सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
DevanagariHindipublished838 पृष्ठ
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१७८ सूर्य-सिद्धान्त
- (१३/१२ च³ - ४३/६४ च⁵) ज्या ३ म
- (१०३/९६ च⁴ - ४५१/४८० च⁶) ज्या ४ म + १०६७/९६० च⁵ ज्या ५म (छ) मध्यम और स्पष्ट ग्रह का सम्बन्ध प्रकट करने के लिए यही प्रधान समीकरण है। इससे यह जाना जाता हैं कि यदि द्रष्टा सूर्य के मध्यम में हो तो किसी ग्रह के मध्यम और स्पष्ट स्थान अपने अपने कक्षावृत्त में किस समय क्या होते हैं । जिस ग्रह की केन्द्र च्युति च के स्थान में रखी जायगी उसी ग्रह के मध्यम और स्पष्ट स्थानों का सम्बन्ध समीकरण (छ) से जाना जा सकता है। व्यवहार में सुविधा के लिए ज्या म, ज्या २म इत्यादि के गुणकों को च का यथार्थ मान रखकर सरल करके एक संख्या में प्रकट किया जा सकता है। जैसे गुरु की केन्द्र च्युति* ०.०४८२५४ है, इसलिए च = ०.०४८२५४ च² = ०.००२३२८४ च³ = ०.०००११२४ च⁴ = ०.०००००५४ च⁵, च⁶ के मान जानने की आवश्यकता नहीं क्योंकि दशमलव के छठे स्थान में यदि ५ का अंक हों और वह छोड़ दिया जाय तो १ विकला की अशुद्धि हो सकती है। इसलिए, स = म + (.०६६५०८ - .००००२८१) ज्या म
- (.००२६१०६ - .०००००२५) ज्या २म
- .०००१२१८ ज्या ३म + .०००००५८ ज्या४म अथवा स = म + .०६६४७६६ ज्या म + .००२६०८१ ज्या २म
- .०००१२१८ ज्या ३म + .०००००५८ ज्या ४म (ज) यह समीकरण सूर्य केन्द्रगत गुरु का स्पष्ट स्थान जानने के लिए पर्याप्त हैं। यदि म, २ म, ३ म इत्यादि की ज्याएँ भारतीय रीति से कला या विकला में प्रयोग की जायें तो समीकरण (ज) के दाहिने पक्ष में म के अतिरिक्त जो कुछ आवेगा वह *केन्द्र च्युति कई कारणों से स्थिर नहीं रहती वरन् अत्यंत मंदगति से बदलती रहती है, इसलिए भिन्न-भिन्न काल में इसका मान कुछ भिन्न होता है। यह केन्द्र च्युति संवत् १६५६ वि० के अंत की है।