिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाओं का विषय बना लेता है। साधारणतया तीन गुणों के आधार पर प्रकृति तीन प्रकार की हैं अतः शास्त्रकारों ने तदनुकूल ²कार्यभेद के अनुसार इस शक्तिवर्ग के भी तीन रूप स्वीकार किये हैं। इनका विवरण इस प्रकार है :— १. ³घोरतरा (अपरा)—प्रधानतया तामसिक प्रकृतिवाले पशुवर्ग के लिये शक्तिवर्ग का रूप महान् भयानक है। यह उनको प्रतिसमय केवल कनक-कामिनी अथवा दूसरे प्रकार के सांसारिक विषयोपभोग की वारुणी पिला-पिला कर अचेत बना देता है और निरन्तर अधोगति की निचली सीढ़ी की ओर लुढ़काता रहता है। २. ⁴घोरा (परापरा)—प्रधानतया राजसिक प्रकृतिवाले पशुवर्ग के लिये शक्तियों का रूप घोर अर्थात् भयानक ही है परन्तु घोरतर रूप जैसा भयंकर नहीं है। अभिप्राय यह कि इस स्तर पर अवस्थित व्यक्ति पर, यदि ईश्वरीय अनुग्रह हो तो वह अपना उद्धार भी कर सकता है। घोरा शक्तियाँ पशुओं के मन में मिश्रित (शुभ एवं अशुभ) कर्मफलों के प्रति आसक्ति उत्पन्न करती हैं और साधारणतया उनके लिये मुक्ति का द्वार बन्द ही रखती हैं। १. करन्ध्रचितिमध्यस्था ब्रह्मपाशावलम्बिकाः। पीठेश्वर्यो महाघोरा नर्तयन्ति मुहुर्मुहुः ॥ (तिमिरोद्घाट, शिवसूत्र, १.१४ में उदाहृत) २. अनन्तस्यापि भेदस्य शिवशक्तेर्महात्मनः। कार्यभेदान्महादेवि ! त्रैविध्यं समुदाहृतम् ॥ (मा० वि०, ३.३०) ३. विषयेष्वेव संलीनानधोऽधः पातयन्त्यणून् । रुद्राणून् या समालिङ्ग्य घोरतर्योऽपराः स्मृताः ॥ (मा० वि०, ३.३१) ४. मिश्रकर्मफलासक्तिं पूर्ववज्जनयन्ति याः । मुक्तिमार्गनिरोधिन्यास्ताः स्युर्घोराः परापराः ॥ (तत्रैव, ३.३२)

१५० स्पन्दकारिका CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri ३. १अघोरा (परा)—अनुभूतिशील एवं सात्त्विक प्रकृतिवाले योगियों के लिये शक्तिवर्ग का रूप अघोर अर्थात् अतीव सौम्य एवं कल्याणकारी है। जिस प्रकार यह राजसिक या तामसिक प्रकृतिवाले व्यक्तियों को तदनुकूल कर्मफलों की ओर प्रेरित करती हैं उसी प्रकार योगियों को शिवभाव पर पहुँचा देती हैं। अब सूत्र में उल्लिखित 'कलासमूह' के विषय में भी दो शब्द कह देना आवश्यक है। अन्तर्विमर्श की अवस्था में अ, इ, उ, ऋ, लृ—ये पाँच मूल-स्वर क्रमशः चित्, निर्वृत्ति, इच्छा, ज्ञान और क्रिया—इन पाँच माहेश्वर शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। २बहिर्विमर्श की अवस्था में इन्हीं पाँच मूल स्वरों की अवतारणा क्रमशः कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग के रूप में होती है। इन्हीं ककार आदि अक्षरों को पारिभाषिक शब्दों में 'कलासमूह' कहते हैं क्योंकि ये कलातत्त्व, विद्यातत्त्व इत्यादि मायीय प्रपञ्च का प्रतिनिधित्व करते हैं। शास्त्रों में कलासमूह की परिगणना स्वरवर्ग को अलग छोड़कर 'क' वर्ण से आरम्भ करने का अभिप्राय यह है कि जब स्वर और व्यंजन पारस्परिक संमिश्रण की अवस्था में पड़ जाते हैं तभी विकल्प परम्पराओं का क्षोभ उत्पन्न हो जाता है, अन्यथा केवल स्वर या केवल व्यंजन अलग अलग किसी क्षोभ को उत्पन्न नहीं कर सकते हैं। इन दोनों के पारस्परिक संमिश्रण को शास्त्रीय शब्दों में बीजयोनि-संक्षोभ कहते हैं। इस सारे प्रसङ्ग का निष्कर्ष यही निकलता है कि प्रत्येक शब्द केवल एक जड़ ध्वनि- मात्र ही नहीं, अपितु स्पन्दमयी चेतना शक्ति है। प्रत्येक जीव तबतक इस शक्ति का दास है जबतक उसे अपने भोक्तृभाव की अनुभूति प्राप्त न हो ।।४५।। [ शक्ति का अवरोह और आवरणात्मक स्वभाव और क्रियाशक्ति के दो रूप ] अगले तीन सूत्रों में इस तथ्य का स्पष्टीकरण किया जा रहा है कि स्वतन्त्र आत्मा में पूर्वोक्त स्वशक्ति-अज्ञान 'प्रत्ययोद्भव' के रूप में प्रकट हो जाता है। 'प्रत्ययोद्भव' ही त्रिविध मल है। इसी से शिव, शिवभाव से अवतीर्ण होकर, जड़ भाव की अन्तिम कोटि पृथिवीतत्त्व तक पहुँच जाता है— परामृतरसापायस्तस्य यः प्रत्ययोद्भवः । तेनास्वतन्त्रतामेति स च तन्मात्रगोचरः ॥४६॥ परामृतरसात् स्वरूपात् अपायः प्रच्युतिः, तस्य यः प्रत्ययोद्भवो विषयदर्शने स्मरणोदयो यतः, तेन पुरुषोऽस्वतन्त्रताम् असर्वगत्वं च प्राप्नोति, स च प्रत्ययः तन्मात्र- गोचरो रूपाद्यभिलाषात्मकः ॥४६॥ १. पूर्ववज्जन्तुजातस्य शिवधामफलप्रदाः । पराः प्रकथितास्तज्जैरघोराः शिवशक्तयः ।। (तत्रैव, ३.३३) २. बहिर्विमर्शेन तु कादिमान्तं पञ्चपञ्चकं अ, इ, उ, ऋ, लृ शक्तिभ्यः पुरुषतत्त्वं समस्तं प्रपञ्चयति । (शिवसूत्रवि०, ३.७)

