भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 838 में से

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स्पष्टाधिकार ६३ क्षेत्र की कोई सीधी भुज बना रहा है तब तक उस पर कोई शक्ति काम नहीं कर रही है और वह अपनी प्राप्त शक्ति से सीधी रेखा में जा रहा है, परन्तु एक भुज से दूसरी भुज पर जैसे ही मुड़ने लगता है वैसे ही क्षण भर के लिए कुछ न कुछ शक्ति उस पर अवश्य लगनी चाहिये, जिससे वह अपनी पहले की सीधी चाल को बदल कर दूसरी सीधी चाल पर आ जाय । जिस समय कण ख पर है उस समय की दशा पर ध्यान दो । यदि इस समय कोई शक्ति न लगे तो दूसरे पल में वह क ख की ही सीध में ख प राह पर जायगा और क ख प रेखा सीधी रेखा होगी तथा ख प और क ख समान होंगे क्योंकि गति में कोई अन्तर नहीं होगा । प को ग और स से मिला दो । स ख प त्रिभुज का आधार ख प है जो क ख के समान है और क ख की ही सीधी रेखा में है, इसलिए रेखा-गणित के अनुसार दोनों त्रिभुज स क ख और स ख प के क्षेत्रफल समान हैं। यह आरम्भ में ही मान लिया गया है कि स क ख, स ख ग इत्यादि त्रिभुजों के क्षेत्रफल समान हैं। इसलिए यह सिद्ध हो गया कि स ख प और स ख ग त्रिभुज भी परस्पर समान हैं जो एक ही आधार स ख पर हैं इसलिए रेखागणित के अनुसार यह दोनों त्रिभुज स ख और ग प समानान्तर रेखाओं के बीच में हैं अर्थात् ग प रेखा स ख के समानान्तर है। ख प के समानान्तर ग र रेखा खींचो जो स ख रेखा से र बिन्दु पर मिले । तब ख प ग र समानान्तर चतुर्भुज क्षेत्र होगा। जिस समय कण ख पर था उस समय यदि कोई शक्ति न लगी होती तो वह बिन्दु प पर पहुँचता; परन्तु शक्ति लगने से वह ग पर पहुँचा, इसलिए प्रकट है कि ख पर कण की प्रथम गति ख प थी और शक्ति लगने के कारण वह ख ग में बदल गयी । इसलिए गतिविज्ञान के ‘गति के समानान्तर चतुर्भुज-नियम’ (parallelogram of velocities) के अनुसार लगी हुई शक्ति के कारण कण में ख प की गति के साथ ख र गति का संयोग हो गया, अर्थात् ख बिन्दु पर कण में जो गति ख प दिशा की ओर थी उसमें ख र की दिशा में ख र के समान ही दूसरी गति मिल गयी, जिससे वह कण ग बिन्दु पर पहुँचा । इसलिए इस मिलने वाली शक्ति के कारण वह वस्तु स की ओर मुड़ी । इसी प्रकार यह सिद्ध हो सकता है कि बहुभुज क्षेत्र के कोण बिन्दुओं ग, घ, च पर भी जो शक्ति लगती है वह स की दिशा में ही लगती है । अब कल्पना करो कि यह बहुभुज क्षेत्र करोड़ों अत्यन्त छोटी-छोटी भुजों से बना है और स के चारों ओर घूमने वाला कण प्रत्येक छोटी-छोटी भुज को पल के करोड़वें भाग में चल कर पूरा करता है तो यह प्रकट है कि उस कण पर स की दिशा में करोड़ों बार शक्ति लगेगी। इसलिए यह सिद्ध है कि कण ने प्रायः वक्र (curved) मार्ग को स की ओर ले जाने वाली एक अनवच्छिन्न (continuon

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