सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
| संस्थानानिर्देशमनुक्रमकोशः | १३ | ||||
|---|---|---|---|---|---|
| इच्छेद्विद्रिपुला मै | १५८।२२७ | इन्दु प्रयास्यति (शा प ८९७) | २२९।२३७ | इह पुरोऽनि (सा द १० ३९) | १८६।१३ |
| इच्छेद्वस्तु सुख | १५२।४१५ | इन्दुप्रभासरविदं (शा प १८१) | ३५।१२ | इह मधुपवधूना | ३३३।८६ |
| इतः पौरस्त्याया क | ३२४।३९ | इन्दुरिन्दुरिति कि दु | २९९।२४ | इह रूपमात्रसारे | २२३।५४ |
| इत शुक्ला चन्द्रद्यु | ३२४।३७ | इन्दुर्यत्र न नि (शा प ३७८०) | ३५३।८९ | इह लोकेऽपि (सु.३१६०) | ६५।३ |
| इत खपिति (भर्तृ स.२०) | २१६।२५ | इन्दुर्यद्युदयाद्रिमूर्ध्नि | २९१।४७ | इह वटवृक्षे यक्ष (शा प ३७७२) | ३५२।५ |
| इतरकर्मफलानि (भा ३ १२१) | ४०।४७ | इन्दुलिप्त इवा (बाल.रा १ ४२) | २७२।७७ | इह समदशुकु (महावीर ५ ४०) | १४०।४ |
| इतरदेव बहिर्मुख | ५९।२१८ | इन्दुस्स्रवयंशसा | १०७।१९१ | इह सरसि (शा प ८३६) | २२४।८९ |
| इतश्चेतश्चाद्रिविंध | १३२।१९ | इन्दोरस्य त्रियामा | ३०३।१३७ | इह सर्वखफालिन (मृच्छ ) | ३५५।३ |
| इतस्ततो वात (कुमार १४ ४६) | १२८।४७ | इन्दोरेककला (शा प ३६२७) | ३०३।१४२ | इह स्फुटं तिष्ठति (शा प ३५८०) | ३१०।२ |
| इतश्चसद्विद्भूतवै (नैषध १२ २६) | १३१।९ | इन्दोर्लक्ष्मा त्रिपुर (ब्रुव १३८) | १३५।३२ | इह हि नववसन्ते | ३३३।८६ |
| इतो न किंचित्प (शा प ४१२७) | ३६७।३१ | इन्द्र प्रक्षुण्णचित्तो | १२६।२६ | इहानेके सन्त | ५२।२४२ |
| इतो विद्युत्पुञ्ज (शा.प.३४५७) | २९२।२० | इन्द्रात्सामुच्चिशू (शा श.२.७) | ३७६।२६० | इहाविशद्येन (नैषध ७ ६०) | २६०।१२८ |
| इतो विद्युद्वल्लीवि (भर्तृ १ ४४) | २७६।३६ | इन्द्राद्यमुत्स्वं ज्वल | १४२।१४ | इहोद्याने सप्रत्यहह | २३६।१५ |
| इत्थ तलपतलाधि | ३१८।१९ | इन्द्राद्या लोकपाला | १८४।७७ | ई | |
| इद कृष्णं कृष्णं (अमरु ९४) | ३०९।७ | इन्द्रो यमोऽसि वरु | २८८।९२ | ईदृशस्य भवत (शिशु १० ७७) | ३१९।२० |
| इदं तत्स्नेहसर्वस्वं (मृच्छ १० ०३) | ८९।१ | इमे तारुण्यश्रीन (भर्तृ.१ ८५) | २५५।३० | ईर्ष्या घृणी (भा ५ १०५६) | १५९।२९५ |
| इदं तावच्चित्रं यदव | ३६३।१९ | इयं चन्द्रेणापि प्रकट | ९।१२४ | ईश करस्थीकृतकाञ्च | ९२।५१ |
| इदं दूर्वाकाण्डद्युति | ३०६।४३ | इयं तावल्लीला यदधि | २४।५३ | ईश्वरा पिशुना | १६८।६७५ |
| इदं नभसि (शा प.३६०५) | २९७।२७ | इयं पली भिल्लैर (शा प.शु ७) | २२७।१९२ | ईषत्कम्प | ३२०।४८ |
| इदं नृपप्रा (नैषध १२ ९०) | १०४।११७ | इयं प्रीतिर्वल्ली हृद | १७७।९८८ | ईषन्मीलित (गीत १२.२४.६) | ३१९।४१ |
| इद परमसुन्दर तनु | २५६।३७ | इयं बाला वल्ली मृदु | २३६।१७ | ईषल्लब्धप्रवेशोऽपि | ५५।६४ |
| इदं मघोन कुलिश(शा.प ४०६८) | ३६५।१ | इयं भुजंगिनीश्रिता | २७४।२३ | उ | |
| इद युगसहस्र(शा.प ४१३२) | ३७२।१५५ | इय मुखाम्भोरुहस | २५७।१३ | उग्रग्राहमुदन्वतो (सु २५५४) | १८४।६९ |
| इदं वक्त्रं साक्षाद्वि | २७१।४१ | इय यशांसि द्विषत | १३५।१४ | उग्ररूप कुचद्वन्द्व | ३१८।२ |
| इदं हि माहात्म्य | ४९।१८६ | इय व्याधायते बा(शृंगारति १३) | २५३।३ | उचितं गोपनमन | ३१३।२७ |
| इदमनुचितमक्रम (भर्तृ १ ०८) | ७०।५७ | इयं सुनय (का प्र १० ४६५) | २६२।१६८ | उचित नाम (शा प १०५७) | २४३।१८८ |
| इदमपटु कपाट(शा प ८७८) | २७७।१८९ | इय सुरतरङ्गिणी न | ३५४।८१ | उचितमनुचितं वा | १७६।९७३ |
| इदमयुक्कमहो म(शिशु ६.५६) | ३४६।१७ | इयं सुस्तनी मस्तकन्य | २७।३९ | उचित्य प्रथम(शा प ३८०१) | ३३४।१०७ |
| इदमशिशिरैर (अ शा ३ ३ १०) | २७९।७३ | इय सृष्टा चन्द्रत्क | २६८।३२३ | उच्चै स्थान (शा प ७६४) | २१०।३७ |
| इदमाभाति गग (सा द १० ९९) | २९९।८ | इयती जगती कियती | १२३।५ | उच्चै कल्याणवाही | ११३।२८९ |
| इदमिदमिति भू (शिशु ७ ५०) | २३४।११४ | इयल्पप्येतस्मिन्निर (भर्तृ स ४१२) | ७०।३८ | उच्चैरध्ययनं पुरातव (सु.२३७८) | ९६।४ |
| इदमीदृग्गुणोपेत (किरात ११ ४१) | ८५।६ | इयत्या सपत्तावति | २१।१७ | उच्चैरुच्चरतु चिर(शा प १११४) | २१८।७५ |
| इदमेव नरेन्द्राणा | १४६।१८० | इयत्यामपि सामग्र्या | ९।५७ | उच्चैरुत्ताल (शा प ६६) | १०१।५८ |
| इदानी तीव्राभि (शा.प ३४३६) | २८४।२५ | इयत्येतस्मिन्वा (भर्तृ सं ४१२) | २४८।९६ | उच्चैस्सतालगण्डस्थल | ३।३२ |
| इन्दीवर लोचनयो | २६०।७९ | इयमसी तरलायत (अमरु १२७) | २७३।८ | उच्चैरेश तरु. (भर्तृ स ४१७) | २४१।१४० |
| इन्दीवरवलय्यामर्मि | २२।९९ | इयमिय मयदीनवन | ३६२।२० | उच्चैर्ब्रह्माण्ड (शा प ५८) | २।२७ |
| इन्दीवराक्ष्या स्फुट | १९०।७२ | इयमुदरदरी दुरन्तपू(भर्तृ स ४१४) | ९६।६ | उच्चैस्तरादम्बरशैल | २९६।१ |
| इन्दीवरेण नयनं मु (शृंगार.२) | ३०६।२५ | इयमुन्नतसत्त्व (शा प.२२०) | ४९।१५७ | उच्छिष्टं शिवनिर्मा (शा.प ५१७) | १८४।४ |
| इन्दुं कैरविणीव (शा.प १५५७) | २९१।४ | इषुत्रयेणेव जग (नैषध ७ २७) | २५९।८० | उच्छ्वसन्मण्डल | २६५।२६६ |
| इन्दुं निन्दति च(शा प १२३८) | १३६।४० | इह किं कुरङ्गशाव (शा प ९३९) | २३२।९९ | उज्जृम्भते कुमुदिनी | ३०१।७१ |
| इन्दुं निन्दति (शा प १२३८) | १३६।४१ | इह जगति रतीशप्र | ३५६।२३ | उज्जृम्भानन (शा.प ३४१७) | २८६।२२ |
| इन्दु निन्दति | १७९।१०३६ | इह तुरगशतै प्रया(शा प १९८) | ३९।२३ | उज्झती शुच (किरात.९ १८) | ३००।३५ |
| इन्दुं निन्दतु नाम | २११।३९ | इह नगरे प्रतिरथ्य | ३५२।१३ | उज्झित्वा दिशमम्बरं | ७।८५ |
| इन्दु कि (का.प्र.१०.४१९) | ३१२।२२ | इह निचुलनिकु (शा.प ३९१८) | ३४५।५८ | उडुपगणपरिवारो नायको (सु ५७६) | ९६।४ |
१४ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| उडडुराजमुखी मृग २५।३९ | उत्तुङ्गस्तनपर्वताद् २६८।३६६ | उदयन्नेव सविता (कुव ५६) ८८।१५ |
| उड्डीन विहगैरमंत २९।१८ | उत्तुङ्गस्तनभरता २५३।१५ | उदयमयते (का प्र १० ४३३) ३२७।१८ |
| उड्डीना गुणपत्रिण (शा.प.३९५)७४।३७ | उत्तुङ्गस्तनभार २६८।३६७ | उदयमुदित (शिशु ११ १२) ३२२।८ |
| उत्कण्ठयति (कुव ५०) ३४।१८ | उत्तुङ्गस्तनमण्डलोपरि ९६।९ | उदयशिखरि (शिशु.११ ४७) ३२७।१६ |
| उत्कर्णोऽयमकाण्ड २०।७४ | उत्तुङ्गस्तनशैलदुस्तर २७४।३२ | उदये सविता रक्तो ४५।१९ |
| उत्कर्षवाचिजगुणो ४८।१९९ | उत्तुङ्गस्तरु (शा प १०५९) २८३।१९५ | उदरद्वयभर (शा.प.६४) ३६४।१७ |
| उत्कूजन्सु वटे(सूक्ति.१४/२)२२६।१४७ | उत्थापित सय (रघु ७ ३०) १२८।२६ | उदर्कभूतिमि १५८।२३६ |
| उत्कूल ज्वलिता (शा प ४०७७)३६६।४ | उत्थाय हृदि लीयन्ते (शा प ४०१)६५।१ | उदस्य धैर्यं (किरात ८ ५०) ३३८।९३ |
| उत्कुलोत्कूल्य (मालती ५ १६) ३६६।७ | उत्थायोत्थाय (शा प ६६८) १६१।४३२ | उदस्योच्चै (शा प.१२१२) २३५।१६० |
| उत्क्रान्तानामा (शिशु १८७३)१३०।१०२ | उत्थिता (का नी ५ ६०) ३८३।२४६ | उदारचरितस्त्या (शा प ३८९) ७१।१४ |
| उत्क्षिप्तं कर (सा द.३ ७६) ३५६।३० | उत्थितो निशि २६१।१४५ | उदारस्य तृणं वित्तं १५६।१८४७ |
| उत्क्षिप्ता अपि १२८।१४ | उत्पतन्ति (पच २ १३०) ३८३।२४७ | उदासीना लीनामपि २५४।३३ |
| उत्क्षिप्य करि (कुमार.१६ ३४) १२८।१५ | उत्पत्त्युत्पन्नशिष्टा १९३।२९० | उदाहरण (किरात ११.६५) ७९।१४ |
| उत्क्षिप्योच्चै (शिशु १८.३८) १२९।७६ | उत्पन्नम (हि ४.७) ३८३।२४८ | उदित प्रिया (शिशु ९ ६९) २७८।३३ |
| उत्खातं निधि (भर्तृ ३ ५) ७७।४९ | उत्पाद्यत्यखलमिदं २८६।३ | उदितवति (शा.प ११४१) २४४।२१२ |
| उत्खातच्छिन्न २९८।३९ | उत्पादिता (भर्तृ स ४२३) ७०।३६ | उदितवति परस्मि १९१।८० |
| उत्खातदैवत (शा प ४००४) ३६२।२१ | उत्पुल्य य शिख २३०।३१ | उदितेऽपि तवावनीन्द्र १३३।७ |
| उत्खाताम्प्रति (हनु ९ ३५) १४२।१५ | उत्फुल्लारा (शिशु १८ ५३) १३०।८५ | उदितोरुसादमति (शिशु ९.७७) ३११।९ |
| उत्तंस केकिपिच्छैरमरकत २९९।२२ | उत्फुल्लगल्लैरा (शा प १६२) ३२।८ | उदीरितोऽर्थ (पच १ ४४) १७४।९११ |
| उत्तंस कौतुक (शा.प ११०७) २३९।१०९ | उत्फुल्लपङ्कजनिषक्त ३३३।८१ | उदेति पूर्वं कुसु(अ.शा ७ ३०)१०४।१९३ |
| उत्तंसेषु न नर्ति (शा.प १२९४)२१७।५९ | उत्फुल्लमानसरसीरुह २२१।२७ | उद्गर्तन्दुभवि (किरात ९ २४) ३००।४१ |
| उत्तत्तोऽयमुदंगम ३३७।५८ | उत्फुल्लरभ्यसह २३९।१११ | उद्गर्भहणतरु (वामन का १३५) ३०१।६९ |
| उत्तमं सुचिर नैव (सु ३०६) ४६।६८ | उत्फुल्लामलकोमलो २१।८१ | उद्घाटितनवद्वारे (ऊट) ३६७।१७ |
| उत्तमं स्वार्जितं १६०।३१९ | उत्फुल्लार्जुनसर्ज(मालती ९ १७)३४२।६५ | उद्दण्डे भुजदण्डे १०३।६५ |
| उत्तमं प्रणिपा (पच ४ ७४) १५८।२४६ | उत्सङ्गरङ्गलितोरु (शा प ५४९) २०६।१ | उद्घानाम्बुदवर्धमान २१९।१६ |
| उत्तम क्लेशविक्षोभं (वृ श १०) ४६।५५ | उत्सवे व्यसने चैव (चा नी १७) ८८।५ | उद्दामदानद्विप (कुमार १४ ४१)१२८।४२ |
| उत्तमर्णधनदान ७३।२८ | उत्साद्य कुन्तलम ३२५।१० | उद्दामदिग्द्विरदच २९७।२४ |
| उत्तमस्तोषमायाति १६९।७०८ | उत्साहसम्पन्नम (पच.२ १०९) ६३।२५ | उद्दामद्युमणिद्यु (सूक्ति.६०.२०)१३७।४६ |
| उत्तमा (शा प.१४८७) १५४।५६ | उत्साहस्य प्र (शा प १४०९)१५०।३१९ | उद्दामभ्रमिवेगविस्तृत(सूक्ति.२.३२)६।७१ |
| उत्तमानापि स्त्रीणा(रसगगाधर)३४९।३७ | उत्सिक्त कुसुमा ३२६।२९ | उद्दामार्वुदवर्धिता (सु २५५५)३५७।३८ |
| उत्तमोऽप्यधमस्य (वृ.श ७०) १६९।७०१ | उच्छङ्खलम्बुजदृशा ३३३।८० | उद्दामाकार्शदीय्य १८४।७४ |
| उत्तरङ्गय कुरङ्ग(श प ३५५७) ३०५।१६ | उदञ्चत्कावेरी (शा प ३८१०)३३४।१३२ | उद्धतैरेव (शिशु.१० ३२) ३१५।३५ |
| उत्तरन्ति विनि (कुमार ८ ३५) २९४।१४ | उदञ्चदक्षोजद्वय २५५।३४ | उद्धतैनिभृत (शिशु १०.७६) ३१९।१९ |
| उत्तरीयविन (शिशु १० ४२) ३१६।२ | उदञ्चय दृगञ्चलं ३०६।३९ | उद्धर्तु किल शैलकेलि २९९।२ |
| उत्तानामुपधाय २७०।४२९ | उदधिरवधिर्व्याप्तं ५१।२१७ | उद्भूतपाशुपटलानुमित १३९।२ |
| उत्तोनो (का प्र ७ ३०४) ३७१।१९९ | उदन्वच्छिन्ना (भर्तृ ३ २०) ५१।२३३ | उद्धयेत तनुलतेति २७७।५७ |
| उत्तालालकबभ्र २५६।५५ | उदमज्जि कैट (शिशु ९ ३०) ३००।५५ | उद्धूयेत नतभ्रू २८८।२१ |
| उत्तिष्ठ क्षणमेक (पच २ २४) ६७।६८ | उदयगिरितटस्थ. (सु २०२८) २९५।४७ | उद्बन्धकेश (रघु.१६ ६७) ३३८।६८ |
| उत्तिष्ठ दूति (सा द ३ ८३) ३५८।६९ | उदयतटान्तरित २९९।९ | उद्भासिताखिल (भर्तृ २ ४९) ६०।२३८ |
| उत्तिष्ठन्त्या (वेणी [पा ]१ ३) ९६।१४ | उदयति कलमन्द्रै ३०१।७७ | उद्विग्नं किमिदं २६५।२९५ |
| उत्तिष्ठमान (शिशु २ १०) १४१।२९६ | उदयति तरुणिम २५५।१२ | उद्वेगं प्रतिपद्य २६६।२९६ |
| उत्तुङ्गमत्तमातङ्गम २२९।३ | उदयति यदि (विक्रम २४९) ५१।२२२ | उद्यत्करकरवाल (शा प १३२) २७।२१० |
| उत्तुङ्गवातायनगो ३७३।१६९ | उदयति वित (शिशु ४.२०) ३२७।५ | उद्यतेष्वपि (हि ३.१५) १४४।७० |
| उत्तुङ्गशैलशिखर (सु ८३७) २३०।२६ | उदयमुदयरीक्षणाय २५३।१६ | उद्यद्वहिंषि दर्दुरा (शा.प.३३९७)३३०।३ |
सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः ९५
उद्यद्वालाङ्कुर (शा प १२३५) १३८।७६ उद्यद्विद्रुमकान्ति (रत्ना १ १७) ३३३।९३ उद्यन्वन्मूर्नि (शा प.७४१) २०९।९ उद्यन्नाद धन्विभि १२९।५६ उद्यमं साहस धैर्यं (विक्रम ६८) ८२।२ उद्यमेन हि (पच २ १३८) ८२।३ उद्यानपालकल २३८।६८ उद्योग कलह १५६।१२९ उद्योग क्षयमेति ३४०।६८ उद्योग खलु कर्तव्य ८३।१ उद्योगिनं करालम्बं ८२।१३ उद्योगिन (घट नी १३) ८२।२० उद्ग्राहारोपिताद्राक्षत १३।४९ उद्धतदैत्यपृतना (सु ५०) १६।४७ उत्तेजयति दरिद्रं १७०।७६२ उन्नतं पद (का प्र १० ४३८) ५९।२१४ उन्नतावनतभा (कुमार ८ ६९) ३००।३१ उन्नतेषु शशिन (कुमार ८ ६६) २९९।२९ उन्नमप्य सकृच (शा प ५०९) १८२।३७ उन्नमितैक (अ शा ३ ११) २०८।३९ उन्नम्य दूर मु (सूक्ति ६५.२१) ३४२।७५ उन्नादाम्बुदवृद्धि १८३।६८ उन्नालनाभिपङ्केरुह इव ११।९ उन्निद्रकन्दलद (शा प ३८७५) ३४१।४८ उन्निद्रकोकन (का प्र ५ ११४) ३२७।८ उन्मीलद्रसबिन्दु २४१।१२८ उन्मीलद्वदनेन्दु (सूक्ति.५३ ३) २५७।२६ उन्मीलन्ति (सा द १० ७९) २९०।७३ उन्मीलन्ति निशा ३२४।५२ उन्मीलन्ति (सूक्ति ७२.११) ३०३।१३१ उन्मीलन्नयनान्त २८३।१६१ उन्मीलनमधु (सा द १० ४) ३३५।१४४ उन्मीलनमुकु (मालती १ ४१) २८३।१४९ उन्मीलयन्ति कुसु २३८।७५ उन्मीलितं तूलि (कुमार १ ३०) २५५।१९ उन्मुखाभिर्द्विवस (सूक्ति.६९ ५) २९६।५ उन्मूलितालान(नैषध ७ ८५) २६७।३५१ उन्मृष्टं कुचसीम्नि २१।९३ उन्मृष्टपत्रा (शा प.३८४८) ३३८।६९ उन्मेषं यो (का.प्र १०.४१६) ३१३।६० उपकर्तोधिकार (हि.२.९५) १४७।२०५ उपकर्तुमेप्रकाश (सु.२५०) ४८।१४८ उपकर्तुं प्रियं (शा प २३१) ४६।३८ उपकर्तुं यथा (दृ.श.१३) १६८।६७२ उपकार (शा.प ६४०) १५९।४२ उपकार (किरात २ ४३) १७५।९३२ उपकार (का नी ० १०) ३८०।४५० उपकारगृही (चा नी २) १८४।३१४ उपकारपर (शिशु १६ २२) ५९।२०० उपकारमेव तनुते (रसगगाधर) ८४।१०४ उपकाराच्च (पच २ ३७) १६५।५२६ उपकारिणि विश्रब्धे (सु ३०६०) ७५।२ उपकारिणि वीत (सु ३०२६) ४९।१६३ उपकारिषु य (पच ४ २७०) ४६।४० उपकारेण दूयन्ते (सु २०२) ८०।२४ उपकारोऽपि नीचाना ५४।१० उपकृतमनेन (शा प ३५२) ५७।१२८ उपकृतिरेव (सु ४१७) ५८।