सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिप्रश्नाधिकार २२५
चित्र ४४
हुई इष्ट भुज के समान सीधी रेखा खींचो जो परिधि तक पहुँचे । परिधि के जिस विन्दु तक भुज की नोक पहुँचे उसको शंकु के मध्य से मिला दो तो छाया की दिशा ज्ञात होगी । विज्ञान भाष्य — चित्र ४५ में श शंकु का केन्द्र है और श छ किसी समय की छाया है । श को केन्द्र मानकर श छ के व्यासार्द्ध से परिधि खींची गयी है । प पू पूर्वापरा रेखा अथवा पूर्व-पच्छिम रेखा है और उ द उत्तर-दक्खिन रेखा है । पूर्वापरा रेखा से छाया की नोक छ का अन्तर छ भ के समान और उत्तर-दक्खिन रेखा से छ का अंतर छ क के समान है । छ भ को छाया का भुज और छ क को छाया की कोटि कहते हैं । इस श्लोक का अर्थ यह है कि यदि छाया और भुज की नाप ज्ञात हो तो छाया की दिशा कैसे जानी जा सकती है । आजकल की प्रथा के अनुसार इसको यों कह सकते हैं कि यदि छाया की नोक के भुजयुग्म (coordinates) ज्ञात हों तो छाया कैसे खींची जा सकती है । पूर्वापरा रेखा से छाया की नोक के अंतर का छाया का भुज और उत्तर-दक्खिन रेखा से छाया की नोक के अंतर का १५