सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५८ सूर्य सिद्धान्त यही समीकरण (३), ४८वें श्लोक के उत्तरार्द्ध और ४६वें श्लोक के पूर्वार्द्ध का रूप है, जिसमें 'गत और गम्य पिंडों की ज्याओं के अन्तर' की जगह संक्षेप में 'दोर्ज्यान्तर' कहा गया है । समीकरण (३) को समीकरण (१) में उत्थापन करने से दैनिक स्पष्ट गति = मध्यम दैनिक गति $\pm \frac{मन्द परिधि}{३६०}$ $\times \frac{गत तथा गम्य ज्या पिण्डों का अन्तर \times मध्यम दैनिक गति}{२२५}$ (४) कर्कादि केन्द्र में धन और मकरादि में ऋण करने का कारण यह है कि जब मंद केन्द्र ३ राशि से अधिक और ६ राशि से कम होता है तब स्पष्ट दैनिक गति मध्यम दैनिक गति से अधिक अन्यथा कम होती है। (देखो चित्र २६ और ३०) । मध्यम ग्रह जितने समय में मि से मु अथवा मु से मे तक पहुँचता है उतने समय में स्पष्ट ग्रह सि से सु अथवा सु से 'से' तक पहुँचता है अर्थात् समान काल में स्पष्ट ग्रह मध्यम ग्रह से अधिक जाता है; इसलिए स्पष्ट ग्रह की दैनिक गति भी मध्यम ग्रह की दैनिक गति से अधिक होगी। इत्यादि । मन्दस्फुटीकृतां भुक्तिं प्रोज्झ्य शीघ्रोच्चभुक्तितः । तच्छेषं विवरेणाऽथ हन्यात्त्रिज्यान्त्यकर्णयोः ॥५०॥ चलकर्णहृतं भुक्तौ कर्णे विज्याऽधिके धनम् । ऋणमूनेऽधिकात्प्रोज्भ्यं भुक्तिं वक्रगतिर्भवेत् ॥५१॥ अनुवाद-(५०-५१) मन्द स्पष्ट दैनिक गति को शीघ्रोच्च की दैनिक गति से घटाकर शेष को त्रिज्या और शीघ्र कर्ण के अन्तर से गुणा कर दो, गुणनफल को शीघ्र कर्ण से भाग दे दो, लब्धि को मन्द स्पष्ट गति में जोड़ दो यदि त्रिज्या से कर्ण अधिक हो और यदि कम हो तो घटा दो । यदि लब्धि ऋणात्मक हो और मन्द स्पष्ट गति से अधिक हो तो शेष भी ऋणात्मक होगा। यह दैनिक वक्रगति होगी । विज्ञान भाष्य-इस नियम को बीजगणित के अनुसार यों लिख सकते हैं :- स्पष्ट दैनिक गति = मन्द स्पष्ट गति $\pm \frac{(शीघ्रोच्च - मन्द स्पष्ट गति) (शीघ्र कर्ण\backsimत्रिज्या)^{*}}{शीघ्र कर्ण}$ (५) *यह चिह्न $\backsim$ अन्तर प्रकट करने का चिह्न है। जिन दो संख्याओं के बीच में यह चिह्न हो उनमें से जो बड़ी हो उसमें से छोटी संख्या को घटाना चाहिये ।