सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्पष्टाधिकार १३७ छोटा होता है। जब ग्रह गु पर होता है, तब पृथ्वी से अत्यन्त निकट होता है। इसी स्थान को ग्रह का नीच कहते हैं। जब मंद केन्द्र ६ राशि या २७०° के समान होता है तब मध्यम ग्रह मे पर और स्पष्ट ग्रह गे पर होते हैं। इस जगह भी मध्यम और स्पष्ट ग्रहों का अंतर परम होता है। चित्र में, मे से परम मन्द फल है। सूर्य सिद्धान्त के अनुसार मन्द केन्द्र विलोम दिशा में नापा जाता है; इसलिए इस पद्धति के अनुसार कक्षावृत्त और मंद वृत्त पर १,४,७,१० के अंक इस प्रकार लिखे जाने चाहिये जैसे ३१ चित्र हैं। इससे शीघ्र केन्द्र के सम्बन्ध की सब बातें भी जानी जा सकती हैं। इसीलिए सूर्य सिद्धान्त में दोनों को एक ही चित्र द्वारा समझाया गया है। परन्तु इससे समझने में कुछ कठिनता पड़ती है। भास्कराचार्य ने इस चित्र को केवल शीघ्र-केन्द्र और इसी के सम्बन्ध की सब बातें जैसे शीघ्रफल शीघ्रकर्ण इत्यादि को जानने के लिए प्रयोग किया है। दो चित्रों से भ्रम नहीं होता। इन दो चित्रों की सहायता से ३६, ४०, ४१, ४२ और ४५वें श्लोकों की उपपत्ति सहज ही समझ में आ सकती है। ३६वें श्लोक में बतलाया गया है कि स्फुट मन्द परिधि × भुज ज्या भुजफल = --------------------------------- ३६० स्फुट मन्द परिधि × कोटि ज्या और कोटि फल = ----------------------------------- ३६० क्योंकि जब मध्यम ग्रह मा पर रहता है तब माजा भुज ज्या, मा का कोटि ज्या, गाभा भुजफल और भामा कोटिफल कहलाते हैं। ऊपर यह समझाया गया है कि <गामाभा = <मापजा और <गाभामा = <माजप, क्योंकि दोनों समकोण हैं। इसलिए △ गा भा मा और △ मा जा प सजातीय (Similar) हैं। ∴ गाभा : गामा :: माजा : माप गाभा माजा ------- = ------- गामा माप गाभा गामा अथवा ------- = ------- माजा माप परन्तु गा मा स्फुट मंद परिधि की त्रिज्या है और माप कक्षावृत्त की त्रिज्या है, और दो वृत्तों की त्रिज्याओं में परस्पर वही सम्बन्ध होता है जो उनकी परिधियों में होता है, इसलिए