सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 114, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्पष्टाधिकार ६१ केपलर ने यह तीनों नियम ग्रहों के सूक्ष्म निरूपणों से सं० १६६४-१६७४ वि० (१६०६-१६१६ ई०) में बनाये थे । उसको इस बात का पता नहीं था कि किन शक्तियों से ग्रहों में इन नियमों के अनुसार गतियाँ होती हैं। कोई ७५ वर्ष तक इन नियमों की उपपत्ति नहीं बतलायी जा सकी । इसके पश्चात् न्यूटन ने यह सिद्ध किया कि विश्वव्यापी गुरुत्वाकर्षण ही इन सब का कारण है। न्यूटन ने जिन तीन नियमों के आधार पर यह सिद्ध किया है वह गति के नियम कहलाते हैं, उसी के नाम से प्रसिद्ध हैं और यह हैं :- पहला नियम—यदि कोई बाहरी शक्ति न लगायी जाय तो प्रत्येक वस्तु यां तो अपनी अचल दशा में, या सीधी रेखा में समान गति से चलती हुई दशा में, रहना चाहती है । दूसरा नियम—गति का परिवर्तन लगायी जाने वाली शक्ति के मानानुसार होता है और यह परिवर्तन उस सीधी रेखा की दिशा में होता है जिस दिशा में शक्ति लगायी जा रही हो । तीसरा नियम - प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, जो परिमाण में सदैव समान, परन्तु दिशा में विरुद्ध होती है अर्थात् प्रत्येक क्रिया के समान परन्तु उसके विरुद्ध दिशा में प्रतिक्रिया होती है । यह नियम स्वयम्प्रसिद्ध हैं। विशेष जानकारी के लिए गतिविज्ञान (Dynamics) के किसी ग्रन्थ को पढ़ना चाहिये । केपलर के पहले और दूसरे नियमों से न्यूटन ने यह सिद्ध किया कि प्रत्येक ग्रह एक ऐसी शक्ति के कारण चल रहा है, जिसकी दिशा सूर्य की ओर है और जिसका परिमाण सूर्य से ग्रह की दूरी के वर्ग के विलोम मानानुसार होता है। केपलर के तीसरे नियम से न्यूटन ने यह सिद्ध किया कि एक ग्रह की गति की वृद्धि दूसरे ग्रह की गति की वृद्धि से क्या सम्बन्ध रखती है और इसीसे उसने विश्वव्यापी गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त निकाला, जो यह है :- द्रव्य (matter) का प्रत्येक कण दूसरे कण को उस शक्ति से आकर्षित करता है, जो उन कणों की मात्राओं के गुणनफल के अनुसार तथा उन दोनों के बीच की दूरी के वर्ग के विलोम मानानुसार बदलती है । अब यह सिद्ध करना है कि यदि किसी स्थिर बिन्दु से किसी गतिमान कण तक रेखा खींची जाय और वह समान काल में समान क्षेत्रफल बनावे तो वह कण जिस शक्ति से चल रहा है उसकी दिशा उसी स्थिर बिन्दु की ओर है। यह बात चलनकलन (Differential Calculus) तथा गतिविज्ञान के आधार पर संक्षेप में