सूत्र—(निर्विकल्प स्वरूप में) १विकल्प ज्ञानों का उदित होना ही, उसका परामृतरस

शक्ति और क्रियाशक्ति १५१ स्वरूपावरणे चास्य शक्तयः सततोत्थिताः । यतः शब्दानुवेधेन न विना प्रत्ययोद्भवः ॥४७॥ स्वरूपस्य स्वभावस्याच्छादने चास्य पुरुषस्य शक्तयो ब्राह्म्याद्याः पूर्वमुक्ता याः, ताः सततम् उद्युक्ताः । यतः शब्दरहितस्य प्रत्ययस्य ज्ञानस्य नास्त्येव कस्यचि- दुद्भवः ॥४७॥ सेयं क्रियात्मिका शक्तिः शिवस्य पशुवर्तिनी । बन्धयित्री स्वमार्गस्था ज्ञाता सिद्ध्युपपादिका ॥४८॥ सा चेयं क्रियास्वभावा भगवतः पशुवर्तिनी शक्तिः । यदुक्तम्— 'न सा जीवकला काचित् सन्तानद्वयवर्तिनी । व्याप्त्री शिवकला यस्यामधिष्ठात्री न विद्यते ॥' इति । सैव च बन्धकारणम् अज्ञाता, ज्ञाता सा च पुनः परापरसिद्धिप्रदा भवति पुंसाम् ॥४८॥ अनुवाद सूत्र—(निर्विकल्प स्वरूप में) १विकल्प ज्ञानों का उदित होना ही, उसका परामृतरस (शिवशक्ति सामरस्य) की पदवी से लुढ़क जाना है। इसी से वह अस्वतन्त्र बन जाता है। इसके (विकल्प ज्ञान के) विषय पांच २तन्मात्र हैं ॥४६॥ वृत्ति—वह (स्वतन्त्र पतिप्रमाता) परा मृत रस की पदवी से लुढ़क जाता है क्योंकि उसमें प्रत्ययोद्भव अर्थात् ग्राह्य विषयों की उपलब्धि होने पर तद्विषयक ३स्मरण का उदय हो जाता है। उससे वह पुरुष परतन्त्रता और असर्वव्यापकता की अवस्था पर पहुँच जाता है। प्रत्ययोद्भव के विषय तन्मात्र हैं। रूप इत्यादि के प्रति अभिलाषा का उत्पन्न होना, उस विषयता का स्वरूप है ॥४६॥ सूत्र—यह निश्चित है कि पूर्वोक्त शक्तियाँ (ब्राह्मी इत्यादि शक्तियाँ) इसके स्वरूप पर आवरण डालने के लिये प्रतिसमय उद्यत रहती हैं। इसका कारण यह कि (स्थूल और सूक्ष्म) शब्दों की अनुस्यूतता के बिना 'प्रत्ययोद्भव' संभव नहीं है ॥४७॥ वृत्ति—पहले जिन ब्राह्मी इत्यादि शक्तियों का उल्लेख किया गया है वे इस पुरुष के स्वरूप अर्थात् स्वभाव को ढापने के लिये प्रतिसमय उद्यत रहती हैं। इसका कारण यह कि शब्द १. सूत्र में उल्लिखित 'प्रत्ययोद्भव' एक पारिभाषिक शब्द है। स्वशक्ति विरोध के फल- स्वरूपविकल्पहीन स्वरूप में ज्ञेय विषयों से सम्बन्धित विकल्प ज्ञानों का उदय हो जाने को 'प्रत्ययोद्भव' कहते हैं। २. यहाँ पर 'तन्मात्र' शब्द से सारी प्राधानिक सृष्टि का अभिप्राय है। ३. यहाँ पर 'स्मरण' से स्मरण, संशय, भ्रम, अध्यवसाय, अनुमान इत्यादि विकल्प ज्ञानों की परम्परा का अभिप्राय है।

सूत्र—यह (मातृका) वास्तव में शिव की वह क्रियाशक्ति ही है जो कि (बहिर्विमर्श की

१५२ स्पन्दकारिका CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri की सहकारिता के बिना किसी भी 'प्रत्यय' अर्थात् विकल्प ज्ञान का उत्पन्न होना संभव ही नहीं है ॥४७॥ सूत्र—यह (मातृका) वास्तव में शिव की वह क्रियाशक्ति ही है जो कि (बहिर्विमर्श की अवस्था में) पशुवर्तिनी (पशु में विद्यमान स्थूल क्रिया) बन जाने के कारण बन्धन में डाल देने- वाली है, परन्तु (इसके प्रतिकूल) अपने मार्ग पर (शिवमार्ग पर) अवस्थित होती हुई, वास्त- विक रूप में ज्ञात होनेपर, सिद्धियाँ प्रदान करती है ॥४८॥ वृत्ति—यह (मातृका) वास्तव में भगवान् की क्रियात्मक स्वभाववाली शक्ति ही है जो पशुवर्तिनी बन गई है। जैसा कहा गया है— 'दो १सन्तानों के रूप में चलने वाली ऐसी कोई भी 'जीवकला' नहीं है जिसमें 'शिव- कला' अधिष्ठात्री बनकर व्याप्त न हो ॥' अतः वही (ईश्वरीय क्रियाशक्ति ही) अज्ञात होने की दशा में बन्धन का कारण है। परन्तु वास्तविक रूप में ज्ञात होने की दशा में मनुष्यों को पररूप और अपररूप सिद्धियाँ प्रदान कर देती है ॥४८॥ विवरण प्रस्तुत तीन सूत्रों में विमर्शरूपा स्पन्दशक्ति के बहिर्मुखीन प्रसार की क्रीडा का सूत्रात्मक रूप में वर्णन किया गया है। यह शाक्त-प्रसार तीन रूपों में प्रसृत होकर स्वतन्त्र को अस्वतन्त्र बना देता है। वे तीन रूप इस प्रकार हैं— १. प्रत्ययोद्भव, २. स्वरूप आवरण, ३. पशुवर्तिनी स्थूलक्रिया के रूप का ग्रहण। इन तीन रूपों को शास्त्रीय शब्दों में क्रमशः पूर्वोक्त आणवमल, मायीयमल और कार्म- मल कहते हैं। शाक्त-प्रसर की क्रीडा बराबर चैतन्य की अनुत्तर कोटि 'शिवभाव' से लेकर जड़भाव की निम्नतमकोटि 'पृथिवीतत्त्व' तक चलती रहती है। शिव से लेकर पृथिवी तक छत्तीस तत्त्व हैं। इनमें सारा जड़चेतनात्मक विश्व अन्तर्भूत है। अतः प्रस्तुत सूत्रों में से पहले सूत्र के शब्दों से छत्तीस तत्त्वों का अभिप्राय भी निकलता है। इन सारी बातों को स्पष्टरूप में समझने के लिये प्रत्येक सूत्र पर अलग-अलग प्रकाश डालना आवश्यक प्रतीत होता है। सूत्र ४६— इस सूत्र में यह समझाया गया है कि बाह्य प्रसार की ओर उन्मुख होते ही शक्ति 'प्रत्ययोद्भव' के रूप में विकसित हो जाती है। विकल्पपरम्परा ही 'प्रत्ययोद्भव' का रूप होता है। इसका अभिप्राय यह कि शिव की निजी अभिन्न स्वातन्त्र्यशक्ति ज्यों ही मायाशक्ति का १. जीवकला दो संतानों के रूप में चलती है—१. ज्ञानसन्तान और २. क्रियासंतान। ज्ञानसंतान में मनस्, बुद्धि और अहंकार ये तीन अन्तःकरण और क्रियासंतान में पांच ज्ञानेन्द्रियाँ, पांच कर्मेन्द्रियाँ और प्राणशक्ति अन्तर्भूत हैं। फलतः 'ज्ञानसंतान' तीन प्रकार का और 'क्रियासंतान' ग्यारह प्रकार का है। (द्रष्टव्य तन्त्रालोक, ४.१८)

