सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
स्पष्टाधिकार १८६
कालिक (periodical) भी है। इसे यूनानी ज्योतिषी टालमी ने विक्रम की दूसरी शताब्दी में ही निश्चय कर लिया था, परन्तु इसके कारण का पता न्यूटन के पहले किसी ने नहीं लगा पाया था। न्यूटन ने आकर्षण सिद्धान्त से सिद्ध किया कि चंद्रमा पर पृथ्वी का ही आकर्षण नहीं होता वरन् अन्य ग्रहों का भी पड़ रहा है और उपर्युक्त महान् अंतर का कारण सूर्य का आकर्षण है। भौतिक ज्योतिर्विज्ञान ने गणित से सिद्ध कर दिया है कि यह अंतर सूर्य के आकर्षण से पड़ता है और इस संस्कार का मुख्य रूप जब मंद केन्द्र की गणना नीच से की जाय तो यह है + १° २०' २६.''५ ✕ ज्या [२ (चन्द्रमा - सूर्य) - चन्द्र मन्द केन्द्र] । इसके आगे के पद जो बहुत सूक्ष्म हैं छोड़ दिये गये हैं। टालमी ने इस संस्कार का नाम इवेक्शन् (evection) रखा था जो अब तक प्रचलित है । स्वर्गीय बेंकटेश बापू जी केतकर ने अपने ज्योतिर्गणित में इसको च्युति संस्कार कहा है। इस पद में चंद्रमा - सूर्य का अर्थ है सूर्य से चंद्रमा का अंतर जो हमारे यहाँ तिथि के नाम से प्रकट किया जाता है। जिस समय अमावस या पूर्णिमा होती है उस समय चंद - सूर्य का मान शून्य या १८०° होता है इसलिए इस पद का रूप १° २०' २६''.५ ज्या (- चन्द्र मंद केन्द्र) या - १° २०' २६''.५ ज्या म होता है जो मंदफल संस्कार के रूप में है और जब मंदफल जोड़ा जाता है तब यह घटाया जाता है और जब मंदफल घटाया जाता है तब यह जोड़ा जाता है जिसका परिणाम यह होता है कि यदि मंदफल को इन दोनों के अन्तर के समान समझ लिया जाय तो कोई हानि नहीं होती । चूंकि मंदफल च्युति के मान पर आश्रित होता है इसलिए मंदफल के घटने से यह सूचित होता है कि चंद्रकक्षा की च्युति घट गयी है और बढ़ने से च्युति के बढ़ने की सूचना मिलती है। अर्थात् इस घट बढ़ से यह अनुमान दृढ़ होता है कि चंद्रकक्षा का आकार सदैव एक सा नहीं रहता । यह बात आकर्षण सिद्धान्त से भी पूरी तरह मेल खाती है जैसा कि आगे दिखाया जायगा । परन्तु जब चंद्र - सूर्य ६०° या २७०° होता है अर्थात अष्टमी होती है तब इसका रूप १° २०' २६.५'' ज्या [२ X ६०° - चन्द्र मन्द केन्द्र] अथवा १° २०' २६''.५ ज्या म होता है जो है तो मन्द फल संस्कार के ही रूप का परन्तु यदि मन्द फल धनात्मक होता है तो यह भी धनात्मक होता है और मंद फल ऋणात्मक होता है तो यह भी ऋणात्मक होता है । इसलिए मंदफल ५° मानने से कभी ३° आगे पीछे का अंतर पड़ जाता है। इसी कारण सप्तमी, अष्टमी और नवमी के जो समय भारतीय रीति से बनाये गये पंचांगों में लिखे रहते हैं वह आधुनिक
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रीति से जाने गये कालों से कभी-कभी १४, १५ घड़ी आगे पीछे रहते हैं । यह बात बापूदेव शास्त्री के पंचांग और काशी के मकरंद सारिणी से बनाये गये पंचांगों से भी प्रकट हो सकती है । न्यूटन ने इसका कारण जिस तरह समझाया है वह संक्षेप में* यह है :— चंद्रमा और पृथिवी की कक्षाओं के बीच का कोण केवल ५° के लगभग है इसलिए दोनों को एक ही धरातल में मान लेने से विशेष हानि नहीं होगी परन्तु सरलता आ जायगी । मान लो र सूरज, प पृथ्वी और च१ च२ च३ च४ चंद्रमा की कक्षा हैं । यहाँ यह न भूल जाना चाहिये कि प र, अर्थात् सूर्य से पृथिवी का अंतर प च, अर्थात् पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी का कोई ४०० गुना है । यह भी समझे रहना आवश्यक है कि चंद्रमा का विचलन इसलिए होता है कि सूर्य पृथिवी और चंद्रमा दोनों को असमान रूप से आकर्षित कर रहा है इसलिए इन दोनों के आकर्षण के अंतर के कारण यह विचलन हो रहा है । यदि यह अंतर न होता अर्थात् सूर्य का आकर्षण चंद्रमा और पृथ्वी पर समान होता तो विचलन कदापि न होता क्योंकि तब तो दोनों साथ ही साथ आगे पीछे होते और चंद्रमा की सापेक्ष गति में भिन्नता न पड़ती । चित्र ३६ से यह स्पष्ट है कि जब तक चंद्रमा च४ से च१ होता हुआ च२ तक चलता है तब तक यह पृथिवी की अपेक्षा सूर्य के निकट रहता है अर्थात् कृष्ण-पक्ष की अष्टमी से लेकर शुक्ल पक्ष की अष्टमी तक चंद्रमा पृथिवी की अपेक्षा सूर्य के निकट रहता है और शुक्ल पक्ष की अष्टमी से कृष्ण पक्ष की अष्टमी तक चंद्रमा पृथ्वी की अपेक्षा सूर्य से दूर रहता है । इसलिए आकर्षण सिद्धान्त के अनुसार पहली दशा में सूर्य का आकर्षण चंद्रमा पर अधिक होता है अर्थात् सूर्य की ओर अधिक खिंचने के कारण चंद्रमा पृथ्वी से कुछ दूर हो जाया करता है जिससे जान पड़ता है कि विचालक शक्ति (perturbing force) चंद्रमा को पृथ्वी से दूर खींचे जा रही है । चूंकि र बहुत दूर है इसलिए यह शक्ति प र के प्रायः समानान्तर दिशा में र की ओर काम कर रही है । दूसरी दशा में पृथ्वी अधिक खिंचती है, इसलिए चंद्रमा पीछे रह जाता है जिससे जान पड़ता है कि विचालक शक्ति सूर्य से विरुद्ध दिशा में चंद्रमा को धक्का देकर पृथ्वी से दूर कर रही है । यह पहले ही कहा गया है कि सूर्य बहुत दूर है इसलिए विचालक शक्ति चंद्रमा को प र के समानान्तर दिशा में र से दूर ढकेले जा रही है । इसलिए यह सिद्ध है कि यह शक्ति चंद्रमा और पृथ्वी को सदैव परस्पर दूर कर रही है, प र के प्रायः समानान्तर काम कर रही है, और इसका प्रभाव उस