१८८ उपकृतिसाहसिक (सु २५०) ४८।१४७ उपगूढवेल्लमल (शिशु ९ १८) ३००।६३ उपचरितव्या (शा.प २३६) ४७।१०९ उपचार कर्तव्यो १७७।७८८ उपचारानुन्थास्ते ३०९।१ उपचितावयवा (रघु ९ ४४) ३३२।५४ उपचितेषु (शिशु ६ ६३) ३४७।८ उपजीवति स्म (शिशु ९.३२.) ३००।५७ उपताप्यमान (शिशु ९ ६५) २८८।२९ उपदेशो हि(पच.१ ४२०) ३९।४ उपनदिपुलिने २४२।२६९ उपनयनविवाहाद्युत्स ९९।१२ उपनिषद परीपीता २५१।२४ उपनेतुमुन्नतिमते (शिशु ९ ७०) ३१०।४ उपपत्तिभिरम्लाना (सु १४२) ३९।२१ उपबर्हमम्बुजदृशो ३०१।१६ उपभुक्तखदिरवी ३६५।३२ उपभोक्तु न १५७।१६७ उपभोगकातराणा (सु ४८२) ७२।३२ उपमा कालिदासस्य ३०।६३ उपययौ तनुता मधु ३३२।४८ उपरि करवालधारा (रसगगाधर) ४८।१२७ उपरिगतं हि सवर्ण १८९।४७ उपरि घनं घन(मुद्रारा १ २१) ३४२।८२ उपरिजतरु (शिशु ७ ४९) ३३४।११३ उपरि पयो (शा प ३८८४) ३४२।८१ उपरि पीनपयोधर २६६।२९९ उपवनतरुवृन्त्या ३३४।१२७ उपशम (शान्ति.३ ३०) ३८३।२४९ उपहरण विभावाना (शा.प.९२) ४।२५ उपहितं शिशि (रघु.९ ३१) ३३१।३७ उपसध्यमास्त (शिशु ९ ५) २९४।३४ उपादाता यावन्न भव ८२।४६ उपाविभि सततं १७८।८८७ उपाध्यायश्च वैद्य १५७।१८४ उपानीतं दूरात्परि २३७।५० उपायज्ञो ३८८।२९१ उपार्जिताना वित्ता(पच २ १७७) ६९।९० उपेक्षित क्षी (पच ४ २०८) १५५।३८० उपैति घनमण्डली ३७१।९७ उपैति सस्यं परि (किरात ४ २२) ३८४।१८ उपोधरागेण वि(शा प ३६३४) २९९।१९ उप्ता कीर्तिलता १२९।१५६ उभौ श्वेतौ पक्षौ (शा प ८९४) ८६।१३ उमासिमा समुद्दीक्ष्य ३०।१२ उर स्थलं कोऽत्र २०२।८० उरसि निहितस्ता (अमरु.३१) २९८।१७ उरसि फणिपतिः शिखी २४५।२ उरसि सुरभिद का २०३।९६ उरस्तव पयोधराद्धि ३५६।१७ उरोजवचक्रमनो २६७।३२७ उरोरुहादुद्गमितैः पयो ८१।९० उरोरुहाम्भोहरुहदर्श ३१९।२५ उर्वीपतेश्च स्फटिकाश्मनश्च ३८६।३७० उल्बेन सवृतस्त ३७२।१४० उल्लङ्घ्यापि सखी (शा प ३४४४) २८०।८ उल्लापयन्त्या (शा प ३५११) २९२।१ उल्लास्य कालक (का प्र ४ ५४) १३३।११० उशना वेद (भा १३ २२३९) ३४८।२० उषसि परिवर्तयन्त्या ३२८।६ उषसि मलयवासी ३२६।१८ उष्णाळु शिशिरे ३३७।५२ उष्णाळु कचिदर्कं २६१।९७
ऊ
ऊरु कुरङ्ग (सा द १० ४३) २६८।३९० ऊरुद्वयं मृगदृशः (अमरु १३७) २७१।३७ ऊरुप्रकाण्डद्वि (नैषध ७ ९५) २६९।३९४ ऊरुमूलचपले (शिशु.१०.६७) ३१०।२८ ऊरु रम्भा दृगपि २७५।६४ ऊर्जितं सजनं दृष्ट्वा (दृ श २५) ५४।८ ऊर्णा नैष दधा(शा.प १२१०) २३३।९६ ऊर्ध्वं नीरपवृन्दमै २७२।६५
१६ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| | | | | | | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | | ऊर्ध्वीकृतग्रीवमहो | २२६।१५६ | एकस्थं जीवि (सु. ६०) | १६।४२ | एकेनाक्षणा प्रविप्त (शा.प.३५९६) | २९६।८ | | ऊषरेषु विवरेषु वा | २१२।२४ | एकस्त्वं गहने | २२५।१२८ | एकेनापि सुपुत्रेण जाय | ९०।९ | | ऋ | | एकस्त्वं मरुभूतूहे | २३७।२८ | एकेनापि सुपुत्रेण विद्या | ९०।४ | | ऋक्षाणां भूरिधान्ना(सूक्ति.२.१६) | २१।९१ | एकस्मिन्जनिरावयोः | २४४।२३८ | एकेनापि सुपुत्रेण सिंही | ९०।८ | | ऋणकर्ता पिता (चा.नी.४५) | १५९।२८५ | एकस्मिन्शयने (अमरु.२३) | ३११।२२ | एकेनापि हि शूरेण | ७८।१ | | ऋणशेषश्चाग्नि (पंच.३.२४०) | १५४।५७ | एकस्मिन्शयने विप (अमरु.२२) | ३५८।६५ | एके सत्पुरुषाः (शा.प.४६५) | ६१।२६६ | | ऋणीकृता किं (नैषध.७.३३) | २५९।८६ | एकस्मिन्शयने सरो | ३११।३० | एकैकातिशयालयः (सु.४९२) | ७२।५९ | | ऋतेन | ३८४।२९८ | एकस्मिन्नयने भृशं (सूक्ति.२.५७) | २७।१० | एकैव सामृतमयी(सूक्ति.११.७) | २१०।२४ | | ऋषेरस्याश्रमे पुण्ये | १८।१६ | एकस्मिन्मल्याचले | २३८।६१ | एकैश्वर्यस्थितोऽपि | ७।१०० | | ए | | एकस्य कर्म सं (पंच.१.२७२) | १५७।१७३ | एको देवः केश (भर्तृ.३.३०) | १७१।१८४ | | एकं काञ्चनभूधरं | १११।१३५ | एकस्य तस्य मन्ये(शा.प.७६५) | २११।१२ | एकोना विंशतिः स्त्री | १८७।१९ | | एकं दन्तच्छदस्य (सु. ७०) | ८।११९ | एकस्य दुःखं (पंच.२.१८७) | १७२।८४३ | एकोऽन्ते द्विसमखिलो | ६।६१ | | एकं ध्याननिमी (सा.द.७.२०) | ९।१४१ | एकस्यायमुदेति (शा.प.१०७०) | २१५।१२ | एकोऽपि गुणवान्पुत्रो (सु.२७३०) | ९०।१ | | एकं भूमिपतिः | १५२।४१८ | एकाकिना (चा.नी. ५६) | ३९३।६५४ | एकोऽभूत्पुलिनात्तत | ३७।५९ | | एकं भूमिपतिः करोति (पंच.१.२२३) | | एकाकिनि वन (शा.प.९०५) | २२९।१४ | एको विश्वसतां हरा (रसगंगाधर) | २४६।४४ | | एकं वस्तु द्विधा कर्तुं | २५।१२ | एकाकिनी यद (शा.प.३७७३) | ३५४।७५ | एकोऽहमसहायो (सु.५८२) | २२९।१ | | एकं वस्तु यदस्ति | १०९।२१७ | एकाकी निःस्पृ (भर्तृ.३.९०) | ३८३।२५२ | एको हि खञ्जन (शृंगारति.४) | ३१३।५० | | एकं हन्यान्न (भा.५.१०।१३) | १४६।१४६ | एकास्रः स्या | ३९३।६४४ | एको हि दोषो गुण (घट.नी.१७) | ६६।४३ | | एकः कर्णमहीपतिं | २४९।१०४ | एकादशरुद्राणामे | ११८।१९६ | एणः क्रीडति (शा.प.९१४) | २३०।४३ | | एकः खलोऽपि यदि | ६०।२३२ | एकान्त | ३८९।४८३ | एणाक्षीस्पृहयालु (शा.श.४) | ३७१।१०५ | | एकः शतं योधयते (हि.३.५०) | १४४।६७ | एकान्तसुन्दरवि(शा.प.२७७३) | २५३।१८ | एणाद्याः पशवः किं | २३८।६३ | | एकः स एव जीवति (शा.प.२५८) | ९६।३ | एकान्ते (साधन.५) | ३९३।६४८ | एणीगणेषु गुरुग | २३३।१०७ | | एकः स एव तेजस्वी(शा.प.२८५) | ७८।२ | एकान्ते द्विसमखिलोच | ५।६१ | एणीदृशः पाणिपु | २५७।१२ | | एकः स्तनस्तुङ्गतरा परस्य | १०।१६२ | एकान्ते बत नो (शा.प.३७७५) | २५८।६२ | एणीदृशः श्रवणसी | २२३।८२ | | एकः स्वादु (भा.५.१०।१६) | ३८३।२५० | एकाभिश्र (प्र.१०) | ३९३।६५१ | एणीदृशो विजयते वे | २५७।५ | | एक एव खगो (भर्तृ.सं.४३३) | २२६।१४८ | एका भार्या प्रकृ(घट.नीति.१४) | ३६५।४७ | एतत्काम (भर्तृ.१.२९) | ३८३।२५८ | | एक एव पदार्थ | १५७।१७९ | एकाभूत्कुसुमायु (कुव.१७१) | ११०।२३० | एतर्तिकं प्रणयिन्यपि | ३५६।८ | | एक एव महान्दो | १०२।१८ | एका भूरुभयोरैक्यं (धर्मवि.९) | २४८।८६ | एतत्कीर्तिवि (नैषध.१२.१०४) | १३७।५७ | | एकचक्रो रथो (स.क.४.१६९) | ७९।११ | एकाभिलाभिलाषो | १६८।६६५ | एतत्कुचस्पर्धि (नैषध.७.७५) | २६५।२७७ | | एकचक्षुर्न काकोऽयं | १८५।११ | एकावलीकलि(शा.प.३३४२) | २६६।३०९ | एतत्कोककुटुम्बि | ३०२।१०० | | एकतश्चतुरो वेदा ब्रह्म | १००।२ | एकासनस्था जलवापु | ४४।३ | एतत्तर्कय कैर (शा.प.३६३९) | ३०२।१३० | | एकतामिव गत (किरात.९.१२) | २९७।८ | एकीभावं गतयोर्ज (सु.४२०) | ५८।१९१ | एतत्तर्कय चक्रवाक | ३२४।५३ | | एकत्रासनसंस्थितिः(अमरु.१८) | ३५८।५९ | एकीभूय (शान्ति. ३.१८) | ३८७।३९३ | एतत्तर्कय चक्रवाय | ३२७।२१ | | एकदन्तद्युतिसित (शा.प.८८) | २।७ | एके केचित्यतिकरग | ८७।३२ | एतदत्र पथिकै (शा.प.७८३) | २१२।२३ | | एकदिप्रभृति क्रमेण | ३२५।५७ | एके तुम्बा व्रतिकर | २४३।२०१ | एतदर्थं कुली (पंच.१.३२०) | १५०।३३४ | | एकदैः किमभावि | ३७०।८३ | एकेऽद्य प्रात (शा.प.४१३७) | ३७२।१४५ | एतदुच्छ्वसितपी (कुमार.८.७०) | ३००।३२ | | एकमेव गुणं प्राप्य | १०२।३१ | एकेन चुलुकेन (शा.प.३९०५) | ३४४।५ | एतद्वन्धगजस्तु (नैषध.१२.८५) | १२३।३ | | एकमेव बलिं (शा.प.३३४७) | २६७।३२८ | एकेन चेत्परिहृतो | २३९।९४ | एतद्वतासिघात (नैषध.१२.७३) | १२५।१९ | | एकमेवाक्षि वामाक्षि | २५९।६४ | एकेन तिष्ठताध्वस्ता (शा.प.२७१) | ७३।१८ | एतद्विन्तबलैर्वि (नैषध.१२.२०) | ११६।६४ | | एकरद द्वैमातुर | २।११ | एकेन राजहंसेन या | २२१।५ | एतद्वीतारिनारी (नैषध.१२.२८) | १३३।४६ | | एकशक्तिप्रहारेण | १४३।४० | एकेन शुष्कवृक्षेण दह्य | ९०।३ | एतद्यशः क्षीर (नैषध.१२.९) | १०४।१०४ | | एकसार्थप्रया (शा.प.४१३६) | ३७२।१५९ | एकेन स्मितपा (पंच.१०१५२) | ३५०।७७ | एतद्विभाति (सा.द.१०.३८) | ३०१।७१ | | एकस्तपो द्विरध्या | १५८।२११ | एकेन हि सुपुत्रेण (चा.नी.१३) | ९०।२ | एतद्व्योमवनीवराह | २९८।३५ | | एकस्त्रिया वस (का.प्र.४७७) | १०५।१३६ | | | एतन्मन्दविप (का.प्र.७.१४२) | २४७।५४ |
| संस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः | १७ | |
|---|---|---|
| एतललब्धमिदं च ३९४।६७५ | एष क्षुञ्चाति पङ्के दल १४१।५ | औषसातपभयाद (किरात ९ ६१) २९७।७ |
| एतस्मादमृत (शा प १०८५) २१६।२७ | एष ते (कुव १६७) ३८७।३९१ | क |
| एतस्मादिरमे (भर्तृ ३ ६४) ३८२।२५९ | एष बक सह (शा प ८९०) २२९।२२६ | क पृच्छाम सुराः ३८६।३६९ |
| एतस्मिन्दक्षि(शा प ३८१९) ३३५।१४७ | एष वन्ध्यासुतो याति ३६३।५ | कं योजयेत् ३८४।३०४ |
| एतस्मिन्मरुमण्डले(शा प ११२९)२१९।९ | एष वृक्षशिखरे (कुमार ८ ३६) २९४।१५ | क संजघान कृष्णः १९६।१५ |
| एतस्मिन्मलया (शा प ८६७) २२७।१७५ | एष षट्पदयुवा २४३।२०३ | कंस ध्वंसयते मुर २४१।६७ |
| एतस्मिन्वन (शा प १०२०) २४०।१२५ | एष स्वभावो (र २ ३९) ३८७।४०३ | कंसारातेर्वद गमनं २०९।७३ |
| एतस्मिन्विजने वने १३२।३७ | एष सूर्याशुसत (शा प ३८३६)३३६।३३ | कसारिचरणोद्भूत (शा प ७९६) २२१।३ |
| एतस्मिन्सहसा वसन्त २३०।५ | एष स्वर्गतर (शा प ३६३०) ३०१।९४ | क क कुत्र (का प्र ७ २२४) २३१।४८ |
| एतस्या रतिवल्लभ ७५६।४९ | एषा का मुक्तमुक्ता ३२८।८ | क कगोरिपिता २०४।११७ |
| एतस्या करिकु (सूक्ति १) ३३९।११६ | एषा ते हर का सुगा ७२।३ | क कान्तारमगा १९७।३४ |
| एतस्या स्तनपद्म २७०।६१ | एषा धर्मपताकिनी (शा प १०७) ९।१३० | क कुर्याद्भुवन सर्व १९६।७ |
| एतस्योन्नतसर्वक १११।२४८ | एषा पुष्करिणी मरा २२२।३६ | क कौ कं कौं कान् १९६।१६ |
| एता नवाम्बुधरका ७५।२१ | एषा फुल्लकद (मृच्छ.५ ३५) ३५७।३१ | क खे चरति (सूक्ति ९८.०८) १९६।१२ |
| एता करोपी (रघु १६ ६६) ३३८।६७ | एषा भविष्यति विनि २५३।२६ | क खे भाति हुतो २०४।११५ |
| एता संप्रति गर्भ ११५।५२ | एषैव योषिता धन्या ३५१।२ | क पूज्य सुजन २०४।११९ |
| एता स्खलद्दल यस २५३।०५ | एष्यति मा पुनरय ३५२।१९ | क प्रार्थयते मदन(शा प ५५५) १९७।३१ |
| एता स्वार्थपरा (पच ५ ६३) ३४९।३४ | एष्यन्ति या (नैषध ७ १०५) २६९।४१८ | क श्रद्धायति (मृच्छ ५ ३८) ३८०।४१४ |
| एता गुरुश्रोणि (रघु १६ ६०) ३३७।६१ | एष्यन्त्यवश्यमद्य ३४३।१०० | क. स्यादम्बुदया २०४।११२ |
| एतादृशे कलियुगेऽपि ९९।११ | एहि गच्छ पततोत्तिष्ठ (ध्वन्या ३) ६५।५ | क स्वभाव (राग त १ २३०)३८७।३८८ |
| एतानि नि सह (शा प ३४१०) २८४।१९ | एहि स्वागतमा १८०।१०४३ | क स्वभावगभी (सु.३१५९) ६६।१८ |
| एतानि बालधव (शा प ९६९)२३४।१४३ | एहि हे रमणि (शा प ५३७) १९४।२८ | ककुभा मुखानि (शिशु ९ ४२) ३००।६७ |
| एता या प्रेक्ष(शा प ४१९९)३७२।१४४ | ऐ | कचकुचचुचुकाग्रे १५।२१ |
| एतावज्जन्मसाफ (हि २ ४७) १६३।४७० | ऐन्दवादचिं (काव्या ३ १८३)३८७।४०८ | कञ्चिदेव समय समा ७२।११३ |
| एतावत्सरसिजकु २०९।७ | ऐन्द्र वनु (काव्या सू ५ १ २७)३४४।१७ | कटाक्षेणापीष (सा द १० ९८) २८०।७७ |
| एतासु केतकि (शा प १०१३) २३९।९३ | ऐश्वर्य नहुषस्य ११२।२७१ | कटी मुष्टिग्राह्या (सु २३६०) २६५।४६ |
| एता हसन्ति च रु (मृच्छ ४ १४)३५५।८ | ऐश्वर्यमद (भा ५ १।१४७) ३८०।३९८ | कटुकं वा मधुरं १६९।७२१ |
| एते केतकबू (सूक्ति ६१ ३०) ३२४।५० | ऐश्वर्यस्य विभूषण (भर्तृ स ४१) ८४।२० | कटु कृणन्तो मल ४९।१७४ |
| एते ते गिरिकूटसद्म १४०।५ | ऐश्वर्यात्संह (चा नी ३ ३३) ३८७।४०० | कटुतीक्ष्णोष्णलव ३७१।१३९ |
| एते ते दुरति (शा प ३८८२) ३४२।७८ | ऐश्वर्यादनपेत (मुद्रारा १ १४) १५२।४१९ | कटुभिरपि कठोरचक्र २७।५ |
| एतेनोत्कृत कण्ठप्र ११२।२८२ | ओ | कठिनतरदामवेष्टनत्ले २२।१०९ |
| एते पाटीरवाटीनव ३२६।३६ | ॐकारो मदनद्वि(शा प ३६२९)३०१।०२ | कठिनहृदये मुच (अमरु ५३) ३०७।५१ |
| एते वारिकणा किर ३५४।६३ | ओजसापि ख (किरात.९ ३३) ३००।४८ | कण्ठस्य तस्या (कुमार १ ४२) २६३।२१५ |
| एतेषु हा तरुण मा (भोज २०४)२१२।३९ | ओजोभाजा (शिशु १८ ७५) १३०।१०४ | कण्ठस्य विद्धे(शा प ३३२७) २६३।२११ |
| एते सत्पु (भर्तृ २ ६६) ३८३।२६२ | ॐनम परमार्थैक (सु १२) ४।८ | कण्ठालंकारघण्टाघण १०।१४९ |
| एते समुल्लस द्वासो रा ३४७।३ | ओषामासे मत्स(शिशु १८ ३५)१२९।७४ | कण्ठालिङ्गनमङ्गलं २४।१६३ |
| एते स्निग्धतमा (सूक्ति ८ १५) ५६।१२० | ओष्ठपल्लवविदश (किरात ९ ५७)३१५।४९ | कण्ठाश्लेषिणमुञ्चत ३१८।१७ |
| एते हि गुणा (भोज ६७) २४३।२१३ | औ | कण्ठे गद्गदता खेदो (सु ३१७२) ६६।२८ |
| एतैर्दीक्षगन्ध (शा प ९९४) २३८।५५ | औत्सुक्यमात्रमवसा १३९।२ | कण्ठे मौक्तिकमालि २७७।६५ |
| एतौ द्वौ दशकण्ठक २१।८६ | औत्सुक्येन कृत (रत्ना १ ०) १२।२६ | कण्ठे वसन्ती (नैषध ७ ५०) २६३।२२३ |
| एवमेव कुले जाता ३८०।११० | औदार्य भुवनत्रये २३७।३५ | कण्ठोच्छित्तोऽपि हुंकृ ९९।११ |
| एवमेव नहि (सु ४२८) ५९।२१६ | औरस कृतसम्बन्धं ८८।७ | कतरपुरहर पहर्षं हा ७३।२३ |
| एवमेव मनु ३७७।३२ | और्वी इवातिलुब्धा(शा प ४३१) ७२।४० | कति कति न (शा प.९३८) २३३।१०२ |
| एष क्रीडान्सताम्य ३२६।३७ | औषधार्थसुमंत्रा १४४।५११ | कति कति न लताः २२२।६१ |
| ३ सुभा०अनु० | कति कति न (सूक्ति २६ ४) २४०।१९६ |
१८ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां | --- | :---: | ---