शक्ति और क्रियाशक्ति १५३ रूप धारण कर लेती है त्यों ही उसमें (शिव में) अपनी पूर्णता और स्वतन्त्रता के विषय में शङ्का उत्पन्न हो जाती है। अपनी स्वतन्त्रता को अन्यथा रूप में समझना ही सबसे पहला 'प्रत्ययोद्भव' है। स्वतन्त्रता की डाँवाडोल परिस्थिति दो रूपों में स्फुरित होती है—(१) स्वतन्त्र ज्ञातृता की हानि, (२) स्वतन्त्रकर्तृता का अबोध। दूसरे शब्दों में इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि स्वरूप से भिन्न ग्राह्यविषयों की उपलब्धि होते ही स्वतन्त्र आत्मा को अपने अनात्मविश्वास और अनात्मभूत शरीरादि पर आत्मविश्वास हो जाता है। यही तो सबसे बड़ा 'प्रत्ययोद्भव' है और यही मौलिक स्वातन्त्र्यहानि है। यही 'आणवमल' कहा जाता है। प्रत्ययोद्भव के द्वारा स्वातन्त्र्य के संदेह में पड़ने के साथ ही आत्मा की सर्वतोमुखी अवरोहण-प्रक्रिया का उद्भव हो जाता है। चेतन ही जड़ बन जाता है; परा वाणी ही स्थूल वैखरी-वाणी का रूप धारण कर लेती है। स्वतन्त्रज्ञातृता और कर्तृता ही संकुचित ज्ञान और क्रिया बन जाते हैं, इत्यादि। फलतः छत्तीस तत्त्वों का बहिर्मुखीन अवभासन सम्पन्न हो जाता है। इस सारी प्रक्रिया को सूत्रकार ने 'परामृतरसापाय' की संज्ञा दी है। अभी ऊपर कहा गया है कि प्रस्तुत सूत्र के शब्दों में, छत्तीस तत्त्वों का अर्थ भी व्यंग्यरूप में अन्तर्निहित है। संक्षेप में वह इस प्रकार है :— परामृत—१. अनुत्तर, अविनाशी, सर्वस्वतन्त्र, प्रकाशरूप शिव। रस—२. शिव की अभिन्न अहंविमर्शमयी स्पन्दशक्ति। (इन दो तत्त्वों में द्वित्व औपचारिक है। वास्तव में यह एक ही शिवशक्ति-सामरस्य की अवस्था है। इसी को प्रकाश की प्रधानता से शिव और विमर्श की प्रधानता से शक्ति कहा गया है)। परामृत—३. सदाशिव-तत्त्व। ४. ईश्वर-तत्त्व। ५. शुद्धविद्या-तत्त्व। (ये तीन तत्त्व भी 'परामृत' शब्द से ही वाच्य हैं क्योंकि यहाँ तक भी अभेद प्रथा उपजानेवाली तत्त्वरूपा माया का उल्लास नहीं हुआ होता है। हाँ इन तत्त्वों में पूर्वोक्त उन्मेष- निमेषात्मक उतार-चढ़ाव से ही पारस्परिक भेद माना जाता है)। प्रत्ययोद्भव—६. माया-तत्त्व। ९. राग-तत्त्व। ७. कला-तत्त्व। १०. नियति-तत्त्व। ८. विद्या-तत्त्व। ११. काल-तत्त्व। (ये छः तत्त्व भेदप्रथा को उपजानेवाली तत्त्वरूपा माया का प्रसार-रूप हैं। शास्त्रीय शब्दों में इनको 'षट्-कञ्चुक' भी कहा जाता है)। अस्वतन्त्र—१२. पुरुष-तत्त्व। (षट्-कञ्चुक में फँसा हुआ जीव अथवा शास्त्रीय शब्दों में 'पशु') अब आगे प्रत्ययोद्भव के विषयभूत तन्मात्रप्रपञ्च अर्थात् जड़ ग्राह्यवर्ग का उल्लेख एक ही शब्द के द्वारा किया गया है :—

सूत्र ४७—

१५४ स्पन्दकारिका तन्मात्रगोचरः—१३. प्रकृति-तत्त्व। २५. पायु-तत्त्व। १४. बुद्धि-तत्त्व। २६. उपस्थ-तत्त्व। १५. मनस्-तत्त्व। २७. शब्द-तत्त्व। १६. अहंकार-तत्त्व। २८. स्पर्श-तत्त्व। १७. श्रोत्र-तत्त्व। २९. रूप-तत्त्व। १८. त्वक्-तत्त्व। ३०. रस-तत्त्व। १९. नेत्र-तत्त्व। ३१. गन्ध-तत्त्व। २०. जिह्वा-तत्त्व। ३२. आकाश-तत्त्व। २१. घ्राण-तत्त्व। ३३. वायु-तत्त्व। २२. वाणी-तत्त्व। ३४. तेजस्-तत्त्व। २३. हस्त-तत्त्व। ३५. जल-तत्त्व। २४. पाद-तत्त्व। ३६. पृथिवी-तत्त्व। सूत्र ४७— इस सूत्र में शक्ति के 'स्वरूप-आवरणात्मक' स्वभाव का वर्णन किया गया है। पहले भी इस तथ्य को समझाने का प्रयत्न किया गया है कि स्वरूप पर प्रतिसमय किसी न किसी प्रकार का आवरण डालकर, उसको आड़ में कर देना शक्ति का अकाट्य स्वभाव है। इस सम्बन्ध में यह दृष्टि में रखना आवश्यक है कि शिवभूमिका पर शक्ति का रूप अहंविमर्शमयी स्पन्दना अथवा पूर्णस्वातन्त्र्य है अतः उस भूमिका पर स्वरूपगोपन का प्रश्न ही नहीं उठता है। परन्तु ज्यों ही शक्ति बहिर्मुख होकर मायाशक्ति का रूप धारण करती है त्यों ही इसकी स्वरूपगोपनात्मक प्रक्रिया का आरम्भ हो जाता है। यही कारण है कि मायाशक्ति को शास्त्रों में, 'स्वरूपगोपन-व्यग्रा', अर्थात् स्वरूप को तिरोहित करने में व्यस्त, की संज्ञा दी गई है। स्वरूप आवरण को ही दूसरे शब्दों में मायीय-मल कहा जाता है, क्योंकि मायीय आवरणों के द्वारा आवृत होने के कारण से ही, शिव, अपने ही अङ्गभूत वेद्य पदार्थों को, स्वरूप से भिन्न समझने के संकोच की परवशता में पड़ जाता है। इसके अतिरिक्त इसी सूत्र में उल्लिखित 'शब्दानुवेध' के विषय में यह समझना आवश्यक है कि संसार के प्रत्येक अर्थ के साथ उसके वाचकभूत शब्द का, नीर-क्षीर का जैसा संश्लेष शाश्वतरूप में वर्तमान है। शास्त्रीय शब्दों में इस प्रकार कहा जाता है कि प्रत्येक अर्थ (ज्ञेयविषय) प्रकाशरूप है और उसका वाचक शब्द उसके अणु-अणु में व्याप्त रहनेवाली विमर्शना है। शब्द ही प्रत्येक अर्थ को ज्ञान के रूप में सत्ता प्रदान कर देता है। क्योंकि संसार में किसी ऐसे अर्थ या उसके ज्ञान का सद्भाव ही नहीं है जिसके साथ शब्द अर्थात् अभिलापात्मकता न हो। फलतः शब्द और अर्थ का साहचर्य साक्षात् शिव-शक्ति का संघटन ही है।