- Heroes of Science : Astronomers के आधार पर
स्पष्टाधिकार १६१ चित्र ३६ समय शून्य होता है जब चंद्रमा च₂ या च₄ के पास रहता है क्योंकि उस समय चंद्रमा और पृथ्वी दोनों सूर्य से समान दूर होते हैं। मान लो यह जानना है कि जिस समय चंद्रमा च₄ और च₁ के बीच में अ पर है और नीच पृथ्वी और सूर्य की रेखा पर है उस समय विचालक शक्ति किस प्रकार काम कर रही है। विचालक शक्ति को अ क रेखा से प्रकट किया जा सकता है और 'गति के समानान्तर चतुर्भुज नियम' के अनुसार इस शक्ति को विभक्त करके अ ख और अ ग रेखाओं में प्रकट कर सकते हैं जब कि अ ख रेखा अ पर स्पर्श-रेखा है अर्थात् चंद्रमा की गति की दिशा में है और अ ग रेखा मंदकर्ण (radius vector) की सीध में है और बाहर की ओर पृथ्वी के विरुद्ध काम कर रही है। विचालक शक्ति का जो भाग (resolved part) अ ग दिशा में काम कर रहा है वह चंद्रमा
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चित्र ३७
को पृथ्वी से दूर कर रहा है और जिस समय चंद्रमा च₁ पर अर्थात् सूर्य की सीध में आ जाता है उस समय यह भाग ही प्रधान हो जाता है और दूसरा भाग शून्य हो जाता है। इसलिये विचालक शक्ति के इस भाग से चंद्रमा चाहे अ, आ, इ, ई पर
स्पष्टाधिकार १६३ जहाँ हो पृथिवी से दूर ही होता जाता है, जिसका परिणाम यह होता है कि चंद्रकक्षा अधिक लम्बी हो जाती है जैसा कि चित्र ३७ से प्रकट होता है । पूर्ण रेखा से वास्तविक चंद्र-कक्षा प्रकट होती है और कटी रेखा से चन्द्र कक्षा का नया रूप प्रकट होता है जो विचालक शक्ति के कारण हो गया है। इससे यह स्पष्ट हो जाती है कि चंद्रकक्षा की च्युति बढ़ गयी क्योंकि दीर्घवृत्ति की च्युति अधिक होने से इसका आकार लम्बा हो जाता है और कम होने से कुछ गोला हो जाता है। यह बात प्रत्यक्ष बेध से भी देखी जाती है जिसका संकेत पहले किया गया है । समीकरण 'छ' से यह भी सिद्ध है कि मंदफल संस्कार का मुख्य पद च्युति के मान पर कितना अवलम्बित है । यदि च्युति अधिक हो तो मंदफल भी अधिक होता है और च्युति कम हो तो मंदफल भी कम होता है। इसलिए यह सिद्ध है कि इस विचालक शक्ति के कारण चन्द्र कक्षा की च्युति यदि नीच सूर्य की सीध में हो तो अधिक हो जायगा जिससे मन्दफल संस्कार भी बढ़ जायगा । मन्दफल संस्कार यथार्थ जितना बढ़ जाता है उसी को च्युति संस्कार (evection) कहा गया है । इसके विरुद्ध यदि नीच सूर्य से ६०° आगे या पीछे हो तो (देखो चित्र ३८) चन्द्रकक्षा का आकार कुछ गोल हो जायगा और च्युति कम पड़ जायगी, जिससे मन्दफल संस्कार यथार्थ से उतना ही कम हो जायगा जितना पहली स्थिति में बढ़ गया है। ऐसी दशा में च्युति संस्कार ऋणात्मक हो जायगा । इससे यह सिद्ध होता है कि विचालक शक्ति के उस भाग से जो चन्द्रमा के मन्द-कर्ण की दिशा में चन्द्रकक्षा के बाहर की ओर काम कर रहा है चन्द्रमा में इतना विचलन (deviation) हो जाता है कि च्युति-संस्कार की आवश्यकता पड़ती है । अब इसके उस भाग की ओर ध्यान देना चाहिये जो चन्द्रकक्षा की स्पर्श रेखा की दिशा में काम कर रहा है। इससे यह फल होता है कि जब तक चन्द्रमा (देखो चित्र ३६) च_४ और च_१ के बीच अथवा च_२ और च_३ के बीच रहता है तब तक चन्द्रमा की साधारण गति की दशा में ही विचालक शक्ति भी अपना काम करती है ओर उसकी साधारण गति (जो पृथिवी के आकर्षण के कारण होती है) को कुछ तीव्र कर देती है। परन्तु जब चन्द्रमा च_१ ओर च_२ अथवा च_३ और च_४ के बीच में रहता है तब तब विचालक शक्ति चंद्रमा की साधारण गति के विरुद्ध काम करती हुई उसको कुछ मन्द कर देती है। यह बात चान्द्रमास के प्रत्येक पक्ष की चौथ और एकादशी को बहुत देख पड़ती है, इसलिए इन तिथियों के कालों में कुछ परिवर्तन कर देती है । इस विषमता के कारण चन्द्रमा में एक ओर संस्कार भी करना पड़ता है जिसे पाक्षिक- १३
