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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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६८ सूर्य सिद्धान्त यदि आप मैदान में एक झंडा गाड़ दें और झंडे से ४,७,१०,१५,५२,९५, १९२, और ३०० फर्लांग के अन्तर पर एक एक घेरा दो तीन फुट ऊँचा करवा दें; प्रत्येक घेरे के पास एक एक घुड़सवार नियुक्त कर दें; आप स्वयं झंडे के पास खड़े हो जायें और घुड़सवारों को आज्ञा दे दें कि प्रत्येक घुड़सवार अपने अपने घेरे के पास इस तरह खड़ा हो जाय कि सब एक ही सीध में दिखाई पड़ें और तदनन्तर सब सवार एक साथ ही घेरे का इस वेग से चक्कर लगाने लगें कि सबसे पास वाला एक चक्कर ८८ सेकंड में, इससे कुछ दूरवाला २२५ सेकंड में, तीसरा ३६५ सेकंड मे, चौथा ६८७ सेकंड में, पांचवां ४३३२ सेकंड में, छठा १०७५६ सेकंड में, सातवां ५१० मिनट में और आठवां १००३ मिनट में, चक्कर पूरा करने लगे, तो जिस प्रकार यह घुड़सवार सेकंडों में आपकी परिक्रमा करते हुए जान पड़ेंगे वैसे ही सौर-मंडल में ग्रह दिनों में सूर्य की परिक्रमा करते हुये दिखाई पड़ते हैं। अंतर केवल इतना होगा कि सवार एक धरातल में चक्कर लगावेंगे पर ग्रह कुछ उत्तर दखिन हट भी जाते हैं। यदि आप झंडे के पास न खड़े होकर स्वयं झंडे से तीसरे घोड़े पर सवार होकर पहले कहे हुये वेग से चक्कर लगाने लगें तो आपको झंडे और घुड़सवार जैसे दिखाई पड़ेंगे वही दृश्य हम पृथ्वी निवासियों को ग्रहों के सूर्य का चक्कर लगाने में दिखाई पड़ता है। कभी यह जान पड़ता है कि ग्रह आगे बढ़ते जा रहे हैं और कभी जान पड़ता है कि कोई पीछे हो रहे हैं और कभी ठहरे हुये भी दिखाई पड़ते हैं। ऊपर सवारों के उदाहरण से आपको विदित हो गया होगा कि यदि सवार तीसरे घोड़े पर बैठ कर झंडे की परिक्रमा करे तो बाहर और भीतर दोनों ओर वाले घोड़ों की गतियों में वही 'वक्रानुवक्रा कुटिला' तथा 'शीघ्रा शीघ्रतरा' गतियों की विलक्षणता दिखाई देती है, जैसे पृथिवी रूपी घोड़े पर सवार पृथिवी निवासियों को अन्य ग्रहों की गतियों में विलक्षणता दिखाई देती है। समझाने के लिये हमको दो उदाहरण लेने होंगे—एक ऐसे ग्रह का जो पृथ्वी और सूर्य के बीच में है और दूसरा ऐसे ग्रह का जो सूर्य और पृथ्वी के बाहर है। पहले के लिये बुध और दूसरे के लिये मंगल २१ तथा २३ चित्रों में लिये गये हैं। चित्र २१ में सबसे बड़ा वृत्त राशि-चक्र है, जिस पर घूमता हुआ सूर्य एक वर्ष में एक चक्कर लगाता हुआ जान पड़ता है। जहाँ वसंत-विषुव लिखा हुआ है वहाँ जब सूर्य दिखलाई पड़ता है तब वसंत ऋतु का आरम्भ होता है और इस दिन दिन रात समान होते हैं। यहीं से आरम्भ करके राशिचक्र बारह भागों में बांटा गया है। इसलिये जिस-जिस भाग पर मेष वृष इत्यादि लिखा हुआ है उसे सायन मेष, सायन वृष समझना चाहिये । सायन मेष का आरम्भ २१, २२ मार्च को होता