सूत्र ४८-

शक्ति और क्रियाशक्ति १५५ CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri सूत्र ४८- इस सूत्र में क्रियाशक्ति के दो रूपों का उल्लेख किया गया है-(१) शिववर्तिनी क्रिया- शक्ति और (२) पशुवर्तिनी स्थूल-क्रिया। इनमें से पशुवर्तिनी क्रिया बन्धन में डाल देनेवाली है और इसी को शास्त्रीय शब्दों में 'कार्म-मल' कहते हैं। इस कथन का आशय निम्नलिखित विचारों को ध्यान में रखने से स्पष्ट हो सकता है- शिव में जिस प्रकार ज्ञातृता है उसी प्रकार कर्तृता भी है। यह कहना ठीक होगा कि वास्तव में उसकी स्वतन्त्र इच्छा ही उसकी ज्ञातृता और कर्तृता भी है। अस्तु, शिवसम्बन्धिनी कर्तृता को 'शिववर्तिनी क्रियाशक्ति' कहते हैं। विमर्शनमयी स्पन्दना ही इसका मात्र स्वरूप है। दूसरे शब्दों में इसको पारमेश्वरी निर्माण^१ शक्ति भी कहते हैं, क्योंकि यही वह शाक्तस्पन्दना है, जो^२ मूर्तिभेद से जनित देशक्रम और क्रियाभेद से जनित कालक्रम से उपलक्षित, अनन्त प्रकार के शून्य, प्राण, पुर्यष्टक इत्यादि प्रमाताओं और उनके नील, सुख आदि ज्ञेयविषयों को स्वरूप से और एक दूसरे से भेदरूप में अवभासित करती है। इस प्रकार अनन्त वैचित्र्यों से परिपूर्ण विश्व का अवभासन ही, ईश्वर की 'निर्माणशक्ति' अथवा 'क्रियाशक्ति' है। यह ^३निर्माण भगवान् की स्वतन्त्र इच्छा से ही यथावत् रूप में निष्पन्न हो जाता है और इसमें उसको किसी भी प्रकार के उपादान-सम्भार की अपेक्षा नहीं रहती है। वह ऐसी क्रिया का स्वयं ही स्वतन्त्र कर्ता है, क्योंकि वह ऐसे निर्माण को स्वयं जानता भी है। उसका ज्ञाता के रूप में स्फुरित होना ही स्वतः ^४क्रिया भी है। शिववर्तिनी क्रियाशक्ति का कोई क्रम नहीं है क्योंकि इस अवस्था पर इसका वास्त- विक रूप-'मैं ^५स्फुरित हो जाऊँ; मैं घूर्णित हो जाऊँ', इस प्रकार के देश-कालक्रम से हीन 'अहंरूप इच्छास्पन्द' के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। १. किन्तु निर्माणशक्तिः साप्येवं विदुष ईशितुः । तथा विज्ञातृविज्ञेयभेदो यदवभास्यते ॥ (ई० प्र०, २.१.८) २. स्वरूपभेदेन देशक्रमकारिणा क्रियाभेदेन च कालक्रमसंपादकेन उपलक्षितो यो विज्ञातुः शून्यादेः प्रमातुः भेदोऽन्योन्यं ज्ञेयाच्च, एवं घटादेः परस्परं ज्ञातुश्च स भगवता अवभास्यते, यत् तदवभासनं सा ईशितुरपि निर्माणशक्तिः क्रियाशक्तिः । (ई० प्र० वि०, २.१.८) ३. इच्छयैव भुवनानि भावयन् यः प्रियोपकरणग्रहोऽपि सन् । अप्रियोपकरणग्रहोऽभवत्तं स्वशक्तिसचिवं शिवं स्तुमः ।। (स्तु० कु०, १.१५) ४. यतश्च तन्निर्मितं ज्ञातृज्ञेयक्रियावैचित्र्यभेदम् असौ विद्वान् वेत्ति अविरतं तत्रैव हि तत् स्फुरति ततोऽपि तस्य सा क्रियाशक्तिः । (ई० प्र० वि०, २.१.८) ५. ईश्वरस्यापि 'ईशे, भासे, स्फुरामि, घूर्णे, प्रत्यवमृशामि', इत्येवंरूपं यदिच्छात्मकं विमर्शनम् 'अहम्' इत्येतावन्मात्रतत्त्वं, न तत्र कश्चित् क्रमः । (तत्रैव) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