| पद्य | पृष्ठ/संख्या | पद्य | पृष्ठ/संख्या | पद्य | पृष्ठ/संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| कतिचिदुद्धतनिर्भरम | ४०।४८ | कपोलपत्रान्तम् (नैषध ७.६०) | २६२।१८६ | करिष्यति कलानाथ | २९३।५ |
| कति ते कबरीभार | १८८।४४ | कपोलपाली तव | २६१।१३५ | करेण करिणा वीर | १२८।१८ |
| कति न सन्ति जना | २८४।१६ | कपोलफलकाव (सा द १० ४३) | २७५।३ | करे वेणीमेणीसद | २७१।४६ |
| कति न सन्ति मही | २३७।४७ | कपोले जान (महा ना ३ ५०) | ३६०।३१ | करे श्लाघ्यस्त्याग (भर्तृ स ७०) | ५२।२४० |
| कति नो विषया | १०५।१३३ | कपोले पत्राली कर (सु १६२७) | ३०६।४७ | करोति योऽ (किरात ३ ५१) | १७४।८८९ |
| कतिपयदिनपर (शा प ६९७) | ५८।१५९ | कपोले पत्राली पुल | २३।१३७ | करोति निर्मलाधार (शा प प्र १५) | ८६।८ |
| कतिपयदिवासस्था (भोज ३९) | २१।८२ | कपोले पाण्डुत्वं किम | २७६।३३ | करोति पूज्यमानो (सु ३६५) | ५६।९७ |
| कतिपयदिनेषु च (कुव ३९) | १२२।१७१ | कपोले मार्जार (शा प १७९) | ३०१।७९ | करोति शोभामलके (भाव ४३) | १९७।२५ |
| कतिपयनिमेषव (शा प १५५) | ३२।१८ | कमठकुलाचल (भर्तृ २ १०९) | ४८।१२१ | करोति नाभ नीति (हि २ १४) | ९१।९ |
| कतिपयसह (किरात १० ३०) | ३४६।१५ | कमण्डलूपमोऽमा (हि २.९१) | १४२।२३ | करौ नुनाना (किरात ८.४८) | ३३८।९१ |
| कति पल्लवि (शा प १०१८) | २३९।१०६ | कमनीयतानिवास | २६०।१२५ | करौ नुनाना नव (किरात ८ ७) | ३४५।५२ |
| कति सन्ति लवङ्ग | २३९।८४ | कमलभूतनया व | १०४।१९२ | कर्कशतर्कविचारव्यय | ४३।३ |
| कथं नाम न सेव्य(हि २ २८) | १४६।१७३ | कमलमनम्भसि (सु १५१६) | ३६३।१० | कर्णत्विग्गुणोत्कर्षारुत्या | ७०।६ |
| कथमपि कृतप्रत्या (अमरु ७५) | २७६।४९ | कमलाकुचकुनकांचल | १४।१२ | कर्णस्त्वच शिबिर्मा (भर्तृ २ ३४) | ७०।११ |
| कथमपि सखि क्री (अमरु १५) | ३०९।८ | कमलाक्ष विलम्ब्य | ३१२।३३ | कर्णाक्सिदन्त (नैषध ७ १०३) | २७०।२५ |
| कथमवनिप (काव्य प्र ५ १३४) | १२६।३६ | कमलासनकमलेक्षण | १६।६ | कर्णाट देहि कर्णावि | ११३।३ |
| कथमिव तव (किरात १० ३६) | ३३६।१३ | कमलिनि म (शा प ३७९३) | २४४।२२२ | कर्णामृत सूक्तिर (शा प १४४) | ३७।१७ |
| कथमिह मनुष्य (शा प १४०) | २९।१२ | कमलिनी मालिनी (सु ७३०) | ३३२।७० | कर्णारुतुदमन्तरे (रसगङ्गाधर) | २०७।२२८ |
| कथमुपरि कला(सा द १० ४७) | ३६३।१६ | कमले कमला शेते | ३६४।१३ | कर्णारुतुदमेव कोकि | २७२।५६ |
| कथयत कथमेषामेनया | ५।४२ | कमले कमले नित्यं | १९५।४० | कणिकादिष्विव खणे (सु १४) | १।४ |
| कथय निपुणे (शा प ३५८२) | २९२।३ | कमले कमलोत्पत्ति | ३१२।१२ | कर्ण चामरचारु (शा प ९१९) | २३८।८२ |
| कदर्यितस्यापि हि (हि २ ६७) | ७७।८ | कमले निधाय कम | २७५।१० | कर्णेजपाना वचनप्र | ४९।१७७ |
| कदली कद (प्र राघव १ ३७) | २६९।२९८ | कमलेव मतिर्मे (सा द १० २७) | १०४।८३ | कर्णे तत्कथयन्ति (सु ४६२) | ६२।२७८ |
| कदा कान्तागारं (शृङ्गारश०) | २७९।७४ | कम्पन्ते गिरय (शा प १०७४) | २१७।४६ | कर्णोत्पलेनापि (नैषध ७ ३०) | २५९।८३ |
| कदाचित्पाञ्चालीवि | १८४।४५ | कम्बुकण्ठि चरण | ३१२।३२ | कर्णोत्तङ्गविसर्पिणी | २७२।६३ |
| कदा भिक्षामक्तै (शान्ति ४) | ३६८।५६ | करकम्पितखड्गस्य | १२२।१७० | कर्तव्यमेव कर्तं (वृ चा ५ ३) | १६०।२१७ |
| कदा वाराण (सा द ३ ०५०) | ३६९।५९ | करकिंमलय (अमरु ९०) | ३२१।१७ | कर्तव्यो हृदि वर्त | २१४।७४ |
| कदा वा साकेते वि | ३६९।५८ | करजालमपूर्वचे (सु ७२) | २७।१७ | कर्पूर इव दग्धो (का प्र १५८) | २५०।५ |
| कदा वृन्दावन्ये न | ३६८।५५ | करतलयुगपरीण | २६५।२७१ | कर्पूरधूलि (का.प्र ७ ३२५) | २७३।१० |
| कदा वृन्दावन्ये वि | ३६८।५७ | करनररविदीर्घध्या | ३२७।११ | कर्पूरधूलिरचिता | २४३।१९३ |
| कनककलशस्य (स क ३ ११०) | २२।१३१ | करप्रचेयासु (शिशु २ ८९) | १४७।१९१ | कर्पूरन्ति सुधाद्रव | १३६।४९ |
| कनककमुकायित | २६७।२८६ | करवदरसदृशमखिल (शा प ५९) | ३।६ | कर्पूरपूरच्छविवाद | १८२।२९ |
| कनकनिकषभासा | २१।७९ | करभदयिते य (शा प ९६०) | २३४।१३२ | कर्पूरप्रतिपन्थिनो | १०७।१८६ |
| कनकभङ्गपिशङ्ग (शिशु ६ ४७) | २४४।२५ | करभदयिते योऽ (सु ६६७) | २३४।१३१ | कर्पूरादपि केत(प्र राघव ७.६८) | १३७।४३ |
| कनकभूषण (पञ्च १ ८२) | १७५।३९ | करमुदयमही (सा द ३ १३१) | २९९।२० | कर्पूराम्बुनिषेक (सूक्ति ४२ ८) | २७७।६० |
| कनकमृगं हत्वा | ३६२।२१ | करयुगमपद्म (शिशु १३ ३७) | १२६।४२ | कर्पूरेण स्थलविर | २५४।४० |
| कन्दर्पज्वरस्य (गीत ४ ९ १२) | २५०।८५ | कररुदनीवि दयि (शिशु ९ ७५) | ३१०।७ | कर्मण फलनिर्वृत्ति | ३८६।३६८ |
| कन्बरा समपहाय क | ९६।४ | करवारिरुहेण सधु | १९८।१११ | कर्मणा बाध्यते (महा ना ?) | ९१।२४ |
| कन्या कामयदुद्वाहं | १००।३३ | करवालकरालवारि | १३५।१७ | कर्मणा मन (शा प १३९४) | १४६।१६६ |
| कन्या निष्कासि | १६६।५७१ | करस्फोटोडम्बरत्या | २०९।५ | कर्मब्रह्मविचारणा विज | ४३।७ |
| कन्याप्रसूतस्य धनु | ३४६।११ | कराग्रजागच्छ (नैषध ७.७९) | २६५।२८० | कर्मभूमिरिमा प्रा(र २ १०९) | ३९३।६४५ |
| कन्या वर (नैषध [?]१०.१) | ३८७।४०१ | करानप्रसार्य रविणा(शा प.७४०) | ७३।१७ | कर्मानुमेया (काम नी ४ ४०) | ३८४।२७२ |
| कपटवचनभाजा के | ३५८।७२ | करालवाचालमु | १२९।४९ | कर्मियत फल (भर्तृ २ ६०) | १६१।३७५ |
| कपिरापे च कापि(कुव.१४५) | २३५।१५१ | कराविव शरीरस्य नेत्र | ८८।१ | कर्षाङ्क सिञ्च (शा प १२७७) | १३२।३२ |
| कलकण्ठ यथा (भोज २८७) | २२५।१२४ |
मस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः १९
कलकणितगमे (काव्या.२.१०) २०८।२२
कलङ्कदाशो गगना २२२।१
कलभ तवान्तिक २२१।००
कलमा पाकविन (भोज ७४,२४) १९।६
कलमाग्रनिर्ग (शा प ४०/१) ८५।६ = = ८८।२७
कलयति कुव (सा द १० ७०) २००।१८
कलयति मम चेत २८८।२२
कलय वलय वम्मि ३००।१४
कलया तुषार (शिशु ० ३४) ३००। २
कलशे निजहेतुद २६५।२८८
कलहान्तानि (पच ४ ७२) १८१।५४५
कलाविनाथानय २०१।१२०
कलानिधिरय रवे ३०१।८८
कलारल गीत पग १७७।९७९
कलाववत सेव कला ८१।३
कलासीमा का १००।२१२
कलास्तास्ता सम्य २१०।३२
कलिकालसियं याव १९४।७१
कलितमम्बरमाक ३००।८९
कलुष च तवा (सा द १० ८२) १०४।९०
कल्पक्षोणिदहोड १११।२५५
कल्पतरुका मदोग्धी (कुव १२५) १०३।७१
कल्पद्रुम कल्पितमे ८७।२४
कल्पद्रुमो न जा (शा प १२४२) १०१।५
कल्पद्रुमोऽपि (शा प ९८७) २३७।३१
कल्पयति येन (हि २ ६५) १७०।००१
कल्पस्थायि न जीवि (सु ५२१) ७०।२९
कल्पान्तक्रूरकेलि कतु ८१।०७
कल्पान्तवाससखो १५६।१४९
कल्पान्ते क्रोवन्तस् (शा प ९७) ८।१११
कल्पान्ते शमित (सूक्ति २ २४) ५।५४
कल्याणं व क्रियासु ८।१११
कल्याण वो विधत्ता ३।३३
कल्याणं न किम (शा प.११८४) २२०।४
कल्याणं भगवत्कथा ३४।५४
कल्याणं भवता १११।२६३
कल्याणवाक्त्वमि २०२।३१
कल्याणाङ्कुरचानुक्त ३०७।५९
कल्याणाना निधान (हनु १ २) २१।८८
कल्याणोल्लाससीमा क २१।८९
कल्योत्थानपरा नि ३५०।१२
कल्लोलक्षित (प्र राघव २.३५) २०२।१९९
कल्लोलवेल्लितदृषत्प २१६।१९
कल्लोलमञ्चलदुगाव २१५।१७
कल्लोल व्यगन प ८ १२५।०२
कवय कालिदासा मा ५४०५- १२
कवय कि न (भोज) १०७।००६
कवय परितुष्यन्ति (शा प १०७) ८८।५
कवयति पण्डितराजे ३५।१३
कवयो वद कुत्र २०९।६३
कवि करोति कव्या ३२।१६
कवि करोति पद्यानि ८२।१३
कवि पिना पोषयति ३२।१७
कवित्वगानप्रि (नैषध ७ ६७) २६५।२१६
कविभिर्नपसेवासु (शा प १५१) ३०।२
कविर्गुणहरति श्लाघ्या ३०।१२
कविरमर कविरुच (शा प १७८) ३४।६
कविवाक्यामृतती (शा प ४६९) ३२।१९
कविहृदयोचनसूया १७१।७८४
कवीना महता सूक्ते (सु १८८) ४०।२४
कवीना मानस नोमि (भोज १२) ३२।६
कवीना सतापो (प्रदीप) १०६।१५१
कवीनामगलहूर्षा (सूक्ति ० ७४) ३७।६२
कवीन्द्र नोमि वा (शा प ७२) ३६।४८
कवीन्द्राणामास (कुव ४३) १२२।१०२
कवीश्वराणा वचसा ३५।८०
कवेरभिप्रायमगन्द (सु २५८) ३२।३५
कश्चिच्छला (शिशु १८ ६४) १३०।९४
कश्चित्कम्यचिदव (ह स १७, १६८।६०८
कश्चित्तरति (मा १० ४९७) २४३।६३३
कश्चि पान्यस्नुषा १८८।७२
कश्चिदास्रवर्ण छि (र २ ६३) ३८०।४१०
कश्चिद्द्विपस्तङ्ग (रघु ७ ७७) ३६०।२०
कश्चिञ्चव पञ्चवमा २२६।२१
कश्चिन्मूर्च्छामि (शिशु १८ ७८) १३०।८८
कषायेरुपवांस्थ कृता ४४।४
कष्टं च खलु मूर्खत्व (चा ना २ ८) ९६।२
कष्ट जीवति गणिका ३५०।५
कष्टा वृत्ति परा (चा ना ५९) १५२।३९०
कस्तूरिका हरिण २४४।१०८
कस्तूरिका तुणभु २०५ ६०
कस्तूरिकामृगनाम (कुव १२६) ५८।१६४
कस्तूरी जायते कस्मा १९६।१
कस्तूरीतिलक ललाट (सु २७) २५१।१८४
कस्तूरीतिलकं ललाट १८३।५५
कस्तूरीतिलकन्ति भा १०१।४५
कस्तूरीतिलक (शा प ३३९४) २५८।४३
कस्तूरीयान्ति भाले १०१।४६
कस्तूरी सितिमानमा १३७।७३
कस्तूरीयमदौ योद्धु (कुव ७०) १०२।३३
कस्त्वं कुष्णमवेहि २३१।५०
कस्त्वं ब्रद्यक्षप्रवे (सूक्ति ० ८३) २०।६८
कस्त्व भद्र खले (कविना २०) ६१।२७०
कस्त्वं भो क (शा प १०४६) २/२।१७१
कम्त्व भो कधिर २८७।८९
कस्त्व लोहितलोच (सु ७६३) २२१।३०
कस्त्व शूली मृगय (शा प ९५) ५।४५
कस्मान्नोऽह किमपि ३६९।७३
कस्मात्त्व दुर्बलासी १९५।५३
कस्मादिन्दुरसौ विनो ५३।२६६
कस्मिञ्छेते मुरारि १९८।३९
कस्मिन्वसन्ति वद १९७।२९
कस्मिन्स्वपिति कमा २००।३४
कस्मै कि कथनीयं कस्य ३६३।६
कस्मै चिन्कपटाय कैट ६३।३३
कस्मै यच्छति स २०४।१११
कस्मै हन्त फलाय (रसगगाधर) २४९।१०२
कस्यचित्किमपि नो १७१।८०८
कस्यचिन्समद (शिशु २० १०) ३१४।१३
कस्य तृष न क्षपय (भोज ७३) २१९।३
कस्य मरो दुरवि (शा प ५५६) १९६।१३
कस्यारयाय (प्र राघव ६ ४४) २९२।२८
कस्यादेशात्क्षपयति ५१।२३१
कस्यापि कोऽप्य १७६।९५८
कस्याचिद्वाचि कश्चि ३४।६८
कस्याश्चिन्मुग्व (शिशु ८ ५६) ३३१।११३
कस्यैयं तरणि प्रपा ३३९।१२२
कहमस्सि गुहावक्ति १८७।२७
काश्चित्कत्तपशत ३७४।२०१
कावित्नुच्छद्यति ९४।१११
काक कृष्ण पि (नीति १३) २२५।१२०
काक पक्षबलेन भू २३१।५०
काक पक्षिक्षु चा १५८।२१२
काक पञ्चवने रति ८४।२१
काक आह्वयते काकान् ७३।१४
काकतालीययोगेन १५२।१२
काकतालीयवत्त्रासं (हि प्र ३६) ८३।१४
काक स्व फल (सूक्ति १७ ४) २२८।२१८
काकस्य गात्रं यदि (नीति र ८) २२८।१०
काका कि कि न (भोज १९२) २२७।१८४
का कान्ता कालिया २००।४०
२० सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| का काबला निधुवन २२३।१८ | कान्तारभूमिरुहमौलि ८७।३१ | कामेघादुपजाति २०४।१९३ |
| काकाल्लौल्यं यमा (सूक्ति ८९ ३५) ४५।१ | कान्ता रुचिं मुनि १९०।७७ | कामेन कामं प्रहि ३४०।१९ |
| काकुत्स्थस्य दशाननो ७८।१३ | कान्तावियोग (चा नी २ १४)३८०।४७९ | कामेनाक्रुध्य चापं २६।२०८ |
| काकुत्स्थेन (शा प ४०१८) ३६३।२१ | कान्तारे जलवृक्षवै १३०।२३ | कामो वामदशा १२२।१६५ |
| का कृता विष्णुना १९८।१० | कान्ते कञ्चलिकाम २१८।१८ | काय सनिहिता (हि.२.६५) १६३।४६६ |
| काके कार्ण्यम् (सूक्ति १५ ११) २२७।३८ | कान्ते कद्यपि (अमरु.१३) ३५७।३७ | काय कष्ट (शा प १०३९) २४१।१५४ |
| काके शौचं (विक्रम ४१) १७७।८१३ | कान्ते कथंचिद्र (अमरु.१५८) ३२९।६ | कायस्थेनोदरस्थेन (शा प.४०४३) ४५।२ |
| काकै सह विवृद्ध (शा प ८३८) ४५।३५ | कान्ते कलितचोलान्ते ३१८।३ | कारञ्जी कुञ्ज (शा प ३८५१) ३३९।१२५ |
| काकोलं कलक (शा प ३६०२) २९७।३० | कान्ते घोरकृतान्त ३११।३९ | कारणान्मित्रता(पञ्च १ ३१७) १६५।५२५ |
| का खलेन सह (वृ चा ४ ३५) ५६।१०४ | कान्ते जग्मुषि ताम्र ३२४।४७ | कारणोत्पन्नकोऽ (शा प ३९३८) ३४७।२ |
| काच काञ्चनसंस (हि प्र ४२) ८६।१२ | कान्ते तथा (शृङ्गारति १ ३९) ३१९।२८ | कारण्वं सवि (पञ्च २ २७) १४९।३०६ |
| का चक्रे हरिणा २०३।१०९ | कान्ते तल्पमु (अमरु १०१) ३२९।२१ | कारुण्यामृतनीरमाध्रि २१।८४ |
| काचा काञ्चनभूषि २१८।६३ | कान्तेत्युत्पललो (भर्तृ.१ ७२) २५०।१९ | कार्कश्यं स्तनयो (पञ्च १ २०२)३५०।७८ |
| काचित्कीर्णा (शिशु १५ ९६) १२६।२२ | कान्ते वावय मे पा १८८।३० | कार्त्स्येन निर्वर्णयि २७०।२७ |
| काचिद्दाला रमणव १९१।८४ | कान्तो यास्यति दूरदे ३३०।२ | कार्पण्याेन यश (नव.५ ) १७९।१०३३ |
| काचिद्वियोगानलतप्त १९०।६७ | कान्तोऽसि नित्य(भोज २३५)२४२।१७८ | कार्पासकृतकूर्पास २५१।१५ |
| काचिद्विलोलोकनयना १९०।७६ | कान्पृच्छाम सुरा (शा प १४७) ३०।१ | कार्यकार्ये किम (सु २८६१) ३६९।७२ |
| काचिन्निवासितब (शा प.३५२३) २७३।३ | का पाण्डुपत्नीगृहभू १९७।२४ | कार्यपेक्षी जन (दृ श.४५) १६८।६९० |
| काचिन्मृगाक्षी (शा प ५१९) १८५।२१ | कापिशायनसुग (शिशु १० ४) ३१४।७ | कार्येणापि विलम्बन ३५४।६१ |
| काचे मणिर्मणौ (पञ्च १ ८३) १४९।२७३ | कापुरुष कुकुरश्च ५५।२७ | कार्ये दासी रतौ वेश्या ३५०।९ |
| काचो मणिर्मणि (भट्ट.३) ४६।७१ | का प्रियेण रहिता २००।५५ | कार्येषु मन्त्री करणे ३५१।२७ |
| काचिद्दिनावैससये १८२।४० | का प्रीति सह १६७।६४८ | कार्ये सत्यपि जातु ३५३।५२ |
| काञ्चीगुणैरिव (शा.प.३३४५)२६६।३१९ | कामं कामदुघ धु (शा प.४९५) १८१।२ | कार्य्यं चेत्प्रतिप (हनु.६ ४०) २९०।८५ |
| काञ्ची काञ्चो न ११८।१०९ | कामं कामसमस्तव १०८।२०४ | कालक्रमकमनीयक्री २३९।९९ |
| काठिन्य कुचकुम्भ ११५।५१ | काम जीर्णपलाशसह ७४।४७ | कालक्रमेण परिणा १७६।९७० |