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संस्कार (variation) कहते हैं। ज्योतिर्गणित में इसे तिथि-संस्कार कहा गया है। इसके भी कई पद हैं जिनमें मुख्य पद का रूप यह है । ३५' ४१''·६ ज्या २ (चंद्र-सूर्य) जब यह बात निश्चित हो गयी कि पृथ्वी की परिक्रमा करने के कारण चंद्रमा की दूरी सूर्य से कभी कम हो जाती है और कभी अधिक जिससे चंद्रमा में विचलन
स्पष्टाधिकार १६५ हो जाता है जो च्युति और पाक्षिक संस्कारों से जाना जा सकता है, तब यह समझना कुछ कठिन नहीं है कि सूर्य की दूरी पृथिवी से जो वर्ष भर में घटती बढ़ती रहती है उससे भी चंद्रमा के स्थान में कुछ अंतर पड़ जाता है और उपर्युक्त दो संस्कारों से पूरा नहीं होता। इसलिए एक और संस्कार की भी आवश्यकता पड़ती है जिसे वार्षिक संस्कार कहते हैं इसका मुख्य रूप यह है। ११' ४१''.९७ ज्या (सूर्य-मंद-केन्द्र) इस प्रकार चंद्रमा के चार मुख्य-मुख्य संस्कारों की चर्चा संक्षेप में हो गयी और यह भी त्र रूप से बतलाया गया है कि इनके कारण क्या हैं। इनके अतिरिक्त अनेक लघु संस्कार भी हैं जो उच्च-गणित की अच्छी जानकारी बिना समझ में नहीं आ सकते और जिनका आविष्कार गत सौ वर्षों में हुआ है जब कि गणित और वैज्ञानिक यंत्रों की सूक्ष्मता हुई है। पहले बताया गया है कि च्युति-संस्कार का आविष्कारक टालमी है जो विक्रम की दूसरी शताब्दी में यूनान में रहा है। परंतु इसका कारण न्यूटन के पहले नहीं मालूम हो पाया था। पाक्षिक-संस्कार तथा वार्षिक-संस्कार का आविष्कार टाइको ब्राही ने (Tycho Brahe जन्म १४ दि० १५४६, मृत्यु २४ अक्टूबर, १६०१ ई०) अपनी अपूर्व निरूपण-शक्ति से किया था। इसका कारण उसको भी नहीं मालूम हो सका था क्योंकि उस समय तक उच्च गणित का तथा आकर्षण सिद्धान्त का अच्छा ज्ञान नहीं था। तिथि संस्कार का कुछ संकेत अबुल वफ़ा नामक मुसलमान ज्योतिषी ने भी किया था। प्राचीन भारतीय ज्योतिषियों ने मंदफल संस्कार के अतिरिक्त अन्य किसी संस्कार की ओर ध्यान नहीं दिया था। मुंजाल १ ने (८५४ शक० ६८६ वि०) च्युति संस्कार की तरह एक संस्कार तथा एक पाक्षिक-संस्कार की चर्चा की है १. अयं संस्कारश्च "इवेक्शन् वेरियेशन् नामक संस्कारवत् प्रतिभाति । तत्र श्लोकोच । इन्दूच्चोनार्ककोटिघ्ना गत्यंशा विभवा विधोः । गुणो व्यर्केन्दु दोः कोट्यो रूप पञ्चाप्तयोः क्रमात् ॥ फले शशाङ्क तद गत्योर्लिप्ताद्ये स्वर्णयोर्वधे । ऋणं चन्द्रे धनं भुक्तौ स्वर्णं साम्यवधेऽन्यथा ॥ अत्र व्याख्याकारः 'अयं संस्कारस्थिति भ योग साधने न क्रियते पूर्वैरपेक्षितत्वात्' (गणक तरङ्गिणी पृष्ठ २१ पाद टिप्पणी)
१६६ सूर्य-सिद्धान्त और नित्यानन्द जी१ ( शक १५६१ वि० १६६६ में ) ने पाक्षिक संस्कार और पात संस्कार की चर्चा की है; परन्तु इनका प्रचार नहीं हुआ । सिद्धान्त-दर्पण से प्रकट होता है कि म० म० चन्द्र शेखर सामन्त ने भी संस्कारों की चर्चा की है । इन चारों संस्कारों के साथ चन्द्रमा सम्बन्धी प्रधान समीकरण का रूप यह होगा :— स = म
- ३७६′ ५६″.४ ज्या म ⎫
- १२′ ५४″.७ ज्या २ म ⎪
- ३६″.६ ज्या ३ म ⎬ मंदफल संस्कार
- २.″० ज्या म ⎭
- १° २०′ २६″.५ ज्या [ २ चंद्र - रवि) - म] च्युति संस्कार
- ३५′ ४१″.६ ज्या २ (चंद्र - रवि) पाक्षिक संस्कार
- ११′ ११.६७ ज्या (सूर्य मन्द केन्द्र) वार्षिक संस्कार यहाँ स चन्द्रमा का स्पष्ट केन्द्र और म चंद्रमा का मंद केन्द्र है, जब कि मन्द केन्द्र की गणना नीच (perigee) से की गयी है । ज्योतिर्गणित में च्युति और पाक्षिक संस्कार के और पद भी दिये गये हैं जो यहाँ नहीं दिये जाते । च्युति के मंद परिवर्तन के कारण अङ्कों में एकाध कला का अंतर पड़ता जाता है जिसका ध्यान रखना आवश्यक है । आधुनिक ज्योतिष का इतना परिचय देना मेरी समझ में पर्याप्त है । उदाहरण देने से विस्तार बहुत हो जायगा; इसलिए उदाहरण नहीं दिये जाते । कुजार्किगुरुपातानां ग्रहवच्छीघ्रजं फलम् । वामं तृतीयकं मान्दं बुधभार्गवयोः फलम् ॥५६॥ स्वपातोनाद्बृहस्पतेर्शीघ्रात् बुधशुक्रयोः । विक्षेपघ्नाऽन्त्यकर्णाप्ता विक्षेपस्त्रिज्यया विधोः ॥५७॥ अनुवाद—(५६) मंगल, शनि और गुरु के पातों के स्थानों में प्रत्येक के दूसरे शीघ्रफल का संस्कार उसी प्रकार करो जिस प्रकार ग्रह के साथ किया जाता है अर्थात् यदि यह धनात्मक हो तो जोड़ दो और ऋणात्मक हो तो घटा दो । ऐसा १. अत्र मन्दफलातिरिक्तः पाक्षिक नामक संस्कारश्च मध्यम रवि चन्द्रान्तर वशतश्चन्द्रे देयस्तथाऽनेन विधिना जातश्चन्द्रो विमण्डल स्थो भवति...(गणक तरंगिणी, पृष्ठ १०१)
