भारतकोश
संग्रह पर लौटें

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

४१४ स्पन्दकारिका समुत्तरण = सम्यक् विलंघन (रामकण्ठ) कारिकाकार का कथन है कि मैं आश्चर्यान्वित करने वाले शब्दों एवं अर्थों से संवलित एवं अतिशय अद्भुत (सरस्वती के समान अनन्त ज्ञान, अनन्त योगसिद्धि, अनन्त शक्ति पावित्र्य तथा अमोघ फल प्रदा) गुरु-वाणी की वन्दना करता हूँ जो कि अत्यन्त गंभीर तथा अमित संशय-सागर को पार कराने वाली है । वृत्तिकार भट्टकल्लट ने इस कारिका की सविस्तार व्याख्या तो नहीं की है किन्तु 'अगाध' शब्द को रेखांकित अवश्य किया है । 'अगाध' शब्द सामान्यतया अथाह, अपार एवं अपरिमेय का बोधक है । वृत्तिकार ने इसका अर्थ—'अप्रतिष्ठ' एवं 'अनन्त' किया है—'अगाधो ह्यप्रतिष्ठोऽनन्तः' ।१ भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में 'संशय' को विनाश का कारण माना है—'संशयात्मा विनश्यति' (गीता) । अगाध = (१) 'न अस्ति गाधो विश्रान्ति भूमिका यस्य ।' (जिसका अपना कोई अधिष्ठान नहीं है ।) (२) 'न अस्ति गाधो विश्रान्ति भूमिका यस्मिन् ।' (जिसमें विश्राम लेने के लिए कोई पुलिन नहीं है ।) (क) अप्रतिष्ठ = जिसका कोई अधिष्ठान या वास्तविक आधार नहीं है । (ख) अनन्त = जो अन्तहीन है । 'दुष्पार' 'दुरतिक्रम' । अप्रतिष्ठ = निराधार, आधार-शून्य, अयथार्थ । अज्ञान-कल्पित होने के कारण संशय निराधार है । वृत्तिकार का अभिप्राय—वृत्तिकार यह संदेश देना चाहते हैं कि— (१) जीवों के डूबने का कारण 'संशय' है । (२) यह संशय दुस्तर समुद्र के समान है । (३) स्वरूप-साधना (स्वस्वरूप-प्रत्यभिज्ञा) यथार्थ का दर्शन कराकर समस्त संशयों का उच्छेद कर देती हैं अतः संशय समुद्रवत् दुस्तार दिखाई पड़ते रहने पर भी गुरु भारती के द्वारा प्रकाशित आत्मस्वरूप का साक्षात्कार होने के कारण दुस्तार समुद्र सूखकर इतना निर्विघ्न बन जाता है कि मानों वह पूर्णतया 'अप्रतिष्ठ' (आधारहीन) हो और केवल मन की भ्रान्ति मात्र हो, न कि वास्तविक ॥ यही वास्तविकता भी है क्योंकि जीवत्व (अणुत्व) सत्य नहीं है अपितु शिवत्व ही सत्य है—जीवत्व केवल एक 'संशय' है—कल्पना है—मायावरण है और वास्तविकता तो यह है कि—'सर्वशक्ति योगेऽपि आभिर्मुख्याभिः शक्तिभिरूपचर्यते, स च भगवान् स्वातन्त्र्यशक्तिमहिम्ना स्वात्मानं संकु- चितमिव आभासयन् 'अणुः' इति उच्यते । यथोक्तम्—'व्यापको हि शिवः स्वेच्छाक्लृप्त- संकोचमुद्रणात् विचित्रफलकर्मौघवशात्तत्तच्छरीरभाक् ॥'२ स्वयं 'शिव' ही अपनी 'स्वातन्त्र्यशक्ति' के माध्यम से अपनी माया शक्ति के द्वारा अपने अमित स्वरूप को संकुचित करके अणु (अज्ञानोपहित जीव) बन जाता है । १. 'स्पन्दसर्वस्व' (भट्टकल्लट) । २. 'जन्ममरणविचार' ।

