सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
२२२ सूर्य-सिद्धान्त दिशाओं के निश्चय करने की रीति शिलातलेऽम्बुसंसिद्धे वज्रलेपेऽपि वा समे । तत्रशङ्कवङ्गुलैरिष्टैः समं मण्डलमालिखेत् ॥१॥ तन्मध्ये स्थापयेच्छङ्कुं कल्पितद्वादशाङ्गुलम् । तच्छायाग्रं स्पृशेद्यत्र वृत्तं पूर्वापराह्वण्योः ॥२॥ तत्र विन्दू विधातव्यौ वृत्ते पूर्वापराभिधौ । तन्मध्ये तिमिना रेखा कर्तव्या दक्षिणोत्तरा ॥३॥ याम्योत्तरदिशोर्मध्ये तिमिना पूर्वपश्चिमे । दिङ्मध्यमत्स्यैः संसाध्या विदिशस्तद्वदेव हि ॥४॥ अनुवाद—(१) जल के द्वारा शोधकर समतल किये हुए पत्थर के तल पर अथवा वज्रलेप (सुर्खी चूने इत्यादि) से बने हुए समतल चबूतरे पर शंकु के अनुसार इष्ट अंगुल के व्यासार्ध का एक वृत्त खींचो । (२) इस वृत्त के केन्द्र में बारह अंगुल का एक शंकु लम्ब रूप में स्थापित करो। इसकी छाया की नोक मध्याह्न के पहले और पीछे वृत्त को जहाँ स्पर्श करे, (३) वहाँ वृत्त पर दो बिन्दु बना दो। इनको पूर्वाह्न और अपराह्न बिन्दु कहते हैं। इन दो विन्दुओं के बीच में तिमि द्वारा उत्तर-दक्षिण रेखा खींचो । (४) उत्तर दक्षिण दिशाओं के बीच में तिमि द्वारा पूर्व-पश्चिम-रेखा खींचो। इस प्रकार दो दिशाओं के बीच में तिमि द्वारा ईशान आदि विदिशाओं की रेखाएँ खींचो। विज्ञान भाष्य—यह जानने के लिए कि कोई तल सम है या नहीं सबसे सुगम रीति यह है कि तल के किनारे चारों ओर गीली मिट्टी की आड़ करके उसमें एक या डेढ़ अंगुल गहरा पानी भर दो और किसी सीधी सींक से देखो कि सब जगह पानी की गहराई एक ही है या भिन्न भिन्न । यदि सब जगह पानी की गहराई एक ही हो तो समझना चाहिए कि तल सम है । आजकल यह काम स्पिरिट लेवेल (Spirit level) से होता है । वज्रलेप – पहले सुर्खी चूने में कई प्रकार का मसाला मिलाकर ऐसा गारा बनाया जाता था जिसकी गच वज्र की तरह कठिन हो जाती थी । ऐसे गारे को वज्रलेप कहते हैं । बराही* संहिता में वज्रलेप बनाने की एक विधि यों है :— *सत्तावनवां अध्याय श्लोक १-३
त्रिप्रश्नाधिकार २२३ तेंदू के कच्चे फल, कैथा के कच्चे फल, सेमल के फूल, सल्लकी के बीज, बंधन की छाल और बव इन सबको जल में पकाकर काढ़ा बनावे, जब आठवां भाग पानी रह जाय तब उतार कर इसमें श्रीवास (सरल वृक्ष का गोंद) रस, गूगल, भिलावा, कुंदरू, राल, अलसी और बेल की गिरी पीसकर मिलावे तो वज्रलेप तैयार होता है । तिमि - यदि दो वृत्त एक दूसरे को काटते हुए खींचे जायँ तो इनके बीच का भाग मछली के आकार का हो जाता है । इसी को तिमि कहते हैं । चित्र ४४ में वृत्त के मध्य में श शंकु का स्थान है । मध्याह्न के पहले शंकु की छाया जब श क के समान होती है तब इसकी नोक परिधि के क बिन्दु पर पहुँचती है । मध्याह्न के पीछे जब छाया श ख के समान फिर होती है तब इसकी नोक परिधि के ख बिन्दु पर पहुँचती है । बस इन्हीं क, ख बिन्दुओं को केन्द्र मानकर समान व्यासार्द्ध के दो वृत्त ऐसे खींचे जिनसे ग घ क्षेत्र तिमि के आकार का बनता है । इसके सामान्य बिन्दुओं को मिलाने वाली रेखा ही उत्तर दक्षिण रेखा है । यह रेखा पहले वृत्त को जिन बिन्दुओं पर काटती है उन पर उत्तर दिशा सूचित करने के लिए उ और दक्षिण दिशा सूचित करने के लिए द लिख देना चाहिये । फिर उ और द को केन्द्र मानकर समान व्यासार्द्ध के दो और धनु खींचकर इनके सामान्य बिन्दुओं को एक सीधी रेखा से मिला दो । इसी को पूर्व-पश्चिम रेखा कहेंगे । पच्छिम दिशा सूचित करने के लिए प और पूर्व दिशा के लिए पू लिखना चाहिये । फिर उ और प बिन्दुओं को केन्द्र मान कर समान व्यासार्द्ध के दो धनु खींचकर उनके सामान्य बिन्दुओं को मिलाने वाली रेखा उ और प के बीच में जिस बिन्दु पर परिधि को काटेगी वह वायव्य कोण की दिशा और पू द के बीच में जिस बिन्दु पर काटेगी वह अग्नि कोण की दिशा होगी । इसी प्रकार ईशान और नैऋत्य कोण की दिशा भी जानी जा सकती है । उपपत्ति-उदय के समय सूर्य पूर्व क्षितिज के जिस बिन्दु पर देख पड़ता है उससे दक्षिण की ओर खसकता हुआ ऊँचा उठता जाता है और किसी खड़ी लकड़ी या शंकु की छाया छोटी होती हुई उत्तर की ओर खसकती जाती है । मध्याह्न काल में सूर्य यामोत्तर-वृत्त पर आ जाता है । उस समय छाया सबसे छोटी और ठीक उत्तर दिशा में होती है । इसके बाद सूर्य कुछ कुछ उत्तर की ओर खसकता हुआ नीचे उतरने लगता है और छाया उत्तर दिशा से पूर्व की ओर खसकती हुई बड़ी होती जाती है । मध्याह्न काल से जितना समय पहले शंकुकी छाया उत्तर दिशा से जितना बड़ा कोण बनाती हुई पच्छिम की ओर रहती है, मध्याह्न से उतना ही समय पीछे छाया उत्तर दिशा से उतना ही बड़ा कोण बनाती हुई पूर्व की ओर रहती है । मध्याह्न से समान