| काठिन्य कुचयो ह्य (कुव १३४) १३१।४ | काम नृपा सन्ति (कुव ५२) १०४।१९० | कालागुरौ सुरभि २३७।४९ |
| काठिन्यमङ्गैर् (शा प ३३४१)२६५।२७७ | काम प्रियानपि (सु ५१३) ७९।१ | कालातिक्रमणं (पञ्च १ २६०) १४९।२८४ |
| काणा कुब्जा (शा प १३३९) १४४।७३ | कामं भवन्तु (शा प ११४४)२४०।४२४ | कालातिक्रमण (शा प ७८६) २१३।६६ |
| का तव का (मोहमुद्गर ) ३८७।४०५ | काम वनेषु हरि (शान्ति ४ ४) ८०।२८ | कालिदासकवि (पद्यस १५) ३८४।२९० |
| का त्व पुत्र पुत्री नरेन्द्र(भोज १८२)१३३।३८ | काम वाच कतिचिद ६९।२७ | कालिन्दि ब्रूहि कु (कुव ६६) ११४।२३ |
| कानने सरिदुर्गै (सा द १० ७४)१०३।६४ | कामकर्मुकतया कथ २५८।५६ | कालिन्दीनर्मदाम्भ १३८।९० |
| कान्त ना (शा प ३८२८) २३६।३० | कामनाम्ना किरातेन ३४८।८ | कालिन्दीतुलिनोदरेषु (सु ३८) २५१।८४ |
| कान्त कुन्तचरि २८७।५ | कामपि श्रियमासाद्य ८२।१२ | कालिन्द्या पुलिनेषु (वेणी.१.२) २४१।६६ |
| कान्तं वक्ति कपोति (धर्म.५ ) ९५।१२४ | कामबाणप्रहारेण २६३।२०७ | काले देशे यथासु १९९।१६ |
| कान्त विना नदीती १९३।१० | कामारिरहितामिच्छ २०२।७७ | कालेन शिति (शा प ४१६७) ३७४।२०२ |
| कान्त वीक्ष्य विपक्ष ३५६।२१ | कामसागरविधौ मृगी ३२१।६ | कालेन शी (भा १२ ७३९) ३९४।७०४ |
| कान्तादूत्य इव (किरात ९.६) २९४।२५ | कामान्दुग्धे विप्र (उत्तर.५ ३०) ८५।१२ | काले नीलवला (शा प ३८७६) ३४२।६४ |
| कान्तं निरीक्ष्य बल ३५६।१५ | कामाय स्पृहय (दृ श २४) १६९।७१८ | काले पयोधराणामय १८६।४ |
| कान्तया कान्तसयोगे १९३।७ | कामेन कृत (शिशु १०.६१) ३१७७२२ | काले मृदु (भा १२ ५३१४) ३९०।६९८ |
| कान्तया सपदि (शिशु.१० ७३)३१९।१६ | कामिनामसक (शिशु.१० ५७) ३१७।१८ | काले सहि(काम नी ८०.३६) २८७।४०७ |
| कान्तसगमप (किरात ९ ५२) ३१९।४४ | कामिनीनयनकज्जल २५९।९५ | का लोकमाता किमु १९७।१८ |
| कान्ता कामपि कामय ७८।३ | कामिनो हन्त हेमन्त ३०५।६ | कालो दैव कर्म ३८४।२९६ |
| कान्ताकटाक्षविशि (भर्तृ २ ७६) ७८।१२ | कामिन्या स्तनभा २०३।१०७ | कालो मधु कुपित २८७७४ |
| कान्ताकेलि क (शा प ९९१) २३७।५१ | कामुका स्यु कया १९९।१३ | कालो हेतुं (भा १२ ५०६८)३९४।६८७ |
| कान्तामुखं सु (अमरु.१६२) २७८।३८ | कामुजहार ह (सूक्ति.९८.३४) २०२।८९ | का विधा कवि १७९।१०३८ |
सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः २१
| कावेरीतीरभू (भर्तृ स ४५०) | २३५।१३६ | किं कोकिलस्य वि | १७६।९६६ | किं तेन हेमगिरिणा (भर्तृ २.७८) | २१५।७ |
| कावेरीवारिवे (सूक्ति ५९ ३३) | ३२७।३८ | किं कोमलै कल | २८०।१३४ | किं ते निसर्गदन्धि | ३०६।२९ |
| काव्यं करोषि किमु(सूक्ति ५ ४) | ३८।२२ | किं कौमुदी (शा प.३२६९) | २७३।१५ | किं त्राणं जगता | २०४।१९६ |
| काव्यप्रपञ्चचू रच | ३२।२० | किं कमिष्यति (शिशु १४ ७५) | ३६३।१४ | किं त्व न वेन्सि (शा.प.४४०) | ९१।३८ |
| काव्यमय्यो गिरो (शा प.१७१) | ३२।११ | किं क्रूरं फणिह | १७०।७५२ | किं त्वं निगूहसे (शा.प.३५१०) | २९३।३ |
| काव्यास्याक्षरमैत्रीभा | ३१।२४ | किं क्रूर स्त्री (वृ चा २.६६) | १७१।७२१ | किं त्वा भणामि विच्छे | ३०५।२ |
| काव्यास्याग्रफलस्यापि | ३०।८ | किं कापि प्रल (शा प ८२७) | २२४।१०१ | किं दूरेण पयो (शा प ८७२) | २२७।१७७ |
| काव्यामृतं दुर्जनराहु (सु १७२) | ४०।४० | किं खलु रत्नैरेतै किं | २१६।८ | किं देवकार्याणि(विक्रम ११९) | ३८६।३७३ |
| काव्ये भव्यतमेऽपि विज्ञ(पदस २) | ४१।७० | किं गजेन | ३८४।२७३ | किं दोर्भ्यां किमु (शा प.१२८) | २०।७० |
| का शंभुकान्ता किमु | १९७।१७ | किं गतेन यदि सा (सु.१७४८) | ३४४।८३ | किं धनेन कुबेर | १६०।३१५ |
| काशा धीरानि (शा प ३९०६) | ३४४।११ | किं गोत्रं किमु जीवन | ६।७९ | किं न द्रुमा (नैषध ११ १२५) | २२७।३३ |
| का शृङ्गारकथा (हनु ६ ४१) | १२०।१५१ | किं चन्दनै (शृङ्गारति २ २) | ३८४।२७४ | किं न पश्यति महे | २२३।६६ |
| का शैलपुत्री किमु | १९७।१९ | किं चन्द्रमाः प्रत्यु | ४९।१८६ | किं नर्भेदाया मम | २६५।२७२ |
| काश्मर्या कृतमाल | ३३७।४९ | किं चान्यै सुकुला (हि.२.९३) | ६६।१४ | किं नु ध्वान्त(सूक्ति ७२ २५) | २०३।१३५ |
| काश्मीरगौरव (शा.प ३६०९) | २९७।२३ | किं चारुचारित्रविला | ३३।३३ | किं नु मे स्या (भोज.२३) | १६१।३५७ |
| काश्मीरद्रवगौरि | ३१४।७७ | किंचित्कम्पितपा (शा प ३५३०) | ३०५।३ | किं पद्मस्य रुचिं न (कुव २०) | ३१४।७३ |
| काश्मीरेण दिहा | ३०४।१६४ | किंचित्कुञ्चितहारयष्टि | २७३।६ | किं पुष्पे किं (शा प १०४९) | २४२।१७४ |
| का श्लाघ्या गुणि | १७९।१०२१ | किंचित्कोपफला (हनु १४ ८७) | ३६५।६ | किं पृष्टेन द्रुत (शा.प.२४९३) | २८९।४९ |
| काष्ठानुषङ्गात्परिव | ११४।१७ | किं चित्रे भुवनानि | १३६।५० | किं पौरुषं रक्षति (भोज.१५३) | १७२।८३० |
| का सबुद्धि सुभ | २०३।१०१ | किं चित्रे यदि (सु १५३७) | १७९।१०२९ | किं बान्धवेन रवि | २४४।२३१ |
| कासारेषु सरित्सु (चा त ४) | १८४।७९ | किंचित्सविभ्रमोदधि | २५८।५५ | किं ब्रूमो हरिं (शा प.४०२५) | ३६३।२२ |
| कासि त्वं वद चौ | २३१।४७ | किंचिदाश्रयसंयोगाद्व | ८६।२ | किं भक्तेनास (हि २.७६) | १४५।१४० |
| किं कण्ठे शिथि (वेणी २ ९) | ३०७।५७ | किंचिद्विश्लथकेशवा | ३२५।६३ | किं भूमौ परि (शा.प ३६०६) | २९७।३१ |
| किं कंदर्प करं (शा प ४०९६) | ३६९।७४ | किंचिन्निर्मुच्यमाने गगन (सु.४५) | १६।४१ | किं भूषणं (सा द.१०.८२) | १७६।९४८ |
| किं कन्दा कन्दरे (भर्तृ ३ २६) | ९७।१४ | किंचिन्मुद्रित (अमरु.११८) | ३४२।६३ | किं भूषणं सुन्दर | १९७।२६ |
| किं करिष्यति (चा नी २.१०) | ३९४।६९३ | किं चैतद्गुरुसेवने कि | ३१७।६ | किं मधुना कि वि | ४८।१३५ |
| किं करिष्यन्ति (सु २७९०) | १६२।४२६ | किं छत्रं कि तु र (सूक्ति २ ८५) | २७।१५ | किं मध्याह्नेदिवाक | ११५।५० |
| किं करोति नरः प्रा (शा प.४५२) | ९०।६ | किं जन्मना च मह | ५०।२०२ | किं मालतीकुसु (शा.प.१००६) | २३९।८६ |
| किं करोति (विक्रम १२ २६४) | ९१।३१ | किञ्जल्कराजिरिव नील | १८।७ | किं मुग्धमासनम | ३०६।२६ |
| किं करोमि क गच्छा | ६६।१२ | किं जातैर्बहुभि पुत्रै (शुक.२२) | ९०।१० | किं मुञ्चन्ति पयो | १९९।२६ |
| किं कवेस्तस्य काव्येन (शा प १५९) | ३७।६ | किं जातोऽसि (भट्ट.३८) | २३६।१८ | किं मृष्ट सुतवचनं | ८९।९ |
| किं कवेस्तस्य काव्येन (सु.१३४) | ३७।५ | किं जीवितेन | ३८५।३१४ | किं मे सद्गुरुसेवनै. | २८०।९५ |
| किं कारणं सुकवि | १०५।१३८ | किं तया क्रियते (हनु १३ १५) | ९०।२ | किं युक्तं बत माम | २५।८८ |
| किं किं वक्त्रमुपेत्य | ३०९।८ | किं तया क्रि (शा प प २.१४१) | ६९।२२ | किं रुद्ध प्रि (शृङ्गारति.१.७५) | २८९।८४ |
| किं कि सिंहस्वतः किं | १९।५५ | किं तारुण्यत (सा.द १०.३६) | २७२।७३ | किं रे विधो मृगदृ | २८२।१४६ |
| किं कुप्यसि क (भोज ६९) | २४४।२१५ | किं तावत्सरसि (शिशु ८.२९) | ३३९।१०१ | किं वर्ण्यता कुचद्व | १०२।२० |
| किं कुर्वन्त्युपसि | १९७।३६ | किं तिष्ठामि किमु | २८१।१०० | किं वाच्यं सूर्यशशि | ६६।१५ |
| किं कुलेन विशालिन | ३८।३ | किं तीर्थे हरिणा (रसगगाधर) | १७८।१०१८ | किं वाच्यो | २१६।३१ |
| किं कुलेन वि(शा प १४८५) | ३९४।६८१ | किं तृष्णाकारि कीदृ | १९८।४३ | किं वापरेण बहुना | ८७।२८ |
| किं कुलेनोपदिष्टेन शी (मृच्छ.९ ७) | ८३।२ | किं ते धनैर्बन्धु | ३७५।२३९ | किं वाससा तत्र | १७४।८८८ |
| किं कूर्मस्य भर (भर्तृ २ ६९) | ५३।२६९ | किं ते धनै (मा १२.६५६०) | ३८६।३७६ | किं विद्यया कि | १५७।२०० |
| किं कृतेन न (शा प १२२०) | १०१।१२ | किं तेन काव्यमधुना | ३२।२ | किं विश्राम्यति (गीत.६ १२.३) | २५।१७३ |
| किं केकीव शि (शा.प ८८७) | २२८।२२३ | किं तेन किल (शा प.१५१) | ३२।१ | किं वीरूधो भुवि | २४३।१९८ |
| किं केतकीपरिमलो | २२३।४८ | किं तेन जातु जाते (पच १.२७) | ९०।१ | किं वृत्तान्ते परगृ (रसगंगाधर) | १३६।३३ |
| किं ते नम्रतया (नीतिप्र.९) | २३८।७७ | किं शीकरैः कृ (अ शा.२.१८) | ३०५।२३ |
२२ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| किं शीतांशुम (प्रं.राघव ३ २३) १३६।४५ | किरति मिहिरे वि ३३६।४० | कुञ्चिताधरपुटेन पूर २२१।१२१ |
| किंशुककलिका (शां.प ३७९४) ३३१।११ | किसलयमिव मुग्ध(उत्तर ३ ५) २७५।२४ | कुटिला लक्ष्मीर्यत्र प्रभ ६२।१० |
| किंशुक किं शु २४२।१६७ | किसलयानि कुत (भोज.२०६) २१२।३४ | कुटुम्बचिन्ताकुलि ३६७।२५ |
| किंशुकक्षितिरुहा ३३२।७२ | कीटगृहं कुटि (शा प १११५) ०१८।७६ | कुठत्वमायाति गुण. (सूक्ति. १) ३३१२१ |
| किंशुके किं शुक (शा प.१३७०) ७१।१२ | कीटोऽपि सुमन (हि प्र ४६) ८६।११ | कुत कुवलयं कर्णे (कुव १) ३१२।५ |
| किंशुके शुक मा २२७।१८२ | कीटैकिं स्यान्न मत्स्या १९८।७ | कुत प्रेमलवोऽप्य २७७।१७ |
| किं स्याद्राखान् २७।२०९ | कीदृक्तोय दुस्तर २०१।७० | कुत सेवाविही (हि २ २९) १४९।२७६ |
| किं स्याद्विशेषानि २००।४८ | कीदृक्प्रतार्दींपर्वतं २०१।७१ | कुत आगल घटते ६४।५ |
| किं स्वप्न किमु २८७।१० | कीदृक्षं समिति बल २०१-६ | कुत्र विधेयो यत्नो १७०।७६४ |
| किं हारै किमु क (राजेन्द्र ७४) २९।२० | कीदृक्ष सक्लजनो २०१।७४ | कुत्र विधेयो वास १७०।७६५ |
| कितव प्रपञ्चिता सा २८८।१८ | कीदृक्षा गिरिशतनु १९७।२७ | कुत्र श्री स्थिरता २०४।११४ |
| कितवा यं प्र (शा प १३३३) १४५।१३४ | कीदृक्सेना भवति र २०१।७२ | कुत्रायासी किमिद ३५४।८० |
| किमकरवमहं हरि २०१।६७ | कीदृग्गृहं याम्यगृहं २००।५० | कुत्रायोध्या क रा (हनु ६ ३७) १५।१३१ |
| किमकारि न कार्पण्यं ९६।२ | कीदृग्वन स्यान्न भ २००।५१ | कुत्रोदयोदयाचलस्य १९८।३८ |
| किमकारि मन्दमति २९१।६ | कीदृग्दत्तमत्तंगज १९७।३५ | कुदेश च कुत्र (चा नी ३०) १६१।३७७ |
| किमञ्जारवद्रां खुरै १२४।६ | कीदृश वद महन्थ २००।५४ | कुदेशमासाद्य (चा नी.९५) १७५।९१५ |
| किमत्र चित्रं यदि (विक्रम १३८) ४५।३४ | कीदृश हृदयहारि २०१।५६ | कुप्तेनसुप्रीनयनाश्र १९०।७४ |
| किमधिकमस्य (सां.द.१०.७२) २१६।१० | कीदृशी निरयभूरने २०१।५७ | कुन्दकुसुममुं पश्य १८७।१६ |
| किमनन्ततया ख्यातं १९९।२६ | कीर नीरसकरीरण २२७।१८५ | कुन्दकुड्मलमुपास्य २२३।७० |
| किमपि कान्तभु (शा प ३७४९) ३२८।९ | कीर्णा रेजे सा(शिशु.१८.७९) ३०१।१०८ | कुन्द दन्तैर्मुख निग २७९।६६ |
| किमपि किमपि(मालती.८.१३) ३०६।३१ | कीर्ति प्रवरसेनस्य (सूक्ति ४ ६२) ३५।२४ | कुन्दे कदम्बे कुमु २३९।१०३ |
| किमपेक्ष्य फलं (किरात २ २१) ४८।१५१ | कीर्ति श्रीनरसिंह १९६।५४ | कुपात्रदानाच्च भ १७३।८५० |
| किमप्यसा (शा प १४००) १४२।१७० | कीर्ति श्रीरघुवंश १९९।१,४ | कुपितापि मनः पति ३३३।८३ |
| किमप्यस्ति स्व (हि २ ५३) १६३।४७७ | कीर्ति श्रीरघुवंश रत्न १९९।२९ | कुपितासि यदा (सा.द १० ६४) ३००।२ |
| किमलम्बताम्ब (शिशु ९.२०) २९७।१६ | कीर्ति स्वर्गतरङ्गिणी १३९।८ | कुपुत्रे ना (भा १२ ५२२७) ३९३।६३७ |
| किमव्यतयता ख्यात १९९।२१ | कीर्ति स्वर्गतरङ्गिणी (पद्यस ४) ११४।१४ | कुप्यताशुभच (किरात ९ ५३) ३१५।४५ |
| किमशक्यं बु(पञ्चत १ १९३) २८३।२५५ | कीर्तिस्तव क्षितिप ५३।५२१ | कुप्यल्लोकेशबाहुप्रक ३२६।३४ |
| किमसि विमला (शा प १९५४) २२०।५ | कीर्तिस्ते दयिता १२२।१८३ | कुप्वोः क्रप्वौ च शेषो ४२।३ |
| किमस्ति यमुनानद्या २००।३९ | कीति मृणालकम १७६।९६१ | कुबेरगुप्ता दिशमुष्ण ३३१।२२ |
| किमस्य रोम्णा क (नैषध १ २१) २५२।२ | कीर्तिर्नृत्यति नर्तकीव ८७।३५ | कुब्जस्य कीटखातस्य (सु ३१६६)६६।२३ |
| किमहं वदामि खल (रसगगाधर) २४८।७७ | कीतौ व्याप्तिमवेल्य १९९।१३० | कुभार्या च (भा १२ ५२२६) ३९४।६८० |
| किमान्द्यत्वगुरुत्वा (शा प ४७९) ८१।७ | कीर्त्यास्य चन्द्रकरको १३९।५ | कुभोज्येन दिनं (शा प १४९२) १५४।५८ |
| किमाराध्यं (सा द १० ८१) १६८।६६४ | कीलालै कुङ्कुमाना(सुधा ल ८) ३२८।२५ | कुमारसंभवं दृष्ट्वा १८८।३२ |
| किमासेव्यं (का प्र १०.५२१) १७७।९८४ | कुक्कुटे कुर्वति क्राण ३२३।२ | कुमुदकमनी (का प्र १० ४६१) ३१३।४६ |
| किमिच्छति नर २००।३५ | कुक्षे पूल्यै यवनवित ९९।१६ | कुमुदवनमप (शिशु ११ ६४) ३२३।३२ |
| किमिति कृशासि कृ (रसगगाधर) ३५४।७१ | कुग्रामवास कुल (पद्यस १०) १७३।८७६ | कुमुदशबलै (शा प ९५१) २३४।१३० |
| किमिति सखे परदेशे ३३०।१ | कुङ्कुमपङ्केनाङ्कित (भर्तृ स ११७) २५३।१३ | कुमुदान्येव श(अ शा ५ २८) ३९३।६३४ |
| किमिन्दु किं पद्म २५४।३७ | कुचफलश्लेषव्वलाना (रसगगाधर) १३५।८ | कुमुदेष्वधिक भा (शा प ३६४३) २९७।२ |
| किमिवाखिल (शिशु १६ ३१) ४९।१५४ | कुचकुम्भौ स (शा प ३३५१) २६७।३२५ | कुम्भ परिमितमम्भ ९०।११ |
| किमिष्टमन्न खरसू १७३।८६१ | कुचदुर्गराजधान्यो २६७।३४६ | कुम्भो सदम्भो २६४।२५९ |
| किमिह बहुभिरु (सु ३४५३) २५२।५२ | कुचद्वये चकोराक्षी २६४।२५५ | कुरङ्गा. कल्या (शान्ति.२.१८) ३६८।४९ |
| किमुत्तीर्णा पन्था ३५६।२५ | कुचाभ्या भाखन्ती २५४।३५ | कुरङ्गाक्ष्या वेणी सुभ १२४।८ |
| कियती पञ्चसहस्त्री ७०।२३ | कुचावस्या काम २६५।२९१ | कुरङ्गीणा यूथं नि २३०।३४ |