स्पष्टाधिकार १८७ करने से इन तीन ग्रहों के पातों के स्पष्ट स्थान ज्ञात हो जायेंगे । परन्तु बुध और शुक्र के पातों के स्थानों में प्रत्येक के दूसरे मन्द फल का, जो ग्रह को स्पष्ट करने के लिए तीसरे संस्कार में काम आता है उलटा संस्कार करो अर्थात् यदि धनात्मक हो तो घटा दो और ऋणात्मक हो तो जोड़ दो । ऐसा करने से बुध और शुक्र के स्पष्ट पात ज्ञात हो जायेंगे । (५७) मंगल, शनि और गुरु प्रत्येक के स्पष्ट स्थान में से अपने-अपने पात के स्पष्ट स्थान को घटा दो जो शेष हो उसकी ज्या निकालो और इस ज्या को ग्रह के मध्यम विक्षेप से गुणा करके अन्तिम शीघ्रकर्ण से भाग दे दो तो स्पष्ट विक्षेप या शर ज्ञात हो जायगा । परन्तु बुध और शुक्र के शीघ्रोच्च के स्थानों में से इनके स्पष्ट पात घटाकर शेष की ज्या निकालनी चाहिये और इस ज्या को बुध और शुक्र के मध्यम विक्षेप से गुणा करके अन्तिम शीघ्रकर्ण से भाग देना चाहिये । चन्द्रमा का स्पष्ट शर (विक्षेप) जानने के लिए स्पष्ट चन्द्र के स्थान में से पात (राहु) का स्थान घटाकर शेष को चन्द्रमा के मध्यम विक्षेप से गुणा करके त्रिज्या से भाग दे देने से ही काम हो जाता है । विज्ञान भाष्य—उदाहरण के लिए गुरु का स्पष्ट शर जानने की रीति लिखी जाती है । १६७६ वि० की बसंत पंचमी की अर्द्धरात्रि को उज्जैन में गुरु का स्पष्ट स्थान गणना से जो कुछ आया वह ६ रा, ७° ५३' ३७" है । इसलिए इसी समय का गुरु का स्पष्ट शर निकालना सुगम होगा । एक कल्प में वृहस्पति का पात १७४ भगण करता है, इसलिए १६७६ वि० की वसंत पंचमी के दिन जब कि सृष्टि के आदि से १, ९५, ५८, ८५, ०२३ सौर वर्ष बीते हैं† वृहस्पति के पात का स्थान = १,९५,५८,८५,०२३ × १७४ / ४,३२,००,००,००० = १,९५,५८,८५,०२३ × २९ / ७२,००,००,००० = ७८ भ ६ रा १०° १६' ५८.२" या ६ रा १०° १६' ५८-२" क्योंकि पूरे भगण लिखने की कोई आवश्यकता नहीं है । परन्तु पातों की गति विलोम दिशा में अथवा पच्छिम दिशा में होती है । ────────────────────────────────────────────────── †यह १६७६ वि० की मेष संक्रान्ति के समय का है परन्तु पात की गति अत्यन्त मन्द होने से इसी को वसंत पंचमी के दिन का भी मान लेने में कोई हानि नहीं है ।
यहाँ पृष्ठ का यथावत लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
१८८ सूर्य-सिद्धान्त इसलिए ऊपर जो स्थान पात के लिए आया है वह ऋणात्मक है। इसको १२ राशि में से घटाने पर गुरु के पात का स्थान (भोगांश) साधारण रीति के अनुसार आ जावेगा। इसलिए गुरु के पात का स्थान = २^रा १६° ४०' २०"† उपर्युक्त ५६वें श्लोक के अनुसार इसी में दूसरे शीघ्र फल का संस्कार ग्रह की तरह करना चाहिये। वसंत पंचमी के दिन वृहस्पति का दूसरा शीघ्रफल + १०° ४७' और अंतिम शीघ्र कर्ण ३६०८ है। इसलिये दूसरा शीघ्रफल संस्कृत पात = २^रा १६° ४०' २" + १०° ४७' = ३^रा ०° २७' २" परंतु गुरु का स्पष्ट स्थान = ६^रा २७° ५३' ३७" ∴ ५७ वें श्लोक के अनुसार पात से गुरु का अंतर = ६^रा २७° ५३' ३७" - ३^रा ०° २७' २" = ३^रा २७° २६' ३५" यही वसंत पंचमी के दिन गुरु का विक्षेप केन्द्र हुआ। इसी विक्षेप केन्द्र की ज्या को गुरु के मध्यम विक्षेप से जो मध्यमाधिकार के ६६-७० श्लोकों के अनुसार १° या ६०' है गुणा करके अन्तिम शीघ्रकर्ण से भाग देने पर गुरु का स्पष्ट विक्षेप या शर आ जायगा। ३^रा २७° २६' ३५" दूसरे अर्थात् समपद में है इसलिए इसकी ज्या दूसरे पाद के गम्य भाग की ज्या के समान होती है। ∴ ज्या ३^रा २७° २६' ३५" = ज्या २^रा २° ३३' २५" = ज्या ६२° ३३' २५" = ३०५० कला ˙ गुरु का स्पष्ट शर = (३०५० × ६०) / ३६०८ कला = ५०' ४३" विक्षेप केन्द्र १८०° से कम है, इसलिए गुरु क्रान्ति वृत्त से उत्तर है और ५०' ४३" गुरु का उत्तर शर हुआ। †सूर्य सिद्धान्त-मध्यमाधिकार (विज्ञान परिषद्)
स्पष्टाधिकार १६६ इसी प्रकार मंगल और शनि के भी शर जाने जा सकते हैं । बुध और शुक्र के लिए कुछ भिन्नता करनी पड़ती है अर्थात् इनका विक्षेप केन्द्र जानने के लिए इनके पातों में दूसरे मंद फल का जो तीसरे कर्म में काम आता है उलटा संस्कार करके शीघ्रोच्चों के स्थानों में से घटाना पड़ता है । इसके बाद जो कुछ करना पड़ता है वह उपर्युक्त रीति की तरह होता है । चंद्रमा का स्पष्ट शर जानने के लिए यह सब झंझट करने की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि इसमें शीघ्र कर्म का संस्कार नहीं करना पड़ता । इसलिए इसके लिए वही नियम लागू है जो २८ वें श्लोक में सूर्य के लिए बतलाया गया है, अर्थात् चंद्रमा के विक्षेप केन्द्र (राहु से स्पष्ट चंद्र का अन्तर) की ज्या को चंद्रमा के परम विक्षेप अर्थात् ४° ३०' से गुणा करके ३४३८ कला से जो त्रिज्या का मान है भाग दें तो चंद्रमा का स्पष्ट शर ज्ञात हो जायगा । यदि विक्षेप केन्द्र १८०° से कम हो तो उत्तर शर होगा अन्यथा दक्षिण शर (देखो श्लोक ७ और उसका विज्ञान भाष्य तथा पृष्ठ २२ का चित्र ४) । पृष्ठ १२२ चित्र २५ में व को राहु का स्थान, व प को क्रान्तिवृत्त और व स को चंद्र कक्षा मान लिया जाय तो स प चंद्रमा का उत्तर शर होगा । विक्षेपापक्रमैकत्वे क्रान्तिर्विक्षेप संयुता । दिग्भेदे वियुता स्पष्टाभास्करस्य यथागता ॥