भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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त्रिप्रश्नाधिकार २२३ तेंदू के कच्चे फल, कैथा के कच्चे फल, सेमल के फूल, सल्लकी के बीज, बंधन की छाल और बव इन सबको जल में पकाकर काढ़ा बनावे, जब आठवां भाग पानी रह जाय तब उतार कर इसमें श्रीवास (सरल वृक्ष का गोंद) रस, गूगल, भिलावा, कुंदरू, राल, अलसी और बेल की गिरी पीसकर मिलावे तो वज्रलेप तैयार होता है । तिमि - यदि दो वृत्त एक दूसरे को काटते हुए खींचे जायँ तो इनके बीच का भाग मछली के आकार का हो जाता है । इसी को तिमि कहते हैं । चित्र ४४ में वृत्त के मध्य में श शंकु का स्थान है । मध्याह्न के पहले शंकु की छाया जब श क के समान होती है तब इसकी नोक परिधि के क बिन्दु पर पहुँचती है । मध्याह्न के पीछे जब छाया श ख के समान फिर होती है तब इसकी नोक परिधि के ख बिन्दु पर पहुँचती है । बस इन्हीं क, ख बिन्दुओं को केन्द्र मानकर समान व्यासार्द्ध के दो वृत्त ऐसे खींचे जिनसे ग घ क्षेत्र तिमि के आकार का बनता है । इसके सामान्य बिन्दुओं को मिलाने वाली रेखा ही उत्तर दक्षिण रेखा है । यह रेखा पहले वृत्त को जिन बिन्दुओं पर काटती है उन पर उत्तर दिशा सूचित करने के लिए उ और दक्षिण दिशा सूचित करने के लिए द लिख देना चाहिये । फिर उ और द को केन्द्र मानकर समान व्यासार्द्ध के दो और धनु खींचकर इनके सामान्य बिन्दुओं को एक सीधी रेखा से मिला दो । इसी को पूर्व-पश्चिम रेखा कहेंगे । पच्छिम दिशा सूचित करने के लिए प और पूर्व दिशा के लिए पू लिखना चाहिये । फिर उ और प बिन्दुओं को केन्द्र मान कर समान व्यासार्द्ध के दो धनु खींचकर उनके सामान्य बिन्दुओं को मिलाने वाली रेखा उ और प के बीच में जिस बिन्दु पर परिधि को काटेगी वह वायव्य कोण की दिशा और पू द के बीच में जिस बिन्दु पर काटेगी वह अग्नि कोण की दिशा होगी । इसी प्रकार ईशान और नैऋत्य कोण की दिशा भी जानी जा सकती है । उपपत्ति-उदय के समय सूर्य पूर्व क्षितिज के जिस बिन्दु पर देख पड़ता है उससे दक्षिण की ओर खसकता हुआ ऊँचा उठता जाता है और किसी खड़ी लकड़ी या शंकु की छाया छोटी होती हुई उत्तर की ओर खसकती जाती है । मध्याह्न काल में सूर्य यामोत्तर-वृत्त पर आ जाता है । उस समय छाया सबसे छोटी और ठीक उत्तर दिशा में होती है । इसके बाद सूर्य कुछ कुछ उत्तर की ओर खसकता हुआ नीचे उतरने लगता है और छाया उत्तर दिशा से पूर्व की ओर खसकती हुई बड़ी होती जाती है । मध्याह्न काल से जितना समय पहले शंकुकी छाया उत्तर दिशा से जितना बड़ा कोण बनाती हुई पच्छिम की ओर रहती है, मध्याह्न से उतना ही समय पीछे छाया उत्तर दिशा से उतना ही बड़ा कोण बनाती हुई पूर्व की ओर रहती है । मध्याह्न से समान