| कियन्मात्रं जलं वि (भोज.१८५) २०५।२ | कुचेलिनं (चा नी १५ ४) ३८५।३१९ | कुरङ्गीवाङ्गानि स्ति(सूक्ति ५१.१५) ३१०।३ |
| किरति प्रकरं गवा २१०।१४ | कुचौ तु परिचर्चि ३७८।२१६ |
संस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः २३
| कुरबक कुचा (शा प १०९९) १३२।१७ | कूजितानि कलयन्व ३३२।७४ | कृतोपकार प्रियब (सु १९००) २९३।८ |
| कुह गम्भीराशयता (सूक्ति ३० १) २१८.४ | कूटसाक्षी मृषावा (शा प ७०७) १५४।४९ | कृत्यं किमस्य ३८४।३०५ |
| कुर्मे किल्विष (रागत ४ ६२६) ३९३।६६३ | कूपाम्भासि पिबन्तु २१४।७३ | कृत्वा कार्णाटक्रान्ता ३२६।३५ |
| कुर्यान्न परदारेच्छा १५४।६३ | कूपे पानमथोसु (शा प ८५९) २१३।६३ | कृत्वा दीनेनि (सा द ३ १८४) ३६९।८७ |
| कुर्यान्नीचजना (शा प १५१४) १५७।६९ | कूपोदकं वटच्छा (चा नी ९६) १६२।४२१ | कृत्वापि कोशपान (सु ७०५) २२२।५१ |
| कुर्वेड्योत्लावि (शिशु १८ ४४) १३०।८० | कूर्म पातालगङ्गाप (भोज २२७) ११७।९८ | कृत्वापि येन लज्जा (सु ४०१) ५८।१८५ |
| कुर्वता मुकुलि (शिशु १० ३०) ३१५।३३ | कूर्म पादो (सूक्ति ९७ ४७) १२२।१६२ | कृत्वा प्रवृद्ध (प्र राघव २ ३०) २०५।५१ |
| कुर्वते स्वमुखेनैव बहु ५५।५५ | कूर्मो मूलवदालवालव (हनु ६ ३) २१।८५ | कृत्वा मेरमुलूख (हनु १४ ८५) १३६।५२ |
| कुर्वन्ति तावत्प्र (पञ्च १ २५७) ३४९।६८ | कूष्माण्डीफलव २४०।१२६ | कृत्वा विग्रहशत्रु (सु २१९०) ३११।२३ |
| कुर्वन्तु नाम (सूक्ति ३३ ३७) २४१।१४४ | कृच्छ्रानुवृत्तयोऽपि ७६।२ | कृत्वा शस्त्रवि (शान्ति १ १०) ३७५।२२८ |
| कुर्वन्नपि व्यलीका (हि २ १३२) १६४।४८५ | कृच्छ्रेण कापि (सूक्ति ४९ २५) २७३।८ | कृत्वोपकार यस्तस्मा (सु ७७७) ७१।३० |
| कुर्वेनानुमपुष्टे सुख ३२५।६७ | कृच्छ्रेणामेव्यमध्ये (भर्तृ ३ ३८) ८९।६ | कृपण स्ववधूमग्न ७१।१६ |
| कुल वृत्त च (काम नी ५ ६०) ३८४।२८६ | कृत च गर्वाभिमु १०५।११२ | कृपणसमृद्धीनामपि (सु ४८४) ७२।३६ |
| कुलगुरुरबलाना (शा प ३०७७) २५०।१६ | कृत पुरुषशब्दे (किरात. १८ ७२) ७७।३ | कृपणेन शवेनेव (शा प ३८८) ७१।८ |
| कुलपतनं जनगर्हा (पञ्च १ १८७) ३५२।९ | कृत वपुषि भूषण (कुव ५२) ३५९।९० | कृपणेन समो दाता (कविता २९) ७१।१ |
| कुलशीलगुणो (चा नी १०२) १४२।१९ | कृतककृतकैर्मायाशा (सु १६८८) १०९।५ | कृपाणकिरणानलं १३१।११२ |
| कुलशैलदल पूर्णसुवर्ण (सु १३) १७।२ | कृतकान्तकेलिकुतुक १७।३ | कृपाणीय काण १२४।९ |
| कुलाचला यस्य महीं २०।६९ | कृतकृत्यस्य नृत्य (हि ४ ११) १४८।२४६ | कृमयो भस्म (शा प ४१४१) ३७१।११६ |
| कुलीना रूपवत्यश्च ३४९।४२ | कृतकोवे यस्मिन्भ्रमर २१।९५ | कृमिकुलचित्तं (भर्तृ २ ९) १७७।९९७ |
| कुलीने सह सप (चा नी ५८) १६२।३८९ | कृतघ्नस्य शिशुघ्न (सु २९८९) १६५।५५९ | कृमिभिः क्षत ३७२।१३८ |
| कुले कलङ्क कत्र १७५।२२३ | कृतचङ्क्रमणे गणेपु ८९।११ | कृश काण (सु ३३९०) ३७१।१३२ |
| कुलोद्भूत (काम नी १० ३८) ३८७।३९९ | कृतदुरितनिराकरण ४२।३ | कृशा केनासि त्वं (सु १३२६) ३०५।१ |
| कुल्याम्भोभि पवनच १४१।५ | कृतवलिभ्रमे (शिशु ११ १४) ३२३।२८ | कृशाङ्ग्या कुच २६४।२४१ |
| कुविन्दस्त्वं ताव (क प्र ७ १७३) १३५।३० | कृतनिश्चयिनो (पञ्च १ १८७) १६५।५२२ | कृशासीत्यालीना (सु १३२५) ३०५।२ |
| कुशल तस्या जीवति (कुव १४९) २८८।२० | कृतमद निगद (शिशु ६ ५०) ३४५।३८ | कृषिका रूप ३८६।३८२ |
| कुशला शब्दवार्ताया ९८।५ | कृतमनुमत दृ (नधी ३ २४) ३६६।८ | कृष्टा केशेषु (वेणी ५ ३०) ३६१।५१ |
| कुसुम कार्मुकका २३२।६७ | कृतमन्दपदन्न्यासा ३०।१६ | कृष्ण वपुर्वह्रतु (सु ७६६) २२८।२१३ |
| कुसुम कोशा (शा प ११३५) २४३।२११ | कृतमपि महोपकार (रसगङ्गाधर) ५६।११८ | कृष्णत्वं (शा प १२३९) १०८।१९९ |
| कुसुम पतदेत्य ना २०१।६३ | कृतवानन (किरात १० २६) १६१।३६९ | कृष्णं त्वं नव (शा प १३०) २३१।४९ |
| कुसुमजन्म ततो ३३१।३६ | कृतविद्योऽपि (काम नी ४ ४६) २८७।४२५ | कृष्णं त्वं (बिल्वमङ्गल) २३१।४८ |
| कुसुमनगवना (किरात १० ३१) ३३२।३६ | कृतवैरे न विश्वास ३८७।४१९ | कृष्णमुखी न १८४।२५ |
| कुसुमपरिमलेनामो ३२६।१९ | कृतशतमसत्सु (हि २ १६६) १७०।७७३ | कृष्णवर्णहृदयं ३०४।१४४ |
| कुसुममेव न केवल ३३२।४१ | कृतस्य करणं (नीतिसार १८) १६०।३०० | कृष्णवर्त्मनि गुणा ९५।१२ |
| कुसुमयनफलिनीर २४७।७ | कृतान्तपाशव (पञ्च २ ७) १५७।१९१ | कृष्णश्टिङ्गवकनीनिके ३१०।५ |
| कुसुमशयन न प्रत्य २७९।७२ | कृतान्तस्य दूती जरा ९५।१३ | कृष्णा ते कच २९१।७ |
| कुसुमशयनेऽप्य (शा प ३४७६) २८९।६३ | कृतापचारोऽपि (शिशु २ ८४) १४७।१८६ | कृष्णांर्जुनातुर (शा प ३६५५) ३१२।२ |
| कुसुमशरविलास भङ्गु ५।४१ | कृतार्थं स्वामि (वृ चा २ ३६) १५६।१४० | कृष्णेनाम्ब गतेन (औचित्य १६) २४।१६४ |
| कुसुमसुकुमार (शा प ३७९७) ३३३।१०२ | कृतावधान जि (किरात ४ ३३) ३४४।२५ | कृष्णो गोरसचौर्य २३१।४५ |
| कुसुमस्तवकस्येव द्वयी (हि १ १३२) ७९।४ | कृतिनामकृती कथं १७५।२३० | केका कर्णा (शा प ८२८) २२७।१७८ |
| कुसुमस्तवकान् (शा प १००९) २३८।७९ | कृतिनोऽपि प्रती (कविता ३४) ३८६।२७२ | केकाभि कल ३०९।१६ |
| कुसुमादपि स्मितह २८८।३१ | कृते च रेणुका कृत्या ९८।७ | केविचित्तस्य २६०।११७ |
| कुसुमायुधकोदण्डे २६४।२३० | कृतेऽप्याज्ञाभङ्गे कथ ३०६।४६ | केचिदज्ञानतो (सु २७८४) १५३।१४ |
| कुसुमितलता (का प्र १० ४७३) २७५।१३ | कृते प्रतिकृतिं (पञ्च ५ ८०) १६५।५४६ | केचिद्भग्ना १२८।३३ |
| कुस्थानस्य प्रवेशेव गुग् ८६।३ | कृतो दूरादेव स्मि (अमरु १४) ३०६।४१ | केचिद्बद्धा १९३।२८८ |
| कूजन्ति कोकिला (सु. १६८६) १९६।१५ | केचिद्दन्दन्ति ३७५।२४२ | |
| केचिल्लोचन २३७।५३ |
२४ | सुभाषीतरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| केतकीकुसुमं भृङ्ग (सु ७२४) ८१।८ | कैलासीयेति १३७।७० | कोल केलिमलं २३०।३६ |
| केतक्य कटु २२४।१११ | कैलासीयेति कैरवी १३६।५३ | कोलाकृतिरपा १८८।३५ |
| केदारभाजा (नैषध ७ ३५) २५९।८८ | कैवर्तकर्कशकर ९२।७५ | को लानो १८०।१०४५ |
| केदारे कीटशो २००।४१ | कोक स्तोक ३२०।५० | कोलाहले काककुलस्य ८६।४ |
| केनचिन्मधुर (शिशु १० ५४) ३१७।१६ | कोकानाकुलयं ३०२।१०७ | को वीरस्य मन (हि १ १७५) ७८।११ |
| केनाजितानि नय ५०।१९९ | कोकानुद्ग्रीवयन्तः ३२५।६८ | कोशमूलो हि(का नी १३ ३३)३९४।७०३ |
| केनात्र चम्प (शा प १००३) २३८।६७ | कोकिल कल (शा प ८४१) २२५।१२५ | कोशद्वद्धमियं (कुव. ६७) ३९३।६४२ |
| केनादिष्टौ कमल ५५।२३० | कोकिलश्रूतशि (सु १६४३) ३८४।२७८ | कोषः स्फीत (सु १५२३) २६३।२०२ |
| केनाप्यर्थं (शान्ति २ २) ३७५।२४४ | कोकिलाना (चा नी ३.९) १६३।३८० | कोऽहं कौ (शा प १४०४) १५३।४२३ |
| के नाम न विन (पच ४ ५४) ३४९।२६ | कोकिलो (सा द १० ५९) २२५।१२२ | कोऽहं ब्रूहि (महा ना २) ३६२।३५ |
| केनासीन (शा प १११०) २१८।७० | कोटरान्त स्थितो(सु. १६९७) ९०।४ | को हि तुला (शा प ११९६) २४८।७१ |
| केऽपि स्वभाव ७२।३९ | कोदिद्वयस्य २४८।७५ | कौटिल्यं कच(का.प्र १०.५२३)३१२।२४ |
| के प्रवीणा १९९।१८ | कोऽतिभार (चा नी ७३) १६३।४०४ | कौन्तेयस्य सहा २३१।४२ |
| के भूषयन्ति १९७।१९ | कोऽत्र भूमि (सा द.१० ५१) २९४।२१ | कौप वारि (शा प ९३३) २३२।८८ |
| केयं भाग्यवती २४१।६० | कोऽत्रेत्यह (का नी २२) १४५।१३७ | कौपीनं धृतवान्ह ९८।३ |
| केयं मूर्त्यन्धकारे (सूक्ति ९९ २) ८१।०४ | कोदण्डं न १०८।२०९ | कौपीन शत ३७१।१११ |
| केयं श्यामोपल (प्र.राघव.२ ७) २७३।१९ | कोदण्डस्तव १०८।२०६ | कौपे पयसि (शा प ९३२) २३१।६१ |
| केयूरं न करे २५८।५१ | कोदण्डो २९०।७८ | कौमुदीव तुहिना (कुव ९१) ११५।४३ |
| केयूरा न विभूष (भर्तृ २ १६) ८५।१४ | को दुःखी सर्व १९९।१४ | कौर्म संकोच (हि ३ ४८) १५०।३१६ |
| केयूरीकृतकङ्कणीकृत(सूक्ति ५४.१०)७।८२ | को दुराव्यस्य १९८।२ | कौ विख्याता १९९।२२ |
| केलिः प्रदहति (पच १ १८६) ३५२।१४ | को देश कानि ३६।१७ | कौ शंकरस्य वल २०२।८८ |
| केलिं कुरुष्व परि (सु ६२३) २३१।६८ | को वन्द्यो (हि प्र २१) ९०।५ | कौशेयं कृमिजं (पच १ १०३) ८२।४८ |
| केलिचलाङ्गुलिल १४।१० | को धर्मो (हि २ १४९) १७०।७६९ | कौस्तुभमुरसि (शा प १२०३) २४८।८७ |
| केलीकौतुक २५६।५४ | को नयति जग २००।४७ | क्रतौ विवाहे (हि ३ १२४) १५२।३९९ |
| केवल व्यमन(पच २ १५५) १६५।५३९ | को न याति (भर्तृ २.१०५) १५६।५५६ | क्रमसरलित २७९।६० |
| के वा न सन्ति (चात ३) ३८५।३३७ | को नाम नानुवर्तेत ६५।७ | क्रमोद्गता (नैषध ७ ९७) २६९।४०२ |
| केश. काश (सा द १० ५) ३७१।१२७ | को निर्दग्धत्रिपुर ९९।३३ | क्रयविक्रय (शा प ४०३५) ३६४।२१ |
| केशः कुन्द ३५५।१० | कोऽन्धो योऽ १७०।७६३ | क्रव्यात्पूगे (शिशु १८ ७८) ५३०।१०७ |
| केशालुञ्चनसाम्ये ३६४।६ | कोप चम्पक २३८।७० | क्रान्तकान्तवदन (शिशु १० ३) ३१४।६ |
| केशव पतितं (शा प ५२७) १८६।१ | कोऽपवाद (किरात ११ २५)१६१।३६८ | क्रामन्त्य अत्त (ध्वन्या ३) १३२।२९ |
| केशाः सयमिन (भर्तृ १ १२) ३१४।६९ | कोपप्रसाद (पच.१ ३७) १४८।२४७ | क्रियते धवल (शिशु १६ ४६)१७५।९२९ |
| केशानाकुलय (सु १८४८) ३४८।१८ | कोपवलयुन (शिशु १० ३९) ३१५।३२ | क्रीडन्मन्दरकन्दरो ७।८६ |
| केशान्धकारा (नैषध ७ २३) २५८।४० | कोपस्त्वया (अमरु.११३) ३१३।५१ | क्रीडन्माणव (प्र.राघव ७ ८०) १४२।१३ |
| केशान्बामकरा २५८।३७ | कोपात्किंचिदु (शृङ्गारति १ २७) ३१०।५ | क्रीडाकारि तडाग २३१।२९१ |
| केशौ कोमल (शा प ३४५८) २७७।५६ | कोपातकोमललोल (अमरु ९) ३१०।८ | क्रीडामिन्नहिरण्य ९६।११ |
| केषांचिद्वदला २३५।१४७ | कोपो यत्र भुकुटि (अमरु. ३८) ३०९।६ | क्रीडासु च (शा प १५६८) १४३।४१ |
| केषांचिद्रावि शुक (सु १४३) ३९।२२ | कोऽध्यन्य (शा प १२२२) १०२।१४ | क्रुद्धस्य दन्तिन १२८।१६ |
| केषांचिन्निजवेश्म ९५।१२६ | कोऽप्येष (शा प ३९७६) ३६०।२४ | क्रुद्धोलूकनखप्र (सु ७१७) २२२।३९ |
| केसरदुमतलेषु २०१।५८ | को मायति मक्र २००।४५ | क्रुद्धार स्मर (का प्र.७.२२५) २६।२०२ |
| के स्थिरा. के १९८।९ | को मोहाय २०३।१०६ | क्रोडं तातस्य ३।३१ |
| कैलासस्य प्रथ (का प्र ५.१०१७) १३६।३४ | कोऽयं कोप ३०७।५३ | क्रोधैर्हृदैष्टिपातै ८।१०२ |
| कैलासाद्रावुदस्ते ७।१०१ | कोऽयं द्वारि हरि. (सु १०४) २४१।५६ | क्रोधो मूलम् (वृ.चा २ १३) १६०।३१३ |
| कैलासायितमद्रि (सु २००२) २०६।९६ | कोऽयं भ्रान्ति (मङ्कट ९९) २१५।१३ | क्रोधो हि शत्रुः १७३।८८० |
| कैलासालयभाल (का प्र ४.६४) १२।३९ | कोऽर्थान्निद्रा (पच १ १५७) १७८।१०११ | क्रोशान्त. शिशाव ८९।३ |
सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः २५
| क्रौञ्च क्रीडतु (शा प ११२७) २९९।८ | क्षणमयमपुवि (शिशु ११ ४८) ३२७।१७ | क्षुद्राः सन्त्रास (सु २२८३) ३६१।४९ |
| केशत्यागकृते ३७६।२५६ | क्षणाहप्रबोवमायाति ९।५२ | क्षुद्रो द्रवैस्य कटुना ५७।१४९ |
| क गन्तासि भ्रा (शान्तिश १ १७)७४।३४ | क्षतातकिल (रघु २ ५३) १५१।३७७ | क्षुद्रोऽपि तनुते तात ८७।१८ |
| क च ननु जनका ९२।६४ | क्षते प्रहारा (पञ्च ४ ६३) १७३।८४४ | क्षुम्पत्प्रत्यर्थिनृपुथ्वी १२२।१६९ |
| क्वचिच्चारुचा १०१।१२ | क्षत्रियस्यो (सूक्ति ९० ३७) १५०।३२१ | क्षेत्रग्राम (प्र ३५) ३७९।८२ |
| क्वचिज्झिल्ल्रीनाद (सु ७२३) २२५।१४० | क्षन्तव्यो मन्द १६६।५६६ | क्षोणी क सहते २०४।१२० |
| क्वचित्कन्था (शा प ४०९८) ३६८।३९ | क्षपा क्षामी (सूक्ति ६१ १८) ३४१।५५ | क्षोणीकाम निजा ११५।३६ |
| क्वचित्कार्यञ्चाञ्ची ५५।७२ | क्षमातुल्यं तपो १६६।६०० | क्षोणीक्राम निजाम् ११५।३७ |
| क्वचित्कृष्णार्जुन २६०।९८ | क्षमा बलमशक्ताना (वृ चा १३ २२)८२।३ | क्षोणी यस्य हिरण्मयी २१५।४ |
| क्वचित्क्वचिदयं २२३।४४ | क्षमा क्षत्रौ च (हि २ १८०) १६४।४९५ | क्षोणीपर्यटनं ३७५।२२९ |
| क्वचित्ताम्बू (अमरु १०७) ३२८।१४ | क्षमाशास्त्रं करे यस्य (वृ चा ३ ३०)८३।१ | क्षोणीपाल त्वदरि १३२।२५ |
| क्वचित्पाणिप्राप्तं ९३।८७ | क्षययुक्तमपि (किरात ० ११) १५१।३८९ | क्षोणीगाश्रयि(भर्तृ स ४७०)१८०।१०४९ |
| क्वचित्पोषोऽपि मित्र ५४।९ | क्षान्त न (भर्तृ स २३६) ३७४।२१९ | क्षोमं वत्ते (शा प ३२८३) २५६।४० |
| क्वचित्पुत्रभ्रष्टै (भर्तृ म ८९) २५३।२९ | क्षान्तिश्चेद (भर्तृ २ १८) १७८।१०१९ | क्ष्वेदाभि क(महावीर ६ ७७) १३१।१९९ |
| क्वचिद्भूमौ शय्या (सु २९४०) ८०।३५ | क्षामक्षामकपोल २७७।५९ | क्ष्वेलातर्जितसिंह १४१।४ |
| क्वचिद्दुष्ट क्वचि (नीतिसार ९) १५७।१७४ | क्षाम गात्रमतीव २८६।२७ | ख |
| क्वचिद्दिद्रोही (भर्तृ २.५१) ८९।५ | क्षार जलं वारि ४९।१७५ | खचितमपि मायावी (सु ३३८) ५६।८४ |
| क्वचिल्लसद्ग (शिशु १७ ५६) १२७।५ | क्षार वारि न २३५।१ | खड्गा नितान्त (सु २३५६) ३६४।४२ |
| क तिष्ठतस्ते पितरौ ४।३० | क्षारो वारिनिधि ५३।२६५ | खड्गनिर्लूनम् (कुमार १६ २६) १२८।११ |
| क दोषोऽत्र मया (सु १४१) ३९।२० | क्षितिप किमपि १३९।६ | खड्गमूलं भवेद्राज्य १५९।२८४ |
| क नु कुलमकलङ्क (भोज ३०४) ९२।६५ | क्षिपसि (सा द १० ५१) ३७३।१७१ | खड्गवारि भवत १२४।२ |
| क पिशुनस्य गति (सु ४३२) ५९।२१९ | क्षिपेदाक्य (शा प १५१२) १५४।६७ | खड्गहस्तोऽरिमा २०८।३४ |