२२४ सूर्य-सिद्धान्त काल आगे और पीछे, छाया की लम्बाई भी समान* होती है। इसलिए जब छाया की लम्बाई खिंचे हुए वृत्त के व्यासार्द्ध के समान हो तब इनके बीच में जो कोण बनता है उसको दो समान भागों में विभाजित करने वाली रेखा ही उत्तर-दक्षिण- रेखा होगी । इसी समविभाजक रेखा को खींचने के लिए समान व्यासार्द्ध के धनु खींचकर तिमि बनाने का आदेश दिया गया है जो रेखागणित की विधि के अनुसार है। इसी नियम के अनुसार अन्य दिशाओं को सूचित करने वाली रेखाएँ खींची जा सकती हैं। वृत्त पर जो पूर्वाह्न और अपराह्न विन्दु छाया की नोक के द्वारा स्थिर किये जाते हैं उनको मिलाने वाली रेखा भी पूर्व-पच्छिम-रेखा है परन्तु भविष्य में गड़े हुए शंकु से काम लेने के लिए आवश्यक है कि दिशासूचक जितनी रेखाएं खींची जायें वह सब शंकु के मध्य से होकर जायें। इसलिए वृत्त के उत्तर दक्षिण विन्दुओं से तिमि बनाकर पूर्व-पच्छिम-रेखा खींचने का आदेश है । क्रान्ति के सदैव बदलते रहने के कारण जो तनिक सी स्थूलता आ जाती है उसके संशोधन के लिए भास्कराचार्य † जी तथा अन्य ज्योतिर्विदों ने नियम बनाये हैं परन्तु उनके वर्णन करने की आवश्यकता नहीं जान पड़ती । इन संशोधनों से उपर्युक्त रीति की सरलता जाती रहती है। यदि शुद्धता के लिए कठिन नियम की आवश्यकता हो तो दिगंश जानने की रीति से ही क्यों न काम लिया जाय जिसकी चर्चा इसी अध्याय में की जायगी । चतुरश्रं बहिः कुर्यात्सूत्रैर्मध्याद्विनिर्गतैः । भुजसूत्राङ्गुलेस्तत्र दत्तेरिष्टप्रभागतः ।।५।। अनुवाद - (५) केन्द्र से उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पच्छिम रेखाएं छाया के समान व्यासार्द्ध से खींची गयी परिधि के जिन विन्दुओं पर पहुँचती हैं उनको स्पर्श करती हुई रेखाएँ खींच कर समचतुर्भुज क्षेत्र बनाओ । पूर्वापर रेखा से समकोण बनाती
- सूर्य की क्रान्ति सदैव बदलती रहती है इसलिए मध्याह्न के पहले और पीछे की क्रान्तियों में कुछ अंतर पड़ जाता है जिससे उपर्युक्त कथन में कुछ स्थूलता आ जाती है परन्तु यह नहीं के समान समझना चाहिए । जिस समय क्रान्ति की गति बहुत मन्द होती है अर्थात् जिस समय सूर्य उत्तरायन या दक्षिणायन विन्दुओं के पास रहता है उस समय यह बात अधिक शुद्ध होगी । †तत्कालापमजीवयोस्तु विवराद्वाकर्णमित्याहतालम्बज्याप्तमिताङ्गुलै- रयनदिश्यैन्द्री स्फुटा चालिता ।।८।। गणिताध्याय, त्रिप्रश्नाधिकार पृष्ठ १०४-१०५
त्रिप्रश्नाधिकार २२५
चित्र ४४
हुई इष्ट भुज के समान सीधी रेखा खींचो जो परिधि तक पहुँचे । परिधि के जिस विन्दु तक भुज की नोक पहुँचे उसको शंकु के मध्य से मिला दो तो छाया की दिशा ज्ञात होगी । विज्ञान भाष्य — चित्र ४५ में श शंकु का केन्द्र है और श छ किसी समय की छाया है । श को केन्द्र मानकर श छ के व्यासार्द्ध से परिधि खींची गयी है । प पू पूर्वापरा रेखा अथवा पूर्व-पच्छिम रेखा है और उ द उत्तर-दक्खिन रेखा है । पूर्वापरा रेखा से छाया की नोक छ का अन्तर छ भ के समान और उत्तर-दक्खिन रेखा से छ का अंतर छ क के समान है । छ भ को छाया का भुज और छ क को छाया की कोटि कहते हैं । इस श्लोक का अर्थ यह है कि यदि छाया और भुज की नाप ज्ञात हो तो छाया की दिशा कैसे जानी जा सकती है । आजकल की प्रथा के अनुसार इसको यों कह सकते हैं कि यदि छाया की नोक के भुजयुग्म (coordinates) ज्ञात हों तो छाया कैसे खींची जा सकती है । पूर्वापरा रेखा से छाया की नोक के अंतर का छाया का भुज और उत्तर-दक्खिन रेखा से छाया की नोक के अंतर का १५
२२६ सूर्य-सिद्धान्त छाया की कोटि कहते हैं । किसी समय की छाया और इसके भुज में जो सम्बन्ध होता है वह २३-२४ श्लोकों में बतलाया गया है । यदि छ श रेखा बढ़ायी जाय तो वह परिधि को स बिन्दु पर काटेगी । इसी श स दिशा में सूर्य होगा जब कि शंकु की छाया श छ होगी । इस समय सूर्य पूर्व बिन्दु पू से जितना दक्षिण है वह पू श स कोण से जाना जा सकता है । यही कोण इस समय सूर्य की अग्रा है । उत्तर बिन्दु उ से सूर्य उ श स कोण के अंतर पर है । यही कोण इस समय सूर्य का दिगंश (azimuth) है । इस चित्र में सूर्य पूर्वापर रेखा से दक्खिन है । यदि सूर्य पूर्वापरा रेखा से उत्तर हो तो छाया, अग्रा, भुज, इत्यादि ४६ चित्र के अनुसार होंगी । जिस दिन सूर्य विषुवद्वृत्त पर होता है उस दिन अर्थात् सायन मेष या सायन तुला संक्रान्ति के दिन मध्याह्न में शंकु की छाया जितनी बड़ी होती है उसको विषुवद्भा, पलभा या अक्षभा कहते हैं । यदि श स्थान की पलभा श व के समान हो तो व से पूर्वापरा रेखा के समानान्तर खींची गयी त थ रेखा को विषुवद्भाप्रगा रेखा कहते हैं । छाया की नोक से विषुवद्भाग्रगा रेखा का जो अन्तर होता है वही अग्राज्या कहलाता है । ४५-४६ चित्रों में छ अ अग्राज्या है । ★सममण्डल, उन्मण्डल और विषुवन्मण्डल★ प्राक्पश्चिमाश्रिता रेखा प्रोच्यते सममण्डलम् । उन्मण्डलं च विषुवन्मण्डलं परिकीर्त्यते ॥६॥
