सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२४ सूर्य-सिद्धान्त काल आगे और पीछे, छाया की लम्बाई भी समान* होती है। इसलिए जब छाया की लम्बाई खिंचे हुए वृत्त के व्यासार्द्ध के समान हो तब इनके बीच में जो कोण बनता है उसको दो समान भागों में विभाजित करने वाली रेखा ही उत्तर-दक्षिण- रेखा होगी । इसी समविभाजक रेखा को खींचने के लिए समान व्यासार्द्ध के धनु खींचकर तिमि बनाने का आदेश दिया गया है जो रेखागणित की विधि के अनुसार है। इसी नियम के अनुसार अन्य दिशाओं को सूचित करने वाली रेखाएँ खींची जा सकती हैं। वृत्त पर जो पूर्वाह्न और अपराह्न विन्दु छाया की नोक के द्वारा स्थिर किये जाते हैं उनको मिलाने वाली रेखा भी पूर्व-पच्छिम-रेखा है परन्तु भविष्य में गड़े हुए शंकु से काम लेने के लिए आवश्यक है कि दिशासूचक जितनी रेखाएं खींची जायें वह सब शंकु के मध्य से होकर जायें। इसलिए वृत्त के उत्तर दक्षिण विन्दुओं से तिमि बनाकर पूर्व-पच्छिम-रेखा खींचने का आदेश है । क्रान्ति के सदैव बदलते रहने के कारण जो तनिक सी स्थूलता आ जाती है उसके संशोधन के लिए भास्कराचार्य † जी तथा अन्य ज्योतिर्विदों ने नियम बनाये हैं परन्तु उनके वर्णन करने की आवश्यकता नहीं जान पड़ती । इन संशोधनों से उपर्युक्त रीति की सरलता जाती रहती है। यदि शुद्धता के लिए कठिन नियम की आवश्यकता हो तो दिगंश जानने की रीति से ही क्यों न काम लिया जाय जिसकी चर्चा इसी अध्याय में की जायगी । चतुरश्रं बहिः कुर्यात्सूत्रैर्मध्याद्विनिर्गतैः । भुजसूत्राङ्गुलेस्तत्र दत्तेरिष्टप्रभागतः ।।५।। अनुवाद - (५) केन्द्र से उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पच्छिम रेखाएं छाया के समान व्यासार्द्ध से खींची गयी परिधि के जिन विन्दुओं पर पहुँचती हैं उनको स्पर्श करती हुई रेखाएँ खींच कर समचतुर्भुज क्षेत्र बनाओ । पूर्वापर रेखा से समकोण बनाती
- सूर्य की क्रान्ति सदैव बदलती रहती है इसलिए मध्याह्न के पहले और पीछे की क्रान्तियों में कुछ अंतर पड़ जाता है जिससे उपर्युक्त कथन में कुछ स्थूलता आ जाती है परन्तु यह नहीं के समान समझना चाहिए । जिस समय क्रान्ति की गति बहुत मन्द होती है अर्थात् जिस समय सूर्य उत्तरायन या दक्षिणायन विन्दुओं के पास रहता है उस समय यह बात अधिक शुद्ध होगी । †तत्कालापमजीवयोस्तु विवराद्वाकर्णमित्याहतालम्बज्याप्तमिताङ्गुलै- रयनदिश्यैन्द्री स्फुटा चालिता ।।८।। गणिताध्याय, त्रिप्रश्नाधिकार पृष्ठ १०४-१०५