५८॥ अनुवाद—(५८) किसी ग्रह की स्पष्ट क्रान्ति जानने के लिए उस ग्रह के स्पष्ट शर (विक्षेप) को उसी ग्रह की (मध्यम) क्रान्ति में जोड़ दो यदि शर और क्रान्ति दोनों एक ही प्रकार हों, अर्थात् यदि शर और क्रान्ति दोनों उत्तर हों या दोनों दक्षिण हों । परन्तु यदि इनकी दिशाओं में भिन्नता हो तो इन दोनों का जो अन्तर होगा वही स्पष्ट क्रान्ति होगी । सूर्य की स्पष्ट क्रान्ति जानने के लिए जो नियम पहले (२८वें श्लोक में) बतलाया गया है वही पर्याप्त है (क्योंकि सूर्य्य क्रान्ति-वृत्त पर ही भ्रमण करता है) । विज्ञान भाष्य—स्पष्ट ग्रह से क्रान्ति वृत्त का जो अन्तर कदम्ब-प्रोत-वृत्त पर होता है उसे उस ग्रह का स्पष्ट विक्षेप कहते हैं (देखो पृष्ठ २२ मध्य० तथा श्लोक ७, ८) और स्पष्ट ग्रह से विषुवद् वृत्त का जो अन्तर ध्रुव प्रोत वृत्त पर होता है उसे उस ग्रह की स्पष्ट क्रान्ति कहते हैं । चित्र ३६ में व द श उ क्रान्तिवृत्त, व दा श ऊ विषुवद् वृत्त, क कदम्ब (क्रान्तिवृत्तीय ध्रुव) और ध ध्रुव है । ग किसी ग्रह का स्थान अपने कक्षा- वृत्त में है जो चित्र में सरलता के विचार से नहीं दिखाया गया है। ग्रह इस समय
२०० सूर्य्य-सिद्धान्त क्रान्तिवृत्त के उत्तर दिखलाया गया है । यदि ग्रह ग₁ बिन्दु पर हो तो क्रान्ति वृत्त के दक्षिण होगा । क ग प कदम्ब प्रोतवृत्त क्रान्तिवृत्त पर समकोण बनाता है और ध ग च ध्रुव प्रोत वृत्त विषुवद् वृत्त पर समकोण बनाता है । प छ भी ध्रुव प्रोतवृत्त का खंड है और विषुवद् वृत्त पर समकोण बनाता है । ग प, ग का उत्तर विक्षेप, प छ, ग की उत्तर मध्य क्रान्ति और ग च, ग की उत्तर स्पष्ट क्रान्ति है । इसी प्रकार ग₁ प₁, ग₁ ग्रह का दक्षिण विक्षेप, प₁ छा, ग₁ ग्रह की उत्तर मध्य क्रान्ति और ग₁ चा, ग₁ की उत्तर स्पष्ट क्रान्ति है । पहली दशा में मध्य क्रान्ति और विक्षेप दोनों उत्तर हैं, इसलिए इन दोनों को जोड़ने से नियमानुसार स्पष्ट उत्तर क्रान्ति आयेगी । परन्तु दूसरी स्थिति में विक्षेप दक्षिण और मध्य क्रान्ति उत्तर है, इसलिए इन दोनों के अन्तर से स्पष्ट उत्तर क्रान्ति ज्ञात होगी ।
चित्र ३६ यहाँ एक बात विचारणीय है । ग प कदम्ब-प्रोतवृत्त का खण्ड है और प छ ध्रुव-प्रोत वृत्त का; इसलिए इन दोनों का योग ग च के समान नहीं होगा वरन कुछ भिन्न होगा । परन्तु आचार्य ने ऐसा ही लिखा है। इससे यह समझना चाहिये कि आचार्य के विचार में यह भिन्नता इतनी कम समझी गयी है कि इससे जो स्थूलता हो जाती है वह नहीं के समान समझ ली गयी है । भास्कराचार्य जी ने इसीलिए
स्पष्टाधिकार २०१ इस रीति को अयुक्त १ कह कर अयन वलन संस्कार करने का आदेश दिया है २ जो विस्तार भय से यहाँ न लिख कर नेपियर के नियमों के आधार पर इस संस्कार की एक सरल रीति लिखी जाती है । सुविधा के लिए चित्र ३६ का सरल रूप चित्र ४० लिया जाता है । इस चित्र में ग ग्रह का स्पष्ट स्थान, ग प ग्रह का स्पष्ट विक्षेप, ग च ग्रह की स्पष्ट क्रान्ति, व प ग्रह का सायन भोगांश, व च ग्रह का विषुवांश, और व ग चित्र ४० परम वृत्त का धनु है । इसलिए स्पष्ट है कि △ ग प व और △ ग च व समकोण गोलीय त्रिभुज है और प व च कोण क्रान्ति वृत्त और विषुष वृत्त के बीच का कोण है जिसे २८वें श्लोक में परम अपक्रम कहा गया है । यदि ग्रह का सायन भोगांश व प और स्पष्ट विक्षेप ग प ज्ञात हो तो नेपियर के नियम (२) के अनुसार समकोण △ ग व प में, कोज्या (व ग) = कोज्या (ग प) × कोज्या(व प) (१) नियम (१) के अनुसार ज्या (व प) = स्पर्श रेखा (ग प) × कोटि स्पर्श रेखा (ग व प) अथवा कोटिस्पर्श रेखा (ग व प) = ज्या (व प) × कोटि स्पर्श रेखा (ग प) (२) १ विक्षेपः कदम्बाभिमुखो भवति । ध्रुवाभिमुख्या क्रान्त्या सह कथं तस्य भिन्न दिक्कस्य योग वियोगावुचितौ । तयोर्यद्भिन्नदिक्त्वं तदायम वलन वशात् ।...... सिद्धान्त शिरोमणि गणिताध्याय, पृष्ठ २१५ २ गणिताध्याय, पृष्ठ २१७ ।