तृतीय: निष्यन्द: ४१५ वह एक आणव मल से उपहित होकर—'विज्ञानाकल' बन जाता है । वह दो आणव मलों से उपहित होकर—'प्रलयाकल' बन जाता है और वह तीन आणव मलों से उपहित होकर—'सकल' बन जाता है । 'असौ भगवान् स्वमायाशक्त्याख्येन अव्यभिचरितस्वातन्त्र्यशक्तिमहिम्ना स्वात्म- नैव आत्मानं संकुचितमिव अवभासयन् विज्ञानाकलः, प्रलयाकलः सकलश्च संपद्यते ॥' १ अतः जीवत्व भी एक भ्रान्तिमूलक उपाधि है । सत्य तो 'शिवत्व' है । जीवत्व शङ्कराचार्य की दृष्टि के समान मिथ्या भी नहीं है क्योंकि स्वयं शिव ही जीव है । होता यह है कि सृष्ट्युन्मुख भगवान् शुद्धाध्वा में वर्तमान होकर अपनी शक्तियों द्वारा माया को विक्षुब्ध करके— (क) 'कलातत्त्व' को किञ्चित्कर्तृत्व में परिवर्तित करके (ख) 'विद्या तत्त्व' को किञ्चिद् अवबोध में परिवर्तित करके (ग) 'राग तत्त्व' को किञ्चिद् अभिलाषा में परिवर्तित करके (घ) 'काल तत्त्व' को भूत, भविष्य, वर्तमान के खण्डित एवं संकुचित काल खण्डों में विभक्त करके स्थित कालावच्छेद में परिवर्तित कर देता है । (ङ) 'नियति तत्त्व' को कर्तृत्वावच्छेद में परिवर्तित कर देता है । 'कला तत्त्व' शिव के सर्वकर्तृत्व को किञ्चिद् कर्तृत्व में बदल देता है और सुख- दुःख एवं मोह के आवरण उत्पन्न कर देता है शिव का जीवत्व-ग्रहण केवल 'निजस्वरूप गोपनकेलि' मात्र है । २ अतः स्पष्ट है कि स्वरूप गोपन की क्रीड़ा के अभिनय के लिए संशय भूमिका पर स्वेच्छा से स्थित शिव के लिए यह पाशव भूमिका छोड़कर संशयों का उच्छेद करना तो अत्यन्त सरल है क्योंकि यह संशयावृत पशु भूमिका उसने अपनी स्वेच्छा से गृहीत किया है अतः यह सत्य नहीं है अपितु भट्टकल्लट के मतानुसार 'अप्रतिष्ठ' (आधार शून्य, निराधार एवं अयाथार्थ) है किन्तु पाशवभूमिका का त्याग न करने पर यह 'संशय' 'अनन्त' समुद्रवत् दुस्तर भी है तथापि 'गुरुभारती' की शक्ति से यह 'अगाध' (अनन्त समुद्र) तरना अत्यन्त सरल है । इसी दृष्टि से वृत्तिकार कहते हैं— 'अगाधो ह्यप्रतिष्ठोऽनन्तः ॥' कारिकाकार कहते हैं—'अगाध संशयांभोधिसमुत्तरणतारिणीम्' । वृत्तिकार का प्रधान संदेश—वृत्तिकार 'अगाधसंशयाम्भोधि' की व्याख्या के संदर्भ में 'अगाध' की व्याख्या में जो उसका अर्थ—'अप्रतिष्ठ' करते हैं उसके पीछे उनका शैव सम्प्रदाय के 'बन्धन' एवं 'मुक्ति' के स्वरूप पर प्रकाश डालना है जो कि निम्नानुसार है— शैवदर्शन में 'बन्धन' नामक कोई यथार्थवस्तु है ही नहीं— न मे बन्धो न मोक्षो में भीतस्यैता विभीषिकाः । प्रतिबिम्बमिदं बुद्धेर्जलेष्विव विवस्वतः ॥ ३ १-२. वामदेव भट्टाचार्य—'जन्ममरणविचारः' । ३. विज्ञानभैरव ।

