भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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२२६ सूर्य-सिद्धान्त छाया की कोटि कहते हैं । किसी समय की छाया और इसके भुज में जो सम्बन्ध होता है वह २३-२४ श्लोकों में बतलाया गया है । यदि छ श रेखा बढ़ायी जाय तो वह परिधि को स बिन्दु पर काटेगी । इसी श स दिशा में सूर्य होगा जब कि शंकु की छाया श छ होगी । इस समय सूर्य पूर्व बिन्दु पू से जितना दक्षिण है वह पू श स कोण से जाना जा सकता है । यही कोण इस समय सूर्य की अग्रा है । उत्तर बिन्दु उ से सूर्य उ श स कोण के अंतर पर है । यही कोण इस समय सूर्य का दिगंश (azimuth) है । इस चित्र में सूर्य पूर्वापर रेखा से दक्खिन है । यदि सूर्य पूर्वापरा रेखा से उत्तर हो तो छाया, अग्रा, भुज, इत्यादि ४६ चित्र के अनुसार होंगी । जिस दिन सूर्य विषुवद्वृत्त पर होता है उस दिन अर्थात् सायन मेष या सायन तुला संक्रान्ति के दिन मध्याह्न में शंकु की छाया जितनी बड़ी होती है उसको विषुवद्भा, पलभा या अक्षभा कहते हैं । यदि श स्थान की पलभा श व के समान हो तो व से पूर्वापरा रेखा के समानान्तर खींची गयी त थ रेखा को विषुवद्भाप्रगा रेखा कहते हैं । छाया की नोक से विषुवद्भाग्रगा रेखा का जो अन्तर होता है वही अग्राज्या कहलाता है । ४५-४६ चित्रों में छ अ अग्राज्या है । ★सममण्डल, उन्मण्डल और विषुवन्मण्डल★ प्राक्पश्चिमाश्रिता रेखा प्रोच्यते सममण्डलम् । उन्मण्डलं च विषुवन्मण्डलं परिकीर्त्यते ॥६॥