भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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द्वितीय अध्याय स्पष्टाधिकार (संक्षिप्त वर्णन) [ १-११ श्लोक—शीघ्रोच्च, मन्दोच्च और पात नामक काल की अदृश्य मूर्तियां ग्रहों की गति में कैसी भिन्नता उत्पन्न करती हैं। १२-१३ श्लोक—ग्रहों की आठ प्रकार की गतियों के नाम । १४ श्लोक—गणितसिद्ध और प्रत्यक्ष देखे हुए ग्रह के स्थानों की तुल्यता के लिए स्पष्टीकरण की आवश्यकता । १५-१६ श्लोक— समकोण के २४ खंडों की ज्या जानने की रीति । १७-२१ श्लोक—किस खंड की ज्या क्या होती है, इसकी सारिणी । २२वें श्लोक का परार्द्ध—उत्क्रम ज्या जानने की रीति । २३-२७ श्लोक—किस खंड की उत्क्रम ज्या क्या होती है, इसकी सारिणी । २८ श्लोक—परम विक्षेप की ज्या से क्रान्ति जानने का गुर । २९-३० श्लोक—मन्द केन्द्र से भुज ज्या और कोटि ज्या बनाना । ३१-३२ श्लोक—सारिणी में दिये हुए कोण खंडों के सिवा अन्य कोण की ज्या अनुपात से जानने की रीति । ३३ श्लोक—ज्या ज्ञात हो तो धनु या कोण कैसे जाना जाय ? ३४-३५ श्लोक—सातों ग्रहों की मंद-परिधि के मान विषम और सम पदों में क्या होते हैं ? ३६-३७ श्लोक— पांच ग्रहों की शीघ्र परिधि के मान विषम और समपदों में क्या होते हैं। ३८ श्लोक—पद के बीच में किसी बिन्दु पर मंद तथा शीघ्र परिधि का क्या परिमाण होता है । ३९ श्लोक—मन्द फल जानने का नियम । ४०-४१ का पूर्वार्द्ध—शीघ्रकर्ण जानने का नियम । ४१ श्लोक का उत्तरार्द्ध-४२ श्लोक—शीघ्र फल जानने की रीति । ४३-४४ श्लोक—ग्रहों का स्पष्ट स्थान जानने के लिए मंदफल और शीघ्रफल का संस्कार कैसे किया जाय । ४५ श्लोक—मेषादि केन्द्र में मंदफल या शीघ्र फल जोड़ना चाहिये और तुलादि केन्द्र में घटाना चाहिये । ४६ श्लोक—भुजान्तर संस्कार की आवश्यकता । ४७-४९ श्लोक—ग्रहों की मध्यगति से मन्द स्पष्टगति जानने की रीति । ५०-५१ श्लोक—मन्दस्पष्टगति से स्पष्ट गति जानने की रीति; वक्र गति कब होती हैं-। ५२ श्लोक—वक्र गति का कारण । ५३-५४ श्लोक—भौमादि पांच ग्रह शीघ्रोच्च से कितनी दूरी पर वक्री होते हैं और कहाँ पहुँच कर वक्र गति को त्यागते हैं। ५५ श्लोक—शीघ्रपरिधि के भिन्न-भिन्न परिमाण के कारण वक्रगति भिन्न-भिन्न अंतर पर होती है । ५६-५७ श्लोक—ग्रहों का विक्षेप जानने का नियम । ५८ श्लोक—ग्रहों