| क प्रस्थितासि (अमरु ७१) २९८।१४ | क्षितो हस्तावलम्ब (अमरु २) ८।१०९ | खड्गा शोणितस (कुमार १६ १५) १२७।७ |
| क यासि (शा प ७४) २३।३४० | क्षिप्रमायमना (हि.२ ९५) १६६।१४४ | खड्गा रुधिरसलिता(कुमार १६ ७) १२७।५ |
| क रुजा हृदय २८२।१२७ | क्षीण क्षीण समी (सु ५४६) २०९।५ | खड्गालक्ष्मीस्तथा (नकुल) १४३।५८ |
| क वन तरु (सा द १० ७०) ९२।६६ | क्षीण (सु १६११) ३०५।११ | खड्गास्तिष्ठन्तु (सु ०२५२) ३६०।४ |
| क वसति लघु १९७।३२ | क्षीणयाव (किरात ९ ६२) ३१६।५४ | खङ्गेन शितधारेण १२८।२२ |
| क वाम्भोद्यौ २१८।७९ | क्षीणांशु (शा प ३७१४) ३०७।५६ | खङ्गेनामूलतो (कुमार १६ ३९) १२८।१७ |
| क स दशरथ (पञ्च ३ २५३)३८४।२७९ | क्षीणो रवि (पञ्च ५ ९०) ३९४।६७९ | खण्डितानेत्ररुञ्जालि २७।१ |
| क्वाकार्यं (विक्रमोर्व ४ ३४) २८१।११३ | क्षीबतासुप (शिशु २० ३४) ३१५।३७ | खद्योतास्तरला भवन्ति २४५।२४१ |
| क्वापि गत २२९।२३६ | क्षीरक्षालितपाश्च ११४।२१ | खद्योतो द्योतते (शा प ७३८) २०९।२ |
| केदानी दर्पितास्ते (सु ५८) १९।४० | क्षीरसागर (शा प ३५१५) २७३।२ | खनन्नाखुबिलं (पञ्च.३ १६) २२९।५ |
| केन्दोर्मण्डलमम्बुधि ८८।२ | क्षीरान्व्हेर्लहरीषु ३०२।१०१ | खर श्वानं गजं मत्तं १५५।९९ |
| कैतद्कारविन्दं ३७२।१३७ | क्षीरिण्य स (मृच्छ १० ६०)३९४।७०६ | खरनखरविमुक्ता (सु ६०५) २४८।९४ |
| कैतनमार्तण्ड ३०३।१२१ | क्षीरेणारमगतो (भर्तृ २ ६७) ८८।२० | खर्वग्रन्थिविमुक्तसंधि २०१।६२ |
| क्षणं सरलवीक्षणं २५६।३९ | क्षीरोदन्व (नैषध १२.७४) ११०।२४१ | खल करोति दुर्यु (हनु १३ ११) ५५।५४ |
| क्षणं कान्ता (सूक्ति अनु ३३) १३२।२० | क्षीरोदीयन्ति १३८।७५ | खल सज्जनकार्पास ५५।६० |
| क्षणं बालो भूत्वा (सु ३१३९) ३६८।३८ | क्षुत्क्षामा शिशव ६७।६६ | खल सर्षपमात्राणि (शा १ ३०६९) ५४।१ |
| क्षण मूच्छमिति २८९।६२ | क्षुत्क्षामाभर्कसञ्च १०१।१ | खल सत्क्रिय (शा प ३७६) ५४।२६ |
| क्षणक्षयिणि साप (सु २९९) ४६।६३ | क्षुत्क्षामोऽपि (सु ६१४) २३०।४० | खल सुजनपैशून्ये (सु ३३५) ५६।८१ |
| क्षणदासाव (का प ४.८२) १०३।७४ | क्षुत्तृडाशा कुद्र ७६।१४ | खलसख्य प्राज्ञात्तुर ४८।१३१ |
| क्षणदृष्टनष्ट (शा प ७६७) २११।१४ | क्षुद्रा सन्ति (शा प ७७३) २३०।३७ | खलाना कण्टकाना (चा नी १५.३) ५४।६ |
| क्षणमपि विरह. (शा प ३४८२) २८८।३५ | क्षुद्रा सन्ति (सु. २८५) ५२।२५७ | खलाना धनुषा (वृ चा १४ ८५) ५४।१२ |
| क्षणमप्यनु (भोज २४२) १०२।४७ | खलास्तु कुशला (रसगगाधर) ५४।३६ |
४ सुभा०अनु०
२६ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां ---|---|--- खलेन वनमत्तेन (सु ३३९) ५६।८५ | गणिकागणकौ समान ४४।२ | गन्ध सुवर्णे (चा.नी ९ ३) १७३।८५३ खलेषु मत्सु निर्याता (सु ३४५) ५६।८८ | गणेश स्तौति १६०।३०९ | गन्धमुद्धत (किरात ९ ३१) ३००।४६ खलो न साधुता याति ५४।२९ | गणेश्वरकवेर्वचोविरच ३५।८ | गन्धर्वनगरा (शा प ४१२३) ३७२।१५२ खलोल्लापा सोटा (सु ३२६१) ७७।४३ | गण्डभित्तिषु (शिशु १० ३) ३१५।३४ | गन्धवाह गहनानि २१४।६ खल्वाटो दिवसेश्व (सु ३१४१) ९४।११४ | गण्डस्थलील (आसी प्र) २।२१ | गन्धाप्यसौ (पद्म सू १९) ३८३।२६६ खाटीच्छाशिपलेह १९३।९२ | गण्डस्थले हि मद २३१।७२ | गन्वाढ्या नवमल्लि (भ्रमराष्टक २) ७५।१८ ख्याति कूर्गति(का प्र १० १०३) ३१७।३ | घण्टाभोगे विहरति(कुव १४४) ११७।४४ | गन्धैराढ्या जगति २२३।९१ खिन्नं चापि सुभाष ३९।२१ | गण्डे पाण्डौ २७६।४३ | गभीरनाभिहद (लक्ष्मीधर) २६७।३५३ खिन्नालसनयनान्त ३२१।३ | गण्डौ पाण्डिमसा १०७।१८६ | गमनमलस शून्या(मालती १ २०) २७४।४ खिन्नोऽसि मुञ्च (कुव ९०) २२१।१० | गतक्लेशायासा २०३।१०२ | गम्भीरनाभि (शा प ३३४८) २६७।३५३ खेलत्खञ्जननेत्रया २७४।३० | गतं तत्ताराध्यं तरु (भर्तृ स ४७८) ७६।४१ | गम्यतामुपगते (किरात ९ ४) २९६।४ ख्यातः शक्रो (पद्यस ६३) १८०।१०५५ | गत तद्गाम्भीर्य (सु ७०७) २२१।२५ | गम्यते यदि (चा नी ७ १७) २३०।२३ ख्यातस्त्व फलवृष्टि १८३।५१ | गत कामक (काव्या २ २४८) ३६७।१४ | गरलद्रुम कन्दमिन्दु २८४।१० ख्याता नराविपतय (सु १६०) ३३।३८ | गत कालो (शान्ति ४.१५) ३६८।५१ | गरीय सौर (सूक्ति ३३ ३३) २४०।१३३ ख्याता वय (शा प ३६९६) ३००।६८ | गत कालो (शान्ति ४ १३) ३६८।५० | गरीयस प्रचुर (शिशु १७ ५४) १२७।३ ख्यातिं गमयति (सु १५४) ३०।१५ | गतप्राया रात्रि (सु १६१२) ३०६।४२ | गर्जति वारिदपटले ३४०।१२ ख्याति यत्र गुणा (सु २८४) ५३।२७२ | गत्या पुर (शिशु ९ २) २९४।३१ | गर्जद्भीमभुजङ्गभीषण ७।८७ ग | गतवति दिननाथे २९५।५६ | गर्जन्नम्बु ददाति २१३।६८ गगनविपिनसिंह ३०१।७४ | गतवलयराजत (शिशु ९ ८) २९४।३६ | गर्जन्हरि (भट्टि २ ९) २०७।१ गङ्गा च धारयति ६५।१३ | गतश्रीर्गणका (शा प १३१८) १५५।९३ | गर्ज वा वर्ष (मृच्छ ५ ३१) २९८।४ गङ्गातरगकणशीकर (भर्तृ ३ २५) ९७।८ | गतसारेऽत्र संसारे ३६७।२० | गर्जसि मेघ न (चातका ४) २१२।३२ गङ्गातीरे हिम (भर्तृ ३.९२) २६९।६५ | गताः केचित्प्रबोधाय ३६४।११ | गर्जितबधिरी (शा प ८६०) २१२।३१ गङ्गादीना सकल २३५।१५९ | गतागतकुतूहलं ३५१।३४ | गर्जितमाकर्ण्य २३०।२० गङ्गा पाप शशी ता (भर्तृ स ४७६) ४५।६ | गता गीता नाश ९९।२४ | गर्जित्वा मेघ (शा प ५९६) २०७।१५ गङ्गाम्भसि सुरत्राण १२६।२९ | गतानुगतिको (हि १ १०) १६३।४३५ | गर्दभ पटहो १६५।५६४ गङ्गावारिभिरुक्षिता ९।१२२ | गता सा कि स्थानं १९१।८२ | गर्भग्रन्थिषु वी (सूक्ति ५०.५) ३३३।१०१ गङ्गासागरसङ्गमे १३७।६१ | गतास्तातभ्रातृ (राघवदेव) ३६८।४१ | गर्वं नोद्वहते न (भर्तृ स ४८२) ५३।२६८ गङ्गीयत्यसिताषगा १०९।२२३ | गतास्ते दिवसा यत्र २४८।८४ | गर्वं मा कुरु २४०।१२७ गङ्गीयत्यसिताषगा १३६।५४ | गते तस्मिन्थानौ (मल्लट १२) २०९।१२ | गर्वग्रन्थिथलगुर्ज्जर ११२।२७८ गङ्गेवाघविनाशिनी ८७।३४ | गतेनापि न (शा प ४१२६) ३७२।१५३ | गर्वायसे विक्रञ्चक्रोर २३८।७४ गङ्गोत्तुङ्गतारङ्गरि ३७१।११० | गतेऽपि वयसि (सु २६४५) १५३।६ | गर्वाविशविशाल १२०।१३९ गच्छ गच्छसि (काव्या २ १४१) ३३०।१ | गते प्रेमानन्धे (अमरु ४३) ३८७।७ | गलत्स्नेहा (शा प ३४७७) २८९।५८ गच्छति न तृप्तिमेतत् २७३।४ | गते मुखच्छद (शिशु १७ ६७) १२७।१६ | गलिता (शा प ४११७) ३७२।१४७ गच्छन्ति काजि (शा प ५५१) १९८।४१ | गतेर्भङ्ग खरो हीनो ७३।९ | गले पाशस्ती (शा प ९३१) २३२।७६ गच्छामीति मयो ३२१।२२ | गते शोको न(चा नी १३ २) १५९।२७७ | गवादीना पयोऽन्ये (सु ८५४) ४५।५ गच्छाम्यच्युत (कुव १५५) २४१।५४ | गते सुहृदि शत्रुता (सु ३२०३) ६७।५३ | गवार्थे ब्राह्मणा ३८३।२६७ गजकदम्बक (शिशु ६ २६) ३४१।३२ | गतै सहावै (किरात ८ २९) ३३८।७४ | गवाशनाना स शृणोति ८७।२३ गजपतिद्वयसीर (शिशु ६ ५५) ३४६।१६ | गतोऽस्मि तीर (नीतिप्र ७) २१७।४५ | गवीशपत्रो नगजार्र्ति १३।५ गजभुजंगमयोरपि (भर्तृ २ ८७) ९२।६८ | गत्वा द्वारवती (सूक्ति ८९ २) ३६५।४८ | गाङ्गमम्बु (काव्यप १० १३८) २२१।१२ गजव्रजाक्रमण (शिशु १७ ६५) १२७।१४ | गत्वा नूनं (शिशु १८ ६३) १३०।९३ | गाङ्गयामुनयोगेन तुत्य १३।२ गजस्य पङ्कमग्नस्य २३१।५५ | गदोदन्ता दन्ता ७६।४० | गाजीजह्नालुद्दीन ११३।४ गजाननाय महसे २।३ | गन्तव्या राजसभा १५१।३६४ | गाढ गुणवती १५७।२०७ गणयति (सु २३०२) ४४।१, ३६४।२४ | गन्तु प्रिये वदति ३२९।१० | गाढं प्रौढाङ्गनाभि २९५।७२ गणयन्ति नापशब्द (सु १५२) ३७।१० | गन्तु सत्वर (सु १७१२) ३३९।१२० | गाढकान्तदशन (सा द ४ ९) १०४।८५ | गन्तुर्विवक्षुदये (व्यक्ति.३७ ३) ३२९।८ | गाढालिङ्गन (अमरु ४०) ३१६।७५
सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः
२७
| श्लोकांश / विषय | संदर्भ | श्लोकांश / विषय | संदर्भ | श्लोकांश / विषय | संदर्भ |
|---|---|---|---|---|---|
| गाढालिङ्गन (शृङ्गारति २१) | ३१।१३९ | गुणवद्भि सह सगम | ६२।१२ | गुरुतरकल नूपू (शिशु ७ १८) | २६९।४२५ |
| गाढाश्लेषनिपीडना (सु २०८२) | ३२९।४३ | गुणवन्त (शा प ३०३) | ८२।३४ | गुरुतामुपयाति यन्मृ(शा प ३९८) | ७३।२६ |
| गाढाश्लेषविशीर्ण (अमरु ७४) | ३२९।२२ | गुणवानपि नोप | १७५।९३४ | गुरुत्रासादासादितभ | ३२८।२ |
| गात्रं कण्टक (शा प १०४२) | २४२।१६१ | गुणवान्सुचिरस्थायी (दृ श ६५) | ८२।३० | गुरुपत्न्या निशावी (कथाणंव) | १५०।१७५ |
| गात्रं ते (शा प ८८०) | २२८।२१४ | गुणा कुर्वन्ति (शा प २९०) | ८१।१ | गुरुभिर्द्विजाती (वृ चा ११ ८) | १६९।७१५ |
| गात्रं सकुचितं (शा प ४१६१) | ९६।१६ | गुणा सर्वत्र (चा नी १६ ७) | ८१।५ | गुरुरपि लघूपनीतो | ८७।२२ |
| गानान्धैस्तु परं पारं | ८४।२ | गुणागारे गौरे यशसि | १३९।७ | गुरुरेक कविरेक सदसि | १०१।६ |
| गान्धर्वं गन्ध (भर्तृ स ४८५) | १५९।२६६ | गुणा गुणज्ञेषु (गुणरत्न ५) | ८२।४० | गुरुनयं भार (शा प ९६६) | २३४।१४४ |
| गान्धारा गुप्तदारा | १२६।२१ | गुणानर्चन्ति जन्तूना (दृ.श ८४) | ८२।२८ | गुरुशुश्रूषया वि (विक्रम १२८) | १५९।१५७ |
| गाम्भीर्येण (काव्या २ ८५) | १२०।१४७ | गुणाना सा (सु ४५१) | ६०।२५३ | गुरुषु मिलितेषु | २४७।६८ |
| गायति गीते शसति | २८८।११ | गुणानामज्ञाता प्रचुरधन | ८२।४५ | गुरुसमीरसमीरितभू | १२९।५१ |
| गायति हसति (शा प ५७९) | २०८।३० | गुणानामज्ञानादनु | २४६।३३ | गुरुस्कुर्वन्ति ते (किरात ११ ६४) | ७९।१३ |
| गायन्तीना गोपसीम | २२।१२३ | गुणानामन्तर (दृ श २२) | १६८।६७२ | गुरो सुता मि (पच २ ११४) | १६५।५३० |
| गायन्तु (सु २४१४) | ११८।१९९ | गुणानामेव (स क ४ १२५) | २३४।१४० | गुरोरधीताखिलवैद्यविद्या | ४३।१ |
| गावो गन्धेन (विक्रम ११७) | ३८३।२६८ | गुणान्भूषयते रूप | १५९।२५९ | गुरोरप्यवलिप्त(भा १ ५५९५) | १६७।६३४ |
| गाहन्ता महिषा (अ शा २ ६) | १४।१९ | गुणापवादेन (किरात १४ १२) | ५९।२२३ | गुरोगिर पञ्च दिना (लटक २ १४) | ४३।२ |
| गिरयो गुरवस्तेभ्यो | ४७।१०५ | गुणायन्ते (गुणरत्न ६) | ५१।२३६ | गुह्यमैथुनध (चा नी ६.१९) | १६२।४०२ |
| गिरयोऽप्यनुन्नति | १०३।७६ | गुणालयोऽप्य (पच १ ४१५) | १४९।३०२ | गूढालिङ्गनगण्डचुम्बन | २९२।३१ |
| गिरा देवी वीणागुण | ३५।१५ | गुणाश्रयं (हि २ ११७) | ३४९।६२ | गृध्राकारोऽपि (पच १ ३२५) | १५०।३४३ |
| गिरिगहरेषु गुरुगर्व | २३१।६७ | गुणिगणगण (हि १ १०८) | ४०।२६ | गृहमध्यस्य खा (पच २ १५४) | ७१।२७ |
| गिरिर्महानिगिरेरब्धि (कुव १०८) | ७६।१३ | गुणिने समीपवर्ती (सु २४७) | ४८।१४५ | गृहिणी सचिव (रघु.८ ६७) | ३६२।१५ |
| गिरौ मयूरा (नीतिसार १) | १७३।८६६ | गुणिन जनमा (शा प २९६) | ६२।२ | गृहीत ताम्बूल (शा प.३४७५) | ३८९।५७ |
| गीतं कोकिल ते | ९४।१०५ | गुणिना गुणेषु | ५६।१२१ | गृहीता पाणिभि(कुमार १६ १४) | १२७।६ |
| गीतशास्त्रविनो (शा प २०२) | १५३।२३ | गुणिना निर्गुणाना | १५६।१६० | गृहे जानुचर कल्या | ८९।२ |
| गीतान्तरेषु (कुमार ३ ३८) | ३३१।३३ | गुणिनामपि निरूप (वासव ८) | ४८।११८ | गृहेश्वरी (स्कान्द मा कौ १४) | ३८९।४८१ |
| गीत्वा किमपि (शा प ५२२) | १८५।३० | गुणिनेि गुणज्ञो रमते (सु २५३) | ८१।३५ | गृहन्तु सर्वे यदि वा (कुव ७३) | ३८।१९ |
| गीयन्ते यदि पन्न | १३७।६५ | गुणिनोऽपि हि | ८१।२४ | गेह दुर्गतबन्धुभि | ५३।२७५ |
| गीर्भिर्गुरुणा परु (रसगगाधर) | १७३।८६० | गुणी गुण वेत्ति (गुणरत्न ४) | १७५।९२७ | गेहादङ्गणमङ्ग (शा प ३४७८) | २८९।६७ |
| गीर्वाणा प्रतियन्ति | ३६५।८ | गुणेन स्पृहणीय (गुणरत्न १३) | ८१।१८ | गेहे गेहे सुभग | ११९।१२७ |
| गुजति मञ्जु मिलिन्दे (रसगगाधर) | २३९।८१ | गुणेषु क्रियता (शा प २९८) | ८१।१२ | गैरिकमन शिलादि | १९६।१३ |
| गुञ्जन्ति प्रतिकुञ्ज | २८५।३९ | गुणेषु यत्न (मृच्छ ४ २३) | ८२।४१ | गोकर्णं गाहमाना | ३४२।८० |
| गुणं पृच्छख मा | १६७।६४५ | गुणेष्वेव हि (मृच्छ ४ ०२) | ८१।१० | गोकर्णराडाभरणं य | १९०।६५ |
| गुण आकर्षणयोग्यो | ८२।३२ | गुणे पूजा (दृ श ७१) | ८१।२६ | गोगजवाहनभोजन | १९०।६३ |
| गुणग्रामाभिसंवादि(प्र राघव १ ५) | ४५।११ | गुणे सर्वज्ञक (चा नी १६ १०) | ८१।११ | गोत्रस्थिति न मुञ्च (शा प २४१) | ४६।४८ |
| गुणदोषावनिधि(हि २ १४३) | १६४।४८९ | गुणैस्तुङ्गता (चा नी १६ ६) | ८१।१६ | गोत्राचारविचारपा | ११६।६० |
| गुणदोषावशास्त्रज्ञ (सु ३४९) | ५६।९१ | गुणैर्गौरवमायाति (शा प २९९) | ८१।१३ | गोत्रे साक्षादज(सूक्ति ७४ १२) | ३१३।५९ |
| गुणदोषौ बुधो (कुव ६) | ३८।१० | गुणो गुणान्तरा (चा नी ५ ६९) | ८१।२५ | गोनासाय नियोजिता (विद्ध १ ३) | १२।३३ |
| गुणभेदविदग्रिम | १०४।९१ | गुणो दूषणता या (शा प.३०४) | ८१।१५ | गोपायन्ती विर(शा प ३४२१) | २८६।१५ |
| गुणमधिगतमपि | १६९।७३१ | गुणोऽपि दोषता याति | ९१।२५ | गोपालेन प्रजा(पच १ २४१) | १४९।२९१ |
| गुणयुक्तोऽपि पूर्णोऽपि | ८१।२० | गुणोऽपि नून दोषाय | ४६।५१ | गोपालो नैव गोपा (शा.प ५१६) | १८४।३ |
| गुणयुक्तोऽप्यधो (शा प ३४४) | ८१।२३ | गुणो भूष्यते (चा नी ८ १४) | १७७।६४६ | गोभि क्रीडितवान्कृष्ण | ६२।४ |
| गुणराणिमहाभार (सु २१६) | ४६।७३ | गुम्फ पङ्कजकुञ्जलयुति | ३१।४७ | गोभिर्विप्रैश्च वेदैश्च | ८३।३ |