त्रिप्रश्नाधिकार २२७ चित्र ४६ अनुवाद-(६) सममण्डल, उन्मण्डल और विषुवन्मण्डल पूर्व और पश्चिम विन्दुओं पर होते हैं । विज्ञान भाष्य - इस श्लोक का शब्दार्थ यह है-पूर्व पश्चिम विन्दुओं से जानेवाली रेखा को सम-मण्डल कहते हैं और उसी को उन्मण्डल और विषुवन्मण्डल भी कहते हैं । परन्तु यथार्थ में यह तीनों शब्द भिन्न-भिन्न अर्थ रखते हैं इसलिये अनुवाद में मैंने अन्य कई टीकाकारों के विरुद्ध वही अर्थ लिखा है जो उचित है । जान पड़ता है कि इस श्लोक का शुद्ध रूप यह नहीं है वरन् भ्रम के कारण ऐसा कर दिया गया है। रंगनाथजी ने अपनी गूढ़ार्थ प्रकाशिका टीका में इसी को शुद्ध मान कर इन तीनों शब्दों की एकरूपता सिद्ध करने की चेष्टा की है परन्तु वह युक्तियुक्त नहीं जान पड़ती क्योंकि यह तीनों शब्द बहुत प्राचीन काल से भिन्न- भिन्न अर्थ रखते आये हैं और इनमें समानता केवल इतनी है कि यह तीनों मण्डल पूर्व पश्चिम विन्दुओं से होकर जाते हैं । सममण्डल (prime vertical) उस ऊर्ध्वाधर (vertical) वृत्त को कहते हैं जो खस्वस्तिक और पूर्व पश्चिम विन्दुओं से होकर जाता है ।
२२८ सूर्य-सिद्धान्त उन्मण्डल,(six o'clock line) उस वृत्त को कहते हैं जो पूर्व पश्चिम बिन्दुओं और उत्तरी दक्षिणी आकाशीय ध्रुवों से होकर जाता है। यही निरक्षदेश पर क्षितिज होता है । विषुवन्मण्डल (celestial equator) उस वृत्त को कहते हैं जो पूर्व पश्चिम बिन्दुओं से होकर जाता है और उत्तरी दक्षिणी आकाशीय ध्रुवों से समान अन्तर पर होता है । चित्र ४७ चित्र ४७ का विवरण— श...दर्शक का स्थान धा...दक्षिणी आकाशीय ध्रुव उ...उत्तर विन्दु ख...खस्वस्तिक पू...पूर्ण विन्दु उ पू द प...क्षितिज वृत्त द...दक्षिण विन्दु ध पू धा प...उन्मण्डल प...पश्चिम विन्दु प ख पू...सममण्डल ध...उत्तरी प्रकाशीय ध्रुव प व पू...विषवन्मण्डल वा विषुवद्वृत्त व...यामोत्तर वृत्त और विषुवद्वृत्त का सामान्य विन्दु उ ध ख व द धा...यामोत्तर वृत्त
त्रिप्रश्नाधिकार २२६ चित्र ४२ में एक एक वृत्त या मंडल के लिये केवल एक एक सीधी रेखा खींची गयी है। हां यामोत्तर वृत्त दोनों में एक ही तरह खींचा गया है । अग्राज्या रेखा प्राच्यपरा साध्या विषुवद्भाप्रगा तथा । इष्टच्छायाविषुवतोः मध्यमग्राऽभिधीयते ॥७॥ अनुवाद—(७) पलभा के अग्र से जानेवाली पूर्व पश्चिम रेखा के समानान्तर रेखा को विषुवद्भाग्रगा रेखा कहते हैं। इष्ट छाया की नोक से विषुवद्भाग्रगा रेखा का जो अन्तर होता है वह अग्रा कहलाती है । विज्ञान भाष्य—चित्र ४५-४६ में जिसको अग्राज्या बतलाया गया है वही यहाँ अग्रा कही गयी है । आचार्य ने कोण और उसके सामने के भुज दोनों को अनेक स्थानों पर अग्रा शब्द से सूचित किया है परन्तु मैं कोण को अग्रा और अग्रा के सामने के भुज को अग्राज्या लिखूँगा जिससे भ्रम न हो । छायाकर्ण शङ्कुच्छायाकृतियुतेर्मूलं कर्णोऽस्य वर्गंतः । प्रोज्झ्य शङ्कुकृतिमूलं छाया शङ्कुर्विपर्ययात् ॥८॥ अनुवाद—(८) शंकु और छाया प्रत्येक के वर्ग को जोड़कर वर्गमूल निकालने से छायाकर्ण आता है। छायाकर्ण के वर्ग में से शंकु के वर्ग को घटाकर वर्गमूल निकालने से [चित्र: शंकु, छाया, छायाकर्ण, चित्र ४८] छाया और छाया के वर्ग को घटाकर वर्गमूल निकालने से शंकु आता है। विज्ञान भाष्य—समकोण त्रिभुज के दो भुज ज्ञात हों तो तीसरा भुज जानने की जो रीति है वही यहाँ शंकु, छाया और छायाकर्ण के सम्बन्ध में भी लागू है। इस श्लोक का सार यह है :— छाया कर्ण = √शंकु² + छाया²; छाया = √कर्ण² – शंकु²; शंकु = √कर्ण² – छाया² अयनांश जानने की रीति त्रिंशत्कृत्या युगे भांशैश्चक्रं प्राक्परिलम्बते । तद्गुणाद्भूदिनैर्भक्ताद् द्युगणाद्यदवाप्यते ॥६॥ तद्दोस्त्रिघ्ना दशाप्तांशा विज्ञेया अयनाभिधाः । तत्संयुक्ताद् ग्रहात्क्रान्तिश्छायाचरदलादिकम् ॥१०॥
२३० सूर्य-सिद्धान्त अनुवाद—(६) एक युग में नक्षत्र-चक्र ६०० बार पूर्व की ओर लोलक की तरह आन्दोलन (oscillation) करता है। इस ६०० को इष्ट अहर्गण से गुणा करके महायुगीय सावन दिनों की संख्या से भाग देने पर जो आवे (१०) उसका भुज बनाकर भुज को ३ से गुणा करके १० से भाग दे दो। ऐसा करने से जो कुछ आवे वही अयनांश कहलाता है। ग्रहों के स्थानों में इसका संस्कार देकर तब ग्रहों की क्रान्ति, छाया, चरदल इत्यादि जानना चाहिये। विज्ञान भाष्य—क्रान्तिवृत्त और विषुवद्वृत्त के जिस सामान्य बिन्दु पर उत्तरगामी सूर्य आता है उसको वसंत-सम्पात (vernal equinox) कहते हैं। वसंत- सम्पात से आगे ९० अंश पर जब सूर्य पहुँच जाता है तब उसकी उत्तर की ओर बढ़ने की गति रुक जाती है और दक्षिण की ओर लौटने लगता है। इसी समय दक्षिणायन का