सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 244, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिप्रश्नाधिकार २२१ इस अध्याय में किसी के मत से श्लोकों की संख्या ५० और किसी के मत से ५१ है । जो लोग श्लोकों की संख्या ५० मानते हैं वह कहते हैं कि ११ वें और २० वें श्लोकों में * प्रत्येक में ४ चरणों की जगह ६ चरण हैं। जो लोग ५१ मानते हैं वह प्रत्येक श्लोक चार-चार चरणों के मानते हैं। इसलिए दोनों मत मेरी समझ में अभिन्न हैं। इस समय मेरे पास सूर्य-सिद्धान्त के चार संस्मरण हैं परन्तु खेद है कि किसी दो में श्लोकों के अंकों का क्रम एक सा नहीं है। पं० इन्द्रनारायण द्विवेदी की सम्पादित पुस्तक में भी अंकों का क्रम गड़बड़ है इसलिए मैंने सुविधा के लिए ११वें और ३५वें श्लोक को तीन-तीन पंक्तियों अथवा छ छ चरणों का माना है। २०वें श्लोक को ६ चरणों का मानने से यह गड़बड़ पड़ती है कि आगे के किसी श्लोक में नियम पूर्ण नहीं होते वरन् एक श्लोक का उत्तरार्द्ध और दूसरे श्लोक का पूर्वार्द्ध मिलाना पड़ता है। ३५ वें श्लोक को ६ चरणों का मान लेने से ३६-४२ श्लोकों में ही यह असुविधा रहती है। इस अध्याय में सूर्य के वेध से दिशा, देश (स्थान) और काल की जानकारी करने की अनेक रीतियाँ वर्णित हैं। वेध के लिए केवल एक यंत्र काम में लाया गया है जिसे शंकु कहते हैं। किसी कठिन धातु या हाथीदांत की एक सीधी नोकदार छड़ समतल भूमि में खड़ी गाड़कर उसी की छाया से सब काम लिया गया है। इसी को शंकु कहा गया है। यंत्राध्याय में और भी यंत्रों का वर्णन है परन्तु इस जगह केवल शंकु की चर्चा है। यह स्पष्ट है कि सूर्य का बिम्ब बहुत बड़ा देख पड़ता है और शंकु की छाया की नोक बहुत सूक्ष्मतापूर्वक नहीं निश्चित की जा सकती है इसलिए शंकु से जो जो बातें जानी जा सकती हैं वह कुछ स्थूल हैं। आजकल दूरदर्शक यंत्र से वेध करने से अधिक सूक्ष्मता हो सकती है परन्तु प्राचीन काल में शंकु बड़ा उपयोगी था। इससे वेध करके जितनी सूक्ष्मता हो सकती थी उसे प्राप्त करने में हमारे ज्योतिषियों ने बहुत कुशलता दिखलायी है इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। दूरदर्शक यंत्र की सहायता से कुछ ऐसी बातों का भी आविष्कार हुआ है जिनके संस्कार के बिना दिशा, देश और काल का ज्ञान स्थूल रहता है इसलिए आवश्यकता है कि उनकी भी चर्चा की जाय । इसलिए विज्ञान भाष्य में लम्बन (parallax) किरणवक्रीभवन (refraction of light), अयन चलन का कारण, अक्ष विचलन (nutation), भूचलन संस्कार (aberration of light) और काल- समीकरण (equation of time) का विस्तारपूर्वक वर्णन किया जायगा ।
- पं० इन्द्रनारायण द्विवेदी सम्पादित सूर्य-सिद्धान्त पृष्ठ १८०