१५६ स्पन्दकारिका "चिन्मात्र भगवान् की स्वतन्त्र इच्छात्मक स्फुरणा ही सारे विश्व की स्फुरणा है; स्वरूप की विमर्शना अर्थात् निजरूप की आनन्दमयता का आस्वाद लेना ही विश्व का आम- र्शन है और अपने चिदानन्दरस की पूर्णता के कारण हिलकोरें लेना ही सारे भावमण्डल का उल्लसित होना है'। अभी ऊपर कहा गया कि शिववर्तिनी क्रियाशक्ति का स्वरूप विमर्शात्मक स्पन्दना है। इस विषय में यह समझना आवश्यक है कि विमर्श के साथ अभिलापात्मकता का साहचर्य एक शाश्वत यथार्थ है। फलतः पारमेश्वर विमर्श के साथ भी अभिलापात्मकता अवश्य है परन्तु उस भूमिका पर वह भी तद्रूप ही है। भाव यह कि उस पदवी पर 'अ' से 'क्ष' तक के ध्वनि- समुदाय का रूप भी 'अहंविमर्श' ही है, जिसको शास्त्रीय शब्दों में 'अव्यक्त-परावाणी' कहते हैं। बाह्यप्रसार की प्रक्रिया में यह उपर्युक्त शिववर्तिनी और क्रमहीन क्रियाशक्ति ही पशुवर्तिनी स्थूल एवं सक्रम क्रिया का रूप धारण कर लेती है। पारमेश्वरी २क्रियाशक्ति स्वतन्त्र चेतनाशक्ति है, अतः अपने सामर्थ्य से अपने को ही, पशुभूमिका पर सक्रम स्थूल क्रिया के रूप में विकसित कर लेती है और अपने अक्रमस्वरूप पर सक्रम क्रियात्मक उपराग भी धारण करती है। स्वतन्त्र इच्छा तो स्वतन्त्र इच्छा है; जो कुछ भी करना चाहे कर लेती है। वास्तव में पशुभूमिका पर भी प्रत्येक क्रिया का मूलरूप इच्छात्मक-स्पन्दना ही है, परन्तु यह स्पन्दना मानसिक संकल्प-विकल्प के रूप में होती है। यदि ३सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाये तो संसार के किसी भी प्राणी के हृदय में जो आन्तरिक इच्छा होती है वही बाह्य रूप में उसकी क्रिया होती है। जबतक यह मानसिक संवेदन के रूप में अवस्थित रहती है तबतक इसमें कोई क्रम नहीं होता है, क्योंकि वहां तक कहीं विच्छेद नहीं पड़ता है। ज्यों ही यह ४इच्छात्मक स्पन्दना, पाञ्चभौतिक काया के द्वारा, बाह्य स्थूल-क्रिया के रूप में उदित होती है त्यों ही इस पर कालक्रम और तद्द्वारा देशक्रम का रंग चढ़ता है और परिणामतः अक्रम क्रियाशक्ति ही सक्रम स्थूलक्रिया बनती है। उदाहरणार्थ नाना प्रकार की पकाने, लिखने या पढ़ने इत्यादि क्रियाओं की मूलरूप इच्छात्मक-स्पन्दना में कोई तद्रूप क्रम नहीं होता है, परन्तु १. स्फारयत्यखिलमात्मना स्फुरन्विश्वमामृशसि रूपमामृशन् । यत्स्वयं निजरसेन घूर्णसे तत्समुल्लसति भावमण्डलम् ॥ (शिवस्तो०; १३.१५) २. अस्य क्रियाशक्तिः 'क्रमरूपक्रियानिर्माणसामर्थ्यं, क्रमरूपक्रियोपरागयोगश्च' इति । (ई० प्र० वि०, २.१ ८) ३. चैत्रमैत्रादेरपि पचामि इति यैव अन्तरिच्छा सैव क्रिया, तथा च अधिश्रयणादिबहुतर- स्पन्दनसम्बन्धेऽपि पचामि इति नास्य विच्छिद्यते । यत्तु इच्छारूपं तदेव तथास्पन्दात्म- तया भाति । तत्र तु न कोऽपि क्रमः तत्त्वतः । (तत्रैव) ४. इच्छारूपं 'पचामि' इति स्पन्दनात्मतां कार्यपर्यन्तां गतं क्रमारूषितम् आभाति । (ई० प्र० वि०, २.१.८)

सूत्र के अन्तिम चरण में इस तथ्य की ओर संकेत किया गया है कि यदि किसी

पुर्यष्टक १५७ ज्यों ही वह कायिक व्यवहार में पर्यवसित हो जाती है त्यों ही उस पर 'मैं पकाता हूँ, मैं कल लिखता था; मैं अगले वर्ष शैवदर्शन पढूँगा' इत्यादि रूपों में देहाभिमान और तदनुकूल संकुचित कालक्रम और देशक्रम का उपराग चढ़ जाता है। स्थूल क्रिया की अभिलापात्म- मकता भी स्थूल ही होती है। यह १अभिलापात्मकता वही पूर्वोक्त अहंविमर्शमयी परावाणी ही पश्यन्ती और मध्यमा के मार्ग से वैखरी पदवी पर उतर कर 'अ' से 'क्ष' तक के स्थूल-वर्णसमुदाय (मातृका) के रूप में विकसित हुई होती है। फलतः ऐसी स्थूल-अभिलापमयी और सक्रम पशुवर्तिनी क्रिया संसार के पशुवर्ग को पग-पग पर तथाकथित शुभ एवं अशुभ कर्मों की ग्राह्यता और हेयता की शङ्काओं के पाशों से जन्मजन्मान्तरों तक जकड़ कर रख देती है। स्थूल अभिलाप अथवा पारिभाषिक शब्दों में 'ककार' आदि स्थूल वर्णसमुदाय में अधिष्ठित ब्राह्मी इत्यादि पशुशक्तियों के द्वारा बुद्धि भेद में डाला गया पशु, प्रतिसमय की जाने वाली स्थूलक्रियाओं के वास्तविक रूप को भूल कर, उनको केवल अपने देह, प्राण आदि के अभिमान के साथ जोड़कर ही करता रहता है। सूत्र के अन्तिम चरण में इस तथ्य की ओर संकेत किया गया है कि यदि किसी अलक्ष्य अनुग्रह से पशु में यह सद्ज्ञान उदित हो जाये कि वास्तव में सारी क्रियायें शिववर्तिनी क्रियाशक्ति का बहिर्मुखीन विकासमात्र हैं और 'मैं' अर्थात् 'मेरा शरीर, मेरी बुद्धि' इत्यादि इनके कर्ता नहीं हैं। तो उसके ये स्थूल क्रियात्मक पाश स्वयं ही छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। यथार्थरूप में ऐसी अनुभूति प्राप्त कर लेने पर, वह जो कुछ भी करे, उसमें उसे शिवत्व की ही उपलब्धि होती रहती है ॥४६-४८॥ [ पुर्यष्टक ] पूर्वसूत्र में यह कहा गया है कि आत्मा को अपनी ही शक्ति, अज्ञात होने की अवस्था में बन्धन में डाल देती है। इस सम्बन्ध में अब अगले दो सूत्रों में यह समझाया जा रहा है कि वह बन्धन कैसा होता है और उससे आत्मा कैसी दुर्गति में पड़ जाती है:— २तन्मात्रोदयरूपेण मनोऽहंबुद्धिवर्तिना । पुर्यष्टकेन संरुद्धस्तदुत्थं प्रत्ययोद्भवम् ॥४९॥ तन्मात्रोदयः, तन्मात्राणां शब्दादीनाम् अनुभवरूपेण, मनोऽहंकारबुद्धिभिः इति त्रिभिः परामृश्यमानेन पुर्यष्टकेन बद्धः, तदुत्थं तस्मादुद्भूतं सुखदुःखसंवेदनरूप तदा ॥४९॥ १. इस विषय में द्रष्टव्य शिवसूत्रविमर्शिनी का १-४ २. 'यहाँ पर पहले 'तन्मात्ररूप' ऐसा शब्दखण्ड लेकर उससे सूक्ष्मपुर्यष्टक (कारण शरीर) और फिर 'तन्मात्रोदयरूप' ऐसा शब्दखण्ड लेकर उससे स्थूल-पुर्यष्टक (पाञ्चभौतिक स्थूल शरीर) का अभिप्राय समझना चाहिये।