आरंभ होता है। इसलिए जिस बिन्दु पर पहुँच कर सूर्य दक्षिण की ओर मुड़ता है उसे दक्षिणायन बिन्दु (summer solstice) कहते हैं। दक्षिणायन के आरंभ से जब तक सूर्य दक्षिण की ओर चलता रहता है तब तक के समय को भी जो ६ मास के समान होता है दक्षिणायन कहते हैं। दक्षिणायन के आरंभ से ३ मास बाद सूर्य विषुवद्वृत्त पर फिर आता है। इस बिन्दु को शरद-सम्पात कहते हैं क्योंकि इसी समय शरद ऋतु का आरंभ होता है। शरद-सम्पात से ९०° आगे तक सूर्य दक्षिण की ओर चलता रहता है फिर उत्तर की लोट पड़ता है। जिस बिन्दु पर पहुँच कर सूर्य उत्तर की ओर लौटने लगता है उस बिन्दु को उत्तरायन बिन्दु (winter solstice) कहते हैं। इसी समय से उत्तरायन का आरंभ होता है। उत्तरायन और दक्षिणायन बिन्दुओं को अयन बिन्दु कहते हैं। चित्र ३६ में व, द, श और उ क्रम से वसंत सम्पात, दक्षिणायन बिन्दु, शरद सम्पात और उत्तरायन बिन्दु हैं। जो वृत्त अयन बिन्दुओं, आकाशीय ध्रुवों और कदम्बों पर हो कर जाता है उसे अयनान्त वृत्त (Solstitial colure) कहते हैं। चित्र ३६ में दा द ध क ऊ उ वृत्त अयनान्त वृत्त है। यह अयन बिन्दु आकाश में सदा एक ही जगह नहीं रहते वरन् पच्छिम की ओर खसक रहे हैं इसलिए जिस नक्षत्र या तारा समूह के पास आजकल उत्तरायण या दक्षिणायन होता है उसी तारे के पास प्राचीन काल में नहीं होता था। वेदांग¹ १. प्रपद्येते श्रविष्ठादौ सूर्याचन्द्रमसावुदक् । सार्पार्धे दक्षिणार्कस्तु माघ श्रावणयोः सदा ॥ याजुष ज्योतिष श्लोक ७ और आर्च ज्योतिष श्लोक ६
विप्रश्नाधिकार २३१ ज्योतिष में लिखा है कि जब सूर्य श्रविष्ठा या धनिष्ठा नामक नक्षत्र के आदि में होता था तब उत्तरायण का आरंभ होता था और जब सूर्य अश्लेषा नक्षत्र के आधे भाग पर पहुँचता था तब दक्षिणायन का आरंभ होता था । बराहमिहिर बाराही १ संहिता में इसकी चर्चा करते हुए लिखते हैं कि प्राचीन काल में आश्लेषा के आधे पर दक्षिणायन और श्रविष्ठा के आदि पर उत्तरायण होता था परन्तु अब कर्क राशि में प्रवेश करते ही सूर्य दक्षिणायन और मकर राशि में प्रवेश करते ही उत्तरायण होता है । यदि ऐसा न हो तो वेध करके निश्चय करना चाहिए । आजकल दक्षिणायन का आरंभ आर्द्रा नक्षत्र के आरंभ में और उत्तरायण का आरंभ मूल के आधे भाग पर होता है । इस तरह सिद्ध है कि उत्तरायण विन्दु वेदांग ज्योतिष काल में धनिष्ठा के आदि में था और अब मूल के आधे पर । इसलिए स्पष्ट है कि अयन पच्छिम की ओर खसक रहा है। इसके कारण वसंत सम्पात विन्दु या शरद सम्पात विन्दु भी पच्छिम की ओर खसक रहा है। वसंत सम्पात विन्दु के खसकने को यूरोपीय ज्योतिषी precession of equinoxes कहते हैं इसलिए हमारे ज्योतिषियों ने जिस घटना को अयन-चलन के नाम से लिखा है उसी को पाश्चात्य ज्योतिषी precession of equinoxes कहते हैं। भास्कराचार्य जी २ ने अयन चलन और विषुवत्क्रान्ति-वलय- पातचलन दोनों का समान अर्थ किया है । अयन चलन के सम्बन्ध में हमारे प्राचीन ज्योतिषियों के मतों में बड़ी भिन्नता है । सूर्य-सिद्धान्त का मत है कि नक्षत्र चक्र का आदि विन्दु अ लोलक (pendulum) की तरह वसंत सम्पात व के दोनों ओर २७ अंश तक परिलम्बन या आंदोलन करता है (चित्र ४६) । अ को अश्विनी का आदि विन्दु भी कहते हैं । इस आंदोलन का अर्थ यह हुआ कि युग के आरंभ में वसंत सम्पात और अश्विनी का आदि विन्दु एक साथ थे । इसके पश्चात् अश्विनी का आदि विन्दु पूर्व की ओर खसकने लगा और जब वसंत सम्पात से २७ अंश तक आगे बढ़ गया तब यह फिर वसंत सम्पात की १. आश्लेषादर्द्धाद्दक्षिणमुत्तरमयनं रवेर्धनिष्ठाद्यम् । नूनंकदाचिदासीद्येनोक्तं पूर्व शास्त्रेषु ।।१।। साम्प्रतमयनं सवितुः कर्कटकाद्यं मृगादितश्चान्यत् । उक्ताभावे विकृतिः प्रत्यक्ष परीक्षणैर्यक्तिः ।।२।। बाराही संहिता, आदित्यचार पृष्ठ १६, १७ । २. तस्य (विषुवत्क्रान्तिवलयपातस्य) अपि चलनमास्त । येऽयनचलन भागाः प्रसिद्धास्तएव विलोमगस्य क्रान्ति पातस्य भागाः । गोलाध्याय पृष्ठ ५५
२३२ सूर्य-सिद्धान्त ओर लौटने लगा और धीरे-धीरे वसंत सम्पात के साथ हो गया । इसके पश्चात् वसंत सम्पात से पच्छिम की ओर जाने लगा और २७ अंश जाकर फिर वसंत सम्पात की ओर लौटा और धीरे-धीरे वसंत सम्पात के पास फिर पहुँच गया । इस क्रम को एक पूर्ण आंदोलन (oscillation) कहते हैं। ऐसे ऐसे ६०० आंदोलन एक महायुग में अर्थात् ४३,२०,००० सौर वर्षों में होते हैं । इसलिए एक आंदोलन ७२०० सौर वर्षों में तथा चौथाई आंदोलन अथवा २७° की गति १८०० सौर वर्षों में होती है ।
चित्र ४६
