भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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८० सूर्य सिद्धान्त गतियों में भिन्नता हो जाती है । (४) यदि ग्रह का उच्च ग्रह से पूरब हो और ६ राशि या १८०° से अधिक दूर न हो तो वह ग्रह को मध्यम स्थान से पूरब की ओर खींच लेता है, परन्तु यदि १८०° से अधिक दूर हो तो (ग्रह से पच्छिम होने के कारण) वह ग्रह को पच्छिम की ओर खींच लेता है । (५) अपने-अपने उच्चों से खिंचे हुए ग्रह मध्यम स्थान से जितना पूरब की ओर बढ़े रहते हैं उतना (मध्यम स्थान में) जोड़ने से तथा जितना पच्छिम की ओर पिछड़े रहते हैं उतना (मध्यम स्थान में से) घटाने से स्पष्ट स्थान निकलता है । जोड़े जानेवाले संस्कारों को धन संस्कार तथा घटाये जाने वाले संस्कार को ऋण संस्कार कहते हैं ॥१-५॥ विज्ञान भाष्य - इन पांच तथा अगले ६-११ श्लोकों में हमारे आचार्यों की आकर्षण सम्बन्धी कल्पनाएँ हैं जिनसे सिद्ध होता है कि वह कितने सूक्ष्म निरूपण से काम लेते थे । वह देखते थे कि चक्कर लगाता हुआ ग्रह किसी समय ऐसे स्थान पर पहुँचता है जहाँ उसकी स्पष्ट गति अत्यन्त मंद पड़ जाती है । बस इसी को उन्होंने ग्रह के मन्दोच्च१ का स्थान निश्चय किया था । मन्दोच्च का स्थान भी स्थिर नहीं है, वरन् अत्यन्त मंद गति से चल रहा है, इसलिए इसको भगणाश्रित अर्थात् राशिचक्र पर चलता हुआ माना है। राशिचक्र में ग्रहों की साधारण गति पच्छिम से पूर्व को होती है । जब ग्रह अपने मन्दोच्च पर पहुँचता है तब उसकी गति अत्यन्त मंद होने के कारण मध्यम गति से कम होती है । इसलिए जब ग्रह मन्दोच्च से आगे बढ़ता है तब दिन भर में मध्यम गति से जहाँ पहुँचना चाहिये वहाँ न पहुँच कर पीछे ही रह जाता है। इस प्रकार ग्रह के मध्यम तथा स्पष्ट स्थानों में अंतर पड़ जाता है । यह अंतर प्रतिदिन बढ़ता जाता है और जब ग्रह मन्दोच्च से ६०° आगे (पूर्व की ओर) बढ़ जाता है तब यह अंतर सबसे अधिक होता है । इसके बाद यह अंतर कम होने लगता है, परन्तु ग्रह मध्यम स्थान से पीछे ही रहता है जब तक कि वह मन्दोच्च से १८०° आगे नहीं बढ़ जाता । मन्दोच्च से १८०° पर ग्रह के मध्यम और स्पष्ट स्थान एक हो जाते हैं। इससे यह कल्पना करना स्वाभाविक है कि जब ग्रह मन्दोच्च से १८०° से कम अंतर पर पूर्व की ओर रहता है तब मन्दोच्च उसको मध्यम स्थान से कुछ पच्छिम की ओर जिधर वह है खींच लेता है । इसलिए मध्यम स्थान में ऋण संस्कार करने से ग्रह का स्पष्ट स्थान निकलता है। जैसे-जैसे ग्रह मन्दोच्च से दूर होता जाता है तैसे-तैसे स्पष्ट गति अधिक होती जाती है; इसलिए यह समझा गया कि आसन्नता के अनुसार मन्दोच्च का आकर्षण बढ़ता-घटता है । १. मन्दोच्च, शीघ्रोच्च और पात की कुछ चर्चा 'विज्ञान' भाग १६ पृष्ठ १८७-१६१ में अथवा मध्यमाधिकार के २६-३३ श्लोकों के विज्ञान भाष्य में हैं ।