सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
सुदामा-चरित / १०५
सवैया
हाथ गह्यो प्रभु को कमला कहै, नाथ कहा तुमनै चित धारी। सन्दुल खाय मुठी दुई, दीन कियो तुमने दुई लोक-बिहारी॥ खाय मुठी तिसरी अब नाथ कहां निज बास की आस बिचारी। रंकहि आप समान कियो तुम चाहत आपहि होन भिखारी॥२२॥
दोहा
करि आचमन मुख धोय के, पान खाय सुख पाय। पौढ़े पलका पै तबैं कृष्ण पलोटैं पांय॥२३॥ बस्त्रादिक बहु भांति के, पहिराए सुखदाय। करि प्रनाम कर जोरि कै, बोले त्रिभुवन राय॥२४॥
सवैया
धन्य कहा कहिए द्विजजू तुम सों जग कौन उदार प्रवीनो। पिछली प्रीति निबाही भली बिधि दोष निवारिकै रोष न कीनो। हौं द्विज के चरणोदक हेतु अजन्म कहाय कै जन्म सुलीनो। आवन कै निज पावन सो यहां, मोसो अपावन पावन कीनो॥२५॥
दोहा
नित नित सब द्वारावती दिखराई प्रभु आप। भले बाग अनुराग सह जहां न व्यापै ताप॥२६॥ परम कृपा दिन दिन करी कृपानाथ जदुराय। मित्र भावना बिस्तारी दूनो आर भाय॥२७॥ चिंता करि सोवत भयो देख्यौ सपन विनीत। देव सकल आए गहूरि संपत लिए पुनीत॥२८॥ आज्ञा दई गुपाल जू बिसकर्मा तुम जाहु। लाइ बिभौ दुइ लोक को नगर सुदाम बसाहु॥२९॥
१०६ / सुदामा-चरित रैनि मध्य सब लाइकै करि दीजौ इकठौर । हय गयंद रथ पालकी विसकर्मा सिरमौर ॥३०॥ कवित्त कह्यौ विस्वकरमा कों हरि तुम जाय करि, नगर सुदामा जी को रचौ बेगि अवहीं । रतनजटित धाम सुबरनमई सब, कोट औ वजार बाग फूलन के तबहीं । कल्पवृक्ष द्वार गज रथ असवार प्यादे, कीजिये अपार दास दासी देव छविहीं । इंद्र औ कुबेर आदि देववधू अपसरा, गंधरब गुनी जहां ठाढ़े रहें सबहीं ॥३१॥ दोहा दंडवत करि बहु भांति सो आज्ञा श्री जदुआय । विभौ साँज सब लै चले मंदिर रचे बनाइ ॥३२॥ सवैया आए हौ आज कै कालि अबै तुम जाहुगे पर्सों कि नर्सों अबारे । पत्र लिखौं सोइ मित्र हमारे कहां उतरौगे जु जाग तुम्हारे ॥ मैं तौ रहौं दरबार के भीतर आवत हौं कबौं सांझ सबारे । मूरख मित्र की प्रीति सुनौ जहां काग उड़ै सोइ जग्ग हमारे ॥३३॥ दोहा गोपुर लौं पहुँचाय कै, फिरे सकल दरबार । मित्र वियोगी कृष्ण के, नेत्र चली जल धार ॥३४॥ प्रीति आरसी विमल है सब कोउ सेवै जानि । कपट मोरचा लगत ही होत दरस की हानि ॥३५॥