यह जानने के लिए कि अश्विनी का आदि बिन्दु वसंत सम्पात से किस समय कितनी दूर है अर्थात् अयनांश क्या है, ६-१० श्लोकों में कहे गये नियम को काम में लाना चाहिए जो एक उदाहरण से स्पष्ट हो जायगा । मान लो १६८२ वि० का अयनांश जानना है । सृष्टि के आरंभ से वर्तमान कलियुग के आरंभ तक १,९५,५८,८०,००० सौर वर्ष बीते* जिसमें ७२०० वर्षों में एक आंदोलन के हिसाब से २,७१,६५० आंदोलन पूरे हो गये इसलिए कलियुग के आरंभ में नये आंदोलन का आरंभ हुआ । इसलिए अयनांश जानने के लिए कलियुगादि अहर्गण से ही काम लेने में सुविधा
- देखो मध्यमाधिकार विज्ञान भाष्य
त्रिप्रश्नाधिकार २३३
होगी। नियम में अहर्गण से काम लेने को कहा गया है परन्तु मेष संक्रान्ति काल का अयनांश जानने के लिए सौर वर्षों से ही काम लेने में कोई अशुद्धि नहीं हो सकती। कलियुग के आरंभ से १६८२ वि० की मेष संक्रान्ति तक ५०२६ सौर वर्ष होते हैं। इसलिए, ७२०० : ५०२६ : : १ आंदोलन : इष्ट आंदोलन अर्थात्, इष्ट आन्दोलन = ५०२६ / ७२०० = (५०२६ × ३६०) / ७२०० अंश = २५१° १८' यह तीसरे पाद में है। इसलिए स्पष्टाधिकार के ३०वें श्लोक के अनुसार ७१° १८' तीसरे पाद का गत भाग ही भुज हुआ। इसको ३ से गुणा करके १० से भाग देने पर २१°२३' २४" अयनांश होता है। मेष संक्रान्ति से जितनें दिन पीछे का अयनांश जानना हो उतने दिन की गति वर्ष में ५४" के हिसाब से निकाल कर मेष संक्रान्ति काल के अयनांश में जोड़ देने से इष्ट काल का अयनांश ज्ञात हो जायगा। यह स्पष्ट है कि भुज का परम मान ६०° होता है इसलिए यदि इसको ३ से गुणा करके १० से भाग दिया जाय तो २७° आता है जो सूर्य-सिद्धान्त के मत से अयनांश का परम मान है। यहाँ एक बात ध्यान देने की है। ६वें श्लोक में कहा गया है कि नक्षत्र-चक्र पूर्व की ओर परिलम्बन करता है अर्थात् आन्दोलन आरम्भ करने पर पहले वह पूर्व की ओर चलता है। इसलिए जब तक वह वसन्त सम्पात से २७ अंश पूर्व की ओर बढ़ता रहता है तब तक प्रथम पाद में होता है, जब वह पूर्व से वसन्त सम्पात की ओर लौटता रहता है तब तक दूसरे पाद में रहता है, जब तक वसन्त सम्पात से २७ अंश पच्छिम की ओर बढ़ता रहता है तब तक वह तीसरे पाद में रहता है और जब वह पच्छिम से वसन्त सम्पात की ओर लौटता रहता है तब तक चौथे पाद में रहता है। इसलिए ऊपर की गणना से सिद्ध है कि अश्विनी का आदि विन्दु वसन्त सम्पात से २१°२३' २४" पच्छिम है। परन्तु यथार्थ में अश्विनी का आदि विन्दु इस समय वसन्त सम्पात से पूर्व है जैसा कि अगले ११वें श्लोक से भी स्पष्ट होता है इसलिए यह मानना पड़ेगा कि अश्विनी का आदि विन्दु आन्दोलन आरम्भ करने पर पहले पच्छिम की ओर बढ़ता है जो श्लोक के विरुद्ध है। इसलिए जान पड़ता है कि आचार्य
२३४ सूर्य-सिद्धान्त ने वसन्त सम्पात को ही अश्विनी के आदि विन्दु के दोनों ओर २७° पूर्व और पश्चिम आन्दोलन करता हुआ माना है और पाठ में किसी कारण गड़बड़ हो गया है। क्योंकि अन्य आचार्यों ने अयनान्त-वृत्त या क्रान्तिपात को ही चलता हुआ माना है। जब १८०० वर्ष में अयन २७ अंश चलता है तब १ वर्ष में ५४ विकला गति होती है। इसलिए सूर्य-सिद्धान्त के मत से दो बातें सिद्ध होती हैं—(१) वसन्त सम्पात अश्विनी के आदि से २७ अंश आगे पीछे हो सकता है तथा (२) इसकी वार्षिक गति ५४ विकला है। अयन-चलन का कारण क्या है यह भारतीय ज्योतिष में कहीं नहीं मिलता। रंगनाथजी ने अपनी गूढ़ार्थ प्रकाशिका टीका में ईश्वर की इच्छा को ही इसका कारण माना है। जो मत सूर्य-सिद्धान्त का है वही सोम-सिद्धान्त, * रोमश-सिद्धान्त, * शाकल्य ब्रह्म-सिद्धान्त,* और लघुवशिष्ठ-सिद्धान्त* का है। द्वितीय आर्यभट* और पराशर* जी ने भी अयन का पूर्ण भगण नहीं माना है, परन्तु इनके मत से वसन्त सम्पात २४ अंश ही मूल बिन्दु से पूर्व पश्चिम जाता है न कि २७°। द्वितीय आर्यभट ने अयनांश जानने की जो रीति बतलायी है उससे जान पड़ता है कि अयन चलन की वार्षिक गति सदा समान नहीं होती। हाँ मध्यम वार्षिक गति ४६.३ विकला मानी गयी है।† पराशर जी ने वार्षिक गति ४६.५ विकला मानी है।† इसके प्रतिकूल मुंजाल १ का मत है कि अयन या वसन्त सम्पात विलोम दिशा में भ्रमण करता हुआ पूरा चक्कर लगाता है और एक कल्प में १,६६,६६६ भगण करता है। इसी को भास्कराचार्य २ जी ने भी माना है। इस हिसाब से अयन की वार्षिक गति ५६.६००७ विकला होती है जो प्रायः १ कला के लगभग है। इसलिए व्यवहार में मुंजाल, भास्कराचार्य, गणेश दैवज्ञ इत्यादि ने १ कला अयन की वार्षिक गति मानी है। वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त इत्यादि ने अयनांश का संस्कार करने की बात नहीं लिखी है। जान पड़ता है कि इनके समय में अयनांश का परिमाण बहुत कम था *भारतीय ज्योतिष शास्त्र पृष्ठ ३२८ तथा जोगेशचन्द्र राय सम्पादित सिद्धान्त दर्पण का Introduction pp. 39-40 † भारतीय ज्योतिष शास्त्र पृष्ठ ३३०-३३१ तथा महासिद्धान्त पृष्ठ ६,४५,५७ १. गोलाध्याय पृष्ठ ५४ २. मुंजाल का लघुमानस ६८६ वि० के लगभग बना है (देखो भारतीय ज्योतिष शास्त्र पृष्ठ ३१३)