४१६ स्पन्दकारिका कल्हण ने 'बन्धन को फूस का निर्मित मुझौसा जैसा मिथ्या कहा है— 'शालीनपलालपुरुषोऽवति यः कृशानुः । दग्धाननश्चटकपेटकभीतिदानैः ॥' जिस प्रकार किसान लोग अपनी फसल की रक्षा करने के लिए घास-फूस का एक आदमी बनाकर खड़ा कर देते हैं और उसे जानवर आदमी समझते हुए भयभीत होकर खेतों से भाग जाते हैं किन्तु हाथी उससे भयभीत होकर नहीं भागता क्योंकि पलाल पुरुष भला हाथियों का क्या बिगाड़ सकता है? इसी प्रकार पञ्चकञ्चुक, वासना, अनात्म पदार्थ, इन्द्रिय, उनके विषय, माया एवं अज्ञान एवं तज्जन्य बन्धन किसी अज्ञ प्राणी को तो भयभीत कर सकते हैं किन्तु किसी स्वरूपावस्थित योगी का क्या बिगाड़ सकते हैं? जैसे सूर्य ही जल के मध्य प्रतिबिम्ब के रूप में उल्टा भासित होता है उसी प्रकार परिमित विषय वाली बुद्धि ही 'मैं बद्ध हूँ, मैं मुक्त हूँ'—आदि आकारों में परिणत होती रहती है—इससे चिदात्मा का—मेरा क्या बनता-बिगड़ता है?— 'प्रतिबिम्बमिदं बुद्धेर्जलेष्विव विवस्वतः ।'¹ बन्धनोपहित चेतना 'जीव' कहलाती है तथा बन्धनमुक्त 'शिव' कहलाती है, पहला 'पशु' कहलाता है दूसरा 'पशुपति' (पति) कहलाता है। दोनों में मूलतः भेद नहीं है— स्वांगरुपेषु भावेषु प्रमाता कथ्यते 'पति' । मायातो भेदिषु क्लेश कर्मादि कलुषः 'पशुः' ॥² अर्थात् ऐश्वर्यदशायां प्रमाता विश्वं शरीरतया पश्यन् 'पतिः' पुंस्त्वभावस्थायां तु रागादिक्लेशकर्मविपाकाशयैः परीतः 'पशु' ।³ जो समस्त विश्व को अपने शरीर के रूप में देखकर उसे अपने से अभिन्न मानता है उसे 'पति' एवं जो उसे अपने से भिन्न मानकर माया द्वारा भेददृष्टि के कारण रागादिक्लेशों से कर्मविपाक के वात्याचक्र में फँस जाता है उसे 'पशु' कहा जाता है । शिवसूत्रकार की दृष्टि—शिवसूत्रकार का कथन है कि बन्धन कोई मौलिक एवं नित्य वस्तु नहीं है और न तो निरपेक्ष स्वतन्त्र सत्ता ही है प्रत्युत् यह एक स्वारोपित मिथ्या कल्पना है—अज्ञान है—मल है अज्ञता है—'ज्ञानं बन्धः' (१।२) वरदराज कहते हैं—अज्ञानमिति तत्राद्यं चैतन्यस्फाररूपिणि । आत्मन्यनात्मताज्ञानं ज्ञानं पुनरनात्मनि ॥ देहादावात्ममानित्वं द्वयमप्येतदाणवम् । मलं स्वकल्पितं स्वस्मिन्बन्धः स्वेच्छाविभाजतः ॥⁴ शङ्कराचार्य की बन्धन-दृष्टि एवं त्रिक-दृष्टि में भी भेद है । त्रिक दृष्टि में 'बन्धन' भी शिव की आत्मगोपन जन्य, स्वेच्छा-निष्पादित एवं रसात्मिकी क्रीड़ा है १. विज्ञानभैरव । २. प्रत्यभिज्ञाकारिका (उत्पलदेव) । ३. प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति । ४. शिवसूत्रवार्तिक ।

तृतीयः निष्यन्दः ४१७ क्योंकि एक ही चेतना शिव भी है और वही जीव भी है—वही बन्धन भी है और वही मुक्ति भी है तथा परमार्थतः न बन्धन है न तो मुक्ति है—'न मे बन्धो न मोक्षो मे' ॥१ ये मिथ्या भी नहीं है क्योंकि—'न सावस्था न यः शिवः ।' शिव एवं जीव की एकता का ज्ञान ही मुक्ति है और इसका अपरिज्ञान ही मुक्ति है—'शिवजीवयोरभेद एव उक्तः । एतत्तत्वपरिज्ञानमेव मुक्तिः एतत्तत्वापरिज्ञानमेव च बन्धः ॥ भला चैतन्य को बन्धन कैसा ? जड़ चेतनात्मक जगत् तो परमशिवरूप है फिर उसको बन्धन कैसा ? 'यदि जीवजडात्मनो विश्वस्य परमशिवरूपं चैतन्यमेव स्वभावः तत् कथम् अयं बन्धः ?' २ 'बन्धन' का स्वरूप—'बन्धन' का स्वरूप क्या है? आचार्य क्षेमराज कहते हैं—परमेश्वर अपनी 'स्वातन्त्र्य शक्ति' के द्वारा अपने सत्स्वरूप के गोपन को आभासित करते हैं (और यह कार्य वे 'महामाया' द्वारा सम्पन्न करते हैं ।) इसके परिणाम स्वरूप मायाप्रमाता पर्यन्त सभी सत्ताएँ सङ्कोचावभासित होने के कारण उनका शिवाभेद को भूलकर शिव से अपना भेद मानना 'अपूर्णम्मन्दतात्मक- आणवमलतत्त्वसंकुचितज्ञानात्मा' हो जाना ही 'बन्धन' है— (१) 'परमेश्वरेण स्वस्वातन्त्र्य-शक्त्याभासितस्वरूपगोपनारूपया महामाया शक्त्या .... माया प्रमात्रन्तं सङ्कोचोऽवभासितः स एव शिवाभेदाख्यात्मका ज्ञानस्वभावोऽपूर्णा- म्मन्यतात्मकाणवमलसतत्त्वसंकुचितज्ञानात्मा 'बन्धः' ।३ (२) आत्मा में अनात्मा एवं अनात्मा में आत्मा भ्रमात्मक अवबोध भी 'बन्धन' है— (३) एवमात्मनि अनात्मताभिमानरूपाख्यातिलक्षणाज्ञानात्मकं ज्ञानं केवलं बन्धो ।४ (४) 'यावद् अनात्मनि शरीरादौ आत्मताभिमानात्मकम् अज्ञानमूलं ज्ञानमपि बन्ध एव ॥'५ (५) सुख दुःख मोह आदि की अध्यवसाय वृत्ति से युक्त जो भेदावभासनात्मक ज्ञान है वही बन्धन है । 'सुखदुःखमोहमयाध्यवसायादिवृत्तिरूपं तदुचितभेदावभासनात्मकं यत् ज्ञानं तत् बन्धः' ।६ (६) अन्तः सुखादिं संवेद्य व्यवसायादिवृत्तिमत् । बहिस्तद्योग्यनीलादिदेहादिविषयोन्मुखम् ॥ भेदाभासात्मकं चास्य ज्ञानं बन्धोऽणुरूपिणः । तत्पाशितत्वादेवासावणुः संसरति ध्रुवम् ॥७ १. विज्ञानभैरव । २. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् । ३-७. क्षेमराज—शिवसूत्रविमर्शिनी । स्पं० २७

इस पृष्ठ पर कोई पाठ (text) उपलब्ध नहीं है। यह पुस्तक का रिक्त आवरण पृष्ठ (blank cover) है।