सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्पष्टाधिकार ६७ इसलिए उन्होंने इन ग्रहों के मण्डलों को चन्द्रमा से भी छोटा समझा जैसा कि यह प्रत्यक्ष देख पड़ते हैं, और यह निश्चय किया कि इनके मण्डल बहुत छोटे हैं इसी- लिए इनमें शीघ्रोच्चों और मन्दोच्चों के आकर्षण का प्रभाव बहुत पड़ता है । परन्तु ग्रहों के मध्यम स्थान से कुछ पूरब या पच्छिम देख पड़ने के यथार्थ कारण हैं ग्रहों की कक्षाओं के आकार । ग्रहों की कक्षाएँ दीर्घवृत्त के आकार की हैं जिनकी च्युति (eccentricity) के परिमाण एक से नहीं हैं; इसीलिए मध्यम और स्पष्ट स्थानों में मुख्यतः अन्तर पड़ता है, ग्रहों के मण्डलों के आकार के कारण नहीं । इनके आकारों का ज्ञान पिछले पृष्ठ की सारिणी से स्पष्ट होगा जो राबर्ट बाल की 'स्फेरिकल एस्ट्रानोमी' पृष्ठ ४६२ से ली गयी है । चन्द्रमा का अर्द्धव्यास १०७६ मील है । वक्रानुवक्रा कुटिला मन्दा मन्दतरा समा । तथा शीघ्रतरा शीघ्रा ग्रहाणामष्टधा गति : ॥१२॥ तत्रातिशीघ्रा शीघ्राख्या मन्दा मन्दतरा समा । ऋज्वीति पञ्चधाज्ञेया या वक्रा सानुवक्रगा ॥१३॥ अनुवाद—(१२) वक्र, अनुवक्र, कुटिल, मन्द मन्दर, सम, शीघ्रतर और शीघ्र नामक आठ प्रकार की गतियां ग्रहों में होती हैं । (१३) इनमें से अति शीघ्र शीघ्र, मन्द, मन्दतर और सम गतियां सीधी होती हैं अर्थात् जब ग्रह में यह गतियां होती हैं तब वह राशि-चक्र में पच्छिम से पूरब को जाता हुआ देख पड़ता है और वक्र के साथ जो अनुवक्र और कुटिल गतियां हैं वह वक्र गति कहलाती हैं क्योकि जब ग्रह में ऐसी गतियां होती हैं तब वह राशि-चक्र में पूरब से पच्छिम को उलटा जाता हुआ देख पड़ता है । जब ग्रह में सीधी गतियां होती हैं तब वह मार्गी और जब वक्र गतियाँ होती हैं तब वक्री कहलाता है । विज्ञान भाष्य—यह भिन्न-भिन्न गतियां ग्रह में कैसे हो जाती हैं इसका कारण हमारे सिद्धान्तों में कहीं नहीं बतलाया गया है, क्योंकि जब तक पृथ्वी अचल समझी जायगी तब तक इसका कारण अच्छी तरह नहीं समझाया जा सकता । हाँ यदि पृथ्वी को भी अन्य ग्रहों की भाँति सूर्य की परिक्रमा करती हुई मान लिया जाय जो कई प्रयोगों से सिद्ध भी हो गया है तो यह सहज ही समझा जा सकता है कि किसी ग्रहों में यह आठ गतियां कैसे देख पड़ती हैं; यद्यपि यथार्थ में ग्रह निरंतर पच्छिम से पूरब को जाता हुआ सूर्य की परिक्रमा कर रहा है । इस सम्बन्ध में मैंने 'विज्ञान' भाग १३ पृष्ठ २६४-२६६ पर जो लिखा था वही यहाँ उद्धृत करता हूँ । ७