त्रिप्रश्नाधिकार २३५ तथा अयन चलन का ज्ञान भी इनको नहीं हुआ था । वराहमिहिर ने तो केवल इतना लिख दिया है कि पहले धनिष्ठा के आदि में उत्तरायण होता था और इनके समय में मकर के आदि में अर्थात् उत्तराषाढ़ के प्रथम पाद पर । इतना और भी कहा है कि यदि विकार हो तो प्रत्यक्ष वेध से काम लेना चाहिए । इसके सिवा अयन जानने का कोई नियम नहीं लिखा है । ब्रह्मगुप्त ने तो कोई संकेत भी नहीं किया है। इसका कारण भास्कराचार्य१ जी यह लिखते हैं कि ब्रह्मगुप्त के२ समय में अयनांश बहुत कम था इसलिए उनको इसका पता नहीं लग सका । वसंत संपात के चलने का ज्ञान यूनानी ज्योतिषी हिपार्कस (Hipparchus) को विक्रम संवत से कोई ७० वर्ष पहले हो चुका था । तारों की सूची बनाने पर इनको ज्ञात हुआ कि इनसे कोई डेढ़ सौ वर्ष पहले जो सूची बनी थी उसकी अपेक्षा इस सूची में वसंत सम्पात से प्रत्येक तारे का अंतर कोई २ अंश अधिक हो गया था । जिससे इन्होंने यह परिणाम निकाला कि वसंत सम्पात पीछे खसक रहा है । इन्होंने वसंत सम्पात की जो वार्षिक गति निकाली थी वह कम से३ कम ३६ विकला थी । वसंत सम्पात की यही गति टालमी४ (Ptolemy) ने विक्रम की तीसरी शताब्दी के आरंभ में निश्चय की । इसके बाद यूनानी ज्योतिष में वसंत सम्पात के चलने के सम्बन्ध में तथा अन्य बातों में भी कोई उन्नति५ नहीं हुई । अलबटानी नामक अरब के एक राजकुमार ने जो एक निपुण ज्योतिषी था ६३७ वि० के लगभग वसंत सम्पात की वार्षिक गति कुछ शुद्धतापूर्वक निश्चय की । शंकर बालकृष्ण दीक्षित६ लिखते हैं कि अलबटानी ने सम्पात चलन की वार्षिक गति ५५.५ विकला निश्चित की थी । इसके बाद नसीरउद्दीन ने७ वर्तमान ईरान के उत्तरी पश्चिमी सीमा के पास वेधालय स्थापित करके वसंत संपात की वार्षिक गति ५१ विकला विक्रम की १४वीं शताब्दी के आरंभ में निश्चय की । १. गोलाध्याय पृष्ठ ५५ । २. जन्म संवत् ६५५ वि०, ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त का रचना-काल सम्वत् ६८५ वि० । देखो ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त पृष्ठ ४०७ । ३. Berry's Short History of Astronomy pp 51-52 तथा Encyclopaedia Brittanica, Eleventh edition pp. 810. ४. Berry's Short History of Astronomy pp. 68-69. ५. उपरोक्त, पृष्ठ ७३ । ६. भारतीय ज्योतिष शास्त्र पृष्ठ ३६५ । ७. Berry's History of Astronomy pp. 81-82.
२३६ सूर्य-सिद्धान्त आजकल बहुत सूक्ष्मयंत्रों के द्वारा वसंत संपात की वार्षिक गति का सूत्र निउकंब १ (Newcomb) के अनुसार यह है। ५०''.२४५३ + ०''.०००२२२५ व जहाँ व, १८५० ई० अथवा १९०७ वि० के बाद के बीते हुए वर्षों की संख्या है। इस हिसाब से १६८२ वि० के आरंभ में वसंत सम्पात की वार्षिक गति ५०''.२४५३ + ०''.०००२२२५ × ७५ = ५०''.२६२ भारतीय, यूनानी, अरबी तथा यूरोपीय विद्वानों के अयन चलन संबंधी विचारों की चर्चा संक्षेप में इसलिए की गयी जिससे प्रकट हो जाय कि इस संबंध में हमारे ज्योतिषियों के विचार कितने स्वतंत्र हैं। अब यह प्रश्न होता है कि हमारे ज्योतिषियों ने अयन की वार्षिक गति १ कला क्यों मानी है जब कि शुद्ध गति ५०.२६२ विकला के लगभग है। इसका कारण यह है कि हमारे ज्योतिषी अयनांश इस अंतर को कहते हैं जो विषुव सम्पात से मेष के आदि विन्दु का होता है। और मेष का आदि विन्दु वह वेध से नहीं निश्चय करते वरन् गणना से करते हैं। गणना के लिए हमारे यहाँ सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार ३६५ दिन १५ घड़ी ३१ पल ३१.४ विपल का वर्ष माना जाता है जब कि आधुनिक खोज के अनुसार शुद्ध वर्ष का मान ३६५ दिन १५ घड़ी २२ पल ५६.८७ विपल होता है (देखो मध्यमाधिकार पृष्ठ २० की सारिणी)। इस तरह हमारे वर्ष का मान शुद्ध वर्ष से ८ पल ३४.५३ विपल अधिक है। इतने समय में सूर्य ५८' ४२''.४६ * प्रति दिन के हिसाब से ८.३६१ विकला चलता है। इसलिए शुद्ध वर्ष के अनुसार यदि वसंत सम्पात की गति ५०''.२६२ होती है तो हमारे वर्ष के अनुसार स्पष्ट मेष संक्रान्ति के विन्दु से वसंत सम्पात ५०.''२६२ + ८''.३६१ = ५८''.६५३ विकला पच्छिम हो जाता है। अर्थात् यदि सौर वर्ष का मान वह रखा जाय जो सूर्य-सिद्धान्त का है तो प्रतिवर्ष ५८''.६५३ वसंत संपात की गति मानने से शुद्धता होती है। इससे सिद्ध होता है कि मुंजाल, भास्कराचार्य, गणेश इत्यादि ने अयन की गति जो १ कला या ६० विकला मानी है वह इस समय सत्य से केवल १.३४७ विकला अधिक है। जिस समय मुंजाल ने प्रत्यक्ष वेध से अयन गति ५६.६००७ विकला निश्चय किया था उस समय अशुद्धि तनिक सी और रही होगी क्योंकि ६८६ विक्रमीय में शुद्ध अयन गति १. Ball's Spherical Astronomy pp. 187. *यह मेष संक्रान्ति के दिन सूर्य की स्पष्ट दैनिक गति है और सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार निकाली गयी है।
