सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्पष्टाधिकार ७६
की स्पष्ट क्रान्ति जानने का नियम । ५६ श्लोक - ग्रहों की अहोरात्रि का मान जानने का नियम । ६० श्लोक - द्युज्या जानने की रीति । ६१ - क्षितिज्या और चर ज्या जानने की रीति । ६२-६३ श्लोक - चर ज्या के धनु से दिन और रात का परिमाण जानने का नियम । ६४ श्लोक - नक्षत्र और तिथि के मान तथा यह जानने की रीति कि ग्रह किस नक्षत्र में है । ६५ श्लोक - योग जानने की रीति । ६६ श्लोक - तिथि जानने की रीति । ६७ श्लोक - चार स्थिर कारणों के नाम और उनके समय । ६८ श्लोक - सात चर करण महीने में कितने फेरे करते हैं । ६६ श्लोक - आधी तिथि एक करण के समान होती है । ] मध्यमाधिकार नामक पहले अध्याय में मध्यम गति के अनुसार ग्रहों के स्थान जानने की रीति बतलायी गयी है। परन्तु इस रीति से ग्रह का जो स्थान मालूम होता है वह उससे बहुत भिन्न होता है जहाँ ग्रह प्रत्यक्ष देख पड़ता है । इस भिन्नता को मिटाने के लिए कुछ संस्कार करने की आवश्यकता पड़ती है । इस अध्याय में यह बतलाया गया है कि यह संस्कार कैसे किये जाते हैं । इन संस्कारों से ग्रहों का स्थान गणित से भी वही आता है जो स्पष्ट आकाश में देख पड़ता है। इसलिए इस अध्याय का नाम स्पष्टाधिकार रखा गया । अदृश्यरूपाः कालस्य मूर्तयो भगणाश्रिताः । शीघ्रमन्दोच्चपाताख्या ग्रहाणां गतिहेतवः ॥१॥ तद्वातरश्मिभिर्बद्धास्तैस्सव्येतरपाणिभिः । प्राक्पश्चादपकृष्यन्ते यथासन्नं स्वदिङ्मुखम् ॥२॥ प्रवाहाख्यो मरुत्तांस्तु स्वोच्चाभिमुखमीरयेत् । पूर्वापरावकृष्टास्ते गतीर्यान्ति पृथग्विधाः ॥३॥ ग्रहात्प्राग्भगणार्धस्थः प्राङ्मुखं कर्षति ग्रहम् । उच्चसंज्ञोऽपरार्धस्थस्तद्वत्पश्चान्मुखं ग्रहम् ॥४॥ स्वोच्चापकृष्टा भगणात्प्राङ्मुखं यान्ति यद्ग्रहाः । तत्तॆषु धनमित्युक्तमृणं पश्चान्मुखेषु च ॥५॥ अनुवाद - (१) शीघ्रोच्च, मन्दोच्च और पात नामक काल की मूर्तियां जो आंख से देखी नहीं जा सकतीं और जो स्वयम् क्रान्तिवृत्त पर चक्कर लगाती हैं ग्रहों की गति के कारण हैं। (२) यह मूर्तियां अपने दाहिने और बायें हाथों से यदि (ग्रहों से) पूरब हुईं तो पूरब की ओर और पच्छिम हुईं तो पच्छिम की ओर जैसी दूरी हो उसके अनुसार ग्रहों को जो उन (मूर्तियों) से वायु रूपी रस्सियों से बंधे हुए हैं अपनी ओर खींच लेती हैं । (३) प्रवह नामक वायु भी इन ग्रहों को इनके उच्चों की ओर ढकेल देती है। इसी कारण पूरब या पच्छिम की ओर खिचे हुए ग्रहों की