सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ
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| संस्थानानिर्देशमनुक्रमकोशः | १३ | ||||
|---|---|---|---|---|---|
| इच्छेद्विद्रिपुला मै | १५८।२२७ | इन्दु प्रयास्यति (शा प ८९७) | २२९।२३७ | इह पुरोऽनि (सा द १० ३९) | १८६।१३ |
| इच्छेद्वस्तु सुख | १५२।४१५ | इन्दुप्रभासरविदं (शा प १८१) | ३५।१२ | इह मधुपवधूना | ३३३।८६ |
| इतः पौरस्त्याया क | ३२४।३९ | इन्दुरिन्दुरिति कि दु | २९९।२४ | इह रूपमात्रसारे | २२३।५४ |
| इत शुक्ला चन्द्रद्यु | ३२४।३७ | इन्दुर्यत्र न नि (शा प ३७८०) | ३५३।८९ | इह लोकेऽपि (सु.३१६०) | ६५।३ |
| इत खपिति (भर्तृ स.२०) | २१६।२५ | इन्दुर्यद्युदयाद्रिमूर्ध्नि | २९१।४७ | इह वटवृक्षे यक्ष (शा प ३७७२) | ३५२।५ |
| इतरकर्मफलानि (भा ३ १२१) | ४०।४७ | इन्दुलिप्त इवा (बाल.रा १ ४२) | २७२।७७ | इह समदशुकु (महावीर ५ ४०) | १४०।४ |
| इतरदेव बहिर्मुख | ५९।२१८ | इन्दुस्स्रवयंशसा | १०७।१९१ | इह सरसि (शा प ८३६) | २२४।८९ |
| इतश्चेतश्चाद्रिविंध | १३२।१९ | इन्दोरस्य त्रियामा | ३०३।१३७ | इह सर्वखफालिन (मृच्छ ) | ३५५।३ |
| इतस्ततो वात (कुमार १४ ४६) | १२८।४७ | इन्दोरेककला (शा प ३६२७) | ३०३।१४२ | इह स्फुटं तिष्ठति (शा प ३५८०) | ३१०।२ |
| इतश्चसद्विद्भूतवै (नैषध १२ २६) | १३१।९ | इन्दोर्लक्ष्मा त्रिपुर (ब्रुव १३८) | १३५।३२ | इह हि नववसन्ते | ३३३।८६ |
| इतो न किंचित्प (शा प ४१२७) | ३६७।३१ | इन्द्र प्रक्षुण्णचित्तो | १२६।२६ | इहानेके सन्त | ५२।२४२ |
| इतो विद्युत्पुञ्ज (शा.प.३४५७) | २९२।२० | इन्द्रात्सामुच्चिशू (शा श.२.७) | ३७६।२६० | इहाविशद्येन (नैषध ७ ६०) | २६०।१२८ |
| इतो विद्युद्वल्लीवि (भर्तृ १ ४४) | २७६।३६ | इन्द्राद्यमुत्स्वं ज्वल | १४२।१४ | इहोद्याने सप्रत्यहह | २३६।१५ |
| इत्थ तलपतलाधि | ३१८।१९ | इन्द्राद्या लोकपाला | १८४।७७ | ई | |
| इद कृष्णं कृष्णं (अमरु ९४) | ३०९।७ | इन्द्रो यमोऽसि वरु | २८८।९२ | ईदृशस्य भवत (शिशु १० ७७) | ३१९।२० |
| इदं तत्स्नेहसर्वस्वं (मृच्छ १० ०३) | ८९।१ | इमे तारुण्यश्रीन (भर्तृ.१ ८५) | २५५।३० | ईर्ष्या घृणी (भा ५ १०५६) | १५९।२९५ |
| इदं तावच्चित्रं यदव | ३६३।१९ | इयं चन्द्रेणापि प्रकट | ९।१२४ | ईश करस्थीकृतकाञ्च | ९२।५१ |
| इदं दूर्वाकाण्डद्युति | ३०६।४३ | इयं तावल्लीला यदधि | २४।५३ | ईश्वरा पिशुना | १६८।६७५ |
| इदं नभसि (शा प.३६०५) | २९७।२७ | इयं पली भिल्लैर (शा प.शु ७) | २२७।१९२ | ईषत्कम्प | ३२०।४८ |
| इदं नृपप्रा (नैषध १२ ९०) | १०४।११७ | इयं प्रीतिर्वल्ली हृद | १७७।९८८ | ईषन्मीलित (गीत १२.२४.६) | ३१९।४१ |
| इद परमसुन्दर तनु | २५६।३७ | इयं बाला वल्ली मृदु | २३६।१७ | ईषल्लब्धप्रवेशोऽपि | ५५।६४ |