| गुणवज्जनसंपर्कार्याति (सु २१८) | ८१।२ | गुरु प्रयोजनोद्देशा | १६९।७१४ | गोवर्धनोद्धरणहृष्ट (सु ३४) | २२।१२८ |
| गुणवतस्तव हार न | २४६।२५ | गुरुणा स्तनभारे(सूक्ति.५४.९४) | २७०।३ | गोष्ठेषु तिष्ठति पतिर्व | ३५२।३१ |
| गुणवद्गुणवद्वा (भर्तृ २.९७) | ९३।८२ | गौरमुग्धवनिताव | २६८।३६७ |
| २८ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां |
|---|
| गौरव प्राप्यते दा (सूक्ति.१८६.३) ६९।७ | घनैर्विलोक्य (कुमार १४ ३५) १२८।३९ | चण्डीजङ्घाकाण्ड ११।८ |
| गौराङ्ग्या भुजला २६४।२३६ | घनोद्यमे गाढतमेऽ ३४०।१८ | चण्डीशचूडाम(सा द ७ १२) २८२।१४४ |
| गौरीक्षण भूवरजा १९०।६९ | घनोऽय चेदभ्रेदुपरि २७६।३५ | चतुर सृजत (शा प १४९३) ३४८।१० |
| गौरी चम्पककलि(शा प ८१६) २२३।४८ | घर्मार्ति न तथा सु (हि १.९७) ५३।२६१ | चतुरङ्गबलो राजा ४४।१ |
| गौरीचुम्बनचञ्चल (लटक १ १) ७।८८ | घासग्रास गृहाण (शा प ९२८) २३३।९७ | चतुर्थैऽहि ह्ला (शा प ३७५८) ३५१।३३ |
| गौरीतनुर्नयनमायत ३६५।४४ | घूर्णन्ते तूर्णमेतत्कु १२६।२४ | चतुर्मुखो न च ब्रह्मा १८५।२४ |
| गौरीनखरसादृश्य(शा प ५३५) १९४।१८ | घृतकुम्भसमा (पञ्च सू ५४) १६२।४०८ | चतुर्ष्वपि समुद्रे (शा प ४०२४) ३६२।३ |
| गौरीपतेर्गरीयो गरल ४७।१५ | घृत न श्रूयते कर्णे १८१।१४ | चत्वार प्रथयन्तु (प्र राघव १ १)१५।३२ |
| गौरीव पत्या सु(नैषध ७ ८३)२६५।३४९ | घृतलवणतेलतण्डुल (सु ३१८८) ६६।३९ | चत्वारो धनदा(भर्तृ स ४९०)१५६।१६४ |
| गौर्गौ कामदुघा १६६।६०८ | घृष्टं घृष्टं पुनरपि पु ५१।२२९ | चत्वारो वयम् (वेणी १.२५) ३६१।४४ |
| ग्रन्थिमुद्ग्रथयि (शिशु १० ६३) ३१५।२४ | घ्रात तालफला(सूक्ति ९७ ७२)१३२।३५ | चत्वार्याहु (भा २ २२७०) ३८०।१४५ |
| ग्रसति कोऽपि विमो २७८।३५ | घ्रात्वा श्रोणीम (शा प ५८६) २०७।१८ | चन्दन शीतलं लोके ८६।६ |
| ग्रसमानमिवौजसा (किरात ११ ५३) ७७।४ | च | चन्दन स्तनतटे (शा प ३७३९) ३२८।७ |
| ग्रामतरुण तरु (काव्याल ७ ३९)३५१।२० | चकितहरिणलो(का प्र १० ८७)३५०।४२ | चन्दने विषधरा (भल्लट ३२) २४२।१६५ |
| ग्रामाणासुपशल्य (शा प ९१३) २३०।४२ | चकोरनेत्रेण दृगु (नैषध ७ ३२) २५९।८६ | चन्द्र समाश्रयति २१०।२९ |
| ग्रामेऽस्मिन्पथि (अमरु १३१) ३७३।९२ | चकोराणा चन्द्र १०६।१५५ | चन्द्र चन्दनकर्द (सूक्ति.४४ ९) २९०।८२ |
| ग्रामेस्मिन्प्रस्तर (कुव.१४९) ३५४।६७ | चक्रे सेव्यं नृ (शा प १३७८) १४६।१६१ | चन्द्रं चन्द्रार्धचूड ११४।२८ |
| ग्रावाणो मणयो (भल्लट ५०) २१६।२६ | चक्र पप्रच्छ पा (शा प १२६१)११४।२६ | चन्द्रं कलङ्करहित २६२।१८६ |
| ग्रासादर्थमपि ग्रास (पञ्च २.७३) ६९।६ | चक्रवरोऽपि सुरत्व ७६।३२ | चन्द्र क्षयी प्रकृति(विक्रम ९३) ५०।१९४ |
| ग्रासाद्गलितसि (शा प १२०८) २३१।५७ | चक्र ब्रूहि विभो गदे १५।३८ | चन्द्रकान्तगलदम्बुना ३२३।७ |
| ग्रीवाद्धतैर्वावड(नैषध ७ ६६) २६६।३०६ | चक्राङ्गो विरही (शा.प ३५९५) २९६।१० | चन्द्रपादजनित (कुमार ८ ६७) २९९।३० |
| ग्रीवाभङ्गाभिराम (अ शा १ ७) २०७।७ | चक्रीकृतभुजलता २६९।४२६ | चन्द्रबिम्बरविविम्ब ३४०।३ |
| ग्रीवास्तम्भभृत (शा प २०७) ४१।६५ | चक्री चकारपङ्क्तिं (सूर्यशतक.७१)२७।१४ | चन्द्रखण्डकरायते (शृङ्गारति १६) २७४।८ |
| ग्रीष्मादित्यकरप्र (शा प ५८८) २०८।२७ | चक्री त्रिशूली न हरो १८५।३५ | चन्द्रश्चन्दनमिन्दुरि १३७।५९ |
| ग्रीष्मे ग्रीष्मतरै २९१।४२ | चकुरेव लल (शिशु १० ६६) ३१७।२७ | चन्द्रादित्योरिनेत्र १७।१३ |
| ग्रीष्मोष्मप्लोष(श प ३८५५) ३४०।१२९ | चक्रे चण्डरुचा समं ३४६।३२ | चन्द्राद्भूत्यकमण्डलो १३७।६० |
| ग्लानिच्छेदि क्षुत्प्र १३०।१०६ | चक्रेण विश्व यु(नैषध ७ ८९) २६८।३७८ | चन्द्राधिकैतन्मु(नैषध ७ ४४)२६१।१५६ |
| घ | चक्षु पूत न्य (शा प ४५५१)१५६।१४१ | चन्द्राननार्यदेहाय ३।४ |
| घट भिन्यात्पट(शा प १४६८) १५४।५० | चक्षु प्रीत्या (सूक्ति ७५ १०) २९५।१२२ | चन्द्रायते शुक्(काव्याल ८ २८)३४४।१६ |
| घटन विघटनमयवा (सु २३९७)७०।२८ | चक्षुर्जाड्यमपैतु ३०७।५८ | चन्द्रे शीतलवल्यली ३४६।२० |
| घटमानकोककुचमाम् ३२७।६ | चक्षुर्मेचकसम्बुज २७२।५७ | चन्द्रो जड कदलि २५३।२२ |
| घटितमिवाञ्जन (सा द १० ४५) २९७।६ | चक्षुर्लुप्तमपीकणं (सूक्ति ५८.७) ३११।२५ | चन्द्रोदये चन्दनमङ्ग २९८।११ |
| घटीयन्त्रायते हारी २६६।३०० | चञ्चच्चन्दनखाग्रभेदवि १९।५० | चन्द्रो द्वादश भास्कर २९२।३५ |
| घटो जन्मस्थानं (शा प ५०५) ५२।२५४ | चञ्चच्चन्द्रिकचन्द्रचारु ६।७४ | चन्द्रोऽनेन कलङ्कि १२२।१७४ |
| घण्टानादो नि (शिशु १८ १०) १२९।५७ | चञ्च्चेलाव्रला (शा प ३९२६) ३४७।४२ | चपलतस्तरङ्गै (शा प १०९२) २१६।२१ |
| घण्टारवै रौद्रत(कुमार १४ ४७)१२९।४८ | चञ्चत्कर्पूरचौरा(शा प.३८१२) ३२७।३९ | चपलबृदये कि (अमरु ५६) ३०८।११ |
| घनघनमपि दृष्ट्वा (शा.प ३५७३)३०९।१ | चञ्चत्काञ्चनशैलाव २६५।२७० | चरणकमलदासस्त्वे ३०६।३४ |
| घनघनाघनकान्ति १९५।०४ | चञ्चद्देवेन्द्रकुञ्जरथलि १०।१६० | चरणकमल तदीय २६९।४०९ |
| घनतरघनवृन्दच्छादिते ३४१।५० | चञ्चद्रादशमील (शा प ५३२) १९१।८६ | चरणपतनप्रत्याख्या(अमरु ५०) ३५०।५० |
| घनतरघनवृन्दच्छा ३४१।५१ | चञ्चद्धुजभ्रमितच (वेणी १ २१) ३६७।३ | चरमगिरिकुरङ्गी (सूक्ति ८२ २५) ३२२।७ |
| घनतरतिमिरघुणो(सूक्ति ६१ १३) २९९।१ | चञ्चरीक चतुरोऽसि २२३।६७ | चरमगिरिनिकुञ्जमु २९७।२२ |
| घनसन्तमसमली (भल्लट. १८) २२९।२३५ | चञ्चल वसु (किरात १३ ५३) १५१।३९३ | चराचरजगत्स्फार (रसगङ्गाधर) १।८ |
| घनसमयमहीभृत्प ३४१।४९ | चटचटिति चर्म (शा प.१२६) १९।४८ | चरेद्धीमानकण्टको १५०।३३८ |
| घनसमये शिखिषु २००।४२ | चण्डचाणूरदोर्द (सु ३३) २२।१०५ | चर्मखण्ड द्विधा(भर्तृ.३ १७) ३७१।१२३ |
संस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः
| चलं वित्तं चलं चित्त ९८।५ | चित्रं नर्तनमम्बरे १८४।७० | चेतोभुवश्चापवति २५०।१० |
| चल चेत पुमा ३५७।५५ | चित्र महानेत्र बना (रसगङ्गाधर) ३६३।१२ | चेतोहरा (शा प ४१३०) ३७३।१७४ |
| चलत्कर्णानिलोद्भूत (शा प ५७) २।६ | चित्राभिरस्योपरि (शिशु ३ ४) १२३।३ | चेत्पोरादपि शङ्कसे ३५३।५० |
| चलत्कामिनमोनी (शा प ३२९०) २५७।४ | चित्राय त्वयि चिन्ति २९१।९२ | चेलाञ्चलेन (शा प ३९१०) ३४५।५३ |
| चलत्तरङ्गरङ्गाया गङ्गा १८१।११ | चित्रास्वातीगता १६६।२८५ | चोलं नीलनिचोल ३५९।९३ |
| चलत्येकेन पादे (शा प १४६३) १५४।३५ | चित्राखादक (पंच १ ४१६) १४९।३०३ | चोलाङ्गनाकुचनि ३२५।११ |
| चलद्दूलोत्कादशनाक्षि ३४०।१ | चित्रोत्कीर्णाद (शा प ३४९४) २८९।५० | चोली चोली न तु कल १२५।९ |
| चलद्भङ्गीमिवा (रसगङ्गाधर) २६२।१६१ | चिन्तनीया हि (शा प १४४०) १५३।१७ | च्युता दन्ता (शा प ४२३) ७६।६ |
| चलन्ति गिरय कामं ७७।२ | चिन्ता मुञ्च गृ (शा प ०५४) २३४।१३४ | च्युतामिन्दोर्लेखा (शा प ९६) ५।४८ |
| चलन्ति येषा (शा प १५७१) १४३।४३ | चिन्तागम्भीरकू ११२।२७९ | च्युतोऽप्युद्गच्छति (सु ०२३) ४६।७६ |
| चलापाङ्गा दृ (अ शा १ २०) २८३।१६० | चिन्ताचक्रिणि हन्त ७९।७ | छ |
| चलेषु स्वामिचित्तेषु ९७।२ | चिन्ता जरा म (चा नी १२ ५) १५५।८२ | छत्रवारी न राजासौ १८४।१२ |
| चाञ्चल्य चरणौ विहा २५७।५९ | चिन्ताभि (सा द ३ २०८) २८६।२८ | छत्र सैन्युरजोभरेण ११७।९१ |
| चाञ्चल्यमुच्चै श्रवसस्तु ६३।२३ | चिन्तामोहविनिश्च (अमरु ८७) ३२९।२३ | छन्न कार्यमुपक्षि (मृच्छ ९ ३) १३९।५ |
| चाटतस्क (याज्ञ स्मृ १ ३३६) १४९।२९९ | चिन्तासक्तनिम (मृच्छ ९ १४) १०१।१४ | छादयित्वात्मभावं (प्र भ १६) ३८६।३६४ |
| चाण्डाल पक्षिणा १५९।२८० | चिन्तासहस्रे (शौन नी ११५) ३८९।४७८ | छादित कथ (शिशु १० १९) ३१५।२२ |
| चाण्डालश्च दरिद्रश्च ६५।६ | चिन्त्यते नय ए (दृ श ७) १५०।३५५ | छाया प्रकुर्व्वन्ति (शा प ११२३) २१९।७ |
| चातकः खलुमा (शा.प ७७०) २११।२ | चिन्वच्चोरचिक्की (शा प ३६०८) २९७।३३ | छायाफलाने (शा प १०२०) २२०।५ |
| चातक धूमसमू (शा प ८५७) २२६।१५१ | चिर ध्याता रामा ३७४।२१५ | छायाभि प्रथम २३६।२५ |
| चातकश्चिचतुरा (पूर्वचातका २) ४९।१६० | चिरमपि क (किरात १०.४८) २८८।३७ | छायामन्यस्य कुर्वन्ति (विक्रम.६५) २३६।४ |
| चातकस्य खलु (शा प ८५४) २१२।२५ | चिरमाविष्कृतप्रीतिभी ११।७ | छायावन्तो गत (शा प ९७८) ४५।७ |
| चातुर्य्यैककचिह्न २६३।२०६ | चिररतिपरिखेद (शिशु ११ १३) ३२२।३ | छाया वियोगिवनि ३३६।१७ |
| चादय इति यत्र २००।४३ | चिरविरहिणो रत्यु (अमरु.४४) ३१९।३५ | छाया संश्रयते तलं (कुव ५८) ३३७।५१ |
| चान्द्री लेखा (प्र राघव ६ ३) १९८।१००६ | चिरशान्तो दूरादह २३०।१२० | छायासुसमृग (पंच २ २) २३६।१९ |
| चापाचार्य्यस्त्रिपुर (बालरामायण) ३६०।३४ | चिरादक्ष्णोर्जा ११५।२९ | छित्त्वा पाशम (पच २ ८८) ९४।१०६ |
| चामरे श्रीक (शा प १४१३) १४५।१०७ | चिराद्यत्कौतुकाविष्टं १०१।२ | छिद्रान्वेषण (शा प ३६१९) ३५७।३३ |
| चारुता परदारार्थं ५६।९५ | चिराय सत्सगमङ्गु (सु ०६२) ४९।१८५ | छिन्न सुनिश्चितै २४२।२०२ |
| चारुता वपुर (शिशु १०.३३) ३१५।३६ | चिरेण मित्र संधी १६६।५८२ | छिन्नेऽपि (शा प ३९८९) ३६०।१६ |
| चारूनू पुरसणत्कृ (शा प ३६८९) ३१८।८ | चीत्कारैरनाश्यन्त १४३।४७ | छिन्नोऽपि रोहति (भर्तृ सं २४६) ४७।९३ |
| चिकीर्षितं वि (भा ५ १०८९) ३९४।६९९ | चीराणि कि पथि (भर्तृ म ४९७) ७५।१५ | छेत्ति ब्रह्माशिरो (शा प ११६१) २७५।६ |
| चिकुरप्रकरा जय (नैषध २ २०) २५७।१९ | चुम्बनेषु परिव (रघु १९ २७) ३१८।६ | छेदश्चन्दनचूत (नीतिसार ६) १७८।१०१६ |
| चिता प्रज्वलिता दृष्ट्वा ४४।३ | चुम्बन्तो गण्ड (शा प ३९४५) ३४८।१९ | ज |
| चिता दहति निर्जी (प्र म.१७) ३९४।६७० | चुलुकयसि चन्द्रदी २८३।१६३ | जगति जयि (मालती १ ३९) २७९।६९ |
| चित्तनिर्वृतिनिधायि ३१६।६३ | चुलीसीमनि (शा प ३९४१) ३४८।१५ | जयति नैशमशी (शिशु ६ ४३) ३४४।३१ |
| चित्तभूवित्तभूमत्त ३७४।२१३ | चूडापीडकपालसङ्क (मालती.१.१) ९।१२१ | जगति विदितमेत २४८।८३ |
| चित्तायत्तं धातुब १७१।८१५ | चूडापीडाभिराम १२५।१८ | जगतप्रसूति (किरात ४ ३२) ३४४।२४ |
| चित्ते निवेश्य परि (अ शा २.९) २५३।२१ | चूडारत्नमपानिधि २९१।९७ | जगतिसुक्ष्माप्रलय (सु ४) ४।३२ |
| चित्ते भ्रान्तिर्जायते १००।६ | चूडारत्नै स्फुरद्भिर्वि २९८।४० | जगदिव बहुलातपा २९४।४७ |
| चित्रं कनकलताया ३६३।७ | चूडाशीतकरस्तनवय ९।१२५ | जगद्द्द्मूमू (नैषध ७ १००) २६९।४१४ |
| चित्र कनकलताया ३६३।११ | चूतश्रेणीपरि (शा प ३८१२) ३२६।२७ | जगन्नेत्रानन्दं वद २६३।१९६ |
| चित्रं चि (का.प्र १०.५३६) १७१।१५८ | चूताङ्कुरास्वादक (कुमार ३ ३२) ३३१।२९ | जगौ विवाहावसरे ३३१।१९ |
| चित्रं तपति राजेन्द्र (कुव ७९) १३३।१ | चूताना चिर (अ शा ६ ४) ३३३।९४ | जग्ध्वा माषमयान ३६५।५४ |
| चित्रं न तयदय (शा प.११४५) २२०।७ | चेत कर्षन्ति (शा प ३९१०) ३४५।४७ | जघान बाणैर्दश ३१३।४२ |
| चेत प्रसादनजनन (सु १६१) ४०।५१ | जङ्घाकाण्डोरु (का प्र. ७ १५०) १३१।५० |
| ३० | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां |
|---|
| स्तम्भ १ | स्तम्भ २ | स्तम्भ ३ |
|---|---|---|
| जङ्गे तदीये (शा प ३३५८) २६९।३९९ | जयश्रिय कृपाणीय ११५।३२ | जाता शुद्धकुले १८४।३९ |
| जटा नेयं वेणीकृत (कुव २९) २८५।४४ | जयश्री (गीत ११ ०० ४) २३।१३८ | जातिमात्रेण किं (हि १ ५८) १६३।४४३ |
| जटाभाभि (का प्र १०.१४०) ३०१।८१ | जये च लभते (हि.२ १७२) १४७।२२० | जातियांतु रसातल (भर्तृ स २५) ६४।१५ |
| जठरज्वलनज्वलता २२९।१८ | जये वरीया (शा प ३०८५) २५१।३४ | जातिस्तस्य न २२८।२३० |
| जडास्त (शा प ४१७५) ३७५।२३८ | जरठ इव मरालो ३२।२६ | जाते जगति ३५।१९ |
| जडे प्रभवति (सु २९२) १८८।६॥३ | जरःशृग (म क ७ ६२) ७०।१४ | जातेति कन्या महती ९०।१ |
| जडेषु जानप्रतिभाभि ४०।३१ | जरा हरु हर (भा प १३४१) १७५।१३३ | जातोऽह ३७१।१०६ |
| जन जनपदा नित्य (हि २ ७८) १४५।१४१ | जरीज़म्भन्न्रौद्रद्य ३४६।२७ | जायन्त्याय च दुर्भु(भर्तृ स १०९) ३५५।९ |
| जनक सानुविशेषा २३७।४५ | जर्जरनॄणा (आ प ८९६) २२९।२३४ | जात्युत्कृष्टस्य हि ८१।२२ |
| जननी जन्म १५७।७० | जलद ममुद्रसेवा २१२।१९ | जानन्ति (शा प १४४८) १५३।२४ |
| जनयन्त्यर्जने दुख (हि १ १८४) ६८।८ | जलदपङ्क्ति (शिशु ६ ३१) ३४१।३७ | जानन्ति हि गुणा १५५।१२२ |
| जनस्थाने भ्रान्त (हनु १० २४) ७३।३३ | जलवर जल (शा प ७६९) २११।१५ | जानन्नपि (पच ४.३७) १६०।३३५ |
| जनि सरोऽङ्गादपि २४४।२२० | जलवर निर्ल (मृच्छ ५ २८) २९८।७ | जानाति वि (भा प १०७५) ३९३।६४३ |
| जनिता चोपने(चा नी ५ १२) १६५।५४२ | जलनिधौ जनन २७५।७७ | जानामि नागेन्द्र तव ८६।१२ |
| जनो दुर्लक्ष्यो (शा प ३६१८) ३५६।२६ | जलविन्दुनि (चा नी १२ १०) १५६।५५३ | जानीमस्तव गौरि २८६।३० |
| जन्तोर्निरुपभोगस्य (दृ श ३४) १६८।६८७ | जलग्नोत्पत्तित्कृते २८५।१७ | जानीमहे (सा द १० ६३) २७३।५ |
| जन्म क्षीरनिधौ २११।४६ | जलमसिषिंप श(हि १ १६५) १५३।४५७ | जानीमो वदन २७२।७४ |
| जन्म क्षीरमहार्णवे २११।३८ | जलरेखा खल(वृ.चा १७ ९) ३९३।६६६ | जानीमो वयमासनस्य २७२।७५ |