त्रिप्रश्नाधिकार २३७ ५०″.२४५३—०.००० २२२५×(१६०७—६८६) =५०″.२४५३—.२०४३ =५०″.०४१ रही होगी । इससे प्रकट है कि हमारे आचार्यों ने अपने स्वतंत्र और निराले ढंग से अयन की गति इतनी सूक्ष्म निकाली थी कि वह सत्य से केवल १.५६८ विकला अधिक थी जो उस समय के स्थूल यंत्रों के विचार से बहुत ही सराहनीय है । अब संक्षेप में इस बात पर विचार किया जायगा कि अयन की गति लोलक की गति की तरह होती है जैसा कि सूर्य-सिद्धान्त, सोम-सिद्धान्त, पराशर-सिद्धान्त और उ चित्र ५० महासिद्धान्त का मत है अथवा पूर्ण भ्रमण होता है जैसा कि मुंजाल या भास्कराचार्य इत्यादि का मत है । सूर्य-सिद्धान्त आदि ग्रन्थों में यह नहीं लिखा मिलता कि अयन की गति लोलक की गति की तरह क्यों होती है । ब्रेनैड¹ ने और शायद इन्हीं के आधार पर विज्ञानानन्द² स्वामी ने इसको समझाने का प्रयत्न इस प्रकार किया है:— १. Brennand’s History of Hindu Astromomy, London 1896. २. श्री सूर्य-सिद्धान्त बङ्गानुवाद तथा टीका, कलकत्ता १६०६ ई०
२३८ सूर्य-सिद्धान्त मानलो उ व द श क्रान्तिवृत्त और क इसके ध्रुव अर्थात् कदम्ब का छेदक (projection) है। घ विषुवद्वृत्त का उत्तरी ध्रुव (pole) और क ध द अयनान्त- वृत्त (solstitial colure) का छेदक है। प फ घ ब उस मार्ग का छेदक समझो जिस मार्ग से उत्तरी ध्रुव कदम्ब की परिक्रमा अयन चलन के कारण विलोम गति से कर रहा है। दु द्रू क्रान्तिवृत्त के वह बिन्दु हैं जहाँ तक दक्षिणायन बिन्दु द, अयन चलन के कारण परिलंबन करता है इसलिए द से दु या द्रू २७° के अंतर पर है। सिद्धान्त के मत से क ध अर्थात् उत्तरी ध्रुव से कदम्ब की दूरी २४° है। दु और द्रू बिन्दुओं से फ और ब बिन्दुओं पर स्पर्शरेखाएँ दु फ और द्रू ब खींचो जो एक दूसरे को ह बिन्दु पर काटती हैं। जितनी देर में ध ब प फ वृत्त पर ध ३६० अंश चलता है उतनी देर में द बिन्दु द से द्रू तक जाता है, फिर द्रू से द तक लौट कर दु तक पहुँचता है और दु से द तक फिर आ जाता है। इसलिए जब तक ध्रुव कदंब की परिक्रमा करता है तब तक नक्षत्रचक्र ह बिन्दु के दोनों ओर लोलक की तरह आंदोलन करता हुआ देख पड़ता है। परन्तु इससे कुछ संतोष नहीं होता क्योंकि प्राचीन लेखों से यह सिद्ध होता है कि वसंत संपात बिन्दु अश्विनी के आरंभ स्थान से २७ अंश से भी आगे रहा है। शतपथ १ ब्राह्मण में लिखा है कि कृत्तिकाएँ ठीक पूर्व दिशा में उदय होती हैं और अन्य तारे पूर्व दिशा से हटकर उदय होते हैं जिससे स्पष्ट है कि उस समय कृतिकाएँ ठीक विषुवद्वृत्त पर थीं। आजकल यह प्रयाग में कोई २७° उत्तर उदय होती हैं। इससे यह गणना की जा सकती है कि जिस समय कृत्तिकाएँ विषुवद्वृत्त पर थीं उस समय वसंत सम्पात बिन्दु कहां था। कृत्तिका के योग तारा (n – Tauri) का भोग ३६°६' और शर प्रत्यक्ष बेध २ से ४°२' होता है। यदि क्रान्तिवृत्त और विषुवद्वृत्त के बीच का कोण (परम अपक्रम) २४° मान लिया जाय तो यह सहज ही जाना जा सकता है कि शतपथ ब्राह्मण काल में कृत्तिका का भोग वसंत सम्पात से क्या था। चित्र ५१ में व आजकल का वसंत सम्पात बिन्दु और प व पा विषुवद् वृत्त है। और वा शतपथ-ब्राह्मण काल का वसंत सम्पात बिन्दु तथा च कृ वा विषुवद् १. एकं द्वे त्रीणि चत्वारीति वा अन्यानि नक्षत्राण्यथैता एव भूयिष्ठा यत्कृत्ति कास्तद्भूमानमेवैतदुपैति तस्मात्कृत्तिका स्वादधीत ॥२॥ 'एता ह वै प्राच्यै दिशो न च्यवंते सर्वाणि ह वा अन्यानि नक्षत्राणि प्राच्यै दिशश्च्यवंते तत्प्राच्यामेवास्यैतद्दिश्या हितो भवतस्तस्मात् कृत्तिका स्वादधीत ॥ ३ ॥ शतपथ ब्राह्मण २. १.२. [भारतीय ज्योतिष शास्त्र पृष्ठ १२७ में उद्धृत] २. भारतीय ज्योतिष शास्त्र पृष्ठ ४५५ ।
वृत्त है । कृ कृत्तिका तारापुंज है जो विषुवद्वृत्त पर दिखलाया गया है । कृद कृत्ति- का का कदम्बाभिमुख शर है जो ४°२' माना गया है । द वा कृत्तिका का शतपथ ब्राह्मण काल का ऋणात्मक भोग है, अ अश्विनी का आदि बिन्दु तथा अ द कृत्तिका का भोग है जो ३६°६' माना गया है । अ व अयनांश है जो १६८२ वि० के मेष संक्रान्ति के दिन २२°४१' के लगभग है । गोलीय समकोण त्रिभुज कृ वा द में नेपियर के नियम के अनुसार, ज्या (द वा) = स्पर्शरेखा (कृ द) × स्पर्शरेखा (६०° - < कृ वा द) = स्पर्शरेखा ४°२' × स्पर्शरेखा (६०° - २४°) = .०७०५ × २.२४६० = .१५८३ ∴ दवा = ६°६' ∴ कृत्तिका का भोगांश शतपथ-ब्राह्मण काल में वसंत सम्पात से ६°६' पश्चिम था । ∴ व वा = व अ + अ द + द वा = २२°४१' + ३६°६' + ६°६' = ६७°५६' चित्र ५१