सुदामा-चरित / १०७ रहियो आवत जात इत कहत न लागी लाज। ऐसे आवन जान तें हौं अब आयौ बाज ॥३६॥ इन सोचन सोचत चले हरि को अति दुख मानि। घर की सुधि बँम्हनै नहीं दीन्हीं सुख की खानि ॥३७॥ कवित्त जगर-मगर जोति छाय रही चहुं ओर, अगर-बगर हाथी घोरन कौ सोर है। चौपर को वनो है बजारे पुनि सोरन के, महल दुकान की कतार चहुं ओर है॥ भीर-भार धकापेल चहुं दिसि देखियत, द्वारिका तें दूनों यहाँ प्यादन कौ जोर है॥ रहिबो को ठाम है न, काहु सों पिछान मेरी, बिन जाने बसे कोउ हाड़ मेरे तोरे है ॥३८॥ वेई सुरतरु प्रफुलित फुलवारिन मैं, वेई सरवर हँस बोलन-मिलन कों। वेई हेम-रिन दिसान दहलीजन मैं, वेई गजराज हय गरज पिलन कों। द्वार द्वार छरी लिए द्वारपौँरिया हैं खरे, बोलत मरोर बरजोर त्यों झिलन कों। द्वारिका तें चल्यौ भूलि द्वारिका ही आयौ नाथ, मांगियो न मो पै चारि चाउर गिलन कों ॥३६॥ फूटी एक थारी बिना टोंटनी की झारी हुतीं, बांस की पिटारी औ कथारी हुती टाट की, बेंठे बिन छुरी औ कमंडल सौ टूंक बहौ, फटे ते पाये पाटी टूटी एक खाट की।
१०८ / सुदामा-चरित पथरौटा काठि कौ कठौता कहूं दीसौ नाहिं, पीतर को लौटा हो कटोरा हौ न बाटकी। कामरी फटी सी हुती डोंड़न की माला ताक गोमती की माटी की न सुद्धि कहूं माटकी ॥४०॥ दोहा जित जित बांमन जात है तित तित के नर नारि । पायं गहत हैं बिप्र के बहु पूंछत सुभकारि ॥४१॥ गए हुते द्वारावती मिलिबे जदुकुलराय । दीन्हो कह प्रभु नै तुम्हैं हमकों देहु दिखाय ॥४२॥ बिप्र सुदामा को नगर है यह चतुर सुजान । करी कृपा यह कृस्न नै दीन्हौं द्विज को दान ॥४३॥ दैखै कहा गुपाल की गुप्तदसा द्विजदीन । जौ लौं प्रकट भयो नहीं तौ लों रह्यो मलीन ॥४४॥ हय गयंद रथ पालकी मनिमँत औं पट कोट । सहस संख की संपदा द्वारावति लगि छोट ॥४५॥ कवित्त ढारि कै उठाई बनिआई के तेऊ दिनन, हिये सूलहू न आई रही तीनि कोने की । जहां लगे हीरालाल थारे औ पिटारे रानी, बैठी तन गोरे बसै थोरी रही जोने की । सबसों पुकारत हौं मारत हौं पेट गहि, बेगि डारौ टारि यह बात नहीं होने की । केते घर छोड़ि मो गरीब ही सों बैर कियो, मेरी मढ़ी ढाहि गढ़ी कौने करी सोने की ॥४६॥
सुदामा-चरित / १०६ चौंतरा उजारि कोऊ चामीकर-धाम कियो, छानी तो उपारि डारि छाई चित्रसारी जू । जौ हौं होतो घर पै तो काहे को उठन देतो, होनहार ऐसी खोटी दसाई हमारी जू । हौं तो हो न, काहू लोभ काहू को दिखायौ वाहि, महल उठाय लयो हाय ! सुखकारी जू । लामी लूमवारी दुःख सूल को दलनहारी, गैया बनवारी काहू सोऊ मारि डारि जू ॥४७॥ दोहा द्वारपाल त्रिय एक सों कहि पठयो यह बात । सुनत चली आनंद भरी पुनि पुनि पुलकित गात ॥४८॥ सवैया तोरि डारी झोपरी करे हैं रुचि धौरहर, सुरपुर ध्रुवलोक गार गार ग्रसे हैं । अंग अंग पांति पांति लागे मनि मानिक हैं, संपदा कि भीतिन प्रबाल लाल लसे हैं । कृष्न की कृपा तें रिद्धि सिद्धिन समेत सब, कामधेनु कामतरु ते ही आनि फँसे हैं । हसि हसि बोलति सुदामा जू की बामा प्यारी, घरै आवौ घर बसे खासे घर बसे हैं ॥४६॥ मैं घर भुलानो भूलि कौन के महल आयौ, जहां लागे लाल जाल बिद्रुम महामनी । कौन की विचित्र नारि करै मनुहारि मैं तो, सकौं न निहारि नखसिख सिद्धि सौं सनी ।
