भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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२२२ सूर्य-सिद्धान्त दिशाओं के निश्चय करने की रीति शिलातलेऽम्बुसंसिद्धे वज्रलेपेऽपि वा समे । तत्रशङ्कवङ्‌गुलैरिष्टैः समं मण्डलमालिखेत् ॥१॥ तन्मध्ये स्थापयेच्छङ्कुं कल्पितद्वादशाङ्गुलम् । तच्छायाग्रं स्पृशेद्यत्र वृत्तं पूर्वापराह्वण्योः ॥२॥ तत्र विन्दू विधातव्यौ वृत्ते पूर्वापराभिधौ । तन्मध्ये तिमिना रेखा कर्तव्या दक्षिणोत्तरा ॥३॥ याम्योत्तरदिशोर्मध्ये तिमिना पूर्वपश्चिमे । दिङ्मध्यमत्स्यैः संसाध्या विदिशस्तद्वदेव हि ॥४॥ अनुवाद—(१) जल के द्वारा शोधकर समतल किये हुए पत्थर के तल पर अथवा वज्रलेप (सुर्खी चूने इत्यादि) से बने हुए समतल चबूतरे पर शंकु के अनुसार इष्ट अंगुल के व्यासार्ध का एक वृत्त खींचो । (२) इस वृत्त के केन्द्र में बारह अंगुल का एक शंकु लम्ब रूप में स्थापित करो। इसकी छाया की नोक मध्याह्न के पहले और पीछे वृत्त को जहाँ स्पर्श करे, (३) वहाँ वृत्त पर दो बिन्दु बना दो। इनको पूर्वाह्न और अपराह्न बिन्दु कहते हैं। इन दो विन्दुओं के बीच में तिमि द्वारा उत्तर-दक्षिण रेखा खींचो । (४) उत्तर दक्षिण दिशाओं के बीच में तिमि द्वारा पूर्व-पश्चिम-रेखा खींचो। इस प्रकार दो दिशाओं के बीच में तिमि द्वारा ईशान आदि विदिशाओं की रेखाएँ खींचो। विज्ञान भाष्य—यह जानने के लिए कि कोई तल सम है या नहीं सबसे सुगम रीति यह है कि तल के किनारे चारों ओर गीली मिट्टी की आड़ करके उसमें एक या डेढ़ अंगुल गहरा पानी भर दो और किसी सीधी सींक से देखो कि सब जगह पानी की गहराई एक ही है या भिन्न भिन्न । यदि सब जगह पानी की गहराई एक ही हो तो समझना चाहिए कि तल सम है । आजकल यह काम स्पिरिट लेवेल (Spirit level) से होता है । वज्रलेप – पहले सुर्खी चूने में कई प्रकार का मसाला मिलाकर ऐसा गारा बनाया जाता था जिसकी गच वज्र की तरह कठिन हो जाती थी । ऐसे गारे को वज्रलेप कहते हैं । बराही* संहिता में वज्रलेप बनाने की एक विधि यों है :— *सत्तावनवां अध्याय श्लोक १-३