२०२ सूर्य-सिद्धान्त इन दोनों समीकरणों से व ग धनु ओर ग व प कोण जाने जा सकते हैं । फिर समकोण △ ग व च में, नियम (२) के अनुसार ज्या (ग च) = ज्या (व ग) ✕ ज्या (< ग व प + < प व च) (३) और नियम (१) के अनुसार स्पर्श रेखा (व च) = स्पर्श रेखा (व ग) ✕ कोज्या (< ग व प + < प व च) (४) समीकरण (१), (२) और (३) से किसी ग्रह या तारे का विक्षेप और सायन भोगांश ज्ञात हो तो उसकी क्रान्ति जानी जा सकती है और समीकरण (४) की सहायता से उसका विषुवांश जाना जा सकता है । इसी प्रकार यदि विषुवांश और क्रान्ति ज्ञात हों तो सायन भोगांश और विक्षेप भी जाने जा सकते हैं । ग्रहोदयप्राणहता खखाष्टैकोद्धृता गतिः । चक्रासवो लब्धयुता. स्वाहोरात्रासवस्मृताः ॥५६॥ अनुवाद-(५६) ग्रह जिस राशि में हो वह जितने प्राणों में उदय होती हो उसको ग्रह की दैनिक गति से गुणा करके १८०० से भाग देने पर जो कुछ आवे उसको पूरे चक्र के असुओं में जोड़ दिया जाय तो योगफल ग्रह'के अहोरात्र का परिमाण होता है । विज्ञान भाष्य-मध्यमाधिकार के ११-१३ श्लोकों में नाक्षत्र-अहोरात्र, घड़ी, पल, प्राण, सावन दिन इत्यादि की चर्चा विस्तार के साथ की गयी है । वहाँ यह बतलाया गया है कि एक नाक्षत्र अहोरात्र २१६०० असुओं या प्राणों का होता है और सावन दिन नाक्षत्र अहोरात्र से प्रायः ४ मिनट या १० पल या ५६ प्राण अधिक होता है क्योंकि सूर्य प्रति दिन प्रायः १ अंश पूर्व की ओर बढ़ता है जब कि नक्षत्र या तारे एक ही जगह स्थिर रहते हैं। जैसे एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय तक के समय को सावन दिन कहते हैं उसी प्रकार किसी ग्रह के पूर्व में उदय होने के समय से दूसरे दिन फिर उदय होने तक के समय को उस ग्रह का अहोरात्र कहते हैं । यदि ग्रह मार्गी हुआ तो उसका अहोरात्र नाक्षत्र-अहोरात्र से अधिक और वक्री हुआ तो कम होगा । नक्षत्र अहोरात्र से ग्रह का अहोरात्र कितना अधिक या कम होगा यही जानने की रीति इस श्लोक में बतलायी गयी है । ग्रह दिन भर में जितना आगे चलेगा या पीछे हटेगा उसी के अनुसार ग्रह का अहोरात्र नाक्षत्र-अहोरात्र से अधिक या कम होगा । त्रिप्रश्नाधिकार नामक तीसरे अध्याय में ४१-४३ श्लोकों में यह विस्तार के साथ
स्पष्टाधिकार २०३ बतलाया जायगा कि कौन राशि किस जगह कितने समय में उदय होती है । जितने समय में जो राशि जहाँ क्षितिज के ऊपर आती है अर्थात् उदय होती है उसी समय को (नाक्षत्र काल के अनुसार) उस जगह उस राशि के उदय-प्राण या उदयासु कहते हैं। इसलिए यह त्रैराशिक से सहज ही जाना जा सकता है कि जब राशि का उदय उदयप्राण के समान समय में होता है तो उस राशि में ग्रह जितना दिन भर में हटता है उतने का उदय कितने प्राण में होगा । बस नाक्षत्र अहोरात्र की अपेक्षा इतने ही प्राण अधिक बीतने पर मार्गी ग्रह दूसरे दिन क्षितिज में फिर आ जायगा । एक राशि ३० अंश या ३० X ६० या १८०० कला के समान होती है। ग्रह की दैनिक गति भी कला में ही साधारणतः प्रकट की जाती है, इसलिए यह अनुपात हुआ— १८०० कला : ग्रह की दैनिक गति : : राशि का उदय प्राण : इष्ट अन्तर ∵ इष्ट अंतर = (राशि का उदय प्राण X ग्रह की गति) / १८०० कला बस यही अंतर नाक्षत्र अहोरात्र में जो २१६०० प्राणों का होता है जोड़ने से (यदि ग्रह मार्गी हुआ) और घटाने से (यदि ग्रह वक्री हुआ) ग्रह का अहोरात्र ज्ञात होता । इस नियम में थोड़ी सी स्थूलता है । यदि ग्रह क्रान्तिवृत्त पर जिसमें कि राशियाँ होती हैं भ्रमण करता होता तो यह नियम बिल्कुल ठीक होता परन्तु वह तो अपने कक्षावृत्त में घूमता है, जिसके कारण वह या तो क्रान्तिवृत्त के उत्तर होता है या दक्षिण । यदि उत्तर हुआ तो कुछ पहले ही उदय होगा और यदि दक्षिण हुआ तो कुछ पीछे । यदि ग्रह के प्रतिदिन के उदय-काल के विषुवांश ५८ वें श्लोक के विज्ञान भाष्य के समीकरण (४) के अनुसार जान लिए जायं और विषुवांशों के अंतर को प्राणों में बदल दिया जाय तो इसको २१६०० प्राणों में जोड़ने से ग्रह के उदय- प्राण ठीक-ठीक निकलेंगे । आगे के कई श्लोकों में यह जानने की रीति बतलायी गयी है कि अहोरात्र- मान में से कितने समय तक ग्रह क्षितिज के ऊपर रहेगा और कितने समय तक क्षितिज के नीचे अर्थात् ग्रह का दिनमान और रात्रिमान कितने कितने समय के होते हैं। इसके लिए पहले यह जानना आवश्यक है कि ग्रह का चर प्राण कितना है जो नीचे लिखे श्लोकों के अनुसार जाना जाता है :— क्रान्तेः क्रमोत्क्रमज्ये द्वे कृत्वा तत्रोत्क्रमज्यया । हीना त्रिज्या दिनव्यासदलं तद्दक्षिणोत्तरम् ।।६०।।