११० / सुदामा-चरित द्वारिका बिहारी गिरधारी सों मिलन गयौ, भयौ नहीं काम कछु आय जिय सों बनी । जहां हो निपुन धाम तहां मेरो कौन काम, कांपै त्यों-त्यों ब्राह्मन बुलावै ज्यों-ज्यों ब्राह्मनी ॥५०॥ दोहा कही कथा सब आदि की जहि विधि सिक्षा दीन्हि। सुहिध सुदामा कों भई परी ब्राह्मनी चीन्हि ॥५१॥ चीन्हि ब्राह्मनी आपनौ कियो कृष्ण को ध्यान । मो जड़ पर ऐसी कृपा कीन्हीं कृपानिधान ॥५२॥ सवैया चंपे की पिराका है कि सोने की सिरका है कि, संपा ही को भाग है कि कला कोऊ न्यारी है । सुकवि नरोत्तम कै भूतल को भूषन है, कै चकोर पूषन कि पुन्य की उजारी है। मेरी अभिलाषा है कि कामतरुसाखा है कि, गीरवान भाषा है कि सुधाकंद क्यारी है। राग है कि रूप है कि रस है कि जस है कि, तन है कि मन है कि प्रान है कि प्यारी है ॥५३॥ दोहा मनमंडित थारा कनक सूपोदन लै राखि । सुरभीपय बेला पृथक् धर्यो कृष्नजू भाखि ॥५४॥ कंदजुक्त ज्याउर धरी पछियाउर बहु भांति । कहि न जाति मुख एक सों बहु बिजति की जाति ॥५५॥
सुदामा-चरित / १११ कवित्त कृपा कीन्हीं भारी मानियारी निरधारी तुम्हें, सुख के समूह चले आवैं छितिछोर तें । दसा जो हमारी सोऊ अधिकारी सों तिहारी, प्यारे भारी जानि कै निहारि कृपा कोर तें । पंडित हौं बड़ो कहा भूले गज बाजि देखि, कृष्न की कृपा तें धन होत बहुजोर तें । रुक्मिनीरमन के चरन दरसन ही ते, सबै सुख बरसें है आनि चहुं ओर तें ॥५६॥ दोहा सोचत जो आनंद करौ भरौ मोद मन माहिं। भक्ति करौ यदुनाथ की अब संसै कछु नाहिं ॥५७॥ बिप्र सुदामा सहित तिय उमगे परमानन्द । नितप्रति सुमिरन करत हैं हिय धरि करुनाकंद ॥५८॥ कृष्न सुदामा मित्रई कह्यो नरोत्तमदास । कहत सुनत जो हित करै ताको कबहुँ न त्रास ॥५६॥ कुण्डलिया चरित सुदामाकृष्न को पढ़ै गुनै करि हेत । ताकों सगरी संपदा कृष्न कृपा करि देत । कृष्न कृपा करि देत बात सांची यह मानौ । यामें कछु न असत्य सत्य करि सत्य सु जानौ ।
११२ / सुदामा-चरित मानौ सत्य प्रमान झूठ जग है न कृष्न को। अनुभवफल सो लहै सुदामा चरित कृष्न को ॥६०॥ दोहा विप्र सुदामा की कथा, कहैं सुनैं चितलाय । ताको श्री जदुबीरपति, निसदिन रहैं सहाय ॥६१॥
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