| जन्मनि केशबहु (हि १.१८६) १६३।४६३ | जलबिललितवस्त्र ३३९।११५ | जानीयात्सगरे (चा नी १ ११) १५५।९८ |
| जन्म ब्रह्मकुलेऽप्रजो ९४।११९ | जलसेकेन वर्धन्ते ८०।२५ | जानुभ्यामुपविश्य ५८।३३२ |
| जन्मस्थान न (शा प १२०२) २४७।६१ | जलाद्रीं शष्पा । ३३६।२३ | जानुस्थापितदर्पणं २५८।३६ |
| जन्मान्तरीण (सा द १०.०६) ११।५ | जलाहुती(कथा मा १२ ४२) ३८७।३९५ | जाने कोप (शा प ३४५४) २८०।८९ |
| जन्माभूदुदधौ २३७।३७ | जले तैल खले (चा नी १४ ५) १५६।१३८ | जानेऽति (नैषध ७ ३९) २६१।१५१ |
| जन्मिनोऽस्य(किरात ११ ३०) १६१।३७३ | जलाकयो (काशीखण्ड३८ ८५) ३८८।२८४ | जाने युष्मत्प्रयाणे १२६।२३ |
| जन्मेन्दोरमले (वेणी. ६ ७) ३६१।३६ | जलौका के(काशीखण्ड३६ ८६) ३८४।२८५ | जाने रात्रिशु २६७।३४५ |
| जन्मैव मास्तु यदि ३५२।३० | जत्पन्ति मार्य (चा ना १६ २) ३४८।५ | जाने खन्न्र (म क ५ १६९) २८१।१९९ |
| जन्मैव (शा प ४१४९) ३७४।२०५ | जद्यो हि ससे (वानराष्टक ८) १७४।८९७ | जामाता जठर १५७।१६९ |
| जम्बीर वा कमल २६५।२९२ | जहाति सहसासन ७२।५७ | जामाता पुरुषोत्तमो ९४।१०२ |
| जम्बीरश्रियमति (रसगङ्गाधर) २६५।२८९ | जहीहि कोप (किरात ८ ८) ३०८।९ | जायन्ते नव सौ १९३।९४ |
| जम्बुद्वीपगृह १२२।१८६ | जहीहि गुरुगर्जिन २३२।७९ | जालान्तरप्रेषित (रघु ७ ९) १२६।३५ |
| जम्बूफलानि पक्वानि १८१।२२ | जाग्रत (शा प ३३६१) २६९।४०४ | जाल्मो गुरु २३४।१४१ |
| जम्भारातीभ (सूर्यशतक १ २) २७।११ | जाड्य धियो हरति (भर्तृ स ४२) ८७।२९ | जाह्नवी मूर्ध्नि पादे वा १३।१ |
| जम्भारिरेव (शा पू ११६९) २८५।१० | जाड्य हीमति (भर्तृ स २४) ६१।२६३ | जिप्रत्याननमिन्दु २७१।५६ |
| जयति जटाकिजल्कं ४।२२ | जात कूर्म स (भर्तृ स २४८) ९८।११ | जितरोषतया (शिशु १६ २६) ४९।१५६ |
| जयति परिमुषित ९।१३५ | जात केलिकलावती २३८।६० | जितेन्दुपुद्गलावण्य २६२।१६० |
| जयति प्रियापदान्ते ४।१८ | जात सूर्यकुले पिता(धर्मवि १०) ९३।१०१ | जितेन्द्रियत (का प्र १० १३९) १०३।६१ |
| जयति मनसिज २५०।१ | जात स्तम न २२०।१० | जितेन्द्रिय (किरात ?) १७३।८६९ |
| जयति ललाटस्फाल ९।१३८ | जानमात्र न (पच १ २५६) १७७।१९६ | जिते लक्ष्मीमृते १५०।३५१ |
| जयति स नाभि (वेणि [पा १] १०) १७।६ | जानश्च नाम न विन ७०।३५ | जिह्वो लोके कथ ६१।२५८ |
| जयति स भग (वेणी [पा] १.२) १४।४ | जास्तस्ते निशि ३५६।१६ | जिह्वादूषितसत्पात्र ५५।७९ |
| जयत्युपेन्द्र स चकार १७।१७ | जाता पक्क (मुरारि) ३२५।५५ | जिहायाश्छेदन (शा प ४०३१) ३६३।१ |
| जयन्ति जगता मातु १६९।१ | जाता प्रासादपत्री २९८।२१ | जिहे लोचन (शातिश ४ १२) २७४।१०० |
| जयन्ति जितमत्सरा ५२।२५५ | जाता नोक्त (अमरु ८८) ३११।३२ | जिह्वारलोल्यप्रस (पच २ ३) १६४।५२० |
| जयन्ति ते पञ्चमनाद ३२।३० | जाता लता हि शाले (कुव ८२) ३६३।९ | जिह्वैकव सतामुखे ८३।४ |
| जयन्ति ते सुकृ (शा.प.१६६) ३२।१ | जाता शिखण्डिनी ३५।२७ |
सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः । ३१
| जीयादम्बुवितनयावर(कुव १२१) १४।१३ | झ | तद्वितथमवा (शिशु ११.३३) ३०९।२ |
| जीयासु शकुलाकृते (शाप ८१) १७।७ | झगिति जग (प्र राघव १ ११) ११९।१२५ | तदाखण्डलाशा २५१।८० |
| जीर्णमन्त्रं प्रशं (मा ५ १०५०) १६२।८१० | झञ्झानिलोऽपि ३२५।१३ | तदा तदङ्गस्य (शाप ३३७९) २७०।२९ |
| जीर्णा तरि सरि २८६।४१ | झग्झर्णितकङ्कण १३१।११३ | तदात्वप्रोन्मीलन्म २५५।३२ |
| जीर्णेऽप्युत्कटकालकूट (हनु ९ ३६) ६।७८ | ट | तदात्वज्ञाताना (शा प.३८३४) ३३६।२२ |
| जीर्णोऽपि क्रमही २२९।६ | टिड्डाण्डद्वयसङ्क्रुद्धोऽसि ७२।१ | तदा मुग्धं वक्रं २७९।७६ |
| जीवञ्जीवयति हि यो ७०।२५ | ढ | तदा रम्या (किरात.११ २८) १६०।३७१ |
| जीवति (शाप ३७५५) ३६०।१९ | ढक्कामाहत्य मद ३५१।२४ | तदीयजघनाभोग २६८।३८४ |
| जीवनग्रहणे नम्रा (कुव २५) ५५।५१ | त | तदीयत्रिवलीमार्ग २६७।३३० |
| जीवन्त मृत (वृचा १३ ९) ३९२।६६७ | त वन्दे पद्मद्मद्मान (शाप ८५) १६।१ | तदेवाजिह्माक्ष (शाप ३५३८) ३१०।१५ |
| जीवन्तोऽपि (पच १२८९) १५५।१२३ | त एव पदविन्यासास्ता २०।६ | तदेवास्य पर मित्र यत्र ८८।९ |
| जीवन्त्यर्थक्षये ६६।३१ | त एवामी वाणान्तदपि ०३।९३ | तदोजसस्तद्यशस (नैषध १.१४) १३९।४ |
| जीवन्नेव (शाप ३१६७) ३६०।१४ | तक्षकस्य विषं (वानी १७८) ५४।३८ | तद्वृह यत्र वमति १६६।५७४ |
| जीवन्नपि न तत्कर्तुं ५६।११० | तटमुपगतं पद्मे ३४८।१९९ | तद्दिव्यमव्यय वाम ३।३ |
| जीवाकृतिं स चक्रे १३९।१२४ | तटस्थै ख्यापिता (वृश ६२) १६८।६९६ | तद्भोजन (वृ चा १५८) ३८७।३८६ |
| जीवामीति (शाप ३४४२) २८७।७ | तटिनि चिराय विचा २१८।१ | तद्गेदोऽन्तरक्षत २९५।६५ |
| जीवितं तदपि १७१।८१० | तडिन्मालालोलं (शातिश ६२) २६८।८७ | तद्व प्रमाष्टुं विपद प्र ११।१४ |
| जीवित इव कण्ठगते ४।२९ | तल्लेखेखा नेय (प्रराघव १३५) २७३।१६ | तद्वक्ता सदसि ब्रवीतु ८६।१५ |
| जीवेति प्रब्रुव (पच १५४) १४८।२६१ | तत कुमुद (भा द्रोण ८४०८) २९९।१ | तद्वक्त्र नेत्रपद्मं २६९।४२१ |
| जीवेन तुलितं प्रेम २७५।२ | तत कोकवधू (शाप ३७३३) ३२७।१ | तद्वक्तं यदि(बालरामा २ १७८) २७१।५१ |
| जुम्भाबर्जरडिम्ब (मालती ९ १६) १४०।४ | तत परामर्शविरुद्ध ३६५।२ | तद्वकाभिमुख (अमरु ११) ३०९।१२ |
| जुम्भा निष्ठीवन १५०।३२९ | ततश्चामिज्ञाय (अमरू ५२) ३५७।५४ | तद्विच्छेदकृशस्य २८२।१४२ |
| जुम्भारम्भप्रवित (वेणी २ ८) ३२४।४४ | ततोऽरुणपरि (वाल्मीकि) ३२३।१ | तद्वियोगसमुत्थेन २७७।७ |
| जुम्भाविस्तृतवक्त्रपङ्कज १७।१० | तत्कार्क त्वयि २२८।२०८ | तनुता तनुता नीता २०५।३ |
| जेतुं यस्त्रिपुरं हरेण २।२५ | तत्कालारभटीविजृम्भण ६।७३ | तनुत्यजा वर्मभृ (रघु ७ ४८) १२८।३१ |
| ज्ञातं ज्ञाति (शाप ३६१६) ३६३।५४ | तर्किं कामपि (गीत ७ १४ १) ३५८।७५ | तनुत्राण तनुत्राण (दश ४ २८) १२७।१ |
| ज्ञाता मैत्री सहज ३५३।४० | तर्किं काव्यमनल्पपीत ३२।४ | तनुह्हाणि (शिशु ६.४५) ३४४।३३ |
| ज्ञातिभिर्विन्ध्यते (गुणारत्नावली १२) २९।५ | तर्किं स्मरसि न २२५।१२६ | तनुग्ना इव ककुभ २९७।४ |
| ज्ञातु वपु परि ३७९।८५ | तत्कुचौ चरत २९४।२६१ | तनुस्पर्शादस्या २५४।३८ |
| ज्ञानं सतां (भर्तृ ३८३) ३८६।३८५ | तत्कृत यन्न (शाप १२४९) १२२।१७८ | तनोतु ते यस्य फणी १९६।९ |
| ज्ञानविद्याविहीनस्य ३९।१२ | तत्तद्दिग्जैत्रयात्रोद्धुर १२६।२० | तन्त्रावाप (शिशु २ ८८) १४७।११० |
| ज्ञानाब्धिश्चिरचण ४२।४ | तत्तद्ददत्यपि (शाप ३५३६) ३५७।४७ | तन्त्रातुन्दिलशोण ३२२।३० |
| ज्याकृष्टिबद्वखटका (अमरु १) ११।१९ | तत्तस्या कमनीय २५६।५३ | तन्नास्ति (शाप ३६९४) ३२०।१२ |
| ज्याघात का(प राघव ३ १०) ११४।२७ | तत्तादृक्तृणपुलकोप १४।१८ | तन्नितम्बस्य (शाप ३३५२) २६८।३७१ |
| ज्यायासम (मा १३ २६१०, १६०।३३९ | तत्तेजस्तरपेर्निदाघ २७१।१४९ | तन्मङ्गलं ३८५।३१५ |
| ज्योति शास्त्रमहोदधौ ४४।६ | तत्त्वं किमपि (रसगङ्गाधर) ३२।१६ | तन्मूलं गुरुताया (शाप ३२०) ७५।१३ |
| ज्योतिस्तमोहरमलोचन ३।१० | तत्र मित्र न (हि १ १०६) १६७।६३१ | तन्वङ्गया (शाप ३३४०) २६४।२४८ |
| ज्योत्स्नाचय पय (साद ७८) २९९।७ | तत्पादनखरखाना २६९।४२० | तन्वङ्गया गुरु (अमरू.९६) २७६।५० |
| ज्योत्स्नाभस्मच्छुरणध (कुव ५४) २९६।६ | तथा न पूर्वं (किरात ८ ४१) ३३८।८४ | तन्वन्ती तिमिरद्युति ११६।६१ |
| ज्योत्स्ना (काप्र १०४७२) २९१।९४ | तथा पौरस्त्याया ३०१।८२ | तन्वि त्वद्वदन(प्र राघव ७ ६५) ३१३।७८ |
| ज्योत्स्नी श्यामलि २८०।९९ | तयारिभिर्न व्यथते ५९।२२२ | तन्वी चारुपयोधरा १८६।१४ |
| ज्योत्स्नेव (काप्र १०४११) २५१।१८४ | तथ्य पथ्य सहेतु ८५।१७ | तन्वीमुज्झित (शाप १२७२) १३२।३० |
| ज्वलति चलिते १७०।७४८ | तदङ्गमपि नाम २८०।८८ | तन्वी शरत्त्रिपथ (अमरु १३५) २७१।३८ |
| ज्वलतु (मालती २२) २८४।२४ | तदपकृत विधि ४८।१९६ | तन्वी श्यामा २७१।४९ |
| ज्वलितं न (किरात २२०) ८०।३२ | तन्वी सा यदि २८०।९६ |
३२ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| तप सीमा मुक्ति (प्र भ १०) | ३८३।२४२ | तव तन्वि तरुणपुण्या | ३१८।५ | ताडिता अपि (पच ४ ५६) | ३४९।२८ |
| तपति तनुगात्रि (अ शा ३ १३) | २९१।५ | तव नित्यमुत्सव | १०५।१३४ | ताडितोऽपि (पच १ ९७) | १४४।८९ |
| तपनस्तपति स्म | ३४७।६ | तव निर्वेणीदृष्टणं | १०३।५१ | तात क्षीर (शा प १११७) | २१८।८० |
| तपखिनोऽप्यन्त | २०२।८३ | तव विरहमसहमाना | २८८।१२ | तात त्वं निजकर्म | ३६३।४० |
| तपस्वी का गतोऽवस्था | ११।६ | तव विरहे मलय | २८८।२५ | तातं तत्तातात कनय | ७।९८ |
| तपापाये गोदापरतट | १८४।४६ | तव विरहे विबुवदना | २८७।५ | तातार्थमन्त्रिसुत | १५२।४०७ |
| तप्तं केर्न तपोभि | २११।२४ | तव विरहे हरिणाक्षी | २८८।२३ | तातेन कथितं पुत्र | १८८।३९ |
| तप्ता गामिव सस्रुषु | १२५।११ | तव सा कथासु (शिशु ० ६४) | २८८।२८ | तादृक्सप्तसमुद्रमुद्रित | ६।८० |
| तप्ता मही विरहिणा | ३३६।१६ | तवाग्रतो वीर | १०४।१०९ | तादृग्दण्डविवर्ते | १३३।४० |
| तप्ते मङ्गाविरह (अमरु ८६) | २७८।३७ | तवाङ्गने सुन्दर (शा प १२६५) | ११६।६२ | तादृग्धीर्धविरित्रि (भाव १ ८) | १३४।१८ |
| तम स्तोम (शा प ३५२१) | २७१।४३ | तवानन सुन्दरि फुल्ल | ३१२।३९ | तादृशी जायते (चा नी ६ ६) | ९१।२१ |
| तम स्तोम भृश | २५७।६ | तवारिनारीनयनाम्बु | १३३।५ | तानि तानि कमलानि | २१९।४ |
| तम स्तोम सोमं | ३२०।१५ | तवाद्ववादिन क्लीबं | १५०।३४६ | तानि प्राब्धि | २६३।२०४ |
| तमद्दढे (शिशु ३ ६०) | १२२।४ | तवाहवे (का प्र १० ४५६) | १०४।९५ | तानि स्पर्श (गीत ० ७ १५) | २८०।९७ |
| तमसि वर। (शा प ४०४७) | ३६४।२८ | तवेद पश्यन्त्या (गीत ८ १८ १) | ३०९।४ | तानीन्द्रियाण्य (पच ५ २८) | ६५।१६ |
| तमांसि ध्वसन्ते | ५२।२४७ | तवैतद्वाचि (शा प ८८२) | २२५।११६ | तापं लुम्पसि | २१३।७१ |
| तमाखुपत्रं राजेन्द्र | १००।१ | तवैव प्रावीण्यं जलद | २१३।५५ | तापनैरिव तेजो | २९३।२ |
| तमृषिं मनुष्यलोक | ३६।४९ | तवैष विन्दु (शा प ३३१०) | २६१।१३७ | तापापहे (शा प ११६८) | ६३।२७ |
| तमोगगविनाशिनी | ३।१२ | तवोपकोष्ठस्थित | २६५।२८२ | तापो नापगत (शा प ९२३) | २३२।८४ |
| तमोभि पीयन्ते | ३२४।३८ | तस्करस्य कुतो (वृ चा ९ ११) | १६८।३९१ | तापोऽम्म प्रसर्र्तं | २९०।८३ |
| तया गाढ मुक्तो | २७९।७५ | तस्करेभ्यो (हि २ १०९) | ७४।२०७ | तामनङ्गजय (का प्र ७ ३२२) | २७३।७ |
| तरङ्गय दृशो (विद्ध ३ २७) | ३०६।३८ | तस्मात्सभ्य (शा प १३४६) | १४६।१५१ | तामिन्दुसुन्दर (मालती १ २१) | २७८।४७ |
| तरत्तरलतृष्णेन | ३७४।२०६ | तस्मात्सर्वप्रयत्नेन (पव ४ ५०) | ३४८।२५ | ताम्बूलं (शा प १४१६) | ३८५।३२५ |
| तरुकुलसुषमापहरां | २१५।२ | तस्मान्महीपतीनाम | ३६४।३१ | ताम्बूलरागोऽश्वर | ३१२।३६ |
| तरुणतरणि (शा प ३८३९) | ३३६।३९ | तस्मिन्गताद्र्धाभावे | ५८।१९७ | ताम्बूलाक्त दशन | ३५३।३९ |
| तरुणतमालकोमल | ३०४।१६१ | तस्मिन्वन्धुशरे स्मरे | २८०।९८ | ताम्बूलेन विना | १०२।४९ |
| तरुणा दिवाकरमयूख | ३२३।९ | तस्मिन्युद्धे (शा प ४०१९) | ३६३।१ | तारतारतरैरूत्त (शा प ५४४) | २०५।२ |
| तरुणिमनि (का प्र ४ ११०) | २७०।१७ | तस्या सुननुमरस्या | २७८।२४ | तारल्य मुखमेलने | ३५८।६२ |
| तरुणिमनि कृ (का प्र.१० ९०) | २५१।३२ | तस्या कचभरव्याजा | २५७।६ | ताराक्षतान्य्रवि | ३०१।७० |
| तरुणिमसमा (नीतिस ७७) | ३८७।४१६ | तस्या कि मुख | २८२।११७ | तारागणश्चन्द्रमस | २९०।१८ |
| तरुण्यालिङ्गित क(शा प ५२०) | १८४।८ | तस्या पद्म (शा प ३३५५) | २६८।३८२ | ताराधिनाथमभिजित्य | १२३।६ |
| तरुमूलयुगेन (नैषध २ ३७) | २६९।३९१ | तस्या (गीत १२ २३ ४) | ३२८।१७ | तारानायकशेखरा (रसगगाधर) | ६।८१ |
| तरुमूलादिषु (शा प९२१) | ४७।८८ | तस्या पादनख (बिल्हण) | २६९।४१९ | तारापते कुमुदिनी | २८२।१४५ |
| तरौ तीरो दूते (शा प ८०३) | २२१।२४ | तस्या प्रविष्टा (कुमार १ ३८) | २२९।२४८ | ताराविष्णूरणत्वित् | १९८।४४ |
| तर्कै तर्केशवक्त्रवाक्य | ३४।६१ | तस्या शलाका (कुमार १ ४७) | २५८।५७ | तारुण्य तरुणी | १७९।१०३४ |
| तर्केषु कर्कशतरा | ३३।३७ | तस्या श्रवणमार्गेण | २५९।६७ | तालं प्रभु स्यादनु | २६५।२७६ |
| तर्तु पर्वतसनिभेन | १८४।६६ | तस्या सान्द्र (अमरु २६) | ३११।२६ | तालीतरोरसु (शा प १०२५) | २४१।१३५ |
| तल्वेक्ष्यते (भा १२.४।४८) | ३८८।४३४ | तस्या महा (शा प ३४७९) | २८८।४० | तालीदलं (शा प ३३०७) | २६०।१२५ |
| तल्पीकृताहिरगणित | १६।४ | तस्या मुखस्याति (हर्ष) | २६२।१७९ | तावका कति न | १०४।८७ |
| तल्पे प्रभुरिव | ३५१।२३ | तस्यास्तुङ्गस्तन | २६४।२६३ | तावच्चकोरचरणा | २२५।१३५ |
| तल्पोपान्तमुपेयुषि | ३५८।६६ | तस्येवाभ्युदयो (शा प ७३९) | २०९।३ | तावज्जन्माति (पच १ २८८) | ९७।८ |
| तव करकमलस्था स्फा | ३।११ | ता जानीया परिमित | ३५९।८३ | तावतकर्णाध्वयाता | ९।१३४ |
| तव कुवलयाक्षि | ३१२।३१ | ता हेमचम्पकरुचिं | २७८।५२ | तावकविविहंगाना (शा प १८७) | ३६१।३५ |
| तव कुसुम (अ शा २.३) | २८२।१३६ | तादृङ्मस्या (शा प ३३०८) | २६१।१३२ | तावतकुलश्रीमर्यादा | ३५०।८ |