| इदं मघोन कुलिश(शा.प ४०६८) | ३६५।१ | इयं भुजंगिनीश्रिता | २७४।२३ | उ | |
| इद युगसहस्र(शा.प ४१३२) | ३७२।१५५ | इय मुखाम्भोरुहस | २५७।१३ | उग्रग्राहमुदन्वतो (सु २५५४) | १८४।६९ |
| इदं वक्त्रं साक्षाद्वि | २७१।४१ | इय यशांसि द्विषत | १३५।१४ | उग्ररूप कुचद्वन्द्व | ३१८।२ |
| इदं हि माहात्म्य | ४९।१८६ | इय व्याधायते बा(शृंगारति १३) | २५३।३ | उचितं गोपनमन | ३१३।२७ |
| इदमनुचितमक्रम (भर्तृ १ ०८) | ७०।५७ | इयं सुनय (का प्र १० ४६५) | २६२।१६८ | उचित नाम (शा प १०५७) | २४३।१८८ |
| इदमपटु कपाट(शा प ८७८) | २७७।१८९ | इय सुरतरङ्गिणी न | ३५४।८१ | उचितमनुचितं वा | १७६।९७३ |
| इदमयुक्कमहो म(शिशु ६.५६) | ३४६।१७ | इयं सुस्तनी मस्तकन्य | २७।३९ | उचित्य प्रथम(शा प ३८०१) | ३३४।१०७ |
| इदमशिशिरैर (अ शा ३ ३ १०) | २७९।७३ | इय सृष्टा चन्द्रत्क | २६८।३२३ | उच्चै स्थान (शा प ७६४) | २१०।३७ |
| इदमाभाति गग (सा द १० ९९) | २९९।८ | इयती जगती कियती | १२३।५ | उच्चै कल्याणवाही | ११३।२८९ |
| इदमिदमिति भू (शिशु ७ ५०) | २३४।११४ | इयल्पप्येतस्मिन्निर (भर्तृ स ४१२) | ७०।३८ | उच्चैरध्ययनं पुरातव (सु.२३७८) | ९६।४ |
| इदमीदृग्गुणोपेत (किरात ११ ४१) | ८५।६ | इयत्या सपत्तावति | २१।१७ | उच्चैरुच्चरतु चिर(शा प १११४) | २१८।७५ |
| इदमेव नरेन्द्राणा | १४६।१८० | इयत्यामपि सामग्र्या | ९।५७ | उच्चैरुत्ताल (शा प ६६) | १०१।५८ |
| इदानी तीव्राभि (शा.प ३४३६) | २८४।२५ | इयत्येतस्मिन्वा (भर्तृ सं ४१२) | २४८।९६ | उच्चैस्सतालगण्डस्थल | ३।३२ |
| इन्दीवर लोचनयो | २६०।७९ | इयमसी तरलायत (अमरु १२७) | २७३।८ | उच्चैरेश तरु. (भर्तृ स ४१७) | २४१।१४० |
| इन्दीवरवलय्यामर्मि | २२।९९ | इयमिय मयदीनवन | ३६२।२० | उच्चैर्ब्रह्माण्ड (शा प ५८) | २।२७ |
| इन्दीवराक्ष्या स्फुट | १९०।७२ | इयमुदरदरी दुरन्तपू(भर्तृ स ४१४) | ९६।६ | उच्चैस्तरादम्बरशैल | २९६।१ |
| इन्दीवरेण नयनं मु (शृंगार.२) | ३०६।२५ | इयमुन्नतसत्त्व (शा प.२२०) | ४९।१५७ | उच्छिष्टं शिवनिर्मा (शा.प ५१७) | १८४।४ |
| इन्दुं कैरविणीव (शा.प १५५७) | २९१।४ | इषुत्रयेणेव जग (नैषध ७ २७) | २५९।८० | उच्छ्वसन्मण्डल | २६५।२६६ |
| इन्दुं निन्दति च(शा प १२३८) | १३६।४० | इह किं कुरङ्गशाव (शा प ९३९) | २३२।९९ | उज्जृम्भते कुमुदिनी | ३०१।७१ |
| इन्दुं निन्दति (शा प १२३८) | १३६।४१ | इह जगति रतीशप्र | ३५६।२३ | उज्जृम्भानन (शा.प ३४१७) | २८६।२२ |
| इन्दु निन्दति | १७९।१०३६ | इह तुरगशतै प्रया(शा प १९८) | ३९।२३ | उज्झती शुच (किरात.९ १८) | ३००।३५ |
| इन्दुं निन्दतु नाम | २११।३९ | इह नगरे प्रतिरथ्य | ३५२।१३ | उज्झित्वा दिशमम्बरं | ७।८५ |
| इन्दु कि (का.प्र.१०.४१९) | ३१२।२२ | इह निचुलनिकु (शा.प ३९१८) | ३४५।५८ | उडुपगणपरिवारो नायको (सु ५७६) | ९६।४ |