सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशक्ति के कारण पूरा किया । यदि कल्पना को और बढ़ा दिया जाय और बहुभुज क्षेत्र की भुज इतनी छोटी हो जायँ कि उनकी कोई सीमा ही न बँध सके और उनकी संख्या असंख्य हो तब भी यह तर्क लागू हो सकता है । इसलिए यह सिद्ध होता है कि यदि कोई कण किसी स्थिर विन्दु के चारों ओर ऐसे मार्ग पर चले कि उससे समान काल में समान क्षेत्रफल बने तो इस कण पर जो शक्ति निरन्तर लगी हुई है वह उस स्थिर बिन्दु की दिशा में है अर्थात् वह स्थिर बिन्दु उस कण को निरन्तर आकर्षित किये हुए है । यदि स को सूर्य का केन्द्र मान लिया जाय और क, ख, ग इत्यादि को किसी ग्रह के स्थान, तो केपलर के दूसरे नियम से सिद्ध होता है कि सूर्य के चारों ओर घूमने वाले ग्रहों को उनकी थामने के लिए जो शक्ति काम कर रही है वह सूर्य की ही आकर्षण शक्ति है । इसी प्रकार ग्रह भी अपने उपग्रहों को खींच रहे हैं । दक्षिणोत्तरयोरेवं पातो राहु स्वरंहसा । विक्षिप्त्येष विक्षेपं चन्द्रादीनामपक्रमात् ॥६॥ उत्तराभिमुखं पातो विक्षिप्त्यपरार्द्धगः । ग्रहं प्राग्भगणार्द्धस्थो याम्यायामपकर्षति ॥७॥ अनुवाद—(६) चन्द्रमा आदि ग्रहों को इनके पात या राहु क्रान्तिवृत्त से विक्षेप के समान उत्तर या दक्षिण भी अपने वेग से हटा देते हैं । (७) जब पात ग्रह से पच्छिम परन्तु ६ राशि या १८०° से कम दूरी पर रहता है तब उसको क्रान्तिवृत्त से उत्तर हटा देता है और जब वह ग्रह से पूरब परन्तु ६ राशि से कम दूरी पर रहता है तब उसको क्रान्तिवृत्त से दक्षिण हटा देता है । विज्ञान भाष्य—इन दोनों श्लोकों का साधारण अर्थ यह है कि ग्रह और उसके पात के स्थानों को देखकर समझना चाहिये कि ग्रह ठीक क्रान्तिवृत्त पर है अथवा उससे कुछ उत्तर या दक्खिन हटा हुआ है । यदि ग्रह और पात दोनों एक ही जगह हों तो समझना चाहिये. कि ग्रह क्रान्तिवृत्त पर है। यदि ग्रह पात से आगे अर्थात् पूरब हो परन्तु १८०° से अधिक दूर न हो तो वह क्रान्तिवृत्त से उत्तर हटा हुआ होगा और यदि ग्रह पात से पीछे अर्थात् पच्छिम हो परन्तु १८०° से अधिक दूर न हो तो वह क्रान्तिवृत्त से दक्षिण हटा हुआ होगा । इसका कारण राहु का आकर्षण या अपकर्षण नहीं है वरन् यह है कि किसी ग्रह की कक्षा क्रान्तिवृत्त के समतल में नहीं है इसलिए ग्रह सदैव क्रान्तिवृत्त पर नहीं रहता । ग्रह की कक्षा और क्रान्तिवृत्त जिन दो विन्दुओं पर मिलते हुए जान पड़ते हैं उन्हीं को पात कहते हैं । जब ग्रह अपनी कक्षा इन दो विन्दुओं पर रहता है तब क्रान्तिवृत्त पर देख पड़ता है अन्यथा क्रान्तिवृत्त