२०४ सूर्य-सिद्धान्त क्रान्तिज्या विषुवद्भाघ्ना क्षितिज्या द्वादशोद्धृता । त्रिज्यागुणा होरात्रार्धकर्णप्ता चरजासवः ॥६१॥ अनुवाद—(६०) ग्रह की स्पष्ट क्रान्ति की ज्या और उत्क्रम ज्या दोनों जानकर उत्क्रम ज्या को त्रिज्या अर्थात् ३४३८ कला में से घटा दे तो अहोरात्र-वृत्त का व्यासार्द्ध निकल आता है । इसको द्युज्या भी कहते हैं। यदि क्रान्ति दक्षिण हो तो अहोरात्र वृत्त का व्यासार्ध दक्षिण होता है और यदि क्रान्ति उत्तर होती है तो उत्तर होता है । (६१) क्रान्ति ज्या को पलभा से गुणा करके १२ से भाग देने पर क्षितिज्या आती है जिसको त्रिज्या से गुणा करके अहोरात्र-वृत्त के व्यासार्ध से भाग देने पर जो लब्धि आती है उसे चरज्या कहते हैं । चरज्या के धनु की कला को चर प्राण कहते हैं । विज्ञान भाष्य—इन दो श्लोकों में त्रिप्रश्नाधिकार नामक तीसरे अध्याय का सार भरा हुआ है इसलिए इनमें जो पारिभाषिक शब्द आये हैं उनका विस्तृत विवेचन उसी अध्याय में मिलेगा । परन्तु इन दो श्लोकों का अर्थ समझने के लिए यह आवश्यक है कि पारिभाषिक शब्दों तथा कुछ अन्य बातों की संक्षेप में चर्चा की जाय । पलभा—जिस दिन सूर्य विषुवद् वृत्त पर होता है अर्थात् जिस दिन सूर्य सायन मेष या सायन तुला बिन्दुओं पर आता है उस दिन समतल भूमि पर सीधे गड़े हुए १२ अंगुल के शंकु की छाया मध्याह्न कालिक जितनी बड़ी होती है उसी को पलभा क कहते हैं । चित्र ४१ में समतल भूमि के ख बिन्दु पर क ख शंकु सीधा गड़ा है और क ख की नाप १२ अंगुल है तो सायन मेष संक्रान्ति के दिन मध्यान्ह काल में क ख की छाया यदि ख ग हो तो ख ग की नाप को ही ख स्थान की पलभा, विषुवद्भा, अक्षभा इत्यादि कहेंगे । इस पलभा का मान सब जगह एक सा नहीं होता वरन् अक्षांश के अनुसार बढ़ता घटता है । विषुवत् रेखा पर जहां अक्षांश शून्य होता है सायन मेष संक्रान्ति के दिन ख ग का मान शून्य होता है । विषुवत् रेखा से ज्यों- ख ग चित्र ४१
स्पष्टाधिकार २०५
ज्यों उत्तर या दक्षिण जाइये त्यों-त्यों पलभा का मान बढ़ता जायगा। उत्तर गोल में पलभा शंकु से उत्तर दिशा में होगी और दक्षिण गोल में दक्षिण दिशा में; इसलिए पलभा से किसी स्थान का अक्षांश सहज ही जाना जा सकता है। हमारे देश में इसीलिए अक्षांश अंशों में प्रकट करने की जगह पलभा की नाप में जो अंगुलों में ली जाती है प्रकट करने की परिपाटी है। ख क ग कोण को ख स्थान का अक्षांश* कहते हैं, इसलिए, अक्षांश की स्पर्शरेखा = ख ग / ख क = पलभा / शंकु = पलभा / १२ (१) इससे स्पष्ट है कि पलभा के ज्ञान से अक्षांश का मान कैसे जाना जा सकता है। हमारे ग्रन्थों में ज्या, कोज्या, और उत्क्रम ज्या के सिवा अन्य त्रिकोणमितीय अनुपातों की चर्चा नहीं है; परन्तु अन्य अनुपातों का काम और रीति से लिया जाता है; जैसे अक्षांश की स्पर्शरेखा का काम पलभा / शंकु से लिया जाता है। द्युज्या, कुज्या और चरज्या को समझने के लिए नीचे लिखे चित्र को देखो—
चित्र ४२
*ऐसा मान लेने से लम्बन के कारण तनिक सी अशुद्धि रह जाती है, जिसका विवेचन तीसरे अध्याय में किया जायगा। परन्तु इस अशुद्धि से कोई हर्ज नहीं हो सकता।
२०६ सूर्य्य-सिद्धान्त श वह स्थान है जहाँ के लिए देखना है कि ग्रह कितने समय तक क्षितिज के ऊपर रहता है । उ श द रेखा श स्थान की क्षितिज रेखा तथा ध श धा निरक्ष देश की क्षितिज रेखा है। ध, आकाशीय उत्तरी ध्रुव और धा आकाशीय दक्षिणी ध्रुव है। उ ध ख द धा यामोत्तर वृत्त और ख, श का ख का खास्वस्तिक है। पृथ्वी की दैनिक गति के कारण ग्रह नक्षत्र, सूर्य्य इत्यादि जिस जिस वृत्त पर घूमते हुए दिन में एक परिक्रमा करते देख पड़ते हैं उस-उस वृत्त को उस ग्रह, नक्षत्र, या सूर्य्य का अहोरात्र वृत्त (Diurnal circle) कहते हैं। यह अहोरात्र-वृत्त विषुवत्-वृत्त के समानान्तर१ होते हैं । तीन अहोरात्र वृत्तों के व्यास चित्र ४२ में व वा, वि वी और वु वू रेखाओं से प्रकट किये गये हैं । वि वी अहोरात्र-वृत्त का व्यास विषुवत् वृत्त से मिल जाता है । इस प्रकार वही तारे या ग्रह चलते देख पड़ते हैं जो ठीक विषुवत् वृत्त पर होते हैं। सायन विषुव संक्रान्ति के दिन सूर्य्य भी (यदि इसकी क्रान्ति की गति थोड़ी देर के लिए स्थिर मान ली जाय) इसी अहोरात्र वृत्त पर चलता हुआ देख पड़ता है। यदि किसी ग्रह की उत्तर क्रान्ति व वि धनु के समान हो तो उस ग्रह के अहोरात्र वृत्त का व्यास व वा होगा । इसी तरह यदि ग्रह की दक्षिण क्रान्ति वि वु के समान हो तो उसके अहोरात्र वृत्त का व्यास वु वू होगा । चित्र से प्रकट है कि ध श धा रेखा से जो निरक्ष देश की क्षितिज रेखा है सभी अहोरात्र वृत्त के व्यास दो समान भागों में कट जाते हैं । निरक्ष देश में जब तक सूर्य्य, तारा या ग्रह ध श धा रेखा से ऊपर रहता है तब तक वह देख पड़ता है या उदय रहता है और जब तक वह इस रेखा से नीचे रहता है तब तक नहीं देख पड़ता अथवा अस्त रहता है। इसलिए निरक्ष देश में जहाँ यह रेखा क्षितिज बनाती है सूर्य्य, चन्द्रमा, तारे, सभी - क्रान्ति चाहे जो हो— १२ घंटे तक उदय और बारह घण्टे तक अस्त रहते हैं। इस बारह घण्टे के समय में ६ घण्टे तक तो यह पूर्व क्षितिज से निकल कर ऊपर चढ़ते हुए यामोत्तर-वृत्त पर पहुँचते हैं और ६ घण्टे तक यामोत्तर वृत्त से नीचे उतरते हुए पच्छिम क्षितिज में जा लगते हैं । (प्रकाश वक्री- भवन के कारण जो थोड़ा सा अन्तर पड़ जाता है उसका विचार सुविधा के लिए यहाँ नहीं किया गया है) । निरक्ष देश से उत्तर या दक्षिण के स्थानों में केवल वही ग्रह या तारा आधे दिन तक उदय और आधे दिन तक अस्त रहता है जो विषुवत् वृत्त पर रहता है अर्थात् जिसके अहोरात्र वृत्त का व्यास वि वी से मिलता जुलता है। १. तारे का अहोरात्र वृत्त विषुवत् वृत्त के बिलकुल समानान्तर होता है । सूर्य्य, चन्द्रमा और ग्रहों के अहोरात्र वृत्तों की दिशा में तनिक सा, अन्तर इसलिये पड़ जाता है कि इनकी क्रान्ति सदैव कुछ बदलती रहती है ।
स्पष्टाधिकार २०७ परन्तु जिस ग्रह यह या तारे की क्रान्ति उत्तर होती है वह उत्तर गोल में आधे दिन से अधिक समय तक क्षितिज के ऊपर रहता है और जिसकी क्रान्ति दक्षिण होती है वह आधे दिन से कम समय तक क्षितिज के ऊपर रहता है। दक्षिण गोल में इसका ठीक उलटा होता है। आधे दिन से कितना अधिक या कम समय तक ग्रह क्षितिज के ऊपर रहता है यह उसकी क्रान्ति के मान पर आश्रित है। यदि क्रान्ति अधिक हुई तो यह अन्तर अधिक होता है और कम हुई तो कम। चित्र में जिस ग्रह की उत्तर क्रान्ति व वि है वह श स्थान पर जिसका अक्षांश ध श उ कोण के समान है उस समय तक क्षितिज के ऊपर रहेगा जितने समय तक यह प से व तक ऊपर चढ़ेगा और फिर वहाँ से उतना ही नीचे उतर कर पच्छिम क्षितिज के नीचे चला जायगा। ऊपर बतलाया गया है कि क से व तक जाने में इसको ६ घण्टे लगेंगे; इसलिए प से क तक ऊपर चढ़ने में जितना समय लगेगा ६ घण्टे से उतना ही अधिक इसको प से व तक जाने में लगेगा क्योंकि क्रान्ति उत्तर होने के कारण ग्रह क्षितिज पर उस समय आवेगा जिस समय वह प विन्दु पर पहुँचेगा। उसके प्रतिकूल यदि दक्षिण क्रान्ति होने से ग्रह के अहोरात्र वृत्त का व्यास वु वू हुआ तो जितनी देर तक वह का से पा तक जायगा ६ घण्टे से उतना ही पीछे वह क्षितिज के विन्दु पा पर पहुँचेगा। अहोरात्र वृत्त के व्यास के प क या पा का खंड को कुज्या या क्षितिज्या और इतना चढ़ने में जितना समय लगता है उसे चर-काल कहते हैं। काल प्रायः पलों या प्राणों में प्रकट किया जाता है इसलिये चर-काल को चर पल, चर प्राण अथवा चर असु कहते हैं। अहोरात्र- वृत्त के व्यासार्ध क व, श वि, या का वु को द्युज्या कहते हैं क्योंकि द्यु के अर्थ हैं दिन, अहोरात्र या प्रकाश। चा श खंड को उत्तर क्रान्ति वाले ग्रह की चरज्या और च श खंड को दक्षिण क्रान्ति वाले ग्रह की चरज्या कहते हैं। चरज्या के धनु को चर खंड और इस धनु की कला को चरप्राण कहते हैं क्योंकि एक चक्र में ३६० x ६० कलाएँ अथवा २१६०० कलाएँ और एक नाक्षत्र अहोरात्र में इतने ही प्राण होते । यहाँ यह याद रखना चाहिए कि ध प चा अथवा धा पा च वृत्तपाद विषुवत् वृत्त से समकोण बनाता हुआ खींचा गया है ? अब देखना है कि चित्र ४२ की सहायता से ६०, ६१ श्लोकों का नियम कैसे सिद्ध होता है । वि श त्रिज्या है, व क द्युज्या, व श वि कोण या व वि धनु ग्रह की क्रान्ति; इसलिये क्रान्ति ज्या = व ल = क श क्रान्ति की उत्क्रम ज्या = वि ल (देखो ११६ पृष्ठ और चित्र २४)
२०८ सूर्य-सिद्धान्त द्युज्या = व क = ल श = श वि - वि ल = त्रिज्या - क्रान्ति की उत्क्रम ज्या (२) यही ६०वें श्लोक का अर्थ है। दाहिने पक्ष का मान क्रान्ति-कोटि ज्या के समान है, ∴ द्युज्या = क्रान्ति-कोटि ज्या त्रिभुज क श प में, क श = व ल = क्रान्ति ज्या ∠ क श प = श स्थान का अक्षांश ∴ अक्षांश स्पर्शरेखा = क प / क श = क्षिति ज्या / क्रान्ति ज्या (३) परन्तु ऊपर समीकरण (१) में बतलाया गया है कि अक्षांश स्पर्शरेखा = पलभा / १२ ∴ पलभा / १२ = क्षितिज्या / क्रान्तिज्या अर्थात् क्षिति ज्या = क्रान्तिज्या × पलभा / १२ (४) परन्तु ध प चा और ध क श दोनों व क और वि श पर लम्ब हैं इसलिए क प और व क का परस्पर जो सम्बन्ध है वही चा श और श वि का भी है, अर्थात् — व क : क प : : वि श : श चा या श चा = क प × वि श / व क = क्षितिज्या × त्रिज्या / द्युज्या चा श को चरज्या भी कहते हैं, इसलिए चरज्या = क्षितिज्या × त्रिज्या / द्युज्या (५) समीकरण (४) और (५) से ६१वें श्लोक का नियम सिद्ध होता है। चरज्या का कलात्मक धनु चर प्राण कहलाता है।