सूत्र—(पशुभाव में पड़ा हुआ शिव) तन्मात्रों के रूपवाले सूक्ष्म और उनके कार्यरूप-

१५८ स्पन्दकारिका भुङ्क्ते परवशो भोगं तद्भावात् संसरत्यतः । संसृतिप्रलयस्यास्य कारणं संप्रचक्ष्महे ॥५०॥ भुङ्क्ते अश्नाति, अस्वतन्त्रो भोगं सुखदुःखसंवेदनरूपं, तस्य पुर्यष्टकस्य भावात् संसरति संसारशरीरे, अतः संसृति-प्रलयस्य जन्ममरणप्रवाहरूपस्य संसारस्य विनाश- कारणं संप्रचक्ष्महे वक्ष्यामः ॥५०॥ अनुवाद सूत्र—(पशुभाव में पड़ा हुआ शिव) तन्मात्रों के रूपवाले सूक्ष्म और उनके कार्यरूप- स्थूल, तथा मनस्, अहंकार और बुद्धि इनके द्वारा परामर्श किये जाने वाले, पुर्यष्टक के बन्धन में पड़ा है। पुर्यष्टक से ही 'प्रत्ययोद्भव' को जन्म मिलता है। फलतः ॥४९॥ (वह) परवश बनकर सांसारिक भोगों को भोगता है। पुर्यष्टक की विद्यमानता से ही बार बार जन्मता और मरता है। इसलिये संसृति के बखेड़े को एक बार ही मिटा देने वाले कारण (उपाय) का वर्णन (अगले सूत्र में) करेंगे ॥५०॥ वृत्ति—'तन्मात्रोदयः' इस शब्द के दो खण्ड हैं—'(१) तन्मात्र और तन्मात्रोदय (क्रमशः सूक्ष्मपुर्यष्टक और स्थूल-पुर्यष्टक)। इसका अभिप्राय यह कि (पशुभाव में पड़ा हुआ शिव) शब्द आदि तन्मात्रों की अनुभूति के ही रूपवाले और मनस्, अहंकार और बुद्धि इन तीनों के द्वारा परामर्श किये जाने वाले, पुर्यष्टक के बन्धन-में पड़ा है। पुर्यष्टक से ही सुखात्मक या दुःखात्मक संवेदना को जन्म मिलता है। फलतः—॥४९॥ (वह) अस्वतन्त्र बनकर, सुख और दुःख की संवेदना के रूपवाले भोगों को भोगता है। उस (पुर्यष्टक की विद्यमानता से संसार-शरीर में (पाञ्चभौतिक काया में) संसरण करता है। अतः संसृति के नाश का अर्थात् जन्म-मरण के प्रवाहरूप संसार का नाश करने वाले कारण का वर्णन (अगले सूत्र में) करेंगे ॥५०॥ विवरण प्रस्तुत सूत्र में उल्लिखित तन्मात्र, पुर्यष्टक इत्यादि शास्त्रीय शब्दों का आंशिक पर्यालोचन भी कुछेक स्थानों पर किया गया है। कुछ बातें रह गई हैं। अतः यहाँ पर इन बातों का संक्षिप्त परन्तु यथासम्भव सर्वाङ्गीण विवेचन प्रस्तुत करना आवश्यक है क्योंकि तभी सूत्र का अभिप्राय समझने में सुगमता होगी। संसार में प्रत्येक प्राणी की काया के दो रूप होते हैं-(१) सूक्ष्म शरीर और (२) स्थूल शरीर। इनमें से सूक्ष्म शरीर, स्थूल शरीर का कारणरूप और स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर का कार्यरूप होता है। सूक्ष्म-शरीर त्रिगुणमय मनस्, बुद्धि और अहंकार इन तीन अन्तःकरणों और इनके द्वारा १संवेद्य शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन पाँच सूक्ष्म तन्मात्रों के योग १. एषां ग्राह्यो विषयः सूक्ष्मः प्रविभागवर्जितो यः स्यात् । तन्मात्रपञ्चकं तत् शब्दः स्पर्शो महो रसो गन्धः । (द्र० सा०, २१)

CC-0.In Public Domain Digitization by eGangotri पुर्यष्टक १५९ से बना होता है । तन्मात्र अवस्था, शब्द आदि पाँच ज्ञेय विषयों की मूलभूत सामान्य अवस्था को कहते हैं । इस अवस्था में उनमें किसी प्रकार की १विशेषता उत्पन्न नहीं हुई है । उदाहर- णार्थ २'गन्धतन्मात्र' गन्ध की उस सामान्य-अवस्था को कहते हैं जिसमें अभी सुगन्ध, दुर्गन्ध, तीव्रगन्ध, मन्दगन्ध, तेल का गन्ध, इत्र का गन्ध, सड़ी लाश का गन्ध इत्यादि विशेषतायें प्रकट न हुई हों, अपितु सामान्य रूप में मात्र गन्धत्व की वर्तमानता हो । 'रस' इत्यादि के विषय में भी यही सिद्धान्त है । तन्मात्ररूप में वर्तमान शब्द आदि विषयों का बाह्य स्थूल इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता है जब कि विशिष्टरूप में विकसित होने पर; बाह्य इन्द्रियों के द्वारा, इनका ग्रहण सहजरूपों में किया जा सकता है । ऐसे ही बने तन्मात्ररूप शब्द आदि पाँच ज्ञेय-विषयों और मनस् इत्यादि तीन अन्तःकरणों से बने हुये, सूक्ष्म शरीर को पारिभा- षिक शब्दों में 'सूक्ष्म-पुर्यष्टक' कहते हैं । दूसरे शब्दों में इसको 'वासना-पिण्ड' भी कहते हैं । स्थूल-शरीर भी त्रिगुणमय मनस्, बुद्धि, अहंकार इन तीन अन्तःकरणों और इनके संवेद्यविषय तन्मात्रों के ही कार्यरूप आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी इन पाँच स्थूल- महाभूतों के मिश्रण से बना हुआ होता है । सूक्ष्म तन्मात्र ही जब अपनी सामान्य-अवस्था को छोड़ कर विशिष्ट-अवस्था में अभिव्यक्त होते हैं तब स्थूल, शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध कहलाते हैं और इन्हीं के कार्य स्थूल पञ्चमहाभूत होते हैं । फलतः स्थूलभूतों की मूलावस्था भी तन्मात्र ही होते हैं । ३स्थूलभूतों का रूप धारण करते समय, ये तन्मात्र आपस में एक निश्चित क्रम के अनुसार मिल जाते हैं । वह क्रम इस प्रकार है— सामान्य रूप विशेषरूप १. शब्द-तन्मात्र शब्द गुण वाला स्थूल आकाश । २. शब्द-स्पर्श तन्मात्र स्पर्श गुण वाला स्थूल वायु । ३. शब्द-स्पर्श-रूप तन्मात्र रूप गुण वाला स्थूल तेज । ४. शब्द-स्पर्श-रूप-रस तन्मात्र रस गुण वाला स्थूल जल । ५. शब्द-स्पर्श-रूप-रस गन्ध तन्मात्र गन्ध गुण वाली स्थूल पृथिवी । स्थूलशरीर में इन पाँच महाभूतों की अवस्थिति निम्नलिखित प्रकार से मानी जाती है— १. नाड़ियों इत्यादि के पोले भाग जिनके मध्य में शून्य अवकाश होता है; आकाश के रूप में 'शब्द-तन्मात्र' की अभिव्यक्ति है । २. पाँच स्थूल प्राण, वायु के रूप में 'स्पर्श-तन्मात्र' की अभिव्यक्ति है । १. अनुद्भिन्नविशेषतया स गन्धादिरेव केवलस्तन्मात्र इत्युक्तम् । (तं० वि०, ९.२८१) २. पृथिव्यां सौरभान्यादिविचित्रे गन्धमण्डले । यत्सामान्यं हि गन्धत्वं गन्धतन्मात्रनाम तत् ॥ (तं०, ९. २८०-८१) ३. एतत्संसर्गवशात् स्थूलो विषयस्तु भूतपञ्चकताम् । अभ्येति नभः पवनस्तेजः सलिलं च पृथिवी च ॥ (प० सा०, २२) द्रष्टव्य इसी कारिका की विवृति भी । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