२४० सूर्य-सिद्धान्त इसलिए यह सिद्ध है कि वसंत सम्पात बिन्दु शतपथ ब्राह्मण के समय जहाँ था उससे इस समय ६७°५६' पच्छिम है। परन्तु सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार वसंत सम्पात बिन्दुओं का महत्तम अंतर ५४° से अधिक नहीं होना चाहिये। इसलिए यह सिद्ध होता है कि सूर्य-सिद्धान्त का यह मत है कि वसंत सम्पात बिन्दु मध्यम स्थान से २७° पूर्व और पच्छिम जाता है ठीक नहीं है। इस संबन्ध में केई¹ महाशय कहते हैं कि कृत्तिका से कृत्तिका तारापुंज (Pleiades) को नहीं समझना चाहिये वरन् वसंत सम्पात को समझना चाहिये जैसे आजकल युरोपीय विद्वान सायनमेष (First point of Aries) को समझते हैं। ऐसा मानने से शतपथ ब्राह्मण काल उतना प्राचीन नहीं ठहरता जितना पूर्वोक्त गणना से ठहरता है। पूर्वोक्त गणना से शतपथ ब्राह्मण का समय आज से कोई ४८६७ वर्ष पूर्व अथवा विक्रम से २८८५ वर्ष पूर्व सिद्ध होता है जो केई महाशय को असम्भव जान पड़ता है। परन्तु मेरी समझ में केई महाशय भ्रम में हैं। पूर्वोक्त अवतरण में जहाँ कृत्तिका शब्द आया है वहां इसका प्रयोग बहुवचन में है जिससे प्रकट है कि कृत्तिका का अर्थ कृत्तिका तारा पुंज है जिसमें कोरी आँख से ६ तारे देख पड़ते हैं। यदि इसका अर्थ वसंत सम्पात बिंदु होता तो बहुवचन में प्रयोग कदापि न होता। इसके सिवा यह विचार करने की बात है कि जब कृत्तिका उसी नाम के तारापुंज को न समझकर वसंत सम्पात बिंदु को समझा जाय तो क्या इस बिंदु को देखकर पूर्व दिशा का ज्ञान हो सकता है ? क्या आजकल सायनमेष को देखकर पूर्व दिशा का ज्ञान हो सकता हैं अथवा अग्रहायण पुंज के इल्वक के प्रथम तारे (δ orionis) से जो आजकल प्रायः विषुववृत्त पर है ? इस विषय को बहुत न बढ़ाकर अब संक्षेप में यह बतलाया जायगा कि आजकल के भौतिक ज्योतिष शास्त्र (physical astronomy) के अनुसार अयन चलन या वसंत सम्पात के पीछे खसकने का क्या कारण है, जिससे यह भी सिद्ध हो जायगा कि इसका पूर्ण भगण होता है न कि लोलक की तरह आंदोलन। प्रत्यक्ष वेध से क्या परिणाम निकलता है ? यदि किसी तारे के किसी समय के विषुवांश और क्रांति की तुलना उसी तारे के अन्य समय के विषुवांश और क्रान्ति से की जाय तो देख पड़ता है कि इनमें बहुत १. Memoirs of Archaeological Survey of India No. 18. Hindu Astronomy by G. R. Kaye pp. 23-24.
त्रिप्रश्नाधिकार २४१ अन्तर होता जाता है । उदाहरण के लिए ध्रुवतारे १ (polaris) के विषुवांश २ और क्रान्ति यही हैं :- १८५० ई० की पहली जनवरी को { विषुवांश १ घ० ५ मि० २३ से० { क्रान्ति + ८८° ३०' ४६" १९०० ई० की { विषुवांश १ घंटा २३ मिनट ० सेकंड पहली जनवरी को { क्रान्ति + ८८° ४६' ५३" यह कहा जा सकता है कि विषुवांश और क्रांति के परिवर्तन का कारण यह है कि तारा स्वयं चलता है । दूसरा अनुमान यह हो सकता है कि विषुवांश और क्रान्ति जिन भुजयुग्मों (axes of coordinates) से निश्चय किये जाते हैं उन्हीं में परिवर्तन होता होगा । ५० वर्ष में ध्रुवतारे की क्रांति १६' ४" अधिक हुई जिससे स्पष्ट होता है कि ध्रुवतारे से ध्रुव का अन्तर प्रायः १६" प्रतिवर्ष कम हो रहा है अर्थात् या तो ध्रुवतारा ध्रुव की ओर जा रहा है या ध्रुव ध्रुव-तारे की ओर जा रहा है। जब अन्य तारों से ध्रुवतारा के अन्तरों की तुलना की जाती है तो देख पड़ता है कि इनमें परस्पर इतनी भिन्नता नहीं हो रही है जितनी ध्रुव और ध्रुवतारे में हो रही है । ध्रुवतारे में जो स्वयं गति (proper motion) है वह इतनी सूक्ष्म है कि इससे १६" प्रति वर्ष का अंतर नहीं पड़ सकता । यह भी देखा गया है कि ५० वर्षों में ध्रुव से अन्य तारों का भी अन्तर बहुत कम पड़ गया है परन्तु उनका परस्पर अंतर प्रायः जैसे का तैसा ही है। इन सब बातों से यही परिणाम निकलता है कि ध्रुव ओर ध्रुवतारे के बीच का अन्तर ध्रुवतारे की गति के कारण नहीं कम हो रहा है वरन् आकाशीय ध्रुव की गति के कारण कम हो रहा है । यदि ध्रुव अपना स्थान सदैव बदलता रहता है तो यह भी आवश्यक है कि विषुवद्वृत्त भी जो ध्रुव से सदैव ९० अंश दूर रहता है अपना स्थान निरन्तर बदला करे । पर विषुवद्वृत्त के चलते रहने पर भी क्रान्तिवृत्त से उसका जो मध्यम झुकाव है वह सदैव प्रायः एक सा रहता है । यह झुकाव मध्यम मान से केवल कुछ कलाएँ इधर उधर आन्दोलन करता है । सूर्य की परम क्रान्ति १८५० ई० में जितनी थी प्रायः उतनी ही १९०० ई० में थी इसलिए विषुवद्वृत्त और क्रान्ति वृत्त के बीच १. Balls' Spherical Astronomy pp. 171. साधारणतः लोग समझते हैं कि ध्रुवतारा एक ही जगह देख पड़ता है और इसी की परिक्रमा अन्य तारे करते हैं परन्तु यह ठीक नहीं है । ध्रुवतारा भी आकाशीय ध्रुव की जो अदृश्य है परिक्रमा करता है और उसके बहुत पास है इसलिए कुछ भेद नहीं जान पड़ता । २. देखो चित्र ४० और इसका वर्णन । १६