भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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स्पष्टाधिकार १५७ दिन के आरम्भ और अन्त में स्पष्ट ग्रह के स्थान क्या थे; इन्हीं का अन्तर स्पष्ट दैनिक गति है। परन्तु दिन के आरम्भ और अन्त में स्पष्ट ग्रहों के स्थान जानने में बहुत गुणा भाग करना पड़ेगा इसलिए उपर्युक्त सरल क्रिया भी हो सकती है जिसकी उपपत्ति यह है :- दैनिक स्पष्ट गति == (दिन के ) अन्त का स्पष्ट ग्रह—(दिन के) आरम्भ का स्पष्ट ग्रह = (अन्त का मध्यम ग्रह ± अन्त का मन्द फल)—(आरम्भ का मध्यम ग्रह ± आरम्भ का मन्द फल) = (अन्त का मध्यम ग्रह—आरम्भ का मध्यम ग्रह) ± (अन्त का मन्द फल —आरम्भ का मन्द फल) = मध्यम दैनिक गति ± (अन्त का मन्द फल—आरम्भ का मन्द फल) (१) परन्तु (दिन के) अन्त का मन्द फल = मन्द परिधि × अन्त के केन्द्र की भुजज्या / ३६० का धनु [श्लोक ३६] और (दिन के) आरम्भ का मन्द फल = मन्द परिधि × आरम्भ के केन्द्र की भुजज्या / ३६० का धनु इसलिए इन दोनों का अन्तर (स्थूल रीति से) = मन्द परिधि / ३६० { अन्त के केन्द्र की भुजज्या — आरम्भ के केन्द्र की भुजज्या } (२) परन्तु (दिन के ) अन्त के केन्द्र की भुजज्या = (दिन के आरम्भ का केन्द्र + केन्द्र की दैनिक गति) की भुजज्या = दिन के आरम्भ के केन्द्र की भुजज्या

  • गत और गम्य पिंडों की ज्याओं का अन्तर × दैनिक केन्द्र गति / २२५ [ श्लोक ३१-३२] इसको समीकरण (२) में उत्थापन करने से तथा समान धन और ऋण पदों को छोड़ देने से, अन्त का मन्द फल — आरम्भ का मन्द फल = मन्द परिधि / ३६० × गत और गम्य पिंडों का ज्याओं का अन्तर × दैनिक गति / २२५ (३)