१६० स्पन्दकारिका CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri ३. गर्मी चमक और आकार इत्यादि, तेज के रूप में 'रूप-तन्मात्र' की अभिव्यक्ति है। ४. खून पसीना इत्यादि तरल पदार्थ, जल रूप में 'रस-तन्मात्र' की अभिव्यक्ति है। ५. शरीर में पाये जाने वाले विभिन्न गन्धों के अतिरिक्त कठिन हड्डियाँ; मांस के लोथड़े इत्यादि, पृथिवी के रूप में 'गन्ध-तन्मात्र' की अभिव्यक्ति है। अब यह बात स्पष्ट हो गई कि पाञ्चभौतिक काया भी पुर्यष्टक ही है क्योंकि इसके आधार भी वही पाँच तन्मात्र ओर तीन अन्तःकरण हैं। हां सूक्ष्म-तन्मात्रों का स्थूल कार्यरूप होने के कारण इसकी (काया की) स्थूल-पुर्यष्टक की संज्ञा दी गई है। इन्हीं दो प्रकार के शरीरों को दूसरे शब्दों में क्रमशः भावात्मक और भूतात्मक शरीर कहते हैं। इनके विषय में पहले ही उल्लेख हो चुका है। स्थूल-पुर्यष्टक अल्पकालावस्थायी है अतः प्रत्येक मरण के समय सूक्ष्मशरीर इसको छोड़कर दूसरे भूतशरीर को धारण कर लेता है। सूक्ष्मशरीर तब तक आत्मा का पिंड नहीं छोड़ता है जब तक उसको स्वरूप-ज्ञान प्राप्त न हो। संक्षेप में इतना कहना पर्याप्त है कि सूक्ष्म शरीर आठ प्रकार की शलाकाओं से निर्मित एक पिंजरा है जिसमें आत्मा नामक विहङ्गम महती रुचि से बैठा रहता है क्योंकि स्वनिर्मित विषयोपभोग की द्राक्षा का आस्वादन, उसमें मुक्ताकाश की स्वच्छन्दमयी भूमिका की विस्मृति उत्पन्न करा देता है। साथ ही यह शरीररूपी पिंजरा केवल पिंजरा ही नहीं अपितु आत्मा को एक स्थूल-शरीर से दूसरे में पहुँचाने वाला वाहन भी है। उपर्युक्त तथ्यों की पृष्ठभूमि पर, सूत्रकार का यह कथन ठीक ही है कि वास्तव में पुर्यष्टक ही आत्मा का बन्धन है और यही उसको स्वरूप-लाभ होने तक शतशः दुर्गंतियों में डाल देता है ॥४९-५०॥ [ चक्रेश्वरता की उपलब्धि ] अब अगले सूत्र में संसृति के टंटे को सदा-सर्वदा के लिये समाप्त कर देने वाले कारण का वर्णन किया जा रहा है :- यदा त्वेकत्र संरूढस्तदा तस्य लयोदयौ । नियच्छन् भोक्तृतामेति ततश्चक्रेश्वरो भवेत् ॥५१॥ यदा पुनस्त्वेकत्र स्थूले सूक्ष्मे वा संरूढो लीनचित्तः, तदा तस्य प्रत्ययोद्भवस्य लयोद्भवौ ध्वंसप्रादुर्भावौ नियच्छन् कुर्वन् भोक्तृतां प्राप्नोति। ततः चक्रेश्वरो भवेत् सर्वाधिपतिर्भवति ॥५१॥ अनुवाद सूत्र—जब (साधक) इन से (स्थूल या सूक्ष्म पुर्यष्टकों में से) किसी एक में व्यवस्थित होता हुआ ही चित्त को लीन करके, अन्तःबहि एकाकार स्पन्दतत्त्व की अनुभूति प्राप्त कर लेता है तब स्वतन्त्रतापूर्वक, उसके (प्रत्ययोद्भव के), सृष्टि और संहार को सम्पन्न करता हुआ,

