भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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स्पष्टाधिकार ६५ से उत्तर या दखिन ऊपर कहे हुए के अनुसार होता है। क्रान्तिवृत्त से उत्तर या दखिन ग्रह की जो दूरी होती है उसी को विक्षेप कहते हैं। यह उस वृत्त पर होता है जो क्रान्तिवृत्त से समकोण बनाता हुआ कदम्ब (क्रान्तिवृत्तीय ध्रुव) से होकर जाता है। बुधभार्गवयोः शीघ्रात्तद्गत्पातो यदास्थितः । तच्छीघ्राकर्षणात्तौ तु विक्षेप्येते यथोक्तवत् ॥८॥ अनुवाद—(८) बुध और शुक्र के पात जब इनके शीघ्रोच्चों से उपर्युक्त (६, ७ श्लोकों में लिखे हुए) नियम के अनुसार होते हैं तब शीघ्रोच्चों में आकर्षण करके ग्रहों को क्रान्तिवृत्त से उत्तर या दखिन उसी प्रकार हटा देते हैं । विज्ञान भाष्य—६, ७ श्लोकों में जो नियम बतलाया गया है वह केवल सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, गुरु और शनि के लिए लागू है । बुध और शुक्र दो ग्रहों के स्थान जानने के लिए यह देखना चाहिये कि इनके शीघ्रोच्च पातों से किधर और कितनी दूर है। यदि शीघ्रोच्च पात से पूरब परन्तु १८०° से कम दूर हो तो ग्रह क्रान्तिवृत्त से उत्तर होगा और पच्छिम परन्तु १८०° से कम दूर हो तो ग्रह क्रान्तिवृत्त से दक्षिण होगा। महत्वान्मण्डलस्याऽर्कः स्वल्पमेवाऽपकृष्यते । मण्डलाल्पतया चन्द्रस्ततो बहुपकृष्यते ॥६॥ भौमादयोल्पमूर्तित्वाच्छीघ्रमन्दोच्चसंज्ञितैः । दैवतैरपकृष्यन्ते सुदूरमतिवेगिताः ॥१०॥ अतो धनर्णं सुमहत्तेषां गतिवशाद्भवेत् । आकृष्यमाणास्तैरैवं व्योम्नि यान्त्यनिलाहताः ॥११॥ अनुवाद—(६) सूर्य का मण्डल बहुत बड़ा है इसलिए वह अपने उच्च द्वारा बहुत कम खिंचता है। चन्द्रमा का मण्डल छोटा है इसलिए यह बहुत खिंचता है। (१०) मंगल आदि ग्रहों के मण्डल बहुत छोटे हैं इसलिए इनके शीघ्रोच्च मन्दोच्च देवता इनको बहुत दूर तक बड़े वेग से खींच ले जाते हैं। (११) इसलिए इनमें धन और ऋण संस्कार इनकी गति के कारण बहुत करना पड़ता है। इस प्रकार यह ग्रह अपने शीघ्रोच्च मन्दोच्च देवताओं से खिंचे हुए और प्रवह वायु का धक्का खाते हुए आकाश में चलते हैं। विज्ञान भाष्य — हमारे आचार्यों ने यह देखा कि सूर्य की अपेक्षा चन्द्रमा अपने मध्यम स्थान से पूरब या पच्छिम अधिक रहता है और मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि इत्यादि तो अपने मध्यम स्थान से कहीं अधिक पूरब या पच्छिम देख पड़ते