सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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कालिक (periodical) भी है। इसे यूनानी ज्योतिषी टालमी ने विक्रम की दूसरी शताब्दी में ही निश्चय कर लिया था, परन्तु इसके कारण का पता न्यूटन के पहले किसी ने नहीं लगा पाया था। न्यूटन ने आकर्षण सिद्धान्त से सिद्ध किया कि चंद्रमा पर पृथ्वी का ही आकर्षण नहीं होता वरन् अन्य ग्रहों का भी पड़ रहा है और उपर्युक्त महान् अंतर का कारण सूर्य का आकर्षण है। भौतिक ज्योतिर्विज्ञान ने गणित से सिद्ध कर दिया है कि यह अंतर सूर्य के आकर्षण से पड़ता है और इस संस्कार का मुख्य रूप जब मंद केन्द्र की गणना नीच से की जाय तो यह है + १° २०' २६.''५ ✕ ज्या [२ (चन्द्रमा - सूर्य) - चन्द्र मन्द केन्द्र] । इसके आगे के पद जो बहुत सूक्ष्म हैं छोड़ दिये गये हैं। टालमी ने इस संस्कार का नाम इवेक्शन् (evection) रखा था जो अब तक प्रचलित है । स्वर्गीय बेंकटेश बापू जी केतकर ने अपने ज्योतिर्गणित में इसको च्युति संस्कार कहा है। इस पद में चंद्रमा - सूर्य का अर्थ है सूर्य से चंद्रमा का अंतर जो हमारे यहाँ तिथि के नाम से प्रकट किया जाता है। जिस समय अमावस या पूर्णिमा होती है उस समय चंद - सूर्य का मान शून्य या १८०° होता है इसलिए इस पद का रूप १° २०' २६''.५ ज्या (- चन्द्र मंद केन्द्र) या - १° २०' २६''.५ ज्या म होता है जो मंदफल संस्कार के रूप में है और जब मंदफल जोड़ा जाता है तब यह घटाया जाता है और जब मंदफल घटाया जाता है तब यह जोड़ा जाता है जिसका परिणाम यह होता है कि यदि मंदफल को इन दोनों के अन्तर के समान समझ लिया जाय तो कोई हानि नहीं होती । चूंकि मंदफल च्युति के मान पर आश्रित होता है इसलिए मंदफल के घटने से यह सूचित होता है कि चंद्रकक्षा की च्युति घट गयी है और बढ़ने से च्युति के बढ़ने की सूचना मिलती है। अर्थात् इस घट बढ़ से यह अनुमान दृढ़ होता है कि चंद्रकक्षा का आकार सदैव एक सा नहीं रहता । यह बात आकर्षण सिद्धान्त से भी पूरी तरह मेल खाती है जैसा कि आगे दिखाया जायगा । परन्तु जब चंद्र - सूर्य ६०° या २७०° होता है अर्थात अष्टमी होती है तब इसका रूप १° २०' २६.५'' ज्या [२ X ६०° - चन्द्र मन्द केन्द्र] अथवा १° २०' २६''.५ ज्या म होता है जो है तो मन्द फल संस्कार के ही रूप का परन्तु यदि मन्द फल धनात्मक होता है तो यह भी धनात्मक होता है और मंद फल ऋणात्मक होता है तो यह भी ऋणात्मक होता है । इसलिए मंदफल ५° मानने से कभी ३° आगे पीछे का अंतर पड़ जाता है। इसी कारण सप्तमी, अष्टमी और नवमी के जो समय भारतीय रीति से बनाये गये पंचांगों में लिखे रहते हैं वह आधुनिक