चक्रेश्वरता की उपलब्धि १६१ (अपनी खोई हुई) भोक्तृभाव की पदवी पर पहुँच जाता है। अन्तर शक्तिचक्र का ईश्वर (पूर्ण- शिव) बन जाता है ॥५१॥ वृत्ति—जब स्थूल या सूक्ष्म पुर्यष्टकों में से किसी एक में भी अवस्थित होता हुआ ही, अपने चित्त को स्पन्दतत्त्व में लीन कर लेता है तब उस प्रत्ययोद्भव के संहार और सृष्टि को स्वतन्त्रतापूर्वक सम्पन्न करता हुआ, (खोये हुये) भोक्तृभाव को प्राप्त कर लेता है। अनन्तर चक्रेश्वर बन जाता है अर्थात् सारे शक्तिचक्र का अधिपति (संयोजन और वियोजन का स्वतन्त्र कर्ता पूर्ण-शिव) बन जाता है ॥५१॥ विवरण प्रस्तुत सूत्र जहाँ एक ओर इस सारे स्पन्दशास्त्र का उपसंहार-सूत्र है वहाँ दूसरी ओर इसका संग्रह-सूत्र भी है। सूत्र के साथ साथ इस सारे स्पन्द-प्रकरण का आद्योपान्त मनन एवं अनुसंधानात्मक पर्यालोचन करने पर भी पाठक सहज ही में निम्नलिखित निष्कर्ष पर पहुँच सकता है। १विश्वोत्तीर्ण और विश्वात्मक रूप में केवल एक ही सर्वस्वतन्त्र चेतनसत्ता विद्यमान है। वह सत्ता प्रकाशरूप शिव और उसकी अभिन्न विमर्शशक्ति की समरस-अवस्था है। शक्ति ही शिव है और शिव ही शक्ति है। अहंविमर्शमय स्पन्द ही शक्ति का स्वरूप है। यह सारा नाम- रूपात्मक व्यक्त विश्व शिव की बहिर्मुखीन शाक्त-स्पन्दना के अतिरिक्त और कुछ नहीं है यद्यपि अभेद भूमिका पर पूर्णाहन्तारूप स्पन्दशक्ति एक ही है तथापि वह बहिर्मुखीन भेद भूमिका के अवभासन करने का शाश्वत स्वभाव होने के कारण, स्वतन्त्रता से, सामान्यभूमिका से विशेष- भूमिका पर उतर कर, अनन्त भावात्मक और भूतात्मक रूपों में स्पन्दायमान है। इसके ये अनन्त विशेष-स्पन्द ही विश्व के अनन्त चेतन और जड़ भाव हैं। इन्हीं अनन्त शाक्त-स्पन्दों को शास्त्रीय शब्दों में 'शक्तिचक्र' कहते हैं। शिव अपनी इच्छात्मक विमर्शना से ही प्रतिसमय इस शक्तिचक्र के २संयोजन और वियोजन (निमेषोन्मेष) के रूप में, सारे भाववर्ग के, सृष्टि स्थिति, संहार, पिधान एवं अनुग्रह, इन पाँच कृत्यों को युगपत् और स्वतन्त्रता से करता रहता है। फलतः वह इस सम्पूर्ण शक्ति-चक्र का स्वतन्त्र अधिपति होने के कारण '३चक्रेश्वर' है। ४शिव और पशु में कोई मौलिक स्वरूपगत भेद नहीं है। शिव अपनी शक्ति के द्वारा उद्भासित पुर्यष्टक में अपने ही आप को बन्दी बनाकर पशु बना है। इस अवस्था में पड़कर वह स्वरूप को पूर्णतया भूल जाने के कारण अविवेकी, असहाय और परवश बना है। उसको

१ ग्रन्थ के प्रारम्भिक सूत्र, विशेषकर पहला सूत्र। २. द्रष्टव्य तन्त्रालोक नवम आह्निक और ईश्वरप्रत्यभिज्ञा के ज्ञानाधिकार में आभासवाद। ३. द्रष्टव्य तंत्रलोक का चौथा आह्निक। ४. ग्रन्थ के मध्यवर्ती सूत्र, विशेषकर निम्नलिखित सूत्र—'निजाशुद्ध्यासामर्थ्यस्य', गुणादिस्पन्द- निष्यन्दाः', 'अप्रबुद्धधियः', 'शब्दराशिसमुत्थस्य', 'सम्ग्रामेऽपि प्रवृत्तस्य'।

१६२ स्पन्दकारिका पुर्यष्टक का भूत इस प्रकार से चिमट गया है कि वह आविष्ट जैसा बन कर, इसी को वास्त- विक स्वरूप समझता हुआ, सांसारिक विषयोपभोग के मधुमिश्रित हलाहल को मजा ले लेकर पी रहा है और इसके जन्ममरणरूप कटु परिणाम को परवश बनकर भोग रहा है । ऊपर से ब्राह्मी इत्यादि पशुशक्तियों का वर्ग इसको, स्थूल एवं सूक्ष्म अभिलाषात्मक विकल्प परम्पराओं में पग-पग पर उलझा कर, स्वरूप-चिन्तन से दूर रखने पर तुला हुआ है । संक्षेप में तात्पर्य यह है कि इसने अपने भोक्तृभाव के चिन्तामणि को भोग्यभाव की कौड़ियों के दाम बेच डाला है । कितना दुःख, कितना अज्ञान और कितनी विडम्बना है ? १पशुशक्तियों से अधिष्ठित पुर्यष्टक (वासनापिंड) से पिंड छुड़ाकर अपनी इच्छा से ही खोई हुई चक्रेश्वरता को प्राप्त कर लेना ही मानवजन्म का मुख्य उद्देश्य है । इस प्रकार की अर्थसिद्धि संसार के आघात-प्रतिघातों से भागकर, दिन रात केवल पुर्यष्टक का दुःखड़ा रोते रहने से ही सम्भव नहीं हो सकती है, अपितु जीवनक्षेत्र में सारे व्यवहार करते करते और पुर्यष्टक में रहते रहते ही लगातार अहंविमर्शात्मक अनुसन्धान के द्वारा, संसार, पुर्यष्टक, मल, अज्ञान, बन्धन, संकोच इत्यादि सारे जड़-चेतन भावों में, केवल और केवल, शाश्वत, स्पन्दमयी स्वरूपसत्ता की व्यापकता की यथार्थ अनुभूति प्राप्त करने से ही सम्भव हो सकती है । निर्मल एवं चिद्रूप विश्वात्मभाव प्राप्त कर लेने पर कोई भी तथाकथित बन्धन, २बन्धन नहीं रहता है । इस भाव को प्राप्त करने के लिए संकल्प-विकल्पात्मक चित्त को 'चित्-शक्ति' में ही विलीन करना आवश्यक है । निरन्तर तीव्र-अनुसन्धान के द्वारा स्वरूप-अनुभूति को प्राप्त करनेवाले सुप्रबुद्ध योगी, अपनी स्वतन्त्र इच्छा के अनुसार कितने ही पुर्यष्टकों, प्रत्ययोद्भवो या दूसरे द्वन्द्वात्मक भावों के सृष्टि-संहार की क्रीडा स्वयं सम्पन्न करने की क्षमता प्राप्त कर लेते हैं अतः वे इनके भोग्य न बन भोक्ता बन जाते हैं । भोक्तृभाव की स्थिर उपलब्धि ही 'चक्रेश्वरता' की उपलब्धि है । यही शिवत्व की प्राप्ति है । यही जन्म-मरणरूप संसृति का अंत है ॥५१॥ शैवशास्त्रों में गुरुशक्ति का महत्व मुक्तकंठ से स्वीकारा गया है । स्वरूप-अनुभूति के विषय में बड़ी पोथियां पढ़ने अथवा लम्बे व्याख्यान सुनने पर भी, मानव-पशु के संशय- ग्रस्त मन को तब तक संतोष प्राप्त नहीं हो सकता है जब तक अनुग्रहमूर्ति गुरुरूप में अवतीर्ण होकर, स्वयं, उसके अन्धकारावृत हृदय को लोकोत्तर प्रकाश-पुञ्ज से प्रकाशित न करे । अतः उस महामहिमामयी गुरुशक्ति के सामने नतमस्तक होना आवश्यक है :- १. प्रस्तुत सूत्र में वर्णित उद्देश्य । २. यो निश्चयः पशुजनस्य जडोऽस्मि कर्म संपाशितोऽस्मि मलिनोऽस्मि परेरितोऽस्मि । इत्येतदन्यदृढ़निश्चयलाभसिद्धा सद्यः पतिर्भवति विश्ववपुश्चिदात्मा ॥ (तं